Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো নবগ্রহাকৃতিবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो नवग्रहाकृतिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো নবগ্রহাকৃতিবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो नवग्रहाकृतिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
বালগ্রহাণাং বিজ্ঞানং সাধনং চাপ্যনন্তরম্ | উত্পত্তিং কারণং চৈব সুশ্রুতৈকমনাঃ শৃণু ||৩||
बालग्रहाणां विज्ञानं साधनं चाप्यनन्तरम् | उत्पत्तिं कारणं चैव सुश्रुतैकमनाः शृणु ||३||
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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
স্কন্দগ্রহস্তু প্রথমঃ স্কন্দাপস্মার এব চ | শকুনী রেবতী চৈব পূতনা চান্ধপূতনা ||৪|| পূতনা শীতনামা চ তথৈব মুখমণ্ডিকা | নবমো নৈগমেষশ্চ যঃ পিতৃগ্রহসঞ্জ্ঞিতঃ ||৫||
स्कन्दग्रहस्तु प्रथमः स्कन्दापस्मार एव च | शकुनी रेवती चैव पूतना चान्धपूतना ||४|| पूतना शीतनामा च तथैव मुखमण्डिका | नवमो नैगमेषश्च यः पितृग्रहसञ्ज्ञितः ||५||
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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
ধাত্রীমাত্রোঃ প্রাক্প্রদিষ্টাপচারাচ্ছৌচভ্রষ্টান্মঙ্গলাচারহীনান্ | ত্রস্তান্ হৃষ্টাংস্তর্জিতান্ তাডিতান্ বা পূজাহেতোর্হিংস্যুরেতে কুমারান্ ||৬||
धात्रीमात्रोः प्राक्प्रदिष्टापचाराच्छौचभ्रष्टान्मङ्गलाचारहीनान् | त्रस्तान् हृष्टांस्तर्जितान् ताडितान् वा पूजाहेतोर्हिंस्युरेते कुमारान् ||६||
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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
ঐশ্বর্যস্থাস্তে ন শক্যা বিশন্তো দেহং দ্রষ্টুং মানুষৈর্বিশ্বরূপাঃ | আপ্তং বাক্যং তত্সমীক্ষ্যাভিধাস্যে লিঙ্গান্যেষাং যানি দেহে ভবন্তি ||৭||
ऐश्वर्यस्थास्ते न शक्या विशन्तो देहं द्रष्टुं मानुषैर्विश्वरूपाः | आप्तं वाक्यं तत्समीक्ष्याभिधास्ये लिङ्गान्येषां यानि देहे भवन्ति ||७||
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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
শূনাক্ষঃ ক্ষতজসগন্ধিকঃ স্তনদ্বিড্ বক্রাস্যো হতচলিতৈকপক্ষ্মনেত্রঃ | উদ্বিগ্নঃ সুলুলিতচক্ষুরল্পরোদী স্কন্দার্তো ভবতি চ গাঢমুষ্টিবর্চাঃ ||৮||
शूनाक्षः क्षतजसगन्धिकः स्तनद्विड् वक्रास्यो हतचलितैकपक्ष्मनेत्रः | उद्विग्नः सुलुलितचक्षुरल्परोदी स्कन्दार्तो भवति च गाढमुष्टिवर्चाः ||८||
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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9
নিঃসঞ্জ্ঞো ভবতি পুনর্ভবেত্সসঞ্জ্ঞঃ সংরব্ধঃ করচরণৈশ্চ নৃত্যতীব | বিণ্মূত্রে সৃজতি বিনদ্য জৃম্ভমাণঃ ফেনং চ প্রসৃজতি তত্সখাভিপন্নঃ ||৯||
निःसञ्ज्ञो भवति पुनर्भवेत्ससञ्ज्ञः संरब्धः करचरणैश्च नृत्यतीव | विण्मूत्रे सृजति विनद्य जृम्भमाणः फेनं च प्रसृजति तत्सखाभिपन्नः ||९||
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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10
স্রস্তাঙ্গো ভযচকিতো বিহঙ্গগন্ধিঃ সংস্রাবিব্রণপরিপীডিতঃ সমন্তাত্ | স্ফোটৈশ্চ প্রচিততনুঃ সদাহপাকৈর্বিজ্ঞেযো ভবতি শিশুঃ ক্ষতঃ শকুন্যা ||১০||
स्रस्ताङ्गो भयचकितो विहङ्गगन्धिः संस्राविव्रणपरिपीडितः समन्तात् | स्फोटैश्च प्रचिततनुः सदाहपाकैर्विज्ञेयो भवति शिशुः क्षतः शकुन्या ||१०||
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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
রক্তাস্যো হরিতমলোঽতিপাণ্ডুদেহঃ শ্যাবো বা জ্বরমুখপাকবেদনার্তঃ | রেবত্যা ব্যথিততনুশ্চ কর্ণনাসং মৃদ্নাতি ধ্রুবমভিপীডিতঃ কুমারঃ ||১১||
रक्तास्यो हरितमलोऽतिपाण्डुदेहः श्यावो वा ज्वरमुखपाकवेदनार्तः | रेवत्या व्यथिततनुश्च कर्णनासं मृद्नाति ध्रुवमभिपीडितः कुमारः ||११||
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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
স্রস্তাঙ্গঃ স্বপিতি সুখং দিবা ন রাত্রৌ বিড্ ভিন্নং সৃজতি চ কাকতুল্যগন্ধিঃ | ছর্দ্যাঽঽর্তো হৃষিততনূরুহঃ কুমারস্তৃষ্ণালুর্ভবতি চ পূতনাগৃহীতঃ ||১২||
स्रस्ताङ्गः स्वपिति सुखं दिवा न रात्रौ विड् भिन्नं सृजति च काकतुल्यगन्धिः | छर्द्याऽऽर्तो हृषिततनूरुहः कुमारस्तृष्णालुर्भवति च पूतनागृहीतः ||१२||
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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
যো দ্বেষ্টি স্তনমতিসারকাসহিক্কাচ্ছর্দীভির্জ্বরসহিতাভিরর্দ্যমানঃ | দুর্বর্ণঃ সততমধঃশযোঽম্লগন্ধিস্তং ব্রূযুর্ভিষজ ইহান্ধপূতনার্তম্ ||১৩||
यो द्वेष्टि स्तनमतिसारकासहिक्काच्छर्दीभिर्ज्वरसहिताभिरर्द्यमानः | दुर्वर्णः सततमधःशयोऽम्लगन्धिस्तं ब्रूयुर्भिषज इहान्धपूतनार्तम् ||१३||
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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14
উদ্বিগ্নো ভৃশমতিবেপতে প্ররুদ্যাত্ সংলীনঃ স্বপিতি চ যস্য চান্ত্রকূজঃ | বিস্রাঙ্গো ভৃশমতিসার্যতে চ যস্তং জানীযাদ্ভিষগিহ শীতপূতনার্তম্ ||১৪||
उद्विग्नो भृशमतिवेपते प्ररुद्यात् संलीनः स्वपिति च यस्य चान्त्रकूजः | विस्राङ्गो भृशमतिसार्यते च यस्तं जानीयाद्भिषगिह शीतपूतनार्तम् ||१४||
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Adhikarana 13 (15) · Śloka 15
ম্লানাঙ্গঃ সুরুচিরপাণিপাদবক্ত্রো বহ্বাশী কলুষসিরাবৃতোদরো যঃ | সোদ্বেগো ভবতি চ মূত্রতুল্যগন্ধিঃ স জ্ঞেযঃ শিশুরিহ বক্ত্রমণ্ডিকার্তঃ ||১৫||
म्लानाङ्गः सुरुचिरपाणिपादवक्त्रो बह्वाशी कलुषसिरावृतोदरो यः | सोद्वेगो भवति च मूत्रतुल्यगन्धिः स ज्ञेयः शिशुरिह वक्त्रमण्डिकार्तः ||१५||
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Adhikarana 14 (16) · Śloka 16
যঃ ফেনং বমতি বিনম্যতে চ মধ্যে সোদ্বেগম্ বিলপতি চোর্ধ্বমীক্ষমাণঃ | জ্বর্যেত প্রততমথো বসাসগন্ধির্নিঃসঞ্জ্ঞো ভবতি হি নৈগমেষজুষ্টঃ ||১৬||
यः फेनं वमति विनम्यते च मध्ये सोद्वेगम् विलपति चोर्ध्वमीक्षमाणः | ज्वर्येत प्रततमथो वसासगन्धिर्निःसञ्ज्ञो भवति हि नैगमेषजुष्टः ||१६||
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Adhikarana 15 (17) · Śloka 17
প্রস্তব্ধো যঃ স্তনদ্বেষী মুহ্যতে চাবিশন্মুহুঃ | তং বালমচিরাদ্ধন্তি গ্রহঃ সম্পূর্ণলক্ষণঃ ||১৭||
प्रस्तब्धो यः स्तनद्वेषी मुह्यते चाविशन्मुहुः | तं बालमचिराद्धन्ति ग्रहः सम्पूर्णलक्षणः ||१७||
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Adhikarana 16 (18) · Śloka 18
বিপরীতমতঃ সাধ্যং চিকিত্সেদচিরার্দিতম্ |১৮|
विपरीतमतः साध्यं चिकित्सेदचिरार्दितम् |१८|
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Adhikarana 17 (18-20) · Śloka 20
গৃহে পুরাণহবিষাঽভ্যজ্য বালং শুচৌ শুচিঃ ||১৮|| সর্ষপান্ প্রকিরেত্তেষাং তৈলৈর্দীপং চ কারযেত্ | সদা সন্নিহিতং চাপি জুহুযাদ্ধব্যবাহনম্ ||১৯|| সর্বগন্ধৌষধীবীজৈর্গন্ধমাল্যৈরলঙ্ক্রতম্ | অগ্নযে কৃত্তিকাভ্যশ্চ স্বাহা স্বাহেতি সন্ততম্ ||২০||
गृहे पुराणहविषाऽभ्यज्य बालं शुचौ शुचिः ||१८|| सर्षपान् प्रकिरेत्तेषां तैलैर्दीपं च कारयेत् | सदा सन्निहितं चापि जुहुयाद्धव्यवाहनम् ||१९|| सर्वगन्धौषधीबीजैर्गन्धमाल्यैरलङ्क्रतम् | अग्नये कृत्तिकाभ्यश्च स्वाहा स्वाहेति सन्ततम् ||२०||
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Adhikarana 18 (21) · Śloka 21
নমঃ স্কন্দায দেবায গ্রহাধিপতযে নমঃ | শিরসা ত্বাঽভিবন্দেঽহং প্রতিগৃহ্ণীষ্ব মে বলিম্ | নীরুজো নির্বিকারশ্চ শিশুর্মে জাযতাং দ্রুতম্ ||২১||
नमः स्कन्दाय देवाय ग्रहाधिपतये नमः | शिरसा त्वाऽभिवन्देऽहं प्रतिगृह्णीष्व मे बलिम् | नीरुजो निर्विकारश्च शिशुर्मे जायतां द्रुतम् ||२१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 27
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কুমারতন্ত্রে নবগ্রহাকৃতিবিজ্ঞানীযো নাম (প্রথমোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) সপ্তবিংশোঽধ্যাযঃ ||২৭||
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे नवग्रहाकृतिविज्ञानीयो नाम (प्रथमोऽध्यायः, आदितः) सप्तविंशोऽध्यायः ||२७||
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