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10. mahākuṣṭhacikitsitam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো মহাকুষ্ঠচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो महाकुष्ठचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

কুষ্ঠেষু মেহেষু কফামযেষু সর্বাঙ্গশোফেষু চ দারুণেষু | কৃশত্বমিচ্ছত্সু চ মেদুরেষু যোগানিমানগ্র্যমতির্বিদধ্যাত্ ||৩||

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कुष्ठेषु मेहेषु कफामयेषु सर्वाङ्गशोफेषु च दारुणेषु | कृशत्वमिच्छत्सु च मेदुरेषु योगानिमानग्र्यमतिर्विदध्यात् ||३||

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Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5

ক্ষুণ্ণান্ যবান্নিষ্পূতান্ রাত্রৌ গোমূত্রপর্যুষিতান্ মহতি কিলিঞ্জে শোষযেত্, এবং সপ্তরাত্রং ভাবযেচ্ছোষযেচ্চ, ততস্তান্ কপালভৃষ্টান্ শক্তূন্ কারযিত্বা, প্রাতঃ প্রাতরেব কুষ্ঠিনং প্রমেহিণং বা সালসারাদিকষাযেণ কণ্টকিবৃক্ষকষাযেণ বা পাযযেদ্ভল্লাতকপ্রপুন্নাডাবল্গুজার্কচিত্রকবিডঙ্গমুস্তচূর্ণচতুর্ভাগযুক্তান্; এবমেব সালসারাদিকষাযপরিপীতানামারগ্বধাদিকষাযপরিপীতানাং বা গবাশ্বাশকৃদ্ভূতানাং বা যবানাং শক্তূন্ কারযিত্বা ভল্লাতকাদীনাং চূর্ণান্যাবাপ্য খদিরাশননিম্বরাজবৃক্ষরোহীতকগুডূচীনামন্যতমস্য কষাযেণ শর্করামধুমধুরেণ দ্রাক্ষাযুক্তেন দাডিমামলকবেতসাম্লেন সৈন্ধবলবণান্বিতেন পাযযেত্; এষ সর্বমন্থকল্পঃ ||৪|| যাবকাংশ্চ ভক্ষ্যান্ ধানোলুম্বককুল্মাষাপূপপূর্ণকোশোত্কারিকাশষ্কুলিকাকুণাবীপ্রভৃতীন্ সেবেত; যববিধানেন গোধূমবেণুযবানুপযুঞ্জীত ||৫||

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क्षुण्णान् यवान्निष्पूतान् रात्रौ गोमूत्रपर्युषितान् महति किलिञ्जे शोषयेत्, एवं सप्तरात्रं भावयेच्छोषयेच्च, ततस्तान् कपालभृष्टान् शक्तून् कारयित्वा, प्रातः प्रातरेव कुष्ठिनं प्रमेहिणं वा सालसारादिकषायेण कण्टकिवृक्षकषायेण वा पाययेद्भल्लातकप्रपुन्नाडावल्गुजार्कचित्रकविडङ्गमुस्तचूर्णचतुर्भागयुक्तान्; एवमेव सालसारादिकषायपरिपीतानामारग्वधादिकषायपरिपीतानां वा गवाश्वाशकृद्भूतानां वा यवानां शक्तून् कारयित्वा भल्लातकादीनां चूर्णान्यावाप्य खदिराशननिम्बराजवृक्षरोहीतकगुडूचीनामन्यतमस्य कषायेण शर्करामधुमधुरेण द्राक्षायुक्तेन दाडिमामलकवेतसाम्लेन सैन्धवलवणान्वितेन पाययेत्; एष सर्वमन्थकल्पः ||४|| यावकांश्च भक्ष्यान् धानोलुम्बककुल्माषापूपपूर्णकोशोत्कारिकाशष्कुलिकाकुणावीप्रभृतीन् सेवेत; यवविधानेन गोधूमवेणुयवानुपयुञ्जीत ||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6

অরিষ্টানতো বক্ষ্যামঃ- পূতীকচব্যচিত্রকসুরদারুসারিবাদন্তীত্রিবৃত্ত্রিকটুকানাং প্রত্যেকং ষট্পলিকা ভাগা বদরকুডবস্ত্রিফলাকুডব ইত্যেতেষাং চূর্ণানি, ততঃ পিপ্পলীমধুঘৃতৈরন্তঃপ্রলিপ্তে ঘৃতভাজনে প্রাক্কৃতসংস্কারে সপ্তোদককুডবানযোরজোঽর্ধকুডবমর্ধতুলাং চ গুডস্যাভিহিতানি চূর্ণান্যাবাপ্য স্বনুগুপ্তং কৃত্বা যবপল্লে সপ্তরাত্রং বাসযেত্, ততো যথাবলমুপযুঞ্জীত, এষোঽরিষ্টঃ কুষ্ঠমেহমেদঃপাণ্ডুরোগশ্বযথূনপহন্তি | এবং শালসারাদৌ ন্যগ্রোধাদাবারগ্বধাদৌ চারিষ্টান্ কুর্বীত ||৬||

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अरिष्टानतो वक्ष्यामः- पूतीकचव्यचित्रकसुरदारुसारिवादन्तीत्रिवृत्त्रिकटुकानां प्रत्येकं षट्पलिका भागा बदरकुडवस्त्रिफलाकुडव इत्येतेषां चूर्णानि, ततः पिप्पलीमधुघृतैरन्तःप्रलिप्ते घृतभाजने प्राक्कृतसंस्कारे सप्तोदककुडवानयोरजोऽर्धकुडवमर्धतुलां च गुडस्याभिहितानि चूर्णान्यावाप्य स्वनुगुप्तं कृत्वा यवपल्ले सप्तरात्रं वासयेत्, ततो यथाबलमुपयुञ्जीत, एषोऽरिष्टः कुष्ठमेहमेदःपाण्डुरोगश्वयथूनपहन्ति | एवं शालसारादौ न्यग्रोधादावारग्वधादौ चारिष्टान् कुर्वीत ||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

আসবানতো বক্ষ্যামঃ- পলাশভস্মপরিস্রুতস্যোষ্ণোদকস্য শীতীভূতস্য ত্রযো ভাগা দ্বৌ ফাণিতস্যৈকধ্যমরিষ্টকল্পেন বিদধ্যাত্, এবং তিলাদীনাং ক্ষারেষু; শালসারাদৌ ন্যগ্রোধাদাবারগ্বধাদৌ মূত্রেষু চাসবান্ বিদধ্যাত্ ||৭||

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आसवानतो वक्ष्यामः- पलाशभस्मपरिस्रुतस्योष्णोदकस्य शीतीभूतस्य त्रयो भागा द्वौ फाणितस्यैकध्यमरिष्टकल्पेन विदध्यात्, एवं तिलादीनां क्षारेषु; शालसारादौ न्यग्रोधादावारग्वधादौ मूत्रेषु चासवान् विदध्यात् ||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

অথ সুরা বক্ষ্যামঃ- শিংশপাখদীরযোঃ সারমাদাযোত্পাট্য চোত্তমারণীব্রাহ্মীকোশবতীস্তত্সর্বমেকতঃ কষাযকল্পেন বিপাচ্যোদকমাদদীত মণ্ডোদকার্থং, কিণ্বপিষ্টমভিষুণুযাচ্চ যথোক্তম্ | এবং সুরাঃ শালসারাদৌ ন্যগ্রোধাদাবারগ্বধাদৌ চ বিদধ্যাত্ ||৮||

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अथ सुरा वक्ष्यामः- शिंशपाखदीरयोः सारमादायोत्पाट्य चोत्तमारणीब्राह्मीकोशवतीस्तत्सर्वमेकतः कषायकल्पेन विपाच्योदकमाददीत मण्डोदकार्थं, किण्वपिष्टमभिषुणुयाच्च यथोक्तम् | एवं सुराः शालसारादौ न्यग्रोधादावारग्वधादौ च विदध्यात् ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

অতোঽবলেহান্ বক্ষ্যামঃ- খদিরাসননিম্বরাজবৃক্ষশালসারক্বাথে তত্সারপিণ্ডাঞ্ছ্লক্ষ্ণপিষ্টান্ প্রক্ষিপ্য বিপচেত্, ততো নাতিদ্রবং নাতিসান্দ্রমবতার্য তস্য পাণিতলং পূর্ণমপ্রাতরাশো মধুমিশ্রং লিহ্যাত্; এবং শালসারাদৌ ন্যগ্রোধাদাবারগ্বধাদৌ চ লেহান্ কারযেত্ ||৯||

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अतोऽवलेहान् वक्ष्यामः- खदिरासननिम्बराजवृक्षशालसारक्वाथे तत्सारपिण्डाञ्छ्लक्ष्णपिष्टान् प्रक्षिप्य विपचेत्, ततो नातिद्रवं नातिसान्द्रमवतार्य तस्य पाणितलं पूर्णमप्रातराशो मधुमिश्रं लिह्यात्; एवं शालसारादौ न्यग्रोधादावारग्वधादौ च लेहान् कारयेत् ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

অতশ্চূর্ণক্রিযাং বক্ষ্যামঃ- শালসারাদীনাং সারচূর্ণপ্রস্থমাহৃত্যারগ্বধাদিকষাযপরিপীতমনেকশঃ শালসারাদিকষাযেণৈব পাযযেত্; এবং ন্যগ্রোধাদীনাং ফলেষু, পুষ্পেষ্বারগ্বধাদীনাং চূর্ণক্রিযাং কারযেত্ ||১০||

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अतश्चूर्णक्रियां वक्ष्यामः- शालसारादीनां सारचूर्णप्रस्थमाहृत्यारग्वधादिकषायपरिपीतमनेकशः शालसारादिकषायेणैव पाययेत्; एवं न्यग्रोधादीनां फलेषु, पुष्पेष्वारग्वधादीनां चूर्णक्रियां कारयेत् ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

অত ঊর্ধ্বমযস্কৃতীর্বক্ষ্যামঃ- তীক্ষ্ণলোহপত্রাণি তনূনি লবণবর্গপ্রদিগ্ধানি গোমযাগ্নিপ্রতপ্তানি ত্রিফলাশালসারাদিকষাযেণ নির্বাপযেত্ ষোডশবারান্, ততঃ খদিরাঙ্গারতপ্তান্যুপশান্ততাপানি সূক্ষ্মচূর্ণানি কারযেদ্ধনতান্তবপরিস্রাবিতানি , ততো যথাবলং মাত্রাং সর্পির্মধুভ্যাং সংসৃজ্যোপযুঞ্জীত, জীর্ণে যথাব্যাধ্যনম্লমলবণমাহারং কুর্বীত, এবং তুলামুপযুজ্য কুষ্ঠমেহমেদঃশ্বযথুপাণ্ডুরোগোন্মাদাপস্মারানপহত্য বর্ষশতং জীবতি, তুলাযাং তুলাযাং বর্ষশতমুত্কর্ষঃ, এতেন সর্বলৌহেষ্বযস্কৃতযো ব্যাখ্যাতাঃ ||১১||

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अत ऊर्ध्वमयस्कृतीर्वक्ष्यामः- तीक्ष्णलोहपत्राणि तनूनि लवणवर्गप्रदिग्धानि गोमयाग्निप्रतप्तानि त्रिफलाशालसारादिकषायेण निर्वापयेत् षोडशवारान्, ततः खदिराङ्गारतप्तान्युपशान्ततापानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेद्धनतान्तवपरिस्रावितानि , ततो यथाबलं मात्रां सर्पिर्मधुभ्यां संसृज्योपयुञ्जीत, जीर्णे यथाव्याध्यनम्लमलवणमाहारं कुर्वीत, एवं तुलामुपयुज्य कुष्ठमेहमेदःश्वयथुपाण्डुरोगोन्मादापस्मारानपहत्य वर्षशतं जीवति, तुलायां तुलायां वर्षशतमुत्कर्षः, एतेन सर्वलौहेष्वयस्कृतयो व्याख्याताः ||११||

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Adhikarana 10 (12) · Śloka 12

ত্রিবৃচ্ছযামাগ্নিমন্থসপ্তলাকেবুকশঙ্খিনীতিল্বকত্রিফলাপলাশশিংশপানাং স্বরসমাদায পালাশ্যাং দ্রোণ্যামভ্যাসিচ্য খদিরাঙ্গারতপ্তমযঃপিণ্ডং ত্রিসপ্তকৃত্বো নির্বাপ্য তমাদায পুনরাসিচ্য স্থাল্যাং গোমযাগ্নিনা বিপচেত্, ততশ্চতুর্থভাগাবশিষ্টমবতার্য পরিস্রাব্য ভূযোঽগ্নিতপ্তান্যযঃপত্রাণি প্রক্ষিপেত্, সিধ্যতি চাস্মিন্ পিপ্পল্যাদিচূর্ণভাগং দ্বৌ মধুনস্তাবদ্ধৃতস্যেতি দদ্যাত্, ততঃ প্রশান্তমাযসে পাত্রে স্বনুগুপ্তং নিদধ্যাত্, ততো যথাযোগং শুক্তিং প্রকুঞ্চং বোপযুঞ্জীত, জীর্ণে যথাব্যাধ্যাহারমুপসেবেত | এষৌষধাযস্কৃতিরসাধ্যং কুষ্ঠং প্রমেহং বা সাধযতি, স্থূলমপকর্ষতি, শোফমুপহন্তি, সন্নমগ্নিমুদ্ধরতি, বিশেষেণ চোপদিশ্যতে রাজযক্ষ্মিণাং, বর্ষশতাযুশ্চানযা পুরুষো ভবতি | শালসারাদিক্বাথমাসিচ্য পালাশ্যাং দ্রোণ্যামযোঘনাংস্তপ্তান্নির্বাপ্য কৃতসংস্কারে কলশেঽভ্যাসিচ্য পিপ্পল্যাদিচূর্ণভাগং ক্ষৌদ্রং গুডমিতি চ দত্ত্বা স্বনুগুপ্তং নিদধ্যাত্, এতাং মহৌষধাযস্কৃতিং মাসমর্ধমাসং বা স্থিতাং যথাবলমুপযুঞ্জীত | এবং ন্যগ্রোধাদাবারেবতাদিষু চ বিদধ্যাত্ ||১২||

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त्रिवृच्छयामाग्निमन्थसप्तलाकेवुकशङ्खिनीतिल्वकत्रिफलापलाशशिंशपानां स्वरसमादाय पालाश्यां द्रोण्यामभ्यासिच्य खदिराङ्गारतप्तमयःपिण्डं त्रिसप्तकृत्वो निर्वाप्य तमादाय पुनरासिच्य स्थाल्यां गोमयाग्निना विपचेत्, ततश्चतुर्थभागावशिष्टमवतार्य परिस्राव्य भूयोऽग्नितप्तान्ययःपत्राणि प्रक्षिपेत्, सिध्यति चास्मिन् पिप्पल्यादिचूर्णभागं द्वौ मधुनस्तावद्धृतस्येति दद्यात्, ततः प्रशान्तमायसे पात्रे स्वनुगुप्तं निदध्यात्, ततो यथायोगं शुक्तिं प्रकुञ्चं वोपयुञ्जीत, जीर्णे यथाव्याध्याहारमुपसेवेत | एषौषधायस्कृतिरसाध्यं कुष्ठं प्रमेहं वा साधयति, स्थूलमपकर्षति, शोफमुपहन्ति, सन्नमग्निमुद्धरति, विशेषेण चोपदिश्यते राजयक्ष्मिणां, वर्षशतायुश्चानया पुरुषो भवति | शालसारादिक्वाथमासिच्य पालाश्यां द्रोण्यामयोघनांस्तप्तान्निर्वाप्य कृतसंस्कारे कलशेऽभ्यासिच्य पिप्पल्यादिचूर्णभागं क्षौद्रं गुडमिति च दत्त्वा स्वनुगुप्तं निदध्यात्, एतां महौषधायस्कृतिं मासमर्धमासं वा स्थितां यथाबलमुपयुञ्जीत | एवं न्यग्रोधादावारेवतादिषु च विदध्यात् ||१२||

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Adhikarana 11 (13) · Śloka 13

অতঃ খদিরবিধানমুপদেক্ষ্যামঃ- প্রশস্তদেশজাতমনুপহতং মধ্যমবযসং খদিরং পরিতঃ খানযিত্বা তস্য মধ্যমং মূলং ছিত্ত্বাঽযোমযং কুম্ভং তস্মিন্নন্তরে নিদধ্যাদ্যথা রসগ্রহণসমর্থো ভবতি, ততস্তং গোমযমৃদাঽবলিপ্তমবকীর্যেন্ধনৈর্গোমযমিশ্রৈরাদীপযেদ্যথাঽস্য দহ্যমানস্য রসঃ স্রবত্যধস্তাত্, তদ্যদা জানীযাত্ পূর্ণং ভাজনমিতি, অথৈনমুদ্ধৃত্য পরিস্রাব্য রসমন্যস্মিন্ পাত্রে নিধাযানুগুপ্তং নিদধ্যাত্, ততো যথাযোগং মাত্রামামলকরসমধুসর্পির্ভিঃ সংসৃজ্যোপযুঞ্জীত, জীর্ণে ভল্লাতকবিধানবদাহারঃ পরিহারশ্চ, প্রস্থে চোপযুক্তে শতং বর্ষাণামাযুষোঽভিবৃদ্ধির্ভবতি | খদিরসারতুলামুদকদ্রোণে বিপাচ্য ষোডশাংশাবশিষ্টমবতার্যানুগুপ্তং নিদধ্যাত্, তমামলকরসমধুসর্পির্ভিঃ সংসৃজ্যোপযুঞ্জীত | এষ এব সর্ববৃক্ষসারেষু কল্পঃ | খদিরসারচূর্ণতুলাং খদিরসারক্বাথমাত্রাং বা প্রাতঃ প্রাতরুপসেবেত, খদিরসারক্বাথসিদ্ধমাবিকং বা সর্পিঃ ||১৩||

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अतः खदिरविधानमुपदेक्ष्यामः- प्रशस्तदेशजातमनुपहतं मध्यमवयसं खदिरं परितः खानयित्वा तस्य मध्यमं मूलं छित्त्वाऽयोमयं कुम्भं तस्मिन्नन्तरे निदध्याद्यथा रसग्रहणसमर्थो भवति, ततस्तं गोमयमृदाऽवलिप्तमवकीर्येन्धनैर्गोमयमिश्रैरादीपयेद्यथाऽस्य दह्यमानस्य रसः स्रवत्यधस्तात्, तद्यदा जानीयात् पूर्णं भाजनमिति, अथैनमुद्धृत्य परिस्राव्य रसमन्यस्मिन् पात्रे निधायानुगुप्तं निदध्यात्, ततो यथायोगं मात्रामामलकरसमधुसर्पिर्भिः संसृज्योपयुञ्जीत, जीर्णे भल्लातकविधानवदाहारः परिहारश्च, प्रस्थे चोपयुक्ते शतं वर्षाणामायुषोऽभिवृद्धिर्भवति | खदिरसारतुलामुदकद्रोणे विपाच्य षोडशांशावशिष्टमवतार्यानुगुप्तं निदध्यात्, तमामलकरसमधुसर्पिर्भिः संसृज्योपयुञ्जीत | एष एव सर्ववृक्षसारेषु कल्पः | खदिरसारचूर्णतुलां खदिरसारक्वाथमात्रां वा प्रातः प्रातरुपसेवेत, खदिरसारक्वाथसिद्धमाविकं वा सर्पिः ||१३||

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Adhikarana 12 (14) · Śloka 14

অমৃতবল্লীস্বরসং ক্বাথং বা প্রাতঃ প্রাতরুপসেবেত, তত্সিদ্ধং বা সর্পিঃ, অপরাহ্ণে সসর্পিষ্কমোদনমামলকযূষেণ ভুঞ্জীত; এবং মাসমুপযুজ্য সর্বকুষ্ঠৈর্বিমুচ্যত ইতি ||১৪||

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अमृतवल्लीस्वरसं क्वाथं वा प्रातः प्रातरुपसेवेत, तत्सिद्धं वा सर्पिः, अपराह्णे ससर्पिष्कमोदनमामलकयूषेण भुञ्जीत; एवं मासमुपयुज्य सर्वकुष्ठैर्विमुच्यत इति ||१४||

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Adhikarana 13 (15-16) · Śloka 16

কৃষ্ণতিলভল্লাতকতৈলামলকরসসর্পিষাং দ্রোণং শালসারাদিকষাযস্য চ, ত্রিফলাত্রিকটুকপরূষফলমজ্জবিডঙ্গফলসারচিত্রার্কাবল্গুজহরিদ্রাদ্বযত্রিবৃদ্দন্তীদ্রবন্তীন্দ্রযবযষ্টীমধুকাতিবিষারসাঞ্জনপ্রিযঙ্গূণাং পালিকা ভাগাস্তানৈকধ্যং স্নেহপাকবিধানেন পচেত্, তত্ সাধুসিদ্ধমবতার্য পরিস্রাব্যানুগুপ্তং নিদধ্যাত্, তত উপসংস্কৃতশরীরঃ প্রাতঃ প্রাতরুত্থায পাণিশুক্তিমাত্রং ক্ষৌদ্রেণ প্রতিসংসৃজ্যোপযুঞ্জীত, জীর্ণে মুদ্গামলকযূষেণালবণেন সর্পিষ্মন্তং খদিরোদকসিদ্ধং মৃদ্বোদনমশ্নীযাত্ খদিরোদকসেবী, ইত্যেবং দ্রোণমুপযুজ্য সর্বকুষ্ঠৈর্বিমুক্তঃ শুদ্ধতনুঃ স্মৃতিমান্ বর্ষশতাযুররোগো ভবতি ||১৫|| ভবতি চাত্র- সুরামন্থাসবারিষ্টাংল্লেহাংশ্চূর্ণান্যযস্কৃতীঃ | সহস্রশোঽপি কুর্বীত বীজেনানেন বুদ্ধিমান্ ||১৬||

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कृष्णतिलभल्लातकतैलामलकरससर्पिषां द्रोणं शालसारादिकषायस्य च, त्रिफलात्रिकटुकपरूषफलमज्जविडङ्गफलसारचित्रार्कावल्गुजहरिद्राद्वयत्रिवृद्दन्तीद्रवन्तीन्द्रयवयष्टीमधुकातिविषारसाञ्जनप्रियङ्गूणां पालिका भागास्तानैकध्यं स्नेहपाकविधानेन पचेत्, तत् साधुसिद्धमवतार्य परिस्राव्यानुगुप्तं निदध्यात्, तत उपसंस्कृतशरीरः प्रातः प्रातरुत्थाय पाणिशुक्तिमात्रं क्षौद्रेण प्रतिसंसृज्योपयुञ्जीत, जीर्णे मुद्गामलकयूषेणालवणेन सर्पिष्मन्तं खदिरोदकसिद्धं मृद्वोदनमश्नीयात् खदिरोदकसेवी, इत्येवं द्रोणमुपयुज्य सर्वकुष्ठैर्विमुक्तः शुद्धतनुः स्मृतिमान् वर्षशतायुररोगो भवति ||१५|| भवति चात्र- सुरामन्थासवारिष्टांल्लेहांश्चूर्णान्ययस्कृतीः | सहस्रशोऽपि कुर्वीत बीजेनानेन बुद्धिमान् ||१६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 10

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে মহাকুষ্ঠচিকিত্সিতং নাম দশমোঽধ্যাযঃ ||১০||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने महाकुष्ठचिकित्सितं नाम दशमोऽध्यायः ||१०||

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10. mahākuṣṭhacikitsitam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi