Adhikarana athodaracikitsitannAma saptadasho~adhyAyaH adhyAyapratij~jA (1) · Śloka 1
অথাত উদরিচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ|
ইতি হ স্মাহুরাত্রৈযাদযো মহর্ষযঃ||১||
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अथात उदरिचिकित्सितं व्याख़्यास्यामः|
इति ह स्माहुरात्रैयादयो महर्षयः||१||
Adhikarana sarvodareShu virecanantatra hetushca (2) · Śloka 2
সর্বমেবোদরমতিমাত্রদোষসঞ্চযানুবন্ধেন স্রোতোমুখনি রোধাদ্ব্যাকুলানিলতযা যত্প্রজাযতে তস্মাদভীক্ষ্ণমুদরী বিরেচনান্যুপযুঞ্জীত|
মূত্রক্ষীরান্যতরযুক্তমেরণ্ডতৈলমহ রহর্মাসমেকং দ্বৌ বা|
ক্ষীরহারো বা গব্যং বা মাহিষং বা মূত্রম্|
উষ্ট্রীক্ষীরবৃত্তির্বা স্যাত্||২||
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सर्वमेवोदरमतिमात्रदोषसञ्चयानुबन्धेन स्रोतोमुख़नि रोधाद्व्याकुलानिलतया यत्प्रजायते तस्मादभीक्ष्णमुदरी विरेचनान्युपयुञ्जीत|
मूत्रक्षीरान्यतरयुक्तमेरण्डतैलमह रहर्मासमेकं द्वौ वा|
क्षीरहारो वा गव्यं वा माहिषं वा मूत्रम्|
उष्ट्रीक्षीरवृत्तिर्वा स्यात्||२||
Adhikarana shoPashUlAdisahite visheShaH (3) · Śloka 3
শোফশূলানাহতৃণ্মূর্ছাপরীতো বিশেষেণ পযোঽনুপানং গো মূত্রেণ প্রাণদাং পিবেত্|
পিপ্পলীসহস্রং ব স্নুহীক্ষীরভাবিতং সেবেত|
তদ্ভাবিতেন বা কৃষ্ণাভযাচূর্ণেন কাসরম্|
সৈন্ধবাজমোদযুক্তং বা নৈম্বং তৈলম্|
অথবাঽঽর্দ্রক রসানুবিদ্ধং সিদ্ধং বা||৩||
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शोफशूलानाहतृण्मूर्छापरीतो विशेषेण पयोऽनुपानं गो मूत्रेण प्राणदां पिबेत्|
पिप्पलीसहस्रं व स्नुहीक्षीरभावितं सेवेत|
तद्भावितेन वा कृष्णाभयाचूर्णेन कासरम्|
सैन्धवाजमोदयुक्तं वा नैम्बं तैलम्|
अथवाऽऽर्द्रक रसानुविद्धं सिद्धं वा||३||
Adhikarana harItakIGRutam (4) · Śloka 4
হরীতকীচূর্ণপ্রস্থযুক্তমাঢকং ঘৃতস্যাঙ্গারেষ্বভিবিলাপ্য খজেনাভিমথ্য সুগুপ্তং যবপল্লে মাসং স্থাপযেত্|
তত শ্চোদ্ধৃত্য পরিস্রাব্য হরীতকীক্বাথাম্লবদধিপ্রতীবাপং বিপাচযেত্||৪||
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हरीतकीचूर्णप्रस्थयुक्तमाढकं ग़ृतस्याङ्गारेष्वभिविलाप्य ख़जेनाभिमथ्य सुगुप्तं यवपल्ले मासं स्थापयेत्|
तत श्चोद्धृत्य परिस्राव्य हरीतकीक्वाथाम्लवदधिप्रतीवापं विपाचयेत्||४||
Adhikarana sudhAkShIraGRutam (5) · Śloka 5
অথবা গব্যে পযসি মহাবৃক্ষক্ষীরমাবাপ্য বিপাচ্য শীতী ভূতমভিমথ্য তন্নবনীতং মহাবৃক্ষক্ষীরেণৈব সহ সাধ যেত্||৫||
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अथवा गव्ये पयसि महावृक्षक्षीरमावाप्य विपाच्य शीती भूतमभिमथ्य तन्नवनीतं महावृक्षक्षीरेणैव सह साध येत्||५||
Adhikarana cavikAdiGRutam (6) · Śloka 6
অথবা চবিকাচিত্রকদন্ত্যতিবিষাকুষ্ঠসারিবাবিডঙ্গ- ত্রিফলাকটুরোহিণীদ্বিহরিদ্রাশঙ্খিনীত্রিবৃদ্দীপ্যকানর্ধকার্ষি- কান্ রাজবৃক্ষফলমজ্জাদ্বিপলং মহাবৃক্ষক্ষীরদ্বিপলং গোমূত্র- ক্ষীরঘৃতত্রিকুডবং চৈকধ্যং পাচযেত্|
এতানি তিল্বক- চতুর্থানি সর্পীষি পীতান্যুদরগুল্মবিদ্রধ্যষ্ঠীলানাহকু- ষ্ঠোন্মাদাপস্মারান্নিঘ্নন্তি||৬||
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अथवा चविकाचित्रकदन्त्यतिविषाकुष्ठसारिवाविडङ्ग- त्रिफलाकटुरोहिणीद्विहरिद्राशङ्ख़िनीत्रिवृद्दीप्यकानर्धकार्षि- कान् राजवृक्षफलमज्जाद्विपलं महावृक्षक्षीरद्विपलं गोमूत्र- क्षीरग़ृतत्रिकुडवं चैकध्यं पाचयेत्|
एतानि तिल्वक- चतुर्थानि सर्पीषि पीतान्युदरगुल्मविद्रध्यष्ठीलानाहकु- ष्ठोन्मादापस्मारान्निग़्नन्ति||६||
Adhikarana dashamUlaShaTpalaM GRutam (7) · Śloka 7
যাবশূকপঞ্চকোলষট্পলেন বা মস্তুদশমূলক্বাথা ঢকদ্বযেন চ সিদ্ধণ্ সর্পিঃপ্রস্থং প্রযোজযেত্||৭||
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यावशूकपञ्चकोलषट्पलेन वा मस्तुदशमूलक्वाथा ढकद्वयेन च सिद्धण् सर्पिःप्रस्थं प्रयोजयेत्||७||
Adhikarana yavakolAdiGRutam (8) · Śloka 8
যবকোলকুলত্থপঞ্চমূলকষাযেণ বা সুরাসৌবীরক যুক্তং সর্পিঃ||৮||
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यवकोलकुलत्थपञ्चमूलकषायेण वा सुरासौवीरक युक्तं सर्पिः||८||
Adhikarana snehottaraM virecanam (9) · Śloka 9
সর্পিষ্পানস্রস্তে চ দোষে বলবান্ বিরেচনার্থং মূত্রাসবা রিষ্টসুরাঃ স্নুহীক্ষীরযুক্তাঃ শীলযেত্|
বিরেচনদ্রব্য কষাযং নাগরদেবদারুপ্রগাঢম্|
ত্রিলবণাদিচূর্ণং বা দ্বিত্রি গুণানুলোমনদ্রব্যম্||৯||
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सर्पिष्पानस्रस्ते च दोषे बलवान् विरेचनार्थं मूत्रासवा रिष्टसुराः स्नुहीक्षीरयुक्ताः शीलयेत्|
विरेचनद्रव्य कषायं नागरदेवदारुप्रगाढम्|
त्रिलवणादिचूर्णं वा द्वित्रि गुणानुलोमनद्रव्यम्||९||
Adhikarana paTolamUlAdiprayogaH (10) · Śloka 10
পটোলমূলরজনীবিডঙ্গত্রিফলাঃ কর্ষাংশাঃ|
কম্পিল্ল কনীলিনীফলত্রিবৃত্তানাং ক্রমাদ্ দ্বিত্রিচতুর্ভিঃ কর্ষৈর্যুক্তা শ্চূর্ণযিত্বা মূত্রেণ পিবেত্|
জীর্ণে চ পেযামণ্ডপো রসাশী বা স্যাত্|
ততঃ ষড্রাত্রং সব্যোষেণ পযসাশ্নীযাত্|
ততঃ সপ্তমেঽহনি পুনশ্চূর্ণং পিবেত্|
অনেন বিধিনা চূর্ণ মিদমুদরাণি জাতোদকান্যপি নিবর্হযতি|
গুল্মভেদনানি চ প্রযুঞ্জীত||১০||
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पटोलमूलरजनीविडङ्गत्रिफलाः कर्षांशाः|
कम्पिल्ल कनीलिनीफलत्रिवृत्तानां क्रमाद् द्वित्रिचतुर्भिः कर्षैर्युक्ता श्चूर्णयित्वा मूत्रेण पिबेत्|
जीर्णे च पेयामण्डपो रसाशी वा स्यात्|
ततः षड्रात्रं सव्योषेण पयसाश्नीयात्|
ततः सप्तमेऽहनि पुनश्चूर्णं पिबेत्|
अनेन विधिना चूर्ण मिदमुदराणि जातोदकान्यपि निबर्हयति|
गुल्मभेदनानि च प्रयुञ्जीत||१०||
Adhikarana mUtravarttiH (11) · Śloka 11
বমনবিরেচনশিরোবিরেচনবত্সকাদিবচাহরিদ্রাদিবর্গদ্রব্যা ণি পৃথক্পালিকানি সূক্ষ্মকল্কীকৃতানি লবণানি চ বজ্রবৃক্ষক্ষীরপ্রস্থং চ প্রক্ষিপ্য মূত্রগণে মৃদ্বগ্নিনা ঘট্টযন্ পাচযেত্|
অবিদগ্ধকল্কং চ তত্সিদ্ধমবতার্য শীতী ভূতমঙ্গুষ্ঠমাত্রা গুলিকা বর্তযিত্বা যথা বলং ত্রিচতুরো মাসানুপযোজযেত্|
এষা মূত্রবর্তির্মহারোগশ্বাসকাসপী নসপ্রসেকশ্বযথুগুল্মপাণ্ডুকৃমিকোষ্ঠারোচকাবিপাকো দাবর্তেষু পরমমগদম্||১১||
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वमनविरेचनशिरोविरेचनवत्सकादिवचाहरिद्रादिवर्गद्रव्या णि पृथक्पालिकानि सूक्ष्मकल्कीकृतानि लवणानि च वज्रवृक्षक्षीरप्रस्थं च प्रक्षिप्य मूत्रगणे मृद्वग्निना ग़ट्टयन् पाचयेत्|
अविदग्धकल्कं च तत्सिद्धमवतार्य शीती भूतमङ्गुष्ठमात्रा गुलिका वर्तयित्वा यथा बलं त्रिचतुरो मासानुपयोजयेत्|
एषा मूत्रवर्तिर्महारोगश्वासकासपी नसप्रसेकश्वयथुगुल्मपाण्डुकृमिकोष्ठारोचकाविपाको दावर्तेषु परममगदम्||११||
Adhikarana virecanottarA upacArAH (12) · Śloka 12
কৃতবিরেচনশ্চ ক্ষামদেহোঽন্তরান্তরা ক্ষীরমৌষ্ট্রকং গব্যমাজং বা ব্যোষযুক্তং শীলযেত্|
দোষশেষবিজযায চ শীল যেচ্চবিকানাগরং ক্ষীরেণ পিষ্টম্|
সুরদারুচিত্রকং বা সুরুঙ্গাং বা পুনর্নবং বা ত্রিফলাদন্তীরৌহীতকনির্যূহং বা ব্যোষক্ষারোপেতং তত্ স্নুহীক্ষীরঘৃতযুক্তম্||১২||
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कृतविरेचनश्च क्षामदेहोऽन्तरान्तरा क्षीरमौष्ट्रकं गव्यमाजं वा व्योषयुक्तं शीलयेत्|
दोषशेषविजयाय च शील येच्चविकानागरं क्षीरेण पिष्टम्|
सुरदारुचित्रकं वा सुरुङ्गां वा पुनर्नवं वा त्रिफलादन्तीरौहीतकनिर्यूहं वा व्योषक्षारोपेतं तत् स्नुहीक्षीरग़ृतयुक्तम्||१२||
Adhikarana purANAnnAdisevanam (13) · Śloka 13
পুরাণমন্নং তক্রমরিষ্টাংশ্চ তাংস্তান্ ক্ষীরঞ্চ দন্তীচিত্রকবি ডঙ্গচবিকাত্রিকটুকোপেতম্|
তুল্যার্দ্রকরসং বা ক্ষীরং শীলযেত্|
পিপ্পলীবর্ধমানং বা সেবেত|
শিলাজতুং বা ক্ষীরাশীং গুগ্গুলুং বা|
পুনঃ পুনশ্চ স্নেহযেদ্বিরেচযেচ্চ|
আত্যযিকাংস্তু স্নেহবিরেকৈরেবোপক্রমেত|
সলিলং তু বর্জ যেত্|
আনাহোদাবর্তযোর্যথাস্বং প্রতিকুর্বীত||১৩||
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पुराणमन्नं तक्रमरिष्टांश्च तांस्तान् क्षीरञ्च दन्तीचित्रकवि डङ्गचविकात्रिकटुकोपेतम्|
तुल्यार्द्रकरसं वा क्षीरं शीलयेत्|
पिप्पलीवर्धमानं वा सेवेत|
शिलाजतुं वा क्षीराशीं गुग्गुलुं वा|
पुनः पुनश्च स्नेहयेद्विरेचयेच्च|
आत्ययिकांस्तु स्नेहविरेकैरेवोपक्रमेत|
सलिलं तु वर्ज येत्|
आनाहोदावर्तयोर्यथास्वं प्रतिकुर्वीत||१३||
Adhikarana vAtaje visheShaH (14) · Śloka 14
বাতকৃতেষু পার্শ্বশূলোপস্তম্ভহৃদ্গ্রহেষু বিল্বক্ষারাম্ভসা তৈলং পাচযেত্|
স্যোনাকাগ্নিমন্থতিলকুতলকদল্যপা মার্গাগ্ন্যতমক্ষারেণ বা বিপক্বং তৈলম্||১৪||
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वातकृतेषु पार्श्वशूलोपस्तम्भहृद्ग्रहेषु बिल्वक्षाराम्भसा तैलं पाचयेत्|
स्योनाकाग्निमन्थतिलकुतलकदल्यपा मार्गाग्न्यतमक्षारेण वा विपक्वं तैलम्||१४||
Adhikarana AvaraNe visheShaH (16) · Śloka 15
কফে পিত্তে বা বাতেনাবৃতে তাভ্যাং বা বাতে বলবান্ বাতগুল্মোক্তক্রমেণৈরণ্ডতৈলং পিবেত্||১৫||
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कफे पित्ते वा वातेनावृते ताभ्यां वा वाते बलवान् वातगुल्मोक्तक्रमेणैरण्डतैलं पिबेत्||१५||
Adhikarana lepasekau (17) · Śloka 17
লিম্পেচ্চ জঠরমুদরিণাং শিগ্রুপলাশার্কাশ্বকর্ণগজ পিপ্লীদেবদারুভির্মূত্রপিষ্টৈঃ সুখোষ্ণৈঃ|
বৃশ্চিকালীকুষ্ঠ ষড্গ্রন্থাদ্বিপুনর্নবধান্যনাগরপঞ্চমূলক্বাথৈর্মূত্রৈশ্চ পরিষেচ যেত্|
প্রততমেব চ স্বেদযেত্||১৭||
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लिम्पेच्च जठरमुदरिणां शिग्रुपलाशार्काश्वकर्णगज पिप्लीदेवदारुभिर्मूत्रपिष्टैः सुख़ोष्णैः|
वृश्चिकालीकुष्ठ षड्ग्रन्थाद्विपुनर्नवधान्यनागरपञ्चमूलक्वाथैर्मूत्रैश्च परिषेच येत्|
प्रततमेव च स्वेदयेत्||१७||
Adhikarana AdhmAnAdrakShaNam (18) · Śloka 18
বিরিক্তস্য চাস্য সদাম্লানমুদরং সাল্বলাদিভিরুপনদ্ধং ঘনেন বাসসা বেষ্টযেত্|
এবমেনমনবকাশো বাযুর্ন পুন রাধ্মাপযতি|
তথাপি পুনঃ সবিরিত্কস্যাধ্মানেঽম্ল লবণান্ সুস্নিগ্ধান্ নিরূহান্ দদ্যাত্|
সোপস্তম্ভে তু বাযৌ তীক্ষ্ণোষ্ণান্||১৮||
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विरिक्तस्य चास्य सदाम्लानमुदरं साल्वलादिभिरुपनद्धं ग़नेन वाससा वेष्टयेत्|
एवमेनमनवकाशो वायुर्न पुन राध्मापयति|
तथापि पुनः सविरित्कस्याध्मानेऽम्ल लवणान् सुस्निग्धान् निरूहान् दद्यात्|
सोपस्तम्भे तु वायौ तीक्ष्णोष्णान्||१८||
Adhikarana vAtodare cikitsA (19) · Śloka 19
অথ বাতোদরিণং বিদার্যাদিসিদ্ধেন সর্পিষোপস্নেহ্য স্বেদি তাঙ্গতিল্বকঘৃতেন বহুশোঽনুলোমযেত্|
কৃতাযাং চ সংসর্গ্যাং বলার্থং ক্ষীরমবচারযেত্|
নিবর্তযেচ্চ প্রাগুত্ক্লেশাত্ ক্রমেণ|
ততো যূষরসাদিভির্মন্দাম্ললবণৈঃ সমিদ্ধানল-মুদাবর্তিনং পুনঃ স্নিগ্ধস্বিন্নমাস্থাপযেদ্বিদার্যাদিক্বাথেন চিত্রাফলতৈলপ্রগাঢেন|
তীক্ষ্ণোষ্ণাধো ভাগিকদ্রব্যযুক্তেন বা দাশমূলিকেন|
দীপ্তাগ্নিং চ বদ্ধমলমস্থিসন্ধিত্রিকপার্শ্বাদিশূলস্ফুর- ণাক্ষেপযুক্তং রূক্ষমনুবাসযেদ্বাতহরাম্লসিদ্ধাভ্যাং তিলো- রুবূকতৈলাভ্যাং|
ভোজযেচ্চৈনং জাঙ্গলরসেন বিদার্যাদি- শৃতেন বা পযসা|
সরলমধুশিগ্রুমূলকবীজস্নেহাশ্চ পানাভ্যঞ্জনেন শূল- ঘ্নাঃ|
স্বেদযেচ্চাভীক্ষ্ণং জঠরম্|
অবিরেচ্যস্য তু পযঃ সর্পির্যূষরসবস্ত্যভ্যঙ্গসমভক্তৌ- ষধৈঃ সংশমযেত্||১৯||
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अथ वातोदरिणं विदार्यादिसिद्धेन सर्पिषोपस्नेह्य स्वेदि ताङ्गतिल्वकग़ृतेन बहुशोऽनुलोमयेत्|
कृतायां च संसर्ग्यां बलार्थं क्षीरमवचारयेत्|
निवर्तयेच्च प्रागुत्क्लेशात् क्रमेण|
ततो यूषरसादिभिर्मन्दाम्ललवणैः समिद्धानल-मुदावर्तिनं पुनः स्निग्धस्विन्नमास्थापयेद्विदार्यादिक्वाथेन चित्राफलतैलप्रगाढेन|
तीक्ष्णोष्णाधो भागिकद्रव्ययुक्तेन वा दाशमूलिकेन|
दीप्ताग्निं च बद्धमलमस्थिसन्धित्रिकपार्श्वादिशूलस्फुर- णाक्षेपयुक्तं रूक्षमनुवासयेद्वातहराम्लसिद्धाभ्यां तिलो- रुबूकतैलाभ्यां|
भोजयेच्चैनं जाङ्गलरसेन विदार्यादि- शृतेन वा पयसा|
सरलमधुशिग्रुमूलकबीजस्नेहाश्च पानाभ्यञ्जनेन शूल- ग़्नाः|
स्वेदयेच्चाभीक्ष्णं जठरम्|
अविरेच्यस्य तु पयः सर्पिर्यूषरसबस्त्यभ्यङ्गसमभक्तौ- षधैः संशमयेत्||१९||
Adhikarana pittodare cikitsA (20) · Śloka 20
পিত্তোদরিণং মধুরবিপক্বেন সর্পিষোপস্নেহ্য শ্যামা ত্রিবৃত্ত্রিফলাবিপক্বেনানুলোম্যেন মধুঘৃতসিতাঢ্যেন ন্যগ্রো ধাদিনির্যূহেণাস্থাপযেদনুবাসযেচ্চ|
দুর্বলং তু প্রাগেবানুবাস্য ক্ষীরবস্তিভিঃ শোধযেত্|
সঞ্জা তবলাগ্নিং চ স্নিগ্ধং পুনঃ ক্ষীরেণ সত্রিবৃত্কল্কেনোরুপূগ শৃতেন বা|
সাতলাত্রাযমাণাভ্যাং বাঽঽরগ্বধেন বা|
সশ্লেষ্মণি পিত্তে সমূত্রেণ|
সবাতে তিক্তঘৃতান্বিতেন পযসা পুনঃ পুনর্বিরেচযেত্|
বস্তিকর্ম চাচরেত্|
এভিরেব ক্ষীরৈর্বিদার্যাদিশৃতেন বা ভোজযেত্|
পাযসেন চোপনাহযেদুদরম্||২০||
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पित्तोदरिणं मधुरविपक्वेन सर्पिषोपस्नेह्य श्यामा त्रिवृत्त्रिफलाविपक्वेनानुलोम्येन मधुग़ृतसिताढ्येन न्यग्रो धादिनिर्यूहेणास्थापयेदनुवासयेच्च|
दुर्बलं तु प्रागेवानुवास्य क्षीरबस्तिभिः शोधयेत्|
सञ्जा तबलाग्निं च स्निग्धं पुनः क्षीरेण सत्रिवृत्कल्केनोरुपूग शृतेन वा|
सातलात्रायमाणाभ्यां वाऽऽरग्वधेन वा|
सश्लेष्मणि पित्ते समूत्रेण|
सवाते तिक्तग़ृतान्वितेन पयसा पुनः पुनर्विरेचयेत्|
बस्तिकर्म चाचरेत्|
एभिरेव क्षीरैर्विदार्यादिशृतेन वा भोजयेत्|
पायसेन चोपनाहयेदुदरम्||२०||
Adhikarana shleShmodare cikitsA (21) · Śloka 21
শ্লেষ্মোদরিণং বত্সকাদিসিদ্ধেন সর্পিষোপস্নেহ্য স্নুহীক্ষীর বিপক্বেনানুলোম্য কটুক্ষারযুক্তৈঃ কফহরৈরাহারৈঃ সংসর্জ্য ত্রিকটুমূত্রতৈলপ্রগাঢেন মুষ্ককাদিক্বাথেনাস্থাপযেদনুবা সযেচ্চ|
কুলত্থযূষেণ ব্যোষবতা ক্ষীরেণ বা ভোজযেত্|
স্ত্যানকফোদরং ক্ষারমরিষ্টাংশ্চ তীক্ষ্ণান্ পাযযেত্|
সততং চ স্বেদযেত্|
কিণ্বসর্ষপমূলবীজকল্কৈর্জঠরমুপনাহ যেত্||২১||
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श्लेष्मोदरिणं वत्सकादिसिद्धेन सर्पिषोपस्नेह्य स्नुहीक्षीर विपक्वेनानुलोम्य कटुक्षारयुक्तैः कफहरैराहारैः संसर्ज्य त्रिकटुमूत्रतैलप्रगाढेन मुष्ककादिक्वाथेनास्थापयेदनुवा सयेच्च|
कुलत्थयूषेण व्योषवता क्षीरेण वा भोजयेत्|
स्त्यानकफोदरं क्षारमरिष्टांश्च तीक्ष्णान् पाययेत्|
सततं च स्वेदयेत्|
किण्वसर्षपमूलबीजकल्कैर्जठरमुपनाह येत्||२१||
Adhikarana sannipAtodare cikitsA (22) · Śloka 22
সান্নিপাতিকমুদরং প্রত্যাখ্যায চিকিত্সেত্|
সর্বমে-বেত্যেকে সর্বস্য সর্বাত্মকত্বাত্ কৃচ্ছ্রতমত্বাচ্চ|
দোষো-দ্রেকতস্তু প্রতিকুর্বীত|
সপ্তলাশঙ্খিনীনির্যাসসিদ্ধেন চ সর্পিষা বিরেচযেন্মা সমর্ধমাসং বা|
মহাবৃক্ষক্ষীরমূত্রসিদ্ধেন বা|
অথবাজগন্ধাজশৃঙ্গীদন্তীদ্রবন্তীস্বাদুকণ্টকপুনর্নবাজর সীবৃশ্চিকালীমূষিকপর্ণীমহাসহাক্ষুদ্রসহাবৃক্ষাদিনী ভার্ঙ্গীকুষ্ঠকুটিলরাস্নাকল্কগোমূত্রসংসৃষ্টেন সৈন্ধবলব ণিতেন স্নিগ্ধেনাস্থাপযেত্||২২||
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सान्निपातिकमुदरं प्रत्याख़्याय चिकित्सेत्|
सर्वमे-वेत्येके सर्वस्य सर्वात्मकत्वात् कृच्छ्रतमत्वाच्च|
दोषो-द्रेकतस्तु प्रतिकुर्वीत|
सप्तलाशङ्ख़िनीनिर्याससिद्धेन च सर्पिषा विरेचयेन्मा समर्धमासं वा|
महावृक्षक्षीरमूत्रसिद्धेन वा|
अथवाजगन्धाजशृङ्गीदन्तीद्रवन्तीस्वादुकण्टकपुनर्नवाज़र सीवृश्चिकालीमूषिकपर्णीमहासहाक्षुद्रसहावृक्षादिनी भार्ङ्गीकुष्ठकुटिलरास्नाकल्कगोमूत्रसंसृष्टेन सैन्धवलव णितेन स्निग्धेनास्थापयेत्||२२||
Adhikarana anupashAntau viShaprayogaH (23) · Śloka 23
তথা চানুপশাম্যতি নিচযাত্মকে সর্বত্র চ জঠরে জ্ঞাতীনা শ্রাব্য মদ্যেনাশ্বমারকগুঞ্জাকাকাদনীমূলকল্কং পায যেত্|
পানভোজনেষু বা বিষং নিক্ষিপেত্|
ইক্ষুগণ্ডিকাং বা ভক্ষযেত্ কৃষ্ণসর্পেণ দংশযিত্বা বল্লীফলানি বা মূলকং বা|
এবং হ্যস্য দোষসঙ্ঘাতঃ স্থিরো লীন উন্মার্গগো বিষে ণাশু প্রমাথিনা বিভিন্নো বহিঃ প্রবর্ততে|
তেনাগদতাং ব্রজতি|
ভবান্তরং বা|
হৃতদোষং চ শীতাম্বুপরিষিক্তং ক্ষীরযবাগূং পাযযেত্|
ততস্ত্রিবৃদ্বাস্তুকমণ্ডূকপর্ণীকালশাকযবশাকানামন্যতমং স্বরসসাধিতমনম্ললবণস্নেহং স্বিন্নাস্বিন্নমনন্নভুঙ্ মাসমেকমশ্নীযাত্|
তত্স্বরসমেব চ তৃষিতঃ পিবেত্|
ততঃ শাকৈর্নিহৃতে দোষে পরতো দুর্বলায কারভং ক্ষীরং প্রযু ঞ্জীত||২৩||
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तथा चानुपशाम्यति निचयात्मके सर्वत्र च जठरे ज्ञातीना श्राव्य मद्येनाश्वमारकगुञ्जाकाकादनीमूलकल्कं पाय येत्|
पानभोजनेषु वा विषं निक्षिपेत्|
इक्षुगण्डिकां वा भक्षयेत् कृष्णसर्पेण दंशयित्वा वल्लीफलानि वा मूलकं वा|
एवं ह्यस्य दोषसङ्ग़ातः स्थिरो लीन उन्मार्गगो विषे णाशु प्रमाथिना विभिन्नो बहिः प्रवर्तते|
तेनागदतां व्रजति|
भवान्तरं वा|
हृतदोषं च शीताम्बुपरिषिक्तं क्षीरयवागूं पाययेत्|
ततस्त्रिवृद्वास्तुकमण्डूकपर्णीकालशाकयवशाकानामन्यतमं स्वरससाधितमनम्ललवणस्नेहं स्विन्नास्विन्नमनन्नभुङ् मासमेकमश्नीयात्|
तत्स्वरसमेव च तृषितः पिबेत्|
ततः शाकैर्निहृते दोषे परतो दुर्बलाय कारभं क्षीरं प्रयु ञ्जीत||२३||
Adhikarana plIhodare cikitsA (24) · Śloka 24
প্লীহোদরে যথাদোষমুপস্নিগ্ধস্বিন্নস্য দধ্না ভুক্তবতো বামবাহৌ সিরাং বিধ্যেত্|
রুধিরস্যন্দনার্থঞ্চ পাণিনা প্লী হানং বিমর্দযেত্|
পুনশ্চ স্নেহপীতং বিশুদ্ধদেহং সমুদ্রশুক্তি ক্ষারং পযসা পাযযেত্ হিঙ্গুং সুবর্চিকাং বা|
পলাশক্ষা রোদকেন বা যবক্ষারম্|
পারিজাতকেক্ষ্বাক্বপামার্গক্ষারং বা তৈলসংসৃষ্টম্|
সৌভাঞ্জনকনির্যূহং বা পিপ্পলীচিত্রকসৈন্ধবচূর্ণযুক্তম্|
অম্ল স্রুতং বা বিডমাগধিকাঢ্যং পূতিকরঞ্জক্ষারম্|
অগ্নিসাদে তু ত্রিলবণাদিং ক্ষারানরিষ্টাংশ্চ পিবেত্|
ঘৃতং ষট্পলং মহা ষট্পলং রোহীতকষট্পলং বা||২৪||
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प्लीहोदरे यथादोषमुपस्निग्धस्विन्नस्य दध्ना भुक्तवतो वामबाहौ सिरां विध्येत्|
रुधिरस्यन्दनार्थञ्च पाणिना प्ली हानं विमर्दयेत्|
पुनश्च स्नेहपीतं विशुद्धदेहं समुद्रशुक्ति क्षारं पयसा पाययेत् हिङ्गुं सुवर्चिकां वा|
पलाशक्षा रोदकेन वा यवक्षारम्|
पारिजातकेक्ष्वाक्वपामार्गक्षारं वा तैलसंसृष्टम्|
सौभाञ्जनकनिर्यूहं वा पिप्पलीचित्रकसैन्धवचूर्णयुक्तम्|
अम्ल स्रुतं वा बिडमागधिकाढ्यं पूतिकरञ्जक्षारम्|
अग्निसादे तु त्रिलवणादिं क्षारानरिष्टांश्च पिबेत्|
ग़ृतं षट्पलं महा षट्पलं रोहीतकषट्पलं वा||२४||
Adhikarana rohItakaShaTpalaM GRutam (25) · Śloka 25
রোহীতকত্বক্পলানি পঞ্চবিংশতিং কোলপ্রস্থদ্বযং চ তোযে ক্বাথযেত্|
তেন ক্বাথেন তথা পালিকৈঃ পঞ্চকোলকৈস্তৈঃ সর্বৈশ্চ তুল্যযা রোহীতকত্বচা কল্কীকৃতৈর্ঘৃতপ্রস্থং সাধ যেত্|
তত্পরং প্লীহহিতম্||২৫||
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रोहीतकत्वक्पलानि पञ्चविंशतिं कोलप्रस्थद्वयं च तोये क्वाथयेत्|
तेन क्वाथेन तथा पालिकैः पञ्चकोलकैस्तैः सर्वैश्च तुल्यया रोहीतकत्वचा कल्कीकृतैर्ग़ृतप्रस्थं साध येत्|
तत्परं प्लीहहितम्||२५||
Adhikarana rohItakarasaH (26) · Śloka 26
রোহীতকলতাঃ খণ্ডশঃ কল্পিতাঃ হরীতকীশ্চ তোযে গো মূত্রে ব সপ্তরাত্রমনুসুযাত্|
স রসঃ প্লীহগুল্মোদরকৃমি মেহকামিলার্শাংসি সাধযতি||২৬||
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रोहीतकलताः ख़ण्डशः कल्पिताः हरीतकीश्च तोये गो मूत्रे व सप्तरात्रमनुसुयात्|
स रसः प्लीहगुल्मोदरकृमि मेहकामिलार्शांसि साधयति||२६||
Adhikarana agnikarma (27) · Śloka 27
এবমনুপশাম্যত্যপ্রাপ্তপিচ্ছোদকে বাতকফোল্বণে গুল্ম বিধিনাঽগ্নিকর্ম কুর্যাত্||২৭||
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एवमनुपशाम्यत्यप्राप्तपिच्छोदके वातकफोल्बणे गुल्म विधिनाऽग्निकर्म कुर्यात्||२७||
Adhikarana pittolbaNe plIhodare (28) · Śloka 28
পিত্তোল্বণে তু জীবনীযঘৃতক্ষীরবস্তিবিরেচনানি প্রযু ঞ্জীত|
পুনঃ পুনশ্চ রুধিরমবসেচযেত্|
যকৃদাখ্যেঽ প্যযমেব ক্রিযাবিভাগঃ||২৮||
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पित्तोल्बणे तु जीवनीयग़ृतक्षीरबस्तिविरेचनानि प्रयु ञ्जीत|
पुनः पुनश्च रुधिरमवसेचयेत्|
यकृदाख़्येऽ प्ययमेव क्रियाविभागः||२८||
Adhikarana baddhodare karma (29) · Śloka 29
বদ্ধোদরে স্বিন্নায সতৈললবণমূত্রং তীক্ষ্ণং নিরূহমনু বাসনং চ দদ্যাত্|
স্রংসনানি চান্নান্যুদাবর্তহরাণি চ তীক্ষ্ণং চ বিরেচনং যচ্চ কিঞ্চিদ্বাতঘ্নম্||২৯||
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बद्धोदरे स्विन्नाय सतैललवणमूत्रं तीक्ष्णं निरूहमनु वासनं च दद्यात्|
स्रंसनानि चान्नान्युदावर्तहराणि च तीक्ष्णं च विरेचनं यच्च किञ्चिद्वातग़्नम्||२९||
Adhikarana Cidrodare dakodare ca (30) · Śloka 30
ছিদ্রোদরে স্বেদবর্জ্যং কফোদরবদাচরেত্|
দকোদরে তু পূর্ব মুদকদোষহরণার্থং রূক্ষতীক্ষ্ণৌষধান্ সমূত্রান্ নির্যূহ চূর্ণক্ষারান্ কফঘ্নানি দীপনীযানি চান্নপানানি যোজ যেত্||৩০||
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छिद्रोदरे स्वेदवर्ज्यं कफोदरवदाचरेत्|
दकोदरे तु पूर्व मुदकदोषहरणार्थं रूक्षतीक्ष्णौषधान् समूत्रान् निर्यूह चूर्णक्षारान् कफग़्नानि दीपनीयानि चान्नपानानि योज येत्||३०||
Adhikarana baddhodarAdau shastrakarma (31) · Śloka 31
এবমসিদ্ধৌ বদ্ধচ্ছিদ্রদকোদরেষু অশ্মর্যামিব সুহৃদাং প্রকা শ্য শস্ত্রমবচারযেত্|
তত্র বদ্ধচ্ছিদ্রোদরযোঃ স্নিগ্ধ স্বিন্নস্যাধোনাভেশ্চতুরঙ্গুলানি বামতোঽপহাযোদরং পাট যিত্বা চতুরঙ্গুলপ্রমাণমান্ত্রাণি নিষ্কাস্য নিরীক্ষ্য বদ্ধ গুদোদরস্যান্ত্রপ্রতিরোধকরং বালং মলোপলেপমশ্মানং চাপ হরেত্|
পরিস্রাবিণি শল্যমুদ্ধত্যান্ত্রপরিস্রাবং বিশোধ্য তচ্ছিদ্রং মর্কোটকৈর্দংশযেত্|
লগ্নেষু চ শিরস্সু কাযমপন যেত্|
ততো মধুঘৃতাভ্যামভ্যজ্যান্ত্রাণি যথাস্থানং স্থাপ যিত্বা বাহ্যং ব্রণমুদরস্য সীব্যেত্|
যষ্টীমধুকমিশ্রযা চ কৃষ্ণমৃদা ব্রণমভিলিপ্য বধ্নীযাত্|
অথ নিবাতমাগরং প্রবেশ্য ক্ষীরবৃত্তিং স্নেহদ্রোণ্যাং বাসযেত্||৩১||
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एवमसिद्धौ बद्धच्छिद्रदकोदरेषु अश्मर्यामिव सुहृदां प्रका श्य शस्त्रमवचारयेत्|
तत्र बद्धच्छिद्रोदरयोः स्निग्ध स्विन्नस्याधोनाभेश्चतुरङ्गुलानि वामतोऽपहायोदरं पाट यित्वा चतुरङ्गुलप्रमाणमान्त्राणि निष्कास्य निरीक्ष्य बद्ध गुदोदरस्यान्त्रप्रतिरोधकरं बालं मलोपलेपमश्मानं चाप हरेत्|
परिस्राविणि शल्यमुद्धत्यान्त्रपरिस्रावं विशोध्य तच्छिद्रं मर्कोटकैर्दंशयेत्|
लग्नेषु च शिरस्सु कायमपन येत्|
ततो मधुग़ृताभ्यामभ्यज्यान्त्राणि यथास्थानं स्थाप यित्वा बाह्यं व्रणमुदरस्य सीव्येत्|
यष्टीमधुकमिश्रया च कृष्णमृदा व्रणमभिलिप्य बध्नीयात्|
अथ निवातमागरं प्रवेश्य क्षीरवृत्तिं स्नेहद्रोण्यां वासयेत्||३१||
Adhikarana dakodare visheShaH (32) · Śloka 32
দকোদরে সর্বেষু চ জাতোদকেষু জঠরেষু বাতহরতৈলা ভ্যক্তস্যোষ্ণোদকস্বিন্নস্যাপ্তৈঃ পরিগৃহীতস্যাকক্ষ্যাতঃ পটবেষ্টিতোদরস্যাধো নাভের্বামতশ্চতুরঙ্গুলমপহায ব্রীহি মুখেনাঙ্গুষ্ঠোদরমাত্রমবগাঢং বিদ্ধ্বা নাডীম্ নিধায দোষো দকমর্ধমাত্রমবসিঞ্চেত্|
ততো নাডীমুদ্ধৃত্য তৈললবণে নাভ্যজ্য ব্রণং বন্ধনেনোপচরেত্||৩২||
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दकोदरे सर्वेषु च जातोदकेषु जठरेषु वातहरतैला भ्यक्तस्योष्णोदकस्विन्नस्याप्तैः परिगृहीतस्याकक्ष्यातः पटवेष्टितोदरस्याधो नाभेर्वामतश्चतुरङ्गुलमपहाय व्रीहि मुख़ेनाङ्गुष्ठोदरमात्रमवगाढं विद्ध्वा नाडीम् निधाय दोषो दकमर्धमात्रमवसिञ्चेत्|
ततो नाडीमुद्धृत्य तैललवणे नाभ्यज्य व्रणं बन्धनेनोपचरेत्||३२||
Adhikarana ardhamAtrAvasecane hetuH (33) · Śloka 33
সহসা সর্বস্মিন্ বিস্রাবিতে তৃষ্ণাজ্বরোঽঙ্গমর্দোঽতী সারঃ শ্বাসঃ কাসঃ পাদদাহো ব জাযতে|
পূর্যতে চ সুররাম্|
অতস্তৃতীযচতুর্থপঞ্চমষষ্ঠাষ্টমদ্বাদশষোডশ রাত্রাণামন্যতমমন্তরং কৃত্বা দোষোদকমল্পশো বিস্রা বযেত্||৩৩||
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सहसा सर्वस्मिन् विस्राविते तृष्णाज्वरोऽङ्गमर्दोऽती सारः श्वासः कासः पाददाहो व जायते|
पूर्यते च सुरराम्|
अतस्तृतीयचतुर्थपञ्चमषष्ठाष्टमद्वादशषोडश रात्राणामन्यतममन्तरं कृत्वा दोषोदकमल्पशो विस्रा वयेत्||३३||
Adhikarana srAvaNottaraM karma (34) · Śloka 34
নিস্রুতে চ দোষোদকে বিমৃদ্যোদরমাবিককৌশেযচর্মণামন্য তরেণ গাঢতরং বেষ্টযেত্|
তথা নাধ্মাপযতি বাযুঃ|
লঙ্ঘ যিত্বা চ যবাগূমল্পস্নেহলবণাং মাত্রযা পাযযেত্|
ততঃ পরং ষণ্মাসান্ ক্ষীরবৃত্তির্ভবেত্|
ততো মাসত্রযং ক্ষীর পেযাং পিবেত্|
অন্যচ্চ মাসত্রযমল্পলবণমল্পক্ষীরং শ্যা মাকং কোরদূষং বা ভুঞ্জীতেতি|
ভবতি চাত্র প্রযতো বত্সরেণৈবং বিজযেত জলোদরম্|
বর্জ্যেষু যন্ত্রিতো দিষ্টে নাত্যদিষ্টে জিতেন্দ্রিযঃ||৩৪||
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निस्रुते च दोषोदके विमृद्योदरमाविककौशेयचर्मणामन्य तरेण गाढतरं वेष्टयेत्|
तथा नाध्मापयति वायुः|
लङ्ग़ यित्वा च यवागूमल्पस्नेहलवणां मात्रया पाययेत्|
ततः परं षण्मासान् क्षीरवृत्तिर्भवेत्|
ततो मासत्रयं क्षीर पेयां पिबेत्|
अन्यच्च मासत्रयमल्पलवणमल्पक्षीरं श्या माकं कोरदूषं वा भुञ्जीतेति|
भवति चात्र प्रयतो वत्सरेणैवं विजयेत जलोदरम्|
वर्ज्येषु यन्त्रितो दिष्टे नात्यदिष्टे जितेन्द्रियः||३४||
Adhikarana sAmAnyopadeshaH (35) · Śloka 35
সর্বমেবোদরং প্রাযো দোষসঙ্ঘাতজং যতঃ|
অতো বাতাদিশমনী ক্রিযা সর্বত্র শস্যতে|
বহ্নির্মন্দত্বমাযাতি দোষৈঃ কুক্ষৌ প্রপূরিতে|
তস্মাদ্ভোজ্যানি যোজ্যানি দীপনানি লঘূনি চ|
সপঞ্চমূলান্যল্পাম্লপটুস্নেহকটূনি চ|
ভাবিতানাং গবাং মূত্রে ষষ্টিকানাং চ তণ্ডুলৈঃ|
যবাগূং পযসা সিদ্ধাং প্রকামং ভোজযেন্নরম্|
পিবেদিক্ষুরসং চানু জঠরাণাং নিবৃত্তযে|
স্বং স্বং স্থানং ব্রজন্ত্যেষাং বাতপিত্তকফাস্তথা|
অত্যর্থোষ্ণাম্ললবণং রূক্ষং গ্রাহি হিমং গুরু|
গুডং তিলকৃতং শাকং বারি পানাবগাহযোঃ|
আযাসাধ্বদিবাস্বপ্নযানযানানি চ ত্যজেত্||৩৫||
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सर्वमेवोदरं प्रायो दोषसङ्ग़ातजं यतः|
अतो वातादिशमनी क्रिया सर्वत्र शस्यते|
वह्निर्मन्दत्वमायाति दोषैः कुक्षौ प्रपूरिते|
तस्माद्भोज्यानि योज्यानि दीपनानि लग़ूनि च|
सपञ्चमूलान्यल्पाम्लपटुस्नेहकटूनि च|
भावितानां गवां मूत्रे षष्टिकानां च तण्डुलैः|
यवागूं पयसा सिद्धां प्रकामं भोजयेन्नरम्|
पिबेदिक्षुरसं चानु जठराणां निवृत्तये|
स्वं स्वं स्थानं व्रजन्त्येषां वातपित्तकफास्तथा|
अत्यर्थोष्णाम्ललवणं रूक्षं ग्राहि हिमं गुरु|
गुडं तिलकृतं शाकं वारि पानावगाहयोः|
आयासाध्वदिवास्वप्नयानयानानि च त्यजेत्||३५||
Adhikarana pAne takraprashaMsA (36) · Śloka 36
নাত্যচ্ছসান্দ্রমধুরং পানে তক্রং প্রশস্যতে|
সকণালবণং বাতে পিত্তে সোষণশর্করম্|
যবানীসৈন্ধবাজাজীমধুব্যোষৈঃ কফোদরে|
ত্র্যূষণক্ষারলবণৈঃ সংযুক্তং নিচযোদরে|
মধুতৈলবচাশুণ্ঠীশতাহ্বাকুষ্ঠসৈন্ধবৈঃ|
প্লীহ্নি বদ্ধে তু হপুষাযবানীপট্বজাজিভিঃ|
সকৃষ্ণামাক্ষিকং ছিদ্রে ব্যোষবত্সলিলোদরে|
গৌরবারোচকানাহমন্দবহ্ন্যতিসারিণাম্|
তক্রং বাতকফর্তানামমৃতত্বায কল্পতে||৩৬||
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नात्यच्छसान्द्रमधुरं पाने तक्रं प्रशस्यते|
सकणालवणं वाते पित्ते सोषणशर्करम्|
यवानीसैन्धवाजाजीमधुव्योषैः कफोदरे|
त्र्यूषणक्षारलवणैः संयुक्तं निचयोदरे|
मधुतैलवचाशुण्ठीशताह्वाकुष्ठसैन्धवैः|
प्लीह्नि बद्धे तु हपुषायवानीपट्वजाजिभिः|
सकृष्णामाक्षिकं छिद्रे व्योषवत्सलिलोदरे|
गौरवारोचकानाहमन्दवह्न्यतिसारिणाम्|
तक्रं वातकफर्तानाममृतत्वाय कल्पते||३६||
Adhikarana prayogAnte kShIrapAnam (37-17) · Śloka 17
প্রযোগাণাং চ সর্বেষামনু ক্ষীরং প্রযোজযেত্|
স্থৈর্যকৃত্সর্বধাতূনাং বল্যং দোষানুবন্ধহৃত্|
ভেষজাপচিতাঙ্গানাং ক্ষীরমেবামৃতাযতে||৩৭||
ইতি বৈদ্যপতিসিংহগুপ্তস্য সূনোর্বাগ্ভটস্য কৃতাব ষ্টাঙ্গসংগ্রহসংহিতাযাং চিকিত্সিতস্থান উদর চিকিত্সিতন্নাম সপ্তদশোঽধ্যাযঃ||১৭||
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प्रयोगाणां च सर्वेषामनु क्षीरं प्रयोजयेत्|
स्थैर्यकृत्सर्वधातूनां बल्यं दोषानुबन्धहृत्|
भेषजापचिताङ्गानां क्षीरमेवामृतायते||३७||
इति वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भटस्य कृताव ष्टाङ्गसंग्रहसंहितायां चिकित्सितस्थान उदर चिकित्सितन्नाम सप्तदशोऽध्यायः||१७||