Adhikarana shukravat sarvadehaM stanyasyAshrayam (1) · Śloka 1
অথ স্তন্যদুষ্টিনিদানম্ |
বিশংস্তেষ্বপি গাত্রেষু যথা শুক্রং ন দৃশ্যতে |
সর্বদেহাশ্রিতত্বাচ্চ শুক্রলক্ষণমুচ্যতে ||১||
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अथ स्तन्यदुष्टिनिदानम् |
विशंस्तेष्वपि गात्रेषु यथा शुक्रं न दृश्यते |
सर्वदेहाश्रितत्वाच्च शुक्रलक्षणमुच्यते ||१||
Adhikarana shukravat stanyapravRuttiH (2-3) · Śloka 3
তদেব চেষ্টযুবতের্দর্শনাত্ স্মরণাদপি |
শব্দসংশ্রবণাত্ স্পর্শাত্ সংহর্ষাচ্চ প্রবর্ততে ||২||
সুপ্রসন্নং মনস্তত্র হর্ষণে হেতুরুচ্যতে |
আহাররসযোনিত্বাদেবং স্তন্যমপি স্ত্রিযাঃ ||৩||
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तदेव चेष्टयुवतेर्दर्शनात् स्मरणादपि |
शब्दसंश्रवणात् स्पर्शात् संहर्षाच्च प्रवर्तते ||२||
सुप्रसन्नं मनस्तत्र हर्षणे हेतुरुच्यते |
आहाररसयोनित्वादेवं स्तन्यमपि स्त्रियाः ||३||
Adhikarana stanyapravRutau hetuH (4) · Śloka 4
তদেবাপত্যসংস্পর্শাদ্দর্শনাত্ স্মরণাদপি |
গ্রহণাচ্চ শরীরস্য শুক্রবত্ সম্প্রবর্ততে |
স্নেহো নিরন্তরস্তত্র প্রস্রবে হেতুরুচ্যতে ||৪||
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तदेवापत्यसंस्पर्शाद्दर्शनात् स्मरणादपि |
ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत् सम्प्रवर्तते |
स्नेहो निरन्तरस्तत्र प्रस्रवे हेतुरुच्यते ||४||
Adhikarana kShIraduShTikAraNaM, duShTastanyAdbAlAnAM nAnArogotpattishca (5) · Śloka 5
গুরুভির্বিবিধৈরন্নৈর্দুষ্টৈর্দোষৈঃ প্রদূষিতম্ |
ক্ষীরং মাতুঃ কুমারস্য নানারোগায কল্পতে ||৫||
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गुरुभिर्विविधैरन्नैर्दुष्टैर्दोषैः प्रदूषितम् |
क्षीरं मातुः कुमारस्य नानारोगाय कल्पते ||५||
Adhikarana vAtAdidUShitastanyalakShaNam (6-7) · Śloka 7
কষাযং সলিলপ্লাবি স্তন্যং মারুতদূষিতম্ |
কট্বম্ললবণং পীতরাজীমত্ পিত্তসঞ্জ্ঞিতম্ ||৬||
কফদুষ্টং ঘনং তোযে নিমজ্জতি সপিচ্ছলম্ |
দ্বিলিঙ্গং দ্বন্দ্বজং বিদ্যাত্ সর্বলিঙ্গং ত্রিদোষজম্ ||৭||
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कषायं सलिलप्लावि स्तन्यं मारुतदूषितम् |
कट्वम्ललवणं पीतराजीमत् पित्तसञ्ज्ञितम् ||६||
कफदुष्टं घनं तोये निमज्जति सपिच्छलम् |
द्विलिङ्गं द्वन्द्वजं विद्यात् सर्वलिङ्गं त्रिदोषजम् ||७||
Adhikarana avikRutastanyalakShaNam (8) · Śloka 8
অদুষ্টং চাম্বুনিক্ষিপ্তমেকীভবতি পাণ্ডুরম্ |
মধুরং চাবিবর্ণং চ প্রসন্নং তত্ প্রশস্যতে ||৮||
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अदुष्टं चाम्बुनिक्षिप्तमेकीभवति पाण्डुरम् |
मधुरं चाविवर्णं च प्रसन्नं तत् प्रशस्यते ||८||
Adhikarana puShpikA · Śloka 67
ইতি শ্রীমাধবকরবিরচিতে মাধবনিদানে স্তন্যদুষ্টিনিদানং সমাপ্তম্ ||৬৭||
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इति श्रीमाधवकरविरचिते माधवनिदाने स्तन्यदुष्टिनिदानं समाप्तम् ||६७||