Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3
অথাতঃ কুষ্ঠচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
বিরুদ্ধাধ্যশনাসাত্ম্যবেগবিঘাতৈঃ স্নেহাদীনাং চাযথারম্ভৈঃ পাপক্রিযযা পুরাকৃতকর্মযোগাচ্চ ত্বগ্দোষা ভবন্তি ||৩||
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अथातः कुष्ठचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
विरुद्धाध्यशनासात्म्यवेगविघातैः स्नेहादीनां चायथारम्भैः पापक्रियया पुराकृतकर्मयोगाच्च त्वग्दोषा भवन्ति ||३||
Adhikarana 2 (4) · Śloka 4
তত্র ত্বগ্দোষী মাংসবসাদুগ্ধদধিতৈলকুলত্থমাষনিষ্পাবেক্ষুপিষ্টবিকারাম্লবিরুদ্ধাধ্যশনাজীর্ণবিদাহ্যভিষ্যন্দীনি দিবাস্বপ্নং ব্যবাযং চ পরিহরেত্ ||৪||
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तत्र त्वग्दोषी मांसवसादुग्धदधितैलकुलत्थमाषनिष्पावेक्षुपिष्टविकाराम्लविरुद्धाध्यशनाजीर्णविदाह्यभिष्यन्दीनि दिवास्वप्नं व्यवायं च परिहरेत् ||४||
Adhikarana 3 (5) · Śloka 5
ততঃ শালিষষ্টিকযবগোধূমকোরদূষশ্যামাকোদ্দালকাদীননবান্ ভুঞ্জীত মুদ্গাঢক্যোরন্যতরস্য যূষেণ সূপেন বা নিম্বপত্রারুষ্করব্যামিশ্রেণ, মণ্ডূকপর্ণ্যবল্গুজাটরূষকরূপিকাপুষ্পৈঃ সর্পিঃসিদ্ধৈঃ সর্ষপতৈলসিদ্ধৈর্বা, তিক্তবর্গেণ বাঽভিহিতেন; মাংসসাত্ম্যায বা জাঙ্গলমাংসমমেদস্কং বিতরেত্; তৈলং বজ্রকমভ্যঙ্গার্থে; আরগ্বধাদিকষাযমুত্সাদনার্থে; পানপরিষেকাবগাহাদিষু চ খদিরকষাযম্; ইত্যেষ আহারাচারবিভাগঃ ||৫||
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ततः शालिषष्टिकयवगोधूमकोरदूषश्यामाकोद्दालकादीननवान् भुञ्जीत मुद्गाढक्योरन्यतरस्य यूषेण सूपेन वा निम्बपत्रारुष्करव्यामिश्रेण, मण्डूकपर्ण्यवल्गुजाटरूषकरूपिकापुष्पैः सर्पिःसिद्धैः सर्षपतैलसिद्धैर्वा, तिक्तवर्गेण वाऽभिहितेन; मांससात्म्याय वा जाङ्गलमांसममेदस्कं वितरेत्; तैलं वज्रकमभ्यङ्गार्थे; आरग्वधादिकषायमुत्सादनार्थे; पानपरिषेकावगाहादिषु च खदिरकषायम्; इत्येष आहाराचारविभागः ||५||
Adhikarana 4 (6) · Śloka 6
তত্র পূর্বরূপেষূভযতঃ সংশোধনমাসেবেত |
তত্র ত্বক্সম্প্রাপ্তে শোধনালেপনানি, শোণিতপ্রাপ্তে সংশোধনালেপনকষাযপানশোণিতাবসেচনানি, মাংসপ্রাপ্তে শোধনালেপনকষাযপানশোণিতাবসেচনারিষ্টমন্থপ্রাশাঃ, চতুর্থকর্মগুণপ্রাপ্তং যাপ্যমাত্মবতঃ সংবিধানবতশ্চ, তত্র সংশোধনাচ্ছোণিতাবসেচনাচ্চোর্ধ্বং ভল্লাতশিলাজতুধাতুমাক্ষীকগুগ্গুল্বগুরুতুবরকখদিরাসনাযস্কৃতিবিধানমাসেবেত; পঞ্চমং নৈবোপক্রমেত্ ||৬||
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तत्र पूर्वरूपेषूभयतः संशोधनमासेवेत |
तत्र त्वक्सम्प्राप्ते शोधनालेपनानि, शोणितप्राप्ते संशोधनालेपनकषायपानशोणितावसेचनानि, मांसप्राप्ते शोधनालेपनकषायपानशोणितावसेचनारिष्टमन्थप्राशाः, चतुर्थकर्मगुणप्राप्तं याप्यमात्मवतः संविधानवतश्च, तत्र संशोधनाच्छोणितावसेचनाच्चोर्ध्वं भल्लातशिलाजतुधातुमाक्षीकगुग्गुल्वगुरुतुवरकखदिरासनायस्कृतिविधानमासेवेत; पञ्चमं नैवोपक्रमेत् ||६||
Adhikarana 5 (7) · Śloka 7
তত্র প্রথমমেব কুষ্ঠিনং স্নেহপানবিধানেনোপপাদযেত্ |
মেষশৃঙ্গীশ্বদংষ্ট্রাশার্ঙ্গেষ্টাগুডূচীদ্বিপঞ্চমূলীসিদ্ধং তৈলং ঘৃতং বা বাতকুষ্ঠিনাং পানাভ্যঙ্গযোর্বিদধ্যাত্, ধবাশ্বকর্ণককুভপলাশপিচুমর্দপর্পটকমধুকরোধ্রসমঙ্গাসিদ্ধং সর্পিঃ পিত্তকুষ্ঠিনাং, প্রিযালশালারগ্বধনিম্বসপ্তপর্ণচিত্রকমরিচবচাকুষ্ঠসিদ্ধং শ্লেষ্মকুষ্ঠিনাং ভল্লাতকাভযাবিডঙ্গসিদ্ধং বা, সর্বেষাং তুবরকতৈলং ভল্লাতকতৈলং বেতি ||৭||
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तत्र प्रथममेव कुष्ठिनं स्नेहपानविधानेनोपपादयेत् |
मेषशृङ्गीश्वदंष्ट्राशार्ङ्गेष्टागुडूचीद्विपञ्चमूलीसिद्धं तैलं घृतं वा वातकुष्ठिनां पानाभ्यङ्गयोर्विदध्यात्, धवाश्वकर्णककुभपलाशपिचुमर्दपर्पटकमधुकरोध्रसमङ्गासिद्धं सर्पिः पित्तकुष्ठिनां, प्रियालशालारग्वधनिम्बसप्तपर्णचित्रकमरिचवचाकुष्ठसिद्धं श्लेष्मकुष्ठिनां भल्लातकाभयाविडङ्गसिद्धं वा, सर्वेषां तुवरकतैलं भल्लातकतैलं वेति ||७||
Adhikarana 6 (8-9) · Śloka 9
সপ্তপর্ণারগ্বধাতিবিষেক্ষুরপাঠাকটুরোহিণ্যমৃতাত্রিফলাপটোলপিচুমর্দপর্পটকদুরালভাত্রাযমাণামুস্তাচন্দনপদ্মক- হরিদ্রোপকুল্যাবিশালামূর্বাশতাবরীসারিবেন্দ্রযবাটরূষকষড্গ্রন্থামধুকভূনিম্বগৃষ্টিকা ইতি সমভাগাঃ কল্কঃস্যাত্, কল্কাচ্চতুর্গুণং সর্পিঃ প্রক্ষিপ্য তদ্দ্বিগুণো ধাত্রীফলরসস্তচ্চতুর্গুণা আপস্তদৈকধ্যং সমালোড্য বিপচেত্, এতন্মহাতিক্তকং নাম সর্পিঃ কুষ্ঠবিষমজ্বররক্তপিত্তহৃদ্রোগোন্মাদাপস্মারগুল্মপিডকাসৃগ্দরগলগণ্ডগণ্ডমালা- শ্লীপদপাণ্ডুরোগবিসর্পার্শঃষাণ্ঢ্যকণ্ডূপামাদীঞ্ছমযেদিতি ||৮||
ত্রিফলাপটোলপিচুমন্দাটরূষককটুরোহিণীদুরালভাত্রাযমাণাঃ পর্পটকশ্চৈতেষাং দ্বিপলিকান্ ভাগাঞ্জলদ্রোণে প্রক্ষিপ্য পাদাবশেষং কষাযমাদায কল্কপেষ্যাণীমানি ভেষজান্যর্ধপলিকানি ত্রাযমাণামুস্তেন্দ্রযবচন্দনকিরাততিক্তানি পিপ্পল্যশ্চৈতানি ঘৃতপ্রস্থে সমাবাপ্য বিপচেত্, এতত্তিক্তকং নাম সর্পিঃ কুষ্ঠবিষমজ্বরগুল্মার্শোগ্রহণীদোষশোফপাণ্ডুরোগবিসর্পষাণ্ঢ্যশমনমূর্ধ্বজত্রুগতরোগঘ্নং চেতি ||৯||
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सप्तपर्णारग्वधातिविषेक्षुरपाठाकटुरोहिण्यमृतात्रिफलापटोलपिचुमर्दपर्पटकदुरालभात्रायमाणामुस्ताचन्दनपद्मक- हरिद्रोपकुल्याविशालामूर्वाशतावरीसारिवेन्द्रयवाटरूषकषड्ग्रन्थामधुकभूनिम्बगृष्टिका इति समभागाः कल्कःस्यात्, कल्काच्चतुर्गुणं सर्पिः प्रक्षिप्य तद्द्विगुणो धात्रीफलरसस्तच्चतुर्गुणा आपस्तदैकध्यं समालोड्य विपचेत्, एतन्महातिक्तकं नाम सर्पिः कुष्ठविषमज्वररक्तपित्तहृद्रोगोन्मादापस्मारगुल्मपिडकासृग्दरगलगण्डगण्डमाला- श्लीपदपाण्डुरोगविसर्पार्शःषाण्ढ्यकण्डूपामादीञ्छमयेदिति ||८||
त्रिफलापटोलपिचुमन्दाटरूषककटुरोहिणीदुरालभात्रायमाणाः पर्पटकश्चैतेषां द्विपलिकान् भागाञ्जलद्रोणे प्रक्षिप्य पादावशेषं कषायमादाय कल्कपेष्याणीमानि भेषजान्यर्धपलिकानि त्रायमाणामुस्तेन्द्रयवचन्दनकिराततिक्तानि पिप्पल्यश्चैतानि घृतप्रस्थे समावाप्य विपचेत्, एतत्तिक्तकं नाम सर्पिः कुष्ठविषमज्वरगुल्मार्शोग्रहणीदोषशोफपाण्डुरोगविसर्पषाण्ढ्यशमनमूर्ध्वजत्रुगतरोगघ्नं चेति ||९||
Adhikarana 7 (10) · Śloka 11
অতোঽন্যতমেন ঘৃতেন স্নিগ্ধস্বিন্নস্যৈকাং দ্বে তিস্রশ্চতস্রঃ পঞ্চ বা সিরা বিধ্যেত্; মণ্ডলানি চোত্সন্নান্যবলিখেদভীক্ষ্ণং, প্রচ্ছযেদ্বা, সমুদ্রফেনশাকগোজীকাকোদুম্বরিকাপত্রৈর্বাঽবঘৃষ্যালেপযেল্লাক্ষাসর্জরসরসাঞ্জন- প্রপুন্নডাবল্গুজতেজোবত্যশ্বমারকার্ককুটজারেবতমূলকল্কৈর্মূত্রপিষ্টৈঃ পিত্তপিষ্টৈর্বা, স্বর্জিকাতুত্থকাসীসবিডঙ্গাগারধূমচিত্রককটুকসুধাহরিদ্রাসৈন্ধবকল্কৈর্বা, এতান্যেবাবাপ্য ক্ষারকল্পেন নিঃস্রুতে পালাশে ক্ষারে ততো বিপাচ্য ফাণীতমিব সঞ্জাতমবতার্য লেপযেত্, জ্যোতিষ্কফললাক্ষামরিচপিপ্পলীসুমনঃপত্রৈর্বা, হরিতালমনঃশিলার্কক্ষীরতিলশিগ্রুমরিচকল্কৈর্বা, স্বর্জিকাকুষ্ঠতুত্থকুটজচিত্রকবিডঙ্গমরিচরোধ্রমনঃশিলাকল্কৈর্বা, হরীতকীকরঞ্জিকাবিডঙ্গসিদ্ধার্থকলবণরোচনাবল্গুজহরিদ্রাকল্কৈর্বা ||১০||
সর্বে কুষ্ঠাপহাঃ সিদ্ধা লেপাঃ সপ্ত প্রকীর্তিতাঃ |১১|
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अतोऽन्यतमेन घृतेन स्निग्धस्विन्नस्यैकां द्वे तिस्रश्चतस्रः पञ्च वा सिरा विध्येत्; मण्डलानि चोत्सन्नान्यवलिखेदभीक्ष्णं, प्रच्छयेद्वा, समुद्रफेनशाकगोजीकाकोदुम्बरिकापत्रैर्वाऽवघृष्यालेपयेल्लाक्षासर्जरसरसाञ्जन- प्रपुन्नडावल्गुजतेजोवत्यश्वमारकार्ककुटजारेवतमूलकल्कैर्मूत्रपिष्टैः पित्तपिष्टैर्वा, स्वर्जिकातुत्थकासीसविडङ्गागारधूमचित्रककटुकसुधाहरिद्रासैन्धवकल्कैर्वा, एतान्येवावाप्य क्षारकल्पेन निःस्रुते पालाशे क्षारे ततो विपाच्य फाणीतमिव सञ्जातमवतार्य लेपयेत्, ज्योतिष्कफललाक्षामरिचपिप्पलीसुमनःपत्रैर्वा, हरितालमनःशिलार्कक्षीरतिलशिग्रुमरिचकल्कैर्वा, स्वर्जिकाकुष्ठतुत्थकुटजचित्रकविडङ्गमरिचरोध्रमनःशिलाकल्कैर्वा, हरीतकीकरञ्जिकाविडङ्गसिद्धार्थकलवणरोचनावल्गुजहरिद्राकल्कैर्वा ||१०||
सर्वे कुष्ठापहाः सिद्धा लेपाः सप्त प्रकीर्तिताः |११|
Adhikarana 8 (11-12) · Śloka 12
বৈশেষিকানতস্তূর্ধ্বং দদ্রূশ্বিত্রেষু মে শৃণু ||১১||
লাক্ষা কুষ্ঠং সর্ষপাঃ শ্রীনিকেতং রাত্রির্ব্যোষং চক্রমর্দস্য বীজম্ |
কৃত্বৈকস্থং তক্রপিষ্টঃ প্রলেপো দদ্রূষূক্তো মূলকাদ্বীজযুক্তঃ ||১২||
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वैशेषिकानतस्तूर्ध्वं दद्रूश्वित्रेषु मे शृणु ||११||
लाक्षा कुष्ठं सर्षपाः श्रीनिकेतं रात्रिर्व्योषं चक्रमर्दस्य बीजम् |
कृत्वैकस्थं तक्रपिष्टः प्रलेपो दद्रूषूक्तो मूलकाद्बीजयुक्तः ||१२||
Adhikarana 9 (13) · Śloka 13
সিন্ধূদ্ভূতং চক্রমর্দস্য বীজমিক্ষূদ্ভূতং কেশরং তার্ক্ষ্যশৈলম্ |
পিষ্টো লেপোঽযং কপিত্থাদ্রসেন দদ্রূস্তূর্ণং নাশযত্যেষ যোগঃ ||১৩||
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सिन्धूद्भूतं चक्रमर्दस्य बीजमिक्षूद्भूतं केशरं तार्क्ष्यशैलम् |
पिष्टो लेपोऽयं कपित्थाद्रसेन दद्रूस्तूर्णं नाशयत्येष योगः ||१३||
Adhikarana 10 (14) · Śloka 14
হেমক্ষীরী ব্যাধিঘাতঃ শিরীষো নিম্বঃ সর্জো বত্সকঃ সাজকর্ণঃ |
শীঘ্রং তীব্রা নাশযন্তীহ দদ্রূঃ স্নানালেপোদ্ধর্ষণেষূপযুক্তাঃ ||১৪||
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हेमक्षीरी व्याधिघातः शिरीषो निम्बः सर्जो वत्सकः साजकर्णः |
शीघ्रं तीव्रा नाशयन्तीह दद्रूः स्नानालेपोद्धर्षणेषूपयुक्ताः ||१४||
Adhikarana 11 (15) · Śloka 15
ভদ্রাসঞ্জ্ঞোদুম্বরীমূলতুল্যং দত্ত্বা মূলং ক্ষোদযিত্বা মলপ্বাঃ |
সিদ্ধং তোযং পীতমুষ্ণে সুখোষ্ণং স্ফোটাঞ্ছ্বিত্রে পুণ্ডরীকে চ কুর্যাত্ ||১৫||
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भद्रासञ्ज्ञोदुम्बरीमूलतुल्यं दत्त्वा मूलं क्षोदयित्वा मलप्वाः |
सिद्धं तोयं पीतमुष्णे सुखोष्णं स्फोटाञ्छ्वित्रे पुण्डरीके च कुर्यात् ||१५||
Adhikarana 12 (16) · Śloka 16
দ্বৈপং দগ্ধং চর্ম মাতঙ্গজং বা ভিন্নে স্ফোটে তৈলযুক্তং প্রলেপঃ |১৬|
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द्वैपं दग्धं चर्म मातङ्गजं वा भिन्ने स्फोटे तैलयुक्तं प्रलेपः |१६|
Adhikarana 13 (16) · Śloka 16
পূতিঃ কীটো রাজবৃক্ষোদ্ভবেন ক্ষারেণাক্তঃ শ্বিত্রমেকো নিহন্তি ||১৬||
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पूतिः कीटो राजवृक्षोद्भवेन क्षारेणाक्तः श्वित्रमेको निहन्ति ||१६||
Adhikarana 14 (17) · Śloka 17
কৃষ্ণস্য সর্পস্য মসী সুদগ্ধা বৈভীতকং তৈলমথ দ্বিতীযম্ |
এতত্ সমস্তং মৃদিতং প্রলেপাচ্ছ্বিত্রাণি অর্বাণ্যপহন্তি শীঘ্রম্ ||১৭||
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कृष्णस्य सर्पस्य मसी सुदग्धा बैभीतकं तैलमथ द्वितीयम् |
एतत् समस्तं मृदितं प्रलेपाच्छ्वित्राणि अर्वाण्यपहन्ति शीघ्रम् ||१७||
Adhikarana 15 (18) · Śloka 18
অধ্যর্ধতোযে সুভতিস্রুতস্য ক্ষারস্য কল্পেন তু সপ্তকৃত্বঃ |
তৈলং শৃতং তেন চতুর্গুণেন শ্বিত্রাপহং ম্রক্ষণমেতদগ্র্যম্ ||১৮||
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अध्यर्धतोये सुभतिस्रुतस्य क्षारस्य कल्पेन तु सप्तकृत्वः |
तैलं शृतं तेन चतुर्गुणेन श्वित्रापहं म्रक्षणमेतदग्र्यम् ||१८||
Adhikarana 16 (19-20) · Śloka 20
ঘৃতেন যুক্তং প্রপুনাডবীজং কুষ্ঠং চ যষ্টীমধুকং চ পিষ্ট্বা |
শ্বেতায দদ্যাদ্গৃহকুক্কুটায চতুর্থভক্তায বুভুক্ষিতায ||১৯||
তস্যোপসঙ্গৃহ্য চ তত্ পুরীষমুত্পাচিতং সর্বত এব লিম্পেত্ |
অভ্যন্তরং মাসমিমং প্রযোগং প্রযোজযেচ্ছ্বিত্রমথো নিহন্তি ||২০||
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घृतेन युक्तं प्रपुनाडबीजं कुष्ठं च यष्टीमधुकं च पिष्ट्वा |
श्वेताय दद्याद्गृहकुक्कुटाय चतुर्थभक्ताय बुभुक्षिताय ||१९||
तस्योपसङ्गृह्य च तत् पुरीषमुत्पाचितं सर्वत एव लिम्पेत् |
अभ्यन्तरं मासमिमं प्रयोगं प्रयोजयेच्छ्वित्रमथो निहन्ति ||२०||
Adhikarana 17 (21-22) · Śloka 22
ক্ষারে সুদগ্ধে জলগণ্ডজে তু গজস্য মূত্রেণ বহুস্রুতে চ |
দ্রোণপ্রমাণে দশভাগযুক্তং দত্ত্বা পচেদ্বীজমবল্গুজস্য ||২১||
এতদ্যদা চিক্কণতামুপৈতি তদা সমস্তং গুটিকা বিদধ্যাত্ |
শ্বিত্রং প্রলিম্পেদথ সম্প্রঘৃষ্য তযা ব্রজেদাশু সবর্ণভাবম্ ||২২||
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क्षारे सुदग्धे जलगण्डजे तु गजस्य मूत्रेण बहुस्रुते च |
द्रोणप्रमाणे दशभागयुक्तं दत्त्वा पचेद्बीजमवल्गुजस्य ||२१||
एतद्यदा चिक्कणतामुपैति तदा समस्तं गुटिका विदध्यात् |
श्वित्रं प्रलिम्पेदथ सम्प्रघृष्य तया व्रजेदाशु सवर्णभावम् ||२२||
Adhikarana 18 (23-24) · Śloka 24
কষাযকল্পেন সুভাবিতাং তু জলং ত্বচা চূতহরীতকীনাম্ |
তাং তাম্রদীপে প্রণিধায ধীমান্ বর্তিং বটক্ষীরসুভাবিতাং তু ||২৩||
আদীপ্য তজ্জাতমসীং গৃহীত্বা তাং চাপি পথ্যাম্ভসি ভাবযিত্বা |
সম্প্রচ্ছিতং তদ্বহুশঃ কিলাসং তৈলেন সিক্তং কটুনা প্রযাতি ||২৪||
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कषायकल्पेन सुभावितां तु जलं त्वचा चूतहरीतकीनाम् |
तां ताम्रदीपे प्रणिधाय धीमान् वर्तिं वटक्षीरसुभावितां तु ||२३||
आदीप्य तज्जातमसीं गृहीत्वा तां चापि पथ्याम्भसि भावयित्वा |
सम्प्रच्छितं तद्बहुशः किलासं तैलेन सिक्तं कटुना प्रयाति ||२४||
Adhikarana 19 (25-26) · Śloka 26
আবল্গুজং বীজমগ্র্যং নদীজং কাকাহ্বানোদুম্বরী যা চ লাক্ষা |
লৌহং চূর্ণং মাগধী তার্ক্ষ্যশৈলং তুল্যাঃ কার্যাঃ কৃষ্ণবর্ণাস্তিলাশ্চ ||২৫||
বর্তিং কৃত্বা তাং গবাং পিত্তপিষ্টাং লেপঃ কার্যঃ শ্বিত্রিণাং শ্বিত্রহারী |
লেপাত্ পিত্তং শৈখিনং শ্বিত্রহারি হ্রীবেরং বা দগ্ধমেতেন যুক্তম্ ||২৬||
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आवल्गुजं बीजमग्र्यं नदीजं काकाह्वानोदुम्बरी या च लाक्षा |
लौहं चूर्णं मागधी तार्क्ष्यशैलं तुल्याः कार्याः कृष्णवर्णास्तिलाश्च ||२५||
वर्तिं कृत्वा तां गवां पित्तपिष्टां लेपः कार्यः श्वित्रिणां श्वित्रहारी |
लेपात् पित्तं शैखिनं श्वित्रहारि ह्रीबेरं वा दग्धमेतेन युक्तम् ||२६||
Adhikarana 20 (27-28) · Śloka 29
তুত্থালকটুকাব্যোষসিংহার্কহযমারকাঃ |
কুষ্ঠাবল্গুজভল্লাতক্ষীরিণীসর্ষপাঃ স্নুহী ||২৭||
তিল্বকারিষ্টপীলূনাং পত্রাণ্যারগ্বধস্য চ |
বীজং বিডঙ্গাশ্বহন্ত্রোর্হরিদ্রে বৃহতীদ্বযম্ ||২৮||
আভ্যাং শ্বিত্রাণি যোগাভ্যাং লেপান্নশ্যন্ত্যশেষতঃ |২৯|
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तुत्थालकटुकाव्योषसिंहार्कहयमारकाः |
कुष्ठावल्गुजभल्लातक्षीरिणीसर्षपाः स्नुही ||२७||
तिल्वकारिष्टपीलूनां पत्राण्यारग्वधस्य च |
बीजं विडङ्गाश्वहन्त्रोर्हरिद्रे बृहतीद्वयम् ||२८||
आभ्यां श्वित्राणि योगाभ्यां लेपान्नश्यन्त्यशेषतः |२९|
Adhikarana 21 (29-33) · Śloka 33
বাযসীফল্গুতিক্তানাং শতং দত্ত্বা পৃথক্ পৃথক্ ||২৯||
দ্বে লোহরজসঃ প্রস্থে ত্রিফলাত্র্যাঢকং তথা |
ত্রিদ্রোণেঽপাং পচেদ্যাবদ্ভাগৌ দ্বাবসনাদপি ||৩০||
শিষ্টৌ চ বিপচেদ্ভূয এতৈঃ শ্লক্ষ্ণপ্রপেষিতৈঃ |
কল্কৈরিন্দ্রযবব্যোষত্বগ্দারুচতুরঙ্গুলৈঃ ||৩১||
পারাবতপদীদন্তীবাকুচীকেশরাহ্বযৈঃ |
কণ্টকার্যা চ তত্পক্বং ঘৃতং কুষ্ঠিষু যোজযেত্ ||৩২||
দোষধাত্বাশ্রিতং পানাদভ্যঙ্গাত্ত্বগ্গতং তথা |
অপ্যসাধ্যং নৃণাং কুষ্ঠং নাম্না নীলং নিযচ্ছতি ||৩৩||
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वायसीफल्गुतिक्तानां शतं दत्त्वा पृथक् पृथक् ||२९||
द्वे लोहरजसः प्रस्थे त्रिफलात्र्याढकं तथा |
त्रिद्रोणेऽपां पचेद्यावद्भागौ द्वावसनादपि ||३०||
शिष्टौ च विपचेद्भूय एतैः श्लक्ष्णप्रपेषितैः |
कल्कैरिन्द्रयवव्योषत्वग्दारुचतुरङ्गुलैः ||३१||
पारावतपदीदन्तीबाकुचीकेशराह्वयैः |
कण्टकार्या च तत्पक्वं घृतं कुष्ठिषु योजयेत् ||३२||
दोषधात्वाश्रितं पानादभ्यङ्गात्त्वग्गतं तथा |
अप्यसाध्यं नृणां कुष्ठं नाम्ना नीलं नियच्छति ||३३||
Adhikarana 22 (34-38) · Śloka 38
ত্রিফলাত্বক্ ত্রিকটুকং সুরসা মদযন্তিকা |
বাযস্যারগ্বধশ্চৈষাং তুলাং কুর্যাত্ পৃথক্ পৃথক্ ||৩৪||
কাকমাচ্যর্কবরুণদন্তীকুটজচিত্রকাত্ |
দার্বীনিদিগ্ধিকাভ্যাং তু পৃথগ্দশপলং তথা ||৩৫||
ত্রিদ্রোণেঽপাং পচেদ্যাবত্ ষট্প্রস্থং পরিশেষিতম্ |
শকৃদ্রসদধিক্ষীরমূত্রাণাং পৃথগাঢকম্ ||৩৬||
তদ্বদ্ধৃতস্য তত্সাধ্যং ভূনিম্বব্যোষচিত্রকৈঃ |
করঞ্জফলনীলিকাশ্যামাবল্গুজপীলুভিঃ ||৩৭||
নীলিনীনিম্বকুসুমৈঃ সিদ্ধং কুষ্ঠাপহং ঘৃতম্ |
ম্রক্ষণাদঙ্গসাবর্ণ্যং শ্বিত্রিণাং জনযেন্নৃণাম্ |
ভগন্দরং কৃমীনর্শো মহানীলং নিযচ্ছতি ||৩৮||
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त्रिफलात्वक् त्रिकटुकं सुरसा मदयन्तिका |
वायस्यारग्वधश्चैषां तुलां कुर्यात् पृथक् पृथक् ||३४||
काकमाच्यर्कवरुणदन्तीकुटजचित्रकात् |
दार्वीनिदिग्धिकाभ्यां तु पृथग्दशपलं तथा ||३५||
त्रिद्रोणेऽपां पचेद्यावत् षट्प्रस्थं परिशेषितम् |
शकृद्रसदधिक्षीरमूत्राणां पृथगाढकम् ||३६||
तद्वद्धृतस्य तत्साध्यं भूनिम्बव्योषचित्रकैः |
करञ्जफलनीलिकाश्यामावल्गुजपीलुभिः ||३७||
नीलिनीनिम्बकुसुमैः सिद्धं कुष्ठापहं घृतम् |
म्रक्षणादङ्गसावर्ण्यं श्वित्रिणां जनयेन्नृणाम् |
भगन्दरं कृमीनर्शो महानीलं नियच्छति ||३८||
Adhikarana 23 (39) · Śloka 39
মূত্রং গব্যং চিত্রকব্যোষযুক্তং সর্পিঃকুম্ভে ক্ষৌদ্রযুক্তং স্থিতং হি |
পক্ষাদূর্ধ্বং শ্বিত্রিভিঃ পেযমেতত্ |
কুর্যাচ্চাস্মিন্ কুষ্ঠদিষ্টং বিধানম্ ||৩৯||
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मूत्रं गव्यं चित्रकव्योषयुक्तं सर्पिःकुम्भे क्षौद्रयुक्तं स्थितं हि |
पक्षादूर्ध्वं श्वित्रिभिः पेयमेतत् |
कुर्याच्चास्मिन् कुष्ठदिष्टं विधानम् ||३९||
Adhikarana 24 (40) · Śloka 40
পূতীকার্কস্নুঙ্নরেন্দ্রদ্রুমাণাং মূত্রৈঃ পিষ্টাঃ পল্লবাঃ সৌমনাশ্চ |
লেপঃ শ্বিত্রং হন্তি দদ্রূর্ব্রণাংশ্চ দুষ্টান্যর্শাংস্যেষ নাডীব্রণাংশ্চ ||৪০||
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पूतीकार्कस्नुङ्नरेन्द्रद्रुमाणां मूत्रैः पिष्टाः पल्लवाः सौमनाश्च |
लेपः श्वित्रं हन्ति दद्रूर्व्रणांश्च दुष्टान्यर्शांस्येष नाडीव्रणांश्च ||४०||
Adhikarana 25 (41) · Śloka 41
অস্মাদূর্ধ্বং নিঃস্রুতে দুষ্টরক্তে জাতপ্রাণং সর্পিষা স্নেহযিত্বা |
তীক্ষ্ণৈর্যোগৈশ্ছর্দযিত্বা প্রগাঢং পশ্চাদ্দোষং নির্হরেচ্চাপ্রমত্তঃ ||৪১||
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अस्मादूर्ध्वं निःस्रुते दुष्टरक्ते जातप्राणं सर्पिषा स्नेहयित्वा |
तीक्ष्णैर्योगैश्छर्दयित्वा प्रगाढं पश्चाद्दोषं निर्हरेच्चाप्रमत्तः ||४१||
Adhikarana 26 (42) · Śloka 42
দুর্বান্তো বা দুর্বিরিক্তোঽপি বা স্যাত্ কুষ্ঠী দোষৈরুদ্ধতৈর্ব্যাপ্তদেহঃ |
নিঃসন্দিগ্ধং যাত্যসাধ্যত্বমাশু তস্মাত্ কৃত্স্নান্নির্হরেত্তস্য দোষান্ ||৪২||
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दुर्वान्तो वा दुर्विरिक्तोऽपि वा स्यात् कुष्ठी दोषैरुद्धतैर्व्याप्तदेहः |
निःसन्दिग्धं यात्यसाध्यत्वमाशु तस्मात् कृत्स्नान्निर्हरेत्तस्य दोषान् ||४२||
Adhikarana 27 (43) · Śloka 43
পক্ষাত্ পক্ষাচ্ছর্দনান্যভ্যুপেযান্মাসান্মাসাত্ স্রংসনং চাপি দেযম্ |
স্রাব্যং রক্তং বত্সরে হি দ্বিরল্পং নস্যং দদ্যাচ্চ ত্রিরাত্রাত্ত্রিরাত্রাত্ ||৪৩||
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पक्षात् पक्षाच्छर्दनान्यभ्युपेयान्मासान्मासात् स्रंसनं चापि देयम् |
स्राव्यं रक्तं वत्सरे हि द्विरल्पं नस्यं दद्याच्च त्रिरात्रात्त्रिरात्रात् ||४३||
Adhikarana 28 (44-49) · Śloka 49
পথ্যা ব্যোষং সেক্ষুজাতং সতৈলং লীঢ্বা শীঘ্রং মুচ্যতে কুষ্ঠরোগাত্ |
ধাত্রীপথ্যাক্ষোপকুল্যাবিডঙ্গান্ ক্ষৌদ্রাজ্যাভ্যামেকতো বাঽবলিহ্যাত্ ||৪৪||
পীত্বা মাসং বা পলাংশাং হরিদ্রাং মূত্রেণান্তং পাপরোগস্য গচ্ছেত্ |
এবং পেযশ্চিত্রকঃ শ্লক্ষ্ণপিষ্টঃ পিপ্পল্যো বা পূর্ববন্মূত্রযুক্তাঃ ||৪৫||
তদ্বত্তার্ক্ষ্যং মাসমাত্রং চ পেযং, তেনাজস্রং দেহমালেপযেচ্চ |
আরিষ্টীত্বক্ সাপ্তপর্ণী চ তুল্যা লাক্ষা মুস্তং পঞ্চমূল্যৌ হরিদ্রে ||৪৬||
মঞ্জিষ্ঠাক্ষৌ বাসকো দেবদারু পথ্যাবহ্নী ব্যোষধাত্রীবিডঙ্গাঃ |
সামান্যাংশং যোজযিত্বা বিডঙ্গৈশ্চূর্ণং কৃত্বা তত্পলোন্মানমশ্নন্ ||৪৭||
কুষ্ঠাজ্জন্তুর্মুচ্যতে ত্রৈফলং বা সর্পির্দ্রোণং ব্যোষযুক্তং চ যুঞ্জন্ |
গোমূত্রাম্বুদ্রোণসিদ্ধেঽক্ষপীডে সিদ্ধং সর্পির্নাশযেচ্চাপি কুষ্ঠম্ ||৪৮||
আরগ্বধে সপ্তপর্ণে পটোলে সবৃক্ষকে নক্তমালে সনিম্বে জীর্ণং পক্বং তদ্ধরিদ্রাদ্বযেন হন্যাত্ কুষ্ঠং মুষ্ককে চাপি সর্পিঃ ||৪৯||
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पथ्या व्योषं सेक्षुजातं सतैलं लीढ्वा शीघ्रं मुच्यते कुष्ठरोगात् |
धात्रीपथ्याक्षोपकुल्याविडङ्गान् क्षौद्राज्याभ्यामेकतो वाऽवलिह्यात् ||४४||
पीत्वा मासं वा पलांशां हरिद्रां मूत्रेणान्तं पापरोगस्य गच्छेत् |
एवं पेयश्चित्रकः श्लक्ष्णपिष्टः पिप्पल्यो वा पूर्ववन्मूत्रयुक्ताः ||४५||
तद्वत्तार्क्ष्यं मासमात्रं च पेयं, तेनाजस्रं देहमालेपयेच्च |
आरिष्टीत्वक् साप्तपर्णी च तुल्या लाक्षा मुस्तं पञ्चमूल्यौ हरिद्रे ||४६||
मञ्जिष्ठाक्षौ वासको देवदारु पथ्यावह्नी व्योषधात्रीविडङ्गाः |
सामान्यांशं योजयित्वा विडङ्गैश्चूर्णं कृत्वा तत्पलोन्मानमश्नन् ||४७||
कुष्ठाज्जन्तुर्मुच्यते त्रैफलं वा सर्पिर्द्रोणं व्योषयुक्तं च युञ्जन् |
गोमूत्राम्बुद्रोणसिद्धेऽक्षपीडे सिद्धं सर्पिर्नाशयेच्चापि कुष्ठम् ||४८||
आरग्वधे सप्तपर्णे पटोले सवृक्षके नक्तमाले सनिम्बे जीर्णं पक्वं तद्धरिद्राद्वयेन हन्यात् कुष्ठं मुष्कके चापि सर्पिः ||४९||
Adhikarana 29 (50) · Śloka 50
রোধ্রারিষ্টং পদ্মকং রক্তসারঃ সপ্তাহ্বাক্ষৌ বৃক্ষকো বীজকশ্চ |
যোজ্যাঃ স্নানে দহ্যমানস্য জন্তোঃ পেযা বা স্যাত্ ক্ষৌদ্রযুক্তা ত্রিভণ্ডী ||৫০||
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रोध्रारिष्टं पद्मकं रक्तसारः सप्ताह्वाक्षौ वृक्षको बीजकश्च |
योज्याः स्नाने दह्यमानस्य जन्तोः पेया वा स्यात् क्षौद्रयुक्ता त्रिभण्डी ||५०||
Adhikarana 30 (51) · Śloka 51
খাদেত্ কুষ্ঠী মাংসশা(পা)তে পুরাণান্ মুদ্গান্ সিদ্ধান্নিম্বতোযে সতৈলান্ |৫১|
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खादेत् कुष्ठी मांसशा(पा)ते पुराणान् मुद्गान् सिद्धान्निम्बतोये सतैलान् |५१|
Adhikarana 31 (51-53) · Śloka 53
নিম্বক্বাথং জাতসত্ত্বঃ পিবেদ্বা ক্বাথং বাঽর্কালর্কসপ্তচ্ছদানাম্ ||৫১||
জগ্ধেষ্বঙ্গেষ্বশ্বমারস্য মূলং লেপো যুক্তঃ স্যাদ্বিডঙ্গৈঃ সমূত্রৈঃ |
মূত্রৈশ্চৈনং সেচযেদ্ভোজযেচ্চ সর্বাহারান্ সম্প্রযুক্তান্ বিডঙ্গৈঃ ||৫২||
কারঞ্জং বা সার্ষপং বা ক্ষতেষু ক্ষেপ্যং তৈলং শিগ্রুকোশাম্রযোর্বা |
পক্বং সর্বৈর্বা কটূষ্ণৈঃ সতিক্তৈঃ শেষং চ স্যাদ্দুষ্টবত্ সংবিধানম্ ||৫৩||
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निम्बक्वाथं जातसत्त्वः पिबेद्वा क्वाथं वाऽर्कालर्कसप्तच्छदानाम् ||५१||
जग्धेष्वङ्गेष्वश्वमारस्य मूलं लेपो युक्तः स्याद्विडङ्गैः समूत्रैः |
मूत्रैश्चैनं सेचयेद्भोजयेच्च सर्वाहारान् सम्प्रयुक्तान् विडङ्गैः ||५२||
कारञ्जं वा सार्षपं वा क्षतेषु क्षेप्यं तैलं शिग्रुकोशाम्रयोर्वा |
पक्वं सर्वैर्वा कटूष्णैः सतिक्तैः शेषं च स्याद्दुष्टवत् संविधानम् ||५३||
Adhikarana 32 (54-63) · Śloka 64
সপ্তপর্ণকরঞ্জার্কমালতীকরবীরজম্ |
স্নুহীশিরীষাযোর্মূলং চিত্রকাস্ফোতযোরপি ||৫৪||
বিষলাঙ্গলবজ্রাখ্যকাসীসালমনঃশিলাঃ |
করঞ্জবীজং ত্রিকটু ত্রিফলাং রজনীদ্বযম্ ||৫৫||
সিদ্ধার্থকান্ বিডঙ্গানি প্রপুন্নাডং চ সংহরেত্ |
মূত্রপিষ্টৈঃ পচেদেতৈস্তৈলং কুষ্ঠবিনাশনম্ ||৫৬||
এতদ্বজ্রকমভ্যঙ্গান্নাডীদুষ্টব্রণাপহম্ |
সিদ্ধার্থকঃ করঞ্জৌ দ্বৌ দ্বে হরিদ্রে রসাঞ্জনম্ ||৫৭||
কুটজশ্চ প্রপুন্নাডসপ্তপর্ণৌ মৃগাদনী |
লাক্ষা সর্জরসোঽর্কশ্চ সাস্ফোতারগ্বধৌ স্নুহী ||৫৮||
শিরীষস্তুবরাখ্যস্তু কুটজারুষ্করৌ বচা |
কুষ্ঠং কৃমিঘ্নং মঞ্জিষ্ঠা লাঙ্গলী চিত্রকং তথা ||৫৯||
মালতী কটুতুম্বী চ গন্ধাহ্বা মূলকং তথা |
সৈন্ধবং করবীরশ্চ গৃহধূমং বিষং তথা ||৬০||
কম্পিল্লকং সসিন্দূরং তেজোহ্বাতুত্থকাহ্বযে |
সমভাগানি সর্বাণি কল্কপেষ্যাণি কারযেত্ ||৬১||
গোমূত্রং দ্বিগুণং দদ্যাত্তিলতৈলাচ্চতুর্গুণম্ |
কারঞ্জং যা মহাবীর্যং সার্ষপং বা মহাগুণম্ ||৬২||
অভ্যঙ্গাত্ সর্বকুষ্ঠানি গণ্ডমালাভগন্দরান্ |
নাডীদুষ্টব্রণান্ ঘোরান্ নাশযেন্নাত্র সংশযঃ ||৬৩||
মহাবজ্রকমিত্যেতন্নাম্না তৈলং মহাগুণম্ |৬৪|
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सप्तपर्णकरञ्जार्कमालतीकरवीरजम् |
स्नुहीशिरीषायोर्मूलं चित्रकास्फोतयोरपि ||५४||
विषलाङ्गलवज्राख्यकासीसालमनःशिलाः |
करञ्जबीजं त्रिकटु त्रिफलां रजनीद्वयम् ||५५||
सिद्धार्थकान् विडङ्गानि प्रपुन्नाडं च संहरेत् |
मूत्रपिष्टैः पचेदेतैस्तैलं कुष्ठविनाशनम् ||५६||
एतद्वज्रकमभ्यङ्गान्नाडीदुष्टव्रणापहम् |
सिद्धार्थकः करञ्जौ द्वौ द्वे हरिद्रे रसाञ्जनम् ||५७||
कुटजश्च प्रपुन्नाडसप्तपर्णौ मृगादनी |
लाक्षा सर्जरसोऽर्कश्च सास्फोतारग्वधौ स्नुही ||५८||
शिरीषस्तुवराख्यस्तु कुटजारुष्करौ वचा |
कुष्ठं कृमिघ्नं मञ्जिष्ठा लाङ्गली चित्रकं तथा ||५९||
मालती कटुतुम्बी च गन्धाह्वा मूलकं तथा |
सैन्धवं करवीरश्च गृहधूमं विषं तथा ||६०||
कम्पिल्लकं ससिन्दूरं तेजोह्वातुत्थकाह्वये |
समभागानि सर्वाणि कल्कपेष्याणि कारयेत् ||६१||
गोमूत्रं द्विगुणं दद्यात्तिलतैलाच्चतुर्गुणम् |
कारञ्जं या महावीर्यं सार्षपं वा महागुणम् ||६२||
अभ्यङ्गात् सर्वकुष्ठानि गण्डमालाभगन्दरान् |
नाडीदुष्टव्रणान् घोरान् नाशयेन्नात्र संशयः ||६३||
महावज्रकमित्येतन्नाम्ना तैलं महागुणम् |६४|
Adhikarana 33 (64-65) · Śloka 66
পিত্তাবাপৈর্মূত্রপিষ্টৈস্তৈলং লাক্ষাদিকৈঃ কৃতম্ ||৬৪||
সপ্তাহং কটুকালাব্বাং নিদধীত চিকিত্সকঃ |
পীতবন্তং ততো মাত্রাং তেনাভ্যক্তং চ মানবম্ ||৬৫||
শাযযেদাতপে তস্য দোষা গচ্ছন্তি সর্বশঃ |৬৬|
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पित्तावापैर्मूत्रपिष्टैस्तैलं लाक्षादिकैः कृतम् ||६४||
सप्ताहं कटुकालाब्वां निदधीत चिकित्सकः |
पीतवन्तं ततो मात्रां तेनाभ्यक्तं च मानवम् ||६५||
शाययेदातपे तस्य दोषा गच्छन्ति सर्वशः |६६|
Adhikarana 34 (66) · Śloka 67
স্রুতদোষং সমুত্থাপ্য স্নাতং খদিরবারিণা ||৬৬||
যবাগূং পাযযেদেনং সাধিতাং খদিরাম্বুনা |৬৭|
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स्रुतदोषं समुत्थाप्य स्नातं खदिरवारिणा ||६६||
यवागूं पाययेदेनं साधितां खदिराम्बुना |६७|
Adhikarana 35 (67) · Śloka 68
এবং সংশোধনে বর্গে কুষ্ঠঘ্নেষ্বৌষধেষু চ ||৬৭||
কুর্যাত্তৈলানি সর্পীংষি প্রদেহোদ্ধর্ষণানি চ |৬৮|
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एवं संशोधने वर्गे कुष्ठघ्नेष्वौषधेषु च ||६७||
कुर्यात्तैलानि सर्पींषि प्रदेहोद्धर्षणानि च |६८|
Adhikarana 36 (68) · Śloka 68
প্রাতঃ প্রাতশ্চ সেবেত যোগান্ বৈরেচনাঞ্ শুভান্ |
পঞ্চ ষট্ সপ্ত চাষ্টৌ বা যৈরুত্থানং ন গচ্ছতি ||৬৮||
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प्रातः प्रातश्च सेवेत योगान् वैरेचनाञ् शुभान् |
पञ्च षट् सप्त चाष्टौ वा यैरुत्थानं न गच्छति ||६८||
Adhikarana 37 (69) · Śloka 69
কারভং বা পিবেন্মূত্রং জীর্ণে তত্ক্ষীরভোজনম্ |
জাতসত্ত্বানি কুষ্ঠানি মাসৈঃ ষড্ভিরপোহতি ||৬৯||
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कारभं वा पिबेन्मूत्रं जीर्णे तत्क्षीरभोजनम् |
जातसत्त्वानि कुष्ठानि मासैः षड्भिरपोहति ||६९||
Adhikarana 38 (70-71) · Śloka 71
দিদৃক্ষুরন্তং কুষ্ঠস্য খদিরং কুষ্ঠপীডিতঃ |
সর্বথৈব প্রযুঞ্জীত স্নানপানাশনাদিষু ||৭০||
যথা হন্তি প্রবৃদ্ধত্বাত্ কুষ্ঠমাতুরমোজসা |
তথা হন্ত্যুপযুক্তস্তু খদিরঃ কুষ্ঠমোজসা ||৭১||
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दिदृक्षुरन्तं कुष्ठस्य खदिरं कुष्ठपीडितः |
सर्वथैव प्रयुञ्जीत स्नानपानाशनादिषु ||७०||
यथा हन्ति प्रवृद्धत्वात् कुष्ठमातुरमोजसा |
तथा हन्त्युपयुक्तस्तु खदिरः कुष्ठमोजसा ||७१||
Adhikarana 39 (72) · Śloka 72
নীচরোমনখঃ শ্রান্তো হিতাশ্যৌষধতত্পরঃ |
যোষিন্মাংসসুরাবর্জী কুষ্ঠী কুষ্ঠমপোহতি ||৭২||
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नीचरोमनखः श्रान्तो हिताश्यौषधतत्परः |
योषिन्मांससुरावर्जी कुष्ठी कुष्ठमपोहति ||७२||
Adhikarana puShpikA · Śloka 9
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে কুষ্ঠচিকিত্সিতং নাম নবমোঽধ্যাযঃ ||৯||
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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने कुष्ठचिकित्सितं नाम नवमोऽध्यायः ||९||