Skip to content
AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
Open navigation
Explore AyurvedaBook appointment

38. yōnivyāpatpratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো যোনিব্যাপত্প্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

View original

अथातो योनिव्यापत्प्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 2 (3) · Śloka 4

প্রবৃদ্ধলিঙ্গং পুরুষং যাঽত্যর্থমুপসেবতে | রূক্ষদুর্বলবালা যা তস্যা বাযুঃ প্রকুপ্যতি ||৩|| স দুষ্টো যোনিমাসাদ্য যোনিরোগায কল্পতে |৪|

View original

प्रवृद्धलिङ्गं पुरुषं याऽत्यर्थमुपसेवते | रूक्षदुर्बलबाला या तस्या वायुः प्रकुप्यति ||३|| स दुष्टो योनिमासाद्य योनिरोगाय कल्पते |४|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 6

ত্রযাণামপি দোষাণাং যথাস্বং লক্ষণেন তু ||৪|| বিংশতির্ব্যাপদো যোনের্নির্দিষ্টা রোগসঙ্গ্রহে | মিথ্যাচারেণ যাঃ স্ত্রীণাং প্রদুষ্টেনার্তবেন চ ||৫|| জাযন্তে বীজদোষাচ্চ দৈবাচ্চ শৃণু তাঃ পৃথক্ |৬|

View original

त्रयाणामपि दोषाणां यथास्वं लक्षणेन तु ||४|| विंशतिर्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोगसङ्ग्रहे | मिथ्याचारेण याः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्तवेन च ||५|| जायन्ते बीजदोषाच्च दैवाच्च शृणु ताः पृथक् |६|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 4 (6-8) · Śloka 9

উদাবর্তা তথা বন্ধ্যা বিপ্লুতা চ পরিপ্লুতা ||৬|| বাতলা চেতি বাতোত্থাঃ, পিত্তোত্থা রুধিরক্ষরা | বামিনী স্রংসিনী চাপি পুত্রঘ্নী পিত্তলা চ যা ||৭|| অত্যানন্দা চ যা যোনিঃ কর্ণিনী চরণাদ্বযম্ | শ্লেষ্মলা চ কফাজ্জ্ঞেযা, ষণ্ডাখ্যা ফলিনী তথা ||৮|| মহতী সূচিবক্ত্রা চ সর্বজেতি ত্রিদোষজা |৯|

View original

उदावर्ता तथा वन्ध्या विप्लुता च परिप्लुता ||६|| वातला चेति वातोत्थाः, पित्तोत्था रुधिरक्षरा | वामिनी स्रंसिनी चापि पुत्रघ्नी पित्तला च या ||७|| अत्यानन्दा च या योनिः कर्णिनी चरणाद्वयम् | श्लेष्मला च कफाज्ज्ञेया, षण्डाख्या फलिनी तथा ||८|| महती सूचिवक्त्रा च सर्वजेति त्रिदोषजा |९|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 5 (9-11) · Śloka 11

সফেনিলমুদাবর্তা রজঃ কৃচ্ছ্রেণ মুঞ্চতি ||৯|| বন্ধ্যাং নষ্টার্তবাং বিদ্যাদ্বিপ্লুতাং নিত্যবেদনাম্ | পরিপ্লুতাযাং ভবতি গ্রাম্যধর্মে রুজা ভৃশম্ ||১০|| বাতলা কর্কশা স্তব্ধা শূলনিস্তোদপীডিতা | চতসৃষ্বপি চাদ্যাসু ভবন্ত্যনিলবেদনাঃ ||১১||

View original

सफेनिलमुदावर्ता रजः कृच्छ्रेण मुञ्चति ||९|| वन्ध्यां नष्टार्तवां विद्याद्विप्लुतां नित्यवेदनाम् | परिप्लुतायां भवति ग्राम्यधर्मे रुजा भृशम् ||१०|| वातला कर्कशा स्तब्धा शूलनिस्तोदपीडिता | चतसृष्वपि चाद्यासु भवन्त्यनिलवेदनाः ||११||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 6 (12-14) · Śloka 14

সদাহং প্রক্ষরত্যস্রং যস্যাং সা লোহিতক্ষরা | সবাতমুদ্গিরেদ্বীজং বামিনী রজসা যুতম্ ||১২|| প্রস্রংসিনী স্যন্দতে তু ক্ষোভিতা দুঃপ্রসূশ্চ যা | স্থিতং স্থিতং হন্তি গর্ভং পুত্রঘ্নী রক্তসংস্রবাত্ ||১৩|| অত্যর্থং পিত্তলা যোনির্দাহপাকজ্বরান্বিতা | চতসৃষ্বপি চাদ্যাসু পিত্তলিঙ্গোচ্ছ্রযো ভবেত্ ||১৪||

View original

सदाहं प्रक्षरत्यस्रं यस्यां सा लोहितक्षरा | सवातमुद्गिरेद्बीजं वामिनी रजसा युतम् ||१२|| प्रस्रंसिनी स्यन्दते तु क्षोभिता दुःप्रसूश्च या | स्थितं स्थितं हन्ति गर्भं पुत्रघ्नी रक्तसंस्रवात् ||१३|| अत्यर्थं पित्तला योनिर्दाहपाकज्वरान्विता | चतसृष्वपि चाद्यासु पित्तलिङ्गोच्छ्रयो भवेत् ||१४||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 7 (15-17) · Śloka 17

অত্যানন্দা ন সন্তোষং গ্রাম্যধর্মেণ গচ্ছতি | কর্ণিন্যাং কর্ণিকা যোনৌ শ্লেষ্মাসৃগ্ভ্যং প্রজাযতে ||১৫|| মৈথুনেঽচরণা পূর্বং পুরুষাদতিরিচ্যতে | বহুশশ্চাতিচরণাদন্যা বীজং ন বিন্দতি ||১৬|| শ্লেষ্মলা পিচ্ছিলা যোনিঃ কণ্ডূযুক্তাঽতিশীতলা | চতসৃষ্বপি চাদ্যাসু শ্লেষ্মলিঙ্গোচ্ছ্রিতির্ভবেত্ ||১৭||

View original

अत्यानन्दा न सन्तोषं ग्राम्यधर्मेण गच्छति | कर्णिन्यां कर्णिका योनौ श्लेष्मासृग्भ्यं प्रजायते ||१५|| मैथुनेऽचरणा पूर्वं पुरुषादतिरिच्यते | बहुशश्चातिचरणादन्या बीजं न विन्दति ||१६|| श्लेष्मला पिच्छिला योनिः कण्डूयुक्ताऽतिशीतला | चतसृष्वपि चाद्यासु श्लेष्मलिङ्गोच्छ्रितिर्भवेत् ||१७||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 8 (18-20) · Śloka 20

অনার্তবস্তনা ষণ্ডী খরস্পর্শা চ মৈথুনে | অতিকাযগৃহীতাযাস্তরুণ্যাঃ ফলিনী ভবেত্ ||১৮|| বিবৃতাঽতিমহাযোনিঃ সূচীবক্ত্রাঽতিসংবৃতা | সর্বলিঙ্গসমুত্থানা সর্বদোষপ্রকোপজা ||১৯|| চতসৃষ্বপি চাদ্যাসু সর্বলিঙ্গোচ্ছ্রিতির্ভবেত্ | পঞ্চাসাধ্যা ভবন্তীমা যোনযঃ সর্বদোষজাঃ ||২০||

View original

अनार्तवस्तना षण्डी खरस्पर्शा च मैथुने | अतिकायगृहीतायास्तरुण्याः फलिनी भवेत् ||१८|| विवृताऽतिमहायोनिः सूचीवक्त्राऽतिसंवृता | सर्वलिङ्गसमुत्थाना सर्वदोषप्रकोपजा ||१९|| चतसृष्वपि चाद्यासु सर्वलिङ्गोच्छ्रितिर्भवेत् | पञ्चासाध्या भवन्तीमा योनयः सर्वदोषजाः ||२०||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 9 (21) · Śloka 21

প্রতিদোষং তু সাধ্যাসু স্নেহাদিক্রম ইষ্যতে | দদ্যাদুত্তরবস্তীংশ্চ বিশেষেণ যথোদিতান্ ||২১||

View original

प्रतिदोषं तु साध्यासु स्नेहादिक्रम इष्यते | दद्यादुत्तरबस्तींश्च विशेषेण यथोदितान् ||२१||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 10 (22-23) · Śloka 24

কর্কশাং শীতলাং স্তব্ধামল্পস্পর্শাং চ মৈথুনে | কুম্ভীস্বেদৈরুপচরেত্ সানূপৌদকসংযুতৈঃ ||২২|| মধুরৌষধসংযুক্তান্ বেশবারাংশ্চ যোনিষু | নিক্ষিপেদ্ধারযেচ্চাপি পিচুতৈলমতন্দ্রিতঃ ||২৩|| ধাবনানি চ পথ্যানি কুর্বীতাপূরণানি চ |২৪|

View original

कर्कशां शीतलां स्तब्धामल्पस्पर्शां च मैथुने | कुम्भीस्वेदैरुपचरेत् सानूपौदकसंयुतैः ||२२|| मधुरौषधसंयुक्तान् वेशवारांश्च योनिषु | निक्षिपेद्धारयेच्चापि पिचुतैलमतन्द्रितः ||२३|| धावनानि च पथ्यानि कुर्वीतापूरणानि च |२४|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 11 (24) · Śloka 24

ওষচোষান্বিতাসূক্তং কুর্যাচ্ছীতং বিধিং ভিষক্ ||২৪||

View original

ओषचोषान्वितासूक्तं कुर्याच्छीतं विधिं भिषक् ||२४||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 12 (25) · Śloka 25

দুর্গন্ধাং পিচ্ছিলাং চাপি চূর্ণৈঃ পঞ্চকষাযজৈঃ | পূরযেদ্রাজবৃক্ষাদিকষাযৈশ্চাপি ধাবনম্ ||২৫||

View original

दुर्गन्धां पिच्छिलां चापि चूर्णैः पञ्चकषायजैः | पूरयेद्राजवृक्षादिकषायैश्चापि धावनम् ||२५||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 13 (26) · Śloka 26

যোন্যাং তু পূযস্রাবিণ্যাং শোধনদ্রব্যসম্ভৃতৈঃ | সগোমূত্রৈঃ সলবণৈঃ শোধনং হিতমিষ্যতে ||২৬||

View original

योन्यां तु पूयस्राविण्यां शोधनद्रव्यसम्भृतैः | सगोमूत्रैः सलवणैः शोधनं हितमिष्यते ||२६||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 14 (27-30) · Śloka 30

বৃহতীফলকল্কস্য দ্বিহরিদ্রাযুতস্য চ | কণ্ডূমতীমল্পস্পর্শাং পূরযেদ্ধূপযেত্তথা ||২৭|| বর্তিং প্রদদ্যাত্ কর্ণিন্যাং শোধনদ্রব্যসম্ভৃতাম্ | প্রস্রংসিনীং ঘৃতাভ্যক্তাং ক্ষীরস্বিন্নাং প্রবেশযেত্ ||২৮|| পিধায বেশবারেণ ততো বন্ধং সমাচরেত্ | প্রতিদোষং বিদধ্যাচ্চ সুরারিষ্টাসবান্ ভিষক্ ||২৯|| প্রাতঃ প্রাতর্নিষেবেত রসোনাদুদ্ধৃতং রসম্ | ক্ষীরমাংসরসপ্রাযমাহারং বিদধীত চ ||৩০||

View original

बृहतीफलकल्कस्य द्विहरिद्रायुतस्य च | कण्डूमतीमल्पस्पर्शां पूरयेद्धूपयेत्तथा ||२७|| वर्तिं प्रदद्यात् कर्णिन्यां शोधनद्रव्यसम्भृताम् | प्रस्रंसिनीं घृताभ्यक्तां क्षीरस्विन्नां प्रवेशयेत् ||२८|| पिधाय वेशवारेण ततो बन्धं समाचरेत् | प्रतिदोषं विदध्याच्च सुरारिष्टासवान् भिषक् ||२९|| प्रातः प्रातर्निषेवेत रसोनादुद्धृतं रसम् | क्षीरमांसरसप्रायमाहारं विदधीत च ||३०||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 15 (31-32) · Śloka 32

শুক্রার্তবাদযো দোষাঃ স্তনরোগাশ্চ কীর্তিতাঃ | ক্লৈব্যস্থানানি মূঢস্য গর্ভস্য বিধিরেব চ ||৩১|| গর্ভিণীপ্রতিরোগেষু চিকিত্সা চাপ্যুদাহৃতা | সর্বথা তাং প্রযুঞ্জীত যোনিব্যাপত্সু বুদ্ধিমান্ | অপপ্রজাতারোগাংশ্চ চিকিত্সেদুত্তরাদ্ভিষক্ ||৩২||

View original

शुक्रार्तवादयो दोषाः स्तनरोगाश्च कीर्तिताः | क्लैब्यस्थानानि मूढस्य गर्भस्य विधिरेव च ||३१|| गर्भिणीप्रतिरोगेषु चिकित्सा चाप्युदाहृता | सर्वथा तां प्रयुञ्जीत योनिव्यापत्सु बुद्धिमान् | अपप्रजातारोगांश्च चिकित्सेदुत्तराद्भिषक् ||३२||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana puShpikA · Śloka 2

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কুমারতন্ত্রে যোনিব্যাপত্প্রতিষেধো নাম(দ্বাদশোঽধ্যাযঃ, আদিতোঽ)ষ্টত্রিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৩৮|| উত্তরতন্ত্রে দ্বিতীযং কৌমারতন্ত্রং সমাপ্তম্ ||২||

View original

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे योनिव्यापत्प्रतिषेधो नाम(द्वादशोऽध्यायः, आदितोऽ)ष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः ||३८|| उत्तरतन्त्रे द्वितीयं कौमारतन्त्रं समाप्तम् ||२||

🔊 Audio coming soon