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8. prāsr̥tayōgīyā siddhiḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ প্রাসৃতযোগীযাং সিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातः प्रासृतयोगीयां सिद्धिं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

অথেমান্ সুকুমারাণাং নিরূহান্ স্নেহনান্ মৃদূন্| কর্মণা বিপ্লুতানাং চ বক্ষ্যামি প্রসৃতৈঃ পৃথক্||৩||

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अथेमान् सुकुमाराणां निरूहान् स्नेहनान् मृदून्| कर्मणा विप्लुतानां च वक्ष्यामि प्रसृतैः पृथक्||३||

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Adhikarana 3 (4-6) · Śloka 6

ক্ষীরাদ্দ্বৌ প্রসৃতৌ কার্যৌ মধুতৈলঘৃতাত্ত্রযঃ| খজেন মথিতো বস্তির্বাতঘ্নো বলবর্ণকৃত্||৪|| একৈকঃ প্রসৃতস্তৈলপ্রসন্নাক্ষৌদ্রসর্পিষাম্| বিল্বাদিমূলক্বাথাদ্দ্বৌ কৌলত্থাদ্দ্বৌ স বাতনুত্||৫|| পঞ্চমূলরসাত্ পঞ্চ দ্বৌ তৈলাত্ ক্ষৌদ্রসর্পিষোঃ| একৈকঃ প্রসৃতো বস্তিঃ স্নেহনীযোঽনিলাপহঃ||৬||

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क्षीराद्द्वौ प्रसृतौ कार्यौ मधुतैलघृतात्त्रयः| खजेन मथितो बस्तिर्वातघ्नो बलवर्णकृत्||४|| एकैकः प्रसृतस्तैलप्रसन्नाक्षौद्रसर्पिषाम्| बिल्वादिमूलक्वाथाद्द्वौ कौलत्थाद्द्वौ स वातनुत्||५|| पञ्चमूलरसात् पञ्च द्वौ तैलात् क्षौद्रसर्पिषोः| एकैकः प्रसृतो बस्तिः स्नेहनीयोऽनिलापहः||६||

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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7

সৈন্ধবার্ধাক্ষ একৈকঃ ক্ষৌদ্রতৈলপযোঘৃতাত্| প্রসৃতো হপুষাকর্ষো নিরূহঃ শুক্রকৃত্ পরম্||৭||

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सैन्धवार्धाक्ष एकैकः क्षौद्रतैलपयोघृतात्| प्रसृतो हपुषाकर्षो निरूहः शुक्रकृत् परम्||७||

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Adhikarana 5 (8) · Śloka 9

পটোলনিম্বভূনিম্বরাস্নাসপ্তচ্ছদাম্ভসঃ| চত্বারঃ প্রসৃতা একো ঘৃতাত্ সর্ষপকল্কিতঃ||৮|| নিরূহঃ পঞ্চতিক্তোঽযং মেহাভিষ্যন্দকুষ্ঠনুত্ |৯|

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पटोलनिम्बभूनिम्बरास्नासप्तच्छदाम्भसः| चत्वारः प्रसृता एको घृतात् सर्षपकल्कितः||८|| निरूहः पञ्चतिक्तोऽयं मेहाभिष्यन्दकुष्ठनुत् |९|

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Adhikarana 6 (10) · Śloka 10

বিডঙ্গত্রিফলাশিগ্রুফলমুস্তাখুপর্ণিজাত্||৯|| কষাযাত্ প্রসৃতাঃ পঞ্চ তৈলাদেকো বিমথ্য তান্| বিডঙ্গপিপ্পলীকল্কো নিরূহঃ ক্রিমিনাশনঃ||১০||

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विडङ्गत्रिफलाशिग्रुफलमुस्ताखुपर्णिजात्||९|| कषायात् प्रसृताः पञ्च तैलादेको विमथ्य तान्| विडङ्गपिप्पलीकल्को निरूहः क्रिमिनाशनः||१०||

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Adhikarana 7 (11-12) · Śloka 12

পযস্যেক্ষুস্থিরারাস্নাবিদারীক্ষৌদ্রসর্পিষাম্| একৈকঃ প্রসৃতো বস্তিঃ কৃষ্ণাকল্কো বৃষত্বকৃত্||১১|| চত্বারস্তৈলগোমূত্রদধিমণ্ডাম্লকাঞ্জিকাত্| প্রসৃতাঃ সর্ষপৈঃ কল্কৈর্বিট্সঙ্গানাহভেদনঃ ||১২||

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पयस्येक्षुस्थिरारास्नाविदारीक्षौद्रसर्पिषाम्| एकैकः प्रसृतो बस्तिः कृष्णाकल्को वृषत्वकृत्||११|| चत्वारस्तैलगोमूत्रदधिमण्डाम्लकाञ्जिकात्| प्रसृताः सर्षपैः कल्कैर्विट्सङ्गानाहभेदनः ||१२||

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Adhikarana 8 (13-14) · Śloka 14

শ্বদংষ্ট্রাশ্মভিদেরণ্ডরসাত্তৈলাত্ সুরাসবাত্| প্রসৃতাঃ পঞ্চ যষ্ট্যাহ্বকৌন্তীমাগধিকাসিতাঃ||১৩|| কল্কঃ স্যান্মূত্রকৃচ্ছ্রে তু সানাহে বস্তিরুত্তমঃ| এতে সলবণাঃ কোষ্ণা নিরূহাঃ প্রসৃতৈর্নব||১৪||

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श्वदंष्ट्राश्मभिदेरण्डरसात्तैलात् सुरासवात्| प्रसृताः पञ्च यष्ट्याह्वकौन्तीमागधिकासिताः||१३|| कल्कः स्यान्मूत्रकृच्छ्रे तु सानाहे बस्तिरुत्तमः| एते सलवणाः कोष्णा निरूहाः प्रसृतैर्नव||१४||

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Adhikarana 9 (15) · Śloka 15

মৃদুবস্তিজডীভূতে তীক্ষ্ণোঽন্যো বস্তিরিষ্যতে| তীক্ষ্ণৈর্বিকর্ষিতে স্বাদু প্রত্যাস্থাপনমিষ্যতে ||১৫||

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मृदुबस्तिजडीभूते तीक्ष्णोऽन्यो बस्तिरिष्यते| तीक्ष्णैर्विकर्षिते स्वादु प्रत्यास्थापनमिष्यते ||१५||

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Adhikarana 10 (16-17) · Śloka 17

বাতোপসৃষ্টস্যোষ্ণৈঃ স্যুর্গুদদাহাদযো যদি| দ্রাক্ষাম্বুনা ত্রিবৃত্কল্কং দদ্যাদ্দোষানুলোমনম্||১৬|| তদ্ধি পিত্তশকৃদ্বাতান্ হৃত্বা দাহাদিকাঞ্জযেত্| শুদ্ধশ্চাপি পিবেচ্ছীতাং যবাগূং শর্করাযুতাম্||১৭||

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वातोपसृष्टस्योष्णैः स्युर्गुददाहादयो यदि| द्राक्षाम्बुना त्रिवृत्कल्कं दद्याद्दोषानुलोमनम्||१६|| तद्धि पित्तशकृद्वातान् हृत्वा दाहादिकाञ्जयेत्| शुद्धश्चापि पिबेच्छीतां यवागूं शर्करायुताम्||१७||

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Adhikarana 11 (18) · Śloka 18

অথবাঽতিবিরিক্তঃ স্যাত্ ক্ষীণবিট্কঃ স ভক্ষযেত্| মাষযূষেণ কুল্মাষান্ পিবেন্মধ্বথবা সুরাম্||১৮||

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अथवाऽतिविरिक्तः स्यात् क्षीणविट्कः स भक्षयेत्| माषयूषेण कुल्माषान् पिबेन्मध्वथवा सुराम्||१८||

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Adhikarana 12 (19) · Śloka 19

সামং চেত্ কুণপং শূলৈরুপবিশেদরোচকী| স ঘনাতিবিষাকুষ্ঠনতদারুবচাঃ পিবেত্||১৯||

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सामं चेत् कुणपं शूलैरुपविशेदरोचकी| स घनातिविषाकुष्ठनतदारुवचाः पिबेत्||१९||

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Adhikarana 13 (20) · Śloka 20

শকৃদ্বাতমসৃক্ পিত্তং কফং বা যোঽতিসার্যতে| পক্বং , তত্র স্ববর্গীযৈর্বস্তিঃ শ্রেষ্ঠং ভিষগ্জিতম্||২০||

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शकृद्वातमसृक् पित्तं कफं वा योऽतिसार्यते| पक्वं , तत्र स्ववर्गीयैर्बस्तिः श्रेष्ठं भिषग्जितम्||२०||

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Adhikarana 14 (21) · Śloka 21

ষণ্ণামেষাং দ্বিসংসর্গাত্ ত্রিংশদ্ভেদা ভবন্তি তু| কেবলৈঃ সহ ষট্ত্রিংশদ্বিদ্যাত্ সোপদ্রবানপি||২১||

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षण्णामेषां द्विसंसर्गात् त्रिंशद्भेदा भवन्ति तु| केवलैः सह षट्त्रिंशद्विद्यात् सोपद्रवानपि||२१||

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Adhikarana 15 (22) · Śloka 22

শূলপ্রবাহিকাধ্মানপরিকর্ত্যরুচিজ্বরান্| তৃষ্ণোষ্ণদাহমূর্চ্ছাদীংশ্চৈষাং বিদ্যাদুপদ্রবান্||২২||

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शूलप्रवाहिकाध्मानपरिकर्त्यरुचिज्वरान्| तृष्णोष्णदाहमूर्च्छादींश्चैषां विद्यादुपद्रवान्||२२||

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Adhikarana 16 (23) · Śloka 23

তত্রামেঽন্তরপানং স্যাত্ ব্যোষাম্ললবণৈর্যুতম্| পাচনং শস্যতে বস্তিরামে হি প্রতিষিধ্যতে||২৩||

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तत्रामेऽन्तरपानं स्यात् व्योषाम्ललवणैर्युतम्| पाचनं शस्यते बस्तिरामे हि प्रतिषिध्यते||२३||

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Adhikarana 17 (24) · Śloka 24

বাতঘ্নৈর্গ্রাহিবর্গীযৈর্বস্তিঃ শকৃতি শস্যতে|২৪|

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वातघ्नैर्ग्राहिवर्गीयैर्बस्तिः शकृति शस्यते|२४|

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Adhikarana 18 (24) · Śloka 24

স্বাদ্বম্ললবণৈঃ শস্তঃ স্নেহবস্তিঃ সমীরণে||২৪||

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स्वाद्वम्ललवणैः शस्तः स्नेहबस्तिः समीरणे||२४||

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Adhikarana 19 (25) · Śloka 25

রক্তে রক্তেন, পিত্তে তু কষাযস্বাদুতিক্তকৈঃ| সার্যমাণে কফে বস্তিঃ কষাযকটুতিক্তকৈঃ||২৫||

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रक्ते रक्तेन, पित्ते तु कषायस्वादुतिक्तकैः| सार्यमाणे कफे बस्तिः कषायकटुतिक्तकैः||२५||

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Adhikarana 20 (26-33) · Śloka 33

শকৃতা বাযুনা বাঽঽমে তেন বর্চস্যথানিলে| সংসৃষ্টেঽন্তরপানং স্যাদ্ ব্যোষাম্ললবণৈর্যুতম্||২৬|| পিত্তেনামেঽসৃজা বাঽপি তযোরামেন বা পুনঃ| সংসৃষ্টযোর্ভবেত্ পানং সব্যোষস্বাদুতিক্তকম্||২৭|| তথাঽঽমে কফসংসৃষ্টে কষাযব্যোষতিক্তকম্| আমেন তু কফে ব্যোষকষাযলবণৈর্যুতম্||২৮|| বাতেন বিশি পিত্তে বা বিট্পিত্তাভ্যাং তথাঽনিলে| মধুরাম্লকষাযঃ স্যাত্ সংসৃষ্টে বস্তিরুত্তমঃ||২৯|| শকৃচ্ছোণিতযোঃ পিত্তশকৃতো রক্তপিত্তযোঃ| বস্তিরন্যোন্যসংসর্গে কষাযস্বাদুতিক্তকঃ||৩০|| কফেন বিশি পিত্তে বা কফে বিট্পিত্তশোণিতৈঃ| ব্যোষতিক্তকষাযঃ স্যাত্ সংসৃষ্টে বস্তিরুত্তমঃ||৩১|| স্যাদ্বস্তির্ব্যোষতিক্তাম্লঃ সংসৃষ্টে বাযুনা কফে| মধুরব্যোষতিক্তস্তু রক্তে কফবিমূর্চ্ছিতে||৩২|| মারুতে কফসংসৃষ্টে ব্যোষাম্ললবণো ভবেত্| বস্তির্বাতেন পিত্তে তু কার্যঃ স্বাদ্বম্লতিক্তকঃ||৩৩||

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शकृता वायुना वाऽऽमे तेन वर्चस्यथानिले| संसृष्टेऽन्तरपानं स्याद् व्योषाम्ललवणैर्युतम्||२६|| पित्तेनामेऽसृजा वाऽपि तयोरामेन वा पुनः| संसृष्टयोर्भवेत् पानं सव्योषस्वादुतिक्तकम्||२७|| तथाऽऽमे कफसंसृष्टे कषायव्योषतिक्तकम्| आमेन तु कफे व्योषकषायलवणैर्युतम्||२८|| वातेन विशि पित्ते वा विट्पित्ताभ्यां तथाऽनिले| मधुराम्लकषायः स्यात् संसृष्टे बस्तिरुत्तमः||२९|| शकृच्छोणितयोः पित्तशकृतो रक्तपित्तयोः| बस्तिरन्योन्यसंसर्गे कषायस्वादुतिक्तकः||३०|| कफेन विशि पित्ते वा कफे विट्पित्तशोणितैः| व्योषतिक्तकषायः स्यात् संसृष्टे बस्तिरुत्तमः||३१|| स्याद्बस्तिर्व्योषतिक्ताम्लः संसृष्टे वायुना कफे| मधुरव्योषतिक्तस्तु रक्ते कफविमूर्च्छिते||३२|| मारुते कफसंसृष्टे व्योषाम्ललवणो भवेत्| बस्तिर्वातेन पित्ते तु कार्यः स्वाद्वम्लतिक्तकः||३३||

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Adhikarana 21 (34) · Śloka 34

ত্রিচতুঃপঞ্চসংসর্গানেবমেব বিকল্পযেত্| যুক্তিশ্চৈষাতিসারোক্তা সর্বরোগেষ্বপি স্মৃতা||৩৪||

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त्रिचतुःपञ्चसंसर्गानेवमेव विकल्पयेत्| युक्तिश्चैषातिसारोक्ता सर्वरोगेष्वपि स्मृता||३४||

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Adhikarana 22 (35) · Śloka 35

যুগপত্ ষড্রসং ষণ্ণাং সংসর্গে পাচনং ভবেত্ | নিরামাণাং তু পঞ্চানাং বস্তিঃ ষাড্রসিকো মতঃ||৩৫||

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युगपत् षड्रसं षण्णां संसर्गे पाचनं भवेत् | निरामाणां तु पञ्चानां बस्तिः षाड्रसिको मतः||३५||

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Adhikarana 23 (36-42) · Śloka 42

উদুম্বরশলাটূনি জম্ব্বাম্রোদুম্বরত্বচঃ| শঙ্খং সর্জরসং লাক্ষাং কর্দমং চ পলাংশিকম্||৩৬|| পিষ্ট্বা তৈঃ সর্পিষঃ প্রস্থং ক্ষীরদ্বিগুণিতং পচেত্| অতীসারেষু সর্বেষু পেযমেতদ্যথাবলম্||৩৭|| কচ্ছুরাধাতকীবিল্বসমঙ্গারক্তশালিভিঃ| মসূরাশ্বত্থশুঙ্গৈশ্চ যবাগূঃ স্যাজ্জলে শৃতৈঃ||৩৮|| বালোদুম্বরকট্বঙ্গসমঙ্গাপ্লক্ষপল্লবৈঃ | মসূরধাতকীপুষ্পবলাভিশ্চ তথা ভবেত্||৩৯|| স্থিরাদীনাং বলাদীনামিক্ষ্বাদীনামথাপি বা| ক্বাথেষু সমসূরাণাং যবাগ্বঃ স্যুঃ পৃথক্ পৃথক্||৪০|| কচ্ছুরামূলশাল্যাদিতণ্ডুলৈরুপসাধিতাঃ| দধিতক্রারনালাম্লক্ষীরেষ্বিক্ষুরসেঽপি বা||৪১|| শীতাঃ সশর্করাক্ষৌদ্রাঃ সর্বাতিসারনাশনাঃ| সসর্পির্মরিচাজাজ্যো মধুরা লবণাঃ শিবাঃ||৪২||

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उदुम्बरशलाटूनि जम्ब्वाम्रोदुम्बरत्वचः| शङ्खं सर्जरसं लाक्षां कर्दमं च पलांशिकम्||३६|| पिष्ट्वा तैः सर्पिषः प्रस्थं क्षीरद्विगुणितं पचेत्| अतीसारेषु सर्वेषु पेयमेतद्यथाबलम्||३७|| कच्छुराधातकीबिल्वसमङ्गारक्तशालिभिः| मसूराश्वत्थशुङ्गैश्च यवागूः स्याज्जले शृतैः||३८|| बालोदुम्बरकट्वङ्गसमङ्गाप्लक्षपल्लवैः | मसूरधातकीपुष्पबलाभिश्च तथा भवेत्||३९|| स्थिरादीनां बलादीनामिक्ष्वादीनामथापि वा| क्वाथेषु समसूराणां यवाग्वः स्युः पृथक् पृथक्||४०|| कच्छुरामूलशाल्यादितण्डुलैरुपसाधिताः| दधितक्रारनालाम्लक्षीरेष्विक्षुरसेऽपि वा||४१|| शीताः सशर्कराक्षौद्राः सर्वातिसारनाशनाः| ससर्पिर्मरिचाजाज्यो मधुरा लवणाः शिवाः||४२||

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Adhikarana 24 (43-45) · Śloka 45

ভবন্তি চাত্র শ্লোকাঃ- স্নিগ্ধাম্ললবণমধুরং পানং বস্তিশ্চ মারুতে কোষ্ণঃ| শীতং তিক্তকষাযং মধুরং পিত্তে চ রক্তে চ||৪৩|| তিক্তোষ্ণকষাযকটুশ্লেষ্মণি সঙ্গ্রাহি বাতনুচ্ছকৃতি| পাচনমামে পানং পিচ্ছাসৃগ্বস্তযো রক্তে||৪৪|| অতিসারং প্রত্যুক্তং মিশ্রং দ্বন্দ্বাদিযোগজেষ্বপি চ| তত্রোদ্রেকবিশেষাদ্দোষেষূপক্রমঃ কার্যঃ||৪৫||

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भवन्ति चात्र श्लोकाः- स्निग्धाम्ललवणमधुरं पानं बस्तिश्च मारुते कोष्णः| शीतं तिक्तकषायं मधुरं पित्ते च रक्ते च||४३|| तिक्तोष्णकषायकटुश्लेष्मणि सङ्ग्राहि वातनुच्छकृति| पाचनमामे पानं पिच्छासृग्बस्तयो रक्ते||४४|| अतिसारं प्रत्युक्तं मिश्रं द्वन्द्वादियोगजेष्वपि च| तत्रोद्रेकविशेषाद्दोषेषूपक्रमः कार्यः||४५||

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Adhikarana 25 (46) · Śloka 46

তত্র শ্লোকঃ- প্রাসৃতিকাঃ সব্যাপত্ক্রিযা নিরূহাস্তথাঽতিসারহিতাঃ| রসকল্পঘৃতযবাগ্বশ্চোক্তা গুরুণা প্রসৃতসিদ্ধৌ||৪৬||

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तत्र श्लोकः- प्रासृतिकाः सव्यापत्क्रिया निरूहास्तथाऽतिसारहिताः| रसकल्पघृतयवाग्वश्चोक्ता गुरुणा प्रसृतसिद्धौ||४६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 8

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে সিদ্ধিস্থানে প্রাসৃতযোগীযসিদ্ধির্নামাষ্টমোঽধ্যাযঃ ||৮||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते सिद्धिस्थाने प्रासृतयोगीयसिद्धिर्नामाष्टमोऽध्यायः ||८||

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