Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ব্যাধিতরূপীযং বিমানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातो व्याधितरूपीयं विमानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ব্যাধিতরূপীযং বিমানং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातो व्याधितरूपीयं विमानं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ইহ খলু দ্বৌ পুরুষৌ ব্যাধিতরূপৌ ভবতঃ- গুরুব্যাধিতঃ, লঘুব্যাধিতশ্চ| তত্র- গুরুব্যাধিত একঃ সত্ত্ববলশরীরসম্পদুপেতত্বাল্লঘুব্যাধিত ইব দৃশ্যতে, লঘুব্যাধিতোঽপরঃ সত্ত্বাদীনামধমত্বাদ্গুরুব্যাধিত ইব দৃশ্যতে| তযোরকুশলাঃ কেবলং চক্ষুষৈব রূপং দৃষ্ট্বাঽধ্যবস্যন্তো ব্যাধিগুরুলাঘবে বিপ্রতিপদ্যন্তে||৩||
इह खलु द्वौ पुरुषौ व्याधितरूपौ भवतः- गुरुव्याधितः, लघुव्याधितश्च| तत्र- गुरुव्याधित एकः सत्त्वबलशरीरसम्पदुपेतत्वाल्लघुव्याधित इव दृश्यते, लघुव्याधितोऽपरः सत्त्वादीनामधमत्वाद्गुरुव्याधित इव दृश्यते| तयोरकुशलाः केवलं चक्षुषैव रूपं दृष्ट्वाऽध्यवस्यन्तो व्याधिगुरुलाघवे विप्रतिपद्यन्ते||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
নহি জ্ঞানাবযবেন কৃত্স্নে জ্ঞেযে বিজ্ঞানমুত্পদ্যতে| বিপ্রতিপন্নাস্তু খলু রোগজ্ঞানে উপক্রমযুক্তিজ্ঞানে চাপি বিপ্রতিপদ্যন্তে| তে যদা গুরুব্যাধিতং লঘুব্যাধিতরূপমাসাদযন্তি, তদা তমল্পদোষং মত্বা সংশোধনকালেঽস্মৈ মৃদু সংশোধনং প্রযচ্ছন্তো ভূয এবাস্য দোষানুদীরযন্তি| যদা তু লঘুব্যাধিতং গুরুব্যাধিতরূপমাসাদযন্তি, তদা তং মহাদোষং মত্বা সংশোধনকালেঽস্মৈ তীক্ষ্ণং সংশোধনং প্রযচ্ছন্তো দোষানতিনির্হৃত্য শরীরমস্য ক্ষিণ্বন্তি| এবমবযবেন জ্ঞানস্য কৃত্স্নে জ্ঞেযে জ্ঞানমভিমন্যমানাঃ পরিস্খলন্তি| বিদিতবেদিতব্যাস্তু ভিষজঃ সর্বং সর্বথা যথাসম্ভবং পরীক্ষ্যং পরীক্ষ্যাধ্যবস্যন্তো ন ক্বচিদপি বিপ্রতিপদ্যন্তে, যথেষ্টমর্থমভিনির্বর্তযন্তি চেতি||৪||
नहि ज्ञानावयवेन कृत्स्ने ज्ञेये विज्ञानमुत्पद्यते| विप्रतिपन्नास्तु खलु रोगज्ञाने उपक्रमयुक्तिज्ञाने चापि विप्रतिपद्यन्ते| ते यदा गुरुव्याधितं लघुव्याधितरूपमासादयन्ति, तदा तमल्पदोषं मत्वा संशोधनकालेऽस्मै मृदु संशोधनं प्रयच्छन्तो भूय एवास्य दोषानुदीरयन्ति| यदा तु लघुव्याधितं गुरुव्याधितरूपमासादयन्ति, तदा तं महादोषं मत्वा संशोधनकालेऽस्मै तीक्ष्णं संशोधनं प्रयच्छन्तो दोषानतिनिर्हृत्य शरीरमस्य क्षिण्वन्ति| एवमवयवेन ज्ञानस्य कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमभिमन्यमानाः परिस्खलन्ति| विदितवेदितव्यास्तु भिषजः सर्वं सर्वथा यथासम्भवं परीक्ष्यं परीक्ष्याध्यवस्यन्तो न क्वचिदपि विप्रतिपद्यन्ते, यथेष्टमर्थमभिनिर्वर्तयन्ति चेति||४||
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Adhikarana 4 (5-7) · Śloka 7
ভবন্তি চাত্র- সত্ত্বাদীনাং বিকল্পেন ব্যাধিরূপমথাতুরে | দৃষ্ট্বা বিপ্রতিপদ্যন্তে বালা ব্যাধিবলাবলে||৫|| তে ভেষজমযোগেন কুর্বন্ত্যজ্ঞানমোহিতাঃ| ব্যাধিতানাং বিনাশায ক্লেশায মহতেঽপি বা||৬|| প্রাজ্ঞাস্তু সর্বমাজ্ঞায পরীক্ষ্যমিহ সর্বথা| ন স্খলন্তি প্রযোগেষু ভেষজানাং কদাচন||৭||
भवन्ति चात्र- सत्त्वादीनां विकल्पेन व्याधिरूपमथातुरे | दृष्ट्वा विप्रतिपद्यन्ते बाला व्याधिबलाबले||५|| ते भेषजमयोगेन कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः| व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा||६|| प्राज्ञास्तु सर्वमाज्ञाय परीक्ष्यमिह सर्वथा| न स्खलन्ति प्रयोगेषु भेषजानां कदाचन||७||
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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8
ইতি ব্যাধিতরূপাধিকারে ব্যাধিতরূপসঙ্খ্যাগ্রসম্ভবং ব্যাধিতরূপহেতুবিপ্রতিপত্তৌ কারণং সাপবাদং সম্প্রতিপত্তিকারণং চানপবাদং নিশম্য, ভগবন্তমাত্রেযমগ্নিবেশোঽতঃ পরং সর্বক্রিমীণাং পুরীষসংশ্রযাণাং সমুত্থানস্থানসংস্থানবর্ণনামপ্রভাবচিকিত্সিতবিশেষান্ পপ্রচ্ছোপসঙ্গৃহ্য পাদৌ||৮||
इति व्याधितरूपाधिकारे व्याधितरूपसङ्ख्याग्रसम्भवं व्याधितरूपहेतुविप्रतिपत्तौ कारणं सापवादं सम्प्रतिपत्तिकारणं चानपवादं निशम्य, भगवन्तमात्रेयमग्निवेशोऽतः परं सर्वक्रिमीणां पुरीषसंश्रयाणां समुत्थानस्थानसंस्थानवर्णनामप्रभावचिकित्सितविशेषान् पप्रच्छोपसङ्गृह्य पादौ||८||
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Adhikarana 6 (9) · Śloka 9
অথাস্মৈ প্রোবাচ ভগবানাত্রেযঃ- ইহ খল্বগ্নিবেশ! বিংশতিবিধাঃ ক্রিমযঃ পূর্বমুদ্দিষ্টা নানাবিধেন প্রবিভাগেনান্যত্র সহজেভ্যঃ; তে পুনঃ প্রকৃতিভির্বিভজ্যমানাশ্চতুর্বিধা ভবন্তি; তদ্যথা- পুরীষজাঃ, শ্লেষ্মজাঃ, শোণিতজা, মলজাশ্চেতি||৯||
अथास्मै प्रोवाच भगवानात्रेयः- इह खल्वग्निवेश! विंशतिविधाः क्रिमयः पूर्वमुद्दिष्टा नानाविधेन प्रविभागेनान्यत्र सहजेभ्यः; ते पुनः प्रकृतिभिर्विभज्यमानाश्चतुर्विधा भवन्ति; तद्यथा- पुरीषजाः, श्लेष्मजाः, शोणितजा, मलजाश्चेति||९||
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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
তত্র মলো বাহ্যশ্চাভ্যন্তরশ্চ| তত্র বাহ্যমলজাতান্ মলজান্ সঞ্চক্ষ্মহে | তেষাং সমুত্থানং- মৃজাবর্জনং; স্থানং- কেশশ্মশ্রুলোমপক্ষ্মবাসাংসি; সংস্থানম্- অণবস্তিলাকৃতযো বহুপাদাশ্চ; বর্ণঃ- কৃষ্ণঃ, শুক্লশ্চ; নামানি- যূকাঃ, পিপীলিকাশ্চ; প্রভাবঃ- কণ্ডূজননং, কোঠপিডকাভিনির্বর্তনং চ; চিকিত্সিতং তু খল্বেষামপকর্ষণং, মলোপঘাতঃ, মলকরাণাং চ ভাবানামনুপসেবনমিতি||১০||
तत्र मलो बाह्यश्चाभ्यन्तरश्च| तत्र बाह्यमलजातान् मलजान् सञ्चक्ष्महे | तेषां समुत्थानं- मृजावर्जनं; स्थानं- केशश्मश्रुलोमपक्ष्मवासांसि; संस्थानम्- अणवस्तिलाकृतयो बहुपादाश्च; वर्णः- कृष्णः, शुक्लश्च; नामानि- यूकाः, पिपीलिकाश्च; प्रभावः- कण्डूजननं, कोठपिडकाभिनिर्वर्तनं च; चिकित्सितं तु खल्वेषामपकर्षणं, मलोपघातः, मलकराणां च भावानामनुपसेवनमिति||१०||
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Adhikarana 8 (11) · Śloka 11
শোণিতজানাং তু খলু কুষ্ঠৈঃ সমানং সমুত্থানং; স্থানং- রক্তবাহিন্যো ধমন্যঃ; সংস্থানম্- অণবো বৃত্তাশ্চাপাদাশ্চ, সূক্ষ্মত্বাচ্চৈকে ভবন্ত্যদৃশ্যাঃ; বর্ণঃ- তাম্রঃ; নামানি- কেশাদা, লোমাদা, লোমদ্বীপাঃ, সৌরসা, ঔডুম্বরা, জন্তুমাতরশ্চেতি; প্রভাবঃ- কেশশ্মশ্রুনখলোমপক্ষ্মাপধ্বংসঃ, ব্রণগতানাং চ হর্ষকণ্ডূতোদসংসর্পণানি, অতিবৃদ্ধানাং চ ত্বক্সিরাস্নাযুমাংসতরুণাস্থিভক্ষণমিতি; চিকিত্সিতমপ্যেষাং কুষ্ঠৈঃ সমানং, তদুত্তরকালমুপদেক্ষ্যামঃ||১১||
शोणितजानां तु खलु कुष्ठैः समानं समुत्थानं; स्थानं- रक्तवाहिन्यो धमन्यः; संस्थानम्- अणवो वृत्ताश्चापादाश्च, सूक्ष्मत्वाच्चैके भवन्त्यदृश्याः; वर्णः- ताम्रः; नामानि- केशादा, लोमादा, लोमद्वीपाः, सौरसा, औडुम्बरा, जन्तुमातरश्चेति; प्रभावः- केशश्मश्रुनखलोमपक्ष्मापध्वंसः, व्रणगतानां च हर्षकण्डूतोदसंसर्पणानि, अतिवृद्धानां च त्वक्सिरास्नायुमांसतरुणास्थिभक्षणमिति; चिकित्सितमप्येषां कुष्ठैः समानं, तदुत्तरकालमुपदेक्ष्यामः||११||
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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12
শ্লেষ্মজাঃ ক্ষীরগুডতিলমত্স্যানূপমাংসপিষ্টান্নপরমান্নকুসুম্ভস্নেহাজীর্ণপূতিক্লিন্নসঙ্কীর্ণবিরুদ্ধাসাত্ম্যভোজনসমুত্থানাঃ; তেষামামাশযঃ স্থানং, তে প্রবর্ধমানাস্তূর্ধ্বমধো বা বিসর্পন্ত্যুভযতো বা; সংস্থানবর্ণবিশেষাস্তু- শ্বেতাঃ পৃথুব্রধ্নসংস্থানাঃ কেচিত্, কেচিদ্বৃত্তপরিণাহা গণ্ডূপদাকৃতযঃ শ্বেতাস্তাম্রাবভাসাশ্চ, কেচিদণবো দীর্ঘাস্তন্ত্বাকৃতযঃ শ্বেতাঃ; তেষাং ত্রিবিধানাং শ্লেষ্মনিমিত্তানাং ক্রিমীণাং নামানি- অন্ত্রাদাঃ, উদরাদাঃ, হৃদযচরাঃ , চুরবঃ, দর্ভপুষ্পাঃ, সৌগন্ধিকাঃ, মহাগুদাশ্চেতি; প্রভাবো- হৃল্লাসঃ, আস্যসংস্রবণম্, অরোচকাবিপাকৌ, জ্বরঃ, মূর্চ্ছা, জৃম্ভা, ক্ষবথুঃ, আনাহঃ, অঙ্গমর্দঃ, ছর্দিঃ কার্শ্যং, পারুষ্যং, চেতি||১২||
श्लेष्मजाः क्षीरगुडतिलमत्स्यानूपमांसपिष्टान्नपरमान्नकुसुम्भस्नेहाजीर्णपूतिक्लिन्नसङ्कीर्णविरुद्धासात्म्यभोजनसमुत्थानाः; तेषामामाशयः स्थानं, ते प्रवर्धमानास्तूर्ध्वमधो वा विसर्पन्त्युभयतो वा; संस्थानवर्णविशेषास्तु- श्वेताः पृथुब्रध्नसंस्थानाः केचित्, केचिद्वृत्तपरिणाहा गण्डूपदाकृतयः श्वेतास्ताम्रावभासाश्च, केचिदणवो दीर्घास्तन्त्वाकृतयः श्वेताः; तेषां त्रिविधानां श्लेष्मनिमित्तानां क्रिमीणां नामानि- अन्त्रादाः, उदरादाः, हृदयचराः , चुरवः, दर्भपुष्पाः, सौगन्धिकाः, महागुदाश्चेति; प्रभावो- हृल्लासः, आस्यसंस्रवणम्, अरोचकाविपाकौ, ज्वरः, मूर्च्छा, जृम्भा, क्षवथुः, आनाहः, अङ्गमर्दः, छर्दिः कार्श्यं, पारुष्यं, चेति||१२||
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Adhikarana 10 (13) · Śloka 13
পুরীষজাস্তুল্যসমুত্থানাঃ শ্লেষ্মজৈঃ; তেষাং স্থানং পক্বাশযঃ, তে প্রবর্ধমানাস্ত্বধো বিসর্পন্তি, যস্য পুনরামাশযাভিমুখাঃ স্যুর্যদন্তরং তদন্তরং তস্যোদ্গারনিঃশ্বাসাঃ পুরীষগন্ধিনঃ স্যুঃ; সংস্থানবর্ণবিশেষাস্তু- সূক্ষ্মবৃত্তপরীণাহাঃ শ্বেতা দীর্ঘা ঊর্ণাংশুসঙ্কাশাঃ কেচিত্, কেচিত্ পুনঃ স্থূলবৃত্তপরীণাহাঃ শ্যাবনীলহরিতপীতাঃ; তেষাং নামানি ককেরুকাঃ, মকেরুকাঃ, লেলিহাঃ; সশূলকাঃ, সৌসুরাদাশ্চেতি; প্রভাবঃ- পুরীষভেদঃ, কার্শ্যং, পারুষ্যং, লোমহর্ষাভিনির্বর্তনং চ, ত এব চাস্য গুদমুখং পরিতুদন্তঃ কণ্ডূং চোপজনযন্তো গুদমুখং পর্যাসতে, ত এব জাতহর্ষা গুদনিষ্ক্রমণমতিবেলং কুর্বন্তি; ইত্যেষ শ্লেষ্মজানাং পুরীষজানাং চ ক্রিমীণাং সমুত্থানাদিবিশেষঃ||১৩||
पुरीषजास्तुल्यसमुत्थानाः श्लेष्मजैः; तेषां स्थानं पक्वाशयः, ते प्रवर्धमानास्त्वधो विसर्पन्ति, यस्य पुनरामाशयाभिमुखाः स्युर्यदन्तरं तदन्तरं तस्योद्गारनिःश्वासाः पुरीषगन्धिनः स्युः; संस्थानवर्णविशेषास्तु- सूक्ष्मवृत्तपरीणाहाः श्वेता दीर्घा ऊर्णांशुसङ्काशाः केचित्, केचित् पुनः स्थूलवृत्तपरीणाहाः श्यावनीलहरितपीताः; तेषां नामानि ककेरुकाः, मकेरुकाः, लेलिहाः; सशूलकाः, सौसुरादाश्चेति; प्रभावः- पुरीषभेदः, कार्श्यं, पारुष्यं, लोमहर्षाभिनिर्वर्तनं च, त एव चास्य गुदमुखं परितुदन्तः कण्डूं चोपजनयन्तो गुदमुखं पर्यासते, त एव जातहर्षा गुदनिष्क्रमणमतिवेलं कुर्वन्ति; इत्येष श्लेष्मजानां पुरीषजानां च क्रिमीणां समुत्थानादिविशेषः||१३||
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Adhikarana 11 (14-15) · Śloka 15
চিকিত্সিতং তু খল্বেষাং সমাসেনোপদিশ্য পশ্চাদ্বিস্তরেণোপদেক্ষ্যামঃ| তত্র সর্বক্রিমীণামপকর্ষণমেবাদিতঃ কার্যং, ততঃ প্রকৃতিবিঘাতঃ, অনন্তরং নিদানোক্তানাং ভাবানামনুপসেবনমিতি||১৪|| তত্রাপকর্ষণং- হস্তেনাভিগৃহ্য বিমৃশ্যোপকরণবতাঽপনযনমনুপকরণেন বা; স্থানগতানাং তু ক্রিমীণাং ভেষজেনাপকর্ষণং ন্যাযতঃ, তচ্চতুর্বিধং; তদ্যথা- শিরোবিরেচনং, বমনং, বিরেচনম্, আস্থাপনং চ; ইত্যপকর্ষণবিধিঃ| প্রকৃতিবিঘাতস্ত্বেষাং কটুতিক্তকষাযক্ষারোষ্ণানাং দ্রব্যাণামুপযোগঃ, যচ্চান্যদপি কিঞ্চিচ্ছ্লেষ্মপুরীষপ্রত্যনীকভূতং তত্ স্যাত্; হতি প্রকৃতিবিঘাতঃ| অনন্তরং নিদানোক্তানাং ভাবানামনুপসেবনং- যদুক্তং নিদানবিধৌ তস্য বিবর্জনং তথাপ্রাযাণাং চাপরেষাং দ্রব্যাণাম্| ইতি লক্ষণতশ্চিকিত্সিতমনুব্যাখ্যাতম্| এতদেব পুনর্বিস্তরেণোপদেক্ষ্যতে||১৫||
चिकित्सितं तु खल्वेषां समासेनोपदिश्य पश्चाद्विस्तरेणोपदेक्ष्यामः| तत्र सर्वक्रिमीणामपकर्षणमेवादितः कार्यं, ततः प्रकृतिविघातः, अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनमिति||१४|| तत्रापकर्षणं- हस्तेनाभिगृह्य विमृश्योपकरणवताऽपनयनमनुपकरणेन वा; स्थानगतानां तु क्रिमीणां भेषजेनापकर्षणं न्यायतः, तच्चतुर्विधं; तद्यथा- शिरोविरेचनं, वमनं, विरेचनम्, आस्थापनं च; इत्यपकर्षणविधिः| प्रकृतिविघातस्त्वेषां कटुतिक्तकषायक्षारोष्णानां द्रव्याणामुपयोगः, यच्चान्यदपि किञ्चिच्छ्लेष्मपुरीषप्रत्यनीकभूतं तत् स्यात्; हति प्रकृतिविघातः| अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनं- यदुक्तं निदानविधौ तस्य विवर्जनं तथाप्रायाणां चापरेषां द्रव्याणाम्| इति लक्षणतश्चिकित्सितमनुव्याख्यातम्| एतदेव पुनर्विस्तरेणोपदेक्ष्यते||१५||
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Adhikarana 12 (16) · Śloka 16
অথৈনং ক্রিমিকোষ্ঠমাতুরমগ্রে ষড্রাত্রং সপ্তরাত্রং বা স্নেহস্বেদাভ্যামুপপাদ্য শ্বোভূতে এনং সংশোধনং পাযযিতাঽস্মীতি ক্ষীরগুডদধিতিলমত্স্যানূপমাংসপিষ্টান্নপরমান্নকুসুম্ভস্নেহসম্প্রযুক্তৈর্ভোজ্যৈঃ সাযং প্রাতশ্চোপপাদযেত্ সমুদীরণার্থং ক্রিমীণাং কোষ্ঠাভিসরণার্থং চ ভিষক্| অথ ব্যুষ্টাযাং রাত্র্যাং সুখোষিতং সুপ্রজীর্ণভক্তং চ বিজ্ঞাযাস্থাপনবমনবিরেচনৈস্তদহরেবোপপাদযেদুপপাদনীযশ্চেত্ স্যাত্ সর্বান্ পরীক্ষ্যবিশেষান্ পরীক্ষ্য সম্যক্||১৬||
अथैनं क्रिमिकोष्ठमातुरमग्रे षड्रात्रं सप्तरात्रं वा स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य श्वोभूते एनं संशोधनं पाययिताऽस्मीति क्षीरगुडदधितिलमत्स्यानूपमांसपिष्टान्नपरमान्नकुसुम्भस्नेहसम्प्रयुक्तैर्भोज्यैः सायं प्रातश्चोपपादयेत् समुदीरणार्थं क्रिमीणां कोष्ठाभिसरणार्थं च भिषक्| अथ व्युष्टायां रात्र्यां सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं च विज्ञायास्थापनवमनविरेचनैस्तदहरेवोपपादयेदुपपादनीयश्चेत् स्यात् सर्वान् परीक्ष्यविशेषान् परीक्ष्य सम्यक्||१६||
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Adhikarana 13 (17) · Śloka 17
অথাহরেতি ব্রূযাত্- মূলকসর্ষপলশুনকরঞ্জশিগ্রুমধুশিগ্রুখরপুষ্পাভূস্তৃণসুমুখসুরসকুঠেরকগণ্ডীরকালমালকপর্ণাসক্ষবকফণিজ্ঝকানি সর্বাণ্যথবা যথালাভং; তান্যাহৃতান্যভিসমীক্ষ্য খণ্ডশশ্ছেদযিত্বা প্রক্ষাল্য পানীযেন সুপ্রক্ষালিতাযাং স্থাল্যাং সমাবাপ্য গোমূত্রেণার্ধোদকেনাভিষিচ্য সাধযেত্ সততমবঘট্টযন্ দর্ব্যা, তমুপযুক্তভূযিষ্ঠেঽম্ভসি গতরসেষ্বৌষধেষু স্থালীমবতার্য সুপরিপূতং কষাযং সুখোষ্ণং মদনফলপিপ্পলীবিডঙ্গকল্কতৈলোপহিতং স্বর্জিকালবণিতমভ্যাসিচ্য বস্তৌ বিধিবদাস্থাপযেদেনং; তথাঽর্কালর্ককুটজাঢকীকুষ্ঠকৈডর্যকষাযেণ বা, তথা শিগ্রুপীলুকুস্তুম্বুরুকটুকাসর্ষপকষাযেণ, তথাঽঽমলকশৃঙ্গবেরদারুহরিদ্রাপিচুমর্দকষাযেণ মদনফলাদিসংযোগসম্পাদিতেন, ত্রিবারং সপ্তরাত্রং বাঽঽস্থাপযেত্||১৭||
अथाहरेति ब्रूयात्- मूलकसर्षपलशुनकरञ्जशिग्रुमधुशिग्रुखरपुष्पाभूस्तृणसुमुखसुरसकुठेरकगण्डीरकालमालकपर्णासक्षवकफणिज्झकानि सर्वाण्यथवा यथालाभं; तान्याहृतान्यभिसमीक्ष्य खण्डशश्छेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सुप्रक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य गोमूत्रेणार्धोदकेनाभिषिच्य साधयेत् सततमवघट्टयन् दर्व्या, तमुपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसेष्वौषधेषु स्थालीमवतार्य सुपरिपूतं कषायं सुखोष्णं मदनफलपिप्पलीविडङ्गकल्कतैलोपहितं स्वर्जिकालवणितमभ्यासिच्य बस्तौ विधिवदास्थापयेदेनं; तथाऽर्कालर्ककुटजाढकीकुष्ठकैडर्यकषायेण वा, तथा शिग्रुपीलुकुस्तुम्बुरुकटुकासर्षपकषायेण, तथाऽऽमलकशृङ्गवेरदारुहरिद्रापिचुमर्दकषायेण मदनफलादिसंयोगसम्पादितेन, त्रिवारं सप्तरात्रं वाऽऽस्थापयेत्||१७||
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Adhikarana 14 (18-19) · Śloka 19
প্রত্যাগতে চ পশ্চিমে বস্তৌ প্রত্যাশ্বস্তং তদহরেবোভযতোভাগহরং সংশোধনং পাযযেদ্যুক্ত্যা; তস্য বিধিরুপদেক্ষ্যতে- মদনফলপিপ্পলীকষাযস্যার্ধাঞ্জলিমাত্রেণ ত্রিবৃত্কল্কাক্ষমাত্রমালোড্য পাতুমস্মৈ প্রযচ্ছেত্, তদস্য দোষমুভযতো নির্হরতি সাধু; এবমেব কল্পোক্তানি বমনবিরেচনানি প্রতিসংসৃজ্য পাযযেদেনং বুদ্ধ্যা সর্ববিশেষানবেক্ষমাণো ভিষক্||১৮|| অথৈনং সম্যগ্বিরিক্তং বিজ্ঞাযাপরাহ্ণে শৈখরিককষাযেণ সুখোষ্ণেন পরিষেচযেত্| তেনৈব চ কষাযেণ বাহ্যাভ্যন্তরান্ সর্বোদকার্থান্ কারযেচ্ছশ্বত্; তদভাবে কটুতিক্তকষাযাণামৌষধানাং ক্বাথৈর্মূত্রক্ষারৈর্বা পরিষেচযেত্| পরিষিক্তং চৈনং নিবাতমাগারমনুপ্রবেশ্য পিপ্পলীপিপ্পলীমূলচব্যচিত্রকশৃঙ্গবেরসিদ্ধেন যবাগ্বাদিনা ক্রমেণোপাচরেত্, বিলেপীক্রমাগতং চৈনমনুবাসযেদ্বিডঙ্গতৈলেনৈকান্তরং দ্বিস্ত্রির্বা||১৯||
प्रत्यागते च पश्चिमे बस्तौ प्रत्याश्वस्तं तदहरेवोभयतोभागहरं संशोधनं पाययेद्युक्त्या; तस्य विधिरुपदेक्ष्यते- मदनफलपिप्पलीकषायस्यार्धाञ्जलिमात्रेण त्रिवृत्कल्काक्षमात्रमालोड्य पातुमस्मै प्रयच्छेत्, तदस्य दोषमुभयतो निर्हरति साधु; एवमेव कल्पोक्तानि वमनविरेचनानि प्रतिसंसृज्य पाययेदेनं बुद्ध्या सर्वविशेषानवेक्षमाणो भिषक्||१८|| अथैनं सम्यग्विरिक्तं विज्ञायापराह्णे शैखरिककषायेण सुखोष्णेन परिषेचयेत्| तेनैव च कषायेण बाह्याभ्यन्तरान् सर्वोदकार्थान् कारयेच्छश्वत्; तदभावे कटुतिक्तकषायाणामौषधानां क्वाथैर्मूत्रक्षारैर्वा परिषेचयेत्| परिषिक्तं चैनं निवातमागारमनुप्रवेश्य पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकशृङ्गवेरसिद्धेन यवाग्वादिना क्रमेणोपाचरेत्, विलेपीक्रमागतं चैनमनुवासयेद्विडङ्गतैलेनैकान्तरं द्विस्त्रिर्वा||१९||
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Adhikarana 15 (20) · Śloka 20
যদি পুনরস্যাতিপ্রবৃদ্ধাঞ্ছীর্ষাদান্ ক্রিমীন্ মন্যেত শিরস্যৈবাভিসর্পতঃ কদাচিত্, ততঃ স্নেহস্বেদাভ্যামস্য শির উপপাদ্য বিরেচযেদপামার্গতণ্ডুলাদিনা শিরোবিরেচনেন||২০||
यदि पुनरस्यातिप्रवृद्धाञ्छीर्षादान् क्रिमीन् मन्येत शिरस्यैवाभिसर्पतः कदाचित्, ततः स्नेहस्वेदाभ्यामस्य शिर उपपाद्य विरेचयेदपामार्गतण्डुलादिना शिरोविरेचनेन||२०||
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Adhikarana 16 (21) · Śloka 21
যস্ত্বভ্যবহার্যবিধিঃ প্রকৃতিবিঘাতাযোক্তঃ ক্রিমীণামথ তমনুব্যাখ্যাস্যামঃ- মূলকপর্ণীং সমূলাগ্রপ্রতানামাহৃত্য খণ্ডশশ্ছেদযিত্বোলূ(দূ)খলে ক্ষোদযিত্বা পাণিভ্যাং পীডযিত্বা রসং গৃহ্ণীযাত্, তেন রসেন লোহিতশালিতণ্ডুলপিষ্টং সমালোড্য পূপলিকাং কৃত্বা বিধূমেষ্বঙ্গারেষূপকুড্য বিডঙ্গতৈললবণোপহিতাং ক্রিমিকোষ্ঠায ভক্ষযিতুং প্রযচ্ছেত্, অনন্তরং চাম্লকাঞ্জিকমুদশ্বিদ্বা পিপ্পল্যাদিপঞ্চবর্গসংসৃষ্টং সলবণমনুপাযযেত্| অনেন কল্পেন মার্কবার্কসহচরনীপনির্গুণ্ডীসুমুখসুরসকুঠেরকগণ্ডীরকালমালকপর্ণাসক্ষবকফণিজ্ঝক- বকুলকুটজসুবর্ণক্ষীরীস্বরসানামন্যতমস্মিন্ কারযেত্ পূপলিকাঃ; তথা কিণিহীকিরাততিক্তকসুবহামলকহরীতকীবিভীতকস্বরসেষু কারযেত্ পূপলিকাঃ; স্বরসাংশ্চৈতেষামেকৈকশো দ্বন্দ্বশঃ সর্বশো বা মধুবিলুলিতান্ প্রাতরনন্নায পাতুং প্রযচ্ছেত্||২১||
यस्त्वभ्यवहार्यविधिः प्रकृतिविघातायोक्तः क्रिमीणामथ तमनुव्याख्यास्यामः- मूलकपर्णीं समूलाग्रप्रतानामाहृत्य खण्डशश्छेदयित्वोलू(दू)खले क्षोदयित्वा पाणिभ्यां पीडयित्वा रसं गृह्णीयात्, तेन रसेन लोहितशालितण्डुलपिष्टं समालोड्य पूपलिकां कृत्वा विधूमेष्वङ्गारेषूपकुड्य विडङ्गतैललवणोपहितां क्रिमिकोष्ठाय भक्षयितुं प्रयच्छेत्, अनन्तरं चाम्लकाञ्जिकमुदश्विद्वा पिप्पल्यादिपञ्चवर्गसंसृष्टं सलवणमनुपाययेत्| अनेन कल्पेन मार्कवार्कसहचरनीपनिर्गुण्डीसुमुखसुरसकुठेरकगण्डीरकालमालकपर्णासक्षवकफणिज्झक- बकुलकुटजसुवर्णक्षीरीस्वरसानामन्यतमस्मिन् कारयेत् पूपलिकाः; तथा किणिहीकिराततिक्तकसुवहामलकहरीतकीबिभीतकस्वरसेषु कारयेत् पूपलिकाः; स्वरसांश्चैतेषामेकैकशो द्वन्द्वशः सर्वशो वा मधुविलुलितान् प्रातरनन्नाय पातुं प्रयच्छेत्||२१||
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Adhikarana 17 (22) · Śloka 22
অথাশ্বশকৃদাহৃত্য মহতি কিলিঞ্জকে প্রস্তীর্যাতপে শোষযিত্বোদূখলে ক্ষোদযিত্বা দৃষদি পুনঃ সূক্ষ্মচূর্ণানি কারযিত্বা বিডঙ্গকষাযেণ ত্রিফলাকষাযেণ বাঽষ্টকৃত্বো দশকৃত্বো বাঽঽতপে সুপরিভাবিতানি ভাবযিত্বা দৃষদি পুনঃ সূক্ষ্মাণি চূর্ণানি কারযিত্বা নবে কলশে সমাবাপ্যানুগুপ্তং নিধাপযেত্| তেষাং তু খলু চূর্ণানাং পাণিতলং যাবদ্বা সাধু মন্যেত তত্ ক্ষৌদ্রেণ সংসৃজ্য ক্রিমিকোষ্ঠিনে লেঢুং প্রযচ্ছেত্||২২||
अथाश्वशकृदाहृत्य महति किलिञ्जके प्रस्तीर्यातपे शोषयित्वोदूखले क्षोदयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्मचूर्णानि कारयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिफलाकषायेण वाऽष्टकृत्वो दशकृत्वो वाऽऽतपे सुपरिभावितानि भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समावाप्यानुगुप्तं निधापयेत्| तेषां तु खलु चूर्णानां पाणितलं यावद्वा साधु मन्येत तत् क्षौद्रेण संसृज्य क्रिमिकोष्ठिने लेढुं प्रयच्छेत्||२२||
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Adhikarana 18 (23-24) · Śloka 24
তথা ভল্লাতকাস্থীন্যাহৃত্য কলশপ্রমাণেন চাপোথ্য স্নেহভাবিতে দৃঢে কলশে সূক্ষ্মানেকচ্ছিদ্রব্রধ্নে শরীরমুপবেষ্ট্য মৃদাবলিপ্তে সমাবাপ্যোডুপেন পিধায ভূমাবাকণ্ঠং নিখাতস্য স্নেহভাবিতস্যৈবান্যস্য দৃঢস্য কুম্ভস্যোপরি সমারোপ্য সমন্তাদ্গোমযৈরুপচিত্য দাহযেত্, স যদা জানীযাত্ সাধু দগ্ধানি গোমযানি বিগতস্নেহানি চ ভল্লাতকাস্থীনীতি ততস্তং কুম্ভমুদ্ধরেত্| অথ তস্মাদ্দ্বিতীযাত্ কুম্ভাত্ স্নেহমাদায বিডঙ্গতণ্ডুলচূর্ণৈঃ স্নেহার্ধমাত্রৈঃ প্রতিসংসৃজ্যাতপে সর্বমহঃ স্থাপযিত্বা ততোঽস্মৈ মাত্রাং প্রযচ্ছেত্ পানায; তেন সাধু বিরিচ্যতে, বিরিক্তস্য চানুপূর্বী যথোক্তা| এবমেব ভদ্রদারুসরলকাষ্ঠস্নেহানুপকল্প্য পাতুং প্রযচ্ছেত্||২৩|| অনুবাসযেচ্চৈনমনুবাসনকালে ||২৪||
तथा भल्लातकास्थीन्याहृत्य कलशप्रमाणेन चापोथ्य स्नेहभाविते दृढे कलशे सूक्ष्मानेकच्छिद्रब्रध्ने शरीरमुपवेष्ट्य मृदावलिप्ते समावाप्योडुपेन पिधाय भूमावाकण्ठं निखातस्य स्नेहभावितस्यैवान्यस्य दृढस्य कुम्भस्योपरि समारोप्य समन्ताद्गोमयैरुपचित्य दाहयेत्, स यदा जानीयात् साधु दग्धानि गोमयानि विगतस्नेहानि च भल्लातकास्थीनीति ततस्तं कुम्भमुद्धरेत्| अथ तस्माद्द्वितीयात् कुम्भात् स्नेहमादाय विडङ्गतण्डुलचूर्णैः स्नेहार्धमात्रैः प्रतिसंसृज्यातपे सर्वमहः स्थापयित्वा ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत् पानाय; तेन साधु विरिच्यते, विरिक्तस्य चानुपूर्वी यथोक्ता| एवमेव भद्रदारुसरलकाष्ठस्नेहानुपकल्प्य पातुं प्रयच्छेत्||२३|| अनुवासयेच्चैनमनुवासनकाले ||२४||
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Adhikarana 19 (25) · Śloka 25
অথাহরেতি ব্রূযাত্- শারদান্নবাংস্তিলান্ সম্পদুপেতান্; তানাহৃত্য সুনিষ্পূতান্নিষ্পূয, সুশুদ্ধান্ শোধযিত্বা , বিডঙ্গকষাযে সুখোষ্ণে প্রক্ষিপ্য নির্বাপযেদাদোষগমনাত্, গতদোষানভিসমীক্ষ্য, সুপ্রলূনান্ প্রলুঞ্চ্য, পুনরেব সুনিষ্পূতান্ নিষ্পূয, সুশুদ্ধান্ শোধযিত্বা, বিডঙ্গকষাযেণ ত্রিঃসপ্তকৃত্বঃ সুপরিভাবিতান্ ভাবযিত্বা, আতপে শোষযিত্বা, উলূ(দূ)খলে সঙ্ক্ষুদ্য, দৃষদি পুনঃ শ্লক্ষ্ণপিষ্টান্ কারযিত্বা, দ্রোণ্যামভ্যবধায, বিডঙ্গকষাযেণ মুহুর্মুহুরবসিঞ্চন্ পাণিমর্দমেব মর্দযেত্; তস্মিংস্তু খলু প্রপীড্যমানে যত্তৈলমুদিযাত্তত্ পাণিভ্যাং পর্যাদায, শুচৌ দৃঢে কলশে ন্যস্যানুগুপ্তং নিধাপযেত্||২৫||
अथाहरेति ब्रूयात्- शारदान्नवांस्तिलान् सम्पदुपेतान्; तानाहृत्य सुनिष्पूतान्निष्पूय, सुशुद्धान् शोधयित्वा , विडङ्गकषाये सुखोष्णे प्रक्षिप्य निर्वापयेदादोषगमनात्, गतदोषानभिसमीक्ष्य, सुप्रलूनान् प्रलुञ्च्य, पुनरेव सुनिष्पूतान् निष्पूय, सुशुद्धान् शोधयित्वा, विडङ्गकषायेण त्रिःसप्तकृत्वः सुपरिभावितान् भावयित्वा, आतपे शोषयित्वा, उलू(दू)खले सङ्क्षुद्य, दृषदि पुनः श्लक्ष्णपिष्टान् कारयित्वा, द्रोण्यामभ्यवधाय, विडङ्गकषायेण मुहुर्मुहुरवसिञ्चन् पाणिमर्दमेव मर्दयेत्; तस्मिंस्तु खलु प्रपीड्यमाने यत्तैलमुदियात्तत् पाणिभ्यां पर्यादाय, शुचौ दृढे कलशे न्यस्यानुगुप्तं निधापयेत्||२५||
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Adhikarana 20 (26-27) · Śloka 27
অথাহরেতি ব্রূযাত্- তিল্বকোদ্দালকযোর্দ্বৌ বিল্বমাত্রৌ পিণ্ডৌ শ্লক্ষ্ণপিষ্টৌ বিডঙ্গকষাযেণ, তদর্ধমাত্রৌ শ্যামাত্রিবৃতযোঃ, অতোঽর্ধমাত্রৌ দন্তীদ্রবন্ত্যোঃ, অতোঽর্ধমাত্রৌ চ চব্যচিত্রকযোরিতি| এতং সম্ভারং বিডঙ্গকষাযস্যার্ধাঢকমাত্রেণ প্রতিসংসৃজ্য, তত্তৈলপ্রস্থং সমাবাপ্য, সর্বমালোড্য, মহতি পর্যোগে সমাসিচ্যাগ্নাবধিশ্রিত্যাসনে সুখোপবিষ্টঃ সর্বতঃ স্নেহমবলোকযন্নজস্রং মৃদ্বগ্নিনা সাধযেদ্দর্ব্যা সততমবঘট্টযন্| স যদা জানীযাদ্বিরমতি শব্দঃ, প্রশাম্যতি চ ফেনঃ, প্রসাদমাপদ্যতে স্নেহঃ, যথাস্বং চ গন্ধবর্ণরসোত্পত্তিঃ, সংবর্ততে চ ভৈষজ্যমঙ্গুলিভ্যাং মৃদ্যমানমনতিমৃদ্বনতিদারুণমনঙ্গুলিগ্রাহি চেতি, স কালস্তস্যাবতারণায| ততস্তমবতার্য শীতীভূতমহতেন বাসসা পরিপূয, শুচৌ দৃঢে কলশে সমাসিচ্য, পিধানেন পিধায, শুক্লেন বস্ত্রপট্টেনাবচ্ছাদ্য, সূত্রেণ সুবদ্ধং সুনিগুপ্তং নিধাপযেত্| ততোঽস্মৈ মাত্রাং প্রযচ্ছেত্ পানায, তেন সাধু বিরিচ্যতে; সম্যগপহৃতদোষস্য চানুপূর্বী যথোক্তা| ততশ্চৈনমনুবাসযেদনুবাসনকালে| এতেনৈব চ পাকবিধিনা সর্ষপাতসীকরঞ্জকোষাতকীস্নেহানুপকল্প্য পাযযেত্ সর্ববিশেষানবেক্ষমাণঃ| তেনাগদো ভবতি||২৬|| এবং দ্বযানাং শ্লেষ্মপুরীষসম্ভবানাং ক্রিমীণাং সমুত্থানসংস্থানবর্ণনামপ্রভাবচিকিত্সিতবিশেষা ব্যাখ্যাতাঃ সামান্যতঃ| বিশেষতস্তু স্বল্পমাত্রমাস্থাপনানুবাসনানুলোমহরণভূযিষ্ঠং তেষ্বেবৌষধেষু পুরীষজানাং ক্রিমীণাং চিকিত্সিতং কর্তব্যং, মাত্রাধিকং পুনঃ শিরোবিরেচনবমনোপশমনভূযিষ্ঠং তেষ্বেবৌষধেষু শ্লেষ্মজানাং ক্রিমীণাং চিকিত্সিতং কার্যম্; ইত্যেষ ক্রিমিঘ্নো ভেষজবিধিরনুব্যাখ্যাতো ভবতি| তমনুতিষ্ঠতা যথাস্বং হেতুবর্জনে প্রযতিতব্যম্| যথোদ্দেশমেবমিদং ক্রিমিকোষ্ঠচিকিত্সিতং যথাবদনুব্যাখ্যাতং ভবতি||২৭||
अथाहरेति ब्रूयात्- तिल्वकोद्दालकयोर्द्वौ बिल्वमात्रौ पिण्डौ श्लक्ष्णपिष्टौ विडङ्गकषायेण, तदर्धमात्रौ श्यामात्रिवृतयोः, अतोऽर्धमात्रौ दन्तीद्रवन्त्योः, अतोऽर्धमात्रौ च चव्यचित्रकयोरिति| एतं सम्भारं विडङ्गकषायस्यार्धाढकमात्रेण प्रतिसंसृज्य, तत्तैलप्रस्थं समावाप्य, सर्वमालोड्य, महति पर्योगे समासिच्याग्नावधिश्रित्यासने सुखोपविष्टः सर्वतः स्नेहमवलोकयन्नजस्रं मृद्वग्निना साधयेद्दर्व्या सततमवघट्टयन्| स यदा जानीयाद्विरमति शब्दः, प्रशाम्यति च फेनः, प्रसादमापद्यते स्नेहः, यथास्वं च गन्धवर्णरसोत्पत्तिः, संवर्तते च भैषज्यमङ्गुलिभ्यां मृद्यमानमनतिमृद्वनतिदारुणमनङ्गुलिग्राहि चेति, स कालस्तस्यावतारणाय| ततस्तमवतार्य शीतीभूतमहतेन वाससा परिपूय, शुचौ दृढे कलशे समासिच्य, पिधानेन पिधाय, शुक्लेन वस्त्रपट्टेनावच्छाद्य, सूत्रेण सुबद्धं सुनिगुप्तं निधापयेत्| ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत् पानाय, तेन साधु विरिच्यते; सम्यगपहृतदोषस्य चानुपूर्वी यथोक्ता| ततश्चैनमनुवासयेदनुवासनकाले| एतेनैव च पाकविधिना सर्षपातसीकरञ्जकोषातकीस्नेहानुपकल्प्य पाययेत् सर्वविशेषानवेक्षमाणः| तेनागदो भवति||२६|| एवं द्वयानां श्लेष्मपुरीषसम्भवानां क्रिमीणां समुत्थानसंस्थानवर्णनामप्रभावचिकित्सितविशेषा व्याख्याताः सामान्यतः| विशेषतस्तु स्वल्पमात्रमास्थापनानुवासनानुलोमहरणभूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु पुरीषजानां क्रिमीणां चिकित्सितं कर्तव्यं, मात्राधिकं पुनः शिरोविरेचनवमनोपशमनभूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु श्लेष्मजानां क्रिमीणां चिकित्सितं कार्यम्; इत्येष क्रिमिघ्नो भेषजविधिरनुव्याख्यातो भवति| तमनुतिष्ठता यथास्वं हेतुवर्जने प्रयतितव्यम्| यथोद्देशमेवमिदं क्रिमिकोष्ठचिकित्सितं यथावदनुव्याख्यातं भवति||२७||
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Adhikarana 21 (28-32) · Śloka 32
ভবন্তি চাত্র- অপকর্ষণমেবাদৌ ক্রিমীণাং ভেষজং স্মৃতম্| ততো বিঘাতঃ প্রকৃতের্নিদানস্য চ বর্জনম্||২৮|| অযমেব বিকারাণাং সর্বেষামপি নিগ্রহে| বিধির্দৃষ্টস্ত্রিধা যোঽযং ক্রিমীনুদ্দিশ্য কীর্তিতঃ||২৯|| সংশোধনং সংশমনং নিদানস্য চ বর্জনম্| এতাবদ্ভিষজা কার্যং রোগে রোগে যথাবিধি||৩০|| তত্র শ্লোকৌ- ব্যাধিতৌ পুরুষৌ জ্ঞাজ্ঞৌ ভিষজৌ সপ্রযোজনৌ| বিংশতিঃ ক্রিমযস্তেষাং হেত্বাদিঃ সপ্তকো গণঃ||৩১|| উক্তো ব্যাধিতরূপীযে বিমানে পরমর্ষিণা| শিষ্যসম্বোধনার্থায ব্যাধিপ্রশমনায চ||৩২||
भवन्ति चात्र- अपकर्षणमेवादौ क्रिमीणां भेषजं स्मृतम्| ततो विघातः प्रकृतेर्निदानस्य च वर्जनम्||२८|| अयमेव विकाराणां सर्वेषामपि निग्रहे| विधिर्दृष्टस्त्रिधा योऽयं क्रिमीनुद्दिश्य कीर्तितः||२९|| संशोधनं संशमनं निदानस्य च वर्जनम्| एतावद्भिषजा कार्यं रोगे रोगे यथाविधि||३०|| तत्र श्लोकौ- व्याधितौ पुरुषौ ज्ञाज्ञौ भिषजौ सप्रयोजनौ| विंशतिः क्रिमयस्तेषां हेत्वादिः सप्तको गणः||३१|| उक्तो व्याधितरूपीये विमाने परमर्षिणा| शिष्यसम्बोधनार्थाय व्याधिप्रशमनाय च||३२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 7
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে বিমানস্থানে ব্যাধিতরূপীযবিমানং নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ||৭||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने व्याधितरूपीयविमानं नाम सप्तमोऽध्यायः||७||
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