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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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25. yajjaḥpuruṣīyō'dhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো যজ্জঃপুরুষীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||

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अथातो यज्जःपुरुषीयमध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

পুরা প্রত্যক্ষধর্মাণং ভগবন্তং পুনর্বসুম্| সমেতানাং মহর্ষীণাং প্রাদুরাসীদিযং কথা ||৩|| আত্মেন্দ্রিযমনোর্থানাং যোঽযং পুরুষসঞ্জ্ঞকঃ| রাশিরস্যামযানাং চ প্রাগুত্পত্তিবিনিশ্চযে||৪||

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पुरा प्रत्यक्षधर्माणं भगवन्तं पुनर्वसुम्| समेतानां महर्षीणां प्रादुरासीदियं कथा ||३|| आत्मेन्द्रियमनोर्थानां योऽयं पुरुषसञ्ज्ञकः| राशिरस्यामयानां च प्रागुत्पत्तिविनिश्चये||४||

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Adhikarana 3 (5-6) · Śloka 6

তদন্তরং কাশিপতির্বামকো বাক্যমর্থবিত্ | ব্যাজহারর্ষিসমিতিমুপসৃত্যাভিবাদ্য চ||৫|| কিন্নু ভোঃ পুরুষো যজ্জস্তজ্জাস্তস্যামযাঃ স্মৃতাঃ| ন বেত্যুক্তে নরেন্দ্রেণ প্রোবাচর্ষীন্ পুনর্বসুঃ||৬||

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तदन्तरं काशिपतिर्वामको वाक्यमर्थवित् | व्याजहारर्षिसमितिमुपसृत्याभिवाद्य च||५|| किन्नु भोः पुरुषो यज्जस्तज्जास्तस्यामयाः स्मृताः| न वेत्युक्ते नरेन्द्रेण प्रोवाचर्षीन् पुनर्वसुः||६||

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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7

সর্ব এবামিতজ্ঞানবিজ্ঞানচ্ছিন্নসংশযাঃ| ভবন্তশ্ছেত্তুমর্হন্তি কাশিরাজস্য সংশযম্||৭||

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सर्व एवामितज्ञानविज्ञानच्छिन्नसंशयाः| भवन्तश्छेत्तुमर्हन्ति काशिराजस्य संशयम्||७||

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Adhikarana 5 (8-9) · Śloka 9

পারীক্ষিস্তত্পরীক্ষ্যাগ্রে মৌদ্গল্যো বাক্যমব্রবীত্| আত্মজঃ পুরুষো রোগাশ্চাত্মজাঃ কারণং হি সঃ||৮|| স চিনোত্যুপভুঙ্ক্তে চ কর্ম কর্মফলানি চ| নহ্যৃতে চেতনাধাতোঃ প্রবৃত্তিঃ সুখদুঃখযোঃ||৯||

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पारीक्षिस्तत्परीक्ष्याग्रे मौद्गल्यो वाक्यमब्रवीत्| आत्मजः पुरुषो रोगाश्चात्मजाः कारणं हि सः||८|| स चिनोत्युपभुङ्क्ते च कर्म कर्मफलानि च| नह्यृते चेतनाधातोः प्रवृत्तिः सुखदुःखयोः||९||

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Adhikarana 6 (10-13) · Śloka 13

শরলোমা তু নেত্যাহ ন হ্যাত্মাঽঽত্মানমাত্মনা| যোজযেদ্ব্যাধিভির্দুঃখৈর্দুঃখদ্বেষী কদাচন||১০|| রজস্তমোভ্যাং তু মনঃ পরীতং সত্ত্বসঞ্জ্ঞকম্| শরীরস্য সমুত্পত্তৌ বিকারাণাং চ কারণম্||১১|| বার্যোবিদস্তু নেত্যাহ ন হ্যেকং কারণং মনঃ | নর্তে শরীরাচ্ছারীররোগা ন মনসঃ স্থিতিঃ||১২|| রসজানি তু ভূতানি ব্যাধযশ্চ পৃথগ্বিধাঃ| আপো হি রসবত্যস্তাঃ স্মৃতা নির্বৃত্তিহেতবঃ||১৩||

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शरलोमा तु नेत्याह न ह्यात्माऽऽत्मानमात्मना| योजयेद्व्याधिभिर्दुःखैर्दुःखद्वेषी कदाचन||१०|| रजस्तमोभ्यां तु मनः परीतं सत्त्वसञ्ज्ञकम्| शरीरस्य समुत्पत्तौ विकाराणां च कारणम्||११|| वार्योविदस्तु नेत्याह न ह्येकं कारणं मनः | नर्ते शरीराच्छारीररोगा न मनसः स्थितिः||१२|| रसजानि तु भूतानि व्याधयश्च पृथग्विधाः| आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्तिहेतवः||१३||

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Adhikarana 7 (14-15) · Śloka 15

হিরণ্যাক্ষস্তু নেত্যাহ ন হ্যাত্মা রসজঃ স্মৃতঃ| নাতীন্দ্রিযং মনঃ সন্তি রোগাঃ শব্দাদিজাস্তথা||১৪|| ষড্ধাতুজস্তু পুরুষো রোগাঃ ষড্ধাতুজাস্তথা| রাশিঃ ষড্ধাতুজো হ্যেষ সাঙ্খ্যৈরাদ্যৈঃ প্রকীর্তিতঃ ||১৫||

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हिरण्याक्षस्तु नेत्याह न ह्यात्मा रसजः स्मृतः| नातीन्द्रियं मनः सन्ति रोगाः शब्दादिजास्तथा||१४|| षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा| राशिः षड्धातुजो ह्येष साङ्ख्यैराद्यैः प्रकीर्तितः ||१५||

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Adhikarana 8 (16-17) · Śloka 17

তথা ব্রুবাণং কুশিকমাহ তন্নেতি কৌশিকঃ| কস্মান্মাতাপিতৃভ্যাং হি বিনা ষড্ধাতুজো ভবেত্||১৬|| পুরুষঃ পুরুষাদ্গৌর্গোরশ্বাদশ্বঃ প্রজাযতে| পিত্র্যা মেহাদযশ্চোক্তা রোগাস্তাবত্র কারণম্||১৭||

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तथा ब्रुवाणं कुशिकमाह तन्नेति कौशिकः| कस्मान्मातापितृभ्यां हि विना षड्धातुजो भवेत्||१६|| पुरुषः पुरुषाद्गौर्गोरश्वादश्वः प्रजायते| पित्र्या मेहादयश्चोक्ता रोगास्तावत्र कारणम्||१७||

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Adhikarana 9 (18-19) · Śloka 19

ভদ্রকাপ্যস্তু নেত্যাহ নহ্যন্ধোঽন্ধাত্ প্রজাযতে| মাতাপিত্রোরপি চ তে প্রাগুত্পত্তির্ন যুজ্যতে||১৮|| কর্মজস্তু মতো জন্তুঃ কর্মজাস্তস্য চামযাঃ| নহ্যৃতে কর্মণো জন্ম রোগাণাং পুরুষস্য বা||১৯||

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भद्रकाप्यस्तु नेत्याह नह्यन्धोऽन्धात् प्रजायते| मातापित्रोरपि च ते प्रागुत्पत्तिर्न युज्यते||१८|| कर्मजस्तु मतो जन्तुः कर्मजास्तस्य चामयाः| नह्यृते कर्मणो जन्म रोगाणां पुरुषस्य वा||१९||

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Adhikarana 10 (20-21) · Śloka 21

ভরদ্বাজস্তু নেত্যাহ কর্তা পূর্বং হি কর্মণঃ| দৃষ্টং ন চাকৃতং কর্ম যস্য স্যাত্ পুরুষঃ ফলম্||২০|| ভাবহেতুঃ স্বভাবস্তু ব্যাধীনাং পুরুষস্য চ| খরদ্রবচলোষ্ণত্বং তেজোন্তানাং যথৈব হি||২১||

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भरद्वाजस्तु नेत्याह कर्ता पूर्वं हि कर्मणः| दृष्टं न चाकृतं कर्म यस्य स्यात् पुरुषः फलम्||२०|| भावहेतुः स्वभावस्तु व्याधीनां पुरुषस्य च| खरद्रवचलोष्णत्वं तेजोन्तानां यथैव हि||२१||

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Adhikarana 11 (22-25) · Śloka 25

কাঙ্কাযনস্তু নেত্যাহ ন হ্যারম্ভফলং ভবেত্| ভবেত্ স্বভাবাদ্ভাবানামসিদ্ধিঃ সিদ্ধিরেব বা||২২|| স্রষ্টা ত্বমিতসঙ্কল্পো ব্রহ্মাপত্যং প্রজাপতিঃ| চেতনাচেতনস্যাস্য জগতঃ সুখদুঃখযোঃ||২৩|| তন্নেতি ভিক্ষুরাত্রেযো ন হ্যপত্যং প্রজাপতিঃ| প্রজাহিতৈষী সততং দুঃখৈর্যুঞ্জ্যাদসাধুবত্||২৪|| কালজস্ত্বেব পুরুষঃ কালজাস্তস্য চামযাঃ| জগত্ কালবশং সর্বং কালঃ সর্বত্র কারণম্||২৫||

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काङ्कायनस्तु नेत्याह न ह्यारम्भफलं भवेत्| भवेत् स्वभावाद्भावानामसिद्धिः सिद्धिरेव वा||२२|| स्रष्टा त्वमितसङ्कल्पो ब्रह्मापत्यं प्रजापतिः| चेतनाचेतनस्यास्य जगतः सुखदुःखयोः||२३|| तन्नेति भिक्षुरात्रेयो न ह्यपत्यं प्रजापतिः| प्रजाहितैषी सततं दुःखैर्युञ्ज्यादसाधुवत्||२४|| कालजस्त्वेव पुरुषः कालजास्तस्य चामयाः| जगत् कालवशं सर्वं कालः सर्वत्र कारणम्||२५||

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Adhikarana 12 (26-29) · Śloka 29

তথর্ষীণাং বিবদতামুবাচেদং পুনর্বসুঃ| মৈবং বোচত তত্ত্বং হি দুষ্প্রাপং পক্ষসংশ্রযাত্||২৬|| বাদান্ সপ্রতিবাদান্ হি বদন্তো নিশ্চিতানিব| পক্ষান্তং নৈব গচ্ছন্তি তিলপীডকবদ্গতৌ||২৭|| মুক্ত্বৈবং বাদসঙ্ঘট্টমধ্যাত্মমনুচিন্ত্যতাম্| নাবিধূতে তমঃস্কন্ধে জ্ঞেযে জ্ঞানং প্রবর্ততে||২৮|| যেষামেব হি ভাবানাং সম্পত্ সঞ্জনযেন্নরম্| তেষামেব বিপদ্ব্যাধীন্বিবিধান্সমুদীরযেত্||২৯||

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तथर्षीणां विवदतामुवाचेदं पुनर्वसुः| मैवं वोचत तत्त्वं हि दुष्प्रापं पक्षसंश्रयात्||२६|| वादान् सप्रतिवादान् हि वदन्तो निश्चितानिव| पक्षान्तं नैव गच्छन्ति तिलपीडकवद्गतौ||२७|| मुक्त्वैवं वादसङ्घट्टमध्यात्ममनुचिन्त्यताम्| नाविधूते तमःस्कन्धे ज्ञेये ज्ञानं प्रवर्तते||२८|| येषामेव हि भावानां सम्पत् सञ्जनयेन्नरम्| तेषामेव विपद्व्याधीन्विविधान्समुदीरयेत्||२९||

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Adhikarana 13 (30-32) · Śloka 32

অথাত্রেযস্য ভগবতো বচনমনুনিশম্য পুনরেব বামকঃ কাশিপতিরুবাচ ভগবন্তমাত্রেযং- ভগবন্! সম্পন্নিমিত্তজস্য পুরুষস্য বিপন্নিমিত্তজানাং চ রোগাণাং কিমভিবৃদ্ধিকারণমিতি||৩০|| তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- হিতাহারোপযোগ এক এব পুরুষবৃদ্ধিকরো ভবতি, অহিতাহারোপযোগঃ পুনর্ব্যাধিনিমিত্তমিতি ||৩১|| এবংবাদিনং ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- কথমিহ ভগবন্! হিতাহিতানামাহারজাতানাং লক্ষণমনপবাদমভিজানীমহে; হিতসমাখ্যাতানামাহারজাতানামহিতসমাখ্যাতানাং চ মাত্রাকালক্রিযাভূমিদেহদোষপুরুষাবস্থান্তরেষু বিপরীতকারিত্বমুপলভামহ ইতি||৩২||

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अथात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरेव वामकः काशिपतिरुवाच भगवन्तमात्रेयं- भगवन्! सम्पन्निमित्तजस्य पुरुषस्य विपन्निमित्तजानां च रोगाणां किमभिवृद्धिकारणमिति||३०|| तमुवाच भगवानात्रेयः- हिताहारोपयोग एक एव पुरुषवृद्धिकरो भवति, अहिताहारोपयोगः पुनर्व्याधिनिमित्तमिति ||३१|| एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- कथमिह भगवन्! हिताहितानामाहारजातानां लक्षणमनपवादमभिजानीमहे; हितसमाख्यातानामाहारजातानामहितसमाख्यातानां च मात्राकालक्रियाभूमिदेहदोषपुरुषावस्थान्तरेषु विपरीतकारित्वमुपलभामह इति||३२||

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Adhikarana 14 (33-34) · Śloka 34

তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- যদাহারজাতমগ্নিবেশ! সমাংশ্চৈব শরীরধাতূন্ প্রকৃতৌ স্থাপযতি বিষমাংশ্চ সমীকরোতীত্যেতদ্ধিতং বিদ্ধি, বিপরীতং ত্বহিতমিতি; ইত্যেতদ্ধিতাহিতলক্ষণমনপবাদং ভবতি||৩৩|| এবংবাদিনং চ ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- ভগবন্! ন ত্বেতদেবমুপদিষ্টং ভূযিষ্ঠকল্পাঃ সর্বভিষজো বিজ্ঞাস্যন্তি||৩৪||

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तमुवाच भगवानात्रेयः- यदाहारजातमग्निवेश! समांश्चैव शरीरधातून् प्रकृतौ स्थापयति विषमांश्च समीकरोतीत्येतद्धितं विद्धि, विपरीतं त्वहितमिति; इत्येतद्धिताहितलक्षणमनपवादं भवति||३३|| एवंवादिनं च भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- भगवन्! न त्वेतदेवमुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति||३४||

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Adhikarana 15 (35) · Śloka 35

তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- যেষাং হি বিদিতমাহারতত্ত্বমগ্নিবেশ! গুণতো দ্রব্যতঃ কর্মতঃ সর্বাবযবশশ্চ মাত্রাদযো ভাবাঃ, ত এতদেবমুপদিষ্টং বিজ্ঞাতুমুত্সহন্তে| যথা তু খল্বেতদুপদিষ্টং ভূযিষ্ঠকল্পাঃ সর্বভিষজো বিজ্ঞাস্যন্তি, তথৈতদুপদেক্ষ্যামো মাত্রাদীন্ ভাবাননুদাহরন্তঃ; তেষাং হি বহুবিধবিকল্পা ভবন্তি| আহারবিধিবিশেষাংস্তু খলু লক্ষণতশ্চাবযবতশ্চানুব্যাখ্যাস্যামঃ||৩৫||

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तमुवाच भगवानात्रेयः- येषां हि विदितमाहारतत्त्वमग्निवेश! गुणतो द्रव्यतः कर्मतः सर्वावयवशश्च मात्रादयो भावाः, त एतदेवमुपदिष्टं विज्ञातुमुत्सहन्ते| यथा तु खल्वेतदुपदिष्टं भूयिष्ठकल्पाः सर्वभिषजो विज्ञास्यन्ति, तथैतदुपदेक्ष्यामो मात्रादीन् भावाननुदाहरन्तः; तेषां हि बहुविधविकल्पा भवन्ति| आहारविधिविशेषांस्तु खलु लक्षणतश्चावयवतश्चानुव्याख्यास्यामः||३५||

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Adhikarana 16 (36) · Śloka 36

তদ্যথা- আহারত্বমাহারস্যৈকবিধমর্থাভেদাত্; স পুনর্দ্বিযোনিঃ, স্থাবরজঙ্গমাত্মকত্বাত্; দ্বিবিধপ্রভাবঃ, হিতাহিতোদর্কবিশেষাত্; চতুর্বিধোপযোগঃ, পানাশনভক্ষ্যলেহ্যোপযোগাত্; ষডাস্বাদঃ, রসভেদতঃ ষড্বিধত্বাত্; বিংশতিগুণঃ, গুরুলঘুশীতোষ্ণস্নিগ্ধরূক্ষমন্দতীক্ষ্ণস্থিরসরমৃদুকঠিন- বিশদপিচ্ছিলশ্লক্ষ্ণখরসূক্ষ্মস্থূলসান্দ্রদ্রবানুগমাত্; অপরিসঙ্খ্যেযবিকল্পঃ, দ্রব্যসংযোগকরণবাহুল্যাত্||৩৬||

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तद्यथा- आहारत्वमाहारस्यैकविधमर्थाभेदात्; स पुनर्द्वियोनिः, स्थावरजङ्गमात्मकत्वात्; द्विविधप्रभावः, हिताहितोदर्कविशेषात्; चतुर्विधोपयोगः, पानाशनभक्ष्यलेह्योपयोगात्; षडास्वादः, रसभेदतः षड्विधत्वात्; विंशतिगुणः, गुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्षमन्दतीक्ष्णस्थिरसरमृदुकठिन- विशदपिच्छिलश्लक्ष्णखरसूक्ष्मस्थूलसान्द्रद्रवानुगमात्; अपरिसङ्ख्येयविकल्पः, द्रव्यसंयोगकरणबाहुल्यात्||३६||

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Adhikarana 17 (37) · Śloka 37

তস্য খলু যে যে বিকারাবযবা ভূযিষ্ঠমুপযুজ্যন্তে, ভূযিষ্ঠকল্পানাং চ মনুষ্যাণাং প্রকৃত্যৈব হিততমাশ্চাহিততমাশ্চ, তাংস্তান্ যথাবদুপদেক্ষ্যামঃ||৩৭||

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तस्य खलु ये ये विकारावयवा भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते, भूयिष्ठकल्पानां च मनुष्याणां प्रकृत्यैव हिततमाश्चाहिततमाश्च, तांस्तान् यथावदुपदेक्ष्यामः||३७||

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Adhikarana 18 (38) · Śloka 38

তদ্যথা- লোহিতশালযঃ শূকধান্যানাং পথ্যতমত্বে শ্রেষ্ঠতমা ভবন্তি, মুদ্গাঃ শমীধান্যানাম্, আন্তরিক্ষমুদকানাং, সৈন্ধবং লবণানাং, জীবন্তীশাকং শাকানাম্, ঐণেযং মৃগমাংসানাং, লাবঃ পক্ষিণাং, গোধা বিলেশযানাং, রোহিতো মত্স্যানাং, গব্যং সর্পিঃ সর্পিষাং, গোক্ষীরং ক্ষীরাণাং, তিলতৈলং স্থাবরজাতানাং স্নেহানাং, বরাহবসা আনূপমৃগবসানাং, চুলুকীবসা মত্স্যবসানাং, পাকহংসবসা জলচরবিহঙ্গবসানাং, কুক্কুটবসা বিষ্কিরশকুনিবসানাং, অজমেদঃ শাখাদমেদসাং, শৃঙ্গবেরং কন্দানাং, মৃদ্বীকা ফলানাং, শর্করেক্ষুবিকারাণাম্, ইতি প্রকৃত্যৈব হিততমানামাহারবিকারাণাং প্রাধান্যতো দ্রব্যাণি ব্যাখ্যাতানি ভবন্তি||৩৮||

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तद्यथा- लोहितशालयः शूकधान्यानां पथ्यतमत्वे श्रेष्ठतमा भवन्ति, मुद्गाः शमीधान्यानाम्, आन्तरिक्षमुदकानां, सैन्धवं लवणानां, जीवन्तीशाकं शाकानाम्, ऐणेयं मृगमांसानां, लावः पक्षिणां, गोधा बिलेशयानां, रोहितो मत्स्यानां, गव्यं सर्पिः सर्पिषां, गोक्षीरं क्षीराणां, तिलतैलं स्थावरजातानां स्नेहानां, वराहवसा आनूपमृगवसानां, चुलुकीवसा मत्स्यवसानां, पाकहंसवसा जलचरविहङ्गवसानां, कुक्कुटवसा विष्किरशकुनिवसानां, अजमेदः शाखादमेदसां, शृङ्गवेरं कन्दानां, मृद्वीका फलानां, शर्करेक्षुविकाराणाम्, इति प्रकृत्यैव हिततमानामाहारविकाराणां प्राधान्यतो द्रव्याणि व्याख्यातानि भवन्ति||३८||

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Adhikarana 19 (39) · Śloka 39

অহিততমানপ্যুপদেক্ষ্যামঃ- যবকাঃ শূকধান্যানামপথ্যতমত্বেন প্রকৃষ্টতমা ভবন্তি, মাষাঃ শমীধান্যানাং, বর্ষানাদেযমুদকানাম্, ঊষরং লবণানাং, সর্ষপশাকং শাকানাং, গোমাংসং মৃগমাংসানাং, কাণকপোতঃ পক্ষিণাং, ভেকো বিলেশযানাং, চিলিচিমো মত্স্যানাম্, আবিকং সর্পিঃ সর্পিষাম্, অবিক্ষীরং ক্ষীরাণাং, কুসুম্ভস্নেহঃ স্থাবরস্নেহানাং, মহিষবসা আনূপমৃগবসানাং, কুম্ভীরবসা মত্স্যবসানাং, কাকমদ্গুবসা জলচরবিহঙ্গবসানাং, চটকবসা বিষ্কিরশুকনিবসানাং, হস্তিমেদঃ শাখাদমেদসাং, নিকুচং ফলানাম্, আলুকং কন্দানাং, ফাণিতমিক্ষুবিকারাণাম্, ইতি প্রকৃত্যৈবাহিততমানামাহারবিকারাণাং প্রকৃষ্টতমানি দ্রব্যাণি ব্যাখ্যাতানি ভবন্তি; (ইতি) হিতাহিতাবযবো ব্যাখ্যাত আহারবিকারাণাম্||৩৯||

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अहिततमानप्युपदेक्ष्यामः- यवकाः शूकधान्यानामपथ्यतमत्वेन प्रकृष्टतमा भवन्ति, माषाः शमीधान्यानां, वर्षानादेयमुदकानाम्, ऊषरं लवणानां, सर्षपशाकं शाकानां, गोमांसं मृगमांसानां, काणकपोतः पक्षिणां, भेको बिलेशयानां, चिलिचिमो मत्स्यानाम्, आविकं सर्पिः सर्पिषाम्, अविक्षीरं क्षीराणां, कुसुम्भस्नेहः स्थावरस्नेहानां, महिषवसा आनूपमृगवसानां, कुम्भीरवसा मत्स्यवसानां, काकमद्गुवसा जलचरविहङ्गवसानां, चटकवसा विष्किरशुकनिवसानां, हस्तिमेदः शाखादमेदसां, निकुचं फलानाम्, आलुकं कन्दानां, फाणितमिक्षुविकाराणाम्, इति प्रकृत्यैवाहिततमानामाहारविकाराणां प्रकृष्टतमानि द्रव्याणि व्याख्यातानि भवन्ति; (इति) हिताहितावयवो व्याख्यात आहारविकाराणाम्||३९||

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Adhikarana 20 (40) · Śloka 40

অতো ভূযঃ কর্মৌষধানাং চ প্রাধান্যতঃ সানুবন্ধানি দ্রব্যাণ্যনুব্যাখ্যাস্যামঃ| তদ্যথা- অন্নং বৃত্তিকরাণাং শ্রেষ্ঠম্, উদকমাশ্বাসকরাণাং (সুরা শ্রমহরাণাং ), ক্ষীরং জীবনীযানাং, মাংসং বৃংহণীযানাং, রসস্তর্পণীযানাং, লবণমন্নদ্রব্যরুচিকরাণাম্, অম্লং হৃদ্যানাং, কুক্কুটো বল্যানাং, নক্ররেতো বৃষ্যাণাং, মধু শ্লেষ্মপিত্তপ্রশমনানাং, সর্পির্বাতপিত্তপ্রশমনানাং, তৈলং বাতশ্লেষ্মপ্রশমনানাং, বমনং শ্লেষ্মহরাণাং, বিরেচনং পিত্তহরাণাং, বস্তির্বাতহরাণাং, স্বেদো মার্দবকরাণাং, ব্যাযামঃ স্থৈর্যকরাণাং, ক্ষারঃ পুংস্ত্বোপঘাতিনাং, (তিন্দুকমনন্নদ্রব্যরুচিকরাণাম্ ,) আমং কপিত্থমকণ্ঠ্যানাম্, আবিকং সর্পিরহৃদ্যানাম্, অজাক্ষীরং শোষঘ্নস্তন্যসাত্ম্যরক্তসাঙ্গ্রাহিকরক্তপিত্তপ্রশমনানাম্, অবিক্ষীরং শ্লেষ্মপিত্তজননানাং, মহিষীক্ষীরং স্বপ্নজননানাং, মন্দকং দধ্যভিষ্যন্দকরাণাং, গবেধুকান্নং কর্শনীযানাম্, উদ্দালকান্নং বিরূক্ষণীযানাম্, ইক্ষুর্মূত্রজননানাং, যবাঃ পুরীষজননানাং, জাম্ববং বাতজননানাং, শষ্কুল্যঃ শ্লেষ্মপিত্তজননানাং, কুলত্থা অম্লপিত্তজননানাং, মাষাঃ শ্লেষ্মপিত্তজননানাং, মদনফলং বমনাস্থাপনানুবাসনোপযোগিনাং, ত্রিবৃত্ সুখবিরেচনানাং, চতুরঙ্গুলো মৃদুবিরেচনানাং, স্নুক্পযস্তীক্ষ্ণবিরেচননাং, প্রত্যক্পুষ্পা শিরোবিরেচনানাং, বিডঙ্গং ক্রিমিঘ্নানাং, শিরীষো বিষঘ্নানাং, খদিরঃ কুষ্ঠঘ্নানাং, রাস্না বাতহরাণাম্, আমলকং বযঃস্থাপনানাং, হরীতকী পথ্যানাম্, এরণ্ডমূলং বৃষ্যবাতহরাণাং, পিপ্পলীমূলং দীপনীযপাচনীযানাহপ্রশমনানাং, চিত্রকমূলং দীপনীযপাচনীযগুদশোথার্শঃশূলহরাণাং, পুষ্করমূলং হিক্কাশ্বাসকাসপার্শ্বশূলহরাণাং, মুস্তং সাঙ্গ্রাহিকদীপনীযপাচনীযানাম্, উদীচ্যং নির্বাপণদীপনীযপাচনীযচ্ছর্দ্যতীসারহরাণাং, কট্বঙ্গং সাঙ্গ্রাহিকপাচনীযদীপনীযানাম্, অনন্তা সাঙ্গ্রাহিকরক্তপিত্তপ্রশমনানাম্, অমৃতা সাঙ্গ্রাহিকবাতহরদীপনীযশ্লেষ্মশোণিতবিবন্ধপ্রশমনানাং, বিল্বং সাঙ্গ্রাহিকদীপনীযবাতকফপ্রশমনানাম্, অতিবিষা দীপনীযপাচনীযসাঙ্গ্রাহিকসর্বদোষহরাণাম্, উত্পলকুমুদপদ্মকিঞ্জল্কঃ সাঙ্গ্রাহিকরক্তপিত্তপ্রশমনানাং, দুরালভা পিত্তশ্লেষ্মপ্রশমনানাং, গন্ধপ্রিযঙ্গুঃ শোণিতপিত্তাতিযোগপ্রশমনানাং, কুটজত্বক্ শ্লেষ্মপিত্তরক্তসাঙ্গ্রাহিকোপশোষণানাং, কাশ্মর্যফলং রক্তসাঙ্গ্রাহিকরক্তপিত্তপ্রশমনানাং, পৃশ্নিপর্ণী সাঙ্গ্রাহিকবাতহরদীপনীযবৃষ্যাণাং, বিদারিগন্ধা বৃষ্যসর্বদোষহরাণাং, বলা সাঙ্গ্রাহিকবল্যবাতহরাণাং, গোক্ষুরকো মূত্রকৃচ্ছ্রানিলহরাণাং, হিঙ্গুনির্যাসশ্ছেদনীযদীপনীযানুলোমিকবাতকফপ্রশমনানাম্, অম্লবেতসো ভেদনীযদীপনীযানুলোমিকবাতশ্লেষ্মহরাণাং, যাবশূকঃ স্রংসনীযপাচনীযার্শোঘ্নানাং, তক্রাভ্যাসো গ্রহণীদোষশোফার্শোঘৃতব্যাপত্প্রশমনানাং, ক্রব্যান্মাংসরসাভ্যাসো গ্রহণীদোষশোষার্শোঘ্নানাং, ক্ষীরঘৃতাভ্যাসো রসাযনানাং, সমঘৃতসক্তুপ্রাশাভ্যাসো বৃষ্যোদাবর্তহরাণাং, তৈলগণ্ডূষাভ্যাসো দন্তবলরুচিকরাণাং, চন্দনং দুর্গন্ধহরদাহনির্বাপণলেপনানাং, রাস্নাগুরুণী শীতাপনযনপ্রলেপনানাং, লামজ্জকোশীরং দাহত্বগ্দোষস্বেদাপনযনপ্রলেপনানাং, কুষ্ঠং বাতহরাভ্যঙ্গোপনাহোপযোগিনাং, মধুকং চক্ষুষ্যবৃষ্যকেশ্যকণ্ঠ্যবর্ণ্যবিরজনীযরোপণীযানাং, বাযুঃ প্রাণসঞ্জ্ঞাপ্রদানহেতূনাম্, অগ্নিরামস্তম্ভশীতশূলোদ্বেপনপ্রশমনানাং, জলং স্তম্ভনীযানাং, মৃদ্ভৃষ্টলোষ্ট্রনির্বাপিতমুদকং তৃষ্ণাচ্ছর্দ্যতিযোগপ্রশমনানাম্, অতিমাত্রাশনমামপ্রদোষহেতূনাং, যথাগ্ন্যভ্যবহারোঽগ্নিসন্ধুক্ষণানাং, যথাসাত্ম্যং চেষ্টাভ্যবহারৌ সেব্যানাং, কালভোজনমারোগ্যকরাণাং, তৃপ্তিরাহারগুণানাং, বেগসন্ধারণমনারোগ্যকরাণাং, মদ্যং সৌমনস্যজননানাং, মদ্যাক্ষেপো ধীধৃতিস্মৃতিহরাণাং, গুরুভোজনং দুর্বিপাককরাণাম্, একাশনভোজনং সুখপরিণামকরাণাং, স্ত্রীষ্বতিপ্রসঙ্গঃ শোষকরাণাং, শুক্রবেগনিগ্রহঃ ষাণ্ড্যকরাণাং, পরাঘাতনমন্নাশ্রদ্ধাজননানাম্, অনশনমাযুষো হ্রাসকরাণাং, প্রমিতাশনং কর্শনীযানাম্, অজীর্ণাধ্যশনং গ্রহণীদূষণানাং, বিষমাশনমগ্নিবৈষম্যকরাণাং, বিরুদ্ধবীর্যাশনং নিন্দিতব্যাধিকরাণাং, প্রশমঃ পথ্যানাং, আযাসঃ সর্বাপথ্যানাং, মিথ্যাযোগো ব্যাধিকরাণাং, রজস্বলাভিগমনমলক্ষ্মীমুখানাং, ব্রহ্মচর্যমাযুষ্যাণাং, পরদারাভিগমনমনাযুষ্যাণাং, সঙ্কল্পো বৃষ্যাণাং, দৌর্মনস্যমবৃষ্যাণাম্, অযথাবলমারম্ভঃ প্রাণোপরোধিনাং, বিষাদো রোগবর্ধনানাং, স্নানং শ্রমহরাণাং, হর্ষঃ প্রীণনানাং, শোকঃ শোষণানাং, নিবৃত্তিঃ পুষ্টিকরাণাং, পুষ্টিঃস্বপ্নকরাণাম্, অতিস্বপ্নস্তন্দ্রাকরাণাং, সর্বরসাভ্যাসো বলকরাণাম্, একরসাভ্যাসো দৌর্বল্যকরাণাং, গর্ভশল্যমাহার্যাণাম্, অজীর্ণমুদ্ধার্যাণাং, বালো মৃদুভেষজীযানাং, বৃদ্ধো যাপ্যানাং, গর্ভিণী তীক্ষ্ণৌষধব্যবাযব্যাযামবর্জনীযানাং, সৌমনস্যং গর্ভধারণানাং, সন্নিপাতো দুশ্চিকিত্স্যানাম্, আমো বিষমচিকিত্স্যানাং , জ্বরো রোগাণাং, কুষ্ঠং দীর্ঘরোগাণাং, রাজযক্ষ্মা রোগসমূহানাং, প্রমেহোঽনুষঙ্গিণাং, জলৌকসোঽনুশস্ত্রাণাং, বস্তিস্তন্ত্রাণাং, হিমবানৌষধিভূমীনাং, সোম ওষধীনাং, মরুভূমিরারোগ্যদেশানাম্, অনূপোঽহিতদেশানাম্, নির্দেশকারিত্বমাতুরগুণানাং, ভিষক্ চিকিত্সাঙ্গানাং, নাস্তিকোবর্জ্যানাং, লৌল্যং ক্লেশকরাণাম্, অনির্দেশকারিত্বমরিষ্টানাং, অনির্বেদো বার্তলক্ষণানাং, বৈদ্যসমূহো নিঃসংশযকরাণং, যোগো বৈদ্যগুণানাং, বিজ্ঞানমৌষধীনাং, শাস্ত্রসহিতস্তর্কঃ সাধনানাং, সম্প্রতিপত্তিঃ কালজ্ঞানপ্রযোজনানাম্, অব্যবসাযঃ কালাতিপত্তিহেতূনাং, দৃষ্টকর্মতা নিঃসংশযকরাণাম্, অসমর্থতা ভযকরাণাং, তদ্বিদ্যসম্ভাষা বুদ্ধিবর্ধনানাম্, আচার্যঃ শাস্ত্রাধিগমহেতূনাম্, আযুর্বেদোঽমৃতানাং, সদ্বচনমনুষ্ঠেযানাম্, অসদ্গ্রহণং সর্বাহিতানাং, সর্বসন্ন্যাসঃ সুখানামিতি||৪০||

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अतो भूयः कर्मौषधानां च प्राधान्यतः सानुबन्धानि द्रव्याण्यनुव्याख्यास्यामः| तद्यथा- अन्नं वृत्तिकराणां श्रेष्ठम्, उदकमाश्वासकराणां (सुरा श्रमहराणां ), क्षीरं जीवनीयानां, मांसं बृंहणीयानां, रसस्तर्पणीयानां, लवणमन्नद्रव्यरुचिकराणाम्, अम्लं हृद्यानां, कुक्कुटो बल्यानां, नक्ररेतो वृष्याणां, मधु श्लेष्मपित्तप्रशमनानां, सर्पिर्वातपित्तप्रशमनानां, तैलं वातश्लेष्मप्रशमनानां, वमनं श्लेष्महराणां, विरेचनं पित्तहराणां, बस्तिर्वातहराणां, स्वेदो मार्दवकराणां, व्यायामः स्थैर्यकराणां, क्षारः पुंस्त्वोपघातिनां, (तिन्दुकमनन्नद्रव्यरुचिकराणाम् ,) आमं कपित्थमकण्ठ्यानाम्, आविकं सर्पिरहृद्यानाम्, अजाक्षीरं शोषघ्नस्तन्यसात्म्यरक्तसाङ्ग्राहिकरक्तपित्तप्रशमनानाम्, अविक्षीरं श्लेष्मपित्तजननानां, महिषीक्षीरं स्वप्नजननानां, मन्दकं दध्यभिष्यन्दकराणां, गवेधुकान्नं कर्शनीयानाम्, उद्दालकान्नं विरूक्षणीयानाम्, इक्षुर्मूत्रजननानां, यवाः पुरीषजननानां, जाम्बवं वातजननानां, शष्कुल्यः श्लेष्मपित्तजननानां, कुलत्था अम्लपित्तजननानां, माषाः श्लेष्मपित्तजननानां, मदनफलं वमनास्थापनानुवासनोपयोगिनां, त्रिवृत् सुखविरेचनानां, चतुरङ्गुलो मृदुविरेचनानां, स्नुक्पयस्तीक्ष्णविरेचननां, प्रत्यक्पुष्पा शिरोविरेचनानां, विडङ्गं क्रिमिघ्नानां, शिरीषो विषघ्नानां, खदिरः कुष्ठघ्नानां, रास्ना वातहराणाम्, आमलकं वयःस्थापनानां, हरीतकी पथ्यानाम्, एरण्डमूलं वृष्यवातहराणां, पिप्पलीमूलं दीपनीयपाचनीयानाहप्रशमनानां, चित्रकमूलं दीपनीयपाचनीयगुदशोथार्शःशूलहराणां, पुष्करमूलं हिक्काश्वासकासपार्श्वशूलहराणां, मुस्तं साङ्ग्राहिकदीपनीयपाचनीयानाम्, उदीच्यं निर्वापणदीपनीयपाचनीयच्छर्द्यतीसारहराणां, कट्वङ्गं साङ्ग्राहिकपाचनीयदीपनीयानाम्, अनन्ता साङ्ग्राहिकरक्तपित्तप्रशमनानाम्, अमृता साङ्ग्राहिकवातहरदीपनीयश्लेष्मशोणितविबन्धप्रशमनानां, बिल्वं साङ्ग्राहिकदीपनीयवातकफप्रशमनानाम्, अतिविषा दीपनीयपाचनीयसाङ्ग्राहिकसर्वदोषहराणाम्, उत्पलकुमुदपद्मकिञ्जल्कः साङ्ग्राहिकरक्तपित्तप्रशमनानां, दुरालभा पित्तश्लेष्मप्रशमनानां, गन्धप्रियङ्गुः शोणितपित्तातियोगप्रशमनानां, कुटजत्वक् श्लेष्मपित्तरक्तसाङ्ग्राहिकोपशोषणानां, काश्मर्यफलं रक्तसाङ्ग्राहिकरक्तपित्तप्रशमनानां, पृश्निपर्णी साङ्ग्राहिकवातहरदीपनीयवृष्याणां, विदारिगन्धा वृष्यसर्वदोषहराणां, बला साङ्ग्राहिकबल्यवातहराणां, गोक्षुरको मूत्रकृच्छ्रानिलहराणां, हिङ्गुनिर्यासश्छेदनीयदीपनीयानुलोमिकवातकफप्रशमनानाम्, अम्लवेतसो भेदनीयदीपनीयानुलोमिकवातश्लेष्महराणां, यावशूकः स्रंसनीयपाचनीयार्शोघ्नानां, तक्राभ्यासो ग्रहणीदोषशोफार्शोघृतव्यापत्प्रशमनानां, क्रव्यान्मांसरसाभ्यासो ग्रहणीदोषशोषार्शोघ्नानां, क्षीरघृताभ्यासो रसायनानां, समघृतसक्तुप्राशाभ्यासो वृष्योदावर्तहराणां, तैलगण्डूषाभ्यासो दन्तबलरुचिकराणां, चन्दनं दुर्गन्धहरदाहनिर्वापणलेपनानां, रास्नागुरुणी शीतापनयनप्रलेपनानां, लामज्जकोशीरं दाहत्वग्दोषस्वेदापनयनप्रलेपनानां, कुष्ठं वातहराभ्यङ्गोपनाहोपयोगिनां, मधुकं चक्षुष्यवृष्यकेश्यकण्ठ्यवर्ण्यविरजनीयरोपणीयानां, वायुः प्राणसञ्ज्ञाप्रदानहेतूनाम्, अग्निरामस्तम्भशीतशूलोद्वेपनप्रशमनानां, जलं स्तम्भनीयानां, मृद्भृष्टलोष्ट्रनिर्वापितमुदकं तृष्णाच्छर्द्यतियोगप्रशमनानाम्, अतिमात्राशनमामप्रदोषहेतूनां, यथाग्न्यभ्यवहारोऽग्निसन्धुक्षणानां, यथासात्म्यं चेष्टाभ्यवहारौ सेव्यानां, कालभोजनमारोग्यकराणां, तृप्तिराहारगुणानां, वेगसन्धारणमनारोग्यकराणां, मद्यं सौमनस्यजननानां, मद्याक्षेपो धीधृतिस्मृतिहराणां, गुरुभोजनं दुर्विपाककराणाम्, एकाशनभोजनं सुखपरिणामकराणां, स्त्रीष्वतिप्रसङ्गः शोषकराणां, शुक्रवेगनिग्रहः षाण्ड्यकराणां, पराघातनमन्नाश्रद्धाजननानाम्, अनशनमायुषो ह्रासकराणां, प्रमिताशनं कर्शनीयानाम्, अजीर्णाध्यशनं ग्रहणीदूषणानां, विषमाशनमग्निवैषम्यकराणां, विरुद्धवीर्याशनं निन्दितव्याधिकराणां, प्रशमः पथ्यानां, आयासः सर्वापथ्यानां, मिथ्यायोगो व्याधिकराणां, रजस्वलाभिगमनमलक्ष्मीमुखानां, ब्रह्मचर्यमायुष्याणां, परदाराभिगमनमनायुष्याणां, सङ्कल्पो वृष्याणां, दौर्मनस्यमवृष्याणाम्, अयथाबलमारम्भः प्राणोपरोधिनां, विषादो रोगवर्धनानां, स्नानं श्रमहराणां, हर्षः प्रीणनानां, शोकः शोषणानां, निवृत्तिः पुष्टिकराणां, पुष्टिःस्वप्नकराणाम्, अतिस्वप्नस्तन्द्राकराणां, सर्वरसाभ्यासो बलकराणाम्, एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकराणां, गर्भशल्यमाहार्याणाम्, अजीर्णमुद्धार्याणां, बालो मृदुभेषजीयानां, वृद्धो याप्यानां, गर्भिणी तीक्ष्णौषधव्यवायव्यायामवर्जनीयानां, सौमनस्यं गर्भधारणानां, सन्निपातो दुश्चिकित्स्यानाम्, आमो विषमचिकित्स्यानां , ज्वरो रोगाणां, कुष्ठं दीर्घरोगाणां, राजयक्ष्मा रोगसमूहानां, प्रमेहोऽनुषङ्गिणां, जलौकसोऽनुशस्त्राणां, बस्तिस्तन्त्राणां, हिमवानौषधिभूमीनां, सोम ओषधीनां, मरुभूमिरारोग्यदेशानाम्, अनूपोऽहितदेशानाम्, निर्देशकारित्वमातुरगुणानां, भिषक् चिकित्साङ्गानां, नास्तिकोवर्ज्यानां, लौल्यं क्लेशकराणाम्, अनिर्देशकारित्वमरिष्टानां, अनिर्वेदो वार्तलक्षणानां, वैद्यसमूहो निःसंशयकराणं, योगो वैद्यगुणानां, विज्ञानमौषधीनां, शास्त्रसहितस्तर्कः साधनानां, सम्प्रतिपत्तिः कालज्ञानप्रयोजनानाम्, अव्यवसायः कालातिपत्तिहेतूनां, दृष्टकर्मता निःसंशयकराणाम्, असमर्थता भयकराणां, तद्विद्यसम्भाषा बुद्धिवर्धनानाम्, आचार्यः शास्त्राधिगमहेतूनाम्, आयुर्वेदोऽमृतानां, सद्वचनमनुष्ठेयानाम्, असद्ग्रहणं सर्वाहितानां, सर्वसन्न्यासः सुखानामिति||४०||

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Adhikarana 21 (41) · Śloka 41

ভবন্তি চাত্র- অগ্র্যাণাং শতমুদ্দিষ্টং যদ্দ্বিপঞ্চাশদুত্তরম্| অলমেতদ্বিকারাণাং বিঘাতাযোপদিশ্যতে||৪১||

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भवन्ति चात्र- अग्र्याणां शतमुद्दिष्टं यद्द्विपञ्चाशदुत्तरम्| अलमेतद्विकाराणां विघातायोपदिश्यते||४१||

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Adhikarana 22 (42-44) · Śloka 44

সমানকারিণো যেঽর্থাস্তেষাং শ্রেষ্ঠস্য লক্ষণম্| জ্যাযস্ত্বং কার্যকর্তৃত্বে বরত্বং চাপ্যুদাহৃতম্||৪২|| বাতপিত্তকফানাং চ যদ্যত্ প্রশমনে হিতম্| প্রাধান্যতশ্চ নির্দিষ্টং যদ্ব্যাধিহরমুত্তমম্||৪৩|| এতন্নিশম্য নিপুণং চিকিত্সাং সম্প্রযোজযেত্| এবং কুর্বন্ সদা বৈদ্যো ধর্মকামৌ সমশ্নুতে||৪৪||

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समानकारिणो येऽर्थास्तेषां श्रेष्ठस्य लक्षणम्| ज्यायस्त्वं कार्यकर्तृत्वे वरत्वं चाप्युदाहृतम्||४२|| वातपित्तकफानां च यद्यत् प्रशमने हितम्| प्राधान्यतश्च निर्दिष्टं यद्व्याधिहरमुत्तमम्||४३|| एतन्निशम्य निपुणं चिकित्सां सम्प्रयोजयेत्| एवं कुर्वन् सदा वैद्यो धर्मकामौ समश्नुते||४४||

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Adhikarana 23 (45-47) · Śloka 47

পথ্যং পথোঽনপেতং যদ্যচ্চোক্তং মনসঃ প্রিযম্| যচ্চাপ্রিযমপথ্যং চ নিযতং তন্ন লক্ষযেত্||৪৫|| মাত্রাকালক্রিযাভূমিদেহদোষগুণান্তরম্ | প্রাপ্য তত্তদ্ধি দৃশ্যন্তে তে তে ভাবাস্তথা তথা||৪৬|| তস্মাত্ স্বভাবো নির্দিষ্টস্তথা মাত্রাদিরাশ্রযঃ| তদপেক্ষ্যোভযং কর্ম প্রযোজ্যং সিদ্ধিমিচ্ছতা||৪৭||

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पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यच्चोक्तं मनसः प्रियम्| यच्चाप्रियमपथ्यं च नियतं तन्न लक्षयेत्||४५|| मात्राकालक्रियाभूमिदेहदोषगुणान्तरम् | प्राप्य तत्तद्धि दृश्यन्ते ते ते भावास्तथा तथा||४६|| तस्मात् स्वभावो निर्दिष्टस्तथा मात्रादिराश्रयः| तदपेक्ष्योभयं कर्म प्रयोज्यं सिद्धिमिच्छता||४७||

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Adhikarana 24 (49) · Śloka 49

তদাত্রেযস্য ভগবতো বচনমনুনিশম্য পুনরপি ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশ উবাচ- যথোদ্দেশমভিনির্দিষ্টঃ কেবলোঽযমর্থো ভগবতা শ্রুতশ্চাস্মাভিঃ| আসবদ্রব্যাণামিদানীমনপবাদং লক্ষণমনতিসঙ্ক্ষেপেণোপদিশ্যমানং শুশ্রূষামহ ইতি||৪৮|| তমুবাচ ভগবানাত্রেযঃ- ধান্যফলমূলসারপুষ্পকাণ্ডপত্রত্বচো ভবন্ত্যাসবযোনযোঽগ্নিবেশ! সঙ্গ্রহেণাষ্টৌ শর্করানবমীকাঃ| তাস্বেব দ্রব্যসংযোগকরণতোঽপরিসঙ্খ্যেযাসু যথাপথ্যতমানামাসবানাং চতুরশীতিং নিবোধ| তদ্যথা- সুরাসৌবীরতুষোদকমৈরেযমেদকধান্যাম্লাঃ ষড্ ধান্যাসবা ভবন্তি, মৃদ্বীকাখর্জূরকাশ্মর্যধন্বনরাজাদনতৃণশূন্যপরূষকাভযামলকমৃগলিণ্ডিকাজাম্ববকপিত্থ- কুবলবদরকর্কন্ধুপীলুপ্রিযালপনসন্যগ্রোধাশ্বত্থপ্লক্ষকপীতনোদুম্বরাজমোদশৃঙ্গাটকশাঙ্খিনীফলাসবাঃ ষড্বিংশতির্ভবন্তি, বিদারিগন্ধাশ্বগন্ধাকৃষ্ণগন্ধাশতাবরীশ্যামাত্রিবৃদ্দন্তীদ্রবন্তীবিল্বোরুবূকচিত্রকমূলৈরেকাদশ মূলাসবা ভবন্তি, শালপ্রিযকাশ্বকর্ণচন্দনস্যন্দনখদিরকদরসপ্তপর্ণার্জুনাসনারিমেদতিন্দুককিণিহীশমী- শুক্তিশিংশপাশিরীষবঞ্জলধন্বনমধূকৈঃ সারাসবা বিংশতির্ভবন্তি, পদ্মোত্পলনলিকুমুদসৌগন্ধিকপুণ্ডরীকশতপত্রমধূকপ্রিযঙ্গুধাতকীপুষ্পৈর্দশ পুষ্পাসবা ভবন্তি, ইক্ষুকাণ্ডেক্ষ্বিক্ষুবালিকাপুণ্ড্রকচতুর্থাঃ কাণ্ডাসবা ভবন্তি, পটোলতাডকপত্রাসবৌ দ্বৌ ভবতঃ, তিল্বকলোধ্রৈলবালুকক্রমুকচতুর্থাস্ত্বগাসবা ভবন্তি, শর্করাসব এক এবেতি| এবমেষামাসবানাং চতুরশীতিঃ পরস্পরেণাসংসৃষ্টানামাসবদ্রব্যাণামুপনির্দিষ্টা ভবতি| এষামাসবানামাসুতত্বাদাসবসঞ্জ্ঞা| দ্রব্যসংযোগবিভাগবিস্তারস্ত্বেষাং বহুবিধকল্পঃ সংস্কারশ্চ| যথাস্বং সংযোগসংস্কারসংস্কৃতা হ্যাসবাঃ স্বং কর্ম কুর্বন্তি| সংযোগসংস্কারদেশকালমাত্রাদযশ্চ ভাবাস্তেষাং তেষামাসবানাং তে তে সমুপদিশ্যন্তে তত্তত্কার্যমভিসমীক্ষ্যেতি||৪৯||

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तदात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच- यथोद्देशमभिनिर्दिष्टः केवलोऽयमर्थो भगवता श्रुतश्चास्माभिः| आसवद्रव्याणामिदानीमनपवादं लक्षणमनतिसङ्क्षेपेणोपदिश्यमानं शुश्रूषामह इति||४८|| तमुवाच भगवानात्रेयः- धान्यफलमूलसारपुष्पकाण्डपत्रत्वचो भवन्त्यासवयोनयोऽग्निवेश! सङ्ग्रहेणाष्टौ शर्करानवमीकाः| तास्वेव द्रव्यसंयोगकरणतोऽपरिसङ्ख्येयासु यथापथ्यतमानामासवानां चतुरशीतिं निबोध| तद्यथा- सुरासौवीरतुषोदकमैरेयमेदकधान्याम्लाः षड् धान्यासवा भवन्ति, मृद्वीकाखर्जूरकाश्मर्यधन्वनराजादनतृणशून्यपरूषकाभयामलकमृगलिण्डिकाजाम्बवकपित्थ- कुवलबदरकर्कन्धुपीलुप्रियालपनसन्यग्रोधाश्वत्थप्लक्षकपीतनोदुम्बराजमोदशृङ्गाटकशाङ्खिनीफलासवाः षड्विंशतिर्भवन्ति, विदारिगन्धाश्वगन्धाकृष्णगन्धाशतावरीश्यामात्रिवृद्दन्तीद्रवन्तीबिल्वोरुबूकचित्रकमूलैरेकादश मूलासवा भवन्ति, शालप्रियकाश्वकर्णचन्दनस्यन्दनखदिरकदरसप्तपर्णार्जुनासनारिमेदतिन्दुककिणिहीशमी- शुक्तिशिंशपाशिरीषवञ्जलधन्वनमधूकैः सारासवा विंशतिर्भवन्ति, पद्मोत्पलनलिकुमुदसौगन्धिकपुण्डरीकशतपत्रमधूकप्रियङ्गुधातकीपुष्पैर्दश पुष्पासवा भवन्ति, इक्षुकाण्डेक्ष्विक्षुवालिकापुण्ड्रकचतुर्थाः काण्डासवा भवन्ति, पटोलताडकपत्रासवौ द्वौ भवतः, तिल्वकलोध्रैलवालुकक्रमुकचतुर्थास्त्वगासवा भवन्ति, शर्करासव एक एवेति| एवमेषामासवानां चतुरशीतिः परस्परेणासंसृष्टानामासवद्रव्याणामुपनिर्दिष्टा भवति| एषामासवानामासुतत्वादासवसञ्ज्ञा| द्रव्यसंयोगविभागविस्तारस्त्वेषां बहुविधकल्पः संस्कारश्च| यथास्वं संयोगसंस्कारसंस्कृता ह्यासवाः स्वं कर्म कुर्वन्ति| संयोगसंस्कारदेशकालमात्रादयश्च भावास्तेषां तेषामासवानां ते ते समुपदिश्यन्ते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्येति||४९||

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Adhikarana 25 (50) · Śloka 50

ভবতি চাত্র- মনঃশরীরাগ্নিবলপ্রদানামস্বপ্নশোকারুচিনাশনানাম্| সংহর্ষণানাং প্রবরাসবানামশীতিরুক্তা চতুরুত্তরৈষা||৫০||

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भवति चात्र- मनःशरीराग्निबलप्रदानामस्वप्नशोकारुचिनाशनानाम्| संहर्षणानां प्रवरासवानामशीतिरुक्ता चतुरुत्तरैषा||५०||

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Adhikarana 26 (51) · Śloka 51

তত্র শ্লোকঃ- শরীররোগপ্রকৃতৌ মতানি তত্ত্বেন চাহারবিনিশ্চযং চ| উবাচ যজ্জঃপুরুষাদিকেঽস্মিন্ মুনিস্তথাঽগ্র্যাণি বরাসবাংশ্চ||৫১||

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तत्र श्लोकः- शरीररोगप्रकृतौ मतानि तत्त्वेन चाहारविनिश्चयं च| उवाच यज्जःपुरुषादिकेऽस्मिन् मुनिस्तथाऽग्र्याणि वरासवांश्च||५१||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 25

ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে যজ্জঃপুরুষীযো নাম পঞ্চবিংশোঽধ্যাযঃ||২৫||

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इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने यज्जःपुरुषीयो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः||२५||

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