Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতঃ স্কন্দাপস্মারপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
বিল্বঃ শিরীষো গোলোমী সুরসাদিশ্চ যো গণঃ |
পরিষেকে প্রযোক্তব্যঃ স্কন্দাপস্মারশান্তযে ||৩||
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अथातः स्कन्दापस्मारप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
बिल्वः शिरीषो गोलोमी सुरसादिश्च यो गणः |
परिषेके प्रयोक्तव्यः स्कन्दापस्मारशान्तये ||३||
Adhikarana 2 (4) · Śloka 5
সর্বগন্ধবিপক্বং তু তৈলমভ্যঞ্জনে হিতম্ |
ক্ষীরবৃক্ষকষাযে চ কাকোল্যাদৌ গণে তথা ||৪||
বিপক্তব্যং ঘৃতং চাপি পানীযং পযসা সহ |৫|
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सर्वगन्धविपक्वं तु तैलमभ्यञ्जने हितम् |
क्षीरवृक्षकषाये च काकोल्यादौ गणे तथा ||४||
विपक्तव्यं घृतं चापि पानीयं पयसा सह |५|
Adhikarana 3 (5-6) · Śloka 6
উত্সাদনং বচাহিঙ্গুযুক্তং স্কন্দগ্রহে হিতম্ ||৫||
গৃধ্রোলূকপুরীষাণি কেশা হস্তিনখা ঘৃতম্ |
বৃষভস্য চ রোমাণি যোজ্যান্যুদ্ধূপনেঽপি চ ||৬||
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उत्सादनं वचाहिङ्गुयुक्तं स्कन्दग्रहे हितम् ||५||
गृध्रोलूकपुरीषाणि केशा हस्तिनखा घृतम् |
वृषभस्य च रोमाणि योज्यान्युद्धूपनेऽपि च ||६||
Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
অনন্তাং কুক্কুটীং বিম্বীং মর্কটীং চাপি ধারযেত্ |৭|
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अनन्तां कुक्कुटीं बिम्बीं मर्कटीं चापि धारयेत् |७|
Adhikarana 5 (7) · Śloka 8
পক্বাপক্বানি মাংসানি প্রসন্না রুধিরং পযঃ ||৭||
ভূতৌদনো নিবেদ্যশ্চ স্কন্দাপস্মারিণেঽবটে |৮|
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पक्वापक्वानि मांसानि प्रसन्ना रुधिरं पयः ||७||
भूतौदनो निवेद्यश्च स्कन्दापस्मारिणेऽवटे |८|
Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
চতুষ্পথে চ কর্তব্যং স্নানমস্য যতাত্মনা ||৮||
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चतुष्पथे च कर्तव्यं स्नानमस्य यतात्मना ||८||
Adhikarana 7 (9) · Śloka 9
স্কন্দাপস্মারসঞ্জ্ঞো যঃ স্কন্দস্য দযিতঃ সখা |
বিশাখসঞ্জ্ঞশ্চ শিশোঃ শিবোঽস্তু বিকৃতাননঃ ||৯||
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स्कन्दापस्मारसञ्ज्ञो यः स्कन्दस्य दयितः सखा |
विशाखसञ्ज्ञश्च शिशोः शिवोऽस्तु विकृताननः ||९||
Adhikarana puShpikA · Śloka 29
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কুমারতন্ত্রে স্কন্দাপস্মারপ্রতিষেধো নাম (তৃতীযোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) একোনত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||২৯||
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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे स्कन्दापस्मारप्रतिषेधो नाम (तृतीयोऽध्यायः, आदितः) एकोनत्रिंशोऽध्यायः ||२९||