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6. śarīravicayaśārīram

Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3

অথাতঃ শরীরবিচযং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২|| শরীরবিচযঃ শরীরোপকারার্থমিষ্যতে| জ্ঞাত্বা হি শরীরতত্ত্বং শরীরোপকারকরেষু ভাবেষু জ্ঞানমুত্পদ্যতে| তস্মাচ্ছরীরবিচযং প্রশংসন্তি কুশলাঃ||৩||

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अथातः शरीरविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२|| शरीरविचयः शरीरोपकारार्थमिष्यते| ज्ञात्वा हि शरीरतत्त्वं शरीरोपकारकरेषु भावेषु ज्ञानमुत्पद्यते| तस्माच्छरीरविचयं प्रशंसन्ति कुशलाः||३||

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Adhikarana 2 (4) · Śloka 4

তত্র শরীরং নাম চেতনাধিষ্ঠানভূতং পঞ্চমহাভূতবিকারসমুদাযাত্মকং সমযোগবাহি | যদা হ্যস্মিঞ্ শরীরে ধাতবো বৈষম্যমাপদ্যন্তে তদা ক্লেশং বিনাশং বা প্রাপ্নোতি| বৈষম্যগমনং হি পুনর্ধাতূনাং বৃদ্ধিহ্রাসগমনমকার্ত্স্ন্যেন প্রকৃত্যা চ||৪||

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तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मकं समयोगवाहि | यदा ह्यस्मिञ् शरीरे धातवो वैषम्यमापद्यन्ते तदा क्लेशं विनाशं वा प्राप्नोति| वैषम्यगमनं हि पुनर्धातूनां वृद्धिह्रासगमनमकार्त्स्न्येन प्रकृत्या च||४||

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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5

যৌগপদ্যেন তু বিরোধিনাং ধাতূনাং বৃদ্ধিহ্রাসৌ ভবতঃ| যদ্ধি যস্য ধাতোর্বৃদ্ধিকরং তত্ততো বিপরীতগুণস্য ধাতোঃ প্রত্যবাযকরং সম্পদ্যতে||৫||

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यौगपद्येन तु विरोधिनां धातूनां वृद्धिह्रासौ भवतः| यद्धि यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्ततो विपरीतगुणस्य धातोः प्रत्यवायकरं सम्पद्यते||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6

তদেব তস্মাদ্ভেষজং সম্যগবচার্যমাণং যুগপন্ন্যূনাতিরিক্তানাং ধাতূনাং সাম্যকরং ভবতি, অধিকমপকর্ষতি ন্যূনমাপ্যাযযতি||৬||

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तदेव तस्माद्भेषजं सम्यगवचार्यमाणं युगपन्न्यूनातिरिक्तानां धातूनां साम्यकरं भवति, अधिकमपकर्षति न्यूनमाप्याययति||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

এতাবদেব হি ভৈষজ্যপ্রযোগে ফলমিষ্টং স্বস্থবৃত্তানুষ্ঠানে চ যাবদ্ধাতূনাং সাম্যং স্যাত্| স্বস্থা হ্যপি ধাতূনাং সাম্যানুগ্রহার্থমেব কুশলা রসগুণানাহারবিকারাংশ্চ পর্যাযেণেচ্ছন্ত্যুপযোক্তুং সাত্ম্যসমাজ্ঞাতান্; একপ্রকারভূযিষ্ঠাংশ্চোপযুঞ্জানাস্তদ্বিপরীতকরসমাজ্ঞাতযা চেষ্টযা সমমিচ্ছন্তি কর্তুম্||৭||

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एतावदेव हि भैषज्यप्रयोगे फलमिष्टं स्वस्थवृत्तानुष्ठाने च यावद्धातूनां साम्यं स्यात्| स्वस्था ह्यपि धातूनां साम्यानुग्रहार्थमेव कुशला रसगुणानाहारविकारांश्च पर्यायेणेच्छन्त्युपयोक्तुं सात्म्यसमाज्ञातान्; एकप्रकारभूयिष्ठांश्चोपयुञ्जानास्तद्विपरीतकरसमाज्ञातया चेष्टया सममिच्छन्ति कर्तुम्||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

দেশকালাত্মগুণবিপরীতানাং হি কর্মণামাহারবিকারাণাং চ ক্রিযোপযোগঃ সম্যক্, সর্বাতিযোগসন্ধারণম্, অসন্ধারণমুদীর্ণানাং চ গতিমতাং, সাহসানাং চ বর্জনং, স্বস্থবৃত্তমেতাবদ্ধাতূনাং সাম্যানুগ্রহার্থমুপদিশ্যতে||৮||

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देशकालात्मगुणविपरीतानां हि कर्मणामाहारविकाराणां च क्रियोपयोगः सम्यक्, सर्वातियोगसन्धारणम्, असन्धारणमुदीर्णानां च गतिमतां, साहसानां च वर्जनं, स्वस्थवृत्तमेतावद्धातूनां साम्यानुग्रहार्थमुपदिश्यते||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

ধাতবঃ পুনঃ শারীরাঃ সমানগুণৈঃ সমানগুণভূযিষ্ঠৈর্বাঽপ্যাহারবিকারৈরভ্যস্যমানৈর্বৃদ্ধিং প্রাপ্নুবন্তি, হ্রাসং তু বিপরীতগুণৈর্বিপরীতগুণভূযিষ্ঠৈর্বাঽপ্যাহারৈরভ্যস্যমানৈঃ||৯||

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धातवः पुनः शारीराः समानगुणैः समानगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारविकारैरभ्यस्यमानैर्वृद्धिं प्राप्नुवन्ति, ह्रासं तु विपरीतगुणैर्विपरीतगुणभूयिष्ठैर्वाऽप्याहारैरभ्यस्यमानैः||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

তত্রেমে শরীরধাতুগুণাঃ সঙ্খ্যাসামর্থ্যকরাঃ; তদ্যথা- গুরুলঘুশীতোষ্ণস্নিগ্ধরূক্ষমন্দতীক্ষ্ণস্থিরসরমৃদুকঠিনবিশদপিচ্ছিলশ্লক্ষ্ণখরসূক্ষ্মস্থূলসান্দ্রদ্রবাঃ| তেষু যে গুরবস্তে গুরুভিরাহারবিকারগুণৈরভ্যস্যমানৈরাপ্যায্যন্তে, লঘবশ্চ হ্রসন্তি; লঘবস্তু লঘুভিরাপ্যায্যন্তে, গুরবশ্চ হ্রসন্তি| এবমেব সর্বধাতুগুণানাং সামান্যযোগাদ্বৃদ্ধিঃ, বিপর্যযাদ্ধ্রাসঃ| তস্মান্মাংসমাপ্যায্যতে মাংসেন ভূযস্তরমন্যেভ্যঃ শরীরধাতুভ্যঃ, তথা লোহিতং লোহিতেন, মেদো মেদসা, বসা বসযা, অস্থি তরুণাস্থ্না, মজ্জা মজ্জ্ঞা, শুক্রং শুক্রেণ, গর্ভস্ত্বামগর্ভেণ||১০||

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तत्रेमे शरीरधातुगुणाः सङ्ख्यासामर्थ्यकराः; तद्यथा- गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षमन्दतीक्ष्णस्थिरसरमृदुकठिनविशदपिच्छिलश्लक्ष्णखरसूक्ष्मस्थूलसान्द्रद्रवाः| तेषु ये गुरवस्ते गुरुभिराहारविकारगुणैरभ्यस्यमानैराप्याय्यन्ते, लघवश्च ह्रसन्ति; लघवस्तु लघुभिराप्याय्यन्ते, गुरवश्च ह्रसन्ति| एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद्वृद्धिः, विपर्ययाद्ध्रासः| तस्मान्मांसमाप्याय्यते मांसेन भूयस्तरमन्येभ्यः शरीरधातुभ्यः, तथा लोहितं लोहितेन, मेदो मेदसा, वसा वसया, अस्थि तरुणास्थ्ना, मज्जा मज्ज्ञा, शुक्रं शुक्रेण, गर्भस्त्वामगर्भेण||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

যত্র ত্বেবংলক্ষণেন সামান্যেন সামান্যবতামাহারবিকারাণামসান্নিধ্যং স্যাত্, সন্নিহিতানাং বাঽপ্যযুক্তত্বান্নোপযোগো ঘৃণিত্বাদন্যস্মাদ্বা কারণাত্, স চ ধাতুরভিবর্ধযিতব্যঃ স্যাত্, তস্য যে সমানগুণাঃ স্যুরাহারবিকারা অসেব্যাশ্চ, তত্র সমানগুণভূযিষ্ঠানামন্যপ্রকৃতীনামপ্যাহারবিকারাণামুপযোগঃ স্যাত্| তদ্যথা- শুক্রক্ষযে ক্ষীরসর্পিষোরুপযোগো মধুরস্নিগ্ধশীতসমাখ্যাতানাং চাপরেষাং দ্রব্যাণাং, মূত্রক্ষযে পুনরিক্ষুরসবারুণীমণ্ডদ্রবমধুরাম্ললবণোপক্লেদিনাং, পুরীষক্ষযে কুল্মাষমাষকুষ্কুণ্ডাজমধ্যযবশাকধান্যাম্লানাং, বাতক্ষযে কটুকতিক্তকষাযরূক্ষলঘুশীতানাং, পিত্তক্ষযেঽম্ললবণকটুকক্ষারোষ্ণতীক্ষ্ণানাং, শ্লেষ্মক্ষযে স্নিগ্ধগুরুমধুরসান্দ্রপিচ্ছিলানাং দ্রব্যাণাম্| কর্মাপি যদ্যস্য ধাতোর্বৃদ্ধিকরং তত্তদাসেব্যম্| এবমন্যেষামপি শরীরধাতূনাং সামান্যবিপর্যযাভ্যাং বৃদ্ধিহ্রাসৌ যথাকালং কার্যৌ| ইতি সর্বধাতূনামেকৈকশোঽতিদেশতশ্চ বৃদ্ধিহ্রাসকরাণি ব্যাখ্যাতানি ভবন্তি||১১||

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यत्र त्वेवंलक्षणेन सामान्येन सामान्यवतामाहारविकाराणामसान्निध्यं स्यात्, सन्निहितानां वाऽप्ययुक्तत्वान्नोपयोगो घृणित्वादन्यस्माद्वा कारणात्, स च धातुरभिवर्धयितव्यः स्यात्, तस्य ये समानगुणाः स्युराहारविकारा असेव्याश्च, तत्र समानगुणभूयिष्ठानामन्यप्रकृतीनामप्याहारविकाराणामुपयोगः स्यात्| तद्यथा- शुक्रक्षये क्षीरसर्पिषोरुपयोगो मधुरस्निग्धशीतसमाख्यातानां चापरेषां द्रव्याणां, मूत्रक्षये पुनरिक्षुरसवारुणीमण्डद्रवमधुराम्ललवणोपक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माषमाषकुष्कुण्डाजमध्ययवशाकधान्याम्लानां, वातक्षये कटुकतिक्तकषायरूक्षलघुशीतानां, पित्तक्षयेऽम्ललवणकटुकक्षारोष्णतीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्धगुरुमधुरसान्द्रपिच्छिलानां द्रव्याणाम्| कर्मापि यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्तदासेव्यम्| एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिह्रासौ यथाकालं कार्यौ| इति सर्वधातूनामेकैकशोऽतिदेशतश्च वृद्धिह्रासकराणि व्याख्यातानि भवन्ति||११||

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12

কার্ত্স্ন্যেন শরীরবৃদ্ধিকরাস্ত্বিমে ভাবা ভবন্তি; তদ্যথা- কালযোগঃ, স্বভাবসংসিদ্ধিঃ, আহারসৌষ্ঠবম্, অবিঘাতশ্চেতি||১২||

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कार्त्स्न्येन शरीरवृद्धिकरास्त्विमे भावा भवन्ति; तद्यथा- कालयोगः, स्वभावसंसिद्धिः, आहारसौष्ठवम्, अविघातश्चेति||१२||

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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13

বলবৃদ্ধিকরাস্ত্বিমে ভাবা ভবন্তি| তদ্যথা- বলবত্পুরুষে দেশে জন্ম বলবত্পুরুষে কালে চ, সুখশ্চ কালযোগঃ, বীজক্ষেত্রগুণসম্পচ্চ, আহারসম্পচ্চ, শরীরসম্পচ্চ, সাত্ম্যসম্পচ্চ, সত্ত্বসম্পচ্চ, স্বভাবসংসিদ্ধিশ্চ, যৌবনং চ, কর্ম চ, সংহর্ষশ্চেতি||১৩||

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बलवृद्धिकरास्त्विमे भावा भवन्ति| तद्यथा- बलवत्पुरुषे देशे जन्म बलवत्पुरुषे काले च, सुखश्च कालयोगः, बीजक्षेत्रगुणसम्पच्च, आहारसम्पच्च, शरीरसम्पच्च, सात्म्यसम्पच्च, सत्त्वसम्पच्च, स्वभावसंसिद्धिश्च, यौवनं च, कर्म च, संहर्षश्चेति||१३||

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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14

আহারপরিণামকরাস্ত্বিমে ভাবা ভবন্তি| তদ্যথা- ঊষ্মা, বাযুঃ, ক্লেদঃ, স্নেহঃ, কালঃ, সমযোগশ্চেতি ||১৪||

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आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति| तद्यथा- ऊष्मा, वायुः, क्लेदः, स्नेहः, कालः, समयोगश्चेति ||१४||

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Adhikarana 13 (15) · Śloka 15

তত্র তু খল্বেষামূষ্মাদীনামাহারপরিণামকরাণাং ভাবানামিমে কর্মবিশেষা ভবন্তি| তদ্যথা- ঊষ্মা পচতি, বাযুরপকর্ষতি, ক্লেদঃ শৈথিল্যমাপাদযতি, স্নেহো মার্দবং জনযতি, কালঃ পর্যাপ্তিমভিনির্বর্তযতি, সমযোগস্ত্বেষাং পরিণামধাতুসাম্যকরঃ সম্পদ্যতে||১৫||

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तत्र तु खल्वेषामूष्मादीनामाहारपरिणामकराणां भावानामिमे कर्मविशेषा भवन्ति| तद्यथा- ऊष्मा पचति, वायुरपकर्षति, क्लेदः शैथिल्यमापादयति, स्नेहो मार्दवं जनयति, कालः पर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति, समयोगस्त्वेषां परिणामधातुसाम्यकरः सम्पद्यते||१५||

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Adhikarana 14 (16) · Śloka 16

পরিণমতস্ত্বাহারস্য গুণাঃ শরীরগুণভাবমাপদ্যন্তে যথাস্বমবিরুদ্ধাঃ; বিরুদ্ধাশ্চ বিহন্যুর্বিহতাশ্চ বিরোধিভিঃ শরীরম্||১৬||

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परिणमतस्त्वाहारस्य गुणाः शरीरगुणभावमापद्यन्ते यथास्वमविरुद्धाः; विरुद्धाश्च विहन्युर्विहताश्च विरोधिभिः शरीरम्||१६||

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Adhikarana 15 (17) · Śloka 17

শরীরগুণাঃ পুনর্দ্বিবিধাঃ সঙ্গ্রহেণ- মলভূতাঃ, প্রসাদভূতাশ্চ| তত্র মলভূতাস্তে যে শরীরস্যাবাধকরাঃ স্যুঃ| তদ্যথা- শরীরচ্ছিদ্রেষূপদেহাঃ পৃথগ্জন্মানো বহির্মুখাঃ, পরিপক্বাশ্চ ধাতবঃ, প্রকুপিতাশ্চ বাতপিত্তশ্লেষ্মাণঃ, যে চান্যেঽপি কেচিচ্ছরীরে তিষ্ঠন্তো ভাবাঃ শরীরস্যোপঘাতাযোপপদ্যন্তে, সর্বাংস্তান্মলে সঞ্চক্ষ্মহে; ইতরাংস্তু প্রসাদে , গুর্বাদীংশ্চ দ্রবান্তান্ গুণভেদেন, রসাদীংশ্চ শুক্রান্তান্ দ্রব্যভেদেন||১৭||

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शरीरगुणाः पुनर्द्विविधाः सङ्ग्रहेण- मलभूताः, प्रसादभूताश्च| तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्याबाधकराः स्युः| तद्यथा- शरीरच्छिद्रेषूपदेहाः पृथग्जन्मानो बहिर्मुखाः, परिपक्वाश्च धातवः, प्रकुपिताश्च वातपित्तश्लेष्माणः, ये चान्येऽपि केचिच्छरीरे तिष्ठन्तो भावाः शरीरस्योपघातायोपपद्यन्ते, सर्वांस्तान्मले सञ्चक्ष्महे; इतरांस्तु प्रसादे , गुर्वादींश्च द्रवान्तान् गुणभेदेन, रसादींश्च शुक्रान्तान् द्रव्यभेदेन||१७||

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Adhikarana 16 (18) · Śloka 18

তেষাং সর্বেষামেব বাতপিত্তশ্লেষ্মাণো দুষ্টা দূষযিতারো ভবন্তি, দোষস্বভাবাত্| বাতাদীনাং পুনর্ধাত্বন্তরে কালান্তরে প্রদুষ্টানাং বিবিধাশিতপীতীযেঽধ্যাযে বিজ্ঞানান্যুক্তানি| এতাবত্যেব দুষ্টদোষগতির্যাবত্ সংস্পর্শনাচ্ছরীরধাতূনাম্| প্রকৃতিভূতানাং তু খলু বাতাদীনাং ফলমারোগ্যম্| তস্মাদেষাং প্রকৃতিভাবে প্রযতিতব্যং বুদ্ধিমদ্ভিরিতি||১৮||

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तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेष्माणो दुष्टा दूषयितारो भवन्ति, दोषस्वभावात्| वातादीनां पुनर्धात्वन्तरे कालान्तरे प्रदुष्टानां विविधाशितपीतीयेऽध्याये विज्ञानान्युक्तानि| एतावत्येव दुष्टदोषगतिर्यावत् संस्पर्शनाच्छरीरधातूनाम्| प्रकृतिभूतानां तु खलु वातादीनां फलमारोग्यम्| तस्मादेषां प्रकृतिभावे प्रयतितव्यं बुद्धिमद्भिरिति||१८||

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Adhikarana 17 (19) · Śloka 19

ভবতি চাত্র- শরীরং সর্বথা সর্বং সর্বদা বেদ যো ভিষক্| আযুর্বেদং স কার্ত্স্ন্যেন বেদ লোকসুখপ্রদম্||১৯||

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भवति चात्र- शरीरं सर्वथा सर्वं सर्वदा वेद यो भिषक्| आयुर्वेदं स कार्त्स्न्येन वेद लोकसुखप्रदम्||१९||

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Adhikarana 18 (20) · Śloka 20

এবংবাদিনং ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ শ্রুতমেতদ্যদুক্তং ভগবতা শরীরাধিকারে বচঃ| কিন্নু খলু গর্ভস্যাঙ্গং পূর্বমভিনির্বর্ততে কুক্ষৌ, কুতো মুখঃ কথং চান্তর্গতস্তিষ্ঠতি, কিমাহারশ্চ বর্তযতি, কথম্ভূতশ্চ নিষ্ক্রামতি, কৈশ্চাযমাহারোপচারৈর্জাতঃ সদ্যো হন্যতে, কৈরব্যাধিরভিবর্ধতে, কিঞ্চাস্য দেবাদিপ্রকোপনিমিত্তা বিকারাঃ সম্ভবন্তি আহোস্বিন্ন, কিঞ্চাস্য কালাকালমৃত্য্বোর্ভাবাভাবযোর্ভগবানধ্যবস্যতি, কিঞ্চাস্য পরমাযুঃ, কানি চাস্য পরমাযুষো নিমিত্তানীতি||২০||

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एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच श्रुतमेतद्यदुक्तं भगवता शरीराधिकारे वचः| किन्नु खलु गर्भस्याङ्गं पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, कुतो मुखः कथं चान्तर्गतस्तिष्ठति, किमाहारश्च वर्तयति, कथम्भूतश्च निष्क्रामति, कैश्चायमाहारोपचारैर्जातः सद्यो हन्यते, कैरव्याधिरभिवर्धते, किञ्चास्य देवादिप्रकोपनिमित्ता विकाराः सम्भवन्ति आहोस्विन्न, किञ्चास्य कालाकालमृत्य्वोर्भावाभावयोर्भगवानध्यवस्यति, किञ्चास्य परमायुः, कानि चास्य परमायुषो निमित्तानीति||२०||

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Adhikarana 19 (21) · Śloka 21

তমেবমুক্তবন্তমগ্নিবেশং ভগবান্ পুনর্বসুরাত্রেয উবাচ- পূর্বমুক্তমেতদ্গর্ভাবক্রান্তৌ যথাঽযমভিনির্বর্ততে কুক্ষৌ, যচ্চাস্য যদা সন্তিষ্ঠতেঽঙ্গজাতম্| বিপ্রতিবাদাস্ত্বত্র বহুবিধাঃ সূত্রকৃতামৃষীণাং সন্তি সর্বেষাং; তানপি নিবোধোচ্যমানান্- শিরঃ পূর্বমভিনির্বর্ততে কুক্ষাবিতি কুমারশিরা ভরদ্বাজঃ পশ্যতি, সর্বেন্দ্রিযাণাং তদধিষ্ঠানমিতি কৃত্বা; হৃদযমিতি কাঙ্কাযনো বাহ্লীকভিষক্, চেতনাধিষ্ঠানত্বাত্; নাভিরিতি ভদ্রকাপ্যঃ, আহারাগম ইতি কৃত্বা; পক্বাশযগুদমিতি ভদ্রশৌনকঃ, মারুতাধিষ্ঠানত্বাত্; হস্তপাদমিতি বডিশঃ, তত্করণত্বাত্ পুরুষস্য; ইন্দ্রিযাণীতি জনকো বৈদেহঃ, তান্যস্য বুদ্ধ্যধিষ্ঠানানীতি কৃত্বা; পরোক্ষত্বাদচিন্ত্যমিতি মারীচিঃ কশ্যপঃ; সর্বাঙ্গাভিনির্বৃত্তির্যুগপদিতি ধন্বন্তরিঃ; তদুপপন্নং, সর্বাঙ্গানাং তুল্যকালাভিনির্বৃত্তত্বাদ্ধৃদযপ্রভৃতীনাম্| সর্বাঙ্গানাং হ্যস্য হৃদযং মূলমধিষ্ঠানং চ কেষাঞ্চিদ্ভাবানাম্, নচ তস্মাত্ পূর্বাভিনির্বৃত্তিরেষাং; তস্মাদ্ধৃদযপ্রভৃতীনাং সর্বাঙ্গানাং তুল্যকালাভিনির্বৃত্তিঃ, সর্বে ভাবা হ্যন্যোন্যপ্রতিবদ্ধাঃ; তস্মাদ্যথাভূতদর্শনং সাধু||২১||

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तमेवमुक्तवन्तमग्निवेशं भगवान् पुनर्वसुरात्रेय उवाच- पूर्वमुक्तमेतद्गर्भावक्रान्तौ यथाऽयमभिनिर्वर्तते कुक्षौ, यच्चास्य यदा सन्तिष्ठतेऽङ्गजातम्| विप्रतिवादास्त्वत्र बहुविधाः सूत्रकृतामृषीणां सन्ति सर्वेषां; तानपि निबोधोच्यमानान्- शिरः पूर्वमभिनिर्वर्तते कुक्षाविति कुमारशिरा भरद्वाजः पश्यति, सर्वेन्द्रियाणां तदधिष्ठानमिति कृत्वा; हृदयमिति काङ्कायनो बाह्लीकभिषक्, चेतनाधिष्ठानत्वात्; नाभिरिति भद्रकाप्यः, आहारागम इति कृत्वा; पक्वाशयगुदमिति भद्रशौनकः, मारुताधिष्ठानत्वात्; हस्तपादमिति बडिशः, तत्करणत्वात् पुरुषस्य; इन्द्रियाणीति जनको वैदेहः, तान्यस्य बुद्ध्यधिष्ठानानीति कृत्वा; परोक्षत्वादचिन्त्यमिति मारीचिः कश्यपः; सर्वाङ्गाभिनिर्वृत्तिर्युगपदिति धन्वन्तरिः; तदुपपन्नं, सर्वाङ्गानां तुल्यकालाभिनिर्वृत्तत्वाद्धृदयप्रभृतीनाम्| सर्वाङ्गानां ह्यस्य हृदयं मूलमधिष्ठानं च केषाञ्चिद्भावानाम्, नच तस्मात् पूर्वाभिनिर्वृत्तिरेषां; तस्माद्धृदयप्रभृतीनां सर्वाङ्गानां तुल्यकालाभिनिर्वृत्तिः, सर्वे भावा ह्यन्योन्यप्रतिबद्धाः; तस्माद्यथाभूतदर्शनं साधु||२१||

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Adhikarana 20 (22) · Śloka 22

গর্ভস্তু খলু মাতুঃ পৃষ্ঠাভিমুখ ঊর্ধ্বশিরাঃ সঙ্কুচ্যাঙ্গান্যাস্তেঽন্তঃকুক্ষৌ ||২২||

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गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः सङ्कुच्याङ्गान्यास्तेऽन्तःकुक्षौ ||२२||

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Adhikarana 21 (23) · Śloka 23

ব্যপগতপিপাসাবুভুক্ষস্তু খলু গর্ভঃ পরতন্ত্রবৃত্তির্মাতরমাশ্রিত্য বর্তযত্যুপস্নেহোপস্বেদাভ্যাং গর্ভাশযে সদসদ্ভূতাঙ্গাবযবঃ, তদনন্তরং হ্যস্য কশ্চিল্লোমকূপাযনৈরুপস্নেহঃ কশ্চিন্নাভিনাড্যযনৈঃ| নাভ্যাং হ্যস্য নাডী প্রসক্তা, নাড্যাং চাপরা, অপরা চাস্য মাতুঃ প্রসক্তা হৃদযে, মাতৃহৃদযং হ্যস্য তামপরামভিসম্প্লবতে সিরাভিঃ স্যন্দমানাভিঃ ; স তস্য রসো বলবর্ণকরঃ সম্পদ্যতে, স চ সর্বরসবানাহারঃ| স্ত্রিযা হ্যাপন্নগর্ভাযাস্ত্রিধা রসঃ প্রতিপদ্যতে- স্বশরীরপুষ্টযে, স্তন্যায, গর্ভবৃদ্ধযে চ| স তেনাহারেণোপষ্টব্ধঃ (পরতন্ত্রবৃত্তির্মাতরমাশ্রিত্য) বর্তযত্যন্তর্গতঃ||২৩||

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व्यपगतपिपासाबुभुक्षस्तु खलु गर्भः परतन्त्रवृत्तिर्मातरमाश्रित्य वर्तयत्युपस्नेहोपस्वेदाभ्यां गर्भाशये सदसद्भूताङ्गावयवः, तदनन्तरं ह्यस्य कश्चिल्लोमकूपायनैरुपस्नेहः कश्चिन्नाभिनाड्ययनैः| नाभ्यां ह्यस्य नाडी प्रसक्ता, नाड्यां चापरा, अपरा चास्य मातुः प्रसक्ता हृदये, मातृहृदयं ह्यस्य तामपरामभिसम्प्लवते सिराभिः स्यन्दमानाभिः ; स तस्य रसो बलवर्णकरः सम्पद्यते, स च सर्वरसवानाहारः| स्त्रिया ह्यापन्नगर्भायास्त्रिधा रसः प्रतिपद्यते- स्वशरीरपुष्टये, स्तन्याय, गर्भवृद्धये च| स तेनाहारेणोपष्टब्धः (परतन्त्रवृत्तिर्मातरमाश्रित्य) वर्तयत्यन्तर्गतः||२३||

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Adhikarana 22 (24) · Śloka 24

স চোপস্থিতকালে জন্মনি প্রসূতিমারুতযোগাত্ পরিবৃত্ত্যাবাক্শিরা নিষ্ক্রামত্যপত্যপথেন, এষা প্রকৃতিঃ, বিকৃতিঃ পুনরতোঽন্যথা| পরং ত্বতঃ স্বতন্ত্রবৃত্তির্ভবতি||২৪||

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स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूतिमारुतयोगात् परिवृत्त्यावाक्शिरा निष्क्रामत्यपत्यपथेन, एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा| परं त्वतः स्वतन्त्रवृत्तिर्भवति||२४||

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Adhikarana 23 (25-26) · Śloka 26

তস্যাহারোপচারৌ জাতিসূত্রীযোপদিষ্টাববিকারকরৌ চাভিবৃদ্ধিকরৌ ভবতঃ||২৫|| তাভ্যামেব চ বিষমসেবিতাভ্যাং জাতঃ সদ্য উপহন্যতে তরুরিবাচিরব্যপরোপিতো বাতাতপাভ্যামপ্রতিষ্ঠিতমূলঃ||২৬||

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तस्याहारोपचारौ जातिसूत्रीयोपदिष्टावविकारकरौ चाभिवृद्धिकरौ भवतः||२५|| ताभ्यामेव च विषमसेविताभ्यां जातः सद्य उपहन्यते तरुरिवाचिरव्यपरोपितो वातातपाभ्यामप्रतिष्ठितमूलः||२६||

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Adhikarana 24 (27) · Śloka 27

আপ্তোপদেশাদদ্ভুতরূপদর্শনাত্ সমুত্থানলিঙ্গচিকিত্সিতবিশেষাচ্চাদোষপ্রকোপানুরূপা দেবাদিপ্রকোপনিমিত্তা বিকারাঃ সমুপলভ্যন্তে||২৭||

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आप्तोपदेशादद्भुतरूपदर्शनात् समुत्थानलिङ्गचिकित्सितविशेषाच्चादोषप्रकोपानुरूपा देवादिप्रकोपनिमित्ता विकाराः समुपलभ्यन्ते||२७||

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Adhikarana 25 (28) · Śloka 28

কালাকালমৃত্য্বোস্তু খলু ভাবাভাবযোরিদমধ্যবসিতং নঃ- “যঃ কশ্চিন্ ম্রিযতে স কাল এব ম্রিযতে, ন হি কালচ্ছিদ্রমস্তি” ইত্যেকে ভাষন্তে| তচ্চাসম্যক্| ন হ্যচ্ছিদ্রতা সচ্ছিদ্রতা বা কালস্যোপপদ্যতে, কালস্বলক্ষণস্বভাবাত্| তত্রাহুরপরে- যো যদা ম্রিযতে স তস্য নিযতো মৃত্যুকালঃ; স সর্বভূতানাং সত্যঃ, সমক্রিযত্বাদিতি| এতদপি চান্যথাঽর্থগ্রহণম্| ন হি কশ্চিন্ন ম্রিযত ইতি সমক্রিযঃ| কালো হ্যাযুষঃ প্রমাণমধিকৃত্যোচ্যতে| যস্য চেষ্টং যো যদা ম্রিযতে স তস্য মৃত্যুকাল ইতি, তস্য সর্বে ভাবা যথাস্বং নিযতকালা ভবিষ্যন্তি; তচ্চ নোপপদ্যতে, প্রত্যক্ষং হ্যকালাহারবচনকর্মণাং ফলমনিষ্টং, বিপর্যযে চেষ্টং; প্রত্যক্ষতশ্চোপলভ্যতে খলু কালাকালব্যক্তিস্তাসু তাস্ববস্থাসু তং তমর্থমভিসমীক্ষ্য, তদ্যথা- কালোঽযমস্য ব্যাধেরাহারস্যৌষধস্য প্রতিকর্মণো বিসর্গস্য, অকালো বেতি| লোকেঽপ্যেতদ্ভবতি- কালে দেবো বর্ষত্যকালে দেবো বর্ষতি, কালে শীতমকালে শীতং, কালে তপত্যকালে তপতি, কালে পুষ্পফলমকালে চ পুষ্পফলমিতি| তস্মাদুভযমস্তি- কালে মৃত্যুরকালে চ; নৈকান্তিকমত্র| যদি হ্যকালে মৃত্যুর্ন স্যান্নিযতকালপ্রমাণমাযুঃ সর্বং স্যাত্; এবং গতে হিতাহিতজ্ঞানমকারণং স্যাত্, প্রত্যক্ষানুমানোপদেশাশ্চাপ্রমাণানি স্যুর্যে প্রমাণভূতাঃ সর্বতন্ত্রেষু, যৈরাযুষ্যাণ্যনাযুষ্যাণি চোপলভ্যন্তে| বাগ্বস্তুমাত্রমেতদ্বাদমৃষযো মন্যন্তে- নাকালে মৃত্যুরস্তীতি||২৮||

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कालाकालमृत्य्वोस्तु खलु भावाभावयोरिदमध्यवसितं नः- “यः कश्चिन् म्रियते स काल एव म्रियते, न हि कालच्छिद्रमस्ति” इत्येके भाषन्ते| तच्चासम्यक्| न ह्यच्छिद्रता सच्छिद्रता वा कालस्योपपद्यते, कालस्वलक्षणस्वभावात्| तत्राहुरपरे- यो यदा म्रियते स तस्य नियतो मृत्युकालः; स सर्वभूतानां सत्यः, समक्रियत्वादिति| एतदपि चान्यथाऽर्थग्रहणम्| न हि कश्चिन्न म्रियत इति समक्रियः| कालो ह्यायुषः प्रमाणमधिकृत्योच्यते| यस्य चेष्टं यो यदा म्रियते स तस्य मृत्युकाल इति, तस्य सर्वे भावा यथास्वं नियतकाला भविष्यन्ति; तच्च नोपपद्यते, प्रत्यक्षं ह्यकालाहारवचनकर्मणां फलमनिष्टं, विपर्यये चेष्टं; प्रत्यक्षतश्चोपलभ्यते खलु कालाकालव्यक्तिस्तासु तास्ववस्थासु तं तमर्थमभिसमीक्ष्य, तद्यथा- कालोऽयमस्य व्याधेराहारस्यौषधस्य प्रतिकर्मणो विसर्गस्य, अकालो वेति| लोकेऽप्येतद्भवति- काले देवो वर्षत्यकाले देवो वर्षति, काले शीतमकाले शीतं, काले तपत्यकाले तपति, काले पुष्पफलमकाले च पुष्पफलमिति| तस्मादुभयमस्ति- काले मृत्युरकाले च; नैकान्तिकमत्र| यदि ह्यकाले मृत्युर्न स्यान्नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं स्यात्; एवं गते हिताहितज्ञानमकारणं स्यात्, प्रत्यक्षानुमानोपदेशाश्चाप्रमाणानि स्युर्ये प्रमाणभूताः सर्वतन्त्रेषु, यैरायुष्याण्यनायुष्याणि चोपलभ्यन्ते| वाग्वस्तुमात्रमेतद्वादमृषयो मन्यन्ते- नाकाले मृत्युरस्तीति||२८||

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Adhikarana 26 (29) · Śloka 29

বর্ষশতং খল্বাযুষঃ প্রমাণমস্মিন্ কালে||২৯||

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वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन् काले||२९||

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Adhikarana 27 (30) · Śloka 30

তস্য নিমিত্তং প্রকৃতিগুণাত্মসম্পত্ সাত্ম্যোপসেবনং চেতি||৩০||

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तस्य निमित्तं प्रकृतिगुणात्मसम्पत् सात्म्योपसेवनं चेति||३०||

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Adhikarana 28 (31-34) · Śloka 34

তত্র শ্লোকাঃ- শরীরং যদ্যথা তচ্চ বর্ততে ক্লিষ্টমামযৈঃ| যথা ক্লেশং বিনাশং চ যাতি যে চাস্য ধাতবঃ||৩১|| বৃদ্ধিহ্রাসৌ যথা তেষাং ক্ষীণানামৌষধং চ যত্| দেহবৃদ্ধিকরা ভাবা বলবৃদ্ধিকরাশ্চ যে||৩২|| পরিণামকরা ভাবা যা চ তেষাং পৃথক্ ক্রিযা| মলাখ্যাঃ সম্প্রসাদাখ্যা ধাতবঃ প্রশ্ন এব চ||৩৩|| নবকো নির্ণযশ্চাস্য বিধিবত্ সম্প্রকাশিতঃ| তথ্যঃ শরীরবিচযে শারীরে পরমর্ষিণা||৩৪||

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तत्र श्लोकाः- शरीरं यद्यथा तच्च वर्तते क्लिष्टमामयैः| यथा क्लेशं विनाशं च याति ये चास्य धातवः||३१|| वृद्धिह्रासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत्| देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराश्च ये||३२|| परिणामकरा भावा या च तेषां पृथक् क्रिया| मलाख्याः सम्प्रसादाख्या धातवः प्रश्न एव च||३३|| नवको निर्णयश्चास्य विधिवत् सम्प्रकाशितः| तथ्यः शरीरविचये शारीरे परमर्षिणा||३४||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 6

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শারীরস্থানে শরীরবিচযশারীরং নাম ষষ্ঠোঽধ্যাযঃ||৬||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरविचयशारीरं नाम षष्ठोऽध्यायः||६||

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