Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মহতীং গর্ভাবক্রান্তিং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो महतीं गर्भावक्रान्तिं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো মহতীং গর্ভাবক্রান্তিং শারীরং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो महतीं गर्भावक्रान्तिं शारीरं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
যতশ্চ গর্ভঃ সম্ভবতি, যস্মিংশ্চ গর্ভসঞ্জ্ঞা, যদ্বিকারশ্চ গর্ভঃ, যযা চানুপূর্ব্যাঽভিনির্বর্ততে কুক্ষৌ, যশ্চাস্য বৃদ্ধিহেতুঃ, যতশ্চাস্যাজন্ম ভবতি, যতশ্চ জাযমানঃ কুক্ষৌ বিনাশং প্রাপ্নোতি, যতশ্চ কার্ত্স্ন্যেনাবিনশ্যন্ বিকৃতিমাপদ্যতে, তদনুব্যাখ্যাস্যামঃ||৩||
यतश्च गर्भः सम्भवति, यस्मिंश्च गर्भसञ्ज्ञा, यद्विकारश्च गर्भः, यया चानुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ, यश्चास्य वृद्धिहेतुः, यतश्चास्याजन्म भवति, यतश्च जायमानः कुक्षौ विनाशं प्राप्नोति, यतश्च कार्त्स्न्येनाविनश्यन् विकृतिमापद्यते, तदनुव्याख्यास्यामः||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
মাতৃতঃ পিতৃত আত্মতঃ সাত্ম্যতো রসতঃ সত্ত্বত ইত্যেতেভ্যো ভাবেভ্যঃ সমুদিতেভ্যো গর্ভঃ সম্ভবতি| তস্য যে যেঽবযবা যতো যতঃ সম্ভবতঃ সম্ভবন্তি তান্ বিভজ্য মাতৃজাদীনবযবান্ পৃথক্ পৃথগুক্তমগ্রে||৪||
मातृतः पितृत आत्मतः सात्म्यतो रसतः सत्त्वत इत्येतेभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भः सम्भवति| तस्य ये येऽवयवा यतो यतः सम्भवतः सम्भवन्ति तान् विभज्य मातृजादीनवयवान् पृथक् पृथगुक्तमग्रे||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
শুক্রশোণিতজীবসংযোগে তু খলু কুক্ষিগতে গর্ভসঞ্জ্ঞা ভবতি||৫||
शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसञ्ज्ञा भवति||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
গর্ভস্তু খল্বন্তরিক্ষবায্বগ্নিতোযভূমিবিকারশ্চেতনাধিষ্ঠানভূতঃ| এবমনযা যুক্ত্যা পঞ্চমহাভূতবিকারসমুদাযাত্মকো গর্ভশ্চেতনাধিষ্ঠানভূতঃ; স হ্যস্য ষষ্ঠো ধাতুরুক্তঃ||৬||
गर्भस्तु खल्वन्तरिक्षवाय्वग्नितोयभूमिविकारश्चेतनाधिष्ठानभूतः| एवमनया युक्त्या पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मको गर्भश्चेतनाधिष्ठानभूतः; स ह्यस्य षष्ठो धातुरुक्तः||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
যযা চানুপূর্ব্যাঽভিনির্বর্ততে কুক্ষৌ তাং ব্যাখ্যাস্যামঃ- গতে পুরাণে রজসি নবে চাবস্থিতে শুদ্ধস্নাতাং স্ত্রিযমব্যাপন্নযোনিশোণিতগর্ভাশযামৃতুমতীমাচক্ষ্মহে| তযা সহ তথাভূতযা যদা পুমানব্যাপন্নবীজো মিশ্রীভাবং গচ্ছতি, তদা তস্য হর্ষোদীরিতঃ পরঃ শরীরধাত্বাত্মা শুক্রভূতোঽঙ্গাদঙ্গাত্ সম্ভবতি| স তথা হর্ষভূতেনাত্মনোদীরিতশ্চাধিষ্ঠিতশ্চ বীজরূপো ধাতুঃ পুরুষশরীরাদভিনিষ্পত্ত্যোচিতেন পথা গর্ভাশযমনুপ্রবিশ্যার্তবেনাভিসংসর্গমেতি||৭||
यया चानुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ तां व्याख्यास्यामः- गते पुराणे रजसि नवे चावस्थिते शुद्धस्नातां स्त्रियमव्यापन्नयोनिशोणितगर्भाशयामृतुमतीमाचक्ष्महे| तया सह तथाभूतया यदा पुमानव्यापन्नबीजो मिश्रीभावं गच्छति, तदा तस्य हर्षोदीरितः परः शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतोऽङ्गादङ्गात् सम्भवति| स तथा हर्षभूतेनात्मनोदीरितश्चाधिष्ठितश्च बीजरूपो धातुः पुरुषशरीरादभिनिष्पत्त्योचितेन पथा गर्भाशयमनुप्रविश्यार्तवेनाभिसंसर्गमेति||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
তত্র পূর্বং চেতনাধাতুঃ সত্ত্বকরণো গুণগ্রহণায প্রবর্ততে; স হি হেতুঃ কারণং নিমিত্তমক্ষরং কর্তা মন্তা বেদিতা বোদ্ধা দ্রষ্টা ধাতা ব্রহ্মা বিশ্বকর্মা বিশ্বরূপঃ পুরুষঃ প্রভবোঽব্যযো নিত্যো গুণী গ্রহণং প্রধানমব্যক্তং জীবো জ্ঞঃ পুদ্গলশ্চেতনাবান্ বিভুর্ভূতাত্মা চেন্দ্রিযাত্মা চান্তরাত্মা চেতি| স গুণোপাদানকালেঽন্তরিক্ষং পূর্বতরমন্যেভ্যো গুণেভ্য উপাদত্তে, যথা- প্রলযাত্যযে সিসৃক্ষুর্ভূতান্যক্ষরভূত আত্মা সত্ত্বোপাদানঃ পূর্বতরমাকাশং সৃজতি, ততঃ ক্রমেণ ব্যক্ততরগুণান্ ধাতূন্ বায্বাদিকাংশ্চতুরঃ; তথা দেহগ্রহণেঽপি প্রবর্তমানঃ পূর্বতরমাকাশমেবোপাদত্তে, ততঃ ক্রমেণ ব্যক্ততরগুণান্ ধাতূন্ বায্বাদিকাংশ্চতুরঃ| সর্বমপি তু খল্বেতদ্গুণোপাদানমণুনা কালেন ভবতি||৮||
तत्र पूर्वं चेतनाधातुः सत्त्वकरणो गुणग्रहणाय प्रवर्तते; स हि हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता मन्ता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽव्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्रधानमव्यक्तं जीवो ज्ञः पुद्गलश्चेतनावान् विभुर्भूतात्मा चेन्द्रियात्मा चान्तरात्मा चेति| स गुणोपादानकालेऽन्तरिक्षं पूर्वतरमन्येभ्यो गुणेभ्य उपादत्ते, यथा- प्रलयात्यये सिसृक्षुर्भूतान्यक्षरभूत आत्मा सत्त्वोपादानः पूर्वतरमाकाशं सृजति, ततः क्रमेण व्यक्ततरगुणान् धातून् वाय्वादिकांश्चतुरः; तथा देहग्रहणेऽपि प्रवर्तमानः पूर्वतरमाकाशमेवोपादत्ते, ततः क्रमेण व्यक्ततरगुणान् धातून् वाय्वादिकांश्चतुरः| सर्वमपि तु खल्वेतद्गुणोपादानमणुना कालेन भवति||८||
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Adhikarana 8 (9-10) · Śloka 10
স সর্বগুণবান্ গর্ভত্বমাপন্নঃ প্রথমে মাসি সম্মূর্চ্ছিতঃ সর্বধাতুকলুষীকৃতঃ খেটভূতো ভবত্যব্যক্তবিগ্রহঃ সদসদ্ভূতাঙ্গাবযবঃ||৯|| দ্বিতীযে মাসি ঘনঃ সম্পদ্যতে পিণ্ডঃ পেশ্যর্বুদং বা| তত্র ঘনঃ পুরুষঃ, পেশী স্ত্রী, অর্বুদং নপুংসকম্||১০||
स सर्वगुणवान् गर्भत्वमापन्नः प्रथमे मासि सम्मूर्च्छितः सर्वधातुकलुषीकृतः खेटभूतो भवत्यव्यक्तविग्रहः सदसद्भूताङ्गावयवः||९|| द्वितीये मासि घनः सम्पद्यते पिण्डः पेश्यर्बुदं वा| तत्र घनः पुरुषः, पेशी स्त्री, अर्बुदं नपुंसकम्||१०||
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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
তৃতীযে মাসি সর্বেন্দ্রিযাণি সর্বাঙ্গাবযবাশ্চ যৌগপদ্যেনাভিনির্বর্তন্তে||১১||
तृतीये मासि सर्वेन्द्रियाणि सर्वाङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्ते||११||
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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12
তত্রাস্য কেচিদঙ্গাবযবা মাতৃজাদীনবযবান্ বিভজ্য পূর্বমুক্তা যথাবত্| মহাভূতবিকারপ্রবিভাগেন ত্বিদানীমস্য তাংশ্চৈবাঙ্গাবযবান্ কাংশ্চিত্ পর্যাযান্তরেণাপরাংশ্চানুব্যাখ্যাস্যামঃ| মাতৃজাদযোঽপ্যস্য মহাভূতবিকারা এব| তত্রাস্যাকাশাত্মকং শব্দঃ শ্রোত্রং লাঘবং সৌক্ষ্ম্যং বিবেকশ্চ, বায্বাত্মকং স্পর্শঃ স্পর্শনং রৌক্ষ্যং প্রেরণং ধাতুব্যূহনং চেষ্টাশ্চ শারীর্যঃ, অগ্ন্যাত্মকং রূপং দর্শনং প্রকাশঃ পক্তিরৌষ্ণ্যং চ, অবাত্মকং রসো রসনং শৈত্যং মার্দবং স্নেহঃ ক্লেদশ্চ, পৃথিব্যাত্মকং গন্ধো ঘ্রাণং গৌরবং স্থৈর্যং মূর্তিশ্চেতি||১২||
तत्रास्य केचिदङ्गावयवा मातृजादीनवयवान् विभज्य पूर्वमुक्ता यथावत्| महाभूतविकारप्रविभागेन त्विदानीमस्य तांश्चैवाङ्गावयवान् कांश्चित् पर्यायान्तरेणापरांश्चानुव्याख्यास्यामः| मातृजादयोऽप्यस्य महाभूतविकारा एव| तत्रास्याकाशात्मकं शब्दः श्रोत्रं लाघवं सौक्ष्म्यं विवेकश्च, वाय्वात्मकं स्पर्शः स्पर्शनं रौक्ष्यं प्रेरणं धातुव्यूहनं चेष्टाश्च शारीर्यः, अग्न्यात्मकं रूपं दर्शनं प्रकाशः पक्तिरौष्ण्यं च, अबात्मकं रसो रसनं शैत्यं मार्दवं स्नेहः क्लेदश्च, पृथिव्यात्मकं गन्धो घ्राणं गौरवं स्थैर्यं मूर्तिश्चेति||१२||
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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13
এবমযং লোকসম্মিতঃ পুরুষঃ| যাবন্তো হি লোকে মূর্তিমন্তো ভাববিশেষাস্তাবন্তঃ পুরুষে, যাবন্তঃ পুরুষে তাবন্তো লোকে ইতি; বুধাস্ত্বেবং দ্রষ্টুমিচ্ছন্তি||১৩||
एवमयं लोकसम्मितः पुरुषः| यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके इति; बुधास्त्वेवं द्रष्टुमिच्छन्ति||१३||
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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14
এবমস্যেন্দ্রিযাণ্যঙ্গাবযবাশ্চ যৌগপদ্যেনাভিনির্বর্তন্তেঽন্যত্র তেভ্যো ভাবেভ্যো যেঽস্য জাতস্যোত্তরকালং জাযন্তে; তদ্যথা- দন্তা ব্যঞ্জনানি ব্যক্তীভাবস্তথাযুক্তানি চাপরাণি| এষা প্রকৃতিঃ, বিকৃতিঃ পুনরতোঽন্যথা| সন্তি খল্বস্মিন্ গর্ভে কেচিন্নিত্যা ভাবাঃ, সন্তি চানিত্যাঃ কেচিত্| তস্য য এবাঙ্গাবযবাঃ সন্তিষ্ঠন্তে, ত এব স্ত্রীলিঙ্গং পুরুষলিঙ্গং নপুংসকলিঙ্গং বা বিভ্রতি| তত্র স্ত্রীপুরুষযোর্যে বৈশেষিকা ভাবাঃ প্রধানসংশ্রযা গুণসংশ্রযাশ্চ, তেষাং যতো ভূযস্ত্বং ততোঽন্যতরভাবঃ| তদ্যথা- ক্লৈব্যং ভীরুত্বমবৈশারদ্যং মোহোঽনবস্থানমধোগুরুত্বমসহনং শৈথিল্যং মার্দবং গর্ভাশযবীজভাগস্তথাযুক্তানি চাপরাণি স্ত্রীকরাণি, অতো বিপরীতানি পুরুষকরাণি, উভযভাগাবযবা নপুংসককরাণি ভবন্তি||১৪||
एवमस्येन्द्रियाण्यङ्गावयवाश्च यौगपद्येनाभिनिर्वर्तन्तेऽन्यत्र तेभ्यो भावेभ्यो येऽस्य जातस्योत्तरकालं जायन्ते; तद्यथा- दन्ता व्यञ्जनानि व्यक्तीभावस्तथायुक्तानि चापराणि| एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा| सन्ति खल्वस्मिन् गर्भे केचिन्नित्या भावाः, सन्ति चानित्याः केचित्| तस्य य एवाङ्गावयवाः सन्तिष्ठन्ते, त एव स्त्रीलिङ्गं पुरुषलिङ्गं नपुंसकलिङ्गं वा बिभ्रति| तत्र स्त्रीपुरुषयोर्ये वैशेषिका भावाः प्रधानसंश्रया गुणसंश्रयाश्च, तेषां यतो भूयस्त्वं ततोऽन्यतरभावः| तद्यथा- क्लैब्यं भीरुत्वमवैशारद्यं मोहोऽनवस्थानमधोगुरुत्वमसहनं शैथिल्यं मार्दवं गर्भाशयबीजभागस्तथायुक्तानि चापराणि स्त्रीकराणि, अतो विपरीतानि पुरुषकराणि, उभयभागावयवा नपुंसककराणि भवन्ति||१४||
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Adhikarana 13 (15) · Śloka 15
তস্য যত্কালমেবেন্দ্রিযাণি সন্তিষ্ঠন্তে, তত্কালমেব চেতসি বেদনা নির্বন্ধং প্রাপ্নোতি; তস্মাত্তদা প্রভৃতি গর্ভঃ স্পন্দতে, প্রার্থযতে চ জন্মান্তরানুভূতং যত্ কিঞ্চিত্, তদ্দ্বৈহৃদয্যমাচক্ষতে বৃদ্ধাঃ| মাতৃজং চাস্য হৃদযং মাতৃহৃদযেনাভিসম্বদ্ধং ভবতি রসবাহিনীভিঃ সংবাহিনীভিঃ; তস্মাত্তযোস্তাভির্ভক্তিঃ সংস্পন্দতে | তচ্চৈব কারণমবেক্ষমাণা ন দ্বৈহৃদয্যস্য বিমানিতং গর্ভমিচ্ছন্তি কর্তুম্| বিমাননে হ্যস্য দৃশ্যতে বিনাশো বিকৃতির্বা| সমানযোগক্ষেমা হি তদা ভবতি গর্ভেণ কেষুচিদর্থেষু মাতা| তস্মাত্ প্রিযহিতাভ্যাং গর্ভিণীং বিশেষেণোপচরন্তি কুশলাঃ||১৫||
तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेव चेतसि वेदना निर्बन्धं प्राप्नोति; तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते, प्रार्थयते च जन्मान्तरानुभूतं यत् किञ्चित्, तद्द्वैहृदय्यमाचक्षते वृद्धाः| मातृजं चास्य हृदयं मातृहृदयेनाभिसम्बद्धं भवति रसवाहिनीभिः संवाहिनीभिः; तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः संस्पन्दते | तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृदय्यस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति कर्तुम्| विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा| समानयोगक्षेमा हि तदा भवति गर्भेण केषुचिदर्थेषु माता| तस्मात् प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणोपचरन्ति कुशलाः||१५||
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Adhikarana 14 (16) · Śloka 16
তস্যা গর্ভাপত্তের্দ্বৈহৃদয্যস্য চ বিজ্ঞানার্থং লিঙ্গানি সমাসেনোপদেক্ষ্যামঃ| উপচারসাধনং হ্যস্য জ্ঞানে, জ্ঞানং চ লিঙ্গতঃ, তস্মাদিষ্টো লিঙ্গোপদেশঃ| তদ্যথা- আর্তবাদর্শনমাস্যসংস্রবণমনন্নাভিলাষশ্ছর্দিররোচকোঽম্লকামতা চ বিশেষেণ শ্রদ্ধাপ্রণযনমুচ্চাবচেষু ভাবেষু গুরুগাত্রত্বং চক্ষুষোর্গ্লানিঃ স্তনযোঃ স্তন্যমোষ্ঠযোঃ স্তনমণ্ডলযোশ্চ কার্ষ্ণ্যমত্যর্থং শ্বযথুঃ পাদযোরীষল্লোমরাজ্যুদ্গমো যোন্যাশ্চাটালত্বমিতি গর্ভে পর্যাগতে রূপাণি ভবন্তি||১৬||
तस्या गर्भापत्तेर्द्वैहृदय्यस्य च विज्ञानार्थं लिङ्गानि समासेनोपदेक्ष्यामः| उपचारसाधनं ह्यस्य ज्ञाने, ज्ञानं च लिङ्गतः, तस्मादिष्टो लिङ्गोपदेशः| तद्यथा- आर्तवादर्शनमास्यसंस्रवणमनन्नाभिलाषश्छर्दिररोचकोऽम्लकामता च विशेषेण श्रद्धाप्रणयनमुच्चावचेषु भावेषु गुरुगात्रत्वं चक्षुषोर्ग्लानिः स्तनयोः स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्ष्ण्यमत्यर्थं श्वयथुः पादयोरीषल्लोमराज्युद्गमो योन्याश्चाटालत्वमिति गर्भे पर्यागते रूपाणि भवन्ति||१६||
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Adhikarana 15 (17-18) · Śloka 18
সা যদ্যদিচ্ছেত্তত্তদস্যৈ দদ্যাদন্যত্র গর্ভোপঘাতকরেভ্যো ভাবেভ্যঃ||১৭|| গর্ভোপঘাতকরাস্ত্বিমে ভাবা ভবন্তিঃ; তদ্যথা- সর্বমতিগুরূষ্ণতীক্ষ্ণং দারুণাশ্চ চেষ্টাঃ; ইমাংশ্চান্যানুপদিশন্তি বৃদ্ধাঃ- দেবতারক্ষোঽনুচরপরিরক্ষণার্থং ন রক্তানি বাসাংসি বিভৃযান্ন মদকরাণি মদ্যান্যভ্যবহরেন্ন যানমধিরোহেন্ন মাংসমশ্নীযাত্ সর্বেন্দ্রিযপ্রতিকূলাংশ্চ ভাবান্ দূরতঃ পরিবর্জযেত্, যচ্চান্যদপি কিঞ্চিত্ স্ত্রিযো বিদ্যুঃ||১৮||
सा यद्यदिच्छेत्तत्तदस्यै दद्यादन्यत्र गर्भोपघातकरेभ्यो भावेभ्यः||१७|| गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्तिः; तद्यथा- सर्वमतिगुरूष्णतीक्ष्णं दारुणाश्च चेष्टाः; इमांश्चान्यानुपदिशन्ति वृद्धाः- देवतारक्षोऽनुचरपरिरक्षणार्थं न रक्तानि वासांसि बिभृयान्न मदकराणि मद्यान्यभ्यवहरेन्न यानमधिरोहेन्न मांसमश्नीयात् सर्वेन्द्रियप्रतिकूलांश्च भावान् दूरतः परिवर्जयेत्, यच्चान्यदपि किञ्चित् स्त्रियो विद्युः||१८||
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Adhikarana 16 (19) · Śloka 19
তীব্রাযাং তু খলু প্রার্থনাযাং কামমহিতমপ্যস্যৈ হিতেনোপহিতং দদ্যাত্ প্রার্থনাবিনযনার্থম্| প্রার্থনাসন্ধারণাদ্ধি বাযুঃ প্রকুপিতোঽন্তঃশরীরমনুচরন্ গর্ভস্যাপদ্যমানস্য বিনাশং বৈরূপ্যং বা কুর্যাত্||১৯||
तीव्रायां तु खलु प्रार्थनायां काममहितमप्यस्यै हितेनोपहितं दद्यात् प्रार्थनाविनयनार्थम्| प्रार्थनासन्धारणाद्धि वायुः प्रकुपितोऽन्तःशरीरमनुचरन् गर्भस्यापद्यमानस्य विनाशं वैरूप्यं वा कुर्यात्||१९||
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Adhikarana 17 (20) · Śloka 20
চতুর্থে মাসি স্থিরত্বমাপদ্যতে গর্ভঃ, তস্মাত্তদা গর্ভিণী গুরুগাত্রত্বমধিকমাপদ্যতে বিশেষেণ||২০||
चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्वमधिकमापद्यते विशेषेण||२०||
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Adhikarana 18 (21) · Śloka 21
পঞ্চমে মাসি গর্ভস্য মাংসশোণিতোপচযো ভবত্যধিকমন্যেভ্যো মাসেভ্যঃ, তস্মাত্তদা গর্ভিণী কার্শ্যমাপদ্যতে বিশেষেণ||২১||
पञ्चमे मासि गर्भस्य मांसशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कार्श्यमापद्यते विशेषेण||२१||
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Adhikarana 19 (22) · Śloka 22
ষষ্ঠে মাসি গর্ভস্য বলবর্ণোপচযো ভবত্যধিকমন্যেভ্যো মাসেভ্যঃ, তস্মাত্তদা গর্ভিণী বলবর্ণহানিমাপদ্যতে বিশেষেণ||২২||
षष्ठे मासि गर्भस्य बलवर्णोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण||२२||
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Adhikarana 20 (23) · Śloka 23
সপ্তমে মাসি গর্ভঃ সর্বৈর্ভাবৈরাপ্যায্যতে, তস্মাত্তদা গর্ভিণী সর্বাকারৈঃ ক্লান্ততমা ভবতি||২৩||
सप्तमे मासि गर्भः सर्वैर्भावैराप्याय्यते, तस्मात्तदा गर्भिणी सर्वाकारैः क्लान्ततमा भवति||२३||
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Adhikarana 21 (24) · Śloka 24
অষ্টমে মাসি গর্ভশ্চ মাতৃতো গর্ভতশ্চ মাতা রসহারিণীভিঃ সংবাহিনীভির্মুহুর্মুহুরোজঃ পরস্পরত আদদাতে গর্ভস্যাসম্পূর্ণত্বাত্ | তস্মাত্তদা গর্ভিণীমুহুর্মহুর্মুদা যুক্তা ভবতি মুহুর্মুহুশ্চ ম্লানা, তথা গর্ভঃ; তস্মাত্তদা গর্ভস্য জন্ম ব্যাপত্তিমদ্ভবত্যোজসোঽনবস্থিতত্বাত্ | তং চৈবার্থমভিসমীক্ষ্যাষ্টমং মাসমগণ্যমিত্যাচক্ষতে কুশলাঃ||২৪||
अष्टमे मासि गर्भश्च मातृतो गर्भतश्च माता रसहारिणीभिः संवाहिनीभिर्मुहुर्मुहुरोजः परस्परत आददाते गर्भस्यासम्पूर्णत्वात् | तस्मात्तदा गर्भिणीमुहुर्महुर्मुदा युक्ता भवति मुहुर्मुहुश्च म्लाना, तथा गर्भः; तस्मात्तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थितत्वात् | तं चैवार्थमभिसमीक्ष्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशलाः||२४||
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Adhikarana 22 (25) · Śloka 25
তস্মিন্নেকদিবসাতিক্রান্তেঽপি নবমং মাসমুপাদায প্রসবকালমিত্যাহুরাদশমান্মাসাত্| এতাবান্ প্রসবকালঃ, বৈকারিকমতঃ পরং কুক্ষাববস্থানং গর্ভস্য||২৫||
तस्मिन्नेकदिवसातिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकालमित्याहुरादशमान्मासात्| एतावान् प्रसवकालः, वैकारिकमतः परं कुक्षाववस्थानं गर्भस्य||२५||
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Adhikarana 23 (26) · Śloka 26
এবমনযাঽঽনুপূর্ব্যাঽভিনির্বর্ততে কুক্ষৌ||২৬||
एवमनयाऽऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ||२६||
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Adhikarana 24 (27) · Śloka 27
মাত্রাদীনাং খলু গর্ভকরাণাং ভাবানাং সম্পদস্তথা বৃত্তস্য সৌষ্ঠবান্মাতৃতশ্চৈবোপস্নেহোপস্বেদাভ্যাং কালপরিণামাত্ স্বভাবসংসিদ্ধেশ্চ কুক্ষৌ বৃদ্ধিং প্রাপ্নোতি||২৭||
मात्रादीनां खलु गर्भकराणां भावानां सम्पदस्तथा वृत्तस्य सौष्ठवान्मातृतश्चैवोपस्नेहोपस्वेदाभ्यां कालपरिणामात् स्वभावसंसिद्धेश्च कुक्षौ वृद्धिं प्राप्नोति||२७||
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Adhikarana 25 (28) · Śloka 28
মাত্রাদীনামেব তু খলু গর্ভকরাণাং ভাবানাং ব্যাপত্তিনিমিত্তমস্যাজন্ম ভবতি||২৮||
मात्रादीनामेव तु खलु गर्भकराणां भावानां व्यापत्तिनिमित्तमस्याजन्म भवति||२८||
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Adhikarana 26 (29) · Śloka 29
যে হ্যস্য কুক্ষৌ বৃদ্ধিহেতুসমাখ্যাতা ভাবাস্তেষাং বিপর্যযাদুদরে বিনাশমাপদ্যতে, অথবাঽপ্যচিরজাতঃ স্যাত্||২৯||
ये ह्यस्य कुक्षौ वृद्धिहेतुसमाख्याता भावास्तेषां विपर्ययादुदरे विनाशमापद्यते, अथवाऽप्यचिरजातः स्यात्||२९||
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Adhikarana 27 (30) · Śloka 30
যতস্তু কার্ত্স্ন্যেনাবিনশ্যন্ বিকৃতিমাপদ্যতে, তদনুব্যাখ্যাস্যামঃ- যদা স্ত্রিযা দোষপ্রকোপণোক্তান্যাসেবমানাযা দোষাঃ প্রকুপিতাঃ শরীরমুপসর্পন্তঃ শোণিতগর্ভাশযাবুপপদ্যন্তে , ন চ কার্ত্স্ন্যেন শোণিতগর্ভাশযৌ দূষযন্তি, তদেযং গর্ভং লভতে স্ত্রী; তদা তস্য গর্ভস্য মাতৃজানামবযবানামন্যতমোঽবযবো বিকৃতিমাপদ্যত একোঽথবাঽনেকে, যস্য যস্য হ্যবযবস্য বীজে বীজভাগে বা দোষাঃ প্রকোপমাপদ্যন্তে, তং তমবযবং বিকৃতিরাবিশতি| যদা হ্যস্যাঃ শোণিতে গর্ভাশযবীজভাগঃ প্রদোষমাপদ্যতে, তদা বন্ধ্যাং জনযতি; যদা পুনরস্যাঃ শোণিতে গর্ভাশযবীজভাগাবযবঃ প্রদোষমাপদ্যতে, তদা পূতিপ্রজাং জনযতি; যদা ত্বস্যাঃ শোণিতে গর্ভাশযবীজভাগাবযবঃ স্ত্রীকরাণাং চ শরীরবীজভাগানামেকদেশঃ প্রদোষমাপদ্যতে, তদা স্ত্র্যাকৃতিভূযিষ্ঠামস্ত্রিযং বার্তাং নাম জনযতি, তাং স্ত্রীব্যাপদমাচক্ষতে||৩০||
यतस्तु कार्त्स्न्येनाविनश्यन् विकृतिमापद्यते, तदनुव्याख्यास्यामः- यदा स्त्रिया दोषप्रकोपणोक्तान्यासेवमानाया दोषाः प्रकुपिताः शरीरमुपसर्पन्तः शोणितगर्भाशयावुपपद्यन्ते , न च कार्त्स्न्येन शोणितगर्भाशयौ दूषयन्ति, तदेयं गर्भं लभते स्त्री; तदा तस्य गर्भस्य मातृजानामवयवानामन्यतमोऽवयवो विकृतिमापद्यत एकोऽथवाऽनेके, यस्य यस्य ह्यवयवस्य बीजे बीजभागे वा दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, तं तमवयवं विकृतिराविशति| यदा ह्यस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभागः प्रदोषमापद्यते, तदा वन्ध्यां जनयति; यदा पुनरस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते, तदा पूतिप्रजां जनयति; यदा त्वस्याः शोणिते गर्भाशयबीजभागावयवः स्त्रीकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोषमापद्यते, तदा स्त्र्याकृतिभूयिष्ठामस्त्रियं वार्तां नाम जनयति, तां स्त्रीव्यापदमाचक्षते||३०||
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Adhikarana 28 (31) · Śloka 31
এবমেব পুরুষস্য যদা বীজে বীজভাগঃ প্রদোষমাপদ্যতে, তদা বন্ধ্যং জনযতি; যদা পুনরস্য বীজে বীজভাগাবযবঃ প্রদোষমাপদ্যতে, তদা পূতিপ্রজং জনযতি; যদা ত্বস্য বীজে বীজভাগাবযবঃ পুরুষকরাণাং চ শরীরবীজভাগানামেকদেশঃ প্রদোষমাপদ্যতে, তদা পুরুষাকৃতিভূযিষ্ঠমপুরুষং তৃণপুত্রিকং নাম জনযতি; তাং পুরুষব্যাপদমাচক্ষতে||৩১||
एवमेव पुरुषस्य यदा बीजे बीजभागः प्रदोषमापद्यते, तदा वन्ध्यं जनयति; यदा पुनरस्य बीजे बीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते, तदा पूतिप्रजं जनयति; यदा त्वस्य बीजे बीजभागावयवः पुरुषकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोषमापद्यते, तदा पुरुषाकृतिभूयिष्ठमपुरुषं तृणपुत्रिकं नाम जनयति; तां पुरुषव्यापदमाचक्षते||३१||
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Adhikarana 29 (32) · Śloka 32
এতেন মাতৃজানাং পিতৃজানাং চাবযবানাং বিকৃতিব্যাখ্যানেন সাত্ম্যজানাং রসজানাং সত্ত্বজানাং চাবযবানাং বিকৃতির্ব্যাখ্যাতা ভবতি||৩২||
एतेन मातृजानां पितृजानां चावयवानां विकृतिव्याख्यानेन सात्म्यजानां रसजानां सत्त्वजानां चावयवानां विकृतिर्व्याख्याता भवति||३२||
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Adhikarana 30 (33) · Śloka 33
নির্বিকারঃ পরস্ত্বাত্মা সর্বভূতানাং নির্বিশেষঃ; সত্ত্বশরীরযোস্তু বিশেষাদ্বিশেষোপলব্ধিঃ||৩৩||
निर्विकारः परस्त्वात्मा सर्वभूतानां निर्विशेषः; सत्त्वशरीरयोस्तु विशेषाद्विशेषोपलब्धिः||३३||
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Adhikarana 31 (34) · Śloka 34
তত্র ত্রযঃ শরীরদোষা বাতপিত্তশ্লেষ্মাণঃ, তে শরীরং দূষযন্তি; দ্বৌ পুনঃ সত্ত্বদোষৌ রজস্তমশ্চ, তৌ সত্ত্বং দূষযতঃ| তাভ্যাং চ সত্ত্বশরীরাভ্যাং দুষ্টাভ্যাং বিকৃতিরুপজাযতে, নোপজাযতে চাপ্রদুষ্টাভ্যাম্||৩৪||
तत्र त्रयः शरीरदोषा वातपित्तश्लेष्माणः, ते शरीरं दूषयन्ति; द्वौ पुनः सत्त्वदोषौ रजस्तमश्च, तौ सत्त्वं दूषयतः| ताभ्यां च सत्त्वशरीराभ्यां दुष्टाभ्यां विकृतिरुपजायते, नोपजायते चाप्रदुष्टाभ्याम्||३४||
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Adhikarana 32 (35) · Śloka 35
তত্র শরীরং যোনিবিশেষাচ্চতুর্বিধমুক্তমগ্রে||৩৫||
तत्र शरीरं योनिविशेषाच्चतुर्विधमुक्तमग्रे||३५||
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Adhikarana 33 (36) · Śloka 36
ত্রিবিধং খলু সত্ত্বং- শুদ্ধং, রাজসং, তামসমিতি| তত্র শুদ্ধমদোষমাখ্যাতং কল্যাণাংশত্বাত্, রাজসং সদোষমাখ্যাতং রোষাংশত্বাত্, তামসমপি সদোষমাখ্যাতং মোহাংশত্বাত্| তেষাং তু ত্রযাণামপি সত্ত্বানামেকৈকস্য ভেদাগ্রমপরিসঙ্খ্যেযং তরতমযোগাচ্ছরীরযোনিবিশেষেভ্যশ্চান্যোন্যানুবিধানত্বাচ্চ| শরীরং হ্যপি সত্ত্বমনুবিধীযতে, সত্ত্বং চ শরীরম্| তস্মাত্ কতিচিত্সত্ত্বভেদাননূকাভিনির্দেশেন নিদর্শনার্থমনুব্যাখ্যাস্যামঃ||৩৬||
त्रिविधं खलु सत्त्वं- शुद्धं, राजसं, तामसमिति| तत्र शुद्धमदोषमाख्यातं कल्याणांशत्वात्, राजसं सदोषमाख्यातं रोषांशत्वात्, तामसमपि सदोषमाख्यातं मोहांशत्वात्| तेषां तु त्रयाणामपि सत्त्वानामेकैकस्य भेदाग्रमपरिसङ्ख्येयं तरतमयोगाच्छरीरयोनिविशेषेभ्यश्चान्योन्यानुविधानत्वाच्च| शरीरं ह्यपि सत्त्वमनुविधीयते, सत्त्वं च शरीरम्| तस्मात् कतिचित्सत्त्वभेदाननूकाभिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुव्याख्यास्यामः||३६||
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Adhikarana 34 (37) · Śloka 37
তদ্যথা- শুচিং সত্যাভিসন্ধং জিতাত্মানং সংবিভাগিনং জ্ঞানবিজ্ঞানবচনপ্রতিবচনসম্পন্নং স্মৃতিমন্তং কামক্রোধলোভমানমোহের্ষ্যাহর্ষামর্ষাপেতং সমং সর্বভূতেষু ব্রাহ্মং বিদ্যাত্ (১)| ইজ্যাধ্যযনব্রতহোমব্রহ্মচর্যপরমতিথিব্রতমুপশান্তমদমানরাগদ্বেষমোহলোভরোষং প্রতিভাবচনবিজ্ঞানোপধারণশক্তিসম্পন্নমার্ষং বিদ্যাত্ (২)| ঐশ্বর্যবন্তমাদেযবাক্যং যজ্বানং শূরমোজস্বিনং তেজসোপেতমক্লিষ্টকর্মাণং দীর্ঘদর্শিনং ধর্মার্থকামাভিরতমৈন্দ্রং বিদ্যাত্ (৩)| লেখাস্থবৃত্তং প্রাপ্তকারিণমসম্প্রহার্যমুত্থানবন্তং স্মৃতিমন্তমৈশ্বর্যলম্ভিনং ব্যপগতরাগের্ষ্যাদ্বেষমোহং যাম্যং বিদ্যাত্ (৪)| শূরং ধীরং শুচিমশুচিদ্বেষিণং যজ্বানমম্ভোবিহাররতিমক্লিষ্টকর্মাণং স্থানকোপপ্রসাদং বারুণং বিদ্যাত্ (৫)| স্থানমানোপভোগপরিবারসম্পন্নং ধর্মার্থকামনিত্যং শুচিং সুখবিহারং ব্যক্তকোপপ্রসাদং কৌবেরং বিদ্যাত্ (৬)| প্রিযনৃত্যগীতবাদিত্রোল্লাপকশ্লোকাখ্যাযিকেতিহাসপুরাণেষু কুশলং গন্ধমাল্যানুলেপনবসনস্ত্রীবিহারকামনিত্যমনসূযকং গান্ধর্বং বিদ্যাত্ (৭)| ইত্যেবং শুদ্ধস্য সত্ত্বস্য সপ্তবিধং ভেদাংশং বিদ্যাত্ কল্যাণাংশত্বাত্; তত্সংযোগাত্তু ব্রাহ্মমত্যন্তশুদ্ধং ব্যবস্যেত্||৩৭||
तद्यथा- शुचिं सत्याभिसन्धं जितात्मानं संविभागिनं ज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनसम्पन्नं स्मृतिमन्तं कामक्रोधलोभमानमोहेर्ष्याहर्षामर्षापेतं समं सर्वभूतेषु ब्राह्मं विद्यात् (१)| इज्याध्ययनव्रतहोमब्रह्मचर्यपरमतिथिव्रतमुपशान्तमदमानरागद्वेषमोहलोभरोषं प्रतिभावचनविज्ञानोपधारणशक्तिसम्पन्नमार्षं विद्यात् (२)| ऐश्वर्यवन्तमादेयवाक्यं यज्वानं शूरमोजस्विनं तेजसोपेतमक्लिष्टकर्माणं दीर्घदर्शिनं धर्मार्थकामाभिरतमैन्द्रं विद्यात् (३)| लेखास्थवृत्तं प्राप्तकारिणमसम्प्रहार्यमुत्थानवन्तं स्मृतिमन्तमैश्वर्यलम्भिनं व्यपगतरागेर्ष्याद्वेषमोहं याम्यं विद्यात् (४)| शूरं धीरं शुचिमशुचिद्वेषिणं यज्वानमम्भोविहाररतिमक्लिष्टकर्माणं स्थानकोपप्रसादं वारुणं विद्यात् (५)| स्थानमानोपभोगपरिवारसम्पन्नं धर्मार्थकामनित्यं शुचिं सुखविहारं व्यक्तकोपप्रसादं कौबेरं विद्यात् (६)| प्रियनृत्यगीतवादित्रोल्लापकश्लोकाख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलं गन्धमाल्यानुलेपनवसनस्त्रीविहारकामनित्यमनसूयकं गान्धर्वं विद्यात् (७)| इत्येवं शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधं भेदांशं विद्यात् कल्याणांशत्वात्; तत्संयोगात्तु ब्राह्ममत्यन्तशुद्धं व्यवस्येत्||३७||
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Adhikarana 35 (38) · Śloka 38
শূরং চণ্ডমসূযকমৈশ্বর্যবন্তমৌপধিকং রৌদ্রমননুক্রোশমাত্মপূজকমাসুরং বিদ্যাত্ (১)| অমর্ষিণমনুবন্ধকোপং ছিদ্রপ্রহারিণং ক্রূরমাহারাতিমাত্ররুচিমামিষপ্রিযতমং স্বপ্নাযাসবহুলমীর্ষ্যুং রাক্ষসং বিদ্যাত্ (২)| মহাশনং স্ত্রৈণং স্ত্রীরহস্কামমশুচিং শুচিদ্বেষিণং ভীরুং ভীষযিতারং বিকৃতবিহারাহারশীলং পৈশাচং বিদ্যাত্ (৩)| ক্রুদ্ধশূরমক্রুদ্ধভীরুং তীক্ষ্ণমাযাসবহুলং সন্ত্রস্তগোচরমাহারবিহারপরং সার্পং বিদ্যাত্ (৪)| আহারকামমতিদুঃখশীলাচারোপচারমসূযকমসংবিভাগিনমতিলোলুপমকর্মশীলং প্রৈতং বিদ্যাত্ (৫)| অনুষক্তকামমজস্রমাহারবিহারপরমনবস্থিতমমর্ষণমসঞ্চযং শাকুনং বিদ্যাত্ (৬)| ইত্যেবং খলু রাজসস্য সত্ত্বস্য ষঙ্বিধং ভেদাংশং বিদ্যাত্, রোষাংশত্বাত্||৩৮||
शूरं चण्डमसूयकमैश्वर्यवन्तमौपधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजकमासुरं विद्यात् (१)| अमर्षिणमनुबन्धकोपं छिद्रप्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमामिषप्रियतमं स्वप्नायासबहुलमीर्ष्युं राक्षसं विद्यात् (२)| महाशनं स्त्रैणं स्त्रीरहस्काममशुचिं शुचिद्वेषिणं भीरुं भीषयितारं विकृतविहाराहारशीलं पैशाचं विद्यात् (३)| क्रुद्धशूरमक्रुद्धभीरुं तीक्ष्णमायासबहुलं सन्त्रस्तगोचरमाहारविहारपरं सार्पं विद्यात् (४)| आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचारमसूयकमसंविभागिनमतिलोलुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् (५)| अनुषक्तकाममजस्रमाहारविहारपरमनवस्थितममर्षणमसञ्चयं शाकुनं विद्यात् (६)| इत्येवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षङ्विधं भेदांशं विद्यात्, रोषांशत्वात्||३८||
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Adhikarana 36 (39) · Śloka 39
নিরাকরিষ্ণুমমেধসং জুগুপ্সিতাচারাহরং মৈথুনপরং স্বপ্নশীলং পাশবং বিদ্যাত্ (১)| ভীরুমবুধমাহারলুব্ধমনবস্থিতমনুষক্তকামক্রোধং সরণশীলং তোযকামং মাত্স্যং বিদ্যাত্ (২)| অলসং কেবলমভিনিবিষ্টমাহারে সর্ববুদ্ধ্যঙ্গহীনং বানস্পত্যং বিদ্যাত্ (৩)| ইত্যেবং তামসস্য সত্ত্বস্য ত্রিবিধং ভেদাংশং বিদ্যান্মোহাংশত্বাত্||৩৯||
निराकरिष्णुममेधसं जुगुप्सिताचाराहरं मैथुनपरं स्वप्नशीलं पाशवं विद्यात् (१)| भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्तकामक्रोधं सरणशीलं तोयकामं मात्स्यं विद्यात् (२)| अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्ध्यङ्गहीनं वानस्पत्यं विद्यात् (३)| इत्येवं तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविधं भेदांशं विद्यान्मोहांशत्वात्||३९||
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Adhikarana 37 (40) · Śloka 40
ইত্যপরিসঙ্খ্যেযভেদানাং ত্রযাণামপি সত্ত্বানাং ভেদৈকদেশো ব্যাখ্যাতঃ; শুদ্ধস্য সত্ত্বস্য সপ্তবিধো ব্রহ্মর্ষিশক্রযমবরুণকুবেরগন্ধর্বসত্ত্বানুকারেণ, রাজসস্য ষড্বিধো দৈত্যপিশাচরাক্ষসসর্পপ্রেতশকুনিসত্ত্বানুকারেণ, তামসস্য ত্রিবিধঃ পশুমত্স্যবনস্পতিসত্ত্বানুকারেণ, কথং চ যথাসত্ত্বমুপচারঃ স্যাদিতি||৪০||
इत्यपरिसङ्ख्येयभेदानां त्रयाणामपि सत्त्वानां भेदैकदेशो व्याख्यातः; शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधो ब्रह्मर्षिशक्रयमवरुणकुबेरगन्धर्वसत्त्वानुकारेण, राजसस्य षड्विधो दैत्यपिशाचराक्षससर्पप्रेतशकुनिसत्त्वानुकारेण, तामसस्य त्रिविधः पशुमत्स्यवनस्पतिसत्त्वानुकारेण, कथं च यथासत्त्वमुपचारः स्यादिति||४०||
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Adhikarana 38 (41) · Śloka 41
কেবলশ্চাযমুদ্দেশো যথোদ্দেশমভিনির্দিষ্টো ভবতি গর্ভাবক্রান্তিসম্প্রযুক্তঃ ; তস্য চার্থস্য বিজ্ঞানে সামর্থ্যং গর্ভকরাণাং চ ভাবানামনুসমাধিঃ, বিধাতশ্চ বিঘাতকরাণাং ভাবানামিতি||৪১||
केवलश्चायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति गर्भावक्रान्तिसम्प्रयुक्तः ; तस्य चार्थस्य विज्ञाने सामर्थ्यं गर्भकराणां च भावानामनुसमाधिः, विधातश्च विघातकराणां भावानामिति||४१||
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Adhikarana 39 (42-45) · Śloka 45
তত্র শ্লোকাঃ- নিমিত্তমাত্মা প্রকৃতির্বৃদ্ধিঃ কুক্ষৌ ক্রমেণ চ| বৃদ্ধিহেতুশ্চ গর্ভস্য পঞ্চার্থাঃ শুভসঞ্জ্ঞিতাঃ||৪২|| অজন্মনি চ যো হেতুর্বিনাশে বিকৃতাবপি| ইমাংস্ত্রীনশুভান্ ভাবানাহুর্গর্ভবিঘাতকান্||৪৩|| শুভাশুভসমাখ্যাতানষ্টৌ ভাবানিমান্ ভিষক্| সর্বথা বেদ যঃ সর্বান্ স রাজ্ঞঃ কর্তুমর্হতি||৪৪|| অবাপ্ত্যুপাযান্ গর্ভস্য স এবং জ্ঞাতুমর্হতি| যে চ গর্ভবিঘাতোক্তা ভাবাস্তাংশ্চাপ্যুদারধীঃ||৪৫||
तत्र श्लोकाः- निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षौ क्रमेण च| वृद्धिहेतुश्च गर्भस्य पञ्चार्थाः शुभसञ्ज्ञिताः||४२|| अजन्मनि च यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि| इमांस्त्रीनशुभान् भावानाहुर्गर्भविघातकान्||४३|| शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक्| सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति||४४|| अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एवं ज्ञातुमर्हति| ये च गर्भविघातोक्ता भावास्तांश्चाप्युदारधीः||४५||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 4
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শারীরস্থানে মহতীগর্ভাবক্রান্তিশারীরং নাম চতুর্থোঽধ্যাযঃ||৪||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने महतीगर्भावक्रान्तिशारीरं नाम चतुर्थोऽध्यायः||४||
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