Skip to content
AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
Open navigation
Explore AyurvedaBook appointment

30. nivr̥ttasaṁtāpīyarasāyanam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো নিবৃত্তসন্তাপীযং রসাযনং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

View original

अथातो निवृत्तसन्तापीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

যথা নিবৃত্তসন্তাপা মোদন্তে দিবি দেবতাঃ | তথৌষধীরিমাঃ প্রাপ্য মোদন্তে ভুবি মানবাঃ ||৩||

View original

यथा निवृत्तसन्तापा मोदन्ते दिवि देवताः | तथौषधीरिमाः प्राप्य मोदन्ते भुवि मानवाः ||३||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

অথ খলু সপ্ত পুরুষা রসাযনং নোপযুঞ্জীরন্; তদ্যথা- অনাত্মবানলসো দরিদ্রঃ প্রমাদী ব্যসনী পাপকৃদ্ ভেষজাপমানী চেতি | সপ্তভিরেব কারণৈর্ন সম্পদ্যতে; তদ্যথা- অজ্ঞানাদনারম্ভাদস্থিরচিত্তত্বাদ্দারিদ্র্যাদনাযত্তত্বাদধর্মাদৌষধালাভাচ্চেতি ||৪||

View original

अथ खलु सप्त पुरुषा रसायनं नोपयुञ्जीरन्; तद्यथा- अनात्मवानलसो दरिद्रः प्रमादी व्यसनी पापकृद् भेषजापमानी चेति | सप्तभिरेव कारणैर्न सम्पद्यते; तद्यथा- अज्ञानादनारम्भादस्थिरचित्तत्वाद्दारिद्र्यादनायत्तत्वादधर्मादौषधालाभाच्चेति ||४||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

অথৌষধীর্ব্যাখ্যাস্যামঃ- তত্রাজগরী, শ্বেতকাপোতী, কৃষ্ণকাপোতী, গোনসী, বারাহী, কন্যা, ছত্রা, অতিচ্ছত্রা, করেণুঃ, অজা, চক্রকা, আদিত্যপর্ণী, ব্রহ্মসুবর্চলা, শ্রাবণী, মহাশ্রাবণী, গোলোমী, অজলোমী, মহাবেগবতী, চেত্যষ্টাদশ সোমসমবীর্যা মহৌষধযো ব্যাখ্যাতাঃ | তাসাং সোমবত্ ক্রিযাশীঃস্তুতযঃ শাস্ত্রেঽভিহিতাঃ | তাসামাগারেঽভিহুতানাং যাঃ ক্ষীরবত্যস্তাসাং ক্ষীরকুডবং সকৃদেবোপযুঞ্জীত , যাস্ত্বক্ষীরা মূলবত্যস্তাসাং প্রদেশিনীপ্রমাণানি ত্রীণি কাণ্ডানি প্রমাণমুপযোগে, শ্বেতকাপোতী সমূলপত্রা ভক্ষযিতব্যা, গোনস্যজগরীকৃষ্ণকাপোতীনাং সনখমুষ্টিং খণ্ডশঃ কল্পযিত্বা ক্ষীরেণ বিপাচ্য পরিস্রাব্যাভিঘারিতমভিহুতং চ সকৃদেবোপযুঞ্জীত, চক্রকাযাঃ পযঃ সকৃদেব, ব্রহ্মসুবর্চলা সপ্তরাত্রমুপযোক্তব্যা ভক্ষ্যকল্পেন, শেষাণাং পঞ্চ পঞ্চ পলানি ক্ষীরাঢকক্বথিতানি প্রস্থেঽবশিষ্টেঽবতার্য পরিস্রাব্য সকৃদেবোপযুঞ্জীত | সোমবদাহারবিহারৌ ব্যাখ্যাতৌ, কেবলং নবনীতমভ্যঙ্গার্থে, শেষং সোমবদানির্গমাদিতি ||৫||

View original

अथौषधीर्व्याख्यास्यामः- तत्राजगरी, श्वेतकापोती, कृष्णकापोती, गोनसी, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणुः, अजा, चक्रका, आदित्यपर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी, महावेगवती, चेत्यष्टादश सोमसमवीर्या महौषधयो व्याख्याताः | तासां सोमवत् क्रियाशीःस्तुतयः शास्त्रेऽभिहिताः | तासामागारेऽभिहुतानां याः क्षीरवत्यस्तासां क्षीरकुडवं सकृदेवोपयुञ्जीत , यास्त्वक्षीरा मूलवत्यस्तासां प्रदेशिनीप्रमाणानि त्रीणि काण्डानि प्रमाणमुपयोगे, श्वेतकापोती समूलपत्रा भक्षयितव्या, गोनस्यजगरीकृष्णकापोतीनां सनखमुष्टिं खण्डशः कल्पयित्वा क्षीरेण विपाच्य परिस्राव्याभिघारितमभिहुतं च सकृदेवोपयुञ्जीत, चक्रकायाः पयः सकृदेव, ब्रह्मसुवर्चला सप्तरात्रमुपयोक्तव्या भक्ष्यकल्पेन, शेषाणां पञ्च पञ्च पलानि क्षीराढकक्वथितानि प्रस्थेऽवशिष्टेऽवतार्य परिस्राव्य सकृदेवोपयुञ्जीत | सोमवदाहारविहारौ व्याख्यातौ, केवलं नवनीतमभ्यङ्गार्थे, शेषं सोमवदानिर्गमादिति ||५||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 5 (6-8) · Śloka 8

ভবন্তি চাত্র- যুবানং সিংহবিক্রান্তং কান্তং শ্রুতনিগাদিনম্ | কুর্যুরেতাঃ ক্রমেণৈব দ্বিসহস্রাযুষং নরম্ ||৬|| অঙ্গদী কুণ্ডলী মৌলী দিব্যস্রক্চন্দনাম্বরঃ | চরত্যমোঘসঙ্কল্পো নভস্যম্বুদদুর্গমে ||৭|| ব্রজন্তি পক্ষিণো যেন জললম্বাশ্চ তোযদাঃ | গতিঃ সৌষধিসিদ্ধস্য সোমসিদ্ধে গতিঃ পরা ||৮||

View original

भवन्ति चात्र- युवानं सिंहविक्रान्तं कान्तं श्रुतनिगादिनम् | कुर्युरेताः क्रमेणैव द्विसहस्रायुषं नरम् ||६|| अङ्गदी कुण्डली मौली दिव्यस्रक्चन्दनाम्बरः | चरत्यमोघसङ्कल्पो नभस्यम्बुददुर्गमे ||७|| व्रजन्ति पक्षिणो येन जललम्बाश्च तोयदाः | गतिः सौषधिसिद्धस्य सोमसिद्धे गतिः परा ||८||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 6 (9-25) · Śloka 25

অথ বক্ষ্যামি বিজ্ঞানমৌষধীনাং পৃথক্ পৃথক্ | মণ্ডলৈঃ কপিলৈশ্চিত্রৈঃ সর্পাভা পঞ্চপর্ণিনী ||৯|| পঞ্চারত্নিপ্রমাণা চ বিজ্ঞেযাঽজগরী বুধৈঃ | নিষ্পত্রা কনকাভাসা মূলে দ্ব্যঙ্গুলসম্মিতা ||১০|| সর্পাকারা লোহিতান্তা শ্বেতকাপোতিরুচ্যতে | দ্বিপর্ণিনীং মূলভবামরুণাং কৃষ্ণমণ্ডলাম্ ||১১|| দ্ব্যরত্নিমাত্রাং জানীযাদ্গোনসীং গোনসাকৃতিম্ | সক্ষীরাং রোমশাং মৃদ্বীং রসেনেক্ষুরসোপমাম্ ||১২|| এবংরূপরসাং চাপি কৃষ্ণকাপোতিমাদিশেত্ | কৃষ্ণসর্পস্বরূপেণ বারাহী কন্দসম্ভবা ||১৩|| একপত্রা মহাবীর্যা ভিন্নাঞ্জনসমপ্রভা | ছত্রাতিচ্ছত্রকে বিদ্যাদ্রক্ষোঘ্নে কন্দসম্ভবে ||১৪|| জরামৃত্যুনিবারিণ্যৌ শ্বেতকাপোতিসংস্থিতে | কান্তৈর্দ্বাদশভিঃ পত্রৈর্মযূরাঙ্গরুহোপমৈঃ ||১৫|| কন্দজা কাঞ্চনক্ষীরী কন্যা নাম মহৌষধী | করেণুঃ সুবহুক্ষীরা কন্দেন গজরূপিণী ||১৬|| হস্তিকর্ণপলাশস্য তুল্যপর্ণা দ্বিপর্ণিনী | অজাস্তনাভকন্দা তু সক্ষীরা ক্ষুপরূপিণী ||১৭|| অজা মহৌষধী জ্ঞেযা শঙ্খকুন্দেন্দুপাণ্ডুরা | শ্বেতাং বিচিত্রকুসুমাং কাকাদন্যা সমাং ক্ষুপাম্ ||১৮|| চক্রকামোষধীং বিদ্যাজ্জরামৃত্যুনিবারিণীম্ | মূলিনী পঞ্চভিঃ পত্রৈঃ সুরক্তাংশুককোমলৈঃ ||১৯|| আদিত্যপর্ণিনী জ্ঞেযা সদাঽঽদিত্যানুবর্তিনী | কনকাভা জলান্তেষু সর্বতঃ পরিসর্পতি ||২০|| সক্ষীরা পদ্মিনীপ্রখ্যা দেবী ব্রহ্মসুবর্চলা | অরত্নিমাত্রক্ষুপকা পত্রৈদ্র্ব্যঙ্গুলসম্মিতৈঃ ||২১|| পুষ্পৈর্নীলোত্পলাকারৈঃ ফলৈশ্চাঞ্জনসন্নিভৈঃ | শ্রাবণী মহতী জ্ঞেযা কনকাভা পযস্বিনী ||২২|| শ্রাবণী পাণ্ডুরাভাসা মহাশ্রাবণিলক্ষণা | গোলোমী চাজলোমী চ রোমশে কন্দসম্ভবে ||২৩|| হংসপাদীব বিচ্ছিন্নৈঃ পত্রৈর্মূলসমুদ্ভবৈঃ | অথবা শঙ্খপুষ্প্যা চ সমানা সর্বরূপতঃ ||২৪|| বেগেন মহতাঽঽবিষ্টা সর্পনির্মোকসন্নিভা | এষা বেগবতী নাম জাযতে হ্যম্বুদক্ষযে ||২৫||

View original

अथ वक्ष्यामि विज्ञानमौषधीनां पृथक् पृथक् | मण्डलैः कपिलैश्चित्रैः सर्पाभा पञ्चपर्णिनी ||९|| पञ्चारत्निप्रमाणा च विज्ञेयाऽजगरी बुधैः | निष्पत्रा कनकाभासा मूले द्व्यङ्गुलसम्मिता ||१०|| सर्पाकारा लोहितान्ता श्वेतकापोतिरुच्यते | द्विपर्णिनीं मूलभवामरुणां कृष्णमण्डलाम् ||११|| द्व्यरत्निमात्रां जानीयाद्गोनसीं गोनसाकृतिम् | सक्षीरां रोमशां मृद्वीं रसेनेक्षुरसोपमाम् ||१२|| एवंरूपरसां चापि कृष्णकापोतिमादिशेत् | कृष्णसर्पस्वरूपेण वाराही कन्दसम्भवा ||१३|| एकपत्रा महावीर्या भिन्नाञ्जनसमप्रभा | छत्रातिच्छत्रके विद्याद्रक्षोघ्ने कन्दसम्भवे ||१४|| जरामृत्युनिवारिण्यौ श्वेतकापोतिसंस्थिते | कान्तैर्द्वादशभिः पत्रैर्मयूराङ्गरुहोपमैः ||१५|| कन्दजा काञ्चनक्षीरी कन्या नाम महौषधी | करेणुः सुबहुक्षीरा कन्देन गजरूपिणी ||१६|| हस्तिकर्णपलाशस्य तुल्यपर्णा द्विपर्णिनी | अजास्तनाभकन्दा तु सक्षीरा क्षुपरूपिणी ||१७|| अजा महौषधी ज्ञेया शङ्खकुन्देन्दुपाण्डुरा | श्वेतां विचित्रकुसुमां काकादन्या समां क्षुपाम् ||१८|| चक्रकामोषधीं विद्याज्जरामृत्युनिवारिणीम् | मूलिनी पञ्चभिः पत्रैः सुरक्तांशुककोमलैः ||१९|| आदित्यपर्णिनी ज्ञेया सदाऽऽदित्यानुवर्तिनी | कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परिसर्पति ||२०|| सक्षीरा पद्मिनीप्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला | अरत्निमात्रक्षुपका पत्रैद्र्व्यङ्गुलसम्मितैः ||२१|| पुष्पैर्नीलोत्पलाकारैः फलैश्चाञ्जनसन्निभैः | श्रावणी महती ज्ञेया कनकाभा पयस्विनी ||२२|| श्रावणी पाण्डुराभासा महाश्रावणिलक्षणा | गोलोमी चाजलोमी च रोमशे कन्दसम्भवे ||२३|| हंसपादीव विच्छिन्नैः पत्रैर्मूलसमुद्भवैः | अथवा शङ्खपुष्प्या च समाना सर्वरूपतः ||२४|| वेगेन महताऽऽविष्टा सर्पनिर्मोकसन्निभा | एषा वेगवती नाम जायते ह्यम्बुदक्षये ||२५||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 7 (26-28) · Śloka 29

সপ্তাদৌ সর্পরূপিণ্যো হ্যৌষধ্যো যাঃ প্রকীর্তিতাঃ | তাসামুদ্ধরণং কার্যং মন্ত্রেণানেন সর্বদা ||২৬|| মহেন্দ্ররামকৃষ্ণানাং ব্রাহ্মণানাং গবামপি | তপসা তেজসা বাঽপি প্রশাম্যধ্বং শিবায বৈ ||২৭|| মন্ত্রেণানেন মতিমান্ সর্বা এবাভিমন্ত্রযেত্ | অশ্রদ্দধানৈরলসৈঃ কৃতঘ্নৈঃ পাপকর্মভিঃ ||২৮|| নৈবাসাদযিতুং শক্যাঃ সোমাঃ সোমসমাস্তথা |২৯|

View original

सप्तादौ सर्परूपिण्यो ह्यौषध्यो याः प्रकीर्तिताः | तासामुद्धरणं कार्यं मन्त्रेणानेन सर्वदा ||२६|| महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि | तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै ||२७|| मन्त्रेणानेन मतिमान् सर्वा एवाभिमन्त्रयेत् | अश्रद्दधानैरलसैः कृतघ्नैः पापकर्मभिः ||२८|| नैवासादयितुं शक्याः सोमाः सोमसमास्तथा |२९|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 8 (29) · Śloka 30

পীতাবশেষমমৃতং দেবৈর্ব্রহ্মপুরোগমৈঃ ||২৯|| নিহিতং সোমবীর্যাসু সোমে চাপ্যোষধীপতৌ |৩০|

View original

पीतावशेषममृतं देवैर्ब्रह्मपुरोगमैः ||२९|| निहितं सोमवीर्यासु सोमे चाप्योषधीपतौ |३०|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 9 (30-40) · Śloka 40

দেবসুন্দে হ্রদবরে তথা সিন্ধৌ মহানদে ||৩০|| দৃশ্যতে চ জলান্তেষু মেধ্যা ব্রহ্মসুবর্চলা | আদিত্যপর্ণিনী জ্ঞেযা তথৈব হিমসঙ্ক্ষযে ||৩১|| দৃশ্যতেঽজগরী নিত্যং গোনসী চাম্বুদাগমে | কাশ্মীরেষু সরো দিব্যং নাম্না ক্ষুদ্রকমানসম্ ||৩২|| করেণুস্তত্র কন্যা চ ছত্রাতিচ্ছত্রকে তথা | গোলোমী চাজলোমী চ মহতী শ্রাবণী তথা ||৩৩|| বসন্তে কৃষ্ণসর্পাখ্যা গোনসী চ প্রদৃশ্যতে | কৌশিকীং সরিতং তীর্ত্বা সঞ্জযন্ত্যাস্তু পূর্বতঃ ||৩৪|| ক্ষিতিপ্রদেশো বল্মীকৈরাচিতো যোজনত্রযম্ | বিজ্ঞেযা তত্র কাপোতী শ্বেতা বল্মীকমূর্ধসু ||৩৫|| মলযে নলসেতৌ চ বেগবত্যৌষধী ধ্রুবা | কার্তিক্যাং পৌর্ণমাস্যাং চ ভক্ষযেত্তামুপোষিতঃ ||৩৬|| সোমবচ্চাত্র বর্তেত ফলং তাবচ্চ কীর্তিতম্ | সর্বা বিচেযাস্ত্বোষধ্যঃ সোমাশ্চাপ্যর্বুদে গিরৌ ||৩৭|| স শৃঙ্গৈর্দেবচরিতৈরম্বুদানীকভেদিভিঃ | ব্যাপ্তস্তীর্থৈশ্চ বিখ্যাতৈঃ সিদ্ধর্ষিসুরসেবিতৈঃ ||৩৮|| গুহাভির্ভীমরূপাভিঃ সিংহোন্নাদিতকুক্ষিভিঃ | গজালোডিততোযাভিরাপগাভিঃ সমন্ততঃ | বিবিধৈর্ধাতুভিশ্চিত্রৈঃ সর্বত্রৈবোপশোভিতঃ ||৩৯|| নদীষু শৈলেষু সরঃসু চাপি পুণ্যেষ্বরণ্যেষু তথাঽঽশ্রমেষু | সর্বত্র সর্বাঃ পরিমার্গিতব্যাঃ সর্বত্র ভূমির্হি বসূনি ধত্তে ||৪০||

View original

देवसुन्दे ह्रदवरे तथा सिन्धौ महानदे ||३०|| दृश्यते च जलान्तेषु मेध्या ब्रह्मसुवर्चला | आदित्यपर्णिनी ज्ञेया तथैव हिमसङ्क्षये ||३१|| दृश्यतेऽजगरी नित्यं गोनसी चाम्बुदागमे | काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ||३२|| करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्रके तथा | गोलोमी चाजलोमी च महती श्रावणी तथा ||३३|| वसन्ते कृष्णसर्पाख्या गोनसी च प्रदृश्यते | कौशिकीं सरितं तीर्त्वा सञ्जयन्त्यास्तु पूर्वतः ||३४|| क्षितिप्रदेशो वल्मीकैराचितो योजनत्रयम् | विज्ञेया तत्र कापोती श्वेता वल्मीकमूर्धसु ||३५|| मलये नलसेतौ च वेगवत्यौषधी ध्रुवा | कार्तिक्यां पौर्णमास्यां च भक्षयेत्तामुपोषितः ||३६|| सोमवच्चात्र वर्तेत फलं तावच्च कीर्तितम् | सर्वा विचेयास्त्वोषध्यः सोमाश्चाप्यर्बुदे गिरौ ||३७|| स शृङ्गैर्देवचरितैरम्बुदानीकभेदिभिः | व्याप्तस्तीर्थैश्च विख्यातैः सिद्धर्षिसुरसेवितैः ||३८|| गुहाभिर्भीमरूपाभिः सिंहोन्नादितकुक्षिभिः | गजालोडिततोयाभिरापगाभिः समन्ततः | विविधैर्धातुभिश्चित्रैः सर्वत्रैवोपशोभितः ||३९|| नदीषु शैलेषु सरःसु चापि पुण्येष्वरण्येषु तथाऽऽश्रमेषु | सर्वत्र सर्वाः परिमार्गितव्याः सर्वत्र भूमिर्हि वसूनि धत्ते ||४०||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana puShpikA · Śloka 30

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে নিবৃত্তসন্তাপীযং রসাযনং নাম ত্রিংশোঽধ্যাযঃ ||৩০||

View original

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने निवृत्तसन्तापीयं रसायनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ||३०||

🔊 Audio coming soon