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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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19. vr̥ddhyupadaṁśaślīpadacikitsitam

Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 4

অথাতো বৃদ্ধ্যুপদংশশ্লীপদচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২|| অন্ত্রবৃদ্ধ্যা বিনা ষড্যা বৃদ্ধযস্তাসু বর্জযেত্ | অশ্বাদিযানং ব্যাযামং মৈথুনং বেগনিগ্রহম্ ||৩|| অত্যাসনং চঙ্ক্রমণমুপবাসং গুরূণি চ |৪|

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अथातो वृद्ध्युपदंशश्लीपदचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२|| अन्त्रवृद्ध्या विना षड्या वृद्धयस्तासु वर्जयेत् | अश्वादियानं व्यायामं मैथुनं वेगनिग्रहम् ||३|| अत्यासनं चङ्क्रमणमुपवासं गुरूणि च |४|

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Adhikarana 2 (4-8) · Śloka 9

তত্রাদিতো বাতবৃদ্ধৌ ত্রৈবৃতস্নিগ্ধমাতুরম্ ||৪|| স্বিন্নং চৈনং যথান্যাযং পাযযেত বিরেচনম্ | কোশাম্রতিল্বকৈরণ্ডফলতৈলানি বা নরম্ ||৫|| সক্ষীরং বা পিবেন্মাসং তৈলমেরণ্ডসম্ভবম্ | ততঃ কালেঽনিলঘ্নানাং ক্বাথৈঃ কল্কৈশ্চ বুদ্ধিমান্ ||৬|| নিরূহযেন্নিরূঢং চ ভুক্তবন্তং রসৌদনম্ | যষ্টীমধুকসিদ্ধেন ততস্তৈলেন যোজযেত্ ||৭|| স্নেহোপনাহৌ কুর্যাচ্চ প্রদেহাংশ্চানিলাপহান্ | বিদগ্ধাং পাচযিত্বা বা সেবনীং পরিবর্জযেত্ ||৮|| ভিন্দ্যাত্ততঃ প্রভিন্নাযাং যথোক্তং ক্রমমাচরেত্ |৯|

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तत्रादितो वातवृद्धौ त्रैवृतस्निग्धमातुरम् ||४|| स्विन्नं चैनं यथान्यायं पाययेत विरेचनम् | कोशाम्रतिल्वकैरण्डफलतैलानि वा नरम् ||५|| सक्षीरं वा पिबेन्मासं तैलमेरण्डसम्भवम् | ततः कालेऽनिलघ्नानां क्वाथैः कल्कैश्च बुद्धिमान् ||६|| निरूहयेन्निरूढं च भुक्तवन्तं रसौदनम् | यष्टीमधुकसिद्धेन ततस्तैलेन योजयेत् ||७|| स्नेहोपनाहौ कुर्याच्च प्रदेहांश्चानिलापहान् | विदग्धां पाचयित्वा वा सेवनीं परिवर्जयेत् ||८|| भिन्द्यात्ततः प्रभिन्नायां यथोक्तं क्रममाचरेत् |९|

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Adhikarana 3 (9-11) · Śloka 12

পিত্তজাযামপক্বাযাং পিত্তগ্রন্থিক্রমো হিতঃ ||৯|| পক্বাং বা ভেদযেদ্ভিন্নাং শোধযেত্ ক্ষৌদ্রসর্পিষা | শুদ্ধাযাং চ ভিষগ্দদ্যাত্তৈলং কল্কং চ রোপণম্ ||১০|| রক্তজাযাং জলৌকোভিঃ শোণিতং নির্হরেদ্ভিষক্ | পিবেদ্বিরেচনং বাঽপি শর্করাক্ষৌদ্রসংযুতম্ ||১১|| পিত্তগ্রন্থিক্রমং কুর্যাদামে পক্বে চ সর্বদা |১২|

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पित्तजायामपक्वायां पित्तग्रन्थिक्रमो हितः ||९|| पक्वां वा भेदयेद्भिन्नां शोधयेत् क्षौद्रसर्पिषा | शुद्धायां च भिषग्दद्यात्तैलं कल्कं च रोपणम् ||१०|| रक्तजायां जलौकोभिः शोणितं निर्हरेद्भिषक् | पिबेद्विरेचनं वाऽपि शर्कराक्षौद्रसंयुतम् ||११|| पित्तग्रन्थिक्रमं कुर्यादामे पक्वे च सर्वदा |१२|

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Adhikarana 4 (12-14) · Śloka 14

বৃদ্ধিং কফাত্মিকামুষ্ণৈর্মূত্রপিষ্টৈঃ প্রলেপযেত্ ||১২|| পীতদারুকষাযং চ পিবেন্মূত্রেণ সংযুতম্ | বিম্লাপনাদৃতে বাঽপি শ্লেষ্মগ্রান্থিক্রমো হিতঃ ||১৩|| পক্বাযাং চ বিভিন্নাযাং তৈলং শোধনমিষ্যতে | সুমনারুষ্করাঙ্কোঠসপ্তপর্ণেষু সাধিতম্ ||১৪||

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वृद्धिं कफात्मिकामुष्णैर्मूत्रपिष्टैः प्रलेपयेत् ||१२|| पीतदारुकषायं च पिबेन्मूत्रेण संयुतम् | विम्लापनादृते वाऽपि श्लेष्मग्रान्थिक्रमो हितः ||१३|| पक्वायां च विभिन्नायां तैलं शोधनमिष्यते | सुमनारुष्कराङ्कोठसप्तपर्णेषु साधितम् ||१४||

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Adhikarana 5 (15-17) · Śloka 18

মেদঃসমুত্থাং সংস্বেদ্য লেপযেত্ সুরসাদিনা | শিরোবিরেকদ্রব্যৈর্বা সুখোষ্ণৈর্মূত্রসংযুতৈঃ ||১৫|| স্বিন্নাং চাবেষ্ট্য পট্টেন সমাশ্বাস্য তু মানবম্ | রক্ষন্ ফলে সেবনীং চ বৃদ্ধিপত্রেণ দারযেত্ ||১৬|| ভেদস্ততঃ সমুদ্ধৃত্য দদ্যাত্ কাসীসসৈন্ধবে | বধ্নীযাচ্চ যথোদ্দিষ্টং শুদ্ধে তৈলং চ দাপযেত্ ||১৭|| মনঃশিলাললবণৈঃ সিদ্ধমারুষ্করেষু চ |১৮|

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मेदःसमुत्थां संस्वेद्य लेपयेत् सुरसादिना | शिरोविरेकद्रव्यैर्वा सुखोष्णैर्मूत्रसंयुतैः ||१५|| स्विन्नां चावेष्ट्य पट्टेन समाश्वास्य तु मानवम् | रक्षन् फले सेवनीं च वृद्धिपत्रेण दारयेत् ||१६|| भेदस्ततः समुद्धृत्य दद्यात् कासीससैन्धवे | बध्नीयाच्च यथोद्दिष्टं शुद्धे तैलं च दापयेत् ||१७|| मनःशिलाललवणैः सिद्धमारुष्करेषु च |१८|

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Adhikarana 6 (18-24) · Śloka 24

মূত্রজাং স্বেদযিত্বা তু বস্ত্রপট্টেন বেষ্টযেত্ ||১৮|| সেবন্যাঃ পার্শ্বতোঽধস্তাদ্বিধ্যেদ্ ব্রীহিমুখেন তু | অথাত্র দ্বিমুখাং নাডীং দত্ত্বা বিস্রাবযেদ্ভিষক্ ||১৯|| মূত্রং, নাডীমথোদ্ধৃত্য স্থগিকাবন্ধমাচরেত্ | শুদ্ধাযাং রোপণং দদ্যাদ্বর্জযেদন্ত্রহৈতুকীম্ ||২০|| অপ্রাপ্তফলকোষাযাং বাতবৃদ্ধিক্রমো হিতঃ | তত্র যা বঙ্ক্ষণস্থা তাং দহেদর্ধেন্দুবক্ত্রযা ||২১|| সম্যঙ্মার্গাবরোধার্থং কোশপ্রাপ্তাং তু বর্জযেত্ | ত্বচং ভিত্ত্বাঽঙ্গুষ্ঠমধ্যে দহেচ্চাঙ্গবিপর্যযাত্ ||২২|| অনেনৈব বিধানেন বৃদ্ধী বাতকফাত্মিকে | প্রদহেত্ প্রযতঃ কিন্তু স্নাযুচ্ছেদোঽধিকস্তযোঃ ||২৩|| শঙ্খোপরি চ কর্ণান্তে ত্যক্ত্বা যত্নেন সেবনীম্ | ব্যত্যাসাদ্বা সিরাং বিধ্যেদন্ত্রবৃদ্ধিনিবৃত্তযে ||২৪||

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मूत्रजां स्वेदयित्वा तु वस्त्रपट्टेन वेष्टयेत् ||१८|| सेवन्याः पार्श्वतोऽधस्ताद्विध्येद् व्रीहिमुखेन तु | अथात्र द्विमुखां नाडीं दत्त्वा विस्रावयेद्भिषक् ||१९|| मूत्रं, नाडीमथोद्धृत्य स्थगिकाबन्धमाचरेत् | शुद्धायां रोपणं दद्याद्वर्जयेदन्त्रहैतुकीम् ||२०|| अप्राप्तफलकोषायां वातवृद्धिक्रमो हितः | तत्र या वङ्क्षणस्था तां दहेदर्धेन्दुवक्त्रया ||२१|| सम्यङ्मार्गावरोधार्थं कोशप्राप्तां तु वर्जयेत् | त्वचं भित्त्वाऽङ्गुष्ठमध्ये दहेच्चाङ्गविपर्ययात् ||२२|| अनेनैव विधानेन वृद्धी वातकफात्मिके | प्रदहेत् प्रयतः किन्तु स्नायुच्छेदोऽधिकस्तयोः ||२३|| शङ्खोपरि च कर्णान्ते त्यक्त्वा यत्नेन सेवनीम् | व्यत्यासाद्वा सिरां विध्येदन्त्रवृद्धिनिवृत्तये ||२४||

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Adhikarana 7 (25-27) · Śloka 27

উপদংশেষু সাধ্যেষু স্নিগ্ধস্বিন্নস্য দেহিনঃ | সিরাং বিধ্যেন্মেঢ্রমধ্যে পাতযেদ্বা জলৌকসঃ ||২৫|| হরেদুভযতশ্চাপি দোষানত্যর্থমুচ্ছ্রিতান্ | সদ্যোঽপহৃতদোষস্য রুক্শোফাবুপশাম্যতঃ ||২৬|| যদি বা দুর্বলো জন্তুর্ন বা প্রাপ্তং বিরেচনম্ | নিরূহেণ হরেত্তস্য দোষানত্যর্থমুচ্ছ্রিতান্ ||২৭||

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उपदंशेषु साध्येषु स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः | सिरां विध्येन्मेढ्रमध्ये पातयेद्वा जलौकसः ||२५|| हरेदुभयतश्चापि दोषानत्यर्थमुच्छ्रितान् | सद्योऽपहृतदोषस्य रुक्शोफावुपशाम्यतः ||२६|| यदि वा दुर्बलो जन्तुर्न वा प्राप्तं विरेचनम् | निरूहेण हरेत्तस्य दोषानत्यर्थमुच्छ्रितान् ||२७||

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Adhikarana 8 (28-29) · Śloka 30

প্রপৌণ্ডরীকযষ্ট্যাহ্ববর্ষাভূকুষ্ঠদারুভিঃ | সরলাগুরুরাস্নাভির্বাতজং সম্প্রলেপযেত্ ||২৮|| নিচুলৈরণ্ডবীজানি যবগোধূমসক্তবঃ | এতৈশ্চ বাতজং স্নিগ্ধৈঃ সুখোষ্ণৈঃ সম্প্রলেপযেত্ ||২৯|| প্রপৌণ্ডরীকপূর্বৈশ্চ দ্রব্যৈঃ সেকঃ প্রশস্যতে |৩০|

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प्रपौण्डरीकयष्ट्याह्ववर्षाभूकुष्ठदारुभिः | सरलागुरुरास्नाभिर्वातजं सम्प्रलेपयेत् ||२८|| निचुलैरण्डबीजानि यवगोधूमसक्तवः | एतैश्च वातजं स्निग्धैः सुखोष्णैः सम्प्रलेपयेत् ||२९|| प्रपौण्डरीकपूर्वैश्च द्रव्यैः सेकः प्रशस्यते |३०|

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Adhikarana 9 (30-32) · Śloka 33

গৈরিকাঞ্জনযষ্ট্যাহ্বসারিবোশীরপদ্মকৈঃ ||৩০|| সচন্দনোত্পলৈঃ স্নিগ্ধৈঃ পৈত্তিকং সম্প্রলেপযেত্ | পদ্মোত্পলমৃণালৈশ্চ সসর্জার্জুনবেতসৈঃ ||৩১|| সর্পিঃস্নিগ্ধৈঃ সমধুকৈঃ পৈত্তিকং সম্প্রলেপযেত্ | সেচযেচ্চ ঘৃতক্ষীরশর্করেক্ষুমধূদকৈঃ ||৩২|| অথবাঽপি সুশীতেন কষাযেণ বটাদিনা |৩৩|

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गैरिकाञ्जनयष्ट्याह्वसारिवोशीरपद्मकैः ||३०|| सचन्दनोत्पलैः स्निग्धैः पैत्तिकं सम्प्रलेपयेत् | पद्मोत्पलमृणालैश्च ससर्जार्जुनवेतसैः ||३१|| सर्पिःस्निग्धैः समधुकैः पैत्तिकं सम्प्रलेपयेत् | सेचयेच्च घृतक्षीरशर्करेक्षुमधूदकैः ||३२|| अथवाऽपि सुशीतेन कषायेण वटादिना |३३|

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Adhikarana 10 (33-35) · Śloka 35

সালাশ্বকর্ণাজকর্ণধবত্বগ্ভিঃ কফোত্থিতম্ ||৩৩|| সুরাপিষ্টাভিরুষ্ণাভিঃ সতৈলাভিঃ প্রলেপযেত্ | রজন্যতিবিষামুস্তাসুরসাসুরদারুভিঃ ||৩৪|| সপত্রপাঠাপত্তূরৈরথবা সম্প্রলেপযেত্ | সুরসারগ্বধাদ্যোশ্চ ক্বাথাভ্যাং পরিষেচযেত্ ||৩৫||

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सालाश्वकर्णाजकर्णधवत्वग्भिः कफोत्थितम् ||३३|| सुरापिष्टाभिरुष्णाभिः सतैलाभिः प्रलेपयेत् | रजन्यतिविषामुस्तासुरसासुरदारुभिः ||३४|| सपत्रपाठापत्तूरैरथवा सम्प्रलेपयेत् | सुरसारग्वधाद्योश्च क्वाथाभ्यां परिषेचयेत् ||३५||

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Adhikarana 11 (36-39) · Śloka 39

এবং সংশোধনালেপসেকশোণিতমোক্ষণৈঃ | প্রতিকুর্যাত্ ক্রিযাযোগৈঃ প্রাক্স্থানোক্তৈর্হিতৈরপি ||৩৬|| ন যাতি চ যথা পাকং প্রযতেত তথা ভিষক্ | বিদগ্ধৈস্তু সিরাস্নাযুত্বঙ্মাংসৈঃ ক্ষীযতে ধ্বজঃ ||৩৭|| শস্ত্রেণোপচরেচ্চাপি পাকমাগতমাশু বৈ | তদাঽপোহ্য তিলৈঃ সর্পিঃক্ষৌদ্রযুক্তৈঃ প্রলেপযেত্ ||৩৮|| করবীরস্য পত্রাণি জাত্যারগ্বধযোস্তথা | প্রক্ষালনে প্রযোজ্যানি বৈজযন্ত্যর্কযোরপি ||৩৯||

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एवं संशोधनालेपसेकशोणितमोक्षणैः | प्रतिकुर्यात् क्रियायोगैः प्राक्स्थानोक्तैर्हितैरपि ||३६|| न याति च यथा पाकं प्रयतेत तथा भिषक् | विदग्धैस्तु सिरास्नायुत्वङ्मांसैः क्षीयते ध्वजः ||३७|| शस्त्रेणोपचरेच्चापि पाकमागतमाशु वै | तदाऽपोह्य तिलैः सर्पिःक्षौद्रयुक्तैः प्रलेपयेत् ||३८|| करवीरस्य पत्राणि जात्यारग्वधयोस्तथा | प्रक्षालने प्रयोज्यानि वैजयन्त्यर्कयोरपि ||३९||

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Adhikarana 12 (40-41) · Śloka 41

সৌরাষ্ট্রীং গৈরিকং তুত্থং পুষ্পকাসীসসৈন্ধবম্ | রোধ্রং রসাঞ্জনং দার্বীং হরিতালং মনঃশিলাম্ ||৪০|| হরেণুকৈলে চ তথা সূক্ষ্মচূর্ণানি কারযেত্ | তচ্চূর্ণং ক্ষৌদ্রসংযুক্তমুপদংশেষু পূজিতম্ ||৪১||

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सौराष्ट्रीं गैरिकं तुत्थं पुष्पकासीससैन्धवम् | रोध्रं रसाञ्जनं दार्वीं हरितालं मनःशिलाम् ||४०|| हरेणुकैले च तथा सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् | तच्चूर्णं क्षौद्रसंयुक्तमुपदंशेषु पूजितम् ||४१||

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Adhikarana 13 (42-44) · Śloka 45

জম্ব্বাম্রসুমনানিম্বশ্বেতকাম্বোজিপল্লবাঃ | শল্লকীবদরীবিল্বপলাশতিনিশত্বচঃ ||৪২|| ক্ষীরিণাং চ ত্বচো যোজ্যাঃ ক্বাথে ত্রিফলযা সহ | তেন ক্বাথেন নিযতং ব্রণং প্রক্ষালযেদ্ভিষক্ ||৪৩|| অস্মিন্নেব কষাযে তু তৈলং ধীরো বিপাচযেত্ | গোজীবিডঙ্গযষ্টীভিঃ সর্বগন্ধৈশ্চ সংযুতম্ ||৪৪|| এতত্ সর্বোপদংশেষু শ্রেষ্ঠং রোপণমিষ্যতে |৪৫|

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जम्ब्वाम्रसुमनानिम्बश्वेतकाम्बोजिपल्लवाः | शल्लकीबदरीबिल्वपलाशतिनिशत्वचः ||४२|| क्षीरिणां च त्वचो योज्याः क्वाथे त्रिफलया सह | तेन क्वाथेन नियतं व्रणं प्रक्षालयेद्भिषक् ||४३|| अस्मिन्नेव कषाये तु तैलं धीरो विपाचयेत् | गोजीविडङ्गयष्टीभिः सर्वगन्धैश्च संयुतम् ||४४|| एतत् सर्वोपदंशेषु श्रेष्ठं रोपणमिष्यते |४५|

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Adhikarana 14 (45-47) · Śloka 48

স্বর্জিকাতুত্থকাসীসং শৈলেযং চ রসাঞ্জনম্ ||৪৫|| মনঃশিলাসমৈশ্চূর্ণং ব্রণবীসর্পনাশনম্ | গুন্দ্রাং দগ্ধ্বা কৃতং ভস্ম হরিতালং মনঃশিলা ||৪৬|| উপদংশবিসর্পাণামেতচ্ছান্তিকরং পরম্ | মার্কবস্ত্রিফলা দন্তী তাম্রচূর্ণমযোরজঃ ||৪৭|| উপদংশং নিহন্ত্যেষ বৃক্ষমিন্দ্রাশনির্যথা |৪৮|

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स्वर्जिकातुत्थकासीसं शैलेयं च रसाञ्जनम् ||४५|| मनःशिलासमैश्चूर्णं व्रणवीसर्पनाशनम् | गुन्द्रां दग्ध्वा कृतं भस्म हरितालं मनःशिला ||४६|| उपदंशबिसर्पाणामेतच्छान्तिकरं परम् | मार्कवस्त्रिफला दन्ती ताम्रचूर्णमयोरजः ||४७|| उपदंशं निहन्त्येष वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा |४८|

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Adhikarana 15 (48) · Śloka 49

উপদংশদ্বযেঽপ্যেতাং প্রত্যাখ্যাযাচরেত্ ক্রিযাম্ ||৪৮|| তযোরেব চ যা যোগ্যা বীক্ষ্য দোষবলাবলম্ |৪৯|

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उपदंशद्वयेऽप्येतां प्रत्याख्यायाचरेत् क्रियाम् ||४८|| तयोरेव च या योग्या वीक्ष्य दोषबलाबलम् |४९|

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Adhikarana 16 (49-51) · Śloka 51

উপদংশে বিশেষেণ শৃণু ভূযস্ত্রিদোষজে ||৪৯|| দুষ্টব্রণবিধিং কুর্যাত্ কুথিতং মেহনং ত্যজেত্ | জম্ব্বোষ্ঠেনাগ্নিবর্ণেন পশ্চাচ্ছেষং দহেদ্ভিষক্ ||৫০|| সম্যগ্দগ্ধং চ বিজ্ঞায মধুসর্পিঃ প্রযোজযেত্ | শুদ্ধে চ রোপণং দদ্যাত্ কল্কং তৈলং হিতং চ যত্ ||৫১||

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उपदंशे विशेषेण शृणु भूयस्त्रिदोषजे ||४९|| दुष्टव्रणविधिं कुर्यात् कुथितं मेहनं त्यजेत् | जम्ब्वोष्ठेनाग्निवर्णेन पश्चाच्छेषं दहेद्भिषक् ||५०|| सम्यग्दग्धं च विज्ञाय मधुसर्पिः प्रयोजयेत् | शुद्धे च रोपणं दद्यात् कल्कं तैलं हितं च यत् ||५१||

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Adhikarana 17 (52-54) · Śloka 54

স্নেহস্বেদোপপন্নে তু শ্লীপদেঽনিলজে ভিষক্ | কৃত্বা গুল্ফোপরি সিরাং বিধ্যেত্তু চতুরঙ্গুলে ||৫২|| সমাপ্যাযিতদেহং চ বস্তিভিঃ সমুপাচরেত্ | মাসমেরণ্ডজং তৈলং পিবেন্মূত্রেণ সংযুতম্ ||৫৩|| পযসৌদনমশ্নীযান্নাগরক্বথিতেন চ | ত্রৈবৃতং চোপযুঞ্জীত শস্তো দাহস্তথাঽগ্নিনা ||৫৪||

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स्नेहस्वेदोपपन्ने तु श्लीपदेऽनिलजे भिषक् | कृत्वा गुल्फोपरि सिरां विध्येत्तु चतुरङ्गुले ||५२|| समाप्यायितदेहं च बस्तिभिः समुपाचरेत् | मासमेरण्डजं तैलं पिबेन्मूत्रेण संयुतम् ||५३|| पयसौदनमश्नीयान्नागरक्वथितेन च | त्रैवृतं चोपयुञ्जीत शस्तो दाहस्तथाऽग्निना ||५४||

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Adhikarana 18 (55) · Śloka 55

গুল্ফস্যাধঃ সিরাং বিধ্যেচ্ছ্লীপদে পিত্তসম্ভবে | পিত্তঘ্নীং চ ক্রিযাং কুর্যাত্ পিত্তার্বুদবিসর্পবত্ ||৫৫||

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गुल्फस्याधः सिरां विध्येच्छ्लीपदे पित्तसम्भवे | पित्तघ्नीं च क्रियां कुर्यात् पित्तार्बुदविसर्पवत् ||५५||

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Adhikarana 19 (56-62) · Śloka 62

সিরাং সুবিদিতাং বিধ্যেদঙ্গুষ্ঠে শ্লৈষ্মিকে ভিষক্ | মধুযুক্তানি চাভীক্ষ্ণং কষাযাণি পিবেন্নরঃ ||৫৬|| পিবেদ্বাঽপ্যভযাকল্কং মূত্রেণান্যতমেন চ | কটুকামমৃতাং শুণ্ঠীং বিডঙ্গং দারু চিত্রকম্ ||৫৭|| হিতং বা লেপনে নিত্যং ভদ্রদারু সচিত্রকম্ | বিডঙ্গমরিচার্কেষু নাগরে চিত্রকেঽথবা ||৫৮|| ভদ্রদার্বেলুকাখ্যে চ সর্বেষু লবণেষু চ | তৈলং পক্বং পিবেদ্বাঽপি যবান্নং চ হিতং সদা ||৫৯|| পিবেত্ সর্ষপতৈলং বা শ্লীপদানাং নিবৃত্তযে | পূতীকরঞ্জপত্রাণাং রসং বাঽপি যথাবলম্ ||৬০|| অনেনৈব বিধানেন পুত্রঞ্জীবকজং রসম্ | প্রযুঞ্জীত ভিষক্ প্রাজ্ঞঃ কালসাত্ম্যবিভাগবিত্ ||৬১|| কেবুকাকন্দনির্যাসং লবণং ত্বথ পাকিমম্ | রসং দত্ত্বাঽথ পূর্বোক্তং পেযমেতদ্ভিষগ্জিতম্ ||৬২||

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सिरां सुविदितां विध्येदङ्गुष्ठे श्लैष्मिके भिषक् | मधुयुक्तानि चाभीक्ष्णं कषायाणि पिबेन्नरः ||५६|| पिबेद्वाऽप्यभयाकल्कं मूत्रेणान्यतमेन च | कटुकाममृतां शुण्ठीं विडङ्गं दारु चित्रकम् ||५७|| हितं वा लेपने नित्यं भद्रदारु सचित्रकम् | विडङ्गमरिचार्केषु नागरे चित्रकेऽथवा ||५८|| भद्रदार्वेलुकाख्ये च सर्वेषु लवणेषु च | तैलं पक्वं पिबेद्वाऽपि यवान्नं च हितं सदा ||५९|| पिबेत् सर्षपतैलं वा श्लीपदानां निवृत्तये | पूतीकरञ्जपत्राणां रसं वाऽपि यथाबलम् ||६०|| अनेनैव विधानेन पुत्रञ्जीवकजं रसम् | प्रयुञ्जीत भिषक् प्राज्ञः कालसात्म्यविभागवित् ||६१|| केवुकाकन्दनिर्यासं लवणं त्वथ पाकिमम् | रसं दत्त्वाऽथ पूर्वोक्तं पेयमेतद्भिषग्जितम् ||६२||

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Adhikarana 20 (63-66) · Śloka 66

কাকাদনীং কাকজঙ্ঘাং বৃহতীং কণ্টকারিকাম্ | কদম্বপুষ্পীং মন্দারীং লম্বাং শুকনসাং তথা ||৬৩|| দগ্ধ্বা মূত্রেণ তদ্ভস্ম স্রাবযেত্ ক্ষারকল্পবত্ | তত্র দদ্যাত্ প্রতীবাপং কাকোদুম্বরিকারসম্ ||৬৪|| মদনাচ্চ ফলাত্ ক্বাথং শুকাখ্যস্বরসং তথা | এষ ক্ষারস্তু পানীযঃ শ্লীপদং হন্তি সেবিতঃ ||৬৫|| অপচীং গলগণ্ডং চ গ্রহণীদোষমেব চ | ভক্তস্যানশনং চৈব হন্যাত্ সর্ববিষাণি চ ||৬৬||

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काकादनीं काकजङ्घां बृहतीं कण्टकारिकाम् | कदम्बपुष्पीं मन्दारीं लम्बां शुकनसां तथा ||६३|| दग्ध्वा मूत्रेण तद्भस्म स्रावयेत् क्षारकल्पवत् | तत्र दद्यात् प्रतीवापं काकोदुम्बरिकारसम् ||६४|| मदनाच्च फलात् क्वाथं शुकाख्यस्वरसं तथा | एष क्षारस्तु पानीयः श्लीपदं हन्ति सेवितः ||६५|| अपचीं गलगण्डं च ग्रहणीदोषमेव च | भक्तस्यानशनं चैव हन्यात् सर्वविषाणि च ||६६||

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Adhikarana 21 (67) · Śloka 67

এষ্বেব তৈলং সংসিদ্ধং নস্যাভ্যঙ্গেষু পূজিতম এতানেবামযান্ হন্তি যে চ দুষ্টব্রণা নৃণাম্ ||৬৭||

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एष्वेव तैलं संसिद्धं नस्याभ्यङ्गेषु पूजितम एतानेवामयान् हन्ति ये च दुष्टव्रणा नृणाम् ||६७||

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Adhikarana 22 (68-69) · Śloka 69

দ্রবন্তীং ত্রিবৃতাং দন্তীং নীলীং শ্যামাং তথৈব চ | সপ্তলাং শঙ্খিনীং চৈব দগ্ধ্বা মূত্রেণ গালযেত্ ||৬৮|| দদ্যাচ্চ ত্রিফলাক্বাথমেষ ক্ষারস্তু সাধিতঃ | অধো গচ্ছতি পীতস্তু পূর্বৈশ্চাপ্যাশিষঃ সমাঃ ||৬৯||

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द्रवन्तीं त्रिवृतां दन्तीं नीलीं श्यामां तथैव च | सप्तलां शङ्खिनीं चैव दग्ध्वा मूत्रेण गालयेत् ||६८|| दद्याच्च त्रिफलाक्वाथमेष क्षारस्तु साधितः | अधो गच्छति पीतस्तु पूर्वैश्चाप्याशिषः समाः ||६९||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 19

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে বৃদ্ধ্যুপদংশশ্লীপদচিকিত্সিতং নামৈকোনবিংশোঽধ্যাযঃ ||১৯||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वृद्ध्युपदंशश्लीपदचिकित्सितं नामैकोनविंशोऽध्यायः ||१९||

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