Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কতমানিশরীরীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः कतमानिशरीरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কতমানিশরীরীযমিন্দ্রিযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः कतमानिशरीरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-6) · Śloka 6
কতমানি শরীরাণি ব্যাধিমন্তি মহামুনে!| যানি বৈদ্যঃ পরিহরেদ্যেষু কর্ম ন সিদ্ধ্যতি||৩|| ইত্যাত্রেযোঽগ্নিবেশেন প্রশ্নং পৃষ্টঃ সুদুর্বচম্| আচচক্ষে যথা তস্মৈ ভগবাংস্তন্নিবোধত||৪|| যস্য বৈ ভাষমাণস্য রুজত্যূর্ধ্বমুরো ভৃশম্| অন্নং চ চ্যবতে ভুক্তং স্থিতং চাপি ন জীর্যতি||৫|| বলং চ হীযতে শীঘ্রং তৃষ্ণা চাতিপ্রবর্ধতে| জাযতে হৃদি শূলং চ তং ভিষক্ পরিবর্জযেত্||৬||
कतमानि शरीराणि व्याधिमन्ति महामुने!| यानि वैद्यः परिहरेद्येषु कर्म न सिद्ध्यति||३|| इत्यात्रेयोऽग्निवेशेन प्रश्नं पृष्टः सुदुर्वचम्| आचचक्षे यथा तस्मै भगवांस्तन्निबोधत||४|| यस्य वै भाषमाणस्य रुजत्यूर्ध्वमुरो भृशम्| अन्नं च च्यवते भुक्तं स्थितं चापि न जीर्यति||५|| बलं च हीयते शीघ्रं तृष्णा चातिप्रवर्धते| जायते हृदि शूलं च तं भिषक् परिवर्जयेत्||६||
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Adhikarana 3 (7-10) · Śloka 10
হিক্কা গম্ভীরজা যস্য শোণিতং চাতিসার্যতে| ন তস্মৈ ভেষজং দদ্যাত্ স্মরন্নাত্রেযশাসনম্||৭|| আনাহশ্চাতিসারশ্চ যমেতৌ দুর্বলং নরম্| ব্যাধিতং বিশতো রোগৌ দুর্লভং তস্য জীবিতম্||৮|| আনাহশ্চাতিতৃষ্ণা চ যমেতৌ দুর্বলং নরম্| বিশতো বিজহত্যেনং প্রাণা নাতিচিরান্নরম্||৯|| জ্বরঃ পৌর্বাহ্ণিকো যস্য শুষ্ককাসশ্চ দারুণঃ| বলমাংসবিহীনস্য যথা প্রেতস্তথৈব সঃ||১০||
हिक्का गम्भीरजा यस्य शोणितं चातिसार्यते| न तस्मै भेषजं दद्यात् स्मरन्नात्रेयशासनम्||७|| आनाहश्चातिसारश्च यमेतौ दुर्बलं नरम्| व्याधितं विशतो रोगौ दुर्लभं तस्य जीवितम्||८|| आनाहश्चातितृष्णा च यमेतौ दुर्बलं नरम्| विशतो विजहत्येनं प्राणा नातिचिरान्नरम्||९|| ज्वरः पौर्वाह्णिको यस्य शुष्ककासश्च दारुणः| बलमांसविहीनस्य यथा प्रेतस्तथैव सः||१०||
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Adhikarana 4 (11-14) · Śloka 14
যস্য মূত্রং পুরীষং চ গ্রথিতং সম্প্রবর্ততে| নিরূষ্মণো জঠরিণঃ শ্বসনো ন স জীবতি||১১|| শ্বযথুর্যস্য কুক্ষিস্থো হস্তপাদং বিসর্পতি| জ্ঞাতিসঙ্ঘং স সঙ্ক্লেশ্য তেন রোগেণ হন্যতে||১২|| শ্বযথুর্যস্য পাদস্থস্তথা স্রস্তে চ পিণ্ডিকে| সীদতশ্চাপ্যুভে জঙ্ঘে তং ভিষক্ পরিবর্জযেত্||১৩|| শূনহস্তং শূনপাদং শূনগুহ্যোদরং নরম্| হীনবর্ণবলাহারমৌষধৈর্নোপপাদযেত্||১৪||
यस्य मूत्रं पुरीषं च ग्रथितं सम्प्रवर्तते| निरूष्मणो जठरिणः श्वसनो न स जीवति||११|| श्वयथुर्यस्य कुक्षिस्थो हस्तपादं विसर्पति| ज्ञातिसङ्घं स सङ्क्लेश्य तेन रोगेण हन्यते||१२|| श्वयथुर्यस्य पादस्थस्तथा स्रस्ते च पिण्डिके| सीदतश्चाप्युभे जङ्घे तं भिषक् परिवर्जयेत्||१३|| शूनहस्तं शूनपादं शूनगुह्योदरं नरम्| हीनवर्णबलाहारमौषधैर्नोपपादयेत्||१४||
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Adhikarana 5 (15-19) · Śloka 19
উরোযুক্তো বহুশ্লেষ্মা নীলঃ পীতঃ সলোহিতঃ| সততং চ্যবতে যস্য দূরাত্তং পরিবর্জযেত্||১৫|| হৃষ্টরোমা সান্দ্রমূত্রঃ শূনঃ কাসজ্বরার্দিতঃ | ক্ষীণমাংসো নরো দূরাদ্বর্জ্যো বৈদ্যেন জানতা||১৬|| ত্রযঃ প্রকুপিতা যস্য দোষাঃ কষ্টাভিলক্ষিতাঃ | কৃশস্য বলহীনস্য নাস্তি তস্য চিকিত্সিতম্||১৭|| জ্বরাতিসারৌ শোফান্তে শ্বযথুর্বা তযোঃ ক্ষযে| দুর্বলস্য বিশেষেণ নরস্যান্তায জাযতে||১৮|| পাণ্ডুরশ্চ কৃশোঽত্যর্থং তৃষ্ণযাঽভিপরিপ্লুতঃ| ডম্বরী কুপিতোচ্ছ্বাসঃ প্রত্যাখ্যেযো বিজানতা||১৯||
उरोयुक्तो बहुश्लेष्मा नीलः पीतः सलोहितः| सततं च्यवते यस्य दूरात्तं परिवर्जयेत्||१५|| हृष्टरोमा सान्द्रमूत्रः शूनः कासज्वरार्दितः | क्षीणमांसो नरो दूराद्वर्ज्यो वैद्येन जानता||१६|| त्रयः प्रकुपिता यस्य दोषाः कष्टाभिलक्षिताः | कृशस्य बलहीनस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम्||१७|| ज्वरातिसारौ शोफान्ते श्वयथुर्वा तयोः क्षये| दुर्बलस्य विशेषेण नरस्यान्ताय जायते||१८|| पाण्डुरश्च कृशोऽत्यर्थं तृष्णयाऽभिपरिप्लुतः| डम्बरी कुपितोच्छ्वासः प्रत्याख्येयो विजानता||१९||
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Adhikarana 6 (20) · Śloka 20
হনুমন্যাগ্রহস্তৃষ্ণা বলহ্রাসোঽতিমাত্রযা| প্রাণাশ্চোরসি বর্তন্তে যস্য তং পরিবর্জযেত্||২০||
हनुमन्याग्रहस्तृष्णा बलह्रासोऽतिमात्रया| प्राणाश्चोरसि वर्तन्ते यस्य तं परिवर्जयेत्||२०||
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Adhikarana 7 (21-25) · Śloka 25
তাম্যত্যাযচ্ছতে শর্ম ন কিঞ্চিদপি বিন্দতি| ক্ষীণমাংসবলাহারো মুমূর্ষুরচিরান্নরঃ||২১|| বিরুদ্ধযোনযো যস্য বিরুদ্ধোপক্রমা ভৃশম্| বর্ধন্তে দারুণা রোগাঃ শীঘ্রং শীঘ্রং স হন্যতে||২২|| বলং বিজ্ঞানমারোগ্যং গ্রহণী মাংসশোণিতম্ | এতানি যস্য ক্ষীযন্তে ক্ষিপ্রং ক্ষিপ্রং স হন্যতে||২৩|| আরোগ্যং হীযতে যস্য প্রকৃতিঃ পরিহীযতে| সহসা সহসা তস্য মৃত্যুর্হরতি জীবিতম্||২৪|| তত্র শ্লোকঃ- ইত্যেতানি শরীরাণি ব্যাধিমন্তি বিবর্জযেত্| ন হ্যেষু ধীরাঃ পশ্যন্তি সিদ্ধিং কাঞ্চিদুপক্রমাত্||২৫||
ताम्यत्यायच्छते शर्म न किञ्चिदपि विन्दति| क्षीणमांसबलाहारो मुमूर्षुरचिरान्नरः||२१|| विरुद्धयोनयो यस्य विरुद्धोपक्रमा भृशम्| वर्धन्ते दारुणा रोगाः शीघ्रं शीघ्रं स हन्यते||२२|| बलं विज्ञानमारोग्यं ग्रहणी मांसशोणितम् | एतानि यस्य क्षीयन्ते क्षिप्रं क्षिप्रं स हन्यते||२३|| आरोग्यं हीयते यस्य प्रकृतिः परिहीयते| सहसा सहसा तस्य मृत्युर्हरति जीवितम्||२४|| तत्र श्लोकः- इत्येतानि शरीराणि व्याधिमन्ति विवर्जयेत्| न ह्येषु धीराः पश्यन्ति सिद्धिं काञ्चिदुपक्रमात्||२५||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 6
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে ইন্দ্রিযস্থানে কতমানিশরীরীযমিন্দ্রিযং নাম ষষ্ঠোঽধ্যাযঃ||৬||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने कतमानिशरीरीयमिन्द्रियं नाम षष्ठोऽध्यायः||६||
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