Adhikarana 1 (1-4) · Śloka 4
অথাতঃ ক্ষুদ্ররোগচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
তত্রাজগল্লিকামামাং জলৌকোভিরুপাচরেত্ |
শুক্তিশ্রুঘ্নীযবক্ষারকল্কৈশ্চালেপযেদ্ভিষক্ ||৩||
শ্যামালাঙ্গলকিপাঠাকল্কৈর্বাঽপি বিচক্ষণঃ |
পক্বাং ব্রণবিধানেন যথোক্তেন প্রসাধযেত্ ||৪||
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अथातः क्षुद्ररोगचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
तत्राजगल्लिकामामां जलौकोभिरुपाचरेत् |
शुक्तिश्रुघ्नीयवक्षारकल्कैश्चालेपयेद्भिषक् ||३||
श्यामालाङ्गलकिपाठाकल्कैर्वाऽपि विचक्षणः |
पक्वां व्रणविधानेन यथोक्तेन प्रसाधयेत् ||४||
Adhikarana 2 (5-6) · Śloka 6
অন্ধালজীং যবপ্রখ্যাং পনসীং কচ্ছপীং তথা |
পাষাণগর্দভং চৈব পূর্বং স্বেদেন যোজযেত্ ||৫||
মনঃশিলাতালকুষ্ঠদারুকল্কৈঃ প্রলেপযেত্ |
পরিপাকগতান্ ভিত্ত্বা ব্রণবত্ সমুপাচরেত্ ||৬||
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अन्धालजीं यवप्रख्यां पनसीं कच्छपीं तथा |
पाषाणगर्दभं चैव पूर्वं स्वेदेन योजयेत् ||५||
मनःशिलातालकुष्ठदारुकल्कैः प्रलेपयेत् |
परिपाकगतान् भित्त्वा व्रणवत् समुपाचरेत् ||६||
Adhikarana 3 (7-8) · Śloka 8
বিবৃতামিন্দ্রবৃদ্ধাং চ গর্দভীং জালগর্দভম্ |
ইরিবেল্লীং গন্ধনাম্নীং কক্ষাং বিস্ফোটকাংস্তথা ||৭||
পিত্তজস্য বিসর্পস্য ক্রিযযা সাধযেদ্ভিষক্ |
রোপযেত্ সর্পিষা পক্বান্ সিদ্ধেন মধুরৌষধৈঃ ||৮||
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विवृतामिन्द्रवृद्धां च गर्दभीं जालगर्दभम् |
इरिवेल्लीं गन्धनाम्नीं कक्षां विस्फोटकांस्तथा ||७||
पित्तजस्य विसर्पस्य क्रियया साधयेद्भिषक् |
रोपयेत् सर्पिषा पक्वान् सिद्धेन मधुरौषधैः ||८||
Adhikarana 4 (9-11) · Śloka 11
চিপ্য(প্প)মুষ্ণাম্বুনা সিক্তমুত্কৃত্য স্রাবযেদ্ভিষক্ |
চক্রতৈলেন চাভ্যজ্য সর্জচূর্ণেন চূর্ণযেত্ ||৯||
বন্ধেনোপচরেচ্চৈনমশক্যং চাগ্নিনা দহেত্ |
মধুরৌষধসিদ্ধেন ততস্তৈলেন রোপযেত্ ||১০||
কুনখে বিধিরপ্যেষ কার্যো হি ভিষজা ভবেত্ |
উপাচরেদনুশযীং শ্লেষ্মবিদ্রধিবদ্ভিষক্ ||১১||
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चिप्य(प्प)मुष्णाम्बुना सिक्तमुत्कृत्य स्रावयेद्भिषक् |
चक्रतैलेन चाभ्यज्य सर्जचूर्णेन चूर्णयेत् ||९||
बन्धेनोपचरेच्चैनमशक्यं चाग्निना दहेत् |
मधुरौषधसिद्धेन ततस्तैलेन रोपयेत् ||१०||
कुनखे विधिरप्येष कार्यो हि भिषजा भवेत् |
उपाचरेदनुशयीं श्लेष्मविद्रधिवद्भिषक् ||११||
Adhikarana 5 (12-16) · Śloka 16
বিদারিকাং সমভ্যজ্য স্বিন্নাং বিম্লাপ্য লেপযেত্ |
নগবৃত্তিকবর্ষাভূবিল্বমূলৈঃ সুপেষিতৈঃ ||১২||
ব্রণভাবগতাযাং বা কৃত্বা সংশোধনক্রিযাম্ |
রোপণার্থং হিতং তৈলং কষাযমধুরৈঃ শৃতম্ ||১৩||
প্রচ্ছানৈর্বা জলৌকোভিঃ স্রাব্যাঽপক্বা বিদারিকা |
অজকর্ণৈঃ সপালাশমূলকল্কৈঃ প্রলেপযেত্ ||১৪||
পক্বাং বিদার্য শস্ত্রেণ পটোলপিচুমর্দযোঃ |
কল্কেন তিলযুক্তেন সর্পির্মিশ্রেণ লেপযেত্ ||১৫||
বদ্ধ্বা চ ক্ষীরবৃক্ষস্য কষাযৈঃ খদিরস্য চ |
ব্রণং প্রক্ষালযেচ্ছুদ্ধাং ততস্তাং রোপযেত্ পুনঃ ||১৬||
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विदारिकां समभ्यज्य स्विन्नां विम्लाप्य लेपयेत् |
नगवृत्तिकवर्षाभूबिल्वमूलैः सुपेषितैः ||१२||
व्रणभावगतायां वा कृत्वा संशोधनक्रियाम् |
रोपणार्थं हितं तैलं कषायमधुरैः शृतम् ||१३||
प्रच्छानैर्वा जलौकोभिः स्राव्याऽपक्वा विदारिका |
अजकर्णैः सपालाशमूलकल्कैः प्रलेपयेत् ||१४||
पक्वां विदार्य शस्त्रेण पटोलपिचुमर्दयोः |
कल्केन तिलयुक्तेन सर्पिर्मिश्रेण लेपयेत् ||१५||
बद्ध्वा च क्षीरवृक्षस्य कषायैः खदिरस्य च |
व्रणं प्रक्षालयेच्छुद्धां ततस्तां रोपयेत् पुनः ||१६||
Adhikarana 6 (17-18) · Śloka 19
মেদোঽর্বুদবিধানেন সাধযেচ্ছর্করার্বুদম্ |
কচ্ছূং বিচর্চিকাং পামাং কুষ্ঠবত্ সমুপাচরেত্ ||১৭||
লেপশ্চ শস্যতে সিক্থশতাহ্বাগৌরসর্ষপৈঃ |
বচাদার্বীসর্ষপৈর্বা তৈলং বা নক্তমালজম্ ||১৮||
সারতৈলমথাভ্যঙ্গে কুর্বীত কটুকৈঃ শৃতম্ |১৯|
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मेदोऽर्बुदविधानेन साधयेच्छर्करार्बुदम् |
कच्छूं विचर्चिकां पामां कुष्ठवत् समुपाचरेत् ||१७||
लेपश्च शस्यते सिक्थशताह्वागौरसर्षपैः |
वचादार्वीसर्षपैर्वा तैलं वा नक्तमालजम् ||१८||
सारतैलमथाभ्यङ्गे कुर्वीत कटुकैः शृतम् |१९|
Adhikarana 7 (19-20) · Śloka 20
পাদদার্যাং সিরাং বিদ্ধ্বা স্বেদাভ্যঙ্গৌ প্রযোজযেত্ ||১৯||
মধূচ্ছিষ্টবসামজ্জসর্জচূর্ণঘৃতৈঃ কৃতঃ |
যবাহ্বগৈরিকোন্মিশ্রৈঃ পাদলেপঃ প্রশস্যতে ||২০||
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पाददार्यां सिरां विद्ध्वा स्वेदाभ्यङ्गौ प्रयोजयेत् ||१९||
मधूच्छिष्टवसामज्जसर्जचूर्णघृतैः कृतः |
यवाह्वगैरिकोन्मिश्रैः पादलेपः प्रशस्यते ||२०||
Adhikarana 8 (21-22) · Śloka 23
পাদৌ সিক্ত্বাঽঽরনালেন লেপনং হ্যলসে হিতম্ |
কল্কীকৃতৈর্নিম্বতিলকাসীসালৈঃ সসৈন্ধবৈঃ ||২১||
লাক্ষারসোঽভযা বাঽপি কার্যং স্যাদ্রক্তমোক্ষণম্ |
সিদ্ধং রসে কণ্টকার্যাস্তৈলং বা সার্ষপং হিতম্ ||২২||
কাসীসরোচনশিলাচূর্ণৈর্বা প্রতিসারণম্ |২৩|
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पादौ सिक्त्वाऽऽरनालेन लेपनं ह्यलसे हितम् |
कल्कीकृतैर्निम्बतिलकासीसालैः ससैन्धवैः ||२१||
लाक्षारसोऽभया वाऽपि कार्यं स्याद्रक्तमोक्षणम् |
सिद्धं रसे कण्टकार्यास्तैलं वा सार्षपं हितम् ||२२||
कासीसरोचनशिलाचूर्णैर्वा प्रतिसारणम् |२३|
Adhikarana 9 (23) · Śloka 23
উত্কৃত্য দগ্ধ্বা স্নেহেন জযেত্ কদরসঞ্জ্ঞকম্ ||২৩||
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उत्कृत्य दग्ध्वा स्नेहेन जयेत् कदरसञ्ज्ञकम् ||२३||
Adhikarana 10 (24-26) · Śloka 27
ইন্দ্রলুপ্তে সিরাং মূর্ধ্নি স্নিগ্ধস্বিন্নস্য মোক্ষযেত্ |
কল্কৈঃ সমরিচৈর্দিহ্যাচ্ছিলাকাসীসতুত্থকৈঃ ||২৪||
কুটন্নটদারুকল্কৈর্লেপনং বা প্রশস্যতে |
প্রচ্ছযিত্বাঽবগাঢং বা গুঞ্জাকল্কৈর্মুহুর্মুহুঃ ||২৫||
লেপযেদুপশান্ত্যর্থং কুর্যাদ্বাঽপি রসাযনম্ |
মালতীকরবীরাগ্নিনক্তমালবিপাচিতম্ ||২৬||
তৈলমভ্যঞ্জনে শস্তমিন্দ্রলুপ্তাপহং পরম্ |২৭|
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इन्द्रलुप्ते सिरां मूर्ध्नि स्निग्धस्विन्नस्य मोक्षयेत् |
कल्कैः समरिचैर्दिह्याच्छिलाकासीसतुत्थकैः ||२४||
कुटन्नटदारुकल्कैर्लेपनं वा प्रशस्यते |
प्रच्छयित्वाऽवगाढं वा गुञ्जाकल्कैर्मुहुर्मुहुः ||२५||
लेपयेदुपशान्त्यर्थं कुर्याद्वाऽपि रसायनम् |
मालतीकरवीराग्निनक्तमालविपाचितम् ||२६||
तैलमभ्यञ्जने शस्तमिन्द्रलुप्तापहं परम् |२७|
Adhikarana 11 (27-28) · Śloka 30
অরূংষিকাং হৃতে রক্তে সেচযেন্নিম্ববারিণা ||২৭||
দিহ্যাত্ সৈন্ধবযুক্তেন বাজিবিষ্ঠারসেন তু |
হরিতালনিশানিম্বকল্কৈর্বা সপটোলজৈঃ ||২৮||
যষ্টীনীলোত্পলৈরণ্ডমার্কবৈর্বা প্রলেপযেত্ |
ইন্দ্রলুপ্তাপহং তৈলমভ্যঙ্গে চ প্রশস্যতে |৩০|
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अरूंषिकां हृते रक्ते सेचयेन्निम्बवारिणा ||२७||
दिह्यात् सैन्धवयुक्तेन वाजिविष्ठारसेन तु |
हरितालनिशानिम्बकल्कैर्वा सपटोलजैः ||२८||
यष्टीनीलोत्पलैरण्डमार्कवैर्वा प्रलेपयेत् |
इन्द्रलुप्तापहं तैलमभ्यङ्गे च प्रशस्यते |३०|
Adhikarana 12 (29-30) · Śloka 30
সিরাং দারুণকে বিদ্ধ্বা স্নিগ্ধস্বিন্নস্য মূর্ধনি ||২৯||
অবপীডং শিরোবস্তিমভ্যঙ্গং চ প্রযোজযেত্ |
ক্ষালনে কোদ্রবতৃণক্ষারতোযং প্রশস্যতে ||৩০||
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सिरां दारुणके विद्ध्वा स्निग्धस्विन्नस्य मूर्धनि ||२९||
अवपीडं शिरोबस्तिमभ्यङ्गं च प्रयोजयेत् |
क्षालने कोद्रवतृणक्षारतोयं प्रशस्यते ||३०||
Adhikarana 13 (31) · Śloka 31
উপরিষ্টাত্ প্রবক্ষ্যামি বিধিং পলিতনাশনম্ |৩১|
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उपरिष्टात् प्रवक्ष्यामि विधिं पलितनाशनम् |३१|
Adhikarana 14 (31) · Śloka 32
মসূরিকাযাং কুষ্ঠঘ্নলেপনাদিক্রিযা হিতা ||৩১||
পিত্তশ্লেষ্মবিসর্পোক্তা ক্রিযা বা সম্প্রশস্যতে |৩২|
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मसूरिकायां कुष्ठघ्नलेपनादिक्रिया हिता ||३१||
पित्तश्लेष्मविसर्पोक्ता क्रिया वा सम्प्रशस्यते |३२|
Adhikarana 15 (32) · Śloka 33
জতুমণিং সমুত্কৃত্য মষকং তিলকালকম্ ||৩২||
ক্ষারেণ প্রদহেদ্যুক্ত্যা বহ্নিনা বা শনৈঃ শনৈঃ |৩৩|
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जतुमणिं समुत्कृत्य मषकं तिलकालकम् ||३२||
क्षारेण प्रदहेद्युक्त्या वह्निना वा शनैः शनैः |३३|
Adhikarana 16 (33-36) · Śloka 36
ন্যচ্ছেব্যঙ্গে সিরামোক্ষো নীলিকাযাং চ শস্যতে ||৩৩||
যথান্যাযং যথাভ্যাসং লালাট্যাদিসিরাব্যধঃ |
ঘৃষ্ট্বা দিহ্যাত্ত্বচং পিষ্ট্বা ক্ষীরিণাং ক্ষীরসংযুতাম্ ||৩৪||
বলাতিবলযষ্ট্যাহ্বরজনীর্বা প্রলেপনম্ |
পযস্যাগুরুকালীযলেপনং বা সগৈরিকম্ ||৩৫||
ক্ষৌদ্রাজ্যযুক্তযা লিম্পেদ্দংষ্ট্রযা শূকরস্য চ |
কপিত্থরাজাদনযোঃ কল্কং বা হিতমুচ্যতে ||৩৬||
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न्यच्छेव्यङ्गे सिरामोक्षो नीलिकायां च शस्यते ||३३||
यथान्यायं यथाभ्यासं लालाट्यादिसिराव्यधः |
घृष्ट्वा दिह्यात्त्वचं पिष्ट्वा क्षीरिणां क्षीरसंयुताम् ||३४||
बलातिबलयष्ट्याह्वरजनीर्वा प्रलेपनम् |
पयस्यागुरुकालीयलेपनं वा सगैरिकम् ||३५||
क्षौद्राज्ययुक्तया लिम्पेद्दंष्ट्रया शूकरस्य च |
कपित्थराजादनयोः कल्कं वा हितमुच्यते ||३६||
Adhikarana 17 (37) · Śloka 38
যৌবনে পিডকাস্বেষ বিশেষাচ্ছর্দনং হিতম্ |
লেপনং চ বচারোধ্রসৈন্ধবৈঃ সর্ষপান্বিতৈঃ ||৩৭||
কুস্তুম্বুরুবচালোধ্রকুষ্ঠৈর্বা লেপনং হিতম্ |৩৮|
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यौवने पिडकास्वेष विशेषाच्छर्दनं हितम् |
लेपनं च वचारोध्रसैन्धवैः सर्षपान्वितैः ||३७||
कुस्तुम्बुरुवचालोध्रकुष्ठैर्वा लेपनं हितम् |३८|
Adhikarana 18 (38-39) · Śloka 39
পদ্মিনীকণ্টকে রোগে ছর্দযেন্নিম্ববারিণা ||৩৮||
তেনৈব সিদ্ধং সক্ষৌদ্রং সর্পিঃপানং প্রদাপযেত্ |
নিম্বারগ্বধযোঃ কল্কো হিত উত্সাদনে ভবেত্ ||৩৯||
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पद्मिनीकण्टके रोगे छर्दयेन्निम्बवारिणा ||३८||
तेनैव सिद्धं सक्षौद्रं सर्पिःपानं प्रदापयेत् |
निम्बारग्वधयोः कल्को हित उत्सादने भवेत् ||३९||
Adhikarana 19 (40-42) · Śloka 42
পরিবৃত্তিং ঘৃতাভ্যক্তাং সুস্বিন্নামুপনাহযেত্ |
ততোঽভ্যজ্য শনৈশ্চর্ম চানযেত্ পীডযেন্মণিম্ ||৪০||
প্রবিষ্টে চ মণৌ চর্ম স্বেদযেদুপনাহনৈঃ |
ত্রিরাত্রং পঞ্চরাত্রং বা বাতঘ্নৈঃ সাল্বণাদিভিঃ ||৪১||
দদ্যাদ্বাতহরান্ বস্তীন্ স্নিগ্ধান্যন্নানি ভোজযেত্ |
বপাটিকাং জযেদেবং যথাদোষং চিকিত্সকঃ ||৪২||
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परिवृत्तिं घृताभ्यक्तां सुस्विन्नामुपनाहयेत् |
ततोऽभ्यज्य शनैश्चर्म चानयेत् पीडयेन्मणिम् ||४०||
प्रविष्टे च मणौ चर्म स्वेदयेदुपनाहनैः |
त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा वातघ्नैः साल्वणादिभिः ||४१||
दद्याद्वातहरान् बस्तीन् स्निग्धान्यन्नानि भोजयेत् |
वपाटिकां जयेदेवं यथादोषं चिकित्सकः ||४२||
Adhikarana 20 (43-47) · Śloka 48
নিরুদ্ধপ্রকশে নাডীং লৌহীমুভযতোমুখীম্ |
দারবীং বা জতুকৃতাং ঘৃতাভ্যক্তাং প্রবেশযেত্ ||৪৩||
পরিষেকে বসামজ্জশিশুমারবরাহযোঃ |
চক্রতৈলং তথা যোজ্যং বাতঘ্নদ্রব্যসংযুতম্ ||৪৪||
ত্র্যহাত্ত্র্যহাত্ স্থূলতরাং সম্যঙ্গাডীং প্রবেশযেত্ |
স্রোতো বিবর্ধযেদেবং স্নিগ্ধমন্নং চ ভোজযেত্ ||৪৫||
ভিত্ত্বা বা সেবনীং মুক্ত্বা সদ্যঃক্ষতবদাচরেত্ |
সন্নিরুদ্ধগুদং রোগং বল্মীকং বহ্নিরোহিণীম্ ||৪৬||
প্রত্যাখ্যায যথাযোগং চিকিত্সিতমথাচরেত্ |
বিসর্পোক্তেন বিধিনা সাধযেদগ্নিরোহিণীম্ ||৪৭||
সন্নিরুদ্ধগুদে যোজ্যা নিরুদ্ধপ্রকশক্রিযা |৪৮|
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निरुद्धप्रकशे नाडीं लौहीमुभयतोमुखीम् |
दारवीं वा जतुकृतां घृताभ्यक्तां प्रवेशयेत् ||४३||
परिषेके वसामज्जशिशुमारवराहयोः |
चक्रतैलं तथा योज्यं वातघ्नद्रव्यसंयुतम् ||४४||
त्र्यहात्त्र्यहात् स्थूलतरां सम्यङ्गाडीं प्रवेशयेत् |
स्रोतो विवर्धयेदेवं स्निग्धमन्नं च भोजयेत् ||४५||
भित्त्वा वा सेवनीं मुक्त्वा सद्यःक्षतवदाचरेत् |
सन्निरुद्धगुदं रोगं वल्मीकं वह्निरोहिणीम् ||४६||
प्रत्याख्याय यथायोगं चिकित्सितमथाचरेत् |
विसर्पोक्तेन विधिना साधयेदग्निरोहिणीम् ||४७||
सन्निरुद्धगुदे योज्या निरुद्धप्रकशक्रिया |४८|
Adhikarana 21 (48-56) · Śloka 56
শস্ত্রেণোত্কৃত্য বল্মীকং ক্ষারাগ্নিভ্যাং প্রসাধযেত্ ||৪৮||
বিধানেনার্বুদোক্তেন শোধযিত্বা চ রোপযেত্ |
বল্মীকং তু ভবেদ্যস্য নাতিবৃদ্ধমমর্মজম্ ||৪৯||
তত্র সংশোধনং কৃত্বা শোণিতং মোক্ষযেদ্ভিষক্ |
কুলত্থিকাযা মূলৈশ্চ গুডূচ্যা লবণেন চ ||৫০||
আরেবতস্য মূলৈশ্চ দন্তীমূলৈস্তথৈব চ |
শ্যামামূলৈঃ সপললৈঃ শক্তুমিশ্রৈঃ প্রলেপযেত্ ||৫১||
সুস্নিগ্ধৈশ্চ সুখোষ্ণৈশ্চ ভিষক্ তমুপনাহযেত্ |
পক্বং বা তদ্বিজানীযাদ্গতীঃ সর্বা যথাক্রমম্ ||৫২||
অভিজ্ঞায ততশ্ছিত্ত্বা প্রদহেন্মতিমান্ ভিষক্ |
সংশোধ্য দুষ্টমাংসানি ক্ষারেণ প্রতিসারযেত্ ||৫৩||
ব্রণং বিশুদ্ধং বিজ্ঞায রোপযেন্মতিমান্ ভিষক্ |
সুমনা গ্রন্থযশ্চৈব ভল্লাতকমনঃশিলে ||৫৪||
কালানুসারী সূক্ষ্মৈলা চন্দনাগুরুণী তথা |
এতৈঃ সিদ্ধং নিম্বতৈলং বল্মীকে রোপণং হিতম্ ||৫৫||
পাণিপাদোপরিষ্টাত্তু ছিদ্রৈর্বহুভিরাবৃতম্ |
বল্মীকং যত্ সশোফং স্যাদ্বর্জ্যং তত্তু বিজানতা ||৫৬||
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शस्त्रेणोत्कृत्य वल्मीकं क्षाराग्निभ्यां प्रसाधयेत् ||४८||
विधानेनार्बुदोक्तेन शोधयित्वा च रोपयेत् |
वल्मीकं तु भवेद्यस्य नातिवृद्धममर्मजम् ||४९||
तत्र संशोधनं कृत्वा शोणितं मोक्षयेद्भिषक् |
कुलत्थिकाया मूलैश्च गुडूच्या लवणेन च ||५०||
आरेवतस्य मूलैश्च दन्तीमूलैस्तथैव च |
श्यामामूलैः सपललैः शक्तुमिश्रैः प्रलेपयेत् ||५१||
सुस्निग्धैश्च सुखोष्णैश्च भिषक् तमुपनाहयेत् |
पक्वं वा तद्विजानीयाद्गतीः सर्वा यथाक्रमम् ||५२||
अभिज्ञाय ततश्छित्त्वा प्रदहेन्मतिमान् भिषक् |
संशोध्य दुष्टमांसानि क्षारेण प्रतिसारयेत् ||५३||
व्रणं विशुद्धं विज्ञाय रोपयेन्मतिमान् भिषक् |
सुमना ग्रन्थयश्चैव भल्लातकमनःशिले ||५४||
कालानुसारी सूक्ष्मैला चन्दनागुरुणी तथा |
एतैः सिद्धं निम्बतैलं वल्मीके रोपणं हितम् ||५५||
पाणिपादोपरिष्टात्तु छिद्रैर्बहुभिरावृतम् |
वल्मीकं यत् सशोफं स्याद्वर्ज्यं तत्तु विजानता ||५६||
Adhikarana 22 (57-60) · Śloka 60
ধাত্র্যাঃ স্তন্যং শোধযিত্বা বালে সাধ্যাঽহিপূতনা |
পটোলপত্রত্রিফলারসাঞ্জনবিপাচিতম্ ||৫৭||
পীতং ঘৃতং নাশযতি কৃচ্ছ্রামপ্যহিপূতনাম্ |
ত্রিফলাকোলখদিরকষাযং ব্রণরোপণম্ ||৫৮||
কাসীসরোচনাতুত্থহরিতালরসাঞ্জনৈঃ |
লেপোঽম্লপিষ্টো বদরীত্বগ্বা সৈন্ধবসংযুতা ||৫৯||
কপালতুত্থজং চূর্ণং চূর্ণকালে প্রযোজযেত্ |
চিকিত্সেন্মুষ্ককচ্ছূং চাপ্যহিপূতনপামবত্ ||৬০||
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धात्र्याः स्तन्यं शोधयित्वा बाले साध्याऽहिपूतना |
पटोलपत्रत्रिफलारसाञ्जनविपाचितम् ||५७||
पीतं घृतं नाशयति कृच्छ्रामप्यहिपूतनाम् |
त्रिफलाकोलखदिरकषायं व्रणरोपणम् ||५८||
कासीसरोचनातुत्थहरितालरसाञ्जनैः |
लेपोऽम्लपिष्टो बदरीत्वग्वा सैन्धवसंयुता ||५९||
कपालतुत्थजं चूर्णं चूर्णकाले प्रयोजयेत् |
चिकित्सेन्मुष्ककच्छूं चाप्यहिपूतनपामवत् ||६०||
Adhikarana 23 (61-63) · Śloka 63
গুদভ্রংশে গুদং স্বিন্নং স্নেহাভ্যক্তং প্রবেশযেত্ |
কারযেদ্গোফণাবন্ধং মধ্যচ্ছিদ্রেণ চর্মণা ||৬১||
বিনির্গমার্থং বাযোশ্চ স্বেদযেচ্চ মুহুর্মুহুঃ |
ক্ষীরে মহত্পঞ্চমূলং মূষিকাং চান্ত্রবর্জিতাম্ ||৬২||
পক্ত্বা তস্মিন্ পচেত্তৈলং বাতঘ্নৌষধসংযুতম্ |
গুদভ্রংশমিদং কৃচ্ছ্রং পানাভ্যঙ্গাত্ প্রসাধযেত্ ||৬৩||
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गुदभ्रंशे गुदं स्विन्नं स्नेहाभ्यक्तं प्रवेशयेत् |
कारयेद्गोफणाबन्धं मध्यच्छिद्रेण चर्मणा ||६१||
विनिर्गमार्थं वायोश्च स्वेदयेच्च मुहुर्मुहुः |
क्षीरे महत्पञ्चमूलं मूषिकां चान्त्रवर्जिताम् ||६२||
पक्त्वा तस्मिन् पचेत्तैलं वातघ्नौषधसंयुतम् |
गुदभ्रंशमिदं कृच्छ्रं पानाभ्यङ्गात् प्रसाधयेत् ||६३||
Adhikarana puShpikA · Śloka 20
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে ক্ষুদ্ররোগচিকিত্সিতং নাম বিংশোঽধ্যাযঃ ||২০||
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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने क्षुद्ररोगचिकित्सितं नाम विंशोऽध्यायः ||२०||