Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্তৃষ্ণাচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातस्तृष्णाचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্তৃষ্ণাচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातस्तृष्णाचिकित्सितं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
জ্ঞানপ্রশমতপোভিঃ খ্যাতোঽত্রিসুতো জগদ্ধিতেঽভিরতঃ| তৃষ্ণানাং প্রশমার্থং চিকিত্সিতং প্রাহ পঞ্চানাম্||৩||
ज्ञानप्रशमतपोभिः ख्यातोऽत्रिसुतो जगद्धितेऽभिरतः| तृष्णानां प्रशमार्थं चिकित्सितं प्राह पञ्चानाम्||३||
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Adhikarana 3 (4-7) · Śloka 7
ক্ষোভাদ্ভযাচ্ছ্রমাদপি শোকাত্ক্রোধাদ্বিলঙ্ঘনান্মদ্যাত্| ক্ষারাম্ললবণকটুকোষ্ণরূক্ষশুষ্কান্নসেবাভিঃ||৪|| ধাতুক্ষযগদকর্ষণবমনাদ্যতিযোগসূর্যসন্তাপৈঃ| পিত্তানিলৌ প্রবৃদ্ধৌ সৌম্যান্ধাতূংশ্চ শোষযতঃ||৫|| রসবাহিনীশ্চ নালীর্জিহ্বামূলগলতালুকক্লোম্নঃ | সংশোষ্য নৃণাং দেহে কুরুতস্তৃষ্ণাং মহাবলাবেতৌ||৬|| পীতং পীতং হি জলং শোষযতস্তাবতো ন যাতি শমম্| ঘোরব্যাধিকৃশানাং প্রভবত্যুপসর্গভূতা সা||৭||
क्षोभाद्भयाच्छ्रमादपि शोकात्क्रोधाद्विलङ्घनान्मद्यात्| क्षाराम्ललवणकटुकोष्णरूक्षशुष्कान्नसेवाभिः||४|| धातुक्षयगदकर्षणवमनाद्यतियोगसूर्यसन्तापैः| पित्तानिलौ प्रवृद्धौ सौम्यान्धातूंश्च शोषयतः||५|| रसवाहिनीश्च नालीर्जिह्वामूलगलतालुकक्लोम्नः | संशोष्य नृणां देहे कुरुतस्तृष्णां महाबलावेतौ||६|| पीतं पीतं हि जलं शोषयतस्तावतो न याति शमम्| घोरव्याधिकृशानां प्रभवत्युपसर्गभूता सा||७||
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Adhikarana 4 (8) · Śloka 8
প্রাগ্রূপং মুখশোষঃ, স্বলক্ষণং সর্বদাঽম্বুকামিত্বম্| তৃষ্ণানাং সর্বাসাং লিঙ্গানাং লাঘবমপাযঃ||৮||
प्राग्रूपं मुखशोषः, स्वलक्षणं सर्वदाऽम्बुकामित्वम्| तृष्णानां सर्वासां लिङ्गानां लाघवमपायः||८||
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Adhikarana 5 (9-10) · Śloka 10
মুখশোষস্বরভেদভ্রমসন্তাপপ্রলাপসংস্তম্ভান্| তাল্বোষ্ঠকণ্ঠজিহ্বাকর্কশতাং চিত্তনাশং চ||৯|| জিহ্বানির্গমমরুচিং বাধির্যং মর্মদূযনং সাদম্| তৃষ্ণোদ্ভূতা কুরুতে, পঞ্চবিধাং লিঙ্গতঃ শৃণু তাম্||১০||
मुखशोषस्वरभेदभ्रमसन्तापप्रलापसंस्तम्भान्| ताल्वोष्ठकण्ठजिह्वाकर्कशतां चित्तनाशं च||९|| जिह्वानिर्गममरुचिं बाधिर्यं मर्मदूयनं सादम्| तृष्णोद्भूता कुरुते, पञ्चविधां लिङ्गतः शृणु ताम्||१०||
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Adhikarana 6 (11) · Śloka 11
অব্ধাতুং দেহস্থং কুপিতঃ পবনো যদা বিশোষযতি| তস্মিঞ্শুষ্কে শুষ্যত্যবলস্তৃষ্যত্যথ বিশুষ্যন্||১১||
अब्धातुं देहस्थं कुपितः पवनो यदा विशोषयति| तस्मिञ्शुष्के शुष्यत्यबलस्तृष्यत्यथ विशुष्यन्||११||
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Adhikarana 7 (12) · Śloka 12
নিদ্রানাশঃ শিরসো ভ্রমস্তথা শুষ্কবিরসমুখতা চ স্রোতোঽবরোধ ইতি চ স্যাল্লিঙ্গং বাততৃষ্ণাযাঃ||১২||
निद्रानाशः शिरसो भ्रमस्तथा शुष्कविरसमुखता च स्रोतोऽवरोध इति च स्याल्लिङ्गं वाततृष्णायाः||१२||
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Adhikarana 8 (13-14) · Śloka 14
পিত্তং মতমাগ্নেযং কুপিতং চেত্তাপযত্যপাং ধাতুম্| সন্তপ্তঃ স হি জনযেত্তৃষ্ণাং দাহোল্বণাং নৄণাম্||১৩|| তিক্তাস্যত্বং শিরসো দাহঃ শীতাভিনন্দতা মূর্চ্ছা| পীতাক্ষিমূত্রবর্চস্ত্বমাকৃতিঃ পিত্ততৃষ্ণাযাঃ||১৪||
पित्तं मतमाग्नेयं कुपितं चेत्तापयत्यपां धातुम्| सन्तप्तः स हि जनयेत्तृष्णां दाहोल्बणां नॄणाम्||१३|| तिक्तास्यत्वं शिरसो दाहः शीताभिनन्दता मूर्च्छा| पीताक्षिमूत्रवर्चस्त्वमाकृतिः पित्ततृष्णायाः||१४||
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Adhikarana 9 (15) · Śloka 15
তৃষ্ণা যাঽঽমপ্রভবা সাঽপ্যাগ্নেযাঽঽমপিত্তজনিতত্বাত্ | লিঙ্গং তস্যাশ্চারুচিরাধ্মানকফপ্রসেকৌ চ||১৫||
तृष्णा याऽऽमप्रभवा साऽप्याग्नेयाऽऽमपित्तजनितत्वात् | लिङ्गं तस्याश्चारुचिराध्मानकफप्रसेकौ च||१५||
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Adhikarana 10 (16) · Śloka 16
দেহো রসজোঽম্বুভবো রসশ্চ তস্য ক্ষযাচ্চ তৃষ্যেদ্ধি| দীনস্বরঃ প্রতাম্যন্ সংশুষ্কহৃদযগলতালুঃ ||১৬||
देहो रसजोऽम्बुभवो रसश्च तस्य क्षयाच्च तृष्येद्धि| दीनस्वरः प्रताम्यन् संशुष्कहृदयगलतालुः ||१६||
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Adhikarana 11 (17) · Śloka 17
ভবতি খলু যোপসর্গাত্তৃষ্ণা সা শোষিণী কষ্টা| জ্বরমেহক্ষযশোষশ্বাসাদ্যুপসৃষ্টদেহানাম্ ||১৭||
भवति खलु योपसर्गात्तृष्णा सा शोषिणी कष्टा| ज्वरमेहक्षयशोषश्वासाद्युपसृष्टदेहानाम् ||१७||
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Adhikarana 12 (18) · Śloka 18
সর্বাস্ত্বতিপ্রসক্তা রোগকৃশানাং বমিপ্রসক্তানাম্| ঘোরোপদ্রবযুক্তাস্তৃণা মরণায বিজ্ঞেযাঃ||১৮||
सर्वास्त्वतिप्रसक्ता रोगकृशानां वमिप्रसक्तानाम्| घोरोपद्रवयुक्तास्तृणा मरणाय विज्ञेयाः||१८||
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Adhikarana 13 (19-22) · Śloka 22
নাগ্নিং বিনা হি তর্ষঃ পবনাদ্বা তৌ হি শোষণে হেতূ| অব্ধাতোরতিবৃদ্ধাবপাং ক্ষযে তৃষ্যতে নরো হি||১৯|| গুর্বন্নপযঃস্নেহৈঃ সম্মূর্চ্ছদ্ভির্বিদাহকালে চ| যস্তৃষ্যেদ্বৃতমার্গে তত্রাপ্যনিলানলৌ হেতূ||২০|| তীক্ষ্ণোষ্ণরূক্ষভাবান্মদ্যং পিত্তানিলৌ প্রকোপযতি| শোষযতোঽপাং ধাতুং তাবেব হি মদ্যশীলানাম্||২১|| তপ্তাস্বিব সিকতাসু হি তোযমাশু শুষ্যতি ক্ষিপ্তম্| তেষাং সন্তপ্তানাং হিমজলপানাদ্ভবতি শর্ম||২২||
नाग्निं विना हि तर्षः पवनाद्वा तौ हि शोषणे हेतू| अब्धातोरतिवृद्धावपां क्षये तृष्यते नरो हि||१९|| गुर्वन्नपयःस्नेहैः सम्मूर्च्छद्भिर्विदाहकाले च| यस्तृष्येद्वृतमार्गे तत्राप्यनिलानलौ हेतू||२०|| तीक्ष्णोष्णरूक्षभावान्मद्यं पित्तानिलौ प्रकोपयति| शोषयतोऽपां धातुं तावेव हि मद्यशीलानाम्||२१|| तप्तास्विव सिकतासु हि तोयमाशु शुष्यति क्षिप्तम्| तेषां सन्तप्तानां हिमजलपानाद्भवति शर्म||२२||
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Adhikarana 14 (23) · Śloka 23
শিশিরস্নাতস্যোষ্মা রুদ্ধঃ কোষ্ঠং প্রপদ্য তর্ষযতি| তস্মান্নোষ্ণক্লান্তো ভজেত সহসা জলং শীতম্ ||২৩||
शिशिरस्नातस्योष्मा रुद्धः कोष्ठं प्रपद्य तर्षयति| तस्मान्नोष्णक्लान्तो भजेत सहसा जलं शीतम् ||२३||
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Adhikarana 15 (24) · Śloka 24
লিঙ্গং সর্বাস্বেতাস্বনিলক্ষযপিত্তজং ভবত্যথ তু| পৃথগাগমাচ্চিকিত্সিতমতঃ প্রবক্ষ্যামি তৃষ্ণানাম্||২৪||
लिङ्गं सर्वास्वेतास्वनिलक्षयपित्तजं भवत्यथ तु| पृथगागमाच्चिकित्सितमतः प्रवक्ष्यामि तृष्णानाम्||२४||
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Adhikarana 16 (25-26) · Śloka 26
অপাং ক্ষযাদ্ধি তৃষ্ণা সংশোষ্য নরং প্রণাশযেদাশু| তস্মাদৈন্দ্রং তোযং সমধু পিবেত্তদ্গুণং বাঽন্যত্||২৫|| কিঞ্চিত্তুবরানুরসং তনু লঘু শীতলং সুগন্ধি সুরসং চ| অনভিষ্যন্দি চ যত্তত্ক্ষিতিগতমপ্যৈন্দ্রবজ্জ্ঞেযম্||২৬||
अपां क्षयाद्धि तृष्णा संशोष्य नरं प्रणाशयेदाशु| तस्मादैन्द्रं तोयं समधु पिबेत्तद्गुणं वाऽन्यत्||२५|| किञ्चित्तुवरानुरसं तनु लघु शीतलं सुगन्धि सुरसं च| अनभिष्यन्दि च यत्तत्क्षितिगतमप्यैन्द्रवज्ज्ञेयम्||२६||
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Adhikarana 17 (27-33) · Śloka 33
শৃতশীতং সসিতোপলমথবা শরপূর্বপঞ্চমূলেন| লাজাসক্তুসিতাহ্বামধুযুতমৈন্দ্রেণ বা মন্থম্||২৭|| বাট্যং বাঽঽমযবানাং শীতং মধুশর্করাযুতং দদ্যাত্| পেযাং বা শালীনাং দদ্যাদ্বা কোরদূষাণাম্||২৮|| পযসা শৃতেন ভোজনমথবা মধুশর্করাযুতং যোজ্যম্| পারাবতাদিকরসৈর্ঘৃতভৃষ্টৈর্বাঽপ্যলবণাম্লৈঃ||২৯|| তৃণপঞ্চমূলমুঞ্জাতকৈঃ প্রিযালৈশ্চ জাঙ্গলাঃ সুকৃতাঃ| শস্তা রসাঃ পযো বা তৈঃ সিদ্ধং শর্করামধুমত্||৩০|| শতধৌতঘৃতেনাক্তঃ পযঃ পিবেচ্ছীততোযমবগাহ্য| মুদ্গমসূরচণকজা রসাস্তু ভৃষ্টা ঘৃতে দেযাঃ||৩১|| মধুরৈঃ সজীবনীযৈঃ শীতৈশ্চ সতিক্তকৈঃ শৃতং ক্ষীরম্| পানাভ্যঞ্জনসেকেষ্বিষ্টং মধুশর্করাযুক্তম্||৩২|| তজ্জং বা ঘৃতমিষ্টং পানাভ্যঙ্গেষু নস্যমপি চ স্যাত্| নারীপযঃ সশর্করমুষ্ট্র্যা অপি নস্যমিক্ষুরসঃ||৩৩||
शृतशीतं ससितोपलमथवा शरपूर्वपञ्चमूलेन| लाजासक्तुसिताह्वामधुयुतमैन्द्रेण वा मन्थम्||२७|| वाट्यं वाऽऽमयवानां शीतं मधुशर्करायुतं दद्यात्| पेयां वा शालीनां दद्याद्वा कोरदूषाणाम्||२८|| पयसा शृतेन भोजनमथवा मधुशर्करायुतं योज्यम्| पारावतादिकरसैर्घृतभृष्टैर्वाऽप्यलवणाम्लैः||२९|| तृणपञ्चमूलमुञ्जातकैः प्रियालैश्च जाङ्गलाः सुकृताः| शस्ता रसाः पयो वा तैः सिद्धं शर्करामधुमत्||३०|| शतधौतघृतेनाक्तः पयः पिबेच्छीततोयमवगाह्य| मुद्गमसूरचणकजा रसास्तु भृष्टा घृते देयाः||३१|| मधुरैः सजीवनीयैः शीतैश्च सतिक्तकैः शृतं क्षीरम्| पानाभ्यञ्जनसेकेष्विष्टं मधुशर्करायुक्तम्||३२|| तज्जं वा घृतमिष्टं पानाभ्यङ्गेषु नस्यमपि च स्यात्| नारीपयः सशर्करमुष्ट्र्या अपि नस्यमिक्षुरसः||३३||
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Adhikarana 18 (34-39) · Śloka 39
ক্ষীরেক্ষুরসগুডোদকসিতোপলাক্ষৌদ্রসীধুমার্দ্বীকৈঃ | বৃক্ষাম্লমাতুলুঙ্গৈর্গণ্ডূষাস্তালুশোষঘ্নাঃ||৩৪|| জম্ব্বাম্রাতকবদরীবেতসপঞ্চবল্কপঞ্চাম্লৈঃ| হৃন্মুখশিরঃপ্রদেহাঃসঘৃতা মূর্চ্ছাভ্রমতৃষ্ণাঘ্নাঃ স্যুঃ||৩৫|| দাডিমদধিত্থলোধ্রৈঃ সবিদারীবীজপূরকৈঃ শিরসঃ| লেপো গৌরামলকৈর্ঘৃতারনালাযুতৈশ্চ হিতঃ||৩৬|| শৈবলপঙ্কাম্বুরুহৈঃ সাম্লৈঃ সঘৃতৈশ্চ শক্তুভির্লেপঃ| মস্ত্বারনালার্দ্রবসনকমলমণিহারসংস্পর্শাঃ||৩৭|| শিশিরাম্বুচন্দনার্দ্রস্তনতটপাণিতলগাত্রসংস্পর্শাঃ| ক্ষৌমার্দ্রনিবসনানাং বরাঙ্গনানাং প্রিযাণাং চ||৩৮|| হিমবদ্দরীবনসরিত্সরোঽম্বুজপবনেন্দুপাদশিশিরাণাম্| রম্যশিশিরোদকানাং স্মরণং কথাশ্চ তৃষ্ণাঘ্নাঃ||৩৯||
क्षीरेक्षुरसगुडोदकसितोपलाक्षौद्रसीधुमार्द्वीकैः | वृक्षाम्लमातुलुङ्गैर्गण्डूषास्तालुशोषघ्नाः||३४|| जम्ब्वाम्रातकबदरीवेतसपञ्चवल्कपञ्चाम्लैः| हृन्मुखशिरःप्रदेहाःसघृता मूर्च्छाभ्रमतृष्णाघ्नाः स्युः||३५|| दाडिमदधित्थलोध्रैः सविदारीबीजपूरकैः शिरसः| लेपो गौरामलकैर्घृतारनालायुतैश्च हितः||३६|| शैवलपङ्काम्बुरुहैः साम्लैः सघृतैश्च शक्तुभिर्लेपः| मस्त्वारनालार्द्रवसनकमलमणिहारसंस्पर्शाः||३७|| शिशिराम्बुचन्दनार्द्रस्तनतटपाणितलगात्रसंस्पर्शाः| क्षौमार्द्रनिवसनानां वराङ्गनानां प्रियाणां च||३८|| हिमवद्दरीवनसरित्सरोऽम्बुजपवनेन्दुपादशिशिराणाम्| रम्यशिशिरोदकानां स्मरणं कथाश्च तृष्णाघ्नाः||३९||
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Adhikarana 19 (40) · Śloka 41
বাতঘ্নমন্নপানং মৃদু লঘু শীতং চ বাততৃষ্ণাযাম্| ক্ষযকাসনুচ্ছৃতং ক্ষীরঘৃতমূর্ধ্ববাততৃষ্ণাঘ্নম্ ||৪০|| স্যাজ্জীবনীযসিদ্ধং ক্ষীরঘৃতং বাতপিত্তজে তর্ষ|৪১|
वातघ्नमन्नपानं मृदु लघु शीतं च वाततृष्णायाम्| क्षयकासनुच्छृतं क्षीरघृतमूर्ध्ववाततृष्णाघ्नम् ||४०|| स्याज्जीवनीयसिद्धं क्षीरघृतं वातपित्तजे तर्ष|४१|
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Adhikarana 20 (41-46) · Śloka 46
পৈত্তে দ্রাক্ষাচন্দনখর্জূরোশীরমধুযুতং তোযম্||৪১|| লোহিতশালিতণ্ডুলখর্জূরপরূষকোত্পলদ্রাক্ষাঃ| মধু পক্বলোষ্টমেব চ জলে স্থিতং শীতলং পেযম্||৪২|| লোহিতশালিপ্রস্থঃ সলোধ্রমধুকাঞ্জনোত্পলঃ ক্ষুণ্ণঃ| পক্বামলোষ্টজলমধুসমাযুতো মৃন্মযে পেযঃ||৪৩|| বটমাতুলুঙ্গবেতসপল্লবকুশকাশমূলযষ্ট্যাহ্বৈঃ| সিদ্ধেঽম্ভস্যগ্নিনিভাং কৃষ্ণমৃদং কৃষ্ণসিকতাং বা||৪৪|| তপ্তানি নবকপালান্যথবা নির্বাপ্য পাযযেতাচ্ছম্| আপাকশর্করং বাঽমৃতবল্ল্যুদকং তৃষাং হন্তি||৪৫|| ক্ষীরবতাং মধুরাণাং শীতানাং শর্করামধুবিমিশ্রাঃ| শীতকষাযা মৃদ্ভৃষ্টসংযুতাঃ পিত্ততৃষ্ণাঘ্নাঃ||৪৬||
पैत्ते द्राक्षाचन्दनखर्जूरोशीरमधुयुतं तोयम्||४१|| लोहितशालितण्डुलखर्जूरपरूषकोत्पलद्राक्षाः| मधु पक्वलोष्टमेव च जले स्थितं शीतलं पेयम्||४२|| लोहितशालिप्रस्थः सलोध्रमधुकाञ्जनोत्पलः क्षुण्णः| पक्वामलोष्टजलमधुसमायुतो मृन्मये पेयः||४३|| वटमातुलुङ्गवेतसपल्लवकुशकाशमूलयष्ट्याह्वैः| सिद्धेऽम्भस्यग्निनिभां कृष्णमृदं कृष्णसिकतां वा||४४|| तप्तानि नवकपालान्यथवा निर्वाप्य पाययेताच्छम्| आपाकशर्करं वाऽमृतवल्ल्युदकं तृषां हन्ति||४५|| क्षीरवतां मधुराणां शीतानां शर्करामधुविमिश्राः| शीतकषाया मृद्भृष्टसंयुताः पित्ततृष्णाघ्नाः||४६||
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Adhikarana 21 (47-56) · Śloka 56
ব্যোষবচাভল্লাতকতিক্তকষাযাস্তথাঽঽমতৃষ্ণাঘ্নাঃ| যচ্চোক্তং কফজাযাং বম্যাং তচ্চৈব কার্যং স্যাত্||৪৭|| স্তম্ভারুচ্যবিপাকালস্যচ্ছর্দিষু কফানুগাং তৃষ্ণাম্| জ্ঞাত্বা দধিমধুতর্পণলবণোষ্ণজলৈর্বমনমিষ্টম্||৪৮|| দাডিমমম্লফলং বাঽপ্যন্যত্ সকষাযমথ লেহম্| পেযমথবা প্রদদ্যাদ্রজনীশর্করাযুক্তম্ ||৪৯|| ক্ষযকাসেন তু তুল্যা ক্ষযতৃষ্ণা সা গরীযসী নৄণাম্| ক্ষীণক্ষতশোষহিতৈস্তস্মাত্তাং ভেষজৈঃ শমযেত্||৫০|| পানতৃষার্তঃ পানং ত্বর্ধোদকমম্ললবণগন্ধাঢ্যম্| শিশিরস্নাতঃ পানং মদ্যাম্বু গুডাম্বু বা তৃষিতঃ||৫১|| ভক্তোপরোধতৃষিতঃ স্নেহতৃষার্তোঽথবা তনুযবাগূম্| প্রপিবেদ্গুরুণা তৃষিতো ভুক্তেন তদুদ্ধরেদ্ভুক্তম্||৫২|| মদ্যাম্বু বাঽম্বু কোষ্ণং বলবাংস্তৃষিতঃ সমুল্লিখেত্ পীত্বা| মাগধিকাবিশদমুখঃ সশর্করং বা পিবেন্মন্থম্||৫৩|| বলবাংস্তু তালুশোষে পিবেদ্ধৃতং তৃষ্যমদ্যাচ্চ| সর্পির্ভৃষ্টং ক্ষীরং মাংসরসাংশ্চাবলঃ স্নিগ্ধান্||৫৪|| অতিরূক্ষদুর্বলানাং তর্ষং শমযেন্নৃণামিহাশু পযঃ| ছাগো বা ঘৃতভৃষ্টঃ শীতো মধুরো রসো হৃদ্যঃ||৫৫|| স্নিগ্ধেঽন্নে ভুক্তে যা তৃষ্ণা স্যাত্তাং গুডাম্বুনা শমযেত্| তর্ষং মূর্চ্ছাভিহতস্য রক্তপিত্তাপহৈর্হন্যাত্||৫৬||
व्योषवचाभल्लातकतिक्तकषायास्तथाऽऽमतृष्णाघ्नाः| यच्चोक्तं कफजायां वम्यां तच्चैव कार्यं स्यात्||४७|| स्तम्भारुच्यविपाकालस्यच्छर्दिषु कफानुगां तृष्णाम्| ज्ञात्वा दधिमधुतर्पणलवणोष्णजलैर्वमनमिष्टम्||४८|| दाडिममम्लफलं वाऽप्यन्यत् सकषायमथ लेहम्| पेयमथवा प्रदद्याद्रजनीशर्करायुक्तम् ||४९|| क्षयकासेन तु तुल्या क्षयतृष्णा सा गरीयसी नॄणाम्| क्षीणक्षतशोषहितैस्तस्मात्तां भेषजैः शमयेत्||५०|| पानतृषार्तः पानं त्वर्धोदकमम्ललवणगन्धाढ्यम्| शिशिरस्नातः पानं मद्याम्बु गुडाम्बु वा तृषितः||५१|| भक्तोपरोधतृषितः स्नेहतृषार्तोऽथवा तनुयवागूम्| प्रपिबेद्गुरुणा तृषितो भुक्तेन तदुद्धरेद्भुक्तम्||५२|| मद्याम्बु वाऽम्बु कोष्णं बलवांस्तृषितः समुल्लिखेत् पीत्वा| मागधिकाविशदमुखः सशर्करं वा पिबेन्मन्थम्||५३|| बलवांस्तु तालुशोषे पिबेद्धृतं तृष्यमद्याच्च| सर्पिर्भृष्टं क्षीरं मांसरसांश्चाबलः स्निग्धान्||५४|| अतिरूक्षदुर्बलानां तर्षं शमयेन्नृणामिहाशु पयः| छागो वा घृतभृष्टः शीतो मधुरो रसो हृद्यः||५५|| स्निग्धेऽन्ने भुक्ते या तृष्णा स्यात्तां गुडाम्बुना शमयेत्| तर्षं मूर्च्छाभिहतस्य रक्तपित्तापहैर्हन्यात्||५६||
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Adhikarana 22 (57-62) · Śloka 62
তৃট্দাহমূর্চ্ছাভ্রমক্লমমদাত্যযাস্রবিষপিত্তে | শস্তং স্বভাবশীতং, শৃতশীতং সন্নিপাতেঽম্ভঃ||৫৭|| হিক্কাশ্বাসনবজ্বরপীনসঘৃতপীতপার্শ্বগলরোগে| কফবাতকৃতে স্ত্যানে সদ্যঃশুদ্ধে চ হিতমুষ্ণম্||৫৮|| পাণ্ডূদরপীনসমেহগুল্মমন্দানলাতিসারেষু| প্লীহ্নি চ তোযং ন হিতং কামমসহ্যে পিবেদল্পম্||৫৯|| পূর্বামযাতুরঃ সন্ দীনস্তৃষ্ণার্দিতো জলং কাঙ্ক্ষন্| ন লভেত স চেন্মরণমাশ্বেবাপ্নুযাদ্দীর্ঘরোগং বা||৬০|| তস্মাদ্ধান্যাম্বু পিবেত্তৃষ্যন্ রোগী সশর্করাক্ষৌদ্রম্| যদ্বা তস্যান্যত্স্যাত্ সাত্ম্যং রোগস্য তচ্চেষ্টম্||৬১|| তস্যাং বিনিবৃত্তাযাং তজ্জন্য উপদ্রবঃ সুখং জেতুম্| তস্মাত্তৃষ্ণাং পূর্বং জযেদ্বহুভ্যোঽপি রোগেভ্যঃ||৬২||
तृट्दाहमूर्च्छाभ्रमक्लममदात्ययास्रविषपित्ते | शस्तं स्वभावशीतं, शृतशीतं सन्निपातेऽम्भः||५७|| हिक्काश्वासनवज्वरपीनसघृतपीतपार्श्वगलरोगे| कफवातकृते स्त्याने सद्यःशुद्धे च हितमुष्णम्||५८|| पाण्डूदरपीनसमेहगुल्ममन्दानलातिसारेषु| प्लीह्नि च तोयं न हितं काममसह्ये पिबेदल्पम्||५९|| पूर्वामयातुरः सन् दीनस्तृष्णार्दितो जलं काङ्क्षन्| न लभेत स चेन्मरणमाश्वेवाप्नुयाद्दीर्घरोगं वा||६०|| तस्माद्धान्याम्बु पिबेत्तृष्यन् रोगी सशर्कराक्षौद्रम्| यद्वा तस्यान्यत्स्यात् सात्म्यं रोगस्य तच्चेष्टम्||६१|| तस्यां विनिवृत्तायां तज्जन्य उपद्रवः सुखं जेतुम्| तस्मात्तृष्णां पूर्वं जयेद्बहुभ्योऽपि रोगेभ्यः||६२||
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Adhikarana 23 (63) · Śloka 63
তত্র শ্লোকঃ- হেতূ যথাঽগ্নিপবনৌ কুরুতঃ সোপদ্রবাং চ পঞ্চানাম্| তৃষ্ণানাং পৃথগাকৃতিরসাধ্যতা সাধনং চোক্তম্||৬৩||
तत्र श्लोकः- हेतू यथाऽग्निपवनौ कुरुतः सोपद्रवां च पञ्चानाम्| तृष्णानां पृथगाकृतिरसाध्यता साधनं चोक्तम्||६३||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 22
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে চিকিত্সাস্থানে তৃষ্ণারোগচিকিত্সিতং নাম দ্বাবিংশোঽধ্যাযঃ||২২||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते चिकित्सास्थाने तृष्णारोगचिकित्सितं नाम द्वाविंशोऽध्यायः||२२||
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