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39. jvarapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো জ্বরপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो ज्वरप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 5

যেনামৃতমপাং মধ্যাদুদ্ধৃতং পূর্বজন্মনি | যতোঽমরত্বং সম্প্রাপ্তাস্ত্রিদশাস্ত্রিদিবেশ্বরাত্ ||৩|| শিষ্যাস্তং দেবমাসীনং পপ্রচ্ছুঃ সুশ্রুতাদযঃ | ব্রণস্যোপদ্রবাঃ প্রোক্তা ব্রণিনামপ্যতঃ পরম্ ||৪|| সমাসাদ্ ব্যাসতশ্চৈব ব্রূহি নো ভিষজাংবর |৫|

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येनामृतमपां मध्यादुद्धृतं पूर्वजन्मनि | यतोऽमरत्वं सम्प्राप्तास्त्रिदशास्त्रिदिवेश्वरात् ||३|| शिष्यास्तं देवमासीनं पप्रच्छुः सुश्रुतादयः | व्रणस्योपद्रवाः प्रोक्ता व्रणिनामप्यतः परम् ||४|| समासाद् व्यासतश्चैव ब्रूहि नो भिषजांवर |५|

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Adhikarana 3 (5-7) · Śloka 7

উপদ্রবেণ জুষ্টস্য ব্রণঃ কৃচ্ছ্রেণ সিধ্যতি ||৫|| উপদ্রবাস্তু ব্রণিনঃ কৃচ্ছ্রসাধ্যাঃ প্রকীর্তিতাঃ | প্রক্ষীণবলমাংসস্য শেষধাতুপরিক্ষযাত্ ||৬|| তস্মাদুপদ্রবান্ কৃত্স্নান্ ব্রূহি নঃ সচিকিত্সিতান্ | সর্বকাযচিকিত্সাসু যে দৃষ্টাঃ পরমর্ষিণা ||৭||

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उपद्रवेण जुष्टस्य व्रणः कृच्छ्रेण सिध्यति ||५|| उपद्रवास्तु व्रणिनः कृच्छ्रसाध्याः प्रकीर्तिताः | प्रक्षीणबलमांसस्य शेषधातुपरिक्षयात् ||६|| तस्मादुपद्रवान् कृत्स्नान् ब्रूहि नः सचिकित्सितान् | सर्वकायचिकित्सासु ये दृष्टाः परमर्षिणा ||७||

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Adhikarana 4 (8-9) · Śloka 9

তেষাং তদ্বচনং শ্রুত্বা প্রাব্রবীদ্ভিষজাংবরঃ | জ্বরমাদৌ প্রবক্ষ্যামি স রোগানীকরাট্ স্মৃতঃ ||৮|| রুদ্রকোপাগ্নিসম্ভূতঃ সর্বভূতপ্রতাপনঃ | তৈস্তৈর্নামভিরন্যেষাং সত্ত্বানাং পরিকীর্ত্যতে ||৯||

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तेषां तद्वचनं श्रुत्वा प्राब्रवीद्भिषजांवरः | ज्वरमादौ प्रवक्ष्यामि स रोगानीकराट् स्मृतः ||८|| रुद्रकोपाग्निसम्भूतः सर्वभूतप्रतापनः | तैस्तैर्नामभिरन्येषां सत्त्वानां परिकीर्त्यते ||९||

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Adhikarana 5 (10) · Śloka 10

জন্মাদৌ নিধনে চৈব প্রাযো বিশতি দেহিনম্ | অতঃ সর্ববিকরাণামযং রাজা প্রকীর্তিতঃ ||১০||

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जन्मादौ निधने चैव प्रायो विशति देहिनम् | अतः सर्वविकराणामयं राजा प्रकीर्तितः ||१०||

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Adhikarana 6 (11-12) · Śloka 13

ঋতে দেবমনুষ্যেভ্যো নান্যো বিষহতে তু তম্ | কর্মণা লভতে যস্মাদ্দেবত্বং মানুষাদপি ||১১|| পুনশ্চৈব চ্যুতঃ স্বর্গান্মানুষ্যমনুবর্ততে | তস্মাত্তে দেবভাবেন সহন্তে মানুষা জ্বরম্ ||১২|| শেষাঃ সর্বে বিপদ্যন্তে তৈর্যগ্যোনা জ্বরার্দিতাঃ |১৩|

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ऋते देवमनुष्येभ्यो नान्यो विषहते तु तम् | कर्मणा लभते यस्माद्देवत्वं मानुषादपि ||११|| पुनश्चैव च्युतः स्वर्गान्मानुष्यमनुवर्तते | तस्मात्ते देवभावेन सहन्ते मानुषा ज्वरम् ||१२|| शेषाः सर्वे विपद्यन्ते तैर्यग्योना ज्वरार्दिताः |१३|

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Adhikarana 7 (13) · Śloka 14

স্বেদাবরোধঃ সন্তাপঃ সর্বাঙ্গগ্রহণং তথা ||১৩|| বিকারা যুগপদ্যস্মিন্ জ্বরঃ স পরিকীর্তিতঃ |১৪|

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स्वेदावरोधः सन्तापः सर्वाङ्गग्रहणं तथा ||१३|| विकारा युगपद्यस्मिन् ज्वरः स परिकीर्तितः |१४|

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Adhikarana 8 (14) · Śloka 15

দোষৈঃ পৃথক্ সমস্তৈশ্চ দ্বন্দ্বৈরাগন্তুরেব চ ||১৪|| অনেককারণোত্পন্নঃ স্মৃতস্ত্বষ্টবিধো জ্বরঃ |১৫|

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दोषैः पृथक् समस्तैश्च द्वन्द्वैरागन्तुरेव च ||१४|| अनेककारणोत्पन्नः स्मृतस्त्वष्टविधो ज्वरः |१५|

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Adhikarana 9 (15-18) · Śloka 19

দোষাঃ প্রকুপিতাঃ স্বেষু কালেষু স্বৈঃ প্রকোপণৈঃ ||১৫|| ব্যাপ্য দেহমশেষেণ জ্বরমাপাদযন্তি হি | দুষ্টাঃ স্বহেতুভির্দোষাঃ প্রাপ্যামাশযমূষ্মণা ||১৬|| সহিতা রসমাগত্য রসস্বেদপ্রবাহিণাম্ | স্রোতসাং মার্গমাবৃত্য মন্দীকৃত্য হুতাশনম্ ||১৭|| নিরস্য বহিরূষ্মাণং পক্তিস্থানাচ্চ কেবলম্ | শরীরং সমভিব্যাপ্য স্বকালেষু জ্বরাগমম্ ||১৮|| জনযন্ত্যথ বৃদ্ধিং বা স্ববর্ণং চ ত্বগাদিষু |১৯|

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दोषाः प्रकुपिताः स्वेषु कालेषु स्वैः प्रकोपणैः ||१५|| व्याप्य देहमशेषेण ज्वरमापादयन्ति हि | दुष्टाः स्वहेतुभिर्दोषाः प्राप्यामाशयमूष्मणा ||१६|| सहिता रसमागत्य रसस्वेदप्रवाहिणाम् | स्रोतसां मार्गमावृत्य मन्दीकृत्य हुताशनम् ||१७|| निरस्य बहिरूष्माणं पक्तिस्थानाच्च केवलम् | शरीरं समभिव्याप्य स्वकालेषु ज्वरागमम् ||१८|| जनयन्त्यथ वृद्धिं वा स्ववर्णं च त्वगादिषु |१९|

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Adhikarana 10 (19-22) · Śloka 22

মিথ্যাতিযুক্তৈরপি চ স্নেহাদ্যৈঃ কর্মভির্নৃণাম্ ||১৯|| বিবিধাদভিঘাতাচ্চ রোগোত্থানাত্ প্রপাকতঃ | শ্রমাত্ ক্ষযাদজীর্ণাচ্চ বিষাত্সাত্ম্যর্তুপর্যযাত্ ||২০|| ওষধীপুষ্পগন্ধাচ্চ শোকান্নক্ষত্রপীডযা | অভিচারাভিশাপাভ্যাং মনোভূতাভিশঙ্কযা ||২১|| স্ত্রীণামপপ্রজাতানাং প্রজাতানাং তথাঽহিতৈঃ | স্তন্যাবতরণে চৈব জ্বরো দোষৈঃ প্রবর্ততে ||২২||

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मिथ्यातियुक्तैरपि च स्नेहाद्यैः कर्मभिर्नृणाम् ||१९|| विविधादभिघाताच्च रोगोत्थानात् प्रपाकतः | श्रमात् क्षयादजीर्णाच्च विषात्सात्म्यर्तुपर्ययात् ||२०|| ओषधीपुष्पगन्धाच्च शोकान्नक्षत्रपीडया | अभिचाराभिशापाभ्यां मनोभूताभिशङ्कया ||२१|| स्त्रीणामपप्रजातानां प्रजातानां तथाऽहितैः | स्तन्यावतरणे चैव ज्वरो दोषैः प्रवर्तते ||२२||

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Adhikarana 11 (23-24) · Śloka 24

তৈর্বেগবদ্ভির্বহুধা সমুদ্ভ্রান্তৈর্বিমার্গগৈঃ | বিক্ষিপ্যমাণোঽন্তরগ্নির্ভবত্যাশু বহিশ্চরঃ ||২৩|| রুণদ্ধি চাপ্যপান্ধাতুং যস্মাত্তস্মাজ্জ্বরাতুরঃ | ভবত্যত্যুষ্ণগাত্রশ্চ জ্বরিতস্তেন চোচ্যতে ||২৪||

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तैर्वेगवद्भिर्बहुधा समुद्भ्रान्तैर्विमार्गगैः | विक्षिप्यमाणोऽन्तरग्निर्भवत्याशु बहिश्चरः ||२३|| रुणद्धि चाप्यपान्धातुं यस्मात्तस्माज्ज्वरातुरः | भवत्यत्युष्णगात्रश्च ज्वरितस्तेन चोच्यते ||२४||

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Adhikarana 12 (25-28) · Śloka 28

শ্রমোঽরতির্বিবর্ণত্বং বৈরস্যং নযনপ্লবঃ | ইচ্ছাদ্বেষৌ মুহুশ্চাপি শীতবাতাতপাদিষু ||২৫|| জৃম্ভাঽঙ্গমর্দো গুরুতা রোমহর্ষোঽরুচিস্তমঃ | অপ্রহর্ষশ্চ শীতং চ ভবত্যুত্পত্স্যতি জ্বরে ||২৬|| সামান্যতো, বিশেষাত্তু জৃম্ভাঽত্যর্থং সমীরণাত্ | পিত্তান্নযনযোর্দাহঃ, কফান্নান্নাভিনন্দনম্ ||২৭|| সর্বলিঙ্গসমবাযঃ সর্বদোষপ্রকোপজে | দ্বযোর্দ্বযোস্তু রূপেণ সংসৃষ্টং দ্বন্দ্বজং বিদুঃ ||২৮||

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श्रमोऽरतिर्विवर्णत्वं वैरस्यं नयनप्लवः | इच्छाद्वेषौ मुहुश्चापि शीतवातातपादिषु ||२५|| जृम्भाऽङ्गमर्दो गुरुता रोमहर्षोऽरुचिस्तमः | अप्रहर्षश्च शीतं च भवत्युत्पत्स्यति ज्वरे ||२६|| सामान्यतो, विशेषात्तु जृम्भाऽत्यर्थं समीरणात् | पित्तान्नयनयोर्दाहः, कफान्नान्नाभिनन्दनम् ||२७|| सर्वलिङ्गसमवायः सर्वदोषप्रकोपजे | द्वयोर्द्वयोस्तु रूपेण संसृष्टं द्वन्द्वजं विदुः ||२८||

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Adhikarana 13 (29-30) · Śloka 30

বেপথুর্বিষমো বেগঃ কণ্ঠৌষ্ঠপরিশোষণম্ | নিদ্রানাশঃ ক্ষুতঃ স্তম্ভো গাত্রাণাং রৌক্ষ্যমেব চ ||২৯|| শিরোহৃদ্গাত্ররুগ্বক্ত্রবৈরস্যং বদ্ধবিট্কতা | জৃম্ভাঽঽধ্মানং তথা শূলং ভবত্যনিলজে জ্বরে ||৩০||

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वेपथुर्विषमो वेगः कण्ठौष्ठपरिशोषणम् | निद्रानाशः क्षुतः स्तम्भो गात्राणां रौक्ष्यमेव च ||२९|| शिरोहृद्गात्ररुग्वक्त्रवैरस्यं बद्धविट्कता | जृम्भाऽऽध्मानं तथा शूलं भवत्यनिलजे ज्वरे ||३०||

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Adhikarana 14 (31-32) · Śloka 32

বেগস্তীক্ষ্ণোঽতিসারশ্চ নিদ্রাল্পত্বং তথা বমিঃ | কণ্ঠৌষ্ঠমুখনাসানাং পাকঃ স্বেদশ্চ জাযতে ||৩১|| প্রলাপঃ কটুতা বক্ত্রে মূর্চ্ছা দাহো মদস্তৃষা | পীতবিণ্মূত্রনেত্রত্বং পৈত্তিকে ভ্রম এব চ ||৩২||

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वेगस्तीक्ष्णोऽतिसारश्च निद्राल्पत्वं तथा वमिः | कण्ठौष्ठमुखनासानां पाकः स्वेदश्च जायते ||३१|| प्रलापः कटुता वक्त्रे मूर्च्छा दाहो मदस्तृषा | पीतविण्मूत्रनेत्रत्वं पैत्तिके भ्रम एव च ||३२||

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Adhikarana 15 (33-34) · Śloka 34

গৌরবং শীতমুত্ক্লেশো রোমহর্ষোঽতিনিদ্রতা | স্রোতোরোধো রুগল্পত্বং প্রসেকো মধুরাস্যতা ||৩৩|| নাত্যুষ্ণগাত্রতা ছর্দিরঙ্গসাদোঽবিপাকতা | প্রতিশ্যাযোঽরুচিঃ কাসঃ কফজেঽক্ষ্ণোশ্চ শুক্লতা ||৩৪||

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गौरवं शीतमुत्क्लेशो रोमहर्षोऽतिनिद्रता | स्रोतोरोधो रुगल्पत्वं प्रसेको मधुरास्यता ||३३|| नात्युष्णगात्रता छर्दिरङ्गसादोऽविपाकता | प्रतिश्यायोऽरुचिः कासः कफजेऽक्ष्णोश्च शुक्लता ||३४||

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Adhikarana 16 (35-37) · Śloka 38

নিদ্রানাশো ভ্রমঃ শ্বাসস্তন্দ্রা সুপ্তাঙ্গতাঽরুচিঃ | তৃষ্ণা মোহো মদঃ স্তম্ভো দাহঃ শীতং হৃদি ব্যথা ||৩৫|| পক্তিশ্চিরেণ দোষাণামুন্মাদঃ শ্যাবদন্ততা | রসনা পরুষা কৃষ্ণা সন্ধিমূর্ধাস্থিজা রুজঃ ||৩৬|| নির্ভুগ্নে কলুষে নেত্রে কর্ণৌ শব্দরুগন্বিতৌ | প্রলাপঃ স্রোতসাং পাকঃ কূজনং চেতনাচ্যুতিঃ ||৩৭|| স্বেদমূত্রপুরীষাণামল্পশঃ সুচিরাত্ স্রুতিঃ |৩৮|

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निद्रानाशो भ्रमः श्वासस्तन्द्रा सुप्ताङ्गताऽरुचिः | तृष्णा मोहो मदः स्तम्भो दाहः शीतं हृदि व्यथा ||३५|| पक्तिश्चिरेण दोषाणामुन्मादः श्यावदन्तता | रसना परुषा कृष्णा सन्धिमूर्धास्थिजा रुजः ||३६|| निर्भुग्ने कलुषे नेत्रे कर्णौ शब्दरुगन्वितौ | प्रलापः स्रोतसां पाकः कूजनं चेतनाच्युतिः ||३७|| स्वेदमूत्रपुरीषाणामल्पशः सुचिरात् स्रुतिः |३८|

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Adhikarana 17 (38) · Śloka 38

সর্বজে সর্বলিঙ্গানি... |৩৮|

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सर्वजे सर्वलिङ्गानि... |३८|

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Adhikarana 18 (38-40) · Śloka 41

...বিশেষং চাত্র মে শৃণু ||৩৮|| নাত্যুষ্ণশীতোঽল্পসঞ্জ্ঞো ভ্রান্তপ্রেক্ষী হতস্বরঃ | খরজিহ্বঃ শুষ্ককণ্ঠঃ স্বেদবিণ্মূত্রবর্জিতঃ ||৩৯|| সাস্রো নির্ভুগ্নহৃদযো ভক্তদ্বেষী হতপ্রভঃ | শ্বসন্নিপতিতঃ শেতে প্রলাপোপদ্রবাযুতঃ ||৪০|| তমভিন্যাসমিত্যাহুর্হতৌজসমথাপরে |৪১|

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...विशेषं चात्र मे शृणु ||३८|| नात्युष्णशीतोऽल्पसञ्ज्ञो भ्रान्तप्रेक्षी हतस्वरः | खरजिह्वः शुष्ककण्ठः स्वेदविण्मूत्रवर्जितः ||३९|| सास्रो निर्भुग्नहृदयो भक्तद्वेषी हतप्रभः | श्वसन्निपतितः शेते प्रलापोपद्रवायुतः ||४०|| तमभिन्यासमित्याहुर्हतौजसमथापरे |४१|

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Adhikarana 19 (41) · Śloka 41

সন্নিপাতজ্বরং কৃচ্ছ্রমসাধ্যমপরে বিদুঃ ||৪১||

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सन्निपातज्वरं कृच्छ्रमसाध्यमपरे विदुः ||४१||

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Adhikarana 20 (42) · Śloka 42

নিদ্রোপেতমভিন্যাসং ক্ষীণমেনং হতৌজসম্ | সন্ন্যস্তগাত্রং সন্ন্যাসং বিদ্যাত্সর্বাত্মকে জ্বরে ||৪২||

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निद्रोपेतमभिन्यासं क्षीणमेनं हतौजसम् | सन्न्यस्तगात्रं सन्न्यासं विद्यात्सर्वात्मके ज्वरे ||४२||

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Adhikarana 21 (43-44) · Śloka 45

ওজো বিস্রংসতে যস্য পিত্তানিলসমুচ্ছ্রযাত্ | স গাত্রস্তম্ভশীতাভ্যাং শযনেপ্সুরচেতনঃ ||৪৩|| অপি জাগ্রত্ স্বপন্ জন্তুস্তন্দ্রালুশ্চ প্রলাপবান্ | সংহৃষ্টরোমা স্রস্তাঙ্গো মন্দসন্তাপবেদনঃ ||৪৪|| ওজোনিরোধজং তস্য জানীযাত্ কুশলো ভিষক্ |৪৫|

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ओजो विस्रंसते यस्य पित्तानिलसमुच्छ्रयात् | स गात्रस्तम्भशीताभ्यां शयनेप्सुरचेतनः ||४३|| अपि जाग्रत् स्वपन् जन्तुस्तन्द्रालुश्च प्रलापवान् | संहृष्टरोमा स्रस्ताङ्गो मन्दसन्तापवेदनः ||४४|| ओजोनिरोधजं तस्य जानीयात् कुशलो भिषक् |४५|

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Adhikarana 22 (45) · Śloka 46

সপ্তমে দিবসে প্রাপ্তে দশমে দ্বাদশেঽপি বা ||৪৫|| পুনর্ঘোরতরো ভূত্বা প্রশমং যাতি হন্তি বা |৪৬|

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सप्तमे दिवसे प्राप्ते दशमे द्वादशेऽपि वा ||४५|| पुनर्घोरतरो भूत्वा प्रशमं याति हन्ति वा |४६|

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Adhikarana 23 (46) · Śloka 46

দ্বিদোষোচ্ছ্রাযলিঙ্গাস্তু দ্বন্দ্বজাস্ত্রিবিধাঃ স্মৃতাঃ ||৪৬||

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द्विदोषोच्छ्रायलिङ्गास्तु द्वन्द्वजास्त्रिविधाः स्मृताः ||४६||

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Adhikarana 24 (47) · Śloka 48

তৃষ্ণা মূর্চ্ছা ভ্রমো দাহঃ স্বপ্ননাশঃ শিরোরুজা | কণ্ঠাস্যদশোষো বমথূ রোমহর্ষোঽরুচিস্তথা ||৪৭|| পর্বভেদশ্চ জৃম্ভা চ বাতপিত্তজ্বরাকৃতিঃ |৪৮|

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तृष्णा मूर्च्छा भ्रमो दाहः स्वप्ननाशः शिरोरुजा | कण्ठास्यदशोषो वमथू रोमहर्षोऽरुचिस्तथा ||४७|| पर्वभेदश्च जृम्भा च वातपित्तज्वराकृतिः |४८|

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Adhikarana 25 (48-49) · Śloka 49

স্তৈমিত্যং পর্বণাং ভেদো নিদ্রা গৌরবমেব চ ||৪৮|| শিরোগ্রহঃ প্রতিশ্যাযঃ কাসঃ স্বেদপ্রবর্তনম্ | সন্তাপো মধ্যবেগশ্চ বাতশ্লেষ্মজ্বরাকৃতিঃ ||৪৯||

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स्तैमित्यं पर्वणां भेदो निद्रा गौरवमेव च ||४८|| शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कासः स्वेदप्रवर्तनम् | सन्तापो मध्यवेगश्च वातश्लेष्मज्वराकृतिः ||४९||

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Adhikarana 26 (50) · Śloka 3

লিপ্তাতিক্তাস্যতা তন্দ্রা মোহঃ কাসোঽরুচিস্তৃষা | মুহুর্দাহো মুহুঃ শীতং শ্লেষ্মপিত্তজ্বরাকৃতিঃ ||৫০|| (জৃম্ভাধ্মানমদোত্কম্পপর্বভেদপরিক্ষযাঃ| তৃট্প্রলাপাভিতাপাঃ স্যুর্জ্বরে মারুতপৈত্তিকে ||১|| শূলকাসকফোত্ক্লেশশীতবেপথুপীনসাঃ| গৌরবারুচিবিষ্টম্ভা বাতশ্লেষ্মসমুদ্ভবে||২|| শীতদাহারুচিস্তম্ভস্বেদমোহমদভ্রমাঃ| কাসাঙ্গসাদহৃল্লাসা ভবন্তি কফপৈত্তিকে||৩||) |

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लिप्तातिक्तास्यता तन्द्रा मोहः कासोऽरुचिस्तृषा | मुहुर्दाहो मुहुः शीतं श्लेष्मपित्तज्वराकृतिः ||५०|| (जृम्भाध्मानमदोत्कम्पपर्वभेदपरिक्षयाः| तृट्प्रलापाभितापाः स्युर्ज्वरे मारुतपैत्तिके ||१|| शूलकासकफोत्क्लेशशीतवेपथुपीनसाः| गौरवारुचिविष्टम्भा वातश्लेष्मसमुद्भवे||२|| शीतदाहारुचिस्तम्भस्वेदमोहमदभ्रमाः| कासाङ्गसादहृल्लासा भवन्ति कफपैत्तिके||३||) |

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Adhikarana 27 (51-52) · Śloka 52

কৃশানাং জ্বরমুক্তানাং মিথ্যাহারবিহারিণাম্ | দোষঃ স্বল্পোঽপি সংবৃদ্ধো দেহিনামনিলেরিতঃ ||৫১|| সততান্যেদ্যুষ্কত্র্যাখ্যচাতুর্থান্ সপ্রলেপকান্ | কফস্থানবিভাগেন যথাসঙ্খ্যং করোতি হি ||৫২||

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कृशानां ज्वरमुक्तानां मिथ्याहारविहारिणाम् | दोषः स्वल्पोऽपि संवृद्धो देहिनामनिलेरितः ||५१|| सततान्येद्युष्कत्र्याख्यचातुर्थान् सप्रलेपकान् | कफस्थानविभागेन यथासङ्ख्यं करोति हि ||५२||

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Adhikarana 28 (53) · Śloka 53

অহোরাত্রাদহোরাত্রাত্ স্থানাত্ স্থানং প্রপদ্যতে | ততশ্চামাশযং প্রাপ্য দোষঃ কুর্যাজ্জ্বরং নৃণাম্ ||৫৩||

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अहोरात्रादहोरात्रात् स्थानात् स्थानं प्रपद्यते | ततश्चामाशयं प्राप्य दोषः कुर्याज्ज्वरं नृणाम् ||५३||

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Adhikarana 29 (54) · Śloka 54

তথা প্রলেপকো জ্ঞেযঃ শোষিণাং প্রাণনাশনঃ | দুশ্চিকিত্স্যতমো মন্দঃ সুকষ্টো ধাতুশোষকৃত্ ||৫৪||

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तथा प्रलेपको ज्ञेयः शोषिणां प्राणनाशनः | दुश्चिकित्स्यतमो मन्दः सुकष्टो धातुशोषकृत् ||५४||

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Adhikarana 30 (55) · Śloka 55

কফস্থানেষু বা দোষস্তিষ্ঠন্ দ্বিত্রিচতুর্ষু বা | বিপর্যযাখ্যান্ কুরুতে বিষমান্ কৃচ্ছ্রসাধনান্ ||৫৫||

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कफस्थानेषु वा दोषस्तिष्ठन् द्वित्रिचतुर्षु वा | विपर्ययाख्यान् कुरुते विषमान् कृच्छ्रसाधनान् ||५५||

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Adhikarana 31 (56) · Śloka 56

পরো হেতুঃ স্বভাবো বা বিষমে কৈশ্চিদীরিতঃ | আগন্তুশ্চানুবন্ধো হি প্রাযশো বিষমজ্বরে ||৫৬||

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परो हेतुः स्वभावो वा विषमे कैश्चिदीरितः | आगन्तुश्चानुबन्धो हि प्रायशो विषमज्वरे ||५६||

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Adhikarana 32 (57-58) · Śloka 58

বাতাধিকত্বাত্ প্রবদন্তি তজ্জ্ঞাস্তৃতীযকং চাপি চতুর্থকং চ | ঔপত্যকে মদ্যসমুদ্ভবে চ হেতুং জ্বরে পিত্তকৃতং বদন্তি ||৫৭|| প্রলেপকং বাতবলাসকং চ কফাধিকত্বেন বদন্তি তজ্জ্ঞাঃ | মূর্চ্ছানুবন্ধা বিষমজ্বরা যে প্রাযেণ তে দ্বন্দ্বসমুত্থিতাস্তু ||৫৮||

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वाताधिकत्वात् प्रवदन्ति तज्ज्ञास्तृतीयकं चापि चतुर्थकं च | औपत्यके मद्यसमुद्भवे च हेतुं ज्वरे पित्तकृतं वदन्ति ||५७|| प्रलेपकं वातबलासकं च कफाधिकत्वेन वदन्ति तज्ज्ञाः | मूर्च्छानुबन्धा विषमज्वरा ये प्रायेण ते द्वन्द्वसमुत्थितास्तु ||५८||

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Adhikarana 33 (59-61) · Śloka 61

ত্বক্স্থৌ শ্লেষ্মানিলৌ শীতমাদৌ জনযতো জ্বরে | তযোঃ প্রশান্তযোঃ পিত্তমন্তে দাহং করোতি চ ||৫৯|| করোত্যাদৌ তথা পিত্তং ত্বক্স্থং দাহমতীব চ | প্রশান্তে কুরুতস্তস্মিংশ্ছীতমন্তে চ তাবপি ||৬০|| দ্বাবেতৌ দাহশীতাদী জ্বরৌ সংসর্গজৌ স্মৃতৌ | দাহপূর্বস্তযোঃ কষ্টঃ কৃচ্ছ্রসাধ্যশ্চ স স্মৃতঃ ||৬১||

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त्वक्स्थौ श्लेष्मानिलौ शीतमादौ जनयतो ज्वरे | तयोः प्रशान्तयोः पित्तमन्ते दाहं करोति च ||५९|| करोत्यादौ तथा पित्तं त्वक्स्थं दाहमतीव च | प्रशान्ते कुरुतस्तस्मिंश्छीतमन्ते च तावपि ||६०|| द्वावेतौ दाहशीतादी ज्वरौ संसर्गजौ स्मृतौ | दाहपूर्वस्तयोः कष्टः कृच्छ्रसाध्यश्च स स्मृतः ||६१||

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Adhikarana 34 (62) · Śloka 62

প্রসক্তশ্চাভিঘাতোত্থশ্চেতনাপ্রভবস্তু যঃ |৬২|

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प्रसक्तश्चाभिघातोत्थश्चेतनाप्रभवस्तु यः |६२|

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Adhikarana 35 (62) · Śloka 63

রাত্র্যহ্নোঃ ষট্সু কালেষু কীর্তিতেষু যথা পুরা ||৬২|| প্রসহ্য বিষমোঽভ্যেতি মানবং বহুধা জ্বরঃ |৬৩|

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रात्र्यह्नोः षट्सु कालेषु कीर्तितेषु यथा पुरा ||६२|| प्रसह्य विषमोऽभ्येति मानवं बहुधा ज्वरः |६३|

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Adhikarana 36 (63-64) · Śloka 64

স চাপি বিষমো দেহং ন কদাচিদ্বিমুঞ্চতি ||৬৩|| গ্লানিগৌরবকার্শ্যেভ্যঃ স যস্মান্ন প্রমুচ্যতে | বেগে তু সমতিক্রান্তে গতোঽযমিতি লক্ষ্যতে ||৬৪||

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स चापि विषमो देहं न कदाचिद्विमुञ्चति ||६३|| ग्लानिगौरवकार्श्येभ्यः स यस्मान्न प्रमुच्यते | वेगे तु समतिक्रान्ते गतोऽयमिति लक्ष्यते ||६४||

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Adhikarana 37 (65) · Śloka 65

ধাত্বন্তরস্থো লীনত্বান্ন সৌক্ষ্ম্যাদুপলভ্যতে | অল্পদোষেন্ধনঃ ক্ষীণঃ ক্ষীণেন্ধন ইবানলঃ ||৬৫||

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धात्वन्तरस्थो लीनत्वान्न सौक्ष्म्यादुपलभ्यते | अल्पदोषेन्धनः क्षीणः क्षीणेन्धन इवानलः ||६५||

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Adhikarana 38 (66) · Śloka 66

দোষোঽল্পোঽহিতসম্ভূতো জ্বরোত্সৃষ্টস্য বা পুনঃ | ধাতুমন্যতমং প্রাপ্য করোতি বিষমজ্বরম্ ||৬৬||

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दोषोऽल्पोऽहितसम्भूतो ज्वरोत्सृष्टस्य वा पुनः | धातुमन्यतमं प्राप्य करोति विषमज्वरम् ||६६||

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Adhikarana 39 (67) · Śloka 68

সততং রসরক্তস্থঃ সোঽন্যেদ্যুঃ পিশিতাশ্রিতঃ | মেদোগতস্তৃতীযেঽহ্নি ত্বস্থিমজ্জগতঃ পুনঃ ||৬৭|| কুর্যাচ্চাতুর্থকং ঘোরমন্তকং রোগসঙ্করম্ |৬৮|

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सततं रसरक्तस्थः सोऽन्येद्युः पिशिताश्रितः | मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि त्वस्थिमज्जगतः पुनः ||६७|| कुर्याच्चातुर्थकं घोरमन्तकं रोगसङ्करम् |६८|

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Adhikarana 40 (68) · Śloka 68

কেচিদ্ভূতাভিষঙ্গোত্থং ব্রুবতে বিষমজ্বরম্ ||৬৮||

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केचिद्भूताभिषङ्गोत्थं ब्रुवते विषमज्वरम् ||६८||

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Adhikarana 41 (69) · Śloka 69

সপ্তাহং বা দশাহং বা দ্বাদশাহমথাপি বা | সন্তত্যা যোঽবিসর্গী স্যাত্সন্ততঃ স নিগদ্যতে ||৬৯||

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सप्ताहं वा दशाहं वा द्वादशाहमथापि वा | सन्तत्या योऽविसर्गी स्यात्सन्ततः स निगद्यते ||६९||

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Adhikarana 42 (70) · Śloka 71

অহোরাত্রে সততকো দ্বৌ কালাবনুবর্ততে | অন্যেদ্যুষ্কস্ত্বহোরাত্রাদেককালং প্রবর্ততে ||৭০|| তৃতীযকস্তৃতীযেঽহ্নি চতুর্থেঽহ্নি চতুর্থকঃ |৭১|

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अहोरात्रे सततको द्वौ कालावनुवर्तते | अन्येद्युष्कस्त्वहोरात्रादेककालं प्रवर्तते ||७०|| तृतीयकस्तृतीयेऽह्नि चतुर्थेऽह्नि चतुर्थकः |७१|

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Adhikarana 43 (71-74) · Śloka 75

বাতেনোদীর্যমাণাশ্চ হ্রীযমাণাশ্চ সর্বতঃ | একদ্বিদোষা মর্ত্যানাং তস্মিন্নেবোদিতেঽহনি ||৭১|| বেলাং তামেব কুর্বন্তি জ্বরবেগে মুহুর্মুহুঃ | (বাতেনোদ্ধূযমানস্তু যথা পূর্যেত সাগরঃ ||৭২|| বাতেনোদীরিতাস্তদ্বদ্দোষাঃ কুর্বন্তি বৈ জ্বরান্ | যথা বেগাগমে বেলাং ছাদযিত্বা মহোদধেঃ ||৭৩|| বেগহানৌ তদেবাম্ভস্তত্রৈবান্তর্নিলীযতে | দোষবেগোদযে তদ্বদুদীর্যেত জ্বরোঽস্য বৈ ||৭৪|| বেগহানৌ প্রশাম্যেত যথাঽম্ভঃ সাগরে তথা) |৭৫|

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वातेनोदीर्यमाणाश्च ह्रीयमाणाश्च सर्वतः | एकद्विदोषा मर्त्यानां तस्मिन्नेवोदितेऽहनि ||७१|| वेलां तामेव कुर्वन्ति ज्वरवेगे मुहुर्मुहुः | (वातेनोद्धूयमानस्तु यथा पूर्येत सागरः ||७२|| वातेनोदीरितास्तद्वद्दोषाः कुर्वन्ति वै ज्वरान् | यथा वेगागमे वेलां छादयित्वा महोदधेः ||७३|| वेगहानौ तदेवाम्भस्तत्रैवान्तर्निलीयते | दोषवेगोदये तद्वदुदीर्येत ज्वरोऽस्य वै ||७४|| वेगहानौ प्रशाम्येत यथाऽम्भः सागरे तथा) |७५|

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Adhikarana 44 (75) · Śloka 76

বিবিধেনাভিঘাতেন জ্বরো যঃ সম্প্রবর্ততে ||৭৫|| যথাদোষপ্রকোপং তু তথা মন্যেত তং জ্বরম্ |৭৬|

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विविधेनाभिघातेन ज्वरो यः सम्प्रवर्तते ||७५|| यथादोषप्रकोपं तु तथा मन्येत तं ज्वरम् |७६|

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Adhikarana 45 (76-79) · Śloka 80

শ্যাবাস্যতা বিষকৃতে দাহাতীসারহৃদ্গ্রহাঃ ||৭৬|| অভক্তরুক্ পিপাসা চ তোদো মূর্চ্ছা বলক্ষযঃ | ওষধীগন্ধজে মূর্চ্ছা শিরোরুক্ বমথুঃ ক্ষবঃ ||৭৭|| কামজে চিত্তবিভ্রংশস্তন্দ্রাঽঽলস্যমরোচকঃ | হৃদযে বেদনা চাস্য গাত্রং চ পরিশুষ্যতি ||৭৮|| ভযাত্ প্রলাপঃ শোকাচ্চ ভবেত্ কোপাচ্চ বেপথুঃ | অভিচারাভিশাপাভ্যাং মোহস্তৃষ্ণা চ জাযতে ||৭৯|| ভূতাভিষঙ্গাদুদ্বেগহাস্যকম্পনরোদনম্ |৮০|

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श्यावास्यता विषकृते दाहातीसारहृद्ग्रहाः ||७६|| अभक्तरुक् पिपासा च तोदो मूर्च्छा बलक्षयः | ओषधीगन्धजे मूर्च्छा शिरोरुक् वमथुः क्षवः ||७७|| कामजे चित्तविभ्रंशस्तन्द्राऽऽलस्यमरोचकः | हृदये वेदना चास्य गात्रं च परिशुष्यति ||७८|| भयात् प्रलापः शोकाच्च भवेत् कोपाच्च वेपथुः | अभिचाराभिशापाभ्यां मोहस्तृष्णा च जायते ||७९|| भूताभिषङ्गादुद्वेगहास्यकम्पनरोदनम् |८०|

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Adhikarana 46 (80) · Śloka 81

শ্রমক্ষযাভিঘাতেভ্যো দেহিনাং কুপিতোঽনিলঃ ||৮০|| পূরযিত্বাঽখিলং দেহং জ্বরমাপাদযেদ্ভৃশম্ |৮১|

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श्रमक्षयाभिघातेभ्यो देहिनां कुपितोऽनिलः ||८०|| पूरयित्वाऽखिलं देहं ज्वरमापादयेद्भृशम् |८१|

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Adhikarana 47 (81-82) · Śloka 82

রোগাণাং তু সমুত্থানাদ্বিদাহাগন্তুতস্তথা ||৮১|| জ্বরোঽপরঃ সম্ভবতি তৈস্তৈরন্যৈশ্চ হেতুভিঃ | দোষাণাং স তু লিঙ্গানি কদাচিন্নাতিবর্ততে ||৮২||

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रोगाणां तु समुत्थानाद्विदाहागन्तुतस्तथा ||८१|| ज्वरोऽपरः सम्भवति तैस्तैरन्यैश्च हेतुभिः | दोषाणां स तु लिङ्गानि कदाचिन्नातिवर्तते ||८२||

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Adhikarana 48 (83-89) · Śloka 90

গুরুতা হৃদযোত্ক্লেশঃ সদনং ছর্দ্যরোচকৌ | রসস্থে তু জ্বরে লিঙ্গং দৈন্যং চাস্যোপজাযতে ||৮৩|| রক্তনিষ্ঠীবনং দাহঃ স্বেদশ্ছর্দনবিভ্রমৌ | প্রলাপঃ পিটিকা তৃষ্ণা রক্তপ্রাপ্তে জ্বরে নৃণাম্ ||৮৪|| পিণ্ডিকোদ্বেষ্টনং তৃষ্ণা সৃষ্টমূত্রপুরীষতা | ঊষ্মাঽন্তর্দাহবিক্ষেপৌ গ্লানিঃ স্যান্মাংসগে জ্বরে ||৮৫|| ভৃশং স্বেদস্তৃষা মূর্চ্ছা প্রলাপশ্ছর্দিরেব চ | দৌর্গন্ধ্যারোচকৌ গ্লানির্মেদঃস্থে চাসহিষ্ণুতা ||৮৬|| ভেদোঽস্থ্নাং কুঞ্চ(জ)নং শ্বাসো বিরেকশ্ছর্দিরেব চ | বিক্ষেপণং চ গাত্রাণামেতদস্থিগতে জ্বরে ||৮৭|| তমঃপ্রবেশনং হিক্কা কাসঃ শৈত্যং বমিস্তথা | অন্তর্দাহো মহাশ্বাসো মর্মচ্ছেদশ্চ মজ্জগে | মরণং প্রাপ্নুযাত্তত্র শুক্রস্থানগতে জ্বরে ||৮৮|| শেফসঃ স্তব্ধতা মোক্ষঃ শুক্রস্য তু বিশেষতঃ | দগ্ধ্বেন্ধনং যথা বহ্নির্ধাতূন্ হত্বা যথা বিষম্ ||৮৯|| কৃতকৃত্যো ব্রজেচ্ছান্তিং দেহং হত্বা তথা জ্বরঃ |৯০|

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गुरुता हृदयोत्क्लेशः सदनं छर्द्यरोचकौ | रसस्थे तु ज्वरे लिङ्गं दैन्यं चास्योपजायते ||८३|| रक्तनिष्ठीवनं दाहः स्वेदश्छर्दनविभ्रमौ | प्रलापः पिटिका तृष्णा रक्तप्राप्ते ज्वरे नृणाम् ||८४|| पिण्डिकोद्वेष्टनं तृष्णा सृष्टमूत्रपुरीषता | ऊष्माऽन्तर्दाहविक्षेपौ ग्लानिः स्यान्मांसगे ज्वरे ||८५|| भृशं स्वेदस्तृषा मूर्च्छा प्रलापश्छर्दिरेव च | दौर्गन्ध्यारोचकौ ग्लानिर्मेदःस्थे चासहिष्णुता ||८६|| भेदोऽस्थ्नां कुञ्च(ज)नं श्वासो विरेकश्छर्दिरेव च | विक्षेपणं च गात्राणामेतदस्थिगते ज्वरे ||८७|| तमःप्रवेशनं हिक्का कासः शैत्यं वमिस्तथा | अन्तर्दाहो महाश्वासो मर्मच्छेदश्च मज्जगे | मरणं प्राप्नुयात्तत्र शुक्रस्थानगते ज्वरे ||८८|| शेफसः स्तब्धता मोक्षः शुक्रस्य तु विशेषतः | दग्ध्वेन्धनं यथा वह्निर्धातून् हत्वा यथा विषम् ||८९|| कृतकृत्यो व्रजेच्छान्तिं देहं हत्वा तथा ज्वरः |९०|

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Adhikarana 49 (90-91) · Śloka 92

বাতপিত্তকফোত্থানাং জ্বরাণাং লক্ষণং যথা ||৯০|| তথা তেষাং ভিষগ্ব্রূযাদ্রসাদিষ্বপি বুদ্ধিমান্ | সমস্তৈঃ সন্নিপাতেন ধাতুস্থমপি নির্দিশেত্ ||৯১|| দ্বন্দ্বজং দ্বন্দ্বজৈরেব দোষৈশ্চাপি বদেত্ কৃতম্ |৯২|

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वातपित्तकफोत्थानां ज्वराणां लक्षणं यथा ||९०|| तथा तेषां भिषग्ब्रूयाद्रसादिष्वपि बुद्धिमान् | समस्तैः सन्निपातेन धातुस्थमपि निर्दिशेत् ||९१|| द्वन्द्वजं द्वन्द्वजैरेव दोषैश्चापि वदेत् कृतम् |९२|

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Adhikarana 50 (92) · Śloka 93

গম্ভীরস্তু জ্বরো জ্ঞেযো হ্যন্তর্দাহেন তৃষ্ণযা ||৯২|| আনদ্ধত্বেন চাত্যর্থং শ্বাসকাসোদ্গমেন চ |৯৩|

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गम्भीरस्तु ज्वरो ज्ञेयो ह्यन्तर्दाहेन तृष्णया ||९२|| आनद्धत्वेन चात्यर्थं श्वासकासोद्गमेन च |९३|

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Adhikarana 51 (93) · Śloka 94

হতপ্রভেন্দ্রিযং ক্ষীণমরোচকনিপীডিতম্ ||৯৩|| গম্ভীরতীক্ষ্ণবেগার্তং জ্বরিতং পরিবর্জযেত্ |৯৪|

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हतप्रभेन्द्रियं क्षीणमरोचकनिपीडितम् ||९३|| गम्भीरतीक्ष्णवेगार्तं ज्वरितं परिवर्जयेत् |९४|

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Adhikarana 52 (94) · Śloka 95

হীনমধ্যাধিকৈর্দোষৈস্ত্রিসপ্তদ্বাদশাহিকঃ ||৯৪|| জ্বরবেগো ভবেত্তীব্রো যথাপূর্বং সুখক্রিযঃ |৯৫|

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हीनमध्याधिकैर्दोषैस्त्रिसप्तद्वादशाहिकः ||९४|| ज्वरवेगो भवेत्तीव्रो यथापूर्वं सुखक्रियः |९५|

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Adhikarana 53 (95-96) · Śloka 96

কালো হ্যোষ যমশ্চৈব নিযতির্মৃত্যুরেব চ ||৯৫|| তস্মিন্ ব্যপগতে দেহাজ্জন্মেহ পুনরুচ্যতে | ইতি জ্বরাঃ সমাখ্যাতাঃ কর্মেদানীং প্রবক্ষ্যতে ||৯৬||

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कालो ह्योष यमश्चैव नियतिर्मृत्युरेव च ||९५|| तस्मिन् व्यपगते देहाज्जन्मेह पुनरुच्यते | इति ज्वराः समाख्याताः कर्मेदानीं प्रवक्ष्यते ||९६||

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Adhikarana 54 (97-98) · Śloka 98

জ্বরস্য পূর্বরূপেষু বর্তমানেষু বুদ্ধিমান্ | পাযযেত ঘৃতং স্বচ্ছং ততঃ স লভতে সুখম্ ||৯৭|| বিধির্মারুতজেষ্বেষ, পৈত্তিকেষু বিরেচনম্ | মৃদু, প্রচ্ছর্দনং তদ্বত্কফজেষু বিধীযতে ||৯৮||

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ज्वरस्य पूर्वरूपेषु वर्तमानेषु बुद्धिमान् | पाययेत घृतं स्वच्छं ततः स लभते सुखम् ||९७|| विधिर्मारुतजेष्वेष, पैत्तिकेषु विरेचनम् | मृदु, प्रच्छर्दनं तद्वत्कफजेषु विधीयते ||९८||

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Adhikarana 55 (99) · Śloka 99

সর্বদ্বিদোষজেষূক্তং যথাদোষং বিকল্পযেত্ |৯৯|

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सर्वद्विदोषजेषूक्तं यथादोषं विकल्पयेत् |९९|

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Adhikarana 56 (99) · Śloka 99

অস্নেহনীযোঽশোধ্যশ্চ সংযোজ্যো লঙ্ঘনাদিনা ||৯৯||

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अस्नेहनीयोऽशोध्यश्च संयोज्यो लङ्घनादिना ||९९||

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Adhikarana 57 (100) · Śloka 100

রূপপ্রাগ্রূপযোর্বিদ্যান্নানাত্বং বহ্নিধূমবত্ |১০০|

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रूपप्राग्रूपयोर्विद्यान्नानात्वं वह्निधूमवत् |१००|

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Adhikarana 58 (100) · Śloka 100

প্রব্যক্তরূপেষু হিতমেকান্তেনাপতর্পণম্ ||১০০||

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प्रव्यक्तरूपेषु हितमेकान्तेनापतर्पणम् ||१००||

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Adhikarana 59 (101) · Śloka 101

আমাশযস্থে দোষে তু সোত্ক্লেশে বমনং পরম্ |১০১|

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आमाशयस्थे दोषे तु सोत्क्लेशे वमनं परम् |१०१|

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Adhikarana 60 (101) · Śloka 102

আনদ্ধঃ স্তিমিতৈর্দোষৈর্যাবন্তং কালমাতুরঃ ||১০১|| কুর্যাদনশনং তাবত্ততঃ সংসর্গমাচরেত্ |১০২|

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आनद्धः स्तिमितैर्दोषैर्यावन्तं कालमातुरः ||१०१|| कुर्यादनशनं तावत्ततः संसर्गमाचरेत् |१०२|

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Adhikarana 61 (102) · Śloka 103

ন লঙ্ঘযেন্মারুতজে ক্ষযজে মানসে তথা ||১০২|| অলঙ্ঘ্যাশ্চাপি যে পূর্বং দ্বিব্রণীযে প্রকীর্তিতাঃ |১০৩|

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न लङ्घयेन्मारुतजे क्षयजे मानसे तथा ||१०२|| अलङ्घ्याश्चापि ये पूर्वं द्विव्रणीये प्रकीर्तिताः |१०३|

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Adhikarana 62 (103) · Śloka 104

অনবস্থিতদোষাগ্নের্লঙ্ঘনং দোষপাচনম্ ||১০৩|| জ্বরঘ্নং দীপনং কাঙ্ক্ষারুচিলাঘবকারকম্ |১০৪|

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अनवस्थितदोषाग्नेर्लङ्घनं दोषपाचनम् ||१०३|| ज्वरघ्नं दीपनं काङ्क्षारुचिलाघवकारकम् |१०४|

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Adhikarana 63 (104) · Śloka 105

সৃষ্টমারুতবিণ্মূত্রং ক্ষুত্পিপাসাঽসহং লঘুম্ ||১০৪|| প্রসন্নাত্মেন্দ্রিযং ক্ষামং নরং বিদ্যাত্ সুলঙ্ঘিতম্ |১০৫|

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सृष्टमारुतविण्मूत्रं क्षुत्पिपासाऽसहं लघुम् ||१०४|| प्रसन्नात्मेन्द्रियं क्षामं नरं विद्यात् सुलङ्घितम् |१०५|

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Adhikarana 64 (105) · Śloka 106

বলক্ষযস্তৃষা শোষস্তন্দ্রানিদ্রাভ্রমক্লমাঃ ||১০৫|| উপদ্রবাশ্চ শ্বাসাদ্যাঃ সম্ভবন্ত্যতিলঙ্ঘনাত্ |১০৬|

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बलक्षयस्तृषा शोषस्तन्द्रानिद्राभ्रमक्लमाः ||१०५|| उपद्रवाश्च श्वासाद्याः सम्भवन्त्यतिलङ्घनात् |१०६|

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Adhikarana 65 (106) · Śloka 107

দীপনং কফবিচ্ছেদি পিত্তবাতানুলোমনম্ ||১০৬|| কফবাতজ্বরার্তেভ্যো হিতমুষ্ণাম্বু তৃট্ছিদম্ | তদ্ধি মার্দবকৃদ্দোষস্রোতসাং ... |১০৭|

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दीपनं कफविच्छेदि पित्तवातानुलोमनम् ||१०६|| कफवातज्वरार्तेभ्यो हितमुष्णाम्बु तृट्छिदम् | तद्धि मार्दवकृद्दोषस्रोतसां ... |१०७|

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Adhikarana 66 (107) · Śloka 108

... শীতমন্যথা ||১০৭|| সেব্যমানেন তোযেন জ্বরঃ শীতেন বর্ধতে |১০৮|

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... शीतमन्यथा ||१०७|| सेव्यमानेन तोयेन ज्वरः शीतेन वर्धते |१०८|

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Adhikarana 67 (108) · Śloka 109

পিত্তমদ্যবিষোত্থেষু শীতলং তিক্তকৈঃ শৃতম্ ||১০৮|| গাঙ্গেযনাগরোশীরপর্পটোদীচ্যচন্দনৈঃ |১০৯|

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पित्तमद्यविषोत्थेषु शीतलं तिक्तकैः शृतम् ||१०८|| गाङ्गेयनागरोशीरपर्पटोदीच्यचन्दनैः |१०९|

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Adhikarana 68 (109) · Śloka 110

দীপনী পাচনী লঘ্বী জ্বরার্তানাং জ্বরাপহা ||১০৯|| অন্নকালে হিতা পেযা যথাস্বং পাচনৈঃ কৃতা |১১০|

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दीपनी पाचनी लघ्वी ज्वरार्तानां ज्वरापहा ||१०९|| अन्नकाले हिता पेया यथास्वं पाचनैः कृता |११०|

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Adhikarana 69 (110-111) · Śloka 112

বহুদোষস্য মন্দাগ্নেঃ সপ্তরাত্রাত্ পরং জ্বরে ||১১০|| লঙ্ঘনাম্বুযবাগূভির্যদা দোষো ন পচ্যতে | তদা তং মুখবৈরস্যতৃষ্ণারোচকনাশনৈঃ ||১১১|| কষাযৈঃ পাচনৈর্হৃদ্যৈর্জ্বরঘ্নৈঃ সমুপাচরেত্ |১১২|

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बहुदोषस्य मन्दाग्नेः सप्तरात्रात् परं ज्वरे ||११०|| लङ्घनाम्बुयवागूभिर्यदा दोषो न पच्यते | तदा तं मुखवैरस्यतृष्णारोचकनाशनैः ||१११|| कषायैः पाचनैर्हृद्यैर्ज्वरघ्नैः समुपाचरेत् |११२|

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Adhikarana 70 (112-113) · Śloka 114

পঞ্চমূলীকষাযং তু পাচনং পবনজ্বরে ||১১২|| সক্ষৌদ্রং পৈত্তিকে মুস্তকটুকেন্দ্রযবৈঃ কৃতম্ | পিপ্পল্যাদিকষাযং তু কফজে পরিপাচনম্ ||১১৩|| দ্বন্দ্বজেষু তু সংসৃষ্টং দদ্যাত্ ... |১১৪|

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पञ्चमूलीकषायं तु पाचनं पवनज्वरे ||११२|| सक्षौद्रं पैत्तिके मुस्तकटुकेन्द्रयवैः कृतम् | पिप्पल्यादिकषायं तु कफजे परिपाचनम् ||११३|| द्वन्द्वजेषु तु संसृष्टं दद्यात् ... |११४|

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Adhikarana 71 (114) · Śloka 114

... অথ বিবর্জযেত্ | পীতাম্বুর্লঙ্ঘিতো ভুক্তোঽজীর্ণী ক্ষীণঃ পিপাসিতঃ ||১১৪||

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... अथ विवर्जयेत् | पीताम्बुर्लङ्घितो भुक्तोऽजीर्णी क्षीणः पिपासितः ||११४||

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Adhikarana 72 (115) · Śloka 115

(তীক্ষ্ণে জ্বরে গুরৌ দেহে বিবদ্ধেষু মলেষু চ| সামদোষং বিজানীযাজ্জ্বরং পক্বমতোঽন্যথা ||) মৃদৌ জ্বরে লঘৌ দেহে প্রচলেষু মলেষু চ | পক্বং দোষং বিজানীযাজ্জ্বরে দেযং তদৌষধম্ ||১১৫||

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(तीक्ष्णे ज्वरे गुरौ देहे विबद्धेषु मलेषु च| सामदोषं विजानीयाज्ज्वरं पक्वमतोऽन्यथा ||) मृदौ ज्वरे लघौ देहे प्रचलेषु मलेषु च | पक्वं दोषं विजानीयाज्ज्वरे देयं तदौषधम् ||११५||

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Adhikarana 73 (116) · Śloka 116

দোষপ্রকৃতিবৈকৃত্যাদেকেষাং পক্বলক্ষণম্ |১১৬|

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दोषप्रकृतिवैकृत्यादेकेषां पक्वलक्षणम् |११६|

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Adhikarana 74 (116-118) · Śloka 119

হৃদযোদ্বেষ্টনং তন্দ্রা লালাস্রুতিররোচকঃ ||১১৬|| দোষাপ্রবৃত্তিরালস্যং বিবন্ধো বহুমূত্রতা | গুরূদরত্বমস্বেদো ন পক্তিঃ শকৃতোঽরতিঃ ||১১৭|| স্বাপঃ স্তম্ভো গুরুত্বং চ গাত্রাণাং বহ্নিমার্দবম্ | মুখস্যাশুদ্ধিরগ্লানিঃ প্রসঙ্গী বলবাঞ্জ্বরঃ ||১১৮|| লিঙ্গৈরেভির্বিজানীযাজ্জ্বরমামং বিচক্ষণঃ |১১৯|

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हृदयोद्वेष्टनं तन्द्रा लालास्रुतिररोचकः ||११६|| दोषाप्रवृत्तिरालस्यं विबन्धो बहुमूत्रता | गुरूदरत्वमस्वेदो न पक्तिः शकृतोऽरतिः ||११७|| स्वापः स्तम्भो गुरुत्वं च गात्राणां वह्निमार्दवम् | मुखस्याशुद्धिरग्लानिः प्रसङ्गी बलवाञ्ज्वरः ||११८|| लिङ्गैरेभिर्विजानीयाज्ज्वरमामं विचक्षणः |११९|

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Adhikarana 75 (119) · Śloka 120

সপ্তরাত্রাত্পরং কেচিন্মন্যন্তে দেযমৌষধম্ ||১১৯|| দশরাত্রাত্পরং কেচিদ্দাতব্যমিতি নিশ্চিতাঃ |১২০|

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सप्तरात्रात्परं केचिन्मन्यन्ते देयमौषधम् ||११९|| दशरात्रात्परं केचिद्दातव्यमिति निश्चिताः |१२०|

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Adhikarana 76 (120) · Śloka 121

পৈত্তিকে বা জ্বরে দেযমল্পকালসমুত্থিতে ||১২০|| অচিরজ্বরিতস্যাপি দেযং স্যাদ্দোষপাকতঃ |১২১|

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पैत्तिके वा ज्वरे देयमल्पकालसमुत्थिते ||१२०|| अचिरज्वरितस्यापि देयं स्याद्दोषपाकतः |१२१|

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Adhikarana 77 (121) · Śloka 122

ভেষজং হ্যামদোষস্য ভূযো জ্বলযতি জ্বরম্ ||১২১|| শোধনং, শমনীযং তু করোতি বিষমজ্বরম্ |১২২|

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भेषजं ह्यामदोषस्य भूयो ज्वलयति ज्वरम् ||१२१|| शोधनं, शमनीयं तु करोति विषमज्वरम् |१२२|

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Adhikarana 78 (122) · Śloka 123

চ্যবমানং জ্বরোত্ক্লিষ্টমুপেক্ষেত মলং সদা ||১২২|| অতিপ্রবর্তমানং চ সাধযেদতিসারবত্ |১২৩|

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च्यवमानं ज्वरोत्क्लिष्टमुपेक्षेत मलं सदा ||१२२|| अतिप्रवर्तमानं च साधयेदतिसारवत् |१२३|

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Adhikarana 79 (123) · Śloka 124

যদা কোষ্ঠানুগাঃ পক্বা বিবদ্ধাঃ স্রোতসাং মলাঃ ||১২৩|| অচিরজ্বরিতস্যাপি তদা দদ্যাদ্বিরেচনম্ |১২৪|

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यदा कोष्ठानुगाः पक्वा विबद्धाः स्रोतसां मलाः ||१२३|| अचिरज्वरितस्यापि तदा दद्याद्विरेचनम् |१२४|

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Adhikarana 80 (124-125) · Śloka 125

পক্বো হ্যনির্হৃতো দোষো দেহে তিষ্ঠন্ মহাত্যযম্ ||১২৪|| বিষমং বা জ্বরং কুর্যাদ্বলব্যাপদমেব চ | তস্মান্নির্হরণং কার্যং দোষাণাং বমনাদিভিঃ ||১২৫||

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पक्वो ह्यनिर्हृतो दोषो देहे तिष्ठन् महात्ययम् ||१२४|| विषमं वा ज्वरं कुर्याद्बलव्यापदमेव च | तस्मान्निर्हरणं कार्यं दोषाणां वमनादिभिः ||१२५||

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Adhikarana 81 (126) · Śloka 127

প্রাক্কর্ম বমনং চাস্য কার্যমাস্থাপনং তথা | বিরেচনং তথা কুর্যাচ্ছিরসশ্চ বিরেচনম্ ||১২৬|| ক্রমশঃ... |১২৭|

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प्राक्कर्म वमनं चास्य कार्यमास्थापनं तथा | विरेचनं तथा कुर्याच्छिरसश्च विरेचनम् ||१२६|| क्रमशः... |१२७|

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Adhikarana 82 (127-129) · Śloka 129

...বলিনে দেযং বমনং শ্লৈষ্মিকে জ্বরে | পিত্তপ্রাযে বিরেকস্তু কার্যঃ প্রশিথিলাশযে ||১২৭|| সরুজেঽনিলজে কার্যং সোদাবর্তে নিরূহণম্ | কটীপৃষ্ঠগ্রহার্তস্য দীপ্তাগ্নেরনুবাসনম্ ||১২৮|| শিরোগৌরবশূলঘ্নমিন্দ্রিযপ্রতিবোধনম্ | কফাভিপন্নে শিরসি কার্যং মূর্ধবিরেচনম্ ||১২৯||

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...बलिने देयं वमनं श्लैष्मिके ज्वरे | पित्तप्राये विरेकस्तु कार्यः प्रशिथिलाशये ||१२७|| सरुजेऽनिलजे कार्यं सोदावर्ते निरूहणम् | कटीपृष्ठग्रहार्तस्य दीप्ताग्नेरनुवासनम् ||१२८|| शिरोगौरवशूलघ्नमिन्द्रियप्रतिबोधनम् | कफाभिपन्ने शिरसि कार्यं मूर्धविरेचनम् ||१२९||

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Adhikarana 83 (130) · Śloka 131

দুর্বলস্য সমাধ্মাতমুদরং সরুজং দিহেত্ | দারুহৈমবতীকুষ্ঠশতাহ্বাহিঙ্গুসৈন্ধবৈঃ ||১৩০|| অম্লপিষ্টৈঃ সুখোষ্ণৈশ্চ... |১৩১|

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दुर्बलस्य समाध्मातमुदरं सरुजं दिहेत् | दारुहैमवतीकुष्ठशताह्वाहिङ्गुसैन्धवैः ||१३०|| अम्लपिष्टैः सुखोष्णैश्च... |१३१|

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Adhikarana 84 (131) · Śloka 131

...পবনে তূর্ধ্বমাগতে | রুদ্ধমূত্রপূরীষায গুদে বর্তিং নিধাপযেত্ ||১৩১||

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...पवने तूर्ध्वमागते | रुद्धमूत्रपूरीषाय गुदे वर्तिं निधापयेत् ||१३१||

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Adhikarana 85 (132) · Śloka 132

পিপ্পলীপিপ্পলীমূলযবানীচব্যসাধিতাম্ | পাযযেত যবাগূং বা মারুতাদ্যনুলোমিনীম্ ||১৩২||

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पिप्पलीपिप्पलीमूलयवानीचव्यसाधिताम् | पाययेत यवागूं वा मारुताद्यनुलोमिनीम् ||१३२||

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Adhikarana 86 (133) · Śloka 133

শুদ্ধস্যোভযতো যস্য জ্বরঃ শান্তিং ন গচ্ছতি | সশেষদোষরূক্ষস্য তস্য তং সর্পিষা জযেত্ ||১৩৩||

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शुद्धस्योभयतो यस्य ज्वरः शान्तिं न गच्छति | सशेषदोषरूक्षस्य तस्य तं सर्पिषा जयेत् ||१३३||

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Adhikarana 87 (134) · Śloka 134

কৃশং চৈবাল্পদোষং চ শমনীযৈরুপাচরেত্ | উপবাসৈর্বলস্থং তু জ্বরে সন্তর্পণোত্থিতে ||১৩৪||

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कृशं चैवाल्पदोषं च शमनीयैरुपाचरेत् | उपवासैर्बलस्थं तु ज्वरे सन्तर्पणोत्थिते ||१३४||

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Adhikarana 88 (135) · Śloka 135

ক্লিন্নাং যবাগূং মন্দাগ্নিং তৃষার্তং পাযযেন্নরম্ |১৩৫|

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क्लिन्नां यवागूं मन्दाग्निं तृषार्तं पाययेन्नरम् |१३५|

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Adhikarana 89 (135-137) · Śloka 138

তৃট্ছর্দিদাহঘর্মার্তং মদ্যপং লাজতর্পণম্ ||১৩৫|| সক্ষৌদ্রমম্ভসা পশ্চাজ্জীর্ণে যূষরসৌদনম্ | উপবাসশ্রমকৃতে ক্ষীণং(ণে) বাতাধিকে জ্বরে ||১৩৬|| দীপ্তাগ্নিং ভোজযেত্ প্রাজ্ঞো নরং মাংসরসৌদনম্ | মুদ্গযূষৌদনশ্চাপি হিতঃ কফসমুত্থিতে ||১৩৭|| স এব সিতযা যুক্তঃ শীতঃ পিত্তজ্বরে হিতঃ |১৩৮|

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तृट्छर्दिदाहघर्मार्तं मद्यपं लाजतर्पणम् ||१३५|| सक्षौद्रमम्भसा पश्चाज्जीर्णे यूषरसौदनम् | उपवासश्रमकृते क्षीणं(णे) वाताधिके ज्वरे ||१३६|| दीप्ताग्निं भोजयेत् प्राज्ञो नरं मांसरसौदनम् | मुद्गयूषौदनश्चापि हितः कफसमुत्थिते ||१३७|| स एव सितया युक्तः शीतः पित्तज्वरे हितः |१३८|

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Adhikarana 90 (138-140) · Śloka 140

দাডিমামলমুদ্গানাং যূষশ্চানিলপৈত্তিকে ||১৩৮|| হ্রস্বমূলকযূষস্তু বাতশ্লেষ্মাধিকে হিতঃ | পটোলনিম্বযূষস্তু পথ্যঃ পিত্তকফাত্মকে ||১৩৯|| দাহচ্ছর্দিযুতং ক্ষামং নিরন্নং তৃষ্ণযাঽর্দিতম্ | সিতাক্ষৌদ্রযুতং লাজতর্পণং পাযযেত চ ||১৪০||

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दाडिमामलमुद्गानां यूषश्चानिलपैत्तिके ||१३८|| ह्रस्वमूलकयूषस्तु वातश्लेष्माधिके हितः | पटोलनिम्बयूषस्तु पथ्यः पित्तकफात्मके ||१३९|| दाहच्छर्दियुतं क्षामं निरन्नं तृष्णयाऽर्दितम् | सिताक्षौद्रयुतं लाजतर्पणं पाययेत च ||१४०||

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Adhikarana 91 (141) · Śloka 142

কফপিত্তপরীতস্য গ্রীষ্মেঽসৃক্পিত্তিনস্তথা | মদ্যনিত্যস্য ন হিতা যবাগূস্তমুপাচরেত্ ||১৪১|| যূষৈরম্লৈরনম্লৈর্বা জাঙ্গলৈশ্চ রসৈর্হিতৈঃ |১৪২|

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कफपित्तपरीतस्य ग्रीष्मेऽसृक्पित्तिनस्तथा | मद्यनित्यस्य न हिता यवागूस्तमुपाचरेत् ||१४१|| यूषैरम्लैरनम्लैर्वा जाङ्गलैश्च रसैर्हितैः |१४२|

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Adhikarana 92 (142) · Śloka 142

মদ্যং পুরাণং মন্দাগ্নের্যবান্নোপহিতং হিতম্ ||১৪২||

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मद्यं पुराणं मन्दाग्नेर्यवान्नोपहितं हितम् ||१४२||

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Adhikarana 93 (143) · Śloka 143

সব্যোষং বিতরেত্তক্রং কফারোচকপীডিতে |১৪৩|

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सव्योषं वितरेत्तक्रं कफारोचकपीडिते |१४३|

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Adhikarana 94 (143-144) · Śloka 144

কৃশোঽল্পদোষো দীনশ্চ নরো জীর্ণজ্বরার্দিতঃ ||১৪৩|| বিবদ্ধঃ সৃষ্টদোষশ্চ রূক্ষঃ পিত্তানিলজ্বরী | পিপাসার্তঃ সদাহো বা পযসা স সুখী ভবেত্ ||১৪৪||

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कृशोऽल्पदोषो दीनश्च नरो जीर्णज्वरार्दितः ||१४३|| विबद्धः सृष्टदोषश्च रूक्षः पित्तानिलज्वरी | पिपासार्तः सदाहो वा पयसा स सुखी भवेत् ||१४४||

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Adhikarana 95 (145) · Śloka 145

তদেব তরুণে পীতং বিষবদ্ধন্তি মানবম্ |১৪৫|

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तदेव तरुणे पीतं विषवद्धन्ति मानवम् |१४५|

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Adhikarana 96 (145) · Śloka 146

সর্বজ্বরেষু সুলঘু মাত্রাবদ্ভোজনং হিতম্ ||১৪৫|| বেগাপাযেঽন্যথা তদ্ধি জ্বরবেগাভিবর্ধনম্ |১৪৬|

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सर्वज्वरेषु सुलघु मात्रावद्भोजनं हितम् ||१४५|| वेगापायेऽन्यथा तद्धि ज्वरवेगाभिवर्धनम् |१४६|

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Adhikarana 97 (146-148) · Śloka 149

জ্বরিতো হিতমশ্নীযাদ্যদ্যপ্যস্যারুচির্ভবেত্ ||১৪৬|| অন্নকালে হ্যভুঞ্জানঃ ক্ষীযতে ম্রিযতেঽথবা | স ক্ষীণঃ কৃচ্ছ্রতাং যাতি যাত্যসাধ্যত্বমেব চ ||১৪৭|| তস্মাদ্রক্ষেদ্বলং পুংসাং বলে সতি হি জীবিতম্ | গুর্বভিষ্যন্দ্যকালে চ জ্বরী নাদ্যাত্ কথঞ্চন ||১৪৮|| ন তু তস্যাহিতং ভুক্তমাযুষে বা সুখায বা |১৪৯|

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ज्वरितो हितमश्नीयाद्यद्यप्यस्यारुचिर्भवेत् ||१४६|| अन्नकाले ह्यभुञ्जानः क्षीयते म्रियतेऽथवा | स क्षीणः कृच्छ्रतां याति यात्यसाध्यत्वमेव च ||१४७|| तस्माद्रक्षेद्बलं पुंसां बले सति हि जीवितम् | गुर्वभिष्यन्द्यकाले च ज्वरी नाद्यात् कथञ्चन ||१४८|| न तु तस्याहितं भुक्तमायुषे वा सुखाय वा |१४९|

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Adhikarana 98 (149) · Śloka 150

সন্ততং বিষমং বাঽপি ক্ষীণস্য সুচিরোত্থিতম্ ||১৪৯|| জ্বরং সম্ভোজনৈঃ পথ্যৈর্লঘুভিঃ সমুপাচরেত্ |১৫০|

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सन्ततं विषमं वाऽपि क्षीणस्य सुचिरोत्थितम् ||१४९|| ज्वरं सम्भोजनैः पथ्यैर्लघुभिः समुपाचरेत् |१५०|

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Adhikarana 99 (150) · Śloka 151

মুদ্গান্মসুরাংশ্চণকান্ কুলত্থান্ সমকুষ্ঠকান্ ||১৫০|| আহারকালে যূষার্থং জ্বরিতায প্রদাপযেত্ |১৫১|

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मुद्गान्मसुरांश्चणकान् कुलत्थान् समकुष्ठकान् ||१५०|| आहारकाले यूषार्थं ज्वरिताय प्रदापयेत् |१५१|

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Adhikarana 100 (151-152) · Śloka 152

পটোলপত্রং বার্তাকং কঠিল্লং পাপচৈলিকম্ ||১৫১|| কর্কোটকং পর্পটকং গোজিহ্বাং বালমূলকম্ | পত্রং গুডূচ্যাঃ শাকার্থে জ্বরিতানাং প্রদাপযেত্ ||১৫২||

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पटोलपत्रं वार्ताकं कठिल्लं पापचैलिकम् ||१५१|| कर्कोटकं पर्पटकं गोजिह्वां बालमूलकम् | पत्रं गुडूच्याः शाकार्थे ज्वरितानां प्रदापयेत् ||१५२||

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Adhikarana 101 (153) · Śloka 154

লাবান্ কপিঞ্জলানেণান্ পৃষতাঞ্ছরভাঞ্ছশান্ | কালপুচ্ছান্ কুরঙ্গাংশ্চ তথৈব মৃগমাতৃকান্ ||১৫৩|| মাংসার্থে মাংসসাত্ম্যানাং জ্বরিতানাং প্রদাপযেত্ |১৫৪|

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लावान् कपिञ्जलानेणान् पृषताञ्छरभाञ्छशान् | कालपुच्छान् कुरङ्गांश्च तथैव मृगमातृकान् ||१५३|| मांसार्थे मांससात्म्यानां ज्वरितानां प्रदापयेत् |१५४|

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Adhikarana 102 (154) · Śloka 155

সারসক্রৌঞ্চশিখিনঃ কুক্কুটাংস্তিত্তিরাং(রীং)স্তথা ||১৫৪|| গুরূষ্ণত্বান্ন শংসন্তি জ্বরে কেচিচ্চিকিত্সকাঃ |১৫৫|

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सारसक्रौञ्चशिखिनः कुक्कुटांस्तित्तिरां(रीं)स्तथा ||१५४|| गुरूष्णत्वान्न शंसन्ति ज्वरे केचिच्चिकित्सकाः |१५५|

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Adhikarana 103 (155) · Śloka 156

জ্বরিতানাং প্রকোপং তু যদা যাতি সমীরণঃ ||১৫৫|| তদৈতেঽপি হি শস্যন্তে মাত্রাকালোপপাদিতাঃ |১৫৬|

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ज्वरितानां प्रकोपं तु यदा याति समीरणः ||१५५|| तदैतेऽपि हि शस्यन्ते मात्राकालोपपादिताः |१५६|

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Adhikarana 104 (156-158) · Śloka 158

পরিষেকান্ প্রদেহাংশ্চ স্নেহান্ সংশোধনানি চ ||১৫৬|| (স্নানাভ্যঙ্গদিবাস্বপ্নশীতব্যাযামযোষিতঃ) | কষাযগুরুরূক্ষাণি ক্রোধাদীনি তথৈব চ ||১৫৭|| সারবন্তি চ ভোজ্যানি বর্জযেত্তরুণজ্বরী | তথৈব নবধান্যাদিং বর্জযেচ্চ সমাসতঃ ||১৫৮||

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परिषेकान् प्रदेहांश्च स्नेहान् संशोधनानि च ||१५६|| (स्नानाभ्यङ्गदिवास्वप्नशीतव्यायामयोषितः) | कषायगुरुरूक्षाणि क्रोधादीनि तथैव च ||१५७|| सारवन्ति च भोज्यानि वर्जयेत्तरुणज्वरी | तथैव नवधान्यादिं वर्जयेच्च समासतः ||१५८||

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Adhikarana 105 (159) · Śloka 159

অনবস্থিতদোষাগ্নেরেভিঃ সন্ধুক্ষিতো জ্বরঃ | গম্ভীরতীক্ষ্ণবেগত্বং যাত্যসাধ্যত্বমেব চ ||১৫৯||

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अनवस्थितदोषाग्नेरेभिः सन्धुक्षितो ज्वरः | गम्भीरतीक्ष्णवेगत्वं यात्यसाध्यत्वमेव च ||१५९||

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Adhikarana 106 (160-162) · Śloka 162

শীততোযদিবাস্বপ্নক্রোধব্যাযামযোষিতঃ | ন সেবেত জ্বরোত্সৃষ্টো যাবন্ন বলবান্ ভবেত্ ||১৬০|| মুক্তস্যাপি জ্বরেণাশু দুর্বলস্যাহিতৈর্জ্বরঃ | প্রত্যাপন্নো দহেদ্দেহং শুষ্কং বৃক্ষমিবানলঃ ||১৬১|| তস্মাত্কার্যঃ পরীহারো জ্বরমুক্তৈর্বিরিক্তবত্ | যাবন্ন প্রকৃতিস্থঃ স্যাদ্দোষতঃ প্রাণতস্তথা ||১৬২||

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शीततोयदिवास्वप्नक्रोधव्यायामयोषितः | न सेवेत ज्वरोत्सृष्टो यावन्न बलवान् भवेत् ||१६०|| मुक्तस्यापि ज्वरेणाशु दुर्बलस्याहितैर्ज्वरः | प्रत्यापन्नो दहेद्देहं शुष्कं वृक्षमिवानलः ||१६१|| तस्मात्कार्यः परीहारो ज्वरमुक्तैर्विरिक्तवत् | यावन्न प्रकृतिस्थः स्याद्दोषतः प्राणतस्तथा ||१६२||

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Adhikarana 107 (163) · Śloka 163

জ্বরে প্রমোহো ভবতি স্বল্পৈরপ্যবচেষ্টিতৈঃ | নিষণ্ণং ভোজযেত্তস্মান্মূত্রোচ্চারৌ চ কারযেত্ ||১৬৩||

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ज्वरे प्रमोहो भवति स्वल्पैरप्यवचेष्टितैः | निषण्णं भोजयेत्तस्मान्मूत्रोच्चारौ च कारयेत् ||१६३||

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Adhikarana 108 (164) · Śloka 164

অরোচকে গাত্রসাদে বৈবর্ণ্যেঽঙ্গমলাদিষু | শান্তজ্বরোঽপি শোধ্যঃ স্যাদনুবন্ধভযান্নরঃ ||১৬৪||

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अरोचके गात्रसादे वैवर्ण्येऽङ्गमलादिषु | शान्तज्वरोऽपि शोध्यः स्यादनुबन्धभयान्नरः ||१६४||

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Adhikarana 109 (165) · Śloka 165

ন জাতু স্নাপযেত্ প্রাজ্ঞঃ সহসা জ্বরকর্শিতম্ | তেন সন্দূষিতো হ্যস্য পুনরেব ভবেজ্জ্বরঃ ||১৬৫||

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न जातु स्नापयेत् प्राज्ञः सहसा ज्वरकर्शितम् | तेन सन्दूषितो ह्यस्य पुनरेव भवेज्ज्वरः ||१६५||

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Adhikarana 110 (166-167) · Śloka 167

চিকিত্সেচ্চ জ্বরান্ সর্বান্নিমিত্তানাং বিপর্যযৈঃ | শ্রমক্ষযাভিঘাতোত্থে মূলব্যাধিমুপাচরেত্ ||১৬৬|| স্ত্রীণামপপ্রজাতানাং স্তন্যাবতরণে চ যঃ | তত্র সংশমনং কুর্যাদ্যথাদোষং বিধানবিত্ ||১৬৭||

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चिकित्सेच्च ज्वरान् सर्वान्निमित्तानां विपर्ययैः | श्रमक्षयाभिघातोत्थे मूलव्याधिमुपाचरेत् ||१६६|| स्त्रीणामपप्रजातानां स्तन्यावतरणे च यः | तत्र संशमनं कुर्याद्यथादोषं विधानवित् ||१६७||

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Adhikarana 111 (168) · Śloka 168

অতঃ সংশমনীযানি কষাযাণি নিবোধ মে | সর্বজ্বরেষু দেযানি যানি বৈদ্যেন জানতা ||১৬৮||

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अतः संशमनीयानि कषायाणि निबोध मे | सर्वज्वरेषु देयानि यानि वैद्येन जानता ||१६८||

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Adhikarana 112 (169) · Śloka 169

পিপ্পলীসারিবাদ্রাক্ষাশতপুষ্পাহরেণুভিঃ | কৃতঃ কষাযঃ সগুডো হন্যাচ্ছ্বসনজং জ্বরম্ ||১৬৯||

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पिप्पलीसारिवाद्राक्षाशतपुष्पाहरेणुभिः | कृतः कषायः सगुडो हन्याच्छ्वसनजं ज्वरम् ||१६९||

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Adhikarana 113 (170) · Śloka 170

শৃতং শীতকষাযং বা গুডূচ্যাঃ পেযমেব তু |১৭০|

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शृतं शीतकषायं वा गुडूच्याः पेयमेव तु |१७०|

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Adhikarana 114 (170) · Śloka 171

বলাদর্ভশ্বদংষ্ট্রাণাং কষাযং পাদশেষিতম্ ||১৭০|| শর্করাঘৃতসংযুক্তং পিবেদ্বাতজ্বরাপহম্ |১৭১|

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बलादर्भश्वदंष्ट्राणां कषायं पादशेषितम् ||१७०|| शर्कराघृतसंयुक्तं पिबेद्वातज्वरापहम् |१७१|

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Adhikarana 115 (171-172) · Śloka 172

শতপুষ্পাবচাকুষ্ঠদেবদারুহরেণুকাঃ ||১৭১|| কুস্তুম্বুরূণি নলদং মুস্তং চৈবাপ্সু সাধযেত্ | ক্ষৌদ্রেণ সিতযা চাপি যুক্তঃ ক্বাথোঽনিলাধিকে ||১৭২||

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शतपुष्पावचाकुष्ठदेवदारुहरेणुकाः ||१७१|| कुस्तुम्बुरूणि नलदं मुस्तं चैवाप्सु साधयेत् | क्षौद्रेण सितया चापि युक्तः क्वाथोऽनिलाधिके ||१७२||

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Adhikarana 116 (173-174) · Śloka 174

দ্রাক্ষাগুডূচীকাশ্মর্যত্রাযমাণাঃ সসারিবাঃ | নিষ্ক্বাথ্য সগুডং ক্বাথং পিবেদ্বাতকৃতে জ্বরে ||১৭৩|| গুডূচ্যাঃ স্বরসো গ্রাহ্যঃ শতাবর্যাশ্চ তত্সমঃ | নিহন্যাত্সগুডঃ পীতঃ সদ্যোঽনিলকৃতং জ্বরম্ ||১৭৪||

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द्राक्षागुडूचीकाश्मर्यत्रायमाणाः ससारिवाः | निष्क्वाथ्य सगुडं क्वाथं पिबेद्वातकृते ज्वरे ||१७३|| गुडूच्याः स्वरसो ग्राह्यः शतावर्याश्च तत्समः | निहन्यात्सगुडः पीतः सद्योऽनिलकृतं ज्वरम् ||१७४||

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Adhikarana 117 (175) · Śloka 175

ঘৃতাভ্যঙ্গস্বেদলেপানবস্থাসু চ যোজযেত্ |১৭৫|

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घृताभ्यङ्गस्वेदलेपानवस्थासु च योजयेत् |१७५|

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Adhikarana 118 (175) · Śloka 176

শ্রীপর্ণীচন্দনোশীরপরূষকমধূকজঃ ||১৭৫|| শর্করামধুরো হন্তি কষাযঃ পৈত্তিকং জ্বরম্ |১৭৬|

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श्रीपर्णीचन्दनोशीरपरूषकमधूकजः ||१७५|| शर्करामधुरो हन्ति कषायः पैत्तिकं ज्वरम् |१७६|

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Adhikarana 119 (176) · Śloka 176

পীতং পিত্তজ্বরং হন্যাত্সারিবাদ্যং সশর্করম্ ||১৭৬||

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पीतं पित्तज्वरं हन्यात्सारिवाद्यं सशर्करम् ||१७६||

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Adhikarana 120 (177) · Śloka 177

সযষ্টীমধুকং হন্যাত্তথৈবোত্পলপূর্বকম্ |১৭৭|

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सयष्टीमधुकं हन्यात्तथैवोत्पलपूर्वकम् |१७७|

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Adhikarana 121 (177) · Śloka 177

শৃতং শীতকষাযং বা সোত্পলং শর্করাযুতম্ ||১৭৭||

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शृतं शीतकषायं वा सोत्पलं शर्करायुतम् ||१७७||

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Adhikarana 122 (178) · Śloka 178

গুডূচীপদ্মরোধ্রাণাং সারিবোত্পলযোস্তথা | শর্করামধুরঃ ক্বাথঃ শীতঃ পিত্তজ্বরাপহঃ ||১৭৮||

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गुडूचीपद्मरोध्राणां सारिवोत्पलयोस्तथा | शर्करामधुरः क्वाथः शीतः पित्तज्वरापहः ||१७८||

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Adhikarana 123 (179) · Śloka 180

দ্রাক্ষারগ্বধযোশ্চাপি কাশ্মর্যস্যাথবা পুনঃ | স্বাদুতিক্তকষাযাণাং কষাযৈঃ শর্করাযুতৈঃ ||১৭৯|| সুশীতৈঃ শমযেত্তৃষ্ণাং প্রবৃদ্ধাং দাহমেব চ |১৮০|

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द्राक्षारग्वधयोश्चापि काश्मर्यस्याथवा पुनः | स्वादुतिक्तकषायाणां कषायैः शर्करायुतैः ||१७९|| सुशीतैः शमयेत्तृष्णां प्रवृद्धां दाहमेव च |१८०|

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Adhikarana 124 (180) · Śloka 181

শীতং মধুযুতং তোযমাকণ্ঠাদ্বা পিপাসিতম্ ||১৮০|| বামযেত্পাযযিত্বা তু তেন তৃষ্ণা প্রশাম্যতি |১৮১|

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शीतं मधुयुतं तोयमाकण्ठाद्वा पिपासितम् ||१८०|| वामयेत्पाययित्वा तु तेन तृष्णा प्रशाम्यति |१८१|

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Adhikarana 125 (181) · Śloka 182

ক্ষীরৈঃ ক্ষীরিকষাযৈশ্চ সুশীতৈশ্চন্দনাযুতৈঃ ||১৮১|| অন্তর্দাহে বিধাতব্যমেভিশ্চান্যৈশ্চ শীতলৈঃ |১৮২|

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क्षीरैः क्षीरिकषायैश्च सुशीतैश्चन्दनायुतैः ||१८१|| अन्तर्दाहे विधातव्यमेभिश्चान्यैश्च शीतलैः |१८२|

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Adhikarana 126 (182-183) · Śloka 184

পদ্মকং মধুকং দ্রাক্ষাং পুণ্ডরীকমথোত্পলম্ ||১৮২|| যবান্ ভৃষ্টানুশীরাণি সমঙ্গাং কাশ্মরীফলম্ | নিদধ্যাদপ্সু চালোড্য নিশাপর্যুষিতং ততঃ ||১৮৩|| ক্ষৌদ্রেণ যুক্তং পিবতো জ্বরদাহৌ প্রশাম্যতঃ |১৮৪|

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पद्मकं मधुकं द्राक्षां पुण्डरीकमथोत्पलम् ||१८२|| यवान् भृष्टानुशीराणि समङ्गां काश्मरीफलम् | निदध्यादप्सु चालोड्य निशापर्युषितं ततः ||१८३|| क्षौद्रेण युक्तं पिबतो ज्वरदाहौ प्रशाम्यतः |१८४|

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Adhikarana 127 (184) · Śloka 184

জিহ্বাতালুগলক্লোমশোষে মূর্ধ্নি চ দাপযেত্ ||১৮৪||

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जिह्वातालुगलक्लोमशोषे मूर्ध्नि च दापयेत् ||१८४||

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Adhikarana 128 (185) · Śloka 186

কেশরং মাতুলঙ্গস্য মধুসৈন্ধবসংযুতম্ | শর্করাদাডিমাভ্যাং বা দ্রাক্ষাখর্জূরযোস্তথা ||১৮৫|| বৈরস্যে ধারযেত্কল্কং গণ্ডূষং চ তথা হিতম্ |১৮৬|

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केशरं मातुलङ्गस्य मधुसैन्धवसंयुतम् | शर्करादाडिमाभ्यां वा द्राक्षाखर्जूरयोस्तथा ||१८५|| वैरस्ये धारयेत्कल्कं गण्डूषं च तथा हितम् |१८६|

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Adhikarana 129 (186) · Śloka 187

সপ্তচ্ছদং গুডূচীং চ নিম্বং স্ফূর্জকমেব চ ||১৮৬|| ক্বাথযিত্বা পিবেত্ ক্বাথং সক্ষৌদ্রং কফজে জ্বরে |১৮৭|

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सप्तच्छदं गुडूचीं च निम्बं स्फूर्जकमेव च ||१८६|| क्वाथयित्वा पिबेत् क्वाथं सक्षौद्रं कफजे ज्वरे |१८७|

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Adhikarana 130 (187) · Śloka 188

কটুত্রিকং নাগপুষ্পং হরিদ্রা কটুরোহিণী ||১৮৭|| কৌটজং চ ফলং হন্যাত্ সেব্যমানং কফজ্বরম্ |১৮৮|

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कटुत्रिकं नागपुष्पं हरिद्रा कटुरोहिणी ||१८७|| कौटजं च फलं हन्यात् सेव्यमानं कफज्वरम् |१८८|

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Adhikarana 131 (188-189) · Śloka 189

হরিদ্রাং চিত্রকং নিম্বমুশীরাতিবিষে বচাম্ ||১৮৮|| কুষ্ঠমিন্দ্রযবান্ মূর্বাং পটোলং চাপি সাধিতম্ | পিবেন্মরিচসংযুক্তং সক্ষৌদ্রং কফজে জ্বরে ||১৮৯||

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हरिद्रां चित्रकं निम्बमुशीरातिविषे वचाम् ||१८८|| कुष्ठमिन्द्रयवान् मूर्वां पटोलं चापि साधितम् | पिबेन्मरिचसंयुक्तं सक्षौद्रं कफजे ज्वरे ||१८९||

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Adhikarana 132 (190) · Śloka 190

সারিবাতিবিষাকুষ্ঠপুরাখ্যৈঃ সদুরালভৈঃ | মুস্তেন চ কৃতঃ ক্বাথঃ পীতো হন্যাত্ কফজ্বরম্ ||১৯০||

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सारिवातिविषाकुष्ठपुराख्यैः सदुरालभैः | मुस्तेन च कृतः क्वाथः पीतो हन्यात् कफज्वरम् ||१९०||

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Adhikarana 133 (191) · Śloka 191

মুস্তং বৃক্ষকবীজানি ত্রিফলা কটুরোহিণী | পরূষকাণি চ ক্বাথঃ কফজ্বরবিনাশনঃ ||১৯১||

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मुस्तं वृक्षकबीजानि त्रिफला कटुरोहिणी | परूषकाणि च क्वाथः कफज्वरविनाशनः ||१९१||

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Adhikarana 134 (192) · Śloka 192

রাজবৃক্ষাদিবর্গস্য কষাযো মধুসংযুতঃ | কফবাতজ্বরং হন্যাচ্ছীঘ্রং কালেঽবচারিতঃ ||১৯২||

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राजवृक्षादिवर्गस्य कषायो मधुसंयुतः | कफवातज्वरं हन्याच्छीघ्रं कालेऽवचारितः ||१९२||

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Adhikarana 135 (193-194) · Śloka 195

নাগরং ধান্যকং ভার্গীমভযাং সুরদারু চ | বচাং পর্পটকং মুস্তং ভূতীকমথ কট্ফলম্ ||১৯৩|| নিষ্ক্বাথ্য কফবাতোত্থে ক্ষৌদ্রহিঙ্গুসমন্বিতম্ | দা(পা)তব্যং শ্বাসকাসঘ্নং শ্লেষ্মোত্সেকে গলগ্রহে ||১৯৪|| হিক্কাসু কণ্ঠশ্বযথৌ শূলে হৃদযপার্শ্বজে |১৯৫|

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नागरं धान्यकं भार्गीमभयां सुरदारु च | वचां पर्पटकं मुस्तं भूतीकमथ कट्फलम् ||१९३|| निष्क्वाथ्य कफवातोत्थे क्षौद्रहिङ्गुसमन्वितम् | दा(पा)तव्यं श्वासकासघ्नं श्लेष्मोत्सेके गलग्रहे ||१९४|| हिक्कासु कण्ठश्वयथौ शूले हृदयपार्श्वजे |१९५|

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Adhikarana 136 (195-198) · Śloka 199

বলাপটোলত্রিফলাযষ্ট্যাহ্বানাং বৃষস্য চ ||১৯৫|| ক্বাথো মধুযুতঃ পীতো হন্তি পিত্তকফজ্বরম্ | কটুকাবিজযাদ্রাক্ষামুস্তপর্পটকৈঃ কৃতঃ ||১৯৬|| কষাযো নাশযেত্ পীতঃ শ্লেষ্মপিত্তভবং জ্বরম্ | ভার্গীবচাপর্পটকধান্যহিঙ্গ্বভযাঘনৈঃ ||১৯৭|| কাশ্মর্যনাগরৈঃ ক্বাথঃ সক্ষৌদ্রঃ শ্লেষ্মপিত্তজে | সশর্করামক্ষমাত্রাং কটুকামুষ্ণবারিণা ||১৯৮|| পীত্বা জ্বরং জযেজ্জন্তুঃ কফপিত্তসমুদ্ভবম্ |১৯৯|

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बलापटोलत्रिफलायष्ट्याह्वानां वृषस्य च ||१९५|| क्वाथो मधुयुतः पीतो हन्ति पित्तकफज्वरम् | कटुकाविजयाद्राक्षामुस्तपर्पटकैः कृतः ||१९६|| कषायो नाशयेत् पीतः श्लेष्मपित्तभवं ज्वरम् | भार्गीवचापर्पटकधान्यहिङ्ग्वभयाघनैः ||१९७|| काश्मर्यनागरैः क्वाथः सक्षौद्रः श्लेष्मपित्तजे | सशर्करामक्षमात्रां कटुकामुष्णवारिणा ||१९८|| पीत्वा ज्वरं जयेज्जन्तुः कफपित्तसमुद्भवम् |१९९|

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Adhikarana 137 (199-200) · Śloka 201

কিরাততিক্তমমৃতাং দ্রাক্ষামামলকং শটীম্ ||১৯৯|| নিষ্ক্বাথ্য বাতপিত্তোত্থে তং ক্বাথং সগুডং পিবেত্ | রাস্না বৃষোঽথ ত্রিফলা রাজবৃক্ষফলৈঃ সহ ||২০০|| কষাযঃ সাধিতঃ পীতো বাতপিত্তজ্বরং জযেত্ |২০১|

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किराततिक्तममृतां द्राक्षामामलकं शटीम् ||१९९|| निष्क्वाथ्य वातपित्तोत्थे तं क्वाथं सगुडं पिबेत् | रास्ना वृषोऽथ त्रिफला राजवृक्षफलैः सह ||२००|| कषायः साधितः पीतो वातपित्तज्वरं जयेत् |२०१|

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Adhikarana 138 (201) · Śloka 201

সর্বদোষসমুত্থে তু সংসৃষ্টানবচারযেত্ ||২০১||

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सर्वदोषसमुत्थे तु संसृष्टानवचारयेत् ||२०१||

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Adhikarana 139 (202) · Śloka 202

যথাদোষোচ্ছ্রযং চাপি জ্বরান্ সর্বানুপাচরেত্ |২০২|

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यथादोषोच्छ्रयं चापि ज्वरान् सर्वानुपाचरेत् |२०२|

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Adhikarana 140 (202) · Śloka 203

বৃশ্চীববিল্ববর্ষাভ্বঃ পযশ্চোদকমেব চ ||২০২|| পচেত্ ক্ষীরাবশিষ্টং তু তদ্ধি সর্বজ্বরাপহম্ |২০৩|

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वृश्चीवबिल्ववर्षाभ्वः पयश्चोदकमेव च ||२०२|| पचेत् क्षीरावशिष्टं तु तद्धि सर्वज्वरापहम् |२०३|

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Adhikarana 141 (203) · Śloka 204

উদকাংশাস্ত্রযঃ ক্ষীরং শিংশপাসারসংযুতম্ ||২০৩|| তত্ ক্ষীরশেষং ক্বথিতং পেযং সর্বজ্বরাপহম্ |২০৪|

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उदकांशास्त्रयः क्षीरं शिंशपासारसंयुतम् ||२०३|| तत् क्षीरशेषं क्वथितं पेयं सर्वज्वरापहम् |२०४|

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Adhikarana 142 (204-207) · Śloka 207

নলবেতসযোর্মূলে মূর্বাযাং দেবদারুণি ||২০৪|| কষাযং বিধিবত্ কৃত্বা পেযমেতজ্জ্বরাপহম্ | হরিদ্রা ভদ্রমুস্তং চ ত্রিফলা কটুরোহিণী ||২০৫|| পিচুমন্দঃ পটোলী চ দেবদারু নিদিগ্ধিকা | এষাং কষাযঃ পীতস্তু সন্নিপাতজ্বরং জযেত্ ||২০৬|| অবিপক্তিং প্রসেকং চ শোফং কাসমরোচকম্ | ত্রৈফলো বা সসর্পিষ্কঃ ক্বাথঃ পেযস্ত্রিদোষজে ||২০৭||

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नलवेतसयोर्मूले मूर्वायां देवदारुणि ||२०४|| कषायं विधिवत् कृत्वा पेयमेतज्ज्वरापहम् | हरिद्रा भद्रमुस्तं च त्रिफला कटुरोहिणी ||२०५|| पिचुमन्दः पटोली च देवदारु निदिग्धिका | एषां कषायः पीतस्तु सन्निपातज्वरं जयेत् ||२०६|| अविपक्तिं प्रसेकं च शोफं कासमरोचकम् | त्रैफलो वा ससर्पिष्कः क्वाथः पेयस्त्रिदोषजे ||२०७||

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Adhikarana 143 (208) · Śloka 209

অনন্তাং বালকং মুস্তাং নাগরং কটুরোহিণীম্ সুখাম্বুনা প্রাগুদযাত্পাযযেতাক্ষসম্মিতম্ ||২০৮|| এষ সর্বজ্বরান্ হন্তি দীপযত্যাশু চানলম্ |২০৯|

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अनन्तां बालकं मुस्तां नागरं कटुरोहिणीम् सुखाम्बुना प्रागुदयात्पाययेताक्षसम्मितम् ||२०८|| एष सर्वज्वरान् हन्ति दीपयत्याशु चानलम् |२०९|

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Adhikarana 144 (209) · Śloka 210

দ্রব্যাণি দীপনীযানি তথা বৈরেচনানি চ ||২০৯|| একশো বা দ্বিশো বাঽপি জ্বরঘ্নানি প্রযোজযেত্ |২১০|

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द्रव्याणि दीपनीयानि तथा वैरेचनानि च ||२०९|| एकशो वा द्विशो वाऽपि ज्वरघ्नानि प्रयोजयेत् |२१०|

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Adhikarana 145 (210) · Śloka 211

সর্পির্মধ্বভযাতৈললেহোঽযং সর্বজং জ্বরম্ ||২১০|| শান্তিং নযেত্ত্রিবৃচ্চাপি সক্ষৌদ্রা প্রবলং জ্বরম্ |২১১|

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सर्पिर्मध्वभयातैललेहोऽयं सर्वजं ज्वरम् ||२१०|| शान्तिं नयेत्त्रिवृच्चापि सक्षौद्रा प्रबलं ज्वरम् |२११|

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Adhikarana 146 (211) · Śloka 211

জ্বরে তু বিষমে কার্যমূর্ধ্বং চাধশ্চ শোধনম্ ||২১১||

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ज्वरे तु विषमे कार्यमूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् ||२११||

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Adhikarana 147 (212) · Śloka 212

ঘৃতং প্লীহোদরোক্তং বা নিহন্যাদ্বিষমজ্বরম্ |২১২|

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घृतं प्लीहोदरोक्तं वा निहन्याद्विषमज्वरम् |२१२|

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Adhikarana 148 (212) · Śloka 212

গুডপ্রগাঢাং ত্রিফলাং পিবেদ্বা বিষমার্দিতঃ ||২১২||

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गुडप्रगाढां त्रिफलां पिबेद्वा विषमार्दितः ||२१२||

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Adhikarana 149 (213) · Śloka 213

গুডূচীনিম্বধাত্রীণাং কষাযং বা সমাক্ষিকম্ |২১৩|

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गुडूचीनिम्बधात्रीणां कषायं वा समाक्षिकम् |२१३|

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Adhikarana 150 (213) · Śloka 213

প্রাতঃ প্রাতঃ সসর্পিষ্কং রসোনমুপযোজযেত্ ||২১৩||

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प्रातः प्रातः ससर्पिष्कं रसोनमुपयोजयेत् ||२१३||

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Adhikarana 151 (214) · Śloka 215

ত্রিচতুর্ভিঃ পিবেত্ ক্বাথং পঞ্চভির্বা সমন্বিতৈঃ | মধুকস্য পটোলস্য রোহিণ্যা মুস্তকস্য চ ||২১৪|| হরীতক্যাশ্চ সর্বোঽযং ত্রিবিধো যোগ ইষ্যতে |২১৫|

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त्रिचतुर्भिः पिबेत् क्वाथं पञ्चभिर्वा समन्वितैः | मधुकस्य पटोलस्य रोहिण्या मुस्तकस्य च ||२१४|| हरीतक्याश्च सर्वोऽयं त्रिविधो योग इष्यते |२१५|

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Adhikarana 152 (215) · Śloka 216

সর্পিঃক্ষীরসিতাক্ষৌদ্রমাগধীর্বা যথাবলম্ ||২১৫|| দশমূলীকষাযেণ মাগধীর্বা প্রযোজযেত্ |২১৬|

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सर्पिःक्षीरसिताक्षौद्रमागधीर्वा यथाबलम् ||२१५|| दशमूलीकषायेण मागधीर्वा प्रयोजयेत् |२१६|

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Adhikarana 153 (216) · Śloka 216

পিপ্পলীবর্ধমানং বা পিবেত্ ক্ষীররসাশনঃ ||২১৬||

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पिप्पलीवर्धमानं वा पिबेत् क्षीररसाशनः ||२१६||

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Adhikarana 154 (217) · Śloka 217

তাম্রচূডস্য মাংসেন পিবেদ্বা মদ্যমুত্তমম্ |২১৭|

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ताम्रचूडस्य मांसेन पिबेद्वा मद्यमुत्तमम् |२१७|

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Adhikarana 155 (217) · Śloka 218

কোলাগ্নিমন্থত্রিফলাক্বাথে দধ্না ঘৃতং পচেত্ ||২১৭|| তিল্বকাবাপমেতদ্ধি বিষমজ্বরনাশনম্ |২১৮|

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कोलाग्निमन्थत्रिफलाक्वाथे दध्ना घृतं पचेत् ||२१७|| तिल्वकावापमेतद्धि विषमज्वरनाशनम् |२१८|

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Adhikarana 156 (218-220) · Śloka 221

পিপ্পল্যতিবিষাদ্রাক্ষাসারিবাবিল্বচন্দনৈঃ ||২১৮|| কটুকেন্দ্রযবোশীরসিংহীতামলকীঘনৈঃ | ত্রাযমাণাস্থিরাধাত্রীবিশ্বভেষজচিত্রকৈঃ ||২১৯|| পক্বমেতৈর্ঘৃতং পীতং বিজিত্য বিষমাগ্নিতাম্ | জীর্ণজ্বরশিরঃশূলগুল্মোদরহলীমকান্ ||২২০|| ক্ষযকাসং সসন্তাপং পার্শ্বশূলানপাস্যতি |২২১|

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पिप्पल्यतिविषाद्राक्षासारिवाबिल्वचन्दनैः ||२१८|| कटुकेन्द्रयवोशीरसिंहीतामलकीघनैः | त्रायमाणास्थिराधात्रीविश्वभेषजचित्रकैः ||२१९|| पक्वमेतैर्घृतं पीतं विजित्य विषमाग्निताम् | जीर्णज्वरशिरःशूलगुल्मोदरहलीमकान् ||२२०|| क्षयकासं ससन्तापं पार्श्वशूलानपास्यति |२२१|

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Adhikarana 157 (221-222) · Śloka 223

গুডূচীত্রিফলাবাসাত্রাযমাণাযবাসকৈঃ ||২২১|| ক্বথিতৈর্বিধিবত্পক্বমেতৈঃ কল্কীকৃতৈঃ সমৈঃ | দ্রাক্ষামাগধিকাম্ভোদনাগরোত্পলচন্দনৈঃ ||২২২|| পীতং সর্পিঃ ক্ষযশ্বাসকাসজীর্ণজ্বরান্ জযেত্ |২২৩|

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गुडूचीत्रिफलावासात्रायमाणायवासकैः ||२२१|| क्वथितैर्विधिवत्पक्वमेतैः कल्कीकृतैः समैः | द्राक्षामागधिकाम्भोदनागरोत्पलचन्दनैः ||२२२|| पीतं सर्पिः क्षयश्वासकासजीर्णज्वरान् जयेत् |२२३|

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Adhikarana 158 (223-225) · Śloka 226

কলশীবৃহতীদ্রাক্ষাত্রাযন্তীনিম্বগোক্ষুরৈঃ ||২২৩|| বলাপর্পটকাম্ভোদশালপর্ণীযবাসকৈঃ | পক্বমুত্ক্বথিতৈঃ সর্পিঃ কল্কৈরেভিঃ সমন্বিতম্ ||২২৪|| শটীতামলকীভার্গীমেদামলকপৌষ্করৈঃ | ক্ষীরদ্বিগুণসংযুক্তং জীর্ণজ্বরমপোহতি ||২২৫|| শিরঃপার্শ্বরুজাকাসক্ষযপ্রশমনং পরম্ |২২৬|

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कलशीबृहतीद्राक्षात्रायन्तीनिम्बगोक्षुरैः ||२२३|| बलापर्पटकाम्भोदशालपर्णीयवासकैः | पक्वमुत्क्वथितैः सर्पिः कल्कैरेभिः समन्वितम् ||२२४|| शटीतामलकीभार्गीमेदामलकपौष्करैः | क्षीरद्विगुणसंयुक्तं जीर्णज्वरमपोहति ||२२५|| शिरःपार्श्वरुजाकासक्षयप्रशमनं परम् |२२६|

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Adhikarana 159 (226-228) · Śloka 229

পটোলীপর্পটারিষ্টগুডূচীত্রিফলাবৃষৈঃ ||২২৬|| কটুকাম্বুদভূনিম্বযাসযষ্ট্যাহ্বচন্দনৈঃ | দার্বীশক্রযবোশীরত্রাযমাণাকণোত্পলৈঃ ||২২৭|| ধাত্রীভৃঙ্গরজোভীরুকাকমাচীরসৈর্ঘৃতম্ | সিদ্ধমাশ্বপচীকুষ্ঠজ্বরশুক্রার্জুনব্রণান্ ||২২৮|| হন্যান্নযনবদনশ্রবণঘ্রাণজান্ গদান্ |২২৯|

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पटोलीपर्पटारिष्टगुडूचीत्रिफलावृषैः ||२२६|| कटुकाम्बुदभूनिम्बयासयष्ट्याह्वचन्दनैः | दार्वीशक्रयवोशीरत्रायमाणाकणोत्पलैः ||२२७|| धात्रीभृङ्गरजोभीरुकाकमाचीरसैर्घृतम् | सिद्धमाश्वपचीकुष्ठज्वरशुक्रार्जुनव्रणान् ||२२८|| हन्यान्नयनवदनश्रवणघ्राणजान् गदान् |२२९|

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Adhikarana 160 (229-233) · Śloka 234

বিডঙ্গত্রিফলামুস্তমঞ্জিষ্ঠাদাডিমোত্পলৈঃ ||২২৯|| প্রিযঙ্গ্বেলৈলবালূকচন্দনামরদারুভিঃ | বর্হিষ্ঠকুষ্ঠরজনীপার্ণিনীসারিবাদ্বযৈঃ ||২৩০|| হরেণুকাত্রিবৃদ্দন্তীবচাতালীশকেসরৈঃ | দ্বিক্ষীরং বিপচেত্সর্পির্মালতীকুসুমৈঃ সহ ||২৩১|| জীর্ণজ্বরশ্বাসকাসগুল্মোন্মাদগরাপহম্ | এতত্কল্যাণকং নাম সর্পির্মাঙ্গল্যমুত্তমম্ ||২৩২|| অলক্ষ্মীগ্রহরক্ষোগ্নিমান্দ্যাপস্মারপাপনুত্ | শস্যতে নষ্টশুক্রাণাং বন্ধ্যানাং গর্ভদং পরম্ ||২৩৩|| মেধ্যং চক্ষুষ্যমাযুষ্যং রেতোমার্গবিশোধনম্ |২৩৪|

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विडङ्गत्रिफलामुस्तमञ्जिष्ठादाडिमोत्पलैः ||२२९|| प्रियङ्ग्वेलैलवालूकचन्दनामरदारुभिः | बर्हिष्ठकुष्ठरजनीपार्णिनीसारिवाद्वयैः ||२३०|| हरेणुकात्रिवृद्दन्तीवचातालीशकेसरैः | द्विक्षीरं विपचेत्सर्पिर्मालतीकुसुमैः सह ||२३१|| जीर्णज्वरश्वासकासगुल्मोन्मादगरापहम् | एतत्कल्याणकं नाम सर्पिर्माङ्गल्यमुत्तमम् ||२३२|| अलक्ष्मीग्रहरक्षोग्निमान्द्यापस्मारपापनुत् | शस्यते नष्टशुक्राणां वन्ध्यानां गर्भदं परम् ||२३३|| मेध्यं चक्षुष्यमायुष्यं रेतोमार्गविशोधनम् |२३४|

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Adhikarana 161 (234-239) · Śloka 240

এতৈরেব তথা দ্রব্যৈঃ সর্বগন্ধৈশ্চ সাধিতম্ ||২৩৪|| কপিলাযা ঘৃতপ্রস্থং সুবর্ণমণিসংযুতম্ | তত্ক্ষীরেণ সহৈকধ্যং প্রসাধ্য কুসুমৈরিমৈঃ ||২৩৫|| সুমনশ্চম্পকাশোকশিরীষকুসুমৈর্বৃতম্ | তথা নলদপদ্মানাং কেশরৈর্দাডিমস্য চ ||২৩৬|| তিথৌ প্রশস্তে নক্ষত্রে সাধকস্যাতুরস্য চ | কৃতং মনুষ্যদেবায ব্রাহ্মণৈরভিমন্ত্রিতম্ ||২৩৭|| দত্তং সর্বজ্বরান্ হন্তি মহাকল্যাণকং ত্বিদম্ ||২৩৮|| দর্শনস্পর্শনাভ্যাং চ সর্বরোগহরং শিবম্ | অধৃষ্যঃ সর্বভূতানাং বলীপলিতবর্জিতঃ ||২৩৯|| অস্যাভ্যাসাদ্ঘৃতস্যেহ জীবেদ্বর্ষশতত্রযম্ |২৪০|

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एतैरेव तथा द्रव्यैः सर्वगन्धैश्च साधितम् ||२३४|| कपिलाया घृतप्रस्थं सुवर्णमणिसंयुतम् | तत्क्षीरेण सहैकध्यं प्रसाध्य कुसुमैरिमैः ||२३५|| सुमनश्चम्पकाशोकशिरीषकुसुमैर्वृतम् | तथा नलदपद्मानां केशरैर्दाडिमस्य च ||२३६|| तिथौ प्रशस्ते नक्षत्रे साधकस्यातुरस्य च | कृतं मनुष्यदेवाय ब्राह्मणैरभिमन्त्रितम् ||२३७|| दत्तं सर्वज्वरान् हन्ति महाकल्याणकं त्विदम् ||२३८|| दर्शनस्पर्शनाभ्यां च सर्वरोगहरं शिवम् | अधृष्यः सर्वभूतानां वलीपलितवर्जितः ||२३९|| अस्याभ्यासाद्घृतस्येह जीवेद्वर्षशतत्रयम् |२४०|

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Adhikarana 162 (240-242) · Śloka 242

গব্যং দধি চ মূত্রং চ ক্ষীরং সর্পিঃ শকৃদ্রসঃ ||২৪০|| সমভাগানি পাচ্যানি কল্কাংশ্চৈতান্ সমাবপেত্ | ত্রিফলাং চিত্রকং মুস্তং হরিদ্রাতিবিষে বচাম্ ||২৪১|| বিডঙ্গং ত্র্যূষণং চব্যং সুরদারু তথৈব চ | পঞ্চগব্যমিদং পানাদ্বিষমজ্বরনাশনম্ ||২৪২||

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गव्यं दधि च मूत्रं च क्षीरं सर्पिः शकृद्रसः ||२४०|| समभागानि पाच्यानि कल्कांश्चैतान् समावपेत् | त्रिफलां चित्रकं मुस्तं हरिद्रातिविषे वचाम् ||२४१|| विडङ्गं त्र्यूषणं चव्यं सुरदारु तथैव च | पञ्चगव्यमिदं पानाद्विषमज्वरनाशनम् ||२४२||

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Adhikarana 163 (243) · Śloka 243

পঞ্চগব্যমৃতে গর্ভাত্পাচ্যমন্যদ্... |২৪৩|

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पञ्चगव्यमृते गर्भात्पाच्यमन्यद्... |२४३|

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Adhikarana 164 (243) · Śloka 244

... বৃষেণ চ | বলযাঽথ পরং পাচ্যং গুডূচ্যা তদ্বদেব তু ||২৪৩|| জীর্ণজ্বরে চ শোফে চ পাণ্ডুরোগে চ পূজিতম্ |২৪৪|

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... वृषेण च | बलयाऽथ परं पाच्यं गुडूच्या तद्वदेव तु ||२४३|| जीर्णज्वरे च शोफे च पाण्डुरोगे च पूजितम् |२४४|

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Adhikarana 165 (244) · Śloka 244

এতেনৈব তু কল্পেন ঘৃতং পঞ্চাবিকং পচেত্ | পঞ্চাজং পঞ্চমহিষং চতুরুষ্ট্রমথাপি চ ||২৪৪||

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एतेनैव तु कल्पेन घृतं पञ्चाविकं पचेत् | पञ्चाजं पञ्चमहिषं चतुरुष्ट्रमथापि च ||२४४||

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Adhikarana 166 (245-253) · Śloka 254

ত্রিফলোশীরশম্পাককটুকাতিবিষাঘনৈঃ | শতাবরীসপ্তপর্ণগুডূচীরজনীদ্বযৈঃ ||২৪৫|| চিত্রকত্রিবৃতামূর্বাপটোলারিষ্টবালকৈঃ | কিরাততিক্তকবচাবিশালাপদ্মকোত্পলৈঃ ||২৪৬|| সারিবাদ্বযযষ্ট্যাহ্বচবিকারক্তচন্দনৈঃ | দুরালভাপর্পটকত্রাযমাণাটরূষকৈঃ ||২৪৭|| রাস্নাকুঙ্কুমমঞ্জিষ্ঠামাগধীনাগরৈস্তথা | ধাত্রীফলরসৈঃ সম্যগ্দ্বিগুণৈঃ সাধিতং হবিঃ ||২৪৮|| পরিসর্পজ্বরশ্বাসগুল্মকুষ্ঠনিবারণম্ | পাণ্ডুপ্লীহাগ্নিসাদিভ্য এতদেব পরং হিতম্ ||২৪৯|| পটোলকটুকাদার্বীনিম্ববাসাফলত্রিকম্ | দুরালভাপর্পটকত্রাযমাণাঃ পলোন্মিতাঃ ||২৫০|| প্রস্থমামলকানাং চ ক্বাথযেত্সলিলার্মণে | তেন পাদাবশেষেণ ঘৃতপ্রস্থং বিপাচযেত্ ||২৫১|| কল্কৈঃ কুটজভূনিম্বঘনযষ্ট্যাহ্বচন্দনৈঃ | সপিপ্পলীকৈস্তত্সিদ্ধং চক্ষুষ্যং শুক্লযোর্হিতম্ ||২৫২|| ঘ্রাণকর্ণাক্ষিবদনবর্ত্মরোগব্রণাপহম্ | রক্তপিত্তকফস্বেদক্লেদপূযোপশোষণম্ ||২৫৩|| কামলাজ্বরবীসর্পগণ্ডমালাহরং পরম্ |২৫৪|

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त्रिफलोशीरशम्पाककटुकातिविषाघनैः | शतावरीसप्तपर्णगुडूचीरजनीद्वयैः ||२४५|| चित्रकत्रिवृतामूर्वापटोलारिष्टवालकैः | किराततिक्तकवचाविशालापद्मकोत्पलैः ||२४६|| सारिवाद्वययष्ट्याह्वचविकारक्तचन्दनैः | दुरालभापर्पटकत्रायमाणाटरूषकैः ||२४७|| रास्नाकुङ्कुममञ्जिष्ठामागधीनागरैस्तथा | धात्रीफलरसैः सम्यग्द्विगुणैः साधितं हविः ||२४८|| परिसर्पज्वरश्वासगुल्मकुष्ठनिवारणम् | पाण्डुप्लीहाग्निसादिभ्य एतदेव परं हितम् ||२४९|| पटोलकटुकादार्वीनिम्बवासाफलत्रिकम् | दुरालभापर्पटकत्रायमाणाः पलोन्मिताः ||२५०|| प्रस्थमामलकानां च क्वाथयेत्सलिलार्मणे | तेन पादावशेषेण घृतप्रस्थं विपाचयेत् ||२५१|| कल्कैः कुटजभूनिम्बघनयष्ट्याह्वचन्दनैः | सपिप्पलीकैस्तत्सिद्धं चक्षुष्यं शुक्लयोर्हितम् ||२५२|| घ्राणकर्णाक्षिवदनवर्त्मरोगव्रणापहम् | रक्तपित्तकफस्वेदक्लेदपूयोपशोषणम् ||२५३|| कामलाज्वरवीसर्पगण्डमालाहरं परम् |२५४|

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Adhikarana 167 (254-255) · Śloka 255

শৃতং পযঃ শর্করা চ পিপ্পল্যো মধুসর্পিষী ||২৫৪|| পঞ্চসারমিদং পেযং মথিতং বিষমজ্বরে | ক্ষতক্ষীণে ক্ষযে শ্বাসে হৃদ্রোগে চৈতদিষ্যতে ||২৫৫||

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शृतं पयः शर्करा च पिप्पल्यो मधुसर्पिषी ||२५४|| पञ्चसारमिदं पेयं मथितं विषमज्वरे | क्षतक्षीणे क्षये श्वासे हृद्रोगे चैतदिष्यते ||२५५||

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Adhikarana 168 (256) · Śloka 256

লাক্ষাবিশ্বনিশামূর্বামঞ্জিষ্ঠাস্বর্জিকামযৈঃ | ষড্গুণেন চ তক্রেণ সিদ্ধং তৈলং জ্বরান্তকৃত্ ||২৫৬||

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लाक्षाविश्वनिशामूर्वामञ्जिष्ठास्वर्जिकामयैः | षड्गुणेन च तक्रेण सिद्धं तैलं ज्वरान्तकृत् ||२५६||

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Adhikarana 169 (257-258) · Śloka 258

ক্ষীরিবৃক্ষাসনারিষ্টজম্বূসপ্তচ্ছদার্জুনৈঃ | শিরীষখদিরাস্ফোটামৃতবল্ল্যাটরূষকৈঃ ||২৫৭|| কটুকাপর্পটোশীরবচাতেজোবতীঘনৈঃ | সাধিতং তৈলমভ্যঙ্গাদাশু জীর্ণজ্বরাপহম্ ||২৫৮||

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क्षीरिवृक्षासनारिष्टजम्बूसप्तच्छदार्जुनैः | शिरीषखदिरास्फोटामृतवल्ल्याटरूषकैः ||२५७|| कटुकापर्पटोशीरवचातेजोवतीघनैः | साधितं तैलमभ्यङ्गादाशु जीर्णज्वरापहम् ||२५८||

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Adhikarana 170 (259-261) · Śloka 261

নির্বিষৈর্ভুজগৈর্নাগৈর্বিনীতৈঃ কৃততস্করৈঃ | ত্রাসযেদাগমে চৈনং তদহর্ভোজযেন্ন চ ||২৫৯|| অত্যভিষ্যন্দিগুরুভির্বামযেদ্বা পুনঃ পুনঃ | মদ্যং তীক্ষ্ণং পাযযেত ঘৃতং বা জ্বরনাশনম্ ||২৬০|| পুরাণং বা ঘৃতং কামমুদারং বা বিরেচনম্ | নিরূহযেদ্বা মতিমান্ সুস্বিন্নং তদহর্নরম্ ||২৬১||

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निर्विषैर्भुजगैर्नागैर्विनीतैः कृततस्करैः | त्रासयेदागमे चैनं तदहर्भोजयेन्न च ||२५९|| अत्यभिष्यन्दिगुरुभिर्वामयेद्वा पुनः पुनः | मद्यं तीक्ष्णं पाययेत घृतं वा ज्वरनाशनम् ||२६०|| पुराणं वा घृतं काममुदारं वा विरेचनम् | निरूहयेद्वा मतिमान् सुस्विन्नं तदहर्नरम् ||२६१||

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Adhikarana 171 (262) · Śloka 262

অজাব্যোশ্চর্মরোমাণি বচা কুষ্ঠং পলঙ্কষা | নিম্বপত্রং মধুযুতং ধূপনং তস্য দাপযেত্ ||২৬২||

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अजाव्योश्चर्मरोमाणि वचा कुष्ठं पलङ्कषा | निम्बपत्रं मधुयुतं धूपनं तस्य दापयेत् ||२६२||

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Adhikarana 172 (263) · Śloka 263

বৈডালং বা শকৃদ্যোজ্যং বেপমানস্য ধূপনম্ |২৬৩|

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बैडालं वा शकृद्योज्यं वेपमानस्य धूपनम् |२६३|

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Adhikarana 173 (263) · Śloka 263

পিপ্পলী সৈন্ধবং তৈলং নেপালী চেক্ষণাঞ্জনম্ ||২৬৩||

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पिप्पली सैन्धवं तैलं नेपाली चेक्षणाञ्जनम् ||२६३||

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Adhikarana 174 (264) · Śloka 264

উদরোক্তানি সর্পিংষি যান্যুক্তানি পুরা মযা | কল্পোক্তং চাজিতং সর্পিঃ সেব্যমানং জ্বরং জযেত্ ||২৬৪||

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उदरोक्तानि सर्पिंषि यान्युक्तानि पुरा मया | कल्पोक्तं चाजितं सर्पिः सेव्यमानं ज्वरं जयेत् ||२६४||

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Adhikarana 175 (265) · Śloka 265

ভূতবিদ্যাসমুদ্দিষ্টৈর্বন্ধাবেশনপূজনৈঃ | জযেদ্ভূতাভিষঙ্গোত্থং... |২৬৫|

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भूतविद्यासमुद्दिष्टैर्बन्धावेशनपूजनैः | जयेद्भूताभिषङ्गोत्थं... |२६५|

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Adhikarana 176 (265) · Śloka 265

... বিজ্ঞানাদ্যৈশ্চ মানসম্ ||২৬৫||

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... विज्ञानाद्यैश्च मानसम् ||२६५||

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Adhikarana 177 (266) · Śloka 266

শ্রমক্ষযোত্থে ভুঞ্জীত ঘৃতাভ্যক্তো রসৌদনম্ |২৬৬|

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श्रमक्षयोत्थे भुञ्जीत घृताभ्यक्तो रसौदनम् |२६६|

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Adhikarana 178 (266) · Śloka 266

অভিশাপাভিচারোত্থৌ জ্বরৌ হোমাদিনা জযেত্ ||২৬৬||

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अभिशापाभिचारोत्थौ ज्वरौ होमादिना जयेत् ||२६६||

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Adhikarana 179 (267) · Śloka 267

দানস্বস্ত্যযনাতিথ্যৈরুত্পাতগ্রহপীডিতম্ |২৬৭|

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दानस्वस्त्ययनातिथ्यैरुत्पातग्रहपीडितम् |२६७|

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Adhikarana 180 (267) · Śloka 268

অভিঘাতজ্বরে কুর্যাত্ ক্রিযামুষ্ণবিবর্জিতাম্ ||২৬৭|| কষাযমধুরাং স্নিগ্ধাং যথাদোষমথাপি বা |২৬৮|

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अभिघातज्वरे कुर्यात् क्रियामुष्णविवर्जिताम् ||२६७|| कषायमधुरां स्निग्धां यथादोषमथापि वा |२६८|

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Adhikarana 181 (268-269) · Śloka 269

ওষধীগন্ধবিষজৌ বিষপিত্তপ্রসাধনৈঃ ||২৬৮|| জযেত্ কষাযং চ হিতং সর্বগন্ধকৃতং তথা | নিম্বদারুকষাযং বা হিতং সৌমনসং যথা ||২৬৯||

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ओषधीगन्धविषजौ विषपित्तप्रसाधनैः ||२६८|| जयेत् कषायं च हितं सर्वगन्धकृतं तथा | निम्बदारुकषायं वा हितं सौमनसं यथा ||२६९||

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Adhikarana 182 (270) · Śloka 270

যবান্নবিকৃতিঃ সর্পির্মদ্যং চ বিষমে হিতম্ |২৭০|

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यवान्नविकृतिः सर्पिर्मद्यं च विषमे हितम् |२७०|

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Adhikarana 183 (270) · Śloka 270

সম্পূজযেদ্দ্বিজান্ গাশ্চ দেবমীশানমম্বিকাম্ ||২৭০||

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सम्पूजयेद्द्विजान् गाश्च देवमीशानमम्बिकाम् ||२७०||

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Adhikarana 184 (271-281) · Śloka 281

কফবাতোত্থযোশ্চাপি জ্বরযোঃ শীতপীডিতম্ | দিহ্যাদুষ্ণেন বর্গেণ পরশ্চোষ্ণো বিধির্হিতঃ ||২৭১|| সিঞ্চেত্ কোষ্ণৈরারনালশুক্তগোমূত্রমস্তুভিঃ | দিহ্যাত্ পলাশৈঃ পিষ্টৈর্বা সুরসার্জকশিগ্রুজৈঃ ||২৭২|| ক্ষারতৈলেন বাঽভ্যঙ্গঃ সশুক্তেন বিধীযতে | পানমারগ্বধাদেশ্চ ক্বথিতস্য বিশেষতঃ ||২৭৩|| অবগাহঃ সুখোষ্ণশ্চ বাতঘ্নক্বাথযোজিতঃ | জিত্বা শীতং ক্রমৈরেভিঃ সুখোষ্ণজলসেচিতম্ ||২৭৪|| প্রবেশ্যৌর্ণিককার্পাসকৌশেযাম্বরসংবৃতম্ | শাযযেত্ ক্ষামদেহং চ কালাগুরুবিভূষিতম্ ||২৭৫|| স্তনাঢ্যা রূপসম্পন্নাঃ কুশলা নবযৌবনাঃ | ভজেযুঃ প্রমদা গাত্রৈঃ শীতদৈন্যাপহাঃ শুভাঃ ||২৭৬|| শরচ্ছশাঙ্কবদনা নীলোত্পলবিলোচনাঃ | স্ফুরিতভ্রূলতাভঙ্গললাটতটকম্পনাঃ ||২৭৭|| প্রলম্ববিম্বপ্রচলদ্বিম্বীফলনিভাধরাঃ | কৃশোদর্যোঽতিবিস্তীর্ণজঘনোদ্বহনালসাঃ ||২৭৮|| কুঙ্কুমাগুরুদিগ্ধাঙ্গ্যো ঘনতুঙ্গপযোধরাঃ | সুগন্ধিধূপিতশ্লক্ষ্ণস্রস্তাংশুকবিভূষণাঃ ||২৭৯|| গাঢমালিঙ্গযেযুস্তং তরুং বনলতা ইব | প্রহ্লাদং চাস্য বিজ্ঞায তাঃ স্ত্রীরপনযেত্ পুনঃ ||২৮০|| তাসামঙ্গপরিষ্বঙ্গনিবারিতহিমজ্বরম্ | ভোজযেদ্ধিতমন্নং চ যথা সুখমবাপ্নুযাত্ ||২৮১||

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कफवातोत्थयोश्चापि ज्वरयोः शीतपीडितम् | दिह्यादुष्णेन वर्गेण परश्चोष्णो विधिर्हितः ||२७१|| सिञ्चेत् कोष्णैरारनालशुक्तगोमूत्रमस्तुभिः | दिह्यात् पलाशैः पिष्टैर्वा सुरसार्जकशिग्रुजैः ||२७२|| क्षारतैलेन वाऽभ्यङ्गः सशुक्तेन विधीयते | पानमारग्वधादेश्च क्वथितस्य विशेषतः ||२७३|| अवगाहः सुखोष्णश्च वातघ्नक्वाथयोजितः | जित्वा शीतं क्रमैरेभिः सुखोष्णजलसेचितम् ||२७४|| प्रवेश्यौर्णिककार्पासकौशेयाम्बरसंवृतम् | शाययेत् क्षामदेहं च कालागुरुविभूषितम् ||२७५|| स्तनाढ्या रूपसम्पन्नाः कुशला नवयौवनाः | भजेयुः प्रमदा गात्रैः शीतदैन्यापहाः शुभाः ||२७६|| शरच्छशाङ्कवदना नीलोत्पलविलोचनाः | स्फुरितभ्रूलताभङ्गललाटतटकम्पनाः ||२७७|| प्रलम्बबिम्बप्रचलद्बिम्बीफलनिभाधराः | कृशोदर्योऽतिविस्तीर्णजघनोद्वहनालसाः ||२७८|| कुङ्कुमागुरुदिग्धाङ्ग्यो घनतुङ्गपयोधराः | सुगन्धिधूपितश्लक्ष्णस्रस्तांशुकविभूषणाः ||२७९|| गाढमालिङ्गयेयुस्तं तरुं वनलता इव | प्रह्लादं चास्य विज्ञाय ताः स्त्रीरपनयेत् पुनः ||२८०|| तासामङ्गपरिष्वङ्गनिवारितहिमज्वरम् | भोजयेद्धितमन्नं च यथा सुखमवाप्नुयात् ||२८१||

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Adhikarana 185 (282-285) · Śloka 286

দাহাভিভূতে তু বিধিং কুর্যাদ্দাহবিনাশনম্ | মধুফাণিতযুক্তেন নিম্বপত্রাম্ভসাঽপি বা ||২৮২|| দাহজ্বরার্তং মতিমান্ বামযেত্ ক্ষিপ্রমেব চ | শতধৌতঘৃতাভ্যক্তং দিহ্যাদ্বা যবশত্কুভিঃ ||২৮৩|| কোলামলকসংযুক্তৈঃ শুক্তধান্যাম্লসংযুতৈঃ | অম্লপিষ্টৈঃ সুশীতৈশ্চ ফেনিলাপল্লবৈস্তথা ||২৮৪|| অম্লপিষ্টৈঃ সুশীতৈর্বা পলাশতরুজৈর্দিহেত্ | বদরীপল্লবোত্থেন ফেনেনারিষ্টকস্য চ ||২৮৫|| লিপ্তেঽঙ্গে দাহতৃণ্মূর্চ্ছাঃ প্রশাম্যন্তি চ সর্বশঃ |২৮৬|

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दाहाभिभूते तु विधिं कुर्याद्दाहविनाशनम् | मधुफाणितयुक्तेन निम्बपत्राम्भसाऽपि वा ||२८२|| दाहज्वरार्तं मतिमान् वामयेत् क्षिप्रमेव च | शतधौतघृताभ्यक्तं दिह्याद्वा यवशत्कुभिः ||२८३|| कोलामलकसंयुक्तैः शुक्तधान्याम्लसंयुतैः | अम्लपिष्टैः सुशीतैश्च फेनिलापल्लवैस्तथा ||२८४|| अम्लपिष्टैः सुशीतैर्वा पलाशतरुजैर्दिहेत् | बदरीपल्लवोत्थेन फेनेनारिष्टकस्य च ||२८५|| लिप्तेऽङ्गे दाहतृण्मूर्च्छाः प्रशाम्यन्ति च सर्वशः |२८६|

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Adhikarana 186 (286-287) · Śloka 287

যবার্ধকুডবং পিষ্ট্বা মঞ্জিষ্ঠার্ধপলং তথা ||২৮৬|| অম্লপ্রস্থশতোন্মিশ্রং তৈলপ্রস্থং বিপাচযেত্ | এতত্ প্রহ্লাদনং তৈলং জ্বরদাহবিনাশনম্ ||২৮৭||

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यवार्धकुडवं पिष्ट्वा मञ्जिष्ठार्धपलं तथा ||२८६|| अम्लप्रस्थशतोन्मिश्रं तैलप्रस्थं विपाचयेत् | एतत् प्रह्लादनं तैलं ज्वरदाहविनाशनम् ||२८७||

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Adhikarana 187 (288-293) · Śloka 293

ন্যগ্রোধাদির্গণো যস্তু কাকোল্যাদিশ্চ যো গণঃ | উত্পলাদির্গণো যস্তু পিষ্টৈর্বা তৈঃ প্রলেপযেত্ ||২৮৮|| তত্কষাযাম্লসংসিদ্ধাঃ স্নেহাশ্চাভ্যঞ্জনে হিতাঃ | তেষাং শীতকষাযে বা দাহার্তমবগাহযেত্ ||২৮৯|| দাহবেগে ত্বতিক্রান্তে তস্মাদুদ্ধৃত্য মানবম্ | পরিষিচ্যাম্বুভিঃ শীতৈঃ প্রলিম্পেচ্চন্দনাদিভিঃ ||২৯০|| গ্লানং বা দীনমনসমাশ্লিষেযুর্বরাঙ্গনাঃ | পেলবক্ষৌমসংবীতাশ্চন্দনার্দ্রপযোধরাঃ ||২৯১|| বিভ্রত্যোঽব্জস্রজশ্চিত্রা মণিরত্নবিভূষিতাঃ | ভজেযুস্তাঃ স্তনৈঃ শীতৈঃ স্পৃশন্ত্যোঽম্বুরুহৈঃ সুখৈঃ ||২৯২|| প্রহ্লাদং চাস্য বিজ্ঞায তাঃ স্ত্রীরপনযেত্ পুনঃ | হিতং চ ভোজযেদন্নং তথাঽঽপ্নোতি সুখং মহত্ ||২৯৩||

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न्यग्रोधादिर्गणो यस्तु काकोल्यादिश्च यो गणः | उत्पलादिर्गणो यस्तु पिष्टैर्वा तैः प्रलेपयेत् ||२८८|| तत्कषायाम्लसंसिद्धाः स्नेहाश्चाभ्यञ्जने हिताः | तेषां शीतकषाये वा दाहार्तमवगाहयेत् ||२८९|| दाहवेगे त्वतिक्रान्ते तस्मादुद्धृत्य मानवम् | परिषिच्याम्बुभिः शीतैः प्रलिम्पेच्चन्दनादिभिः ||२९०|| ग्लानं वा दीनमनसमाश्लिषेयुर्वराङ्गनाः | पेलवक्षौमसंवीताश्चन्दनार्द्रपयोधराः ||२९१|| बिभ्रत्योऽब्जस्रजश्चित्रा मणिरत्नविभूषिताः | भजेयुस्ताः स्तनैः शीतैः स्पृशन्त्योऽम्बुरुहैः सुखैः ||२९२|| प्रह्लादं चास्य विज्ञाय ताः स्त्रीरपनयेत् पुनः | हितं च भोजयेदन्नं तथाऽऽप्नोति सुखं महत् ||२९३||

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Adhikarana 188 (294) · Śloka 294

পিত্তজ্বরোক্তং শমনং বিরেকোঽন্যদ্ধিতং চ যত্ |২৯৪|

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पित्तज्वरोक्तं शमनं विरेकोऽन्यद्धितं च यत् |२९४|

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Adhikarana 189 (294) · Śloka 295

নির্হরেত্পিত্তমেবাদৌ দোষেষু সমবাযিষু ||২৯৪|| দুর্নিবারতরং তদ্ধি জ্বরার্তানাং বিশেষতঃ |২৯৫|

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निर्हरेत्पित्तमेवादौ दोषेषु समवायिषु ||२९४|| दुर्निवारतरं तद्धि ज्वरार्तानां विशेषतः |२९५|

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Adhikarana 190 (295) · Śloka 296

ছর্দিমূর্চ্ছাপিপাসাদীনবিরোধাজ্জ্বরস্য চ ||২৯৫|| উপদ্রবাঞ্জযেচ্চাপি প্রত্যনীকেন হেতুনা |২৯৬|

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छर्दिमूर्च्छापिपासादीनविरोधाज्ज्वरस्य च ||२९५|| उपद्रवाञ्जयेच्चापि प्रत्यनीकेन हेतुना |२९६|

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Adhikarana 191 (296-299) · Śloka 299

বিশেষমপরং চাত্র শৃণূপদ্রবনাশনম্ ||২৯৬|| মধুকং রজনী মুস্তং দাডিমং সাম্লবেতসম্ | অঞ্জনং তিন্তিডীকং চ নলদং পত্রমুত্পলম্ ||২৯৭|| ত্বচং ব্যাঘ্রনখং চৈব মাতুলুঙ্গরসো মধু | দিহ্যাদেভির্জ্বরার্তস্য মধুশুক্তযুতৈঃ শিরঃ ||২৯৮|| শিরোভিতাপসম্মোহবমিহিক্কাপ্রবেপথূন্ | প্রদেহো নাশযত্যেষ জ্বরিতানামুপদ্রবান্ ||২৯৯||

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विशेषमपरं चात्र शृणूपद्रवनाशनम् ||२९६|| मधुकं रजनी मुस्तं दाडिमं साम्लवेतसम् | अञ्जनं तिन्तिडीकं च नलदं पत्रमुत्पलम् ||२९७|| त्वचं व्याघ्रनखं चैव मातुलुङ्गरसो मधु | दिह्यादेभिर्ज्वरार्तस्य मधुशुक्तयुतैः शिरः ||२९८|| शिरोभितापसम्मोहवमिहिक्काप्रवेपथून् | प्रदेहो नाशयत्येष ज्वरितानामुपद्रवान् ||२९९||

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Adhikarana 192 (300-301) · Śloka 301

মধূকমথ হ্রীবেরমুত্পলানি মধূলিকাম্ ||৩০০|| লীঢ্বা চূর্ণানি মধুনা সর্পিষা চ জযেদ্বমিম্ | কফপ্রসেকাসৃক্পিত্তহিক্কাশ্বাসাংশ্চ দারুণান্ ||৩০১||

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मधूकमथ ह्रीबेरमुत्पलानि मधूलिकाम् ||३००|| लीढ्वा चूर्णानि मधुना सर्पिषा च जयेद्वमिम् | कफप्रसेकासृक्पित्तहिक्काश्वासांश्च दारुणान् ||३०१||

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Adhikarana 193 (302) · Śloka 302

লিহন্ জ্বরার্তস্ত্রিফলাং পিপ্পলীং চ সমাক্ষিকাম্ | কাসে শ্বাসে চ মধুনা সর্পিষা চ সুখী ভবেত্ ||৩০২||

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लिहन् ज्वरार्तस्त्रिफलां पिप्पलीं च समाक्षिकाम् | कासे श्वासे च मधुना सर्पिषा च सुखी भवेत् ||३०२||

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Adhikarana 194 (303) · Śloka 303

বিদারী দাডিমং লোধ্রং দধিত্থং বীজপূরকম্ | এভিঃ প্রদিহ্যান্মূর্ধানং তৃড্দাহার্তস্য দেহিনঃ ||৩০৩||

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विदारी दाडिमं लोध्रं दधित्थं बीजपूरकम् | एभिः प्रदिह्यान्मूर्धानं तृड्दाहार्तस्य देहिनः ||३०३||

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Adhikarana 195 (304) · Śloka 305

দাডিমস্য সিতাযাশ্চ দ্রাক্ষামলকযোস্তথা | বৈরস্যে ধারযেত্ কল্কং গণ্ডূষং চ যথাহিতম্ ||৩০৪|| ক্ষীরেক্ষুরসমাক্ষীকসর্পিস্তৈলোষ্ণবারিভিঃ |৩০৫|

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दाडिमस्य सितायाश्च द्राक्षामलकयोस्तथा | वैरस्ये धारयेत् कल्कं गण्डूषं च यथाहितम् ||३०४|| क्षीरेक्षुरसमाक्षीकसर्पिस्तैलोष्णवारिभिः |३०५|

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Adhikarana 196 (305) · Śloka 305

শূন্যে মূর্ধ্নি হিতং নস্যং জীবনীযশৃতং ঘৃতম্ ||৩০৫||

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शून्ये मूर्ध्नि हितं नस्यं जीवनीयशृतं घृतम् ||३०५||

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Adhikarana 197 (306) · Śloka 307

চূর্ণিতৈস্ত্রিফলাশ্যামাত্রিবৃত্পিপ্পলিসংযুতৈঃ | সক্ষৌদ্রঃ শর্করাযুক্তো বিরেকস্তু প্রশস্যতে ||৩০৬|| পক্বে পিত্তজ্বরে রক্তে চোর্ধ্বগে বেপথৌ তথা |৩০৭|

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चूर्णितैस्त्रिफलाश्यामात्रिवृत्पिप्पलिसंयुतैः | सक्षौद्रः शर्करायुक्तो विरेकस्तु प्रशस्यते ||३०६|| पक्वे पित्तज्वरे रक्ते चोर्ध्वगे वेपथौ तथा |३०७|

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Adhikarana 198 (307) · Śloka 307

কফবাতোত্থযোরেবং স্নেহাভ্যঙ্গৈর্বিশোধযেত্ ||৩০৭||

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कफवातोत्थयोरेवं स्नेहाभ्यङ्गैर्विशोधयेत् ||३०७||

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Adhikarana 199 (308) · Śloka 308

হৃতদোষো ভ্রমার্তস্তু লিহ্যাত্ ক্ষৌদ্রসিতাভযাঃ |৩০৮|

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हृतदोषो भ्रमार्तस्तु लिह्यात् क्षौद्रसिताभयाः |३०८|

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Adhikarana 200 (308) · Śloka 309

বাতঘ্নমধুরৈর্যোজ্যা নিরূহা বাতজে জ্বরে ||৩০৮|| অবেক্ষ্য দোষং প্রাণং চ যথাস্বং চানুবাসনাঃ |৩০৯|

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वातघ्नमधुरैर्योज्या निरूहा वातजे ज्वरे ||३०८|| अवेक्ष्य दोषं प्राणं च यथास्वं चानुवासनाः |३०९|

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Adhikarana 201 (309-311) · Śloka 312

উত্পলাদিকষাযাদ্যা(ঢ্যা)শ্চন্দনোশীরসংযুতাঃ ||৩০৯|| শর্করামধুরাঃ শীতাঃ পিত্তজ্বরহরা মতাঃ | আম্রাদীনাং ত্বচং শঙ্খং চন্দনং মধুকোত্পলে ||৩১০|| গৈরিকাঞ্জনমঞ্জিষ্ঠামৃণালান্যথ পদ্মকম্ | শ্লক্ষ্ণপিষ্টং তু পযসা শর্করামধুসংযুতম্ ||৩১১|| সুপূতং শীতলং বস্তিং দহ্যমানায দাপযেত্ |৩১২|

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उत्पलादिकषायाद्या(ढ्या)श्चन्दनोशीरसंयुताः ||३०९|| शर्करामधुराः शीताः पित्तज्वरहरा मताः | आम्रादीनां त्वचं शङ्खं चन्दनं मधुकोत्पले ||३१०|| गैरिकाञ्जनमञ्जिष्ठामृणालान्यथ पद्मकम् | श्लक्ष्णपिष्टं तु पयसा शर्करामधुसंयुतम् ||३११|| सुपूतं शीतलं बस्तिं दह्यमानाय दापयेत् |३१२|

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Adhikarana 202 (312) · Śloka 312

জ্বরদাহাপহং তেষু সিদ্ধং চৈবানুবাসনম্ ||৩১২||

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ज्वरदाहापहं तेषु सिद्धं चैवानुवासनम् ||३१२||

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Adhikarana 203 (313) · Śloka 313

আরগ্বধগণক্বাথাঃ পিপ্পল্যাদিসমাযুতাঃ | সক্ষৌদ্রমূত্রা দেযাঃ স্যুঃ কফজ্বরবিনাশনাঃ ||৩১৩||

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आरग्वधगणक्वाथाः पिप्पल्यादिसमायुताः | सक्षौद्रमूत्रा देयाः स्युः कफज्वरविनाशनाः ||३१३||

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Adhikarana 204 (314) · Śloka 314

কফঘ্নৈরেব সংসিদ্ধা দ্রব্যৈশ্চাপ্যনুবাসনাঃ |৩১৪|

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कफघ्नैरेव संसिद्धा द्रव्यैश्चाप्यनुवासनाः |३१४|

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Adhikarana 205 (314) · Śloka 314

সংসর্গে সন্নিপাতে চ সংসৃষ্টা বস্তযো হিতাঃ ||৩১৪||

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संसर्गे सन्निपाते च संसृष्टा बस्तयो हिताः ||३१४||

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Adhikarana 206 (315) · Śloka 315

সংসৃষ্টৈরেব সংসৃষ্টা দ্রব্যৈশ্চাপ্যনুবাসনাঃ |৩১৫|

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संसृष्टैरेव संसृष्टा द्रव्यैश्चाप्यनुवासनाः |३१५|

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Adhikarana 207 (315) · Śloka 316

বাতরোগাপহাঃ সর্বে স্নেহা যে সম্যগীরিতাঃ ||৩১৫|| বিনা তৈলং ত এব স্যুর্যোজ্যা মারুতজে জ্বরে |৩১৬|

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वातरोगापहाः सर्वे स्नेहा ये सम्यगीरिताः ||३१५|| विना तैलं त एव स्युर्योज्या मारुतजे ज्वरे |३१६|

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Adhikarana 208 (316) · Śloka 316

নিখিলেনোপযোজ্যাশ্চ ত এবাভ্যঞ্জনাদিষু ||৩১৬||

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निखिलेनोपयोज्याश्च त एवाभ्यञ्जनादिषु ||३१६||

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Adhikarana 209 (317) · Śloka 317

পৈত্তিকে মধুরৈস্তিক্তৈঃ সিদ্ধং সর্পিশ্চ পূজ্যতে |৩১৭|

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पैत्तिके मधुरैस्तिक्तैः सिद्धं सर्पिश्च पूज्यते |३१७|

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Adhikarana 210 (317) · Śloka 317

শ্লৈষ্মিকে কটুতিক্তৈশ্চ, সংসৃষ্টানীতরেষু চ ||৩১৭||

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श्लैष्मिके कटुतिक्तैश्च, संसृष्टानीतरेषु च ||३१७||

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Adhikarana 211 (318) · Śloka 319

হৃতাবশেষং পিত্তং তু ত্বক্স্থং জনযতি জ্বরম্ | পিবেদিক্ষুরসং তত্র শীতং বা শর্করোদকম্ ||৩১৮|| শালিষষ্টিকযোরন্নমশ্নীযাত্ ক্ষীরসম্প্লুতম্ |৩১৯|

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हृतावशेषं पित्तं तु त्वक्स्थं जनयति ज्वरम् | पिबेदिक्षुरसं तत्र शीतं वा शर्करोदकम् ||३१८|| शालिषष्टिकयोरन्नमश्नीयात् क्षीरसम्प्लुतम् |३१९|

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Adhikarana 212 (319) · Śloka 319

কফবাতোত্থযোরেব স্বেদাভ্যঙ্গৌ প্রযোজযেত্ ||৩১৯||

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कफवातोत्थयोरेव स्वेदाभ्यङ्गौ प्रयोजयेत् ||३१९||

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Adhikarana 213 (320) · Śloka 320

ঘৃতং দ্বাদশরাত্রাত্তু দেযং সর্বজ্বরেষু চ | তেনান্তরেণাশযং স্বং গতা দোষা ভবন্তি হি ||৩২০||

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घृतं द्वादशरात्रात्तु देयं सर्वज्वरेषु च | तेनान्तरेणाशयं स्वं गता दोषा भवन्ति हि ||३२०||

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Adhikarana 214 (321) · Śloka 321

ধাতূন্ প্রক্ষোভযন্ দোষো মোক্ষকালে বলীযতে | তেন ব্যাকুলচিত্তস্তু ম্রিযমাণ ইবেহতে ||৩২১||

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धातून् प्रक्षोभयन् दोषो मोक्षकाले बलीयते | तेन व्याकुलचित्तस्तु म्रियमाण इवेहते ||३२१||

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Adhikarana 215 (322) · Śloka 322

লঘুত্বং শিরসঃ স্বেদো মুখমাপাণ্ডু পাকি চ | ক্ষবথুশ্চান্নকাঙ্ক্ষা চ জ্বরমুক্তস্য লক্ষণম্ ||৩২২||

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लघुत्वं शिरसः स्वेदो मुखमापाण्डु पाकि च | क्षवथुश्चान्नकाङ्क्षा च ज्वरमुक्तस्य लक्षणम् ||३२२||

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Adhikarana 216 (323-324) · Śloka 324

শম্ভুক্রোধোদ্ভবো ঘোরো বলবর্ণাগ্নিসাদকঃ | রোগরাট্ রোঘসঙ্ঘাতো জ্বর ইত্যুপদিশ্যতে ||৩২৩|| ব্যাপিত্বাত্ সর্বসংস্পর্শাত্ কৃচ্ছ্রত্বাদন্তসম্ভবাত্ | অন্তকো হ্যেষ ভূতানাং জ্বর ইত্যুপদিশ্যতে ||৩২৪||

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शम्भुक्रोधोद्भवो घोरो बलवर्णाग्निसादकः | रोगराट् रोघसङ्घातो ज्वर इत्युपदिश्यते ||३२३|| व्यापित्वात् सर्वसंस्पर्शात् कृच्छ्रत्वादन्तसम्भवात् | अन्तको ह्येष भूतानां ज्वर इत्युपदिश्यते ||३२४||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 39

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে জ্বরপ্রতিষেধো নাম(প্রথমোঽধ্যাযঃ, আদিত) একোনচত্বারিংশোঽধ্যাযঃ ||৩৯||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे ज्वरप्रतिषेधो नाम(प्रथमोऽध्यायः, आदित) एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ||३९||

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