Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্ত্রিমর্মীযাং সিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
View original
अथातस्त्रिमर्मीयां सिद्धिं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতস্ত্রিমর্মীযাং সিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातस्त्रिमर्मीयां सिद्धिं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সপ্তোত্তরং মর্মশতমস্মিঞ্ছরীরে স্কন্ধশাখাসমাশ্রিতমগ্নিবেশ!| তেষামন্যতমপীডাযাং সমধিকা পীডা ভবতি, চেতনানিবন্ধবৈশেষ্যাত্| তত্র শাখাশ্রিতেভ্যো মর্মভ্যঃ স্কন্ধাশ্রিতানি গরীযাংসি, শাখানাং তদাশ্রিতত্বাত্; স্কন্ধাশ্রিতেভ্যোঽপি হৃদ্বস্তিশিরাংসি, তন্মূলত্বাচ্ছরীরস্য||৩||
सप्तोत्तरं मर्मशतमस्मिञ्छरीरे स्कन्धशाखासमाश्रितमग्निवेश!| तेषामन्यतमपीडायां समधिका पीडा भवति, चेतनानिबन्धवैशेष्यात्| तत्र शाखाश्रितेभ्यो मर्मभ्यः स्कन्धाश्रितानि गरीयांसि, शाखानां तदाश्रितत्वात्; स्कन्धाश्रितेभ्योऽपि हृद्वस्तिशिरांसि, तन्मूलत्वाच्छरीरस्य||३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
তত্র হৃদযে দশ ধমন্যঃ প্রাণাপানৌ মনো বুদ্ধিশ্চেতনা মহাভূতানি চ নাভ্যামরা ইব প্রতিষ্ঠিতানি, শিরসি ইন্দ্রিযাণি ইন্দ্রিযপ্রাণবহানি চ স্রোতাংসি সূর্যমিব গভস্তযঃ সংশ্রিতানি, বস্তিস্তু স্থূলগুদমুষ্কসেবনীশুক্রমূত্রবাহিনীনাং নাডী(লী)নাং মধ্যে মূত্রধারোঽম্বুবহানাং সর্বস্রোতসামুদধিরিবাপগানাং প্রতিষ্ঠা , বহুভিশ্চ তন্মূলৈর্মর্মসঞ্জ্ঞকৈঃ স্রোতোভির্গগনমিব দিনকরকরৈর্ব্যাপ্তমিদং শরীরম্||৪|| তেষাং ত্রযাণামন্যতমস্যাপি ভেদাদাশ্বেব শরীরভেদঃ স্যাত্, আশ্রযনাশাদাশ্রিতস্যাপি বিনাশঃ; তদুপঘাতাত্তু ঘোরতরব্যাধিপ্রাদুর্ভাবঃ; তস্মাদেতানি বিশেষেণ রক্ষ্যাণি বাহ্যাভিঘাদ্বাতাদিভ্যশ্চ||৫||
तत्र हृदये दश धमन्यः प्राणापानौ मनो बुद्धिश्चेतना महाभूतानि च नाभ्यामरा इव प्रतिष्ठितानि, शिरसि इन्द्रियाणि इन्द्रियप्राणवहानि च स्रोतांसि सूर्यमिव गभस्तयः संश्रितानि, बस्तिस्तु स्थूलगुदमुष्कसेवनीशुक्रमूत्रवाहिनीनां नाडी(ली)नां मध्ये मूत्रधारोऽम्बुवहानां सर्वस्रोतसामुदधिरिवापगानां प्रतिष्ठा , बहुभिश्च तन्मूलैर्मर्मसञ्ज्ञकैः स्रोतोभिर्गगनमिव दिनकरकरैर्व्याप्तमिदं शरीरम्||४|| तेषां त्रयाणामन्यतमस्यापि भेदादाश्वेव शरीरभेदः स्यात्, आश्रयनाशादाश्रितस्यापि विनाशः; तदुपघातात्तु घोरतरव्याधिप्रादुर्भावः; तस्मादेतानि विशेषेण रक्ष्याणि बाह्याभिघाद्वातादिभ्यश्च||५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
তত্র হৃদ্যভিহতে কাসশ্বাসবলক্ষযকণ্ঠশোষক্লোমাকর্ষণজিহ্বানির্গমমুখতালুশোষাপস্মারোন্মাদপ্রলাপচিত্তনাশাদযঃ স্যুঃ; শিরস্যভিহতে মন্যাস্তম্ভার্দিতচক্ষুর্বিভ্রমমোহোদ্বেষ্টনচেষ্টানাশকাসশ্বাসহনুগ্রহমূকগদ্গদত্বাক্ষিনিমীলন- গণ্ডস্পন্দনজৃম্ভণলালাস্রাবস্বরহানিবদনজিহ্মত্বাদীনি, বস্তৌ তু বাতমূত্রবর্চোনিগ্রহবঙ্ক্ষণমেহনবস্তিশূলকুণ্ডলোদাবর্তগুল্মানিলাষ্ঠীলোপস্তম্ভনাভিকুক্ষিগুদশ্রোণিগ্রহাদযঃ ; বাতাদ্যুপসৃষ্টানাং ত্বেষাং লিঙ্গানি চিকিত্সিতে সক্রিযাবিধীন্যুক্তানি||৬||
तत्र हृद्यभिहते कासश्वासबलक्षयकण्ठशोषक्लोमाकर्षणजिह्वानिर्गममुखतालुशोषापस्मारोन्मादप्रलापचित्तनाशादयः स्युः; शिरस्यभिहते मन्यास्तम्भार्दितचक्षुर्विभ्रममोहोद्वेष्टनचेष्टानाशकासश्वासहनुग्रहमूकगद्गदत्वाक्षिनिमीलन- गण्डस्पन्दनजृम्भणलालास्रावस्वरहानिवदनजिह्मत्वादीनि, बस्तौ तु वातमूत्रवर्चोनिग्रहवङ्क्षणमेहनबस्तिशूलकुण्डलोदावर्तगुल्मानिलाष्ठीलोपस्तम्भनाभिकुक्षिगुदश्रोणिग्रहादयः ; वाताद्युपसृष्टानां त्वेषां लिङ्गानि चिकित्सिते सक्रियाविधीन्युक्तानि||६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
কিন্ত্বেতানি বিশেষতোঽনিলাদ্রক্ষ্যাণি, অনিলো হি পিত্তকফসমুদীরণে হেতুঃ প্রাণমূলং চ, স বস্তিকর্মসাধ্যতমঃ, তস্মান্ন বস্তিসমং কিঞ্চিত্ কর্ম মর্মপরিপালনমস্তি| তত্র ষডাস্থাপনস্কন্ধান্ বিমানে দ্বৌ চানুবাসনস্কন্ধাবিহ চ বিহিতান্ বস্তীন্ বুদ্ধ্যা বিচার্য মহামর্মপরিপালনার্থং প্রযোজযেদ্বাতব্যাধিচিকিত্সাং চ||৭||
किन्त्वेतानि विशेषतोऽनिलाद्रक्ष्याणि, अनिलो हि पित्तकफसमुदीरणे हेतुः प्राणमूलं च, स बस्तिकर्मसाध्यतमः, तस्मान्न बस्तिसमं किञ्चित् कर्म मर्मपरिपालनमस्ति| तत्र षडास्थापनस्कन्धान् विमाने द्वौ चानुवासनस्कन्धाविह च विहितान् बस्तीन् बुद्ध्या विचार्य महामर्मपरिपालनार्थं प्रयोजयेद्वातव्याधिचिकित्सां च||७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
ভূযশ্চ হৃদ্যুপসৃষ্টে হিঙ্গুচূর্ণং লবণানামন্যতমচূর্ণসংযুক্তং মাতুলুঙ্গস্য রসেনান্যেন বাঽম্লেন হৃদ্যেন বা পাযযেত্, স্থিরাদিপঞ্চমূলীরসঃ সশর্করঃ পানার্থং, বিল্বাদিপঞ্চমূলরসসিদ্ধা চ যবাগূঃ, হৃদ্রোগবিহিতং চ কর্ম; মূর্ধ্নি তু বাতোপসৃষ্টেঽভ্যঙ্গস্বেদনোপনাহস্নেহপাননস্তঃকর্মাবপীডনধূমাদীনি; বস্তৌ তু কুম্ভীস্বেদঃ, বর্তযঃ, শ্যামাদিভির্গোমূত্রসিদ্ধো নিরূহঃ, বিল্বাদিভিশ্চ সুরাসিদ্ধঃ, শরকাশেক্ষুদর্ভগোক্ষুরকমূলশৃতক্ষীরৈশ্চ ত্রপুসৈর্বারুখরাশ্বাবীজযবর্ষভকবৃদ্ধিকল্কিতো নিরূহঃ, পীতদারুসিদ্ধতৈলেনানুবাসনং, তৈল্বকং চ সর্পির্বিরেকার্থং, শতাবরীগোক্ষুরকবৃহতীকণ্টকারিকাগুডূচীপুনর্নবোশীরমধুকদ্বিসারিবালোধ্রশ্রেযসীকুশকাশমূলকষাযক্ষীরচতুর্গুণং বলাবৃষর্ষভকখরাশ্বোপকুঞ্চিকাবত্সকত্রপুসৈর্বারুবীজশিতিবারকমধুকবচাশতপুষ্পাশ্মভেদকবর্ষাভূমদনফলকল্কসিদ্ধং তৈলমুত্তরবস্তির্নিরূহো বা শুদ্ধস্নিগ্ধস্বিন্নস্য বস্তিশূলমূত্রবিকারহর ইতি||৮||
भूयश्च हृद्युपसृष्टे हिङ्गुचूर्णं लवणानामन्यतमचूर्णसंयुक्तं मातुलुङ्गस्य रसेनान्येन वाऽम्लेन हृद्येन वा पाययेत्, स्थिरादिपञ्चमूलीरसः सशर्करः पानार्थं, बिल्वादिपञ्चमूलरससिद्धा च यवागूः, हृद्रोगविहितं च कर्म; मूर्ध्नि तु वातोपसृष्टेऽभ्यङ्गस्वेदनोपनाहस्नेहपाननस्तःकर्मावपीडनधूमादीनि; बस्तौ तु कुम्भीस्वेदः, वर्तयः, श्यामादिभिर्गोमूत्रसिद्धो निरूहः, बिल्वादिभिश्च सुरासिद्धः, शरकाशेक्षुदर्भगोक्षुरकमूलशृतक्षीरैश्च त्रपुसैर्वारुखराश्वाबीजयवर्षभकवृद्धिकल्कितो निरूहः, पीतदारुसिद्धतैलेनानुवासनं, तैल्वकं च सर्पिर्विरेकार्थं, शतावरीगोक्षुरकबृहतीकण्टकारिकागुडूचीपुनर्नवोशीरमधुकद्विसारिवालोध्रश्रेयसीकुशकाशमूलकषायक्षीरचतुर्गुणं बलावृषर्षभकखराश्वोपकुञ्चिकावत्सकत्रपुसैर्वारुबीजशितिवारकमधुकवचाशतपुष्पाश्मभेदकवर्षाभूमदनफलकल्कसिद्धं तैलमुत्तरबस्तिर्निरूहो वा शुद्धस्निग्धस्विन्नस्य बस्तिशूलमूत्रविकारहर इति||८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 7 (9-10) · Śloka 10
ভবন্তি চাত্র শ্লোকাঃ- হৃদযে মূর্ধ্নি বস্তৌ চ নৃণাং প্রাণাঃ প্রতিষ্ঠিতাঃ| তস্মাত্তেষাং সদা যত্নং কুর্বীত পরিপালনে||৯|| আবাধবর্জনং নিত্যং স্বস্থবৃত্তানুবর্তনম্| উত্পন্নার্তিবিঘাতশ্চ মর্মণাং পরিপালনম্||১০||
भवन्ति चात्र श्लोकाः- हृदये मूर्ध्नि बस्तौ च नृणां प्राणाः प्रतिष्ठिताः| तस्मात्तेषां सदा यत्नं कुर्वीत परिपालने||९|| आबाधवर्जनं नित्यं स्वस्थवृत्तानुवर्तनम्| उत्पन्नार्तिविघातश्च मर्मणां परिपालनम्||१०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
অত উর্ধ্বং বিকারা যে ত্রিমর্মীযে চিকিত্সিতে| ন প্রোক্তা মর্মজাস্তেষাং কাংশ্চিদ্বক্ষ্যামি সৌষধান্||১১||
अत उर्ध्वं विकारा ये त्रिमर्मीये चिकित्सिते| न प्रोक्ता मर्मजास्तेषां कांश्चिद्वक्ष्यामि सौषधान्||११||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 9 (12-15) · Śloka 15
ক্রুদ্ধঃ স্বৈঃ কোপনৈর্বাযুঃ স্থানাদূর্ধ্বং প্রপদ্যতে| পীডযন্ হৃদযং গত্বা শিরঃ শঙ্খৌ চ পীডযন্||১২|| ধনুর্বন্নমযেদ্গাত্রাণ্যাক্ষিপেন্মোহযেত্তথা| (নমযেচ্চাক্ষিপেচ্চাঙ্গান্যুচ্ছ্বাসং নিরুণদ্ধি চ)| কৃচ্ছ্রেণ চাপ্যুচ্ছ্বসিতি স্তব্ধাক্ষোঽথ নিমীলকঃ ||১৩|| কপোত ইব কূজেচ্চ নিঃসঞ্জ্ঞঃ সোঽপতন্ত্রকঃ| দৃষ্টিং সংস্তম্ভ্য সঞ্জ্ঞাং চ হত্বা কণ্ঠেন কূজতি||১৪|| হৃদি মুক্তে নরঃ স্বাস্থ্যং যাতি মোহং বৃতে পুনঃ| বাযুনা দারুণং প্রাহুরেকে তমপতানকম্||১৫||
क्रुद्धः स्वैः कोपनैर्वायुः स्थानादूर्ध्वं प्रपद्यते| पीडयन् हृदयं गत्वा शिरः शङ्खौ च पीडयन्||१२|| धनुर्वन्नमयेद्गात्राण्याक्षिपेन्मोहयेत्तथा| (नमयेच्चाक्षिपेच्चाङ्गान्युच्छ्वासं निरुणद्धि च)| कृच्छ्रेण चाप्युच्छ्वसिति स्तब्धाक्षोऽथ निमीलकः ||१३|| कपोत इव कूजेच्च निःसञ्ज्ञः सोऽपतन्त्रकः| दृष्टिं संस्तम्भ्य सञ्ज्ञां च हत्वा कण्ठेन कूजति||१४|| हृदि मुक्ते नरः स्वास्थ्यं याति मोहं वृते पुनः| वायुना दारुणं प्राहुरेके तमपतानकम्||१५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 10 (16-20) · Śloka 20
শ্বসনং কফবাতাভ্যাং রুদ্ধং তস্য বিমোক্ষযেত্| তীক্ষ্ণৈঃ প্রধমনৈঃ সঞ্জ্ঞাং তাসু মুক্তাসু বিন্দতি||১৬|| মরিচং শিগ্রুবীজানি বিডঙ্গং চ ফণিজ্ঝকম্| এতানি সূক্ষ্মচূর্ণানি দদ্যাচ্ছীর্ষবিরেচনম্||১৭|| তুম্বুরূণ্যভযা হিঙ্গু পৌষ্করং লবণত্রযম্| যবক্বাথাম্বুনা পেযং হৃদ্গ্রহে চাপতন্ত্রকে ||১৮|| হিঙ্গ্বম্লবেতসং শুণ্ঠীং সসৌবর্চলদাডিমম্| পিবেদ্বাতকফঘ্নং চ কর্ম হৃদ্রোগনুদ্ধিতম্||১৯|| শোধনা বস্তযস্তীক্ষ্ণা ন হিতাস্তস্য কৃত্স্নশঃ| সৌবর্চলাভযাব্যোষৈঃ সিদ্ধং তস্মৈ ঘৃতং হিতম্||২০||
श्वसनं कफवाताभ्यां रुद्धं तस्य विमोक्षयेत्| तीक्ष्णैः प्रधमनैः सञ्ज्ञां तासु मुक्तासु विन्दति||१६|| मरिचं शिग्रुबीजानि विडङ्गं च फणिज्झकम्| एतानि सूक्ष्मचूर्णानि दद्याच्छीर्षविरेचनम्||१७|| तुम्बुरूण्यभया हिङ्गु पौष्करं लवणत्रयम्| यवक्वाथाम्बुना पेयं हृद्ग्रहे चापतन्त्रके ||१८|| हिङ्ग्वम्लवेतसं शुण्ठीं ससौवर्चलदाडिमम्| पिबेद्वातकफघ्नं च कर्म हृद्रोगनुद्धितम्||१९|| शोधना बस्तयस्तीक्ष्णा न हितास्तस्य कृत्स्नशः| सौवर्चलाभयाव्योषैः सिद्धं तस्मै घृतं हितम्||२०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 11 (21-24) · Śloka 24
মধুরস্নিগ্ধগুর্বন্নসেবনাচ্চিন্তনাচ্ছ্রমাত্ | শোকাদ্ব্যাধ্যনুষঙ্গাচ্চ বাযুনোদীরিতঃ কফঃ||২১|| যদাঽসৌ সমবস্কন্দ্য হৃদযং হৃদযাশ্রযান্| সমাবৃণোতি জ্ঞানাদীংস্তদা তন্দ্রোপজাযতে||২২|| হৃদযে ব্যাকুলীভাবো বাক্চেষ্টেন্দ্রিযগৌরবম্| মনোবুদ্ধ্যপ্রসাদশ্চ তন্দ্রাযা লক্ষণং মতম্||২৩|| কফঘ্নং তত্র কর্তব্যং শোধনং শমনানি চ| ব্যাযামো রক্তমোক্ষশ্চ ভোজ্যং চ কটুতিক্তকম্||২৪||
मधुरस्निग्धगुर्वन्नसेवनाच्चिन्तनाच्छ्रमात् | शोकाद्व्याध्यनुषङ्गाच्च वायुनोदीरितः कफः||२१|| यदाऽसौ समवस्कन्द्य हृदयं हृदयाश्रयान्| समावृणोति ज्ञानादींस्तदा तन्द्रोपजायते||२२|| हृदये व्याकुलीभावो वाक्चेष्टेन्द्रियगौरवम्| मनोबुद्ध्यप्रसादश्च तन्द्राया लक्षणं मतम्||२३|| कफघ्नं तत्र कर्तव्यं शोधनं शमनानि च| व्यायामो रक्तमोक्षश्च भोज्यं च कटुतिक्तकम्||२४||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 12 (25-26) · Śloka 26
মূত্রৌকসাদো জঠরং কৃচ্ছ্রমুত্সঙ্গসঙ্ক্ষযৌ| মূত্রাতীতোঽনিলাষ্ঠীলা বাতবস্ত্যুষ্ণমারুতৌ||২৫|| বাতকুণ্ডলিকা গ্রন্থির্বিড্ঘাতো বস্তিকুণ্ডলম্| ত্রযোদশৈতে মূত্রস্য দোষাস্তাঁল্লিঙ্গতঃ শৃণু||২৬||
मूत्रौकसादो जठरं कृच्छ्रमुत्सङ्गसङ्क्षयौ| मूत्रातीतोऽनिलाष्ठीला वातबस्त्युष्णमारुतौ||२५|| वातकुण्डलिका ग्रन्थिर्विड्घातो बस्तिकुण्डलम्| त्रयोदशैते मूत्रस्य दोषास्ताँल्लिङ्गतः शृणु||२६||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 13 (27-28) · Śloka 28
পিত্তং কফো দ্বাবপি বা বস্তৌ সংহন্যতে যদা| মারুতেন তদা মূত্রং রক্তং পীতং ঘনং সৃজেত্||২৭|| সদাহং শ্বেতসান্দ্রং বা সর্বৈর্বা লক্ষণৈর্যুতম্| মূত্রৌকসাদং তং বিদ্যাত্ পিত্তশ্লেষ্মহরৈর্জযেত্||২৮||
पित्तं कफो द्वावपि वा बस्तौ संहन्यते यदा| मारुतेन तदा मूत्रं रक्तं पीतं घनं सृजेत्||२७|| सदाहं श्वेतसान्द्रं वा सर्वैर्वा लक्षणैर्युतम्| मूत्रौकसादं तं विद्यात् पित्तश्लेष्महरैर्जयेत्||२८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 14 (29-31) · Śloka 31
বিধারণাত্ প্রতিহতং বাতোদাবর্তিতং যদা| পূরযত্যুদরং মূত্রং তদা তদনিমিত্তরুক্||২৯|| অপক্তিমূত্রবিট্সঙ্গৈস্তন্মূত্রজঠরং বদেত্| মূত্রবৈরেচনীং তত্র চিকিত্সাং সম্প্রযোজযেত্||৩০|| হিঙ্গুদ্বিরুত্তরং চূর্ণং ত্রিমর্মীযে প্রকীর্তিতম্| হন্যান্মূত্রোদরানাহমাধ্মানং গুদমেঢ্রযোঃ||৩১||
विधारणात् प्रतिहतं वातोदावर्तितं यदा| पूरयत्युदरं मूत्रं तदा तदनिमित्तरुक्||२९|| अपक्तिमूत्रविट्सङ्गैस्तन्मूत्रजठरं वदेत्| मूत्रवैरेचनीं तत्र चिकित्सां सम्प्रयोजयेत्||३०|| हिङ्गुद्विरुत्तरं चूर्णं त्रिमर्मीये प्रकीर्तितम्| हन्यान्मूत्रोदरानाहमाध्मानं गुदमेढ्रयोः||३१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 15 (32-48) · Śloka 49
মূত্রিতস্য ব্যবাযাত্তু রেতো বাতোদ্ধতং চ্যুতম্| পূর্বং মূত্রস্য পশ্চাদ্বা স্রবেত্ কৃচ্ছ্রং তদুচ্যতে||৩২|| খবৈগুণ্যানিলাক্ষেপৈঃ কিঞ্চিন্মূত্রং চ তিষ্ঠতি| মণিসন্ধৌ স্রবেত্ পশ্চাত্তদরুগ্বাঽথ চাতিরুক্||৩৩|| মূত্রোত্সঙ্গঃ স বিচ্ছিন্নমুচ্ছেষগুরুশেফসঃ | বাতাকৃতির্ভবেদ্বাতান্মূত্রে শুষ্যতি সঙ্ক্ষযঃ||৩৪|| চিরং ধারযতো মূত্রং ত্বরযা ন প্রবর্ততে| মেহমানস্য মন্দং বা মূত্রাতীতঃ স উচ্যতে||৩৫|| আধ্মাপযন্ বস্তিগুদং রুদ্ধ্বা বাযুশ্চলোন্নতাম্| কুর্যাত্তীব্রার্তিমষ্ঠীলাং মূত্রবিণ্মার্গরোধিনীম্||৩৬|| মূত্রং ধারযতো বস্তৌ বাযুঃ ক্রুদ্ধো বিধারণাত্| মূত্ররোধার্তিকণ্ডূভির্বাতবস্তিঃ স উচ্যতে||৩৭|| উষ্মণা সোষ্মকং মূত্রং শোষযন্ রক্তপীতকম্| উষ্ণবাতঃ সৃজেত্ কৃচ্ছ্রাদ্বস্ত্যুপস্থার্তিদাহবান্||৩৮|| গতিসঙ্গাদুদাবৃত্তঃ স মূত্রস্থানমার্গযোঃ| মূত্রস্য বিগুণো বাযুর্ভগ্নব্যাবিদ্ধকুণ্ডলী||৩৯|| মূত্রং বিহন্তি সংস্তম্ভভঙ্গগৌরববেষ্টনৈঃ| তীব্ররুঙ্মূত্রবিট্সঙ্গৈর্বাতকুণ্ডলিকেতি সা||৪০|| রক্তং বাতকফাদ্দুষ্টং বস্তিদ্বারে সুদারুণম্| গ্রন্থিং কুর্যাত্ স কৃচ্ছ্রেণ সৃজেন্মূত্রং তদাবৃতম্||৪১|| অশ্মরীসমশূলং তং রক্তগ্রন্থিং প্রচক্ষতে| রূক্ষদুর্বলযোর্বাতেনোদাবৃত্তং শকৃদ্যদা||৪২|| মূত্রস্রোতঃ প্রপদ্যেত বিট্সংসৃষ্টং তদা নরঃ| বিড্গন্ধং মূত্রযেত্ কৃচ্ছ্রাদ্বিড্বিঘাতং বিনির্দিশেত্||৪৩|| দ্রুতাধ্বলঙ্ঘনাযাসাদভিঘাতাত্ প্রপীডনাত্| স্বস্থানাদ্বস্তিরুদ্বৃত্তঃ স্থূলস্তিষ্ঠতি গর্ভবত্||৪৪|| শূলস্পন্দনদাহার্তো বিন্দুং বিন্দুং স্রবত্যপি| পীডিতস্তু সৃজেদ্ধারাং সংস্তম্ভোদ্বেষ্টনার্তিমান্||৪৫|| বস্তিকুণ্ডলমাহুস্তং ঘোরং শস্ত্রবিষোপমম্| পবনপ্রবলং প্রাযো দুর্নিবারমবুদ্ধিভিঃ||৪৬|| তস্মিন্ পিত্তান্বিতে দাহঃ শূলং মূত্রবিবর্ণতা| শ্লেষ্মণা গৌরবং শোফঃ স্নিগ্ধং মূত্রং ঘনং সিতম্||৪৭|| শ্লেষ্মরুদ্ধবিলো বস্তিঃ পিত্তোদীর্ণো ন সিধ্যতি| অবিভ্রান্তবিলঃ সাধ্যো ন তু যঃ কুণ্ডলীকৃতঃ||৪৮|| স্যাদ্বস্তৌ কুণ্ডলীভূতে হৃন্মোহঃ শ্বাস এব চ|৪৯|
मूत्रितस्य व्यवायात्तु रेतो वातोद्धतं च्युतम्| पूर्वं मूत्रस्य पश्चाद्वा स्रवेत् कृच्छ्रं तदुच्यते||३२|| खवैगुण्यानिलाक्षेपैः किञ्चिन्मूत्रं च तिष्ठति| मणिसन्धौ स्रवेत् पश्चात्तदरुग्वाऽथ चातिरुक्||३३|| मूत्रोत्सङ्गः स विच्छिन्नमुच्छेषगुरुशेफसः | वाताकृतिर्भवेद्वातान्मूत्रे शुष्यति सङ्क्षयः||३४|| चिरं धारयतो मूत्रं त्वरया न प्रवर्तते| मेहमानस्य मन्दं वा मूत्रातीतः स उच्यते||३५|| आध्मापयन् बस्तिगुदं रुद्ध्वा वायुश्चलोन्नताम्| कुर्यात्तीव्रार्तिमष्ठीलां मूत्रविण्मार्गरोधिनीम्||३६|| मूत्रं धारयतो बस्तौ वायुः क्रुद्धो विधारणात्| मूत्ररोधार्तिकण्डूभिर्वातबस्तिः स उच्यते||३७|| उष्मणा सोष्मकं मूत्रं शोषयन् रक्तपीतकम्| उष्णवातः सृजेत् कृच्छ्राद्बस्त्युपस्थार्तिदाहवान्||३८|| गतिसङ्गादुदावृत्तः स मूत्रस्थानमार्गयोः| मूत्रस्य विगुणो वायुर्भग्नव्याविद्धकुण्डली||३९|| मूत्रं विहन्ति संस्तम्भभङ्गगौरववेष्टनैः| तीव्ररुङ्मूत्रविट्सङ्गैर्वातकुण्डलिकेति सा||४०|| रक्तं वातकफाद्दुष्टं बस्तिद्वारे सुदारुणम्| ग्रन्थिं कुर्यात् स कृच्छ्रेण सृजेन्मूत्रं तदावृतम्||४१|| अश्मरीसमशूलं तं रक्तग्रन्थिं प्रचक्षते| रूक्षदुर्बलयोर्वातेनोदावृत्तं शकृद्यदा||४२|| मूत्रस्रोतः प्रपद्येत विट्संसृष्टं तदा नरः| विड्गन्धं मूत्रयेत् कृच्छ्राद्विड्विघातं विनिर्दिशेत्||४३|| द्रुताध्वलङ्घनायासादभिघातात् प्रपीडनात्| स्वस्थानाद्वस्तिरुद्वृत्तः स्थूलस्तिष्ठति गर्भवत्||४४|| शूलस्पन्दनदाहार्तो बिन्दुं बिन्दुं स्रवत्यपि| पीडितस्तु सृजेद्धारां संस्तम्भोद्वेष्टनार्तिमान्||४५|| बस्तिकुण्डलमाहुस्तं घोरं शस्त्रविषोपमम्| पवनप्रबलं प्रायो दुर्निवारमबुद्धिभिः||४६|| तस्मिन् पित्तान्विते दाहः शूलं मूत्रविवर्णता| श्लेष्मणा गौरवं शोफः स्निग्धं मूत्रं घनं सितम्||४७|| श्लेष्मरुद्धबिलो बस्तिः पित्तोदीर्णो न सिध्यति| अविभ्रान्तबिलः साध्यो न तु यः कुण्डलीकृतः||४८|| स्याद्वस्तौ कुण्डलीभूते हृन्मोहः श्वास एव च|४९|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 16 (49) · Śloka 50
দোষাধিক্যমবেক্ষ্যৈতান্ মূত্রকৃচ্ছ্রহরৈর্জযেত্||৪৯|| বস্তিমুত্তরবস্তিং চ সর্বেষামেব দাপযেত্|৫০|
दोषाधिक्यमवेक्ष्यैतान् मूत्रकृच्छ्रहरैर्जयेत्||४९|| बस्तिमुत्तरबस्तिं च सर्वेषामेव दापयेत्|५०|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 17 (50-57) · Śloka 57
পুষ্পনেত্রং তু হৈমং স্যাচ্ছ্লক্ষ্ণমৌত্তরবস্তিকম্||৫০|| জাত্যশ্বহনবৃন্তেন সমং গোপুচ্ছসংস্থিতম্| রৌপ্যং বা সর্ষপচ্ছিদ্রং দ্বিকর্ণং দ্বাদশাঙ্গুলম্||৫১|| তেনাজবস্তিযুক্তেন স্নেহস্যার্ধপলং নযেত্| যথাবযোবিশেষেণ স্নেহমাত্রাং বিকল্প্য বা||৫২|| স্নাতস্য ভুক্তভক্তস্য রসেন পযসাঽপি বা| সৃষ্টবিণ্মূত্রবেগস্য পীঠে জানুসমে মৃদৌ||৫৩|| ঋজোঃ সুখোপবিষ্টস্য হৃষ্টে মেঢ্রে ঘৃতাক্তযা| শলাকযাঽন্বিষ্য গতিং যদ্যপ্রতিহতা ব্রজেত্||৫৪|| ততঃ শেফঃপ্রমাণেন পুষ্পনেত্রং প্রবেশযেত্| গুদবন্মূত্রমার্গেণ প্রণযেদনু সেবনীম্||৫৫|| হিংস্যাদতিগতং বস্তিমূনে স্নেহো ন গচ্ছতি| সুখং প্রপীড্য নিষ্কম্পং নিষ্কর্ষেন্নেত্রমেব চ||৫৬|| প্রত্যাগতে দ্বিতীযং চ তৃতীযং চ প্রদাপযেত্| অনাগচ্ছন্নুপেক্ষ্যস্তু রজনীব্যুষিতস্য চ||৫৭||
पुष्पनेत्रं तु हैमं स्याच्छ्लक्ष्णमौत्तरबस्तिकम्||५०|| जात्यश्वहनवृन्तेन समं गोपुच्छसंस्थितम्| रौप्यं वा सर्षपच्छिद्रं द्विकर्णं द्वादशाङ्गुलम्||५१|| तेनाजबस्तियुक्तेन स्नेहस्यार्धपलं नयेत्| यथावयोविशेषेण स्नेहमात्रां विकल्प्य वा||५२|| स्नातस्य भुक्तभक्तस्य रसेन पयसाऽपि वा| सृष्टविण्मूत्रवेगस्य पीठे जानुसमे मृदौ||५३|| ऋजोः सुखोपविष्टस्य हृष्टे मेढ्रे घृताक्तया| शलाकयाऽन्विष्य गतिं यद्यप्रतिहता व्रजेत्||५४|| ततः शेफःप्रमाणेन पुष्पनेत्रं प्रवेशयेत्| गुदवन्मूत्रमार्गेण प्रणयेदनु सेवनीम्||५५|| हिंस्यादतिगतं बस्तिमूने स्नेहो न गच्छति| सुखं प्रपीड्य निष्कम्पं निष्कर्षेन्नेत्रमेव च||५६|| प्रत्यागते द्वितीयं च तृतीयं च प्रदापयेत्| अनागच्छन्नुपेक्ष्यस्तु रजनीव्युषितस्य च||५७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 18 (58-61) · Śloka 61
পিপ্পলীলবণাগারধূমাপামার্গসর্ষপৈঃ| বার্তাকুরসনির্গুণ্ডীশম্পাকৈঃ সসহাচরৈঃ||৫৮|| মূত্রাম্লপিষ্টৈঃ সগুডৈর্বর্তিং কৃত্বা প্রবেশযেত্| অগ্রে তু সর্ষপাকারাং পশ্চার্ধে মাষসম্মিতাম্||৫৯|| নেত্রদীর্ঘাং ঘৃতাভ্যক্তাং সুকুমারামভঙ্গুরাম্| নেত্রবন্মূত্রনাড্যাং তু পাযৌ চাঙ্গুষ্ঠসম্মিতাম্||৬০|| স্নেহে প্রত্যাগতে তাভ্যামানুবাসনিকো বিধিঃ| পরিহারশ্চ সব্যাপত্ সসম্যগ্দত্তলক্ষণঃ||৬১||
पिप्पलीलवणागारधूमापामार्गसर्षपैः| वार्ताकुरसनिर्गुण्डीशम्पाकैः ससहाचरैः||५८|| मूत्राम्लपिष्टैः सगुडैर्वर्तिं कृत्वा प्रवेशयेत्| अग्रे तु सर्षपाकारां पश्चार्धे माषसम्मिताम्||५९|| नेत्रदीर्घां घृताभ्यक्तां सुकुमारामभङ्गुराम्| नेत्रवन्मूत्रनाड्यां तु पायौ चाङ्गुष्ठसम्मिताम्||६०|| स्नेहे प्रत्यागते ताभ्यामानुवासनिको विधिः| परिहारश्च सव्यापत् ससम्यग्दत्तलक्षणः||६१||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 19 (62-64) · Śloka 65
স্ত্রীণামার্তবকালে তু প্রতিকর্ম তদাচরেত্| গর্ভাসনা সুখং স্নেহং তদাঽঽদত্তে হ্যপাবৃতা||৬২|| গর্ভং যোনিস্তদা শীঘ্রং জিতে গৃহ্ণাতি মারুতে| বস্তিজেষু বিকারেষু যোনিবিভ্রংশজেষু চ||৬৩|| যোনিশূলেষু তীব্রেষু যোনিব্যাপত্স্বসৃগ্দরে| অপ্রস্রবতি মূত্রে চ বিন্দুং বিন্দুং স্রবত্যপি||৬৪|| বিদধ্যাদুত্তরং বস্তিং যথাস্বৌষধসংস্কৃতম্ |৬৫|
स्त्रीणामार्तवकाले तु प्रतिकर्म तदाचरेत्| गर्भासना सुखं स्नेहं तदाऽऽदत्ते ह्यपावृता||६२|| गर्भं योनिस्तदा शीघ्रं जिते गृह्णाति मारुते| बस्तिजेषु विकारेषु योनिविभ्रंशजेषु च||६३|| योनिशूलेषु तीव्रेषु योनिव्यापत्स्वसृग्दरे| अप्रस्रवति मूत्रे च बिन्दुं बिन्दुं स्रवत्यपि||६४|| विदध्यादुत्तरं बस्तिं यथास्वौषधसंस्कृतम् |६५|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 20 (65-69) · Śloka 70
পুষ্পনেত্রপ্রমাণং তু প্রমদানাং দশাঙ্গুলম্||৬৫|| মূত্রস্রোতঃপরীণাহং মুদ্গস্রোতোঽনুবাহি চ| অপত্যমার্গে নারীণাং বিধেযং চতুরঙ্গুলম্||৬৬|| দ্ব্যঙ্গুলং মূত্রমার্গে তু বালাযাস্ত্বেকমঙ্গুলম্| উত্তানাযাঃ শযানাযাঃ সম্যক্ সঙ্কোচ্য সক্থিনী||৬৭|| অথাস্যাঃ প্রণযেন্নেত্রমনুবংশগতং সুখম্| দ্বিস্ত্রিশ্চতুরিতি স্নেহানহোরাত্রেণ যোজযেত্||৬৮|| বস্তৌ , বস্তৌ প্রণীতে চ বর্তিঃ পীনতরা ভবেত্| ত্রিরাত্রং কর্ম কুর্বীত স্নেহমাত্রাং বিবর্ধযেত্||৬৯|| অনেনৈব বিধানেন কর্ম কুর্যাত্ পুনস্ত্র্যহাত্|৭০|
पुष्पनेत्रप्रमाणं तु प्रमदानां दशाङ्गुलम्||६५|| मूत्रस्रोतःपरीणाहं मुद्गस्रोतोऽनुवाहि च| अपत्यमार्गे नारीणां विधेयं चतुरङ्गुलम्||६६|| द्व्यङ्गुलं मूत्रमार्गे तु बालायास्त्वेकमङ्गुलम्| उत्तानायाः शयानायाः सम्यक् सङ्कोच्य सक्थिनी||६७|| अथास्याः प्रणयेन्नेत्रमनुवंशगतं सुखम्| द्विस्त्रिश्चतुरिति स्नेहानहोरात्रेण योजयेत्||६८|| बस्तौ , बस्तौ प्रणीते च वर्तिः पीनतरा भवेत्| त्रिरात्रं कर्म कुर्वीत स्नेहमात्रां विवर्धयेत्||६९|| अनेनैव विधानेन कर्म कुर्यात् पुनस्त्र्यहात्|७०|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 21 (70-73) · Śloka 73
অতঃ শিরোবিকারাণাং কশ্চিদ্ভেদঃ প্রবক্ষ্যতে||৭০|| রক্তপিত্তানিলা দুষ্টাঃ শঙ্খদেশে বিমূর্চ্ছিতাঃ| তীব্ররুগ্দাহরাগং হি শোফং কুর্বন্তি দারুণম্||৭১|| স শিরো বিষবদ্বেগী নিরুধ্যাশু গলং তথা| ত্রিরাত্রাজ্জীবিতং হন্তি শঙ্খকো নাম নামতঃ||৭২|| পরং ত্র্যহাজ্জীবতি চেত্ প্রত্যাখ্যাযাচরেত্ ক্রিযাম্| শিরোবিরেকসেকাদি সর্বং বীসর্পনুচ্চ যত্||৭৩||
अतः शिरोविकाराणां कश्चिद्भेदः प्रवक्ष्यते||७०|| रक्तपित्तानिला दुष्टाः शङ्खदेशे विमूर्च्छिताः| तीव्ररुग्दाहरागं हि शोफं कुर्वन्ति दारुणम्||७१|| स शिरो विषवद्वेगी निरुध्याशु गलं तथा| त्रिरात्राज्जीवितं हन्ति शङ्खको नाम नामतः||७२|| परं त्र्यहाज्जीवति चेत् प्रत्याख्यायाचरेत् क्रियाम्| शिरोविरेकसेकादि सर्वं वीसर्पनुच्च यत्||७३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 22 (74-78) · Śloka 78
রূক্ষাত্যধ্যশনাত্ পূর্ববাতাবশ্যাযমৈথুনৈঃ| বেগসন্ধারণাযাসব্যাযামৈঃ কুপিতোঽনিলঃ||৭৪|| কেবলঃ সকফো বাঽর্ধং গৃহীত্বা শিরসস্ততঃ| মন্যাভ্রূশঙ্খকর্ণাক্ষিললাটার্ধেঽতিবেদনাম্||৭৫|| শস্ত্রারণিনিভাং কুর্যাত্তীব্রাং সোঽর্ধাবভেদকঃ| নযনং বাঽথবা শ্রোত্রমতিবৃদ্ধো বিনাশযেত্||৭৬|| চতুঃস্নেহোত্তমা মাত্রা শিরঃকাযবিরেচনম্| নাডীস্বেদো ঘৃতং জীর্ণং বস্তিকর্মানুবাসনম্||৭৭|| উপনাহঃ শিরোবস্তির্দহনং চাত্র শস্যতে| প্রতিশ্যাযে শিরোরোগে যচ্চোদ্দিষ্টং চিকিত্সিতম্||৭৮||
रूक्षात्यध्यशनात् पूर्ववातावश्यायमैथुनैः| वेगसन्धारणायासव्यायामैः कुपितोऽनिलः||७४|| केवलः सकफो वाऽर्धं गृहीत्वा शिरसस्ततः| मन्याभ्रूशङ्खकर्णाक्षिललाटार्धेऽतिवेदनाम्||७५|| शस्त्रारणिनिभां कुर्यात्तीव्रां सोऽर्धावभेदकः| नयनं वाऽथवा श्रोत्रमतिवृद्धो विनाशयेत्||७६|| चतुःस्नेहोत्तमा मात्रा शिरःकायविरेचनम्| नाडीस्वेदो घृतं जीर्णं बस्तिकर्मानुवासनम्||७७|| उपनाहः शिरोबस्तिर्दहनं चात्र शस्यते| प्रतिश्याये शिरोरोगे यच्चोद्दिष्टं चिकित्सितम्||७८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 23 (79-83) · Śloka 83
সন্ধারণাদজীর্ণাদ্যৈর্মস্তিষ্কং রক্তমারুতৌ| দুষ্টৌ দূষযতস্তচ্চ দুষ্টং তাভ্যাং বিমূর্চ্ছিতম্||৭৯|| সূর্যোদযেংঽশুসন্তাপাদ্দ্রবং বিষ্যন্দতে শনৈঃ| ততো দিনে শিরঃশূলং দিনবৃদ্ধ্যা বিবর্ধতে||৮০|| দিনক্ষযে ততঃ স্ত্যানে মস্তিষ্কে সম্প্রশাম্যতি| সূর্যাবর্তঃ স তত্র স্যাত্ সর্পিরৌত্তরভক্তিকম্||৮১|| শিরঃকাযবিরেকৌ চ মূর্ধ্না ত্রিস্নেহধারণম্ | জাঙ্গলৈরুপনাহশ্চ ঘৃতক্ষীরৈশ্চ সেচনম্ ||৮২|| বর্হিতিত্তিরিলাবাদিশৃতক্ষীরোত্থিতং ঘৃতম্| স্যান্নাবনং জীবনীযক্ষীরাষ্টগুণসাধিতম্||৮৩||
सन्धारणादजीर्णाद्यैर्मस्तिष्कं रक्तमारुतौ| दुष्टौ दूषयतस्तच्च दुष्टं ताभ्यां विमूर्च्छितम्||७९|| सूर्योदयेंऽशुसन्तापाद्द्रवं विष्यन्दते शनैः| ततो दिने शिरःशूलं दिनवृद्ध्या विवर्धते||८०|| दिनक्षये ततः स्त्याने मस्तिष्के सम्प्रशाम्यति| सूर्यावर्तः स तत्र स्यात् सर्पिरौत्तरभक्तिकम्||८१|| शिरःकायविरेकौ च मूर्ध्ना त्रिस्नेहधारणम् | जाङ्गलैरुपनाहश्च घृतक्षीरैश्च सेचनम् ||८२|| बर्हितित्तिरिलावादिशृतक्षीरोत्थितं घृतम्| स्यान्नावनं जीवनीयक्षीराष्टगुणसाधितम्||८३||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 24 (84-87) · Śloka 87
(উপবাসাতিশোকাতিরূক্ষশীতাল্পভোজনৈঃ )| দুষ্টা দোষাস্ত্রযো মন্যাপশ্চাদ্ঘাটাসু বেদনাম্||৮৪|| তীব্রাং কুর্বন্তি সা চাক্ষিভ্রূশঙ্খেষ্ববতিষ্ঠতে| স্পন্দনং গণ্ডপার্শ্বস্য নেত্ররোগং হনুগ্রহম্||৮৫|| সোঽনন্তবাতস্তং হন্যাত্ সিরার্কাবর্তনাশনৈঃ| বাতো রূক্ষাদিভিঃ ক্রুদ্ধঃ শিরঃকম্পমুদীরযেত্||৮৬|| তত্রামৃতাবলারাস্নামহাশ্বেতাশ্বগন্ধকৈঃ| স্নেহস্বেদাদি বাতঘ্নং শস্তং নস্যং চ তর্পণম্||৮৭||
(उपवासातिशोकातिरूक्षशीताल्पभोजनैः )| दुष्टा दोषास्त्रयो मन्यापश्चाद्घाटासु वेदनाम्||८४|| तीव्रां कुर्वन्ति सा चाक्षिभ्रूशङ्खेष्ववतिष्ठते| स्पन्दनं गण्डपार्श्वस्य नेत्ररोगं हनुग्रहम्||८५|| सोऽनन्तवातस्तं हन्यात् सिरार्कावर्तनाशनैः| वातो रूक्षादिभिः क्रुद्धः शिरःकम्पमुदीरयेत्||८६|| तत्रामृताबलारास्नामहाश्वेताश्वगन्धकैः| स्नेहस्वेदादि वातघ्नं शस्तं नस्यं च तर्पणम्||८७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 25 (88) · Śloka 88
নস্তঃকর্ম চ কুর্বীত শিরোরোগেষু শাস্ত্রবিদ্| দ্বারং হি শিরসো নাসা তেন তদ্ ব্যাপ্য হন্তি তান্||৮৮||
नस्तःकर्म च कुर्वीत शिरोरोगेषु शास्त्रविद्| द्वारं हि शिरसो नासा तेन तद् व्याप्य हन्ति तान्||८८||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 26 (89-92) · Śloka 92
নাবনং চাবপীডশ্চ ধ্মাপনং ধূম এব চ| প্রতিমর্শশ্চ বিজ্ঞেযং নস্তঃকর্ম তু পঞ্চধা||৮৯|| স্নেহনং শোধনং চৈব দ্বিবিধং নাবনং স্মৃতম্| শোধনঃ স্তম্ভনশ্চ স্যাদবপীডো দ্বিধা মতঃ ||৯০|| চূর্ণস্যাধ্মাপনং তদ্ধি দেহস্রোতোবিশোধনম্ | বিজ্ঞেযস্ত্রিবিধো ধূমঃ প্রাগুক্তঃ শমনাদিকঃ||৯১|| প্রতিমর্শো ভবেত্ স্নেহো নির্দোষ উভযার্থকৃত্| এবং তদ্রেচনং কর্ম তর্পণং শমনং ত্রিধা||৯২||
नावनं चावपीडश्च ध्मापनं धूम एव च| प्रतिमर्शश्च विज्ञेयं नस्तःकर्म तु पञ्चधा||८९|| स्नेहनं शोधनं चैव द्विविधं नावनं स्मृतम्| शोधनः स्तम्भनश्च स्यादवपीडो द्विधा मतः ||९०|| चूर्णस्याध्मापनं तद्धि देहस्रोतोविशोधनम् | विज्ञेयस्त्रिविधो धूमः प्रागुक्तः शमनादिकः||९१|| प्रतिमर्शो भवेत् स्नेहो निर्दोष उभयार्थकृत्| एवं तद्रेचनं कर्म तर्पणं शमनं त्रिधा||९२||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 27 (93-95) · Śloka 96
স্তম্ভসুপ্তিগুরুত্বাদ্যাঃ শ্লৈষ্মিকা যে শিরোগদাঃ| শিরোবিরেচনং তেষু নস্তঃকর্ম প্রশস্যতে||৯৩|| যে চ বাতাত্মকা রোগাঃ শিরঃকম্পার্দিতাদযঃ| শিরসস্তর্পণং তেষু নস্তঃকর্ম প্রশস্যতে ||৯৪|| রক্তপিত্তাদিরোগেষু শমনং নস্যমিষ্যতে| ধ্মাপনং ধূমপানং চ তথা যোগ্যেষু শস্যতে ||৯৫|| (দোষাদিকং সমীক্ষ্যৈব ভিষক্ সম্যক্ চ কারযেত্)|৯৬|
स्तम्भसुप्तिगुरुत्वाद्याः श्लैष्मिका ये शिरोगदाः| शिरोविरेचनं तेषु नस्तःकर्म प्रशस्यते||९३|| ये च वातात्मका रोगाः शिरःकम्पार्दितादयः| शिरसस्तर्पणं तेषु नस्तःकर्म प्रशस्यते ||९४|| रक्तपित्तादिरोगेषु शमनं नस्यमिष्यते| ध्मापनं धूमपानं च तथा योग्येषु शस्यते ||९५|| (दोषादिकं समीक्ष्यैव भिषक् सम्यक् च कारयेत्)|९६|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 28 (96-97) · Śloka 98
ফলাদিভেষজং প্রোক্তং শিরসো যদ্বিরেচনম্||৯৬|| তচ্চূর্ণং কল্পযেত্তেন পচেত্ স্নেহং বিরেচনম্| যদুক্তং মধুরস্কন্ধে ভেষজং তেন তর্পণম্||৯৭|| সাধযিত্বা ভিষক্ স্নেহং নস্তঃ কুর্যাদ্বিধানবিত্|৯৮|
फलादिभेषजं प्रोक्तं शिरसो यद्विरेचनम्||९६|| तच्चूर्णं कल्पयेत्तेन पचेत् स्नेहं विरेचनम्| यदुक्तं मधुरस्कन्धे भेषजं तेन तर्पणम्||९७|| साधयित्वा भिषक् स्नेहं नस्तः कुर्याद्विधानवित्|९८|
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 29 (98-110) · Śloka 110
প্রাক্সূর্যে মধ্যসূর্যে বা প্রাক্কৃতাবশ্যকস্য চ||৯৮|| উত্তানস্য শযানস্য শযনে স্বাস্তৃতে সুখম্| প্রলম্বশিরসঃ কিঞ্চিত্ কিঞ্চিত্ পাদোন্নতস্য চ||৯৯|| দদ্যান্নাসাপুটে স্নেহং তর্পণং বুদ্ধিমান্ ভিষক্| অনবাক্শিরসো নস্যং ন শিরঃ প্রতিপদ্যতে||১০০|| অত্যবাক্শিরসো নস্যং মস্তুলুঙ্গেঽবতিষ্ঠতি| অত এবংশযানস্য শুদ্ধ্যর্থং স্বেদযেচ্ছিরঃ||১০১|| সংস্বেদ্য নাসামুন্নম্য বামেনাঙ্গুষ্ঠপর্বণা| হস্তেন দক্ষিণেনাথ কুর্যাদুভযতঃ সমম্||১০২|| প্রণাড্যা পিচুনা বাঽপি নস্তঃস্নেহং যথাবিধি| কৃতে চ স্বেদযেদ্ভূয আকর্ষেচ্চ পুনঃ পুনঃ||১০৩|| তং স্নেহং শ্লেষ্মণা সাকং তথা স্নেহো ন তিষ্ঠতি| স্বেদেনোত্ক্লেশিতঃ শ্লেষ্মা নস্তঃকর্মণ্যুপস্থিতঃ ||১০৪|| ভূযঃ স্নেহস্য শৈত্যেন শিরসি স্ত্যাযতে ততঃ| শ্রোত্রমন্যাগলাদ্যেষু বিকারায স কল্পতে||১০৫|| ততো নস্তঃকৃতে ধূমং পিবেত্ কফবিনাশনম্ | হিতান্নভুঙ্নিবাতোষ্ণসেবী স্যান্নিযতেন্দ্রিযঃ||১০৬|| বিধিরেষোঽবপীডস্য কার্যঃ প্রধ্মাপনস্য তু| তত্ ষডঙ্গুলযা নাড্যা ধমেচ্চূর্ণং মুখেন তু||১০৭|| বিরিক্তশিরসং তূষ্ণং পাযযিত্বাঽম্বু ভোজযেত্| লঘু ত্রিষ্ববিরুদ্ধং চ নিবাতস্থমতন্দ্রিতঃ||১০৮|| বিরেকশুদ্ধো দোষস্য কোপনং যস্য সেবতে| স দোষো বিচরংস্তত্র করোতি স্বান্ গদান্ বহূন্||১০৯|| যথাস্বং বিহিতাং তেষু ক্রিযাং কুর্যাদ্বিচক্ষণঃ| অকালকৃতজাতানাং রোগাণামনুরূপতঃ||১১০||
प्राक्सूर्ये मध्यसूर्ये वा प्राक्कृतावश्यकस्य च||९८|| उत्तानस्य शयानस्य शयने स्वास्तृते सुखम्| प्रलम्बशिरसः किञ्चित् किञ्चित् पादोन्नतस्य च||९९|| दद्यान्नासापुटे स्नेहं तर्पणं बुद्धिमान् भिषक्| अनवाक्शिरसो नस्यं न शिरः प्रतिपद्यते||१००|| अत्यवाक्शिरसो नस्यं मस्तुलुङ्गेऽवतिष्ठति| अत एवंशयानस्य शुद्ध्यर्थं स्वेदयेच्छिरः||१०१|| संस्वेद्य नासामुन्नम्य वामेनाङ्गुष्ठपर्वणा| हस्तेन दक्षिणेनाथ कुर्यादुभयतः समम्||१०२|| प्रणाड्या पिचुना वाऽपि नस्तःस्नेहं यथाविधि| कृते च स्वेदयेद्भूय आकर्षेच्च पुनः पुनः||१०३|| तं स्नेहं श्लेष्मणा साकं तथा स्नेहो न तिष्ठति| स्वेदेनोत्क्लेशितः श्लेष्मा नस्तःकर्मण्युपस्थितः ||१०४|| भूयः स्नेहस्य शैत्येन शिरसि स्त्यायते ततः| श्रोत्रमन्यागलाद्येषु विकाराय स कल्पते||१०५|| ततो नस्तःकृते धूमं पिबेत् कफविनाशनम् | हितान्नभुङ्निवातोष्णसेवी स्यान्नियतेन्द्रियः||१०६|| विधिरेषोऽवपीडस्य कार्यः प्रध्मापनस्य तु| तत् षडङ्गुलया नाड्या धमेच्चूर्णं मुखेन तु||१०७|| विरिक्तशिरसं तूष्णं पाययित्वाऽम्बु भोजयेत्| लघु त्रिष्वविरुद्धं च निवातस्थमतन्द्रितः||१०८|| विरेकशुद्धो दोषस्य कोपनं यस्य सेवते| स दोषो विचरंस्तत्र करोति स्वान् गदान् बहून्||१०९|| यथास्वं विहितां तेषु क्रियां कुर्याद्विचक्षणः| अकालकृतजातानां रोगाणामनुरूपतः||११०||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 30 (111-115) · Śloka 115
অজীর্ণে ভোজনে ভুক্তে তোযে পীতেঽথ দুর্দিনে| প্রতিশ্যাযে নবে স্নাতে স্নেহপানেঽনুবাসনে||১১১|| নাবনং স্নেহনং রোগান্ করোতি শ্লৈষ্মিকান্ বহূন্| তত্র শ্লেষ্মহরঃ সর্বস্তীক্ষ্ণোষ্ণাদির্বিধির্হিতঃ||১১২|| ক্ষামে বিরেচিতে গর্ভে ব্যাযামাভিহতে তৃষি| বাতো রূক্ষেণ নস্যেন ক্রুদ্ধঃ স্বাঞ্জনযেদ্গদান্||১১৩|| তত্র বাতহরঃ সর্বো বিধিঃ স্নেহনবৃংহণঃ| স্বেদাদিঃ, স্যাদ্ঘৃতং ক্ষীরং গর্ভিণ্যাস্তু বিশেষতঃ||১১৪|| জ্বরশোকাতিতপ্তানাং তিমিরং মদ্যপস্য তু| রূক্ষৈঃ শীতাঞ্জনৈর্লেপৈঃ পুটপাকৈশ্চ সাধযেত্ ||১১৫||
अजीर्णे भोजने भुक्ते तोये पीतेऽथ दुर्दिने| प्रतिश्याये नवे स्नाते स्नेहपानेऽनुवासने||१११|| नावनं स्नेहनं रोगान् करोति श्लैष्मिकान् बहून्| तत्र श्लेष्महरः सर्वस्तीक्ष्णोष्णादिर्विधिर्हितः||११२|| क्षामे विरेचिते गर्भे व्यायामाभिहते तृषि| वातो रूक्षेण नस्येन क्रुद्धः स्वाञ्जनयेद्गदान्||११३|| तत्र वातहरः सर्वो विधिः स्नेहनबृंहणः| स्वेदादिः, स्याद्घृतं क्षीरं गर्भिण्यास्तु विशेषतः||११४|| ज्वरशोकातितप्तानां तिमिरं मद्यपस्य तु| रूक्षैः शीताञ्जनैर्लेपैः पुटपाकैश्च साधयेत् ||११५||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 31 (116-117) · Śloka 117
স্নেহনং শোধনং চৈব দ্বিবিধং নাবনং মতম্| প্রতিমর্শস্তু নস্যার্থং করোতি ন চ দোষাবান্||১১৬|| নস্তঃ স্নেহাঙ্গুলিং দদ্যাত্ প্রাতর্নিশি চ সর্বদা| ন চোচ্ছিঙ্ঘেদরোগাণাং প্রতিমর্শঃ স দার্ঢ্যকৃত্||১১৭||
स्नेहनं शोधनं चैव द्विविधं नावनं मतम्| प्रतिमर्शस्तु नस्यार्थं करोति न च दोषावान्||११६|| नस्तः स्नेहाङ्गुलिं दद्यात् प्रातर्निशि च सर्वदा| न चोच्छिङ्घेदरोगाणां प्रतिमर्शः स दार्ढ्यकृत्||११७||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana 32 (118-119) · Śloka 119
তত্র শ্লোকৌ- ত্রীণি যস্মাত্ প্রধানানি মর্মাণ্যভিহতেষু চ| তেষু লিঙ্গং চিকিত্সাং চ রোগভেদাশ্চ সৌষধাঃ||১১৮|| বিধিরুত্তরবস্তেশ্চ নস্তঃকর্মবিধিস্তথা| সব্যাপদ্ভেষজং সিদ্ধৌ মর্মাখ্যাযাং প্রকীর্তিতম্||১১৯||
तत्र श्लोकौ- त्रीणि यस्मात् प्रधानानि मर्माण्यभिहतेषु च| तेषु लिङ्गं चिकित्सां च रोगभेदाश्च सौषधाः||११८|| विधिरुत्तरबस्तेश्च नस्तःकर्मविधिस्तथा| सव्यापद्भेषजं सिद्धौ मर्माख्यायां प्रकीर्तितम्||११९||
🔊 Audio coming soon
Adhikarana puShpikA · Śloka 9
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে সিদ্ধিস্থানে ত্রিমর্মীযসিদ্ধির্নাম নবমোঽধ্যাযঃ||৯||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते सिद्धिस्थाने त्रिमर्मीयसिद्धिर्नाम नवमोऽध्यायः||९||
🔊 Audio coming soon