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5. puruṣavicayaśārīram

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ পুরুষবিচযং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातः पुरुषविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

‘পুরুষোঽযং লোকসম্মিতঃ’ ইত্যুবাচ ভগবান্ পুনর্বসুরাত্রেযঃ| যাবন্তো হি লোকে (মূর্তিমন্তো ) ভাববিশেষাস্তাবন্তঃ পুরুষে, যাবন্তঃ পুরুষে তাবন্তো লোকে; ইত্যেবংবাদিনং ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- নৈতাবতা বাক্যেনোক্তং বাক্যার্থমবগাহামহে, ভগবতা বুদ্ধ্যা ভূযস্তরমতোঽনুব্যাখ্যাযমানং শুশ্রূষামহ ইতি||৩|| তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- অপরিসঙ্খ্যেযা লোকাবযববিশেষাঃ, পুরুষাবযববিশেষা অপ্যপরিসঙ্খ্যেযাঃ; তেষাং যথাস্থূলং কতিচিদ্ভাবান্ সামান্যমভিপ্রেত্যোদাহরিষ্যামঃ, তানেকমনা নিবোধ সম্যগুপবর্ণ্যমানানগ্নিবেশ!| ষড্ধাতবঃ সমুদিতাঃ ‘পুরুষ’ ইতি শব্দং লভন্তে; তদ্যথা- পৃথিব্যাপস্তেজো বাযুরাকাশং ব্রহ্ম চাব্যক্তমিতি, এত এব চ ষড্ধাতবঃ সমুদিতাঃ ‘পুরুষ’ ইতি শব্দং লভন্তে||৪||

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‘पुरुषोऽयं लोकसम्मितः’ इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः| यावन्तो हि लोके (मूर्तिमन्तो ) भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके; इत्येवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- नैतावता वाक्येनोक्तं वाक्यार्थमवगाहामहे, भगवता बुद्ध्या भूयस्तरमतोऽनुव्याख्यायमानं शुश्रूषामह इति||३|| तमुवाच भगवानात्रेयः- अपरिसङ्ख्येया लोकावयवविशेषाः, पुरुषावयवविशेषा अप्यपरिसङ्ख्येयाः; तेषां यथास्थूलं कतिचिद्भावान् सामान्यमभिप्रेत्योदाहरिष्यामः, तानेकमना निबोध सम्यगुपवर्ण्यमानानग्निवेश!| षड्धातवः समुदिताः ‘पुरुष’ इति शब्दं लभन्ते; तद्यथा- पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमिति, एत एव च षड्धातवः समुदिताः ‘पुरुष’ इति शब्दं लभन्ते||४||

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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5

তস্য পুরুষস্য পৃথিবী মূর্তিঃ, আপঃ ক্লেদঃ, তেজোঽভিসন্তাপঃ, বাযুঃ প্রাণঃ, বিযত্ সুষিরাণি, ব্রহ্ম অন্তরাত্মা| যথা খলু ব্রাহ্মী বিভূতির্লোকে তথা পুরুষেঽপ্যান্তরাত্মিকী বিভূতিঃ, ব্রহ্মণো বিভূতির্লোকে প্রজাপতিরন্তরাত্মনো বিভূতিঃ পুরুষে সত্ত্বং, যস্ত্বিন্দ্রো লোকে স পুরুষেঽহঙ্কারঃ, আদিত্যস্ত্বাদানং, রুদ্রো রোষঃ, সোমঃ প্রসাদঃ, বসবঃ সুখম্, অশ্বিনৌ কান্তিঃ, মরুদুত্সাহঃ, বিশ্বেদেবাঃ সর্বেন্দ্রিযাণি সর্বেন্দ্রিযার্থাশ্চ, তমো মোহঃ, জ্যোতির্জ্ঞানং, যথা লোকস্য সর্গাদিস্তথা পুরুষস্য গর্ভাধানং, যথা কৃতযুগমেবং বাল্যং, যথা ত্রেতা তথা যৌবনং, যথা দ্বাপরস্তথা স্থাবির্যং, যথা কলিরেবমাতুর্যং, যথা যুগান্তস্তথা মরণমিতি| এবমেতেনানুমানেনানুক্তানামপি লোকপুরুষযোরবযববিশেষাণামগ্নিবেশ! সামান্যং বিদ্যাদিতি||৫||

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तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्तिः, आपः क्लेदः, तेजोऽभिसन्तापः, वायुः प्राणः, वियत् सुषिराणि, ब्रह्म अन्तरात्मा| यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापतिरन्तरात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्त्वं, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदित्यस्त्वादानं, रुद्रो रोषः, सोमः प्रसादः, वसवः सुखम्, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहः, विश्वेदेवाः सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च, तमो मोहः, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं, यथा कृतयुगमेवं बाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं, यथा द्वापरस्तथा स्थाविर्यं, यथा कलिरेवमातुर्यं, यथा युगान्तस्तथा मरणमिति| एवमेतेनानुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्निवेश! सामान्यं विद्यादिति||५||

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Adhikarana 4 (6-7) · Śloka 7

এবংবাদিনং ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- এবমেতত্ সর্বমনপবাদং যথোক্তং ভগবতা লোকপুরুষযোঃ সামান্যম্| কিন্ন্বস্য সামান্যোপদেশস্য প্রযোজনমিতি||৬|| ভগবানুবাচ- শৃণ্বগ্নিবেশ! সর্বলোকমাত্মন্যাত্মানং চ সর্বলোকে সমমনুপশ্যতঃ সত্যা বুদ্ধিঃ সমুত্পদ্যতে| সর্বলোকং হ্যাত্মনি পশ্যতো ভবত্যাত্মৈব সুখদুঃখযোঃ কর্তা নান্য ইতি| কর্মাত্মকত্বাচ্চ হেত্বাদিভির্যুক্তঃ সর্বলোকোঽহমিতি বিদিত্বা জ্ঞানং পূর্বমুত্থাপ্যতেঽপবর্গাযেতি| তত্র সংযোগাপেক্ষীলোকশব্দঃ| ষড্ধাতুসমুদাযো হি সামান্যতঃ সর্বলোকঃ||৭||

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एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- एवमेतत् सर्वमनपवादं यथोक्तं भगवता लोकपुरुषयोः सामान्यम्| किन्न्वस्य सामान्योपदेशस्य प्रयोजनमिति||६|| भगवानुवाच- शृण्वग्निवेश! सर्वलोकमात्मन्यात्मानं च सर्वलोके सममनुपश्यतः सत्या बुद्धिः समुत्पद्यते| सर्वलोकं ह्यात्मनि पश्यतो भवत्यात्मैव सुखदुःखयोः कर्ता नान्य इति| कर्मात्मकत्वाच्च हेत्वादिभिर्युक्तः सर्वलोकोऽहमिति विदित्वा ज्ञानं पूर्वमुत्थाप्यतेऽपवर्गायेति| तत्र संयोगापेक्षीलोकशब्दः| षड्धातुसमुदायो हि सामान्यतः सर्वलोकः||७||

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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8

তস্য হেতুঃ, উত্পত্তিঃ, বৃদ্ধিঃ, উপপ্লবঃ, বিযোগশ্চ| তত্র হেতুরুত্পত্তিকারণং, উত্পত্তির্জন্ম, বৃদ্ধিরাপ্যাযনম্, উপপ্লবো দুঃখাগমঃ, ষড্ধাতুবিভাগো বিযোগঃ সজীবাপগমঃ স প্রাণনিরোধঃ স ভঙ্গঃ স লোকস্বভাবঃ| তস্য মূলং সর্বোপপ্লবানাং চ প্রবৃত্তিঃ, নিবৃত্তিরুপরমঃ| প্রবৃত্তির্দুঃখং, নিবৃত্তিঃ সুখমিতি যজ্জ্ঞানমুত্পদ্যতে তত্ সত্যম্| তস্য হেতুঃ সর্বলোকসামান্যজ্ঞানম্| এতত্প্রযোজনং সামান্যোপদেশস্যেতি||৮||

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तस्य हेतुः, उत्पत्तिः, वृद्धिः, उपप्लवः, वियोगश्च| तत्र हेतुरुत्पत्तिकारणं, उत्पत्तिर्जन्म, वृद्धिराप्यायनम्, उपप्लवो दुःखागमः, षड्धातुविभागो वियोगः सजीवापगमः स प्राणनिरोधः स भङ्गः स लोकस्वभावः| तस्य मूलं सर्वोपप्लवानां च प्रवृत्तिः, निवृत्तिरुपरमः| प्रवृत्तिर्दुःखं, निवृत्तिः सुखमिति यज्ज्ञानमुत्पद्यते तत् सत्यम्| तस्य हेतुः सर्वलोकसामान्यज्ञानम्| एतत्प्रयोजनं सामान्योपदेशस्येति||८||

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Adhikarana 6 (9-10) · Śloka 10

অথাগ্নিবেশ উবাচ- কিম্মূলা ভগবন্! প্রবৃত্তিঃ, নিবৃত্তৌ চ ক উপায ইতি||৯|| ভগবানুবাচ- মোহেচ্ছাদ্বেষকর্মমূলা প্রবৃত্তিঃ| তজ্জা হ্যহঙ্কারসঙ্গসংশযাভিসম্প্লবাভ্যবপাতবিপ্রত্যযাবিশেষানুপাযাস্তরুণমিব দ্রুমমতিবিপুলশাখাস্তরবোঽভিভূয পুরুষমবতত্যৈবোত্তিষ্ঠন্তে; যৈরভিভূতো ন সত্তামতিবর্ততে| তত্রৈবঞ্জাতিরূপবিত্তবৃত্তবুদ্ধিশীলবিদ্যাভিজনবযোবীর্যপ্রভাবসম্পন্নোঽহমিত্যহঙ্কারঃ, যন্মনোবাক্কাযকর্ম নাপবর্গায স সঙ্গঃ, কর্মফলমোক্ষপুরুষপ্রেত্যভাবাদযঃ সন্তি বা নেতি সংশযঃ, সর্বাবস্থাস্বনন্যোঽহমহং স্রষ্টা স্বভাবসংসিদ্ধোঽহমহং শরীরেন্দ্রিযবুদ্ধিস্মৃতিবিশেষরাশিরিতি গ্রহণমভিসম্প্লবঃ, মম মাতৃপিতৃভ্রাতৃদারাপত্যবন্ধুমিত্রভৃত্যগণো গণস্য চাহমিত্যভ্যবপাতঃ, কার্যাকার্যহিতাহিতশুভাশুভেষু বিপরীতাভিনিবেশো বিপ্রত্যযঃ, জ্ঞাজ্ঞযোঃ প্রকৃতিবিকারযোঃ প্রবৃত্তিনিবৃত্ত্যোশ্চ সামান্যদর্শনমবিশেষঃ, প্রোক্ষণানশনাগ্নিহোত্রত্রিষবণাভ্যুক্ষণাবাহনযাজনযজনযাচনসলিলহুতাশনপ্রবেশাদযঃ সমারম্ভাঃ প্রোচ্যন্তে হ্যনুপাযাঃ| এবমযমধীধৃতিস্মৃতিরহঙ্কারাভিনিবিষ্টঃ সক্তঃ সসংশযোঽভিসম্প্লুতবুদ্ধিরভ্যবপতিতোঽন্যথাদৃষ্টিরবিশেষগ্রাহী বিমার্গগতির্নিবাসবৃক্ষঃ সত্ত্বশরীরদোষমূলানাং সর্বদুঃখানাং ভবতি| এবমহঙ্কারাদিভির্দোষৈর্ভ্রাম্যমাণো নাতিবর্ততে প্রবৃত্তিং, সা চ মূলমঘস্য||১০||

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अथाग्निवेश उवाच- किम्मूला भगवन्! प्रवृत्तिः, निवृत्तौ च क उपाय इति||९|| भगवानुवाच- मोहेच्छाद्वेषकर्ममूला प्रवृत्तिः| तज्जा ह्यहङ्कारसङ्गसंशयाभिसम्प्लवाभ्यवपातविप्रत्ययाविशेषानुपायास्तरुणमिव द्रुममतिविपुलशाखास्तरवोऽभिभूय पुरुषमवतत्यैवोत्तिष्ठन्ते; यैरभिभूतो न सत्तामतिवर्तते| तत्रैवञ्जातिरूपवित्तवृत्तबुद्धिशीलविद्याभिजनवयोवीर्यप्रभावसम्पन्नोऽहमित्यहङ्कारः, यन्मनोवाक्कायकर्म नापवर्गाय स सङ्गः, कर्मफलमोक्षपुरुषप्रेत्यभावादयः सन्ति वा नेति संशयः, सर्वावस्थास्वनन्योऽहमहं स्रष्टा स्वभावसंसिद्धोऽहमहं शरीरेन्द्रियबुद्धिस्मृतिविशेषराशिरिति ग्रहणमभिसम्प्लवः, मम मातृपितृभ्रातृदारापत्यबन्धुमित्रभृत्यगणो गणस्य चाहमित्यभ्यवपातः, कार्याकार्यहिताहितशुभाशुभेषु विपरीताभिनिवेशो विप्रत्ययः, ज्ञाज्ञयोः प्रकृतिविकारयोः प्रवृत्तिनिवृत्त्योश्च सामान्यदर्शनमविशेषः, प्रोक्षणानशनाग्निहोत्रत्रिषवणाभ्युक्षणावाहनयाजनयजनयाचनसलिलहुताशनप्रवेशादयः समारम्भाः प्रोच्यन्ते ह्यनुपायाः| एवमयमधीधृतिस्मृतिरहङ्काराभिनिविष्टः सक्तः ससंशयोऽभिसम्प्लुतबुद्धिरभ्यवपतितोऽन्यथादृष्टिरविशेषग्राही विमार्गगतिर्निवासवृक्षः सत्त्वशरीरदोषमूलानां सर्वदुःखानां भवति| एवमहङ्कारादिभिर्दोषैर्भ्राम्यमाणो नातिवर्तते प्रवृत्तिं, सा च मूलमघस्य||१०||

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Adhikarana 7 (11-12) · Śloka 12

নিবৃত্তিরপবর্গঃ; তত্ পরং প্রশান্তং তত্তদক্ষরং তদ্ব্রহ্ম স মোক্ষঃ||১১|| তত্র মুমুক্ষূণামুদযনানি ব্যাখ্যাস্যামঃ| তত্র লোকদোষদর্শিনো মুমুক্ষোরাদিত এবাচার্যাভিগমনং, তস্যোপদেশানুষ্ঠানম্, অগ্নেরেবোপচর্যা, ধর্মশাস্ত্রানুগমনং, তদার্থাববোধঃ, তেনাবষ্টম্ভঃ, তত্র যথোক্তাঃ ক্রিযাঃ, সতামুপাসনম্, অসতাং পরিবর্জনম্, অসঙ্গতির্দুর্জনেন, সত্যং সর্বভূতহিতমপরুষমনতিকালে পরীক্ষ্য বচনং, সর্বপ্রাণিষু চাত্মনীবাবেক্ষা, সর্বাসামস্মরণমসঙ্কল্পনমপ্রার্থনমনভিভাষণং চ স্ত্রীণাং, সর্বপরিগ্রহত্যাগঃ, কৌপীনং প্রচ্ছাদনার্থং, ধাতুরাগনিবসনং, কন্থাসীবনহেতোঃ সূচীপিপ্পলকং, শৌচাধানতোর্জলকুণ্ডিকা, দণ্ডধারণং, ভৈক্ষচর্যার্থং পাত্রং, প্রাণধারণার্থমেককালমগ্রাম্যো যথোপপন্নোঽভ্যবহারঃ, শ্রমাপনযনার্থং শীর্ণশুষ্কপর্ণতৃণাস্তরণোপধানং, ধ্যানহেতোঃ কাযনিবন্ধনং, বনেষ্বনিকেতবাসঃ, তন্দ্রানিন্দ্রালস্যাদিকর্মবর্জনং, ইন্দ্রিযার্থেষ্বনুরাগোপতাপনিগ্রহঃ, সুপ্তস্থিতগতপ্রেক্ষিতা হারবিহারপ্রত্যঙ্গচেষ্টাদিকেষ্বারম্ভেষু স্মৃতিপূর্বিকা প্রবৃত্তিঃ, সত্কারস্তুতিগর্হাবমানক্ষমত্বং, ক্ষুত্পিপাসাযাসশ্রমশীতোষ্ণবাতবর্ষাসুখদুঃখসংস্পর্শসহত্বং, শোকদৈন্যমানোদ্বেগমদলোভরাগের্ষ্যাভযক্রোধাদিভিরসঞ্চলনম্, অহঙ্কারাদিষূপসর্গসঞ্জ্ঞা, লোকপুরুষযোঃ সর্গাদিসামান্যাবেক্ষণং, কার্যকালাত্যযভযং, যোগারম্ভে সততমনির্বেদঃ, সত্ত্বোত্সাহঃ, অপবর্গায ধীধৃতিস্মৃতিবলাধানং; নিযমনমিন্দ্রিযাণাং চেতসি, চেতস আত্মনি, আত্মনশ্চ; ধাতুভেদেন শরীরাবযবসঙ্খ্যানমভীক্ষ্ণং, সর্বং কারণবদ্দুঃখমস্বমনিত্যমিত্যভ্যুপগমঃ, সর্বপ্রবৃত্তিষ্বঘসঞ্জ্ঞা , সর্বসন্ন্যাসে সুখমিত্যভিনিবেশঃ; এষ মার্গোঽপবর্গায, অতোঽন্যথা বধ্যতে; ইত্যুদযনানি ব্যাখ্যাতানি||১২||

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निवृत्तिरपवर्गः; तत् परं प्रशान्तं तत्तदक्षरं तद्ब्रह्म स मोक्षः||११|| तत्र मुमुक्षूणामुदयनानि व्याख्यास्यामः| तत्र लोकदोषदर्शिनो मुमुक्षोरादित एवाचार्याभिगमनं, तस्योपदेशानुष्ठानम्, अग्नेरेवोपचर्या, धर्मशास्त्रानुगमनं, तदार्थावबोधः, तेनावष्टम्भः, तत्र यथोक्ताः क्रियाः, सतामुपासनम्, असतां परिवर्जनम्, असङ्गतिर्दुर्जनेन, सत्यं सर्वभूतहितमपरुषमनतिकाले परीक्ष्य वचनं, सर्वप्राणिषु चात्मनीवावेक्षा, सर्वासामस्मरणमसङ्कल्पनमप्रार्थनमनभिभाषणं च स्त्रीणां, सर्वपरिग्रहत्यागः, कौपीनं प्रच्छादनार्थं, धातुरागनिवसनं, कन्थासीवनहेतोः सूचीपिप्पलकं, शौचाधानतोर्जलकुण्डिका, दण्डधारणं, भैक्षचर्यार्थं पात्रं, प्राणधारणार्थमेककालमग्राम्यो यथोपपन्नोऽभ्यवहारः, श्रमापनयनार्थं शीर्णशुष्कपर्णतृणास्तरणोपधानं, ध्यानहेतोः कायनिबन्धनं, वनेष्वनिकेतवासः, तन्द्रानिन्द्रालस्यादिकर्मवर्जनं, इन्द्रियार्थेष्वनुरागोपतापनिग्रहः, सुप्तस्थितगतप्रेक्षिता हारविहारप्रत्यङ्गचेष्टादिकेष्वारम्भेषु स्मृतिपूर्विका प्रवृत्तिः, सत्कारस्तुतिगर्हावमानक्षमत्वं, क्षुत्पिपासायासश्रमशीतोष्णवातवर्षासुखदुःखसंस्पर्शसहत्वं, शोकदैन्यमानोद्वेगमदलोभरागेर्ष्याभयक्रोधादिभिरसञ्चलनम्, अहङ्कारादिषूपसर्गसञ्ज्ञा, लोकपुरुषयोः सर्गादिसामान्यावेक्षणं, कार्यकालात्ययभयं, योगारम्भे सततमनिर्वेदः, सत्त्वोत्साहः, अपवर्गाय धीधृतिस्मृतिबलाधानं; नियमनमिन्द्रियाणां चेतसि, चेतस आत्मनि, आत्मनश्च; धातुभेदेन शरीरावयवसङ्ख्यानमभीक्ष्णं, सर्वं कारणवद्दुःखमस्वमनित्यमित्यभ्युपगमः, सर्वप्रवृत्तिष्वघसञ्ज्ञा , सर्वसन्न्यासे सुखमित्यभिनिवेशः; एष मार्गोऽपवर्गाय, अतोऽन्यथा बध्यते; इत्युदयनानि व्याख्यातानि||१२||

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Adhikarana 8 (13-15) · Śloka 15

ভবন্তি চাত্র- এতৈরবিমলং সত্ত্বং শুদ্ধ্যুপাযৈর্বিশুধ্যতি| মৃজ্যমান ইবাদর্শস্তৈলচেলকচাদিভিঃ||১৩|| গ্রহাম্বুদরজোধূমনীহারৈরসমাবৃতম্| যথাঽর্কমণ্ডলং ভাতি ভাতি সত্ত্বং তথাঽমলম্||১৪|| জ্বলত্যাত্মনি সংরুদ্ধং তত্ সত্ত্বং সংবৃতাযনে| শুদ্ধঃ স্থিরঃ প্রসন্নার্চির্দীপো দীপাশযে যথা||১৫||

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भवन्ति चात्र- एतैरविमलं सत्त्वं शुद्ध्युपायैर्विशुध्यति| मृज्यमान इवादर्शस्तैलचेलकचादिभिः||१३|| ग्रहाम्बुदरजोधूमनीहारैरसमावृतम्| यथाऽर्कमण्डलं भाति भाति सत्त्वं तथाऽमलम्||१४|| ज्वलत्यात्मनि संरुद्धं तत् सत्त्वं संवृतायने| शुद्धः स्थिरः प्रसन्नार्चिर्दीपो दीपाशये यथा||१५||

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Adhikarana 9 (16-19) · Śloka 19

শুদ্ধসত্ত্বস্য যা শুদ্ধা সত্যা বুদ্ধিঃ প্রবর্ততে| যযা ভিনত্ত্যতিবলং মহামোহমযং তমঃ||১৬|| সর্বভাবস্বভাবজ্ঞো যযা ভবতি নিঃস্পৃহঃ| যোগং যযা সাধযতে সাঙ্খ্যঃ সম্পদ্যতে যযা||১৭|| যযা নোপৈত্যহঙ্কারং নোপাস্তে কারণং যযা| যযা নালম্বতে কিঞ্চিত্ সর্বং সন্ন্যস্যতে যযা||১৮|| যাতি ব্রহ্ম যযা নিত্যমজরং শান্তমব্যযম্ | বিদ্যা সিদ্ধির্মতির্মেধা প্রজ্ঞা জ্ঞানং চ সা মতা||১৯||

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शुद्धसत्त्वस्य या शुद्धा सत्या बुद्धिः प्रवर्तते| यया भिनत्त्यतिबलं महामोहमयं तमः||१६|| सर्वभावस्वभावज्ञो यया भवति निःस्पृहः| योगं यया साधयते साङ्ख्यः सम्पद्यते यया||१७|| यया नोपैत्यहङ्कारं नोपास्ते कारणं यया| यया नालम्बते किञ्चित् सर्वं सन्न्यस्यते यया||१८|| याति ब्रह्म यया नित्यमजरं शान्तमव्ययम् | विद्या सिद्धिर्मतिर्मेधा प्रज्ञा ज्ञानं च सा मता||१९||

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Adhikarana 10 (20) · Śloka 20

লোকে বিততমাত্মানং লোকং চাত্মনি পশ্যতঃ| পরাবরদৃশঃ শান্তির্জ্ঞানমূলা ন নশ্যতি||২০||

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लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यतः| परावरदृशः शान्तिर्ज्ञानमूला न नश्यति||२०||

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Adhikarana 11 (21) · Śloka 21

পশ্যতঃ সর্বভাবান্ হি সর্বাবস্থাসু সর্বদা| ব্রহ্মভূতস্য সংযোগো ন শুদ্ধস্যোপপদ্যতে||২১||

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पश्यतः सर्वभावान् हि सर्वावस्थासु सर्वदा| ब्रह्मभूतस्य संयोगो न शुद्धस्योपपद्यते||२१||

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Adhikarana 12 (22) · Śloka 22

নাত্মনঃ করণাভাবাল্লিঙ্গমপ্যুপলভ্যতে| স সর্বকরণাযোগান্মুক্ত ইত্যভিধীযতে||২২||

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नात्मनः करणाभावाल्लिङ्गमप्युपलभ्यते| स सर्वकरणायोगान्मुक्त इत्यभिधीयते||२२||

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Adhikarana 13 (23-24) · Śloka 24

বিপাপং বিরজঃ শান্তং পরমক্ষরমব্যযম্| অমৃতং ব্রহ্ম নির্বাণং পর্যাযৈঃ শান্তিরুচ্যতে||২৩|| এতত্তত্ সৌম্য! বিজ্ঞানং যজ্জ্ঞাত্বা মুক্তসংশযাঃ| মুনযঃ প্রশমং জগ্মুর্বীতমোহরজঃস্পৃহাঃ||২৪||

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विपापं विरजः शान्तं परमक्षरमव्ययम्| अमृतं ब्रह्म निर्वाणं पर्यायैः शान्तिरुच्यते||२३|| एतत्तत् सौम्य! विज्ञानं यज्ज्ञात्वा मुक्तसंशयाः| मुनयः प्रशमं जग्मुर्वीतमोहरजःस्पृहाः||२४||

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Adhikarana 14 (25-26) · Śloka 26

তত্র শ্লোকৌ- সপ্রযোজনমুদ্দিষ্টং লোকস্য পুরুষস্য চ| সামান্যং মূলমুত্পত্তৌ নিবৃত্তৌ মার্গ এব চ||২৫|| শুদ্ধসত্ত্বসমাধানং সত্যা বুদ্ধিশ্চ নৈষ্ঠিকী| বিচযে পুরুষস্যোক্তা নিষ্ঠা চ পরমর্ষিণা||২৬||

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तत्र श्लोकौ- सप्रयोजनमुद्दिष्टं लोकस्य पुरुषस्य च| सामान्यं मूलमुत्पत्तौ निवृत्तौ मार्ग एव च||२५|| शुद्धसत्त्वसमाधानं सत्या बुद्धिश्च नैष्ठिकी| विचये पुरुषस्योक्ता निष्ठा च परमर्षिणा||२६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 5

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শারীরস্থানে পুরুষবিচযশারীরং নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ||৫||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने पुरुषविचयशारीरं नाम पञ्चमोऽध्यायः||५||

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5. puruṣavicayaśārīram — Charaka Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi