Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽভযামলকীযং রসাযনপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
View original
अथातोऽभयामलकीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽভযামলকীযং রসাযনপাদং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातोऽभयामलकीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 2 (3) · Śloka 4
চিকিত্সিতং ব্যাধিহরং পথ্যং সাধনমৌষধম্| প্রাযশ্চিত্তং প্রশমনং প্রকৃতিস্থাপনং হিতম্||৩|| বিদ্যাদ্ভেষজনামানি, ...|৪|
चिकित्सितं व्याधिहरं पथ्यं साधनमौषधम्| प्रायश्चित्तं प्रशमनं प्रकृतिस्थापनं हितम्||३|| विद्याद्भेषजनामानि, ...|४|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
... ভেষজং দ্বিবিধং চ তত্| স্বস্থস্যোর্জস্করং কিঞ্চিত্ কিঞ্চিদার্তস্য রোগনুত্||৪||
... भेषजं द्विविधं च तत्| स्वस्थस्योर्जस्करं किञ्चित् किञ्चिदार्तस्य रोगनुत्||४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
অভেষজং চ দ্বিবিধং বাধনং সানুবাধনম্|৫|
अभेषजं च द्विविधं बाधनं सानुबाधनम्|५|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 5 (5-6) · Śloka 6
স্বস্থস্যোর্জস্করং যত্তু তদ্বৃষ্যং তদ্রসাযনম্||৫|| প্রাযঃ, প্রাযেণ রোগাণাং দ্বিতীযং প্রশমে মতম্| প্রাযঃশব্দো বিশেষার্থো হ্যুভযং হ্যুভযার্থকৃত্||৬||
स्वस्थस्योर्जस्करं यत्तु तद्वृष्यं तद्रसायनम्||५|| प्रायः, प्रायेण रोगाणां द्वितीयं प्रशमे मतम्| प्रायःशब्दो विशेषार्थो ह्युभयं ह्युभयार्थकृत्||६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8
দীর্ঘমাযুঃ স্মৃতিং মেধামারোগ্যং তরুণং বযঃ| প্রভাবর্ণস্বরৌদার্যং দেহেন্দ্রিযবলং পরম্||৭|| বাক্সিদ্ধিং প্রণতিং কান্তিং লভতে না রসাযনাত্| লাভোপাযো হি শস্তানাং রসাদীনাং রসাযনম্||৮||
दीर्घमायुः स्मृतिं मेधामारोग्यं तरुणं वयः| प्रभावर्णस्वरौदार्यं देहेन्द्रियबलं परम्||७|| वाक्सिद्धिं प्रणतिं कान्तिं लभते ना रसायनात्| लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्||८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 7 (9-12) · Śloka 12
অপত্যসন্তানকরং যত্ সদ্যঃ সম্প্রহর্ষণম্| বাজীবাতিবলো যেন যাত্যপ্রতিহতঃ স্ত্রিযঃ||৯|| ভবত্যতিপ্রিযঃ স্ত্রীণাং যেন যেনোপচীযতে| জীর্যতোঽপ্যক্ষযং শুক্রং ফলবদ্যেন দৃশ্যতে||১০|| প্রভূতশাখঃ শাখীব যেন চৈত্যো যথা মহান্| ভবত্যর্চ্যো বহুমতঃ প্রজানাং সুবহুপ্রজঃ||১১|| সন্তানমূলং যেনেহ প্রেত্য চানন্ত্যমশ্নুতে| যশঃ শ্রিযং বলং পুষ্টিং বাজীকরণমেব তত্||১২||
अपत्यसन्तानकरं यत् सद्यः सम्प्रहर्षणम्| वाजीवातिबलो येन यात्यप्रतिहतः स्त्रियः||९|| भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां येन येनोपचीयते| जीर्यतोऽप्यक्षयं शुक्रं फलवद्येन दृश्यते||१०|| प्रभूतशाखः शाखीव येन चैत्यो यथा महान्| भवत्यर्च्यो बहुमतः प्रजानां सुबहुप्रजः||११|| सन्तानमूलं येनेह प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते| यशः श्रियं बलं पुष्टिं वाजीकरणमेव तत्||१२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 8 (13-14) · Śloka 14
স্বস্থস্যোর্জস্করং ত্বেতদ্দ্বিবিধং প্রোক্তমৌষধম্| যদ্ব্যাধিনির্ঘাতকরং বক্ষ্যতে তচ্চিকিত্সিতে||১৩|| চিকিত্সিতার্থ এতাবান্ বিকারাণাং যদৌষধম্| রসাযনবিধিশ্চাগ্রে বাজীকরণমেব চ||১৪||
स्वस्थस्योर्जस्करं त्वेतद्द्विविधं प्रोक्तमौषधम्| यद्व्याधिनिर्घातकरं वक्ष्यते तच्चिकित्सिते||१३|| चिकित्सितार्थ एतावान् विकाराणां यदौषधम्| रसायनविधिश्चाग्रे वाजीकरणमेव च||१४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 9 (15) · Śloka 15
অভেষজমিতি জ্ঞেযং বিপরীতং যদৌষধাত্| তদসেব্যং নিষেব্যং তু প্রবক্ষ্যামি যদৌষধম্||১৫||
अभेषजमिति ज्ञेयं विपरीतं यदौषधात्| तदसेव्यं निषेव्यं तु प्रवक्ष्यामि यदौषधम्||१५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 10 (16-24) · Śloka 24
রসাযনানাং দ্বিবিধং প্রযোগমৃষযো বিদুঃ| কুটীপ্রাবেশিকং চৈব বাতাতপিকমেব চ||১৬|| কুটীপ্রাবেশিকস্যাদৌ বিধিঃ সমুপদেক্ষ্যতে| নৃপবৈদ্যদ্বিজাতীনাং সাধূনাং পুণ্যকর্মণাম্||১৭|| নিবাসে নির্ভযে শস্তে প্রাপ্যোপকরণে পুরে| দিশি পূর্বোত্তরস্যাং চ সুভূমৌ কারযেত্ কুটীম্||১৮|| বিস্তারোত্সেধসম্পন্নাং ত্রিগর্ভাং সূক্ষ্মলোচনাম্| ঘনভিত্তিমৃতুসুখাং সুস্পষ্টাং মনসঃ প্রিযাম্||১৯|| শব্দাদীনামশস্তানামগম্যং স্ত্রীবিবর্জিতাম্| ইষ্টোপকরণোপেতাং সজ্জবৈদ্যৌষধদ্বিজাম্ ||২০|| অথোদগযনে শুক্লে তিথিনক্ষত্রপূজিতে| মুহূর্তকরণোপেতে প্রশস্তে কৃতবাপনঃ||২১|| ধৃতিস্মৃতিবলং কৃত্বা শ্রদ্দধানঃ সমাহিতঃ| বিধূয মানসান্ দোষান্ মৈত্রীং ভূতেষু চিন্তযন্||২২|| দেবতাঃ পূজযিত্বাঽগ্রে দ্বিজাতীংশ্চ প্রদক্ষিণম্| দেবগোব্রাহ্মণান্ কৃত্বা ততস্তাং প্রবিশেত্ কুটীম্||২৩|| তস্যাং সংশোধনৈঃ শুদ্ধঃ সুখী জাতবলঃ পুনঃ| রসাযনং প্রযুঞ্জীত তত্প্রবক্ষ্যামি শোধনম্||২৪||
रसायनानां द्विविधं प्रयोगमृषयो विदुः| कुटीप्रावेशिकं चैव वातातपिकमेव च||१६|| कुटीप्रावेशिकस्यादौ विधिः समुपदेक्ष्यते| नृपवैद्यद्विजातीनां साधूनां पुण्यकर्मणाम्||१७|| निवासे निर्भये शस्ते प्राप्योपकरणे पुरे| दिशि पूर्वोत्तरस्यां च सुभूमौ कारयेत् कुटीम्||१८|| विस्तारोत्सेधसम्पन्नां त्रिगर्भां सूक्ष्मलोचनाम्| घनभित्तिमृतुसुखां सुस्पष्टां मनसः प्रियाम्||१९|| शब्दादीनामशस्तानामगम्यं स्त्रीविवर्जिताम्| इष्टोपकरणोपेतां सज्जवैद्यौषधद्विजाम् ||२०|| अथोदगयने शुक्ले तिथिनक्षत्रपूजिते| मुहूर्तकरणोपेते प्रशस्ते कृतवापनः||२१|| धृतिस्मृतिबलं कृत्वा श्रद्दधानः समाहितः| विधूय मानसान् दोषान् मैत्रीं भूतेषु चिन्तयन्||२२|| देवताः पूजयित्वाऽग्रे द्विजातींश्च प्रदक्षिणम्| देवगोब्राह्मणान् कृत्वा ततस्तां प्रविशेत् कुटीम्||२३|| तस्यां संशोधनैः शुद्धः सुखी जातबलः पुनः| रसायनं प्रयुञ्जीत तत्प्रवक्ष्यामि शोधनम्||२४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 11 (25-28) · Śloka 28
হরীতকীনাং চূর্ণানি সৈন্ধবামলকে গুডম্| বচাং বিডঙ্গং রজনীং পিপ্পলীং বিশ্বভেষজম্||২৫|| পিবেদুষ্ণাম্বুনা জন্তুঃ স্নেহস্বেদোপপাদিতঃ| তেন শুদ্ধশরীরায কৃতসংসর্জনায চ||২৬|| ত্রিরাত্রং যাবকং দদ্যাত্ পঞ্চাহং বাঽপি সর্পিষা| সপ্তাহং বা পুরাণস্য যাবচ্ছুদ্ধেস্তু বর্চসঃ||২৭|| শুদ্ধকোষ্ঠং তু তং জ্ঞাত্বা রসাযনমুপাচরেত্| বযঃপ্রকৃতিসাত্ম্যজ্ঞো যৌগিকং যস্য যদ্ভবেত্||২৮||
हरीतकीनां चूर्णानि सैन्धवामलके गुडम्| वचां विडङ्गं रजनीं पिप्पलीं विश्वभेषजम्||२५|| पिबेदुष्णाम्बुना जन्तुः स्नेहस्वेदोपपादितः| तेन शुद्धशरीराय कृतसंसर्जनाय च||२६|| त्रिरात्रं यावकं दद्यात् पञ्चाहं वाऽपि सर्पिषा| सप्ताहं वा पुराणस्य यावच्छुद्धेस्तु वर्चसः||२७|| शुद्धकोष्ठं तु तं ज्ञात्वा रसायनमुपाचरेत्| वयःप्रकृतिसात्म्यज्ञो यौगिकं यस्य यद्भवेत्||२८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 12 (29-37) · Śloka 37
হরীতকীং পঞ্চরসামুষ্ণামলবণাং শিবাম্| দোষানুলোমনীং লঘ্বীং বিদ্যাদ্দীপনপাচনীম্||২৯|| আযুষ্যাং পৌষ্টিকীং ধন্যাং বযসঃ স্থাপনীং পরাম্| সর্বরোগপ্রশমনীং বুদ্ধীন্দ্রিযবলপ্রদাম্||৩০|| কুষ্ঠং গুল্মমুদাবর্তং শোষং পাণ্ড্বামযং মদম্| অর্শাংসি গ্রহণীদোষং পুরাণং বিষমজ্বরম্||৩১|| হৃদ্রোগং সশিরোরোগমতীসারমরোচকম্| কাসং প্রমেহমানাহং প্লীহানমুদরং নবম্||৩২|| কফপ্রসেকং বৈস্বর্যং বৈবর্ণ্যং কামলাং ক্রিমীন্| শ্বযথুং তমকং ছর্দিং ক্লৈব্যমঙ্গাবসাদনম্||৩৩|| স্রোতোবিবন্ধান্ বিবিধান্ প্রলেপং হৃদযোরসোঃ| স্মৃতিবুদ্ধিপ্রমোহং চ জযেচ্ছীঘ্রং হরীতকী||৩৪|| (অজীর্ণিনো রূক্ষভুজঃ স্ত্রীমদ্যবিষকর্শিতাঃ| সেবেরন্নাভযামেতে ক্ষুত্তৃষ্ণোষ্ণার্দিতাশ্চ যে)||৩৫|| তান্ গুণাংস্তানি কর্মাণি বিদ্যাদামলকীষ্বপি| যান্যুক্তানি হরীতক্যা বীর্যস্য তু বিপর্যযঃ||৩৬|| অতশ্চামৃতকল্পানি বিদ্যাত্ কর্মভিরীদৃশৈঃ| হরীতকীনাং শস্যানি ভিষগামলকস্য চ||৩৭||
हरीतकीं पञ्चरसामुष्णामलवणां शिवाम्| दोषानुलोमनीं लघ्वीं विद्याद्दीपनपाचनीम्||२९|| आयुष्यां पौष्टिकीं धन्यां वयसः स्थापनीं पराम्| सर्वरोगप्रशमनीं बुद्धीन्द्रियबलप्रदाम्||३०|| कुष्ठं गुल्ममुदावर्तं शोषं पाण्ड्वामयं मदम्| अर्शांसि ग्रहणीदोषं पुराणं विषमज्वरम्||३१|| हृद्रोगं सशिरोरोगमतीसारमरोचकम्| कासं प्रमेहमानाहं प्लीहानमुदरं नवम्||३२|| कफप्रसेकं वैस्वर्यं वैवर्ण्यं कामलां क्रिमीन्| श्वयथुं तमकं छर्दिं क्लैब्यमङ्गावसादनम्||३३|| स्रोतोविबन्धान् विविधान् प्रलेपं हृदयोरसोः| स्मृतिबुद्धिप्रमोहं च जयेच्छीघ्रं हरीतकी||३४|| (अजीर्णिनो रूक्षभुजः स्त्रीमद्यविषकर्शिताः| सेवेरन्नाभयामेते क्षुत्तृष्णोष्णार्दिताश्च ये)||३५|| तान् गुणांस्तानि कर्माणि विद्यादामलकीष्वपि| यान्युक्तानि हरीतक्या वीर्यस्य तु विपर्ययः||३६|| अतश्चामृतकल्पानि विद्यात् कर्मभिरीदृशैः| हरीतकीनां शस्यानि भिषगामलकस्य च||३७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 13 (38-40) · Śloka 40
ওষধীনাং পরা ভূমির্হিমবাঞ্ শৈলসত্তমঃ| তস্মাত্ফলানি তজ্জানি গ্রাহযেত্কালজানি তু||৩৮|| আপূর্ণরসবীর্যাণি কালে কালে যথাবিধি| আদিত্যপবনচ্ছাযাসলিলপ্রীণিতানি চ||৩৯|| যান্যজগ্ধান্যপূতীনি নির্ব্রণান্যগদানি চ| তেষাং প্রযোগং বক্ষ্যামি ফলানাং কর্ম চোত্তমম্||৪০||
ओषधीनां परा भूमिर्हिमवाञ् शैलसत्तमः| तस्मात्फलानि तज्जानि ग्राहयेत्कालजानि तु||३८|| आपूर्णरसवीर्याणि काले काले यथाविधि| आदित्यपवनच्छायासलिलप्रीणितानि च||३९|| यान्यजग्धान्यपूतीनि निर्व्रणान्यगदानि च| तेषां प्रयोगं वक्ष्यामि फलानां कर्म चोत्तमम्||४०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 14 (41-57) · Śloka 57
পঞ্চানাং পঞ্চমূলানাং ভাগান্ দশপলোন্মিতান্| হরীতকীসহস্রং চ ত্রিগুণামলকং নবম্||৪১|| বিদারিগন্ধাং বৃহতীং পৃশ্নিপর্ণীং নিদিগ্ধিকাম্| বিদ্যাদ্বিদারিগন্ধাদ্যং শ্বদংষ্ট্রাপঞ্চমং গণম্||৪২|| বিল্বাগ্নিমন্থশ্যোনাকং কাশ্মর্যমথ পাটলাম্| পুনর্নবাং শূর্পপর্ণ্যৌ বলামেরণ্ডমেব চ||৪৩|| জীবকর্ষভকৌ মেদাং জীবন্তীং সশতাবরীম্| শরেক্ষুদর্ভকাশানাং শালীনাং মূলমেব চ||৪৪|| ইত্যেষাং পঞ্চমূলানাং পঞ্চানামুপকল্পযেত্| ভাগান্ যথোক্তাংস্তত্সর্বং সাধ্যং দশগুণেঽম্ভসি||৪৫|| দশভাগাবশেষং তু পূতং তং গ্রাহযেদ্রসম্| হরীতকীশ্চ তাঃ সর্বাঃ সর্বাণ্যামলকানি চ||৪৬|| তানি সর্বাণ্যনস্থীনি ফলান্যাপোথ্য কূর্চনৈঃ| বিনীয তস্মিন্নির্যূহে চূর্ণানীমানি দাপযেত্||৪৭|| মণ্ডূকপর্ণ্যাঃ পিপ্পল্যাঃ শঙ্খপুষ্প্যাঃ প্লবস্য চ| মুস্তানাং সবিডঙ্গানাং চন্দনাগুরুণোস্তথা||৪৮|| মধুকস্য হরিদ্রাযা বচাযাঃ কনকস্য চ| ভাগাংশ্চতুষ্পলান্ কৃত্বা সূক্ষ্মৈলাযাস্ত্বচস্তথা||৪৯|| সিতোপলাসহস্রং চ চূর্ণিতং তুলযাঽধিকম্| তৈলস্য দ্ব্যাঢকং তত্র দদ্যাত্ত্রীণি চ সর্পিষঃ||৫০|| সাধ্যমৌদুম্বরে পাত্রে তত্ সর্বং মৃদুনাঽগ্নিনা| জ্ঞাত্বা লেহ্যমদগ্ধং চ শীতং ক্ষৌদ্রেণ সংসৃজেত্||৫১|| ক্ষৌদ্রপ্রমাণং স্নেহার্ধং তত্ সর্বং ঘৃতভাজনে| তিষ্ঠেত্সম্মূর্চ্ছিতং তস্য মাত্রাং কালে প্রযোজযেত্||৫২|| যা নোপরুন্ধ্যাদাহারমেকং মাত্রা জরাং প্রতি| ষষ্টিকঃ পযসা চাত্র জীর্ণে ভোজনমিষ্যতে||৫৩|| বৈখানসা বালখিল্যাস্তথা চান্যে তপোধনাঃ| রসাযনমিদং প্রাশ্য বভূবুরমিতাযুষঃ||৫৪|| মুক্ত্বা জীর্ণং বপুশ্চাগ্র্যমবাপুস্তরুণং বযঃ| বীততন্দ্রাক্লমশ্বাসা নিরাতঙ্কাঃ সমাহিতাঃ||৫৫|| মেধাস্মৃতিবলোপেতাশ্চিররাত্রং তপোধনাঃ| ব্রাহ্মং তপো ব্রহ্মচর্যং চেরুশ্চাত্যন্তনিষ্ঠযা||৫৬|| রসাযনমিদং ব্রাহ্মমাযুষ্কামঃ প্রযোজযেত্| দীর্ঘমাযুর্বযশ্চাগ্র্যং কামাংশ্চেষ্টান্ সমশ্নুতে||৫৭|| (ইতি ব্রাহ্মরসাযনম্)|
पञ्चानां पञ्चमूलानां भागान् दशपलोन्मितान्| हरीतकीसहस्रं च त्रिगुणामलकं नवम्||४१|| विदारिगन्धां बृहतीं पृश्निपर्णीं निदिग्धिकाम्| विद्याद्विदारिगन्धाद्यं श्वदंष्ट्रापञ्चमं गणम्||४२|| बिल्वाग्निमन्थश्योनाकं काश्मर्यमथ पाटलाम्| पुनर्नवां शूर्पपर्ण्यौ बलामेरण्डमेव च||४३|| जीवकर्षभकौ मेदां जीवन्तीं सशतावरीम्| शरेक्षुदर्भकाशानां शालीनां मूलमेव च||४४|| इत्येषां पञ्चमूलानां पञ्चानामुपकल्पयेत्| भागान् यथोक्तांस्तत्सर्वं साध्यं दशगुणेऽम्भसि||४५|| दशभागावशेषं तु पूतं तं ग्राहयेद्रसम्| हरीतकीश्च ताः सर्वाः सर्वाण्यामलकानि च||४६|| तानि सर्वाण्यनस्थीनि फलान्यापोथ्य कूर्चनैः| विनीय तस्मिन्निर्यूहे चूर्णानीमानि दापयेत्||४७|| मण्डूकपर्ण्याः पिप्पल्याः शङ्खपुष्प्याः प्लवस्य च| मुस्तानां सविडङ्गानां चन्दनागुरुणोस्तथा||४८|| मधुकस्य हरिद्राया वचायाः कनकस्य च| भागांश्चतुष्पलान् कृत्वा सूक्ष्मैलायास्त्वचस्तथा||४९|| सितोपलासहस्रं च चूर्णितं तुलयाऽधिकम्| तैलस्य द्व्याढकं तत्र दद्यात्त्रीणि च सर्पिषः||५०|| साध्यमौदुम्बरे पात्रे तत् सर्वं मृदुनाऽग्निना| ज्ञात्वा लेह्यमदग्धं च शीतं क्षौद्रेण संसृजेत्||५१|| क्षौद्रप्रमाणं स्नेहार्धं तत् सर्वं घृतभाजने| तिष्ठेत्सम्मूर्च्छितं तस्य मात्रां काले प्रयोजयेत्||५२|| या नोपरुन्ध्यादाहारमेकं मात्रा जरां प्रति| षष्टिकः पयसा चात्र जीर्णे भोजनमिष्यते||५३|| वैखानसा वालखिल्यास्तथा चान्ये तपोधनाः| रसायनमिदं प्राश्य बभूवुरमितायुषः||५४|| मुक्त्वा जीर्णं वपुश्चाग्र्यमवापुस्तरुणं वयः| वीततन्द्राक्लमश्वासा निरातङ्काः समाहिताः||५५|| मेधास्मृतिबलोपेताश्चिररात्रं तपोधनाः| ब्राह्मं तपो ब्रह्मचर्यं चेरुश्चात्यन्तनिष्ठया||५६|| रसायनमिदं ब्राह्ममायुष्कामः प्रयोजयेत्| दीर्घमायुर्वयश्चाग्र्यं कामांश्चेष्टान् समश्नुते||५७|| (इति ब्राह्मरसायनम्)|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 15 (58-61) · Śloka 61
যথোক্তগুণানামামলকানাং সহস্রং পিষ্টস্বেদনবিধিনা পযস ঊষ্মণা সুস্বিন্নমনাতপশুষ্কমনস্থি চূর্ণযেত্| তদামলকসহস্রস্বরসপরিপীতং স্থিরাপুনর্নবাজীবন্তীনাগবলাব্রহ্মসুবর্চলামণ্ডূকপর্ণীশতাবরীশঙ্খপুষ্পীপিপ্পলীবচাবিডঙ্গস্বযঙ্গুপ্তামৃতা- চন্দনাগুরুমধুকমধূকপুষ্পোত্পলপদ্মমালতীযুবতীযূথিকাচূর্ণাষ্টভাগসংযুক্তং পুনর্নাগবলাসহস্রপলস্বরসপরিপীতমনাতপশুষ্কং দ্বিগুণিতসর্পিষা ক্ষৌদ্রসর্পিষা বা ক্ষুদ্রগুডাকৃতিং কৃত্বা শুচৌ দৃঢে ঘৃতভাবিতে কুম্ভে ভস্মরাশেরধঃ স্থাপযেদন্তর্ভূমেঃ পক্ষং কৃতরক্ষাবিধানমথর্ববেদবিদা, পক্ষাত্যযে চোদ্ধৃত্য কনকরজততাম্রপ্রবালকালাযসচূর্ণাষ্টভাগসংযুক্তমর্ধকর্ষবৃদ্ধ্যা যথোক্তেন বিধিনা প্রাতঃ প্রাতঃ প্রযুঞ্জানোঽগ্নিবলমভিসমীক্ষ্য, জীর্ণে চ ষষ্টিকং পযসা সসর্পিষ্কমুপসেবমানো যথোক্তান্ গুণান্ সমশ্নুত ইতি||৫৮|| ভবন্তি চাত্র- ইদং রসাযনং ব্রাহ্মং মহর্ষিগণসেবিতম্| ভবত্যরোগো দীর্ঘাযুঃ প্রযুঞ্জানো মহাবলঃ||৫৯|| কান্তঃ প্রজানাং সিদ্ধার্থশ্চন্দ্রাদিত্যসমদ্যুতিঃ| শ্রুতং ধারযতে সত্ত্বমার্ষং চাস্য প্রবর্ততে||৬০|| ধরণীধরসারশ্চ বাযুনা সমবিক্রমঃ| স ভবত্যবিষং চাস্য গাত্রে সম্পদ্যতে বিষম্||৬১|| (ইতি দ্বিতীযং ব্রাহ্মরসাযনম্)|
यथोक्तगुणानामामलकानां सहस्रं पिष्टस्वेदनविधिना पयस ऊष्मणा सुस्विन्नमनातपशुष्कमनस्थि चूर्णयेत्| तदामलकसहस्रस्वरसपरिपीतं स्थिरापुनर्नवाजीवन्तीनागबलाब्रह्मसुवर्चलामण्डूकपर्णीशतावरीशङ्खपुष्पीपिप्पलीवचाविडङ्गस्वयङ्गुप्तामृता- चन्दनागुरुमधुकमधूकपुष्पोत्पलपद्ममालतीयुवतीयूथिकाचूर्णाष्टभागसंयुक्तं पुनर्नागबलासहस्रपलस्वरसपरिपीतमनातपशुष्कं द्विगुणितसर्पिषा क्षौद्रसर्पिषा वा क्षुद्रगुडाकृतिं कृत्वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे भस्मराशेरधः स्थापयेदन्तर्भूमेः पक्षं कृतरक्षाविधानमथर्ववेदविदा, पक्षात्यये चोद्धृत्य कनकरजतताम्रप्रवालकालायसचूर्णाष्टभागसंयुक्तमर्धकर्षवृद्ध्या यथोक्तेन विधिना प्रातः प्रातः प्रयुञ्जानोऽग्निबलमभिसमीक्ष्य, जीर्णे च षष्टिकं पयसा ससर्पिष्कमुपसेवमानो यथोक्तान् गुणान् समश्नुत इति||५८|| भवन्ति चात्र- इदं रसायनं ब्राह्मं महर्षिगणसेवितम्| भवत्यरोगो दीर्घायुः प्रयुञ्जानो महाबलः||५९|| कान्तः प्रजानां सिद्धार्थश्चन्द्रादित्यसमद्युतिः| श्रुतं धारयते सत्त्वमार्षं चास्य प्रवर्तते||६०|| धरणीधरसारश्च वायुना समविक्रमः| स भवत्यविषं चास्य गात्रे सम्पद्यते विषम्||६१|| (इति द्वितीयं ब्राह्मरसायनम्)|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 16 (62-74) · Śloka 74
বিল্বোঽগ্নিমন্থঃ শ্যোনাকঃ কাশ্মর্যঃ পাটলির্বলা| পর্ণ্যশ্চতস্রঃ পিপ্পল্যঃ শ্বদংষ্ট্রা বৃহতীদ্বযম্||৬২|| শৃঙ্গী তামলকী দ্রাক্ষা জীবন্তী পুষ্করাগুরু| অভযা চামৃতা ঋদ্ধির্জীবকর্ষভকৌ শটী||৬৩|| মুস্তং পুনর্নবা মেদা সৈলা চন্দনমুত্পলম্| বিদারী বৃষমূলানি কাকোলী কাকনাসিকা||৬৪|| এষাং পলোন্মিতান্ ভাগাঞ্ছতান্যামলকস্য চ| পঞ্চ দদ্যাত্তদৈকধ্যং জলদ্রোণে বিপাচযেত্||৬৫|| জ্ঞাত্বা গতরসান্যেতান্যৌষধান্যথ তং রসম্| তচ্চামলকমুদ্ধৃত্য নিষ্কুলং তৈলসর্পিষোঃ||৬৬|| পলদ্বাদশকে ভৃষ্ট্বা দত্ত্বা চার্ধতুলাং ভিষক্| মত্স্যণ্ডিকাযাঃ পূতাযা লেহবত্সাধু সাধযেত্||৬৭|| ষট্পলং মধুনশ্চাত্র সিদ্ধশীতে প্রদাপযেত্| চতুষ্পলং তুগাক্ষীর্যাঃ পিপ্পলীদ্বিপলং তথা||৬৮|| পলমেকং নিদধ্যাচ্চ ত্বগেলাপত্রকেশরাত্| ইত্যযং চ্যবনপ্রাশঃ পরমুক্তো রসাযনঃ||৬৯|| কাসশ্বাসহরশ্চৈব বিশেষেণোপদিশ্যতে| ক্ষীণক্ষতানাং বৃদ্ধানাং বালানাং চাঙ্গবর্ধনঃ||৭০|| স্বরক্ষযমুরোরোগং হৃদ্রোগং বাতশোণিতম্| পিপাসাং মূত্রশুক্রস্থান্ দোষাংশ্চাপ্যপকর্ষতি||৭১|| অস্য মাত্রাং প্রযুঞ্জীত যোপরুন্ধ্যান্ন ভোজনম্| অস্য প্রযোগাচ্চ্যবনঃ সুবৃদ্ধোঽভূত্ পুনর্যুবা||৭২|| মেধাং স্মৃতিং কান্তিমনামযত্বমাযুঃপ্রকর্ষং বলমিন্দ্রিযাণাম্| স্ত্রীষু প্রহর্ষং পরমগ্নিবৃদ্ধিং বর্ণপ্রসাদং পবনানুলোম্যম্||৭৩|| রসাযনস্যাস্য নরঃ প্রযোগাল্লভেত জীর্ণোঽপি কুটীপ্রবেশাত্| জরাকৃতং রূপমপাস্য সর্বং বিভর্তি রূপং নবযৌবনস্য||৭৪|| (ইতি চ্যবনপ্রাশঃ)|
बिल्वोऽग्निमन्थः श्योनाकः काश्मर्यः पाटलिर्बला| पर्ण्यश्चतस्रः पिप्पल्यः श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम्||६२|| शृङ्गी तामलकी द्राक्षा जीवन्ती पुष्करागुरु| अभया चामृता ऋद्धिर्जीवकर्षभकौ शटी||६३|| मुस्तं पुनर्नवा मेदा सैला चन्दनमुत्पलम्| विदारी वृषमूलानि काकोली काकनासिका||६४|| एषां पलोन्मितान् भागाञ्छतान्यामलकस्य च| पञ्च दद्यात्तदैकध्यं जलद्रोणे विपाचयेत्||६५|| ज्ञात्वा गतरसान्येतान्यौषधान्यथ तं रसम्| तच्चामलकमुद्धृत्य निष्कुलं तैलसर्पिषोः||६६|| पलद्वादशके भृष्ट्वा दत्त्वा चार्धतुलां भिषक्| मत्स्यण्डिकायाः पूताया लेहवत्साधु साधयेत्||६७|| षट्पलं मधुनश्चात्र सिद्धशीते प्रदापयेत्| चतुष्पलं तुगाक्षीर्याः पिप्पलीद्विपलं तथा||६८|| पलमेकं निदध्याच्च त्वगेलापत्रकेशरात्| इत्ययं च्यवनप्राशः परमुक्तो रसायनः||६९|| कासश्वासहरश्चैव विशेषेणोपदिश्यते| क्षीणक्षतानां वृद्धानां बालानां चाङ्गवर्धनः||७०|| स्वरक्षयमुरोरोगं हृद्रोगं वातशोणितम्| पिपासां मूत्रशुक्रस्थान् दोषांश्चाप्यपकर्षति||७१|| अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत योपरुन्ध्यान्न भोजनम्| अस्य प्रयोगाच्च्यवनः सुवृद्धोऽभूत् पुनर्युवा||७२|| मेधां स्मृतिं कान्तिमनामयत्वमायुःप्रकर्षं बलमिन्द्रियाणाम्| स्त्रीषु प्रहर्षं परमग्निवृद्धिं वर्णप्रसादं पवनानुलोम्यम्||७३|| रसायनस्यास्य नरः प्रयोगाल्लभेत जीर्णोऽपि कुटीप्रवेशात्| जराकृतं रूपमपास्य सर्वं बिभर्ति रूपं नवयौवनस्य||७४|| (इति च्यवनप्राशः)|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 17 (75) · Śloka 75
অথামলকহরীতকীনামামলকবিভীতকানাং হরীতকীবিভীতকানামামলকহরীতকীবিভীতকানাং বা পলাশত্বগবনদ্ধানাং মৃদাঽবলিপ্তানাং কুকূলস্বিন্নানামকুলকানাং পলসহস্রমুলূখলে সম্পোথ্য দধিঘৃতমধুপললতৈলশর্করাসংযুক্তং ভক্ষযেদনন্নভুগ্যথোক্তেন বিধিনা; তস্যান্তে যবাগ্বাদিভিঃ প্রত্যবস্থাপনম্ , অভ্যঙ্গোত্সাদনং সর্পিষা যবচূর্ণৈশ্চ, অযং চ রসাযনপ্রযোগপ্রকর্ষো দ্বিস্তাবদগ্নিবলমভিসমীক্ষ্য , প্রতিভোজনং যূষেণ পযসা বা ষষ্টিকঃ সসর্পিষ্কঃ, অতঃ পরং যথাসুখবিহারঃ কামভক্ষ্যঃ স্যাত্| অনেন প্রযোগেণর্ষযঃ পুনর্যুবত্বমবাপুর্বভূবুশ্চানেকবর্ষশতজীবিনো নির্বিকারাঃ পরং শরীরবুদ্ধীন্দ্রিযবলসমুদিতাশ্চেরুশ্চাত্যন্তনিষ্ঠযা তপঃ||৭৫|| (ইতি চতুর্থামলকরসাযনম্)|
अथामलकहरीतकीनामामलकबिभीतकानां हरीतकीबिभीतकानामामलकहरीतकीबिभीतकानां वा पलाशत्वगवनद्धानां मृदाऽवलिप्तानां कुकूलस्विन्नानामकुलकानां पलसहस्रमुलूखले सम्पोथ्य दधिघृतमधुपललतैलशर्करासंयुक्तं भक्षयेदनन्नभुग्यथोक्तेन विधिना; तस्यान्ते यवाग्वादिभिः प्रत्यवस्थापनम् , अभ्यङ्गोत्सादनं सर्पिषा यवचूर्णैश्च, अयं च रसायनप्रयोगप्रकर्षो द्विस्तावदग्निबलमभिसमीक्ष्य , प्रतिभोजनं यूषेण पयसा वा षष्टिकः ससर्पिष्कः, अतः परं यथासुखविहारः कामभक्ष्यः स्यात्| अनेन प्रयोगेणर्षयः पुनर्युवत्वमवापुर्बभूवुश्चानेकवर्षशतजीविनो निर्विकाराः परं शरीरबुद्धीन्द्रियबलसमुदिताश्चेरुश्चात्यन्तनिष्ठया तपः||७५|| (इति चतुर्थामलकरसायनम्)|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 18 (76) · Śloka 76
হরীতক্যামলকবিভীতকপঞ্চপঞ্চমূলনির্যূহে পিপ্পলীমধুকমধূককাকোলীক্ষীরকাকোল্যাত্মগুপ্তাজীবকর্ষভকক্ষীরশুক্লাকল্কসম্প্রযুক্তেন বিদারীস্বরসেন ক্ষীরাষ্টগুণসম্প্রযুক্তেন চ সর্পিষঃ কুম্ভং সাধযিত্বা প্রযুঞ্জানোঽগ্নিবলসমাং মাত্রাং জীর্ণে চ ক্ষীরসর্পির্ভ্যাং শালিষষ্টিকমুষ্ণোদকানুপানমশ্নঞ্জরাব্যাধিপাপাভিচারব্যপগতভযঃ শরীরেন্দ্রিযবুদ্ধিবলমতুলমুপলভ্যাপ্রতিহতসর্বারম্ভঃ পরমাযুরনবাপ্নুযাত্||৭৬|| (ইতি পঞ্চমো হরীতকীযোগঃ)|
हरीतक्यामलकबिभीतकपञ्चपञ्चमूलनिर्यूहे पिप्पलीमधुकमधूककाकोलीक्षीरकाकोल्यात्मगुप्ताजीवकर्षभकक्षीरशुक्लाकल्कसम्प्रयुक्तेन विदारीस्वरसेन क्षीराष्टगुणसम्प्रयुक्तेन च सर्पिषः कुम्भं साधयित्वा प्रयुञ्जानोऽग्निबलसमां मात्रां जीर्णे च क्षीरसर्पिर्भ्यां शालिषष्टिकमुष्णोदकानुपानमश्नञ्जराव्याधिपापाभिचारव्यपगतभयः शरीरेन्द्रियबुद्धिबलमतुलमुपलभ्याप्रतिहतसर्वारम्भः परमायुरनवाप्नुयात्||७६|| (इति पञ्चमो हरीतकीयोगः)|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 19 (77-80) · Śloka 80
হরীতক্যামলকবিভীতকহরিদ্রাস্থিরাবলাবিডঙ্গামৃতবল্লীবিশ্বভেষজমধুকপিপ্পলীসোমবল্কসিদ্ধেন ক্ষীরসর্পিষা মধুশর্করাভ্যামপি চ সন্নীযামলকস্বরসশতপরিপীতমামলকচূর্ণমযশ্চূর্ণচতুর্ভাগসম্প্রযুক্তং পাণিতলমাত্রং প্রাতঃ প্রাতঃ প্রাশ্য যথোক্তেন বিধিনা সাযং মুদ্গযূষেণ পযসা বা সসর্পিষ্কং শালিষষ্টিকান্নমশ্নীযাত্, ত্রিবর্ষপ্রযোগাদস্য বর্ষশতমজরং বযস্তিষ্ঠতি, শ্রুতমবতিষ্ঠতে, সর্বামযাঃ প্রশাম্যন্তি, বিষমবিষং ভবতি গাত্রে, গাত্রমশ্মবত্ স্থিরীভবতি, অধৃষ্যো ভূতানাং ভবতি||৭৭|| ভবন্তি চাত্র- যথাঽমরাণামমৃতং যথা ভোগবতাং সুধা| তথাঽভবন্মহর্ষীণাং রসাযনবিধিঃ পুরা||৭৮|| ন জরাং ন চ দৌর্বল্যং নাতুর্যং নিধনং ন চ| জগ্মুর্বর্ষসহস্রাণি রসাযনপরাঃ পুরা||৭৯|| ন কেবলং দীর্ঘমিহাযুরশ্নুতে রসাযনং যো বিধিবন্নিষেবতে| গতিং স দেবর্ষিনিষেবিতাং শুভাং প্রপদ্যতে ব্রহ্ম তথেতি চাক্ষযম্ ||৮০||
हरीतक्यामलकबिभीतकहरिद्रास्थिराबलाविडङ्गामृतवल्लीविश्वभेषजमधुकपिप्पलीसोमवल्कसिद्धेन क्षीरसर्पिषा मधुशर्कराभ्यामपि च सन्नीयामलकस्वरसशतपरिपीतमामलकचूर्णमयश्चूर्णचतुर्भागसम्प्रयुक्तं पाणितलमात्रं प्रातः प्रातः प्राश्य यथोक्तेन विधिना सायं मुद्गयूषेण पयसा वा ससर्पिष्कं शालिषष्टिकान्नमश्नीयात्, त्रिवर्षप्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठति, श्रुतमवतिष्ठते, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, विषमविषं भवति गात्रे, गात्रमश्मवत् स्थिरीभवति, अधृष्यो भूतानां भवति||७७|| भवन्ति चात्र- यथाऽमराणाममृतं यथा भोगवतां सुधा| तथाऽभवन्महर्षीणां रसायनविधिः पुरा||७८|| न जरां न च दौर्बल्यं नातुर्यं निधनं न च| जग्मुर्वर्षसहस्राणि रसायनपराः पुरा||७९|| न केवलं दीर्घमिहायुरश्नुते रसायनं यो विधिवन्निषेवते| गतिं स देवर्षिनिषेवितां शुभां प्रपद्यते ब्रह्म तथेति चाक्षयम् ||८०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 20 (81) · Śloka 81
তত্র শ্লোকঃ- অভযামলকীযেঽস্মিন্ ষড্যোগাঃ পরিকীর্তিতাঃ| রসাযনানাং সিদ্ধানামাযুর্যৈরনুবর্ততে||৮১||
तत्र श्लोकः- अभयामलकीयेऽस्मिन् षड्योगाः परिकीर्तिताः| रसायनानां सिद्धानामायुर्यैरनुवर्तते||८१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana puShpikA · Śloka 1
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সাস্থানে রসাযনাধ্যাযেঽভযামলকীযো নাম রসাযনপাদঃ প্রথমঃ||১||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने रसायनाध्यायेऽभयामलकीयो नाम रसायनपादः प्रथमः||१||
🔊 Audio coming soon