Adhikarana shUkadoShanidAnam (1) · Śloka 1
অথ শূকদোষনিদানম্ |
অক্রমাচ্ছেফসো বৃদ্ধিং যোঽভিবাঞ্ছতি মূঢধীঃ |
ব্যাধযস্তস্য জাযন্তে দশ চাষ্টৌ চ শূকজাঃ ||১||
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अथ शूकदोषनिदानम् |
अक्रमाच्छेफसो वृद्धिं योऽभिवाञ्छति मूढधीः |
व्याधयस्तस्य जायन्ते दश चाष्टौ च शूकजाः ||१||
Adhikarana sarShapikAlakShaNam (2) · Śloka 2
গৌরসর্ষপসংস্থানা শূকদুর্ভুগ্নহেতুকা |
পিডকা শ্লেষ্মবাতাভ্যাং জ্ঞেযা সর্ষপিকা তু সা ||২||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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गौरसर्षपसंस्थाना शूकदुर्भुग्नहेतुका |
पिडका श्लेष्मवाताभ्यां ज्ञेया सर्षपिका तु सा ||२||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana aShThIlikAlakShaNam (3) · Śloka 3
কঠিনা বিষমৈর্ভুগ্নৈর্বাযুনাঽষ্ঠীলিকা ভবেত্ |৩|
(সু. নি. অ. ১৪) |
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कठिना विषमैर्भुग्नैर्वायुनाऽष्ठीलिका भवेत् |३|
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana grathitalakShaNam (3) · Śloka 3
শূকৈর্যত্ পূরিতং শশ্বদ্গ্রথিতং নাম তত্ কফাত্ ||৩||
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शूकैर्यत् पूरितं शश्वद्ग्रथितं नाम तत् कफात् ||३||
Adhikarana kumbhikAlakShaNam (4) · Śloka 4
কুম্ভিকা রক্তপিত্তোত্থা জাম্ববাস্থিনিভাঽশুভা |৪|
(সু. নি. অ. ১৪) |
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कुम्भिका रक्तपित्तोत्था जाम्बवास्थिनिभाऽशुभा |४|
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana alajIlakShaNam (4) · Śloka 4
তুল্যজাং ত্বলজীং বিদ্যাদ্যথাপ্রোক্তাং বিচক্ষণঃ ||৪||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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तुल्यजां त्वलजीं विद्याद्यथाप्रोक्तां विचक्षणः ||४||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana mRuditalakShaNam (5) · Śloka 5
মৃদিতং পীডিতং যচ্চ সংরব্ধং বাতকোপতঃ |৫|
(সু. নি. অ. ১৪) |
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मृदितं पीडितं यच्च संरब्धं वातकोपतः |५|
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana sammUDhapiDakAlakShaNam (5) · Śloka 5
পাণিভ্যাং ভৃশসম্মূঢে সম্মূঢপিডকা ভবেত্ ||৫||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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पाणिभ्यां भृशसम्मूढे सम्मूढपिडका भवेत् ||५||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana adhimanthalakShaNam (6) · Śloka 6
দীর্ঘা বহ্ব্যশ্চ পিডকা দীর্যন্তে মধ্যতস্তু যাঃ |
সোঽধিমন্থঃ কফাসৃগ্ভ্যাং বেদনারোমহর্ষকৃত্ ||৬||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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दीर्घा बह्व्यश्च पिडका दीर्यन्ते मध्यतस्तु याः |
सोऽधिमन्थः कफासृग्भ्यां वेदनारोमहर्षकृत् ||६||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana puShkarikAlakShaNam (7) · Śloka 7
পিডকা পিডকাব্যাপ্তা পিত্তশোণিতসম্ভবা |
পদ্মকর্ণিকসংস্থানা জ্ঞেযা পুষ্করিকা তু সা ||৭||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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पिडका पिडकाव्याप्ता पित्तशोणितसम्भवा |
पद्मकर्णिकसंस्थाना ज्ञेया पुष्करिका तु सा ||७||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana sparshahAnilakShaNam (8) · Śloka 8
স্পর্শহানিং তু জনযেচ্ছোণিতং শূকদূষিতম্ |৮|
(সু. নি. অ. ১৪) |
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स्पर्शहानिं तु जनयेच्छोणितं शूकदूषितम् |८|
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana uttamAlakShaNam (8) · Śloka 8
মুদ্গমাষোপমা রক্তা রক্তপিত্তোদ্ভবা তু যা ||৮||
ব্যাধিরেষোত্তমা নাম শূকাজীর্ণনিমিত্তজা |
(সু. নি. অ. ১৪) |
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मुद्गमाषोपमा रक्ता रक्तपित्तोद्भवा तु या ||८||
व्याधिरेषोत्तमा नाम शूकाजीर्णनिमित्तजा |
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana shataponakalakShaNam (9) · Śloka 11
ছিদ্রৈরণুমুখৈর্লিঙ্গং চিতং যস্য সমন্ততঃ ||৯||
বাতশোণিতজো ব্যাধিঃ স জ্ঞেযঃ শতপোনকঃ |
(সু. নি. ১৪) ||১১||
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छिद्रैरणुमुखैर्लिङ्गं चितं यस्य समन्ततः ||९||
वातशोणितजो व्याधिः स ज्ञेयः शतपोनकः |
(सु. नि. १४) ||११||
Adhikarana tvakpAkalakShaNam (10) · Śloka 10
বাতপিত্তকৃতো জ্ঞেযস্ত্বক্পাকো জ্বরদাহকৃত্ ||১০||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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वातपित्तकृतो ज्ञेयस्त्वक्पाको ज्वरदाहकृत् ||१०||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana shoNitArbudalakShaNam (11) · Śloka 11
কৃষ্ণৈঃ স্ফোটৈঃ সরক্তাভিঃ পিডকাভির্নিপীডিতম্ |
যস্য বাস্তুরুজশ্চোগ্রা জ্ঞেযং তচ্ছোণিতার্বুদম্ ||১১||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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कृष्णैः स्फोटैः सरक्ताभिः पिडकाभिर्निपीडितम् |
यस्य वास्तुरुजश्चोग्रा ज्ञेयं तच्छोणितार्बुदम् ||११||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana mAMsArbudalakShaNam (12) · Śloka 12
মাংসদোষেণ জানীযাদর্বুদং মাংসসম্ভবম্ |১২|
(সু. নি. অ. ১৪) |
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मांसदोषेण जानीयादर्बुदं मांससम्भवम् |१२|
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana mAMsapAkalakShaNam (12) · Śloka 12
শীর্যন্তে যস্য মাংসানি যস্য সর্বাশ্চ বেদনাঃ ||১২||
বিদ্যাত্তং মাংসপাকং তু সর্বদোষকৃতং ভিষক্ |
(সু. নি. অ. ১৪) |
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शीर्यन्ते यस्य मांसानि यस्य सर्वाश्च वेदनाः ||१२||
विद्यात्तं मांसपाकं तु सर्वदोषकृतं भिषक् |
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana vidradhilakShaNam (13) · Śloka 13
বিদ্রধিং সন্নিপাতেন যথোক্তমিতি নির্দিশেত্ ||১৩||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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विद्रधिं सन्निपातेन यथोक्तमिति निर्दिशेत् ||१३||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana tilakAlakalakShaNam (14-15) · Śloka 15
কৃষ্ণানি চিত্রাণ্যথবা শূকানি সবিষাণি বা |
পাতিতানি পচন্ত্যাশু মেঢ্রং নিরবশেষতঃ ||১৪||
কালানি ভূত্বা মাংসানি শীর্যন্তে যস্য দেহিনঃ |
সন্নিপাতসমুত্থাংস্তু তান্ বিদ্যাত্তিলকালকান্ ||১৫||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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कृष्णानि चित्राण्यथवा शूकानि सविषाणि वा |
पातितानि पचन्त्याशु मेढ्रं निरवशेषतः ||१४||
कालानि भूत्वा मांसानि शीर्यन्ते यस्य देहिनः |
सन्निपातसमुत्थांस्तु तान् विद्यात्तिलकालकान् ||१५||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana shUkadoShANAM sAdhyAsAdhyavicAraH (16) · Śloka 16
তত্র মাংসার্বুদং যচ্চ মাংসপাকশ্চ যঃ স্মৃতঃ |
বিদ্রধিশ্চ ন সিদ্ধ্যন্তি যে চ স্যুস্তিলকালকাঃ ||১৬||
(সু. নি. অ. ১৪) |
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तत्र मांसार्बुदं यच्च मांसपाकश्च यः स्मृतः |
विद्रधिश्च न सिद्ध्यन्ति ये च स्युस्तिलकालकाः ||१६||
(सु. नि. अ. १४) |
Adhikarana puShpikA · Śloka 48
ইতি শ্রীমাধবকরবিরচিতে মাধবনিদানে শূকদোষনিদানং সমাপ্তম্ ||৪৮||
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इति श्रीमाधवकरविरचिते माधवनिदाने शूकदोषनिदानं समाप्तम् ||४८||