Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বিসর্পচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो विसर्पचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বিসর্পচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो विसर्पचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-10) · Śloka 10
কৈলাসে কিন্নরাকীর্ণে বহুপ্রস্রবণৌষধে| পাদপৈর্বিবিধৈঃ স্নিগ্ধৈর্নিত্যং কুসুমসম্পদা||৩|| বমদ্ভির্মধুরান্ গন্ধান্ সর্বতঃ স্বভ্যলঙ্কৃতে| বিহরন্তং জিতাত্মানমাত্রেযমৃষিবন্দিতম্||৪|| মহর্ষিভিঃ পরিবৃতং সর্বভূতহিতে রতম্| অগ্নিবেশো গুরুং কালে বিনযাদিদমুক্তবান্||৫|| ভগবন্! দারুণং রোগমাশীবিষবিষোপমম্| বিসর্পন্তং শরীরেষু দেহিনামুপলক্ষযে||৬|| সহসৈব নরাস্তেন পরীতাঃ শীঘ্রকারিণা| বিনশ্যন্ত্যনুপক্রান্তাস্তত্র নঃ সংশযো মহান্||৭|| স নাম্না কেন বিজ্ঞেযঃ সঞ্জ্ঞিতঃ কেন হেতুনা| কতিভেদঃ কিযদ্ধাতুঃ কিন্নিদানঃ কিমাশ্রযঃ||৮|| সুখসাধ্যঃ কৃচ্ছ্রসাধ্যো জ্ঞেযো যশ্চানুপক্রমঃ| কথং কৈর্লক্ষণৈঃ কিং চ ভগবন্! তস্য ভেষজম্||৯|| তদগ্নিবেশস্য বচঃ শ্রুত্বাঽঽত্রেযঃ পুনর্বসুঃ| যথাবদখিলং সর্বং প্রোবাচ মুনিসত্তমঃ||১০||
कैलासे किन्नराकीर्णे बहुप्रस्रवणौषधे| पादपैर्विविधैः स्निग्धैर्नित्यं कुसुमसम्पदा||३|| वमद्भिर्मधुरान् गन्धान् सर्वतः स्वभ्यलङ्कृते| विहरन्तं जितात्मानमात्रेयमृषिवन्दितम्||४|| महर्षिभिः परिवृतं सर्वभूतहिते रतम्| अग्निवेशो गुरुं काले विनयादिदमुक्तवान्||५|| भगवन्! दारुणं रोगमाशीविषविषोपमम्| विसर्पन्तं शरीरेषु देहिनामुपलक्षये||६|| सहसैव नरास्तेन परीताः शीघ्रकारिणा| विनश्यन्त्यनुपक्रान्तास्तत्र नः संशयो महान्||७|| स नाम्ना केन विज्ञेयः सञ्ज्ञितः केन हेतुना| कतिभेदः कियद्धातुः किन्निदानः किमाश्रयः||८|| सुखसाध्यः कृच्छ्रसाध्यो ज्ञेयो यश्चानुपक्रमः| कथं कैर्लक्षणैः किं च भगवन्! तस्य भेषजम्||९|| तदग्निवेशस्य वचः श्रुत्वाऽऽत्रेयः पुनर्वसुः| यथावदखिलं सर्वं प्रोवाच मुनिसत्तमः||१०||
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Adhikarana 3 (11) · Śloka 11
বিবিধং সর্পতি যতো বিসর্পস্তেন স স্মৃতঃ| পরিসর্পোঽথবা নাম্না সর্বতঃ পরিসর্পণাত্||১১||
विविधं सर्पति यतो विसर्पस्तेन स स्मृतः| परिसर्पोऽथवा नाम्ना सर्वतः परिसर्पणात्||११||
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Adhikarana 4 (12-14) · Śloka 14
স চ সপ্তবিধো দোষৈর্বিজ্ঞেযঃ সপ্তধাতুকঃ| পৃথক্ ত্রযস্ত্রিভিশ্চৈকো বিসর্পো দ্বন্দ্বজাস্ত্রযঃ||১২|| বাতিকঃ পৈত্তিকশ্চৈব কফজঃ সান্নিপাতিকঃ| চত্বার এতে বিসর্পা বক্ষ্যন্তে দ্বন্দ্বজাস্ত্রযঃ||১৩|| আগ্নেযো বাতপিত্তাভ্যাং গ্রন্থ্যাখ্যঃ কফবাতজঃ| যস্তু কর্দমকো ঘোরঃ স পিত্তকফসম্ভবঃ||১৪||
स च सप्तविधो दोषैर्विज्ञेयः सप्तधातुकः| पृथक् त्रयस्त्रिभिश्चैको विसर्पो द्वन्द्वजास्त्रयः||१२|| वातिकः पैत्तिकश्चैव कफजः सान्निपातिकः| चत्वार एते विसर्पा वक्ष्यन्ते द्वन्द्वजास्त्रयः||१३|| आग्नेयो वातपित्ताभ्यां ग्रन्थ्याख्यः कफवातजः| यस्तु कर्दमको घोरः स पित्तकफसम्भवः||१४||
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Adhikarana 5 (15) · Śloka 15
রক্তং লসীকা ত্বঙ্মাংসং দূষ্যং দোষাস্ত্রযো মলাঃ| বিসর্পাণাং সমুত্পত্তৌ বিজ্ঞেযাঃ সপ্ত ধাতবঃ||১৫||
रक्तं लसीका त्वङ्मांसं दूष्यं दोषास्त्रयो मलाः| विसर्पाणां समुत्पत्तौ विज्ञेयाः सप्त धातवः||१५||
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Adhikarana 6 (16-22) · Śloka 22
লবণাম্লকটূষ্ণানাং রসানামতিসেবনাত্| দধ্যম্লমস্তুশুক্তানাং সুরাসৌবীরকস্য চ||১৬|| ব্যাপন্নবহুমদ্যোষ্ণরাগষাডবসেবনাত্| শাকানাং হরিতানাং চ সেবনাচ্চ বিদাহিনাম্||১৭|| কূর্চিকানাং কিলাটানাং সেবনান্মন্দকস্য চ| দধ্নঃ শাণ্ডাকিপূর্বাণামাসুতানাং চ সেবনাত্||১৮|| তিলমাষকুলত্থানাং তৈলানাং পৈষ্টিকস্য চ| গ্রাম্যানূপৌদকানাং চ মাংসানাং লশুনস্য চ||১৯|| প্রক্লিন্নানামসাত্ম্যানাং বিরুদ্ধানাং চ সেবনাত্| অত্যাদানাদ্দিবাস্বপ্নাদজীর্ণাধ্যশনাত্ ক্ষতাত্||২০|| ক্ষতবন্ধপ্রপতনাদ্ধর্মকর্মাতিসেবনাত্ | বিষবাতাগ্নিদোষাচ্চ বিসর্পাণাং সমুদ্ভবঃ||২১|| এতৈর্নিদানৈর্ব্যামিশ্রৈঃ কুপিতা মারুতাদযঃ| দূষ্যান্ সন্দূষ্য রক্তাদীন্ বিসর্পন্ত্যহিতাশিনাম্||২২||
लवणाम्लकटूष्णानां रसानामतिसेवनात्| दध्यम्लमस्तुशुक्तानां सुरासौवीरकस्य च||१६|| व्यापन्नबहुमद्योष्णरागषाडवसेवनात्| शाकानां हरितानां च सेवनाच्च विदाहिनाम्||१७|| कूर्चिकानां किलाटानां सेवनान्मन्दकस्य च| दध्नः शाण्डाकिपूर्वाणामासुतानां च सेवनात्||१८|| तिलमाषकुलत्थानां तैलानां पैष्टिकस्य च| ग्राम्यानूपौदकानां च मांसानां लशुनस्य च||१९|| प्रक्लिन्नानामसात्म्यानां विरुद्धानां च सेवनात्| अत्यादानाद्दिवास्वप्नादजीर्णाध्यशनात् क्षतात्||२०|| क्षतबन्धप्रपतनाद्धर्मकर्मातिसेवनात् | विषवाताग्निदोषाच्च विसर्पाणां समुद्भवः||२१|| एतैर्निदानैर्व्यामिश्रैः कुपिता मारुतादयः| दूष्यान् सन्दूष्य रक्तादीन् विसर्पन्त्यहिताशिनाम्||२२||
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Adhikarana 7 (23-25) · Śloka 25
বহিঃশ্রিতঃ শ্রিতশ্চান্তস্তথা চোভযসংশ্রিতঃ| বিসর্পো বলমেতেষাং জ্ঞেযং গুরু যথোত্তরম্||২৩|| বহির্মার্গাশ্রিতং সাধ্যমসাধ্যমুভযাশ্রিতম্| বিসর্পং দারুণং বিদ্যাত্ সুকৃচ্ছ্রং ত্বন্তরাশ্রযম্||২৪|| অন্তঃপ্রকুপিতা দোষা বিসর্পন্ত্যন্তরাশ্রযে| বহির্বহিঃপ্রকুপিতাঃ সর্বত্রোভযসংশ্রিতাঃ||২৫||
बहिःश्रितः श्रितश्चान्तस्तथा चोभयसंश्रितः| विसर्पो बलमेतेषां ज्ञेयं गुरु यथोत्तरम्||२३|| बहिर्मार्गाश्रितं साध्यमसाध्यमुभयाश्रितम्| विसर्पं दारुणं विद्यात् सुकृच्छ्रं त्वन्तराश्रयम्||२४|| अन्तःप्रकुपिता दोषा विसर्पन्त्यन्तराश्रये| बहिर्बहिःप्रकुपिताः सर्वत्रोभयसंश्रिताः||२५||
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Adhikarana 8 (26-27) · Śloka 27
মর্মোপঘাতাত্ সম্মোহাদযনানাং বিঘট্টনাত্| তৃষ্ণাতিযোগাদ্বেগানাং বিষমাণাং প্রবর্তনাত্||২৬|| বিদ্যাদ্বিসর্পমন্তর্জমাশু চাগ্নিবলক্ষযাত্| অতো বিপর্যযাদ্বাহ্যমন্যৈর্বিদ্যাত্ স্বলক্ষণৈঃ||২৭||
मर्मोपघातात् सम्मोहादयनानां विघट्टनात्| तृष्णातियोगाद्वेगानां विषमाणां प्रवर्तनात्||२६|| विद्याद्विसर्पमन्तर्जमाशु चाग्निबलक्षयात्| अतो विपर्ययाद्बाह्यमन्यैर्विद्यात् स्वलक्षणैः||२७||
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Adhikarana 9 (28) · Śloka 28
যস্য সর্বাণি লিঙ্গানি বলবদ্যস্য কারণম্| যস্য চোপদ্রবাঃ কষ্টা মর্মগো যশ্চ হন্তি সঃ||২৮||
यस्य सर्वाणि लिङ्गानि बलवद्यस्य कारणम्| यस्य चोपद्रवाः कष्टा मर्मगो यश्च हन्ति सः||२८||
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Adhikarana 10 (29-30) · Śloka 30
রূক্ষোষ্ণৈঃ কেবলো বাযুঃ পূরণৈর্বা সমাবৃতঃ| প্রদুষ্টো দূষযন্ দূষ্যান্ বিসর্পতি যথাবলম্||২৯|| তস্য রূপাণি- ভ্রমদবথুপিপাসানিস্তোদশূলাঙ্গমর্দোদ্বেষ্টনকম্পজ্বরতমক- কাসাস্থিসন্ধিভেদবিশ্লেষণবেপনারোচকাবিপাকাশ্চক্ষুষোরাকুলত্বমস্রাগমনং পিপীলিকাসঞ্চার ইব চাঙ্গেষু, যস্মিংশ্চাবকাশে বিসর্পো বিসর্পতি সোঽবকাশঃ শ্যাবারুণাভাসঃ শ্বযথুমান্ নিস্তোদভেদশূলাযামসঙ্কোচহর্ষস্ফুরণৈরতিমাত্রং প্রপীড্যতে, অনুপক্রান্তশ্চোপচীযতে শীঘ্রভেদৈঃ স্ফোটকৈস্তনুভিররুণাভৈঃ শ্যাবৈর্বা তনুবিশদারুণাল্পাস্রাবৈঃ, বিবদ্ধবাতমূত্রপুরীষশ্চ ভবতি, নিদানোক্তানি চাস্য নোপশেরতে বিপরীতানি চোপশেরত ইতি বাতবিসর্পঃ||৩০||
रूक्षोष्णैः केवलो वायुः पूरणैर्वा समावृतः| प्रदुष्टो दूषयन् दूष्यान् विसर्पति यथाबलम्||२९|| तस्य रूपाणि- भ्रमदवथुपिपासानिस्तोदशूलाङ्गमर्दोद्वेष्टनकम्पज्वरतमक- कासास्थिसन्धिभेदविश्लेषणवेपनारोचकाविपाकाश्चक्षुषोराकुलत्वमस्रागमनं पिपीलिकासञ्चार इव चाङ्गेषु, यस्मिंश्चावकाशे विसर्पो विसर्पति सोऽवकाशः श्यावारुणाभासः श्वयथुमान् निस्तोदभेदशूलायामसङ्कोचहर्षस्फुरणैरतिमात्रं प्रपीड्यते, अनुपक्रान्तश्चोपचीयते शीघ्रभेदैः स्फोटकैस्तनुभिररुणाभैः श्यावैर्वा तनुविशदारुणाल्पास्रावैः, विबद्धवातमूत्रपुरीषश्च भवति, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते विपरीतानि चोपशेरत इति वातविसर्पः||३०||
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Adhikarana 11 (31-32) · Śloka 32
পিত্তমুষ্ণোপচারেণ বিদাহ্যম্লাশনৈশ্চিতম্| দূষ্যান্ সন্দূষ্য ধমনীঃ পূরযন্ বৈ বিসর্পতি||৩১|| তস্য রূপাণি- জ্বরস্তৃষ্ণা মূর্চ্ছা মোহশ্ছর্দিররোচকোঽঙ্গভেদঃ স্বেদোঽতিমাত্রমন্তর্দাহঃ প্রলাপঃ শিরোরুক্ চক্ষুষোরাকুলত্বমস্বপ্নমরতির্ভ্রমঃ শীতবাতবারিতর্ষোঽতিমাত্রং হরিতহারিদ্রনেত্রমূত্রবর্চস্ত্বং হরিতহারিদ্ররূপদর্শনং চ, যস্মিংশ্চাবকাশে বিসর্পোঽনুসর্পতি সোঽবকাশস্তাম্রহরিতহারিদ্রনীলকৃষ্ণরক্তানাং বর্ণানামন্যতমং পুষ্যতি, সোত্সেধৈশ্চাতিমাত্রং দাহসম্ভেদনপরীতৈঃ স্ফোটকৈরুপচীযতে তুল্যবর্ণাস্রাবৈশ্চিরপাকৈশ্চ, নিদানোক্তানি চাস্য নোপশেরতে বিপরীতানি চোপশেরত ইতি পিত্তবিসর্পঃ||৩২||
पित्तमुष्णोपचारेण विदाह्यम्लाशनैश्चितम्| दूष्यान् सन्दूष्य धमनीः पूरयन् वै विसर्पति||३१|| तस्य रूपाणि- ज्वरस्तृष्णा मूर्च्छा मोहश्छर्दिररोचकोऽङ्गभेदः स्वेदोऽतिमात्रमन्तर्दाहः प्रलापः शिरोरुक् चक्षुषोराकुलत्वमस्वप्नमरतिर्भ्रमः शीतवातवारितर्षोऽतिमात्रं हरितहारिद्रनेत्रमूत्रवर्चस्त्वं हरितहारिद्ररूपदर्शनं च, यस्मिंश्चावकाशे विसर्पोऽनुसर्पति सोऽवकाशस्ताम्रहरितहारिद्रनीलकृष्णरक्तानां वर्णानामन्यतमं पुष्यति, सोत्सेधैश्चातिमात्रं दाहसम्भेदनपरीतैः स्फोटकैरुपचीयते तुल्यवर्णास्रावैश्चिरपाकैश्च, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते विपरीतानि चोपशेरत इति पित्तविसर्पः||३२||
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Adhikarana 12 (33-34) · Śloka 34
স্বাদ্বম্ললবণস্নিগ্ধগুর্বন্নস্বপ্নসঞ্চিতঃ| কফঃ সন্দূষযন্ দূষ্যান্ কৃচ্ছ্রমঙ্গে বিসর্পতি||৩৩|| তস্য রূপাণি- শীতকঃ শীতজ্বরো গৌরবং নিদ্রা তন্দ্রাঽরোচকো মধুরাস্যত্বমাস্যোপলেপো নিষ্ঠীবিকা ছর্দিরালস্যং স্তৈমিত্যমগ্নিনাশো দৌর্বল্যং চ, যস্মিংশ্চাবকাশে বিসর্পোঽনুসর্পতি সোঽবকাশঃ শ্বযথুমান্ পাণ্ডুর্নাতিরক্তঃ স্নেহসুপ্তিস্তম্ভগৌরবৈরন্বিতোঽল্পবেদনঃ কৃচ্ছ্রপাকৈশ্চিরকারিভির্বহুলত্বগুপলেপৈঃ স্ফোটঃ শ্বেতপাণ্ডুভিরনুবধ্যতে, প্রভিন্নস্তু শ্বেতং পিচ্ছিলং তন্তুমদ্ধনমনুবদ্ধং স্নিগ্ধমাস্রাবং স্রবতি, ঊর্ধ্বং চ গুরুভিঃ স্থিরৈর্জালাবততৈঃ স্নিগ্ধৈর্বহুলত্বগুপলেপৈর্ব্রণৈরনুবধ্যতেঽনুষঙ্গী চ ভবতি, শ্বেতনখনযনবদনত্বঙ্মূত্রবর্চস্ত্বং, নিদানোক্তানি চাস্য নোপশেরতে বিপরীতানি চোপশেরত ইতি শ্লেষ্মবিসর্পঃ||৩৪||
स्वाद्वम्ललवणस्निग्धगुर्वन्नस्वप्नसञ्चितः| कफः सन्दूषयन् दूष्यान् कृच्छ्रमङ्गे विसर्पति||३३|| तस्य रूपाणि- शीतकः शीतज्वरो गौरवं निद्रा तन्द्राऽरोचको मधुरास्यत्वमास्योपलेपो निष्ठीविका छर्दिरालस्यं स्तैमित्यमग्निनाशो दौर्बल्यं च, यस्मिंश्चावकाशे विसर्पोऽनुसर्पति सोऽवकाशः श्वयथुमान् पाण्डुर्नातिरक्तः स्नेहसुप्तिस्तम्भगौरवैरन्वितोऽल्पवेदनः कृच्छ्रपाकैश्चिरकारिभिर्बहुलत्वगुपलेपैः स्फोटः श्वेतपाण्डुभिरनुबध्यते, प्रभिन्नस्तु श्वेतं पिच्छिलं तन्तुमद्धनमनुबद्धं स्निग्धमास्रावं स्रवति, ऊर्ध्वं च गुरुभिः स्थिरैर्जालावततैः स्निग्धैर्बहुलत्वगुपलेपैर्व्रणैरनुबध्यतेऽनुषङ्गी च भवति, श्वेतनखनयनवदनत्वङ्मूत्रवर्चस्त्वं, निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते विपरीतानि चोपशेरत इति श्लेष्मविसर्पः||३४||
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Adhikarana 13 (35-36) · Śloka 36
বাতপিত্তং প্রকুপিতমতিমাত্রং স্বহেতুভিঃ| পরস্পরং লব্ধবলং দহদ্গাত্রং বিসর্পতি||৩৫|| তদুপতাপাদাতুরঃ সর্বশরীরমঙ্গারৈরিবাকীর্যমাণং মন্যতে, ছর্দ্যতীসারমূর্চ্ছাদাহমোহজ্বরতমকারোচকাস্থিসন্ধিভেদতৃষ্ণাবিপাকাঙ্গভেদাদিভিশ্চাভিভূযতে, যং যং চাবকাশং বিসর্পোঽনুসর্পতি সোঽবকাশঃ শান্তাঙ্গারপ্রকাশোঽতিরক্তো বা ভবতি, অগ্নিদগ্ধপ্রকারৈশ্চ স্ফোটৈরুপচীযতে, স শীঘ্রগত্বাদাশ্বেব মর্মানুসারী ভবতি, মর্মণি চোপতপ্তে পবনোঽতিবলো ভিনত্ত্যঙ্গান্যতিমাত্রং প্রমোহযতি সঞ্জ্ঞাং, হিক্কাশ্বাসৌ জনযতি, নাশযতি নিদ্রাং, স নষ্টনিদ্রঃ প্রমূঢসঞ্জ্ঞো ব্যথিতচেতা ন ক্বচন সুখমুপলভতে, অরতিপরীতঃ স্থানাদাসনাচ্ছয্যাং ক্রান্তুমিচ্ছতি, ক্লিষ্টভূযিষ্ঠশ্চাশু নিদ্রাং ভজতি, দুর্বলো দুঃখপ্রবোধশ্চ ভবতি; তমেবংবিধমগ্নিবিসর্পপরীতমচিকিত্স্যং বিদ্যাত্||৩৬||
वातपित्तं प्रकुपितमतिमात्रं स्वहेतुभिः| परस्परं लब्धबलं दहद्गात्रं विसर्पति||३५|| तदुपतापादातुरः सर्वशरीरमङ्गारैरिवाकीर्यमाणं मन्यते, छर्द्यतीसारमूर्च्छादाहमोहज्वरतमकारोचकास्थिसन्धिभेदतृष्णाविपाकाङ्गभेदादिभिश्चाभिभूयते, यं यं चावकाशं विसर्पोऽनुसर्पति सोऽवकाशः शान्ताङ्गारप्रकाशोऽतिरक्तो वा भवति, अग्निदग्धप्रकारैश्च स्फोटैरुपचीयते, स शीघ्रगत्वादाश्वेव मर्मानुसारी भवति, मर्मणि चोपतप्ते पवनोऽतिबलो भिनत्त्यङ्गान्यतिमात्रं प्रमोहयति सञ्ज्ञां, हिक्काश्वासौ जनयति, नाशयति निद्रां, स नष्टनिद्रः प्रमूढसञ्ज्ञो व्यथितचेता न क्वचन सुखमुपलभते, अरतिपरीतः स्थानादासनाच्छय्यां क्रान्तुमिच्छति, क्लिष्टभूयिष्ठश्चाशु निद्रां भजति, दुर्बलो दुःखप्रबोधश्च भवति; तमेवंविधमग्निविसर्पपरीतमचिकित्स्यं विद्यात्||३६||
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Adhikarana 14 (37-38) · Śloka 38
কফপিত্তং প্রকুপিত্তং বলবত্ স্বেন হেতুনা| বিসর্পত্যেকদেশে তু প্রক্লেদযতি দেহিনম্||৩৭|| তদ্বিকারাঃ- শীতজ্বরঃ শিরোগুরুত্বং দাহঃ স্তৈমিত্যমঙ্গাবসদনং নিদ্রা তন্দ্রা মোহোঽন্নদ্বেষঃ প্রলাপোঽগ্নিনাশো দৌর্বল্যমস্থিভেদো মূর্চ্ছা পিপাসা স্রোতসাং প্রলেপো জাড্যমিন্দ্রিযাণাং প্রাযোপবেশনমঙ্গবিক্ষেপোঽঙ্গমর্দোঽরতিরৌত্সুক্যং চোপজাযতে, প্রাযশ্চামাশযে বিসর্পত্যলসক একদেশগ্রাহী চ, যস্মিংশ্চাবকাশে বিসর্পো বিসর্পতি সোঽবকাশো রক্তপীতপাণ্ডুপিডকাবকীর্ণ ইব মেচকাভঃ কালো মলিনঃ স্নিগ্ধো বহূষ্মা গুরুঃ স্তিমিতবেদনঃ শ্বযথুমান্ গম্ভীরপাকো নিরাস্রাবঃ শীঘ্রক্লেদঃ স্বিন্নক্লিন্নপূতিমাংসত্বক্ ক্রমেণাল্পরুক্ পরামৃষ্টোঽবদীর্যতে কর্দম ইবাবপীডিতোঽন্তরং প্রযচ্ছত্যুপক্লিন্নপূতিমাংসত্যাগী সিরাস্নাযুসন্দর্শী কুণপগন্ধী চ ভবতি সঞ্জ্ঞাস্মৃতিহন্তা চ; তং কর্দমবিসর্পপরীতমচিকিত্স্যং বিদ্যাত্||৩৮||
कफपित्तं प्रकुपित्तं बलवत् स्वेन हेतुना| विसर्पत्येकदेशे तु प्रक्लेदयति देहिनम्||३७|| तद्विकाराः- शीतज्वरः शिरोगुरुत्वं दाहः स्तैमित्यमङ्गावसदनं निद्रा तन्द्रा मोहोऽन्नद्वेषः प्रलापोऽग्निनाशो दौर्बल्यमस्थिभेदो मूर्च्छा पिपासा स्रोतसां प्रलेपो जाड्यमिन्द्रियाणां प्रायोपवेशनमङ्गविक्षेपोऽङ्गमर्दोऽरतिरौत्सुक्यं चोपजायते, प्रायश्चामाशये विसर्पत्यलसक एकदेशग्राही च, यस्मिंश्चावकाशे विसर्पो विसर्पति सोऽवकाशो रक्तपीतपाण्डुपिडकावकीर्ण इव मेचकाभः कालो मलिनः स्निग्धो बहूष्मा गुरुः स्तिमितवेदनः श्वयथुमान् गम्भीरपाको निरास्रावः शीघ्रक्लेदः स्विन्नक्लिन्नपूतिमांसत्वक् क्रमेणाल्परुक् परामृष्टोऽवदीर्यते कर्दम इवावपीडितोऽन्तरं प्रयच्छत्युपक्लिन्नपूतिमांसत्यागी सिरास्नायुसन्दर्शी कुणपगन्धी च भवति सञ्ज्ञास्मृतिहन्ता च; तं कर्दमविसर्पपरीतमचिकित्स्यं विद्यात्||३८||
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Adhikarana 15 (39) · Śloka 39
স্থিরগুরুকঠিনমধুরশীতস্নিগ্ধান্নপানাভিষ্যন্দিসেবিনামব্যাযামাদিসেবিনামপ্রতিকর্মশীলানাং শ্লেষ্মা বাযুশ্চ প্রকোপমাপদ্যতে, তাবুভৌ দুষ্টপ্রবৃদ্ধাবতিবলৌ প্রদূষ্য দূষ্যান্ বিসর্পায কল্পেতে; তত্র বাযুঃ শ্লেষ্মণা বিবদ্ধমার্গস্তমেব শ্লেষ্মাণমনেকধা ভিন্দন্ ক্রমেণ গ্রন্থিমালাং কৃচ্ছ্রপাকসাধ্যাং কফাশযে সঞ্জনযতি, উত্সন্নরক্তস্য বা প্রদূষ্য রক্তং সিরাস্নাযুমাংসত্বগাশ্রিতং গ্রন্থীনাং মালাং কুরুতে তীব্ররুজানাং স্থূলানামণূনাং বা দীর্ঘবৃত্তরক্তানাং, তদুপতাপাজ্জ্বরাতিসারকাসহিক্কাশ্বাসশোষ- প্রমোহবৈবর্ণ্যারোচকাবিপাকপ্রসেকচ্ছর্দির্মূর্চ্ছাঙ্গভঙ্গনিদ্রারতিসদনাদ্যাঃ প্রাদুর্ভবন্ত্যুপদ্রবাঃ; স এতৈরুপদ্রুতঃ সর্বকর্মণাং বিষযমতিপতিতো বিবর্জনীযো ভবতীতি গ্রন্থিবিসর্পঃ||৩৯||
स्थिरगुरुकठिनमधुरशीतस्निग्धान्नपानाभिष्यन्दिसेविनामव्यायामादिसेविनामप्रतिकर्मशीलानां श्लेष्मा वायुश्च प्रकोपमापद्यते, तावुभौ दुष्टप्रवृद्धावतिबलौ प्रदूष्य दूष्यान् विसर्पाय कल्पेते; तत्र वायुः श्लेष्मणा विबद्धमार्गस्तमेव श्लेष्माणमनेकधा भिन्दन् क्रमेण ग्रन्थिमालां कृच्छ्रपाकसाध्यां कफाशये सञ्जनयति, उत्सन्नरक्तस्य वा प्रदूष्य रक्तं सिरास्नायुमांसत्वगाश्रितं ग्रन्थीनां मालां कुरुते तीव्ररुजानां स्थूलानामणूनां वा दीर्घवृत्तरक्तानां, तदुपतापाज्ज्वरातिसारकासहिक्काश्वासशोष- प्रमोहवैवर्ण्यारोचकाविपाकप्रसेकच्छर्दिर्मूर्च्छाङ्गभङ्गनिद्रारतिसदनाद्याः प्रादुर्भवन्त्युपद्रवाः; स एतैरुपद्रुतः सर्वकर्मणां विषयमतिपतितो विवर्जनीयो भवतीति ग्रन्थिविसर्पः||३९||
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Adhikarana 16 (40) · Śloka 40
উপদ্রবস্তু খলু রোগোত্তরকালজো রোগাশ্রযো রোগ এব স্থূলোঽণুর্বা, রোগাত্ পশ্চাজ্জাযত ইত্যুপদ্রবসঞ্জ্ঞঃ| তত্র প্রধানো ব্যাধিঃ, ব্যাধের্গুণভূত উপদ্রবঃ, তস্য প্রাযঃ প্রধানপ্রশমে প্রশমো ভবতি| স তু পীডাকরতরো ভবতি পশ্চাদুত্পদ্যমানো ব্যাধিপরিক্লিষ্টশরীরত্বাত্; তস্মাদুপদ্রবং ত্বরমাণোঽভিবাধেত||৪০||
उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजो रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणुर्वा, रोगात् पश्चाज्जायत इत्युपद्रवसञ्ज्ञः| तत्र प्रधानो व्याधिः, व्याधेर्गुणभूत उपद्रवः, तस्य प्रायः प्रधानप्रशमे प्रशमो भवति| स तु पीडाकरतरो भवति पश्चादुत्पद्यमानो व्याधिपरिक्लिष्टशरीरत्वात्; तस्मादुपद्रवं त्वरमाणोऽभिबाधेत||४०||
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Adhikarana 17 (41) · Śloka 41
সর্বাযতনসমুত্থং সর্বলিঙ্গব্যাপিনং সর্বধাত্বনুসারিণমাশুকারিণং মহাত্যযিকমিতি সন্নিপাতবিসর্পমচিকিত্স্যং বিদ্যাত্||৪১||
सर्वायतनसमुत्थं सर्वलिङ्गव्यापिनं सर्वधात्वनुसारिणमाशुकारिणं महात्ययिकमिति सन्निपातविसर्पमचिकित्स्यं विद्यात्||४१||
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Adhikarana 18 (42) · Śloka 42
তত্র বাতপিত্তশ্লেষ্মনিমিত্তা বিসর্পাস্ত্রযঃ সাধ্যা ভবন্তি; অগ্নিকর্দমাখ্যৌ পুনরনুপসৃষ্টে মর্মণি অনুপগতে বা সিরাস্নাযুমাংসক্লেদে সাধারণক্রিযাভিরুভাবেবাভ্যস্যমানৌ প্রশান্তিমাপদ্যেযাতাম্, অনাদরোপক্রান্তঃ পুনস্তযোরন্যতরো হন্যাদ্দেহমাশ্বেবাশীবিষবত্; তথা গ্রন্থিবিসর্পমজাতোপদ্রবমারভেত চিকিত্সিতুম্, উপদ্রবোপদ্রুতং ত্বেনং পরিহরেত্; সন্নিপাতজং তু সর্বধাত্বনুসারিত্বাদাশুকারিত্বাদ্বিরুদ্ধোপক্রমত্বাচ্চাসাধ্যং বিদ্যাত্||৪২||
तत्र वातपित्तश्लेष्मनिमित्ता विसर्पास्त्रयः साध्या भवन्ति; अग्निकर्दमाख्यौ पुनरनुपसृष्टे मर्मणि अनुपगते वा सिरास्नायुमांसक्लेदे साधारणक्रियाभिरुभावेवाभ्यस्यमानौ प्रशान्तिमापद्येयाताम्, अनादरोपक्रान्तः पुनस्तयोरन्यतरो हन्याद्देहमाश्वेवाशीविषवत्; तथा ग्रन्थिविसर्पमजातोपद्रवमारभेत चिकित्सितुम्, उपद्रवोपद्रुतं त्वेनं परिहरेत्; सन्निपातजं तु सर्वधात्वनुसारित्वादाशुकारित्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चासाध्यं विद्यात्||४२||
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Adhikarana 19 (43-49) · Śloka 49
তত্র সাধ্যানাং সাধনমনুব্যাখ্যাস্যামঃ||৪৩|| লঙ্ঘনোল্লেখনে শস্তে তিক্তকানাং চ সেবনম্| কফস্থানগতে সামে রূক্ষশীতৈঃ প্রলেপযেত্||৪৪|| পিত্তস্থানগতেঽপ্যেতত্ সামে কুর্যাচ্চিকিত্সিতম্| শোণিতস্যাবসেকং চ বিরেকং চ বিশেষতঃ||৪৫|| মারুতাশযসম্ভূতেঽপ্যাদিতঃ স্যাদ্বিরূক্ষণম্| রক্তপিত্তান্বযেঽপ্যাদৌ স্নেহনং ন হিতং মতম্||৪৬|| বাতোল্বণে তিক্তঘৃতং পৈত্তিকে চ প্রশস্যতে| লঘুদোষে, মহাদোষে পৈত্তিকে স্যাদ্বিরেচনম্||৪৭|| ন ঘৃতং বহুদোষায দেযং যন্ন বিরেচযেত্| তেন দোষো হ্যুপষ্টব্ধস্ত্বঙ্মাংসরুধিরং পচেত্||৪৮|| তস্মাদ্বিরেকমেবাদৌ শস্তং বিদ্যাদ্বিসর্পিণঃ| রুধিরস্যাবসেকং চ তদ্ধ্যস্যাশ্রযসঞ্জ্ঞিতম্||৪৯||
तत्र साध्यानां साधनमनुव्याख्यास्यामः||४३|| लङ्घनोल्लेखने शस्ते तिक्तकानां च सेवनम्| कफस्थानगते सामे रूक्षशीतैः प्रलेपयेत्||४४|| पित्तस्थानगतेऽप्येतत् सामे कुर्याच्चिकित्सितम्| शोणितस्यावसेकं च विरेकं च विशेषतः||४५|| मारुताशयसम्भूतेऽप्यादितः स्याद्विरूक्षणम्| रक्तपित्तान्वयेऽप्यादौ स्नेहनं न हितं मतम्||४६|| वातोल्बणे तिक्तघृतं पैत्तिके च प्रशस्यते| लघुदोषे, महादोषे पैत्तिके स्याद्विरेचनम्||४७|| न घृतं बहुदोषाय देयं यन्न विरेचयेत्| तेन दोषो ह्युपष्टब्धस्त्वङ्मांसरुधिरं पचेत्||४८|| तस्माद्विरेकमेवादौ शस्तं विद्याद्विसर्पिणः| रुधिरस्यावसेकं च तद्ध्यस्याश्रयसञ्ज्ञितम्||४९||
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Adhikarana 20 (50-53) · Śloka 53
ইতি বীসর্পনুত্ প্রোক্তং সমাসেন চিকিত্সিতম্| এতদেব পুনঃ সর্বং ব্যাসতঃ সম্প্রবক্ষ্যতে||৫০|| মদনং মধুকং নিম্বং বত্সকস্য ফলানি চ| বমনং সম্প্রদাতব্যং বিসর্পে কফপিত্তজে||৫১|| পটোলপিচুমর্দাভ্যাং পিপ্পল্যা মদনেন চ| বিসর্পে বমনং শস্তং তথা চেন্দ্রযবৈঃ সহ||৫২|| যাংশ্চ যোগান্ প্রবক্ষ্যাভি কল্পেষু কফপিত্তিনাম্| বিসর্পিণাং প্রযোজ্যাস্তে দোষনির্হরণাঃ শিবাঃ||৫৩||
इति वीसर्पनुत् प्रोक्तं समासेन चिकित्सितम्| एतदेव पुनः सर्वं व्यासतः सम्प्रवक्ष्यते||५०|| मदनं मधुकं निम्बं वत्सकस्य फलानि च| वमनं सम्प्रदातव्यं विसर्पे कफपित्तजे||५१|| पटोलपिचुमर्दाभ्यां पिप्पल्या मदनेन च| विसर्पे वमनं शस्तं तथा चेन्द्रयवैः सह||५२|| यांश्च योगान् प्रवक्ष्याभि कल्पेषु कफपित्तिनाम्| विसर्पिणां प्रयोज्यास्ते दोषनिर्हरणाः शिवाः||५३||
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Adhikarana 21 (54-61) · Śloka 61
মুস্তনিম্বপটোলানাং চন্দনোত্পলযোরপি| সারিবামলকোশীরমুস্তানাং বা বিচক্ষণঃ||৫৪|| কষাযান্ পাযযেদ্বৈদ্যঃ সিদ্ধান্ বীসর্পনাশনান্| কিরাততিক্তকং লোধ্রং চন্দনং সদুরালভম্||৫৫|| নাগরং পদ্মকিঞ্জল্কমুত্পলং সবিভীতকম্| মধুকং নাগপুষ্পং চ দদ্যাদ্বীসর্পশান্তযে||৫৬|| প্রপৌণ্ডরীকং মধুকং পদ্মকিঞ্জল্কমুত্পলম্| নাগপুষ্পং চ লোধ্রং চ তেনৈব বিধিনা পিবেত্||৫৭|| দ্রাক্ষাং পর্পটকং শুণ্ঠীং গুডূচীং ধন্বযাসকম্| নিশাপর্যুষিতং দদ্যাত্তৃষ্ণাবীসর্পশান্তযে||৫৮|| পটোলং পিচুমর্দং চ দার্বীং কটুকরোহিণীম্| যষ্ট্যাহ্বাং ত্রাযমাণাং চ দদ্যাদ্বীসর্পশান্তযে||৫৯|| পটোলাদিকষাযং বা পিবেত্ত্রিফলযা সহ| মসূরবিদলৈর্যুক্তং ঘৃতমিশ্রং প্রদাপযেত্||৬০|| পটোলপত্রমুদ্গানাং রসমামলকস্য চ| পাযযেত ঘৃতোন্মিশ্রং নরং বীসর্পপীডিতম্||৬১||
मुस्तनिम्बपटोलानां चन्दनोत्पलयोरपि| सारिवामलकोशीरमुस्तानां वा विचक्षणः||५४|| कषायान् पाययेद्वैद्यः सिद्धान् वीसर्पनाशनान्| किराततिक्तकं लोध्रं चन्दनं सदुरालभम्||५५|| नागरं पद्मकिञ्जल्कमुत्पलं सबिभीतकम्| मधुकं नागपुष्पं च दद्याद्वीसर्पशान्तये||५६|| प्रपौण्डरीकं मधुकं पद्मकिञ्जल्कमुत्पलम्| नागपुष्पं च लोध्रं च तेनैव विधिना पिबेत्||५७|| द्राक्षां पर्पटकं शुण्ठीं गुडूचीं धन्वयासकम्| निशापर्युषितं दद्यात्तृष्णावीसर्पशान्तये||५८|| पटोलं पिचुमर्दं च दार्वीं कटुकरोहिणीम्| यष्ट्याह्वां त्रायमाणां च दद्याद्वीसर्पशान्तये||५९|| पटोलादिकषायं वा पिबेत्त्रिफलया सह| मसूरविदलैर्युक्तं घृतमिश्रं प्रदापयेत्||६०|| पटोलपत्रमुद्गानां रसमामलकस्य च| पाययेत घृतोन्मिश्रं नरं वीसर्पपीडितम्||६१||
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Adhikarana 22 (62-67) · Śloka 68
যচ্চ সর্পির্মহাতিক্তং পিত্তকুষ্ঠনিবর্হণম্| নির্দিষ্টং তদপি প্রাজ্ঞো দদ্যাদ্বীসর্পশান্তযে||৬২|| ত্রাযমাণাঘৃতং সিদ্ধং গৌল্মিকে যদুদাহৃতম্| বিসর্পাণাং প্রশান্ত্যর্থং দদ্যাত্তদপি বুদ্ধিমান্||৬৩|| ত্রিবৃচ্চূর্ণং সমালোড্য সর্পিষা পযসাঽপি বা| ঘর্মাম্বুনা বা সংযোজ্য মৃদ্বীকানাং রসেন বা||৬৪|| বিরেকার্থং প্রযোক্তব্যং সিদ্ধং বীসর্পনাশনম্| ত্রাযমাণাশৃতং বাঽপি পযো দদ্যাদ্বিরেচনম্||৬৫|| ত্রিফলারসসংযুক্তং সর্পিস্ত্রিবৃতযা সহ| প্রযোক্তব্যং বিরেকার্থং বিসর্পজ্বরনাশনম্||৬৬|| রসমামলকানাং বা ঘৃতমিশ্রং প্রদাপযেত্| স এব গুরুকোষ্ঠায ত্রিবৃচ্চূর্ণযুতো হিতঃ||৬৭|| দোষে কোষ্ঠগতে ভূয এতত্ কুর্যাচ্চিকিত্সিতম্|৬৮|
यच्च सर्पिर्महातिक्तं पित्तकुष्ठनिबर्हणम्| निर्दिष्टं तदपि प्राज्ञो दद्याद्वीसर्पशान्तये||६२|| त्रायमाणाघृतं सिद्धं गौल्मिके यदुदाहृतम्| विसर्पाणां प्रशान्त्यर्थं दद्यात्तदपि बुद्धिमान्||६३|| त्रिवृच्चूर्णं समालोड्य सर्पिषा पयसाऽपि वा| घर्माम्बुना वा संयोज्य मृद्वीकानां रसेन वा||६४|| विरेकार्थं प्रयोक्तव्यं सिद्धं वीसर्पनाशनम्| त्रायमाणाशृतं वाऽपि पयो दद्याद्विरेचनम्||६५|| त्रिफलारससंयुक्तं सर्पिस्त्रिवृतया सह| प्रयोक्तव्यं विरेकार्थं विसर्पज्वरनाशनम्||६६|| रसमामलकानां वा घृतमिश्रं प्रदापयेत्| स एव गुरुकोष्ठाय त्रिवृच्चूर्णयुतो हितः||६७|| दोषे कोष्ठगते भूय एतत् कुर्याच्चिकित्सितम्|६८|
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Adhikarana 23 (68-70) · Śloka 70
শাখাদুষ্টে তু রুধিরে রক্তমেবাদিতো হরেত্||৬৮|| ভিষগ্বাতান্বিতং রক্তং বিষাণেন বিনির্হরেত্| পিত্তান্বিতং জলৌকোভিঃ, কফান্বিতমলাবুভিঃ||৬৯|| যথাসন্নং বিকারস্য ব্যধযেদাশু বা সিরাম্| ত্বঙ্মাংসস্নাযুসঙ্ক্লেদো রক্তক্লেদাদ্ধি জাযতে||৭০||
शाखादुष्टे तु रुधिरे रक्तमेवादितो हरेत्||६८|| भिषग्वातान्वितं रक्तं विषाणेन विनिर्हरेत्| पित्तान्वितं जलौकोभिः, कफान्वितमलाबुभिः||६९|| यथासन्नं विकारस्य व्यधयेदाशु वा सिराम्| त्वङ्मांसस्नायुसङ्क्लेदो रक्तक्लेदाद्धि जायते||७०||
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Adhikarana 24 (71-97) · Śloka 98
অন্তঃশরীরে সংশুদ্ধে দোষে ত্বঙ্মাংসসংশ্রিতে| আদিতো বাঽল্পদোষাণাং ক্রিযা বাহ্যা প্রবক্ষ্যতে||৭১|| উদুম্বরত্বঙ্মধুকং পদ্মকিঞ্জল্কমুত্পলম্| নাগপুষ্পং প্রিযঙ্গুশ্চ প্রদেহঃ সঘৃতো হিতঃ||৭২|| ন্যগ্রোধপাদাস্তরুণাঃ কদলীগর্ভসংযুতাঃ| বিসগ্রন্থিশ্চ লেপঃ স্যাচ্ছতধৌতঘৃতাপ্লুতঃ||৭৩|| কালীযং মধুকং হেম বন্যং চন্দনপদ্মকৌ| এলা মৃণালং ফলিনী প্রলেপঃ স্যাদ্ধৃতাপ্লুতঃ||৭৪|| শাদ্বলং চ মৃণালং চ শঙ্খং চন্দনমুত্পলম্| বেতসস্য চ মূলানি প্রদেহঃ স্যাত্ সতণ্ডুলঃ||৭৫|| সারিবা পদ্মকিঞ্জল্কমুশীরং নীলমুত্পলম্| মঞ্জিষ্ঠা চন্দনং লোধ্রমভযা চ প্রলেপনম্||৭৬|| নলদং চ হরেণুশ্চ লোধ্রং মধুকপদ্মকৌ | দূর্বা সর্জরসশ্চৈব সঘৃতং স্যাত্ প্রলেপনম্||৭৭|| যাবকাঃ সক্তবশ্চৈব সর্পিষা সহ যোজিতাঃ| প্রদেহো মধুকং বীরা সঘৃতা যবসক্তবঃ||৭৮|| বলামুত্পলশালূকং বীরামগুরুচন্দনম্| কুর্যাদালেপনং বৈদ্যো মৃণালং চ বিসান্বিতম্||৭৯|| যবচূর্ণং সমধুকং সঘৃতং চ প্রলেপনম্| হরেণবো মসুরাশ্চ সমুদ্গাঃ শ্বেতশালযঃ||৮০|| পৃথক্ পৃথক্ প্রদেহাঃ স্যুঃ সর্বে বা সর্পিষা সহ| পদ্মিনীকর্দমঃ শীতো মৌক্তিকং পিষ্টমেব বা||৮১|| শঙ্খঃ প্রবালঃ শুক্তির্বা গৈরিকং বা ঘৃতাপ্লুতম্| (পৃথগেতে প্রদেহাশ্চ হিতা জ্ঞেযা বিসর্পিণাম্ )| প্রপৌণ্ডরীকং মধুকং বলা শালূকমুত্পলম্||৮২|| ন্যগ্রোধপত্রদুগ্ধীকে সঘৃতং স্যাত্ প্রলেপনম্| বিসানি চ মৃণালং চ সঘৃতাশ্চ কশেরুকাঃ||৮৩|| শতাবরীবিদার্যোশ্চ কন্দৌ ধৌতঘৃতাপ্লুতৌ| শৈবালং নলমূলানি গোজিহ্বা বৃষকর্ণিকা||৮৪|| ইন্দ্রাণিশাকং সঘৃতং শিরীষত্বগ্বলাঘৃতম্ | ন্যগ্রোধোদুম্বরপ্লক্ষবেতসাশ্বত্থপল্লবৈঃ||৮৫|| ত্বক্কল্কৈর্বহুসর্পির্ভিঃ শীতৈরালেপনং হিতম্| প্রদেহাঃ সর্ব এবৈতে বাতপিত্তোল্বণে শুভাঃ||৮৬|| সকফে তু প্রবক্ষ্যামি প্রদেহানপরান্ হিতান্| ত্রিফলাং পদ্মকোশীরং সমঙ্গাং করবীরকম্||৮৭|| নলমূলান্যনন্তাং চ প্রদেহমুপকল্পযেত্| খদিরং সপ্তপর্ণং চ মুস্তমারগ্বধং ধবম্||৮৮|| কুরণ্টকং দেবদারু দদ্যাদালেপনং ভিষক্| আরগ্বধস্য পত্রাণি ত্বচং শ্লেষ্মাতকস্য চ||৮৯|| ইন্দ্রাণিশাকং কাকাহ্বাং শিরীষকুসুমানি চ| শৈবালং নলমূলানি বীরাং গন্ধপ্রিযঙ্গুকাম্||৯০|| ত্রিফলাং মধুকং বীরাং শিরীষকুসুমানি চ| প্রপৌণ্ডরীকং হ্রীবেরং দার্বীত্বঙ্মধুকং বলাম্||৯১|| পৃথগালেপনং কুর্যাদ্দ্বন্দ্বশঃ সর্বশোঽপি বা| প্রদেহাঃ সর্ব এবৈতে দেযাঃ স্বল্পঘৃতাপ্লুতাঃ||৯২|| বাতপিত্তোল্বণে যে তু প্রদেহাস্তে ঘৃতাধিকাঃ| ঘৃতেন শতধৌতেন প্রদিহ্যাত্ কেবলেন বা||৯৩|| ঘৃতমণ্ডেন শীতেন পযসা মধুকাম্বুনা| পঞ্চবল্ককষাযেণ সেচযেচ্ছীতলেন বা||৯৪|| বাতাসৃক্পিত্তবহুলং বিসর্পং বহুশো ভিষক্| সেচনাস্তে প্রদেহা যে ত এব ঘৃতসাধনাঃ||৯৫|| তে চূর্ণযোগা বীসর্পব্রণানামবচূর্ণনাঃ| দূর্বাস্বরসসিদ্ধং চ ঘৃতং স্যাদ্ব্রণরোপণম্||৯৬|| দার্বীত্বঙ্মধুকং লোধ্রং কেশরং চাবচূর্ণনম্| পটোলঃ পিচুমর্দশ্চ ত্রিফলা মধুকোত্পলে||৯৭|| এতত্ প্রক্ষালনং সর্পির্ব্রণচূর্ণং প্রলেপনম্|৯৮|
अन्तःशरीरे संशुद्धे दोषे त्वङ्मांससंश्रिते| आदितो वाऽल्पदोषाणां क्रिया बाह्या प्रवक्ष्यते||७१|| उदुम्बरत्वङ्मधुकं पद्मकिञ्जल्कमुत्पलम्| नागपुष्पं प्रियङ्गुश्च प्रदेहः सघृतो हितः||७२|| न्यग्रोधपादास्तरुणाः कदलीगर्भसंयुताः| बिसग्रन्थिश्च लेपः स्याच्छतधौतघृताप्लुतः||७३|| कालीयं मधुकं हेम वन्यं चन्दनपद्मकौ| एला मृणालं फलिनी प्रलेपः स्याद्धृताप्लुतः||७४|| शाद्वलं च मृणालं च शङ्खं चन्दनमुत्पलम्| वेतसस्य च मूलानि प्रदेहः स्यात् सतण्डुलः||७५|| सारिवा पद्मकिञ्जल्कमुशीरं नीलमुत्पलम्| मञ्जिष्ठा चन्दनं लोध्रमभया च प्रलेपनम्||७६|| नलदं च हरेणुश्च लोध्रं मधुकपद्मकौ | दूर्वा सर्जरसश्चैव सघृतं स्यात् प्रलेपनम्||७७|| यावकाः सक्तवश्चैव सर्पिषा सह योजिताः| प्रदेहो मधुकं वीरा सघृता यवसक्तवः||७८|| बलामुत्पलशालूकं वीरामगुरुचन्दनम्| कुर्यादालेपनं वैद्यो मृणालं च बिसान्वितम्||७९|| यवचूर्णं समधुकं सघृतं च प्रलेपनम्| हरेणवो मसुराश्च समुद्गाः श्वेतशालयः||८०|| पृथक् पृथक् प्रदेहाः स्युः सर्वे वा सर्पिषा सह| पद्मिनीकर्दमः शीतो मौक्तिकं पिष्टमेव वा||८१|| शङ्खः प्रवालः शुक्तिर्वा गैरिकं वा घृताप्लुतम्| (पृथगेते प्रदेहाश्च हिता ज्ञेया विसर्पिणाम् )| प्रपौण्डरीकं मधुकं बला शालूकमुत्पलम्||८२|| न्यग्रोधपत्रदुग्धीके सघृतं स्यात् प्रलेपनम्| बिसानि च मृणालं च सघृताश्च कशेरुकाः||८३|| शतावरीविदार्योश्च कन्दौ धौतघृताप्लुतौ| शैवालं नलमूलानि गोजिह्वा वृषकर्णिका||८४|| इन्द्राणिशाकं सघृतं शिरीषत्वग्बलाघृतम् | न्यग्रोधोदुम्बरप्लक्षवेतसाश्वत्थपल्लवैः||८५|| त्वक्कल्कैर्बहुसर्पिर्भिः शीतैरालेपनं हितम्| प्रदेहाः सर्व एवैते वातपित्तोल्बणे शुभाः||८६|| सकफे तु प्रवक्ष्यामि प्रदेहानपरान् हितान्| त्रिफलां पद्मकोशीरं समङ्गां करवीरकम्||८७|| नलमूलान्यनन्तां च प्रदेहमुपकल्पयेत्| खदिरं सप्तपर्णं च मुस्तमारग्वधं धवम्||८८|| कुरण्टकं देवदारु दद्यादालेपनं भिषक्| आरग्वधस्य पत्राणि त्वचं श्लेष्मातकस्य च||८९|| इन्द्राणिशाकं काकाह्वां शिरीषकुसुमानि च| शैवालं नलमूलानि वीरां गन्धप्रियङ्गुकाम्||९०|| त्रिफलां मधुकं वीरां शिरीषकुसुमानि च| प्रपौण्डरीकं ह्रीबेरं दार्वीत्वङ्मधुकं बलाम्||९१|| पृथगालेपनं कुर्याद्द्वन्द्वशः सर्वशोऽपि वा| प्रदेहाः सर्व एवैते देयाः स्वल्पघृताप्लुताः||९२|| वातपित्तोल्बणे ये तु प्रदेहास्ते घृताधिकाः| घृतेन शतधौतेन प्रदिह्यात् केवलेन वा||९३|| घृतमण्डेन शीतेन पयसा मधुकाम्बुना| पञ्चवल्ककषायेण सेचयेच्छीतलेन वा||९४|| वातासृक्पित्तबहुलं विसर्पं बहुशो भिषक्| सेचनास्ते प्रदेहा ये त एव घृतसाधनाः||९५|| ते चूर्णयोगा वीसर्पव्रणानामवचूर्णनाः| दूर्वास्वरससिद्धं च घृतं स्याद्व्रणरोपणम्||९६|| दार्वीत्वङ्मधुकं लोध्रं केशरं चावचूर्णनम्| पटोलः पिचुमर्दश्च त्रिफला मधुकोत्पले||९७|| एतत् प्रक्षालनं सर्पिर्व्रणचूर्णं प्रलेपनम्|९८|
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Adhikarana 25 (98-107) · Śloka 107
প্রদেহাঃ সর্ব এবৈতে কর্তব্যাঃ সম্প্রসাদনাঃ ||৯৮|| ক্ষণে ক্ষণে প্রযোক্তব্যাঃ পূর্বমুদ্ধৃত্য লেপনম্| অধাবনোদ্ধৃতে পূর্বে প্রদেহা বহুশোঽঘনাঃ||৯৯|| দেযাঃ প্রদেহাঃ কফজে পর্যাধানোদ্ধৃতে ঘনাঃ| ত্রিভাগাঙ্গুষ্ঠমাত্রঃ স্যাত্ প্রলেপঃ কল্কপেষিতঃ||১০০|| নাতিস্নিগ্ধো ন রূক্ষশ্চ ন পিণ্ডো ন দ্রবঃ সমঃ| ন চ পর্যুষিতং লেপং কদাচিদবচারযেত্||১০১|| ন চ তেনৈব লেপেন পুনর্জাতু প্রলেপযেত্| ক্লেদবীসর্পশূলানি সোষ্ণাভাবাত্ প্রবর্তযেত্||১০২|| লেপো হ্যুপরি পট্টস্য কৃতঃ স্বেদযতি ব্রণম্| স্বেদজাঃ পিডকাস্তস্য কণ্ডূশ্চৈবোপজাযতে||১০৩|| উপর্যুপরি লেপস্য লেপো যদ্যবচার্যতে| তানেব দোষাঞ্জনযেত্ পট্টস্যোপরি যান্ কৃতঃ||১০৪|| অতিস্নিগ্ধোঽতিদ্রবশ্চ লেপো যদ্যবচার্যতে| ত্বচি ন শ্লিষ্যতে সম্যঙ্ন দোষং শমযত্যপি||১০৫|| তন্বালিপ্তং ন কুর্বীত সংশুষ্কো হ্যাপুটাযতে| ন চৌষধিরসো ব্যাধিং প্রাপ্নোত্যপি চ শুষ্যতি||১০৬|| তন্বালিপ্তেন যে দোষাস্তানেব জনযেদ্ভৃশম্| সংশুষ্কঃ পীডযেদ্ব্যাধিং নিঃস্নেহো হ্যবচারিতঃ||১০৭||
प्रदेहाः सर्व एवैते कर्तव्याः सम्प्रसादनाः ||९८|| क्षणे क्षणे प्रयोक्तव्याः पूर्वमुद्धृत्य लेपनम्| अधावनोद्धृते पूर्वे प्रदेहा बहुशोऽघनाः||९९|| देयाः प्रदेहाः कफजे पर्याधानोद्धृते घनाः| त्रिभागाङ्गुष्ठमात्रः स्यात् प्रलेपः कल्कपेषितः||१००|| नातिस्निग्धो न रूक्षश्च न पिण्डो न द्रवः समः| न च पर्युषितं लेपं कदाचिदवचारयेत्||१०१|| न च तेनैव लेपेन पुनर्जातु प्रलेपयेत्| क्लेदवीसर्पशूलानि सोष्णाभावात् प्रवर्तयेत्||१०२|| लेपो ह्युपरि पट्टस्य कृतः स्वेदयति व्रणम्| स्वेदजाः पिडकास्तस्य कण्डूश्चैवोपजायते||१०३|| उपर्युपरि लेपस्य लेपो यद्यवचार्यते| तानेव दोषाञ्जनयेत् पट्टस्योपरि यान् कृतः||१०४|| अतिस्निग्धोऽतिद्रवश्च लेपो यद्यवचार्यते| त्वचि न श्लिष्यते सम्यङ्न दोषं शमयत्यपि||१०५|| तन्वालिप्तं न कुर्वीत संशुष्को ह्यापुटायते| न चौषधिरसो व्याधिं प्राप्नोत्यपि च शुष्यति||१०६|| तन्वालिप्तेन ये दोषास्तानेव जनयेद्भृशम्| संशुष्कः पीडयेद्व्याधिं निःस्नेहो ह्यवचारितः||१०७||
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Adhikarana 26 (108-114) · Śloka 114
অন্নপানানি বক্ষ্যামি বিসর্পাণাং নিবৃত্তযে| লঙ্ঘিতেভ্যো হিতো মন্থো রূক্ষঃ সক্ষৌদ্রশর্করঃ||১০৮|| মধুরঃ কিঞ্চিদম্লো বা দাডিমামলকান্বিতঃ| সপরূষকমৃদ্বীকঃ সখর্জূরঃ শৃতাম্বুনা||১০৯|| তর্পণৈর্যবশালীনাং সস্নেহা চাবলেহিকা| জীর্ণে পুরাণশালীনাং যূষৈর্ভুঞ্জীত ভোজনম্||১১০|| মুদ্গান্মসূরাংশ্চণকান্ যূষার্থমুপকল্পযেত্| অনম্লান্ দাডিমাম্লান্ বা পটোলামলকৈঃ সহ||১১১|| জাঙ্গলানাং চ মাংসানাং রসাংস্তস্যোপকল্পযেত্| রূক্ষান্ পরূষকদ্রাক্ষাদাডিমামলকান্বিতান্||১১২|| রক্তাঃ শ্বেতা মহাহ্বাশ্চ শালযঃ ষষ্টিকৈঃ সহ| ভোজনার্থে প্রশস্যন্তে পুরাণাঃ সুপরিস্রুতাঃ||১১৩|| যবগোধূমশালীনাং সাত্ম্যান্যেব প্রদাপযেত্| যেষাং নাত্যুচিতঃ শালির্নরা যে চ কফাধিকাঃ||১১৪||
अन्नपानानि वक्ष्यामि विसर्पाणां निवृत्तये| लङ्घितेभ्यो हितो मन्थो रूक्षः सक्षौद्रशर्करः||१०८|| मधुरः किञ्चिदम्लो वा दाडिमामलकान्वितः| सपरूषकमृद्वीकः सखर्जूरः शृताम्बुना||१०९|| तर्पणैर्यवशालीनां सस्नेहा चावलेहिका| जीर्णे पुराणशालीनां यूषैर्भुञ्जीत भोजनम्||११०|| मुद्गान्मसूरांश्चणकान् यूषार्थमुपकल्पयेत्| अनम्लान् दाडिमाम्लान् वा पटोलामलकैः सह||१११|| जाङ्गलानां च मांसानां रसांस्तस्योपकल्पयेत्| रूक्षान् परूषकद्राक्षादाडिमामलकान्वितान्||११२|| रक्ताः श्वेता महाह्वाश्च शालयः षष्टिकैः सह| भोजनार्थे प्रशस्यन्ते पुराणाः सुपरिस्रुताः||११३|| यवगोधूमशालीनां सात्म्यान्येव प्रदापयेत्| येषां नात्युचितः शालिर्नरा ये च कफाधिकाः||११४||
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Adhikarana 27 (115) · Śloka 115
বিদাহীন্যন্নপানানি বিরুদ্ধং স্বপনং দিবা| ক্রোধব্যাযামসূর্যাগ্নিপ্রবাতাংশ্চ বিবর্জযেত্||১১৫||
विदाहीन्यन्नपानानि विरुद्धं स्वपनं दिवा| क्रोधव्यायामसूर्याग्निप्रवातांश्च विवर्जयेत्||११५||
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Adhikarana 28 (116-117) · Śloka 117
কুর্যাচ্চিকিত্সিতাদস্মাচ্ছীতপ্রাযাণি পৈত্তিকে| রূক্ষপ্রাযাণি কফজে স্নৈহিকান্যনিলাত্মকে||১১৬|| বাতপিত্তপ্রশমনমগ্নিবীসর্পণে হিতম্| কফপিত্তপ্রশমনং প্রাযঃ কর্দমসঞ্জ্ঞিতে||১১৭||
कुर्याच्चिकित्सितादस्माच्छीतप्रायाणि पैत्तिके| रूक्षप्रायाणि कफजे स्नैहिकान्यनिलात्मके||११६|| वातपित्तप्रशमनमग्निवीसर्पणे हितम्| कफपित्तप्रशमनं प्रायः कर्दमसञ्ज्ञिते||११७||
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Adhikarana 29 (118-138) · Śloka 138
রক্তপিত্তোত্তরং দৃষ্ট্বা গ্রন্থিবীসর্পমাদিতঃ| রূক্ষণৈর্লঙ্ঘনৈঃ সেকৈঃ প্রদেহৈঃ পাঞ্চবল্কলৈঃ||১১৮|| সিরামোক্ষৈর্জলৌকোভির্বমনৈঃ সবিরেচনৈঃ| ঘৃতৈঃ কষাযতিক্তৈশ্চ কালজ্ঞঃ সমুপাচরেত্||১১৯|| ঊর্ধ্বং চাধশ্চ শুদ্ধায রক্তে চাপ্যবসেচিতে| বাতশ্লেষ্মহরং কর্ম গ্রন্থিবীসর্পিণে হিতম্||১২০|| উত্কারিকাভিরুষ্ণাভিরুপনাহঃ প্রশস্যতে| স্নিগ্ধাভির্বেশবারৈর্বা গ্রন্থিবীসর্পশূলিনাম্||১২১|| দশমূলোপসিদ্ধেন তৈলেনোষ্ণেন সেচযেত্| কুষ্ঠতৈলেন চোষ্ণেন পাক্যক্ষারযুতেন চ||১২২|| গোমূত্রৈঃ পত্রনির্যূহৈরুষ্ণৈর্বা পরিষেচযেত্| সুখোষ্ণযা প্রদিহ্যাদ্বা পিষ্টযা চাশ্বগন্ধযা||১২৩|| শুষ্কমূলককল্কেন নক্তমালত্বচাঽপি বা| বিভীতকত্বচাং বাঽপি কল্কেনোষ্ণেন লেপযেত্||১২৪|| বলাং নাগবলাং পথ্যাং ভূর্জগ্রন্থিং বিভীতকম্| বংশপত্রাণ্যগ্নিমন্থং কুর্যাদ্গ্রন্থিপ্রলেপনম্||১২৫|| দন্তী চিত্রকমূলত্বক্ সুধার্কপযসী গুডঃ| ভল্লাতকাস্থি কাসীসং লেপো ভিন্দ্যাচ্ছিলামপি||১২৬|| বহির্মার্গাস্থিতং গ্রন্থিং কিং পুনঃ কফসম্ভবম্| দীর্ঘকালস্থিতং গ্রন্থিং ভিন্দ্যাদ্বা ভেষজৈরিমৈঃ||১২৭|| মূলকানাং কুলত্থানাং যূষৈঃ সক্ষারদাডিমৈঃ| গোধূমান্নৈর্যবান্নৈর্বা সসীধুমধুশর্করৈঃ||১২৮|| সক্ষৌদ্রৈর্বারুণীমণ্ডৈর্মাতুলুঙ্গরসান্বিতৈঃ| ত্রিফলাযাঃ প্রযোগৈশ্চ পিপ্পলীক্ষৌদ্রসংযুতৈঃ||১২৯|| মুস্তভল্লাতশক্তূনাং প্রযোগৈর্মাক্ষিকস্য চ| দেবদারুগুডূচ্যোশ্চ প্রযোগৈর্গিরিজস্য চ||১৩০|| ধূমৈর্বিরেকৈঃ শিরসঃ পূর্বোক্তৈর্গুল্মভেদনৈঃ| অযোলবণপাষাণহেমতাম্রপ্রপীডনৈঃ||১৩১|| আভিঃ ক্রিযাভিঃ সিদ্ধাভির্বিবিধাভির্বলী স্থিরঃ| গ্রন্থিঃ পাষাণকঠিনো যদা নৈবোপশাম্যতি||১৩২|| অথাস্য দাহঃ ক্ষারেণ শরৈর্হেম্নাঽথ বা হিতঃ| পাকিভিঃ পাচযিত্বা বা পাটযিত্বা সমুদ্ধরেত্||১৩৩|| মোক্ষযেদ্বহুশশ্চাস্য রক্তমুত্ক্লেশমাগতম্| পুনশ্চাপহৃতে রক্তে বাতশ্লেষ্মজিদৌষধম্||১৩৪|| ধূমো বিরেকঃ শিরসঃ স্বেদনং পরিমর্দনম্| অপ্রশাম্যতি দোষে চ পাচনং বা প্রশস্যতে||১৩৫|| প্রক্লিন্নং দাহপাকাভ্যাং ভিষক্ শোধনরোপণৈঃ| বাহ্যৈশ্চাভ্যন্তরৈশ্চৈব ব্রণবত্ সমুপাচরেত্||১৩৬|| কম্পিল্লকং বিডঙ্গানি দার্বীং কারঞ্জকং ফলম্| পিষ্ট্বা তৈলং বিপক্তব্যং গ্রন্থিব্রণচিকিত্সিতম্||১৩৭|| দ্বিব্রণীযোপদিষ্টেন কর্মণা চাপ্যুপাচরেত্| দেশকালবিভাগজ্ঞো ব্রণান্ বীসর্পজান্ বুধঃ||১৩৮|| ইতি গ্রন্থিবিসর্পচিকিত্সা|
रक्तपित्तोत्तरं दृष्ट्वा ग्रन्थिवीसर्पमादितः| रूक्षणैर्लङ्घनैः सेकैः प्रदेहैः पाञ्चवल्कलैः||११८|| सिरामोक्षैर्जलौकोभिर्वमनैः सविरेचनैः| घृतैः कषायतिक्तैश्च कालज्ञः समुपाचरेत्||११९|| ऊर्ध्वं चाधश्च शुद्धाय रक्ते चाप्यवसेचिते| वातश्लेष्महरं कर्म ग्रन्थिवीसर्पिणे हितम्||१२०|| उत्कारिकाभिरुष्णाभिरुपनाहः प्रशस्यते| स्निग्धाभिर्वेशवारैर्वा ग्रन्थिवीसर्पशूलिनाम्||१२१|| दशमूलोपसिद्धेन तैलेनोष्णेन सेचयेत्| कुष्ठतैलेन चोष्णेन पाक्यक्षारयुतेन च||१२२|| गोमूत्रैः पत्रनिर्यूहैरुष्णैर्वा परिषेचयेत्| सुखोष्णया प्रदिह्याद्वा पिष्टया चाश्वगन्धया||१२३|| शुष्कमूलककल्केन नक्तमालत्वचाऽपि वा| बिभीतकत्वचां वाऽपि कल्केनोष्णेन लेपयेत्||१२४|| बलां नागबलां पथ्यां भूर्जग्रन्थिं बिभीतकम्| वंशपत्राण्यग्निमन्थं कुर्याद्ग्रन्थिप्रलेपनम्||१२५|| दन्ती चित्रकमूलत्वक् सुधार्कपयसी गुडः| भल्लातकास्थि कासीसं लेपो भिन्द्याच्छिलामपि||१२६|| बहिर्मार्गास्थितं ग्रन्थिं किं पुनः कफसम्भवम्| दीर्घकालस्थितं ग्रन्थिं भिन्द्याद्वा भेषजैरिमैः||१२७|| मूलकानां कुलत्थानां यूषैः सक्षारदाडिमैः| गोधूमान्नैर्यवान्नैर्वा ससीधुमधुशर्करैः||१२८|| सक्षौद्रैर्वारुणीमण्डैर्मातुलुङ्गरसान्वितैः| त्रिफलायाः प्रयोगैश्च पिप्पलीक्षौद्रसंयुतैः||१२९|| मुस्तभल्लातशक्तूनां प्रयोगैर्माक्षिकस्य च| देवदारुगुडूच्योश्च प्रयोगैर्गिरिजस्य च||१३०|| धूमैर्विरेकैः शिरसः पूर्वोक्तैर्गुल्मभेदनैः| अयोलवणपाषाणहेमताम्रप्रपीडनैः||१३१|| आभिः क्रियाभिः सिद्धाभिर्विविधाभिर्बली स्थिरः| ग्रन्थिः पाषाणकठिनो यदा नैवोपशाम्यति||१३२|| अथास्य दाहः क्षारेण शरैर्हेम्नाऽथ वा हितः| पाकिभिः पाचयित्वा वा पाटयित्वा समुद्धरेत्||१३३|| मोक्षयेद्बहुशश्चास्य रक्तमुत्क्लेशमागतम्| पुनश्चापहृते रक्ते वातश्लेष्मजिदौषधम्||१३४|| धूमो विरेकः शिरसः स्वेदनं परिमर्दनम्| अप्रशाम्यति दोषे च पाचनं वा प्रशस्यते||१३५|| प्रक्लिन्नं दाहपाकाभ्यां भिषक् शोधनरोपणैः| बाह्यैश्चाभ्यन्तरैश्चैव व्रणवत् समुपाचरेत्||१३६|| कम्पिल्लकं विडङ्गानि दार्वीं कारञ्जकं फलम्| पिष्ट्वा तैलं विपक्तव्यं ग्रन्थिव्रणचिकित्सितम्||१३७|| द्विव्रणीयोपदिष्टेन कर्मणा चाप्युपाचरेत्| देशकालविभागज्ञो व्रणान् वीसर्पजान् बुधः||१३८|| इति ग्रन्थिविसर्पचिकित्सा|
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Adhikarana 30 (139-140) · Śloka 140
য এব বিধিরুদ্দিষ্টো গ্রন্থীনাং বিনিবৃত্তযে| স এব গলগণ্ডানাং কফজানাং নিবৃত্তযে||১৩৯|| গলগণ্ডাস্তু বাতোত্থা যে কফানুগতা নৃণাম্| ঘৃতক্ষীরকষাযাণামভ্যাসান্ন ভবন্তি তে||১৪০||
य एव विधिरुद्दिष्टो ग्रन्थीनां विनिवृत्तये| स एव गलगण्डानां कफजानां निवृत्तये||१३९|| गलगण्डास्तु वातोत्था ये कफानुगता नृणाम्| घृतक्षीरकषायाणामभ्यासान्न भवन्ति ते||१४०||
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Adhikarana 31 (141-143) · Śloka 143
যানীহোক্তানি কর্মাণি বিসর্পাণাং নিবৃত্তযে| একতস্তানি সর্বাণি রক্তমোক্ষণমেকতঃ||১৪১|| বিসর্পো ন হ্যসংসৃষ্টো রক্তপিত্তেন জাযতে| তস্মাত্ সাধারণং সর্বমুক্তমেতচ্চিকিত্সিতম্||১৪২|| বিশেষো দোষবৈষম্যান্ন চ নোক্তঃ সমাসতঃ| সমাসব্যাসনির্দিষ্টাং ক্রিযাং বিদ্বানুপাচরেত্||১৪৩||
यानीहोक्तानि कर्माणि विसर्पाणां निवृत्तये| एकतस्तानि सर्वाणि रक्तमोक्षणमेकतः||१४१|| विसर्पो न ह्यसंसृष्टो रक्तपित्तेन जायते| तस्मात् साधारणं सर्वमुक्तमेतच्चिकित्सितम्||१४२|| विशेषो दोषवैषम्यान्न च नोक्तः समासतः| समासव्यासनिर्दिष्टां क्रियां विद्वानुपाचरेत्||१४३||
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Adhikarana 32 (144-146) · Śloka 146
তত্র শ্লোকাঃ- নিরুক্তং নামভেদাশ্চ দোষা দূষ্যাণি হেতবঃ| আশ্রযো মার্গতশ্চৈব বিসর্পগুরুলাঘবম্||১৪৪|| লিঙ্গান্যুপদ্রবা যে চ যল্লক্ষণ উপদ্রবঃ| সাধ্যত্বং, ন চ, সাধ্যানাং সাধনং চ যথাক্রমম্||১৪৫|| ইতি পিপ্রক্ষবে সিদ্ধিমগ্নিবেশায ধীমতে| পুনর্বসুরুবাচেদং বিসর্পাণাং চিকিত্সিতম্||১৪৬||
तत्र श्लोकाः- निरुक्तं नामभेदाश्च दोषा दूष्याणि हेतवः| आश्रयो मार्गतश्चैव विसर्पगुरुलाघवम्||१४४|| लिङ्गान्युपद्रवा ये च यल्लक्षण उपद्रवः| साध्यत्वं, न च, साध्यानां साधनं च यथाक्रमम्||१४५|| इति पिप्रक्षवे सिद्धिमग्निवेशाय धीमते| पुनर्वसुरुवाचेदं विसर्पाणां चिकित्सितम्||१४६||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 21
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে চিকিত্সাস্থানে বিসর্পচিকিত্সিতং নামৈকবিংশোঽধ্যাযঃ||২১||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने विसर्पचिकित्सितं नामैकविंशोऽध्यायः||२१||
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