Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো গ্রহোত্পত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो ग्रहोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো গ্রহোত্পত্তিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो ग्रहोत्पत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
নব স্কন্দাদযঃ প্রোক্তা বালানাং য ইমে গ্রহাঃ | শ্রীমন্তো দিব্যবপুষো নারীপুরুষবিগ্রহাঃ ||৩||
नव स्कन्दादयः प्रोक्ता बालानां य इमे ग्रहाः | श्रीमन्तो दिव्यवपुषो नारीपुरुषविग्रहाः ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
এতে গুহস্য রক্ষার্থং কৃত্তিকোমাগ্নিশূলিভিঃ | সৃষ্টাঃ শরবণস্থস্য রক্ষিতস্যাত্মতেজসা ||৪||
एते गुहस्य रक्षार्थं कृत्तिकोमाग्निशूलिभिः | सृष्टाः शरवणस्थस्य रक्षितस्यात्मतेजसा ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
স্ত্রীবিগ্রহা গ্রহা যে তু নানারূপা মযেরিতাঃ | গঙ্গোমাকৃত্তিকানাং তে ভাগা রাজসতামসাঃ ||৫||
स्त्रीविग्रहा ग्रहा ये तु नानारूपा मयेरिताः | गङ्गोमाकृत्तिकानां ते भागा राजसतामसाः ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
নৈগমেষস্তু পার্বত্যা সৃষ্টো মেষাননো গ্রহাঃ | কুমারধারী দেবস্য গুহস্যাত্মসমঃ সখা ||৬||
नैगमेषस्तु पार्वत्या सृष्टो मेषाननो ग्रहाः | कुमारधारी देवस्य गुहस्यात्मसमः सखा ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
স্কন্দাপস্মারসঞ্জ্ঞো যঃ সোঽগ্নিনাঽগ্নিসমদ্যুতিঃ | স চ স্কন্দসখা নাম বিশাখ ইতি চোচ্যতে ||৭||
स्कन्दापस्मारसञ्ज्ञो यः सोऽग्निनाऽग्निसमद्युतिः | स च स्कन्दसखा नाम विशाख इति चोच्यते ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
স্কন্দঃ সৃষ্টো ভগবতা দেবেন ত্রিপুরারিণা | বিভর্তি চারপরাং সঞ্জ্ঞাং কুমার ইতি স গ্রহঃ ||৮||
स्कन्दः सृष्टो भगवता देवेन त्रिपुरारिणा | बिभर्ति चारपरां सञ्ज्ञां कुमार इति स ग्रहः ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
বাললীলাধরো যোঽযং দেবো রুদ্রাগ্নিসম্ভবঃ | মিথ্যাচারেষু ভগবান্ স্বযং নৈষ প্রবর্ততে ||৯||
बाललीलाधरो योऽयं देवो रुद्राग्निसम्भवः | मिथ्याचारेषु भगवान् स्वयं नैष प्रवर्तते ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
কুমারঃ স্কন্দসামান্যাদত্র কেচিদপণ্ডিতাঃ | গৃহ্ণাতীত্যল্পবিজ্ঞানা ব্রুবতে দেহচিন্তকাঃ ||১০||
कुमारः स्कन्दसामान्यादत्र केचिदपण्डिताः | गृह्णातीत्यल्पविज्ञाना ब्रुवते देहचिन्तकाः ||१०||
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Adhikarana 10 (11-20) · Śloka 21
ততো ভগবতি স্কন্দে সুরসেনাপতৌ কৃতে | উপতস্থুর্গ্রহাঃ সর্বে দীপ্তশক্তিধরং গুহম্ ||১১|| ঊচুঃ প্রাঞ্জলযশ্চৈনং বৃত্তিং নঃ সংবিধত্স্ব বৈ | তেষামর্থে ততঃ স্কন্দঃ শিবং দেবমচোদযত্ ||১২|| ততো গ্রহাংস্তানুবাচ ভগবান্ ভগনেত্রহৃত্ | তির্যগ্যোনিং মানুষং চ দৈবং চ ত্রিতযং জগত্ ||১৩|| পরস্পরোপকারেণ বর্ততে ধার্যতেঽপি চ | দেবা মনুষ্যান্ প্রীণন্তি তৈর্যগ্যোনীংস্তথৈব চ ||১৪|| বর্তমানৈর্যথাকালং শীতবর্ষোষ্ণমারুতৈঃ | ইজ্যাঞ্জলিনমস্কারজপহোমব্রতাদিভিঃ ||১৫|| নরাঃ সম্যক্ প্রযুক্তৈশ্চ প্রীণন্তি ত্রিদিবেশ্বরান্ | ভাগধেযং বিভক্তং চ শেষং কিঞ্চিন্ন বিদ্যতে ||১৬|| তদ্যুষ্মাকং শুভা বৃত্তির্বালেষ্বেব ভবিষ্যতি | কুলেষু যেষু নেজ্যন্তে দেবাঃ পিতর এব চ ||১৭|| ব্রাহ্মণাঃ সাধবশ্চৈব গুরবোঽতিথযস্তথা | নিবৃত্তাচারশৌচেষু পরপাকোপজীবিষু ||১৮|| উত্সন্নবলিভিক্ষেষু ভিন্নকাংস্যোপভোজিষু | গৃহেষু তেষু যে বালাস্তান্ গৃহ্ণীধ্বমশঙ্কিতাঃ ||১৯|| তত্র বো বিপুলা বৃত্তিঃ পূজা চৈব ভবিষ্যতি | এবং গ্রহাঃ সমুত্পন্না বালান্ গৃহ্ণন্তি চাপ্যতঃ ||২০|| গ্রহোপসৃষ্টা বালাস্তু দুশ্চিকিত্স্যতমা মতাঃ |২১|
ततो भगवति स्कन्दे सुरसेनापतौ कृते | उपतस्थुर्ग्रहाः सर्वे दीप्तशक्तिधरं गुहम् ||११|| ऊचुः प्राञ्जलयश्चैनं वृत्तिं नः संविधत्स्व वै | तेषामर्थे ततः स्कन्दः शिवं देवमचोदयत् ||१२|| ततो ग्रहांस्तानुवाच भगवान् भगनेत्रहृत् | तिर्यग्योनिं मानुषं च दैवं च त्रितयं जगत् ||१३|| परस्परोपकारेण वर्तते धार्यतेऽपि च | देवा मनुष्यान् प्रीणन्ति तैर्यग्योनींस्तथैव च ||१४|| वर्तमानैर्यथाकालं शीतवर्षोष्णमारुतैः | इज्याञ्जलिनमस्कारजपहोमव्रतादिभिः ||१५|| नराः सम्यक् प्रयुक्तैश्च प्रीणन्ति त्रिदिवेश्वरान् | भागधेयं विभक्तं च शेषं किञ्चिन्न विद्यते ||१६|| तद्युष्माकं शुभा वृत्तिर्बालेष्वेव भविष्यति | कुलेषु येषु नेज्यन्ते देवाः पितर एव च ||१७|| ब्राह्मणाः साधवश्चैव गुरवोऽतिथयस्तथा | निवृत्ताचारशौचेषु परपाकोपजीविषु ||१८|| उत्सन्नबलिभिक्षेषु भिन्नकांस्योपभोजिषु | गृहेषु तेषु ये बालास्तान् गृह्णीध्वमशङ्किताः ||१९|| तत्र वो विपुला वृत्तिः पूजा चैव भविष्यति | एवं ग्रहाः समुत्पन्ना बालान् गृह्णन्ति चाप्यतः ||२०|| ग्रहोपसृष्टा बालास्तु दुश्चिकित्स्यतमा मताः |२१|
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Adhikarana 11 (21-22) · Śloka 22
বৈকল্যং মরণং চাপি ধ্রুবং স্কন্দগ্রহে মতম্ ||২১|| স্কন্দগ্রহোঽত্যুগ্রতমঃ সর্বেষ্বেব যতঃ স্মৃতঃ | অন্যো বা সর্বরূপস্তু ন সাধ্যো গ্রহ উচ্যতে ||২২||
वैकल्यं मरणं चापि ध्रुवं स्कन्दग्रहे मतम् ||२१|| स्कन्दग्रहोऽत्युग्रतमः सर्वेष्वेव यतः स्मृतः | अन्यो वा सर्वरूपस्तु न साध्यो ग्रह उच्यते ||२२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 37
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কুমারতন্ত্রে গ্রহোত্পত্ত্যধ্যাযো নাম(একাদশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) সপ্তত্রিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৩৭||
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कुमारतन्त्रे ग्रहोत्पत्त्यध्यायो नाम(एकादशोऽध्यायः, आदितः) सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः ||३७||
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