Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্নেহোপযৌগিকচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः स्नेहोपयौगिकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্নেহোপযৌগিকচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः स्नेहोपयौगिकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
স্নেহসারোঽযং পুরুষঃ, প্রাণাশ্চ স্নেহভূযিষ্ঠাঃ স্নেহসাধ্যাশ্চ ভবন্তি | স্নেহো হি পানানুবাসনমস্তিষ্কশিরোবস্ত্যুত্তরবস্তিনস্যকর্ণপূরণগাত্রাভ্যঙ্গভোজনেষূপযোজ্যঃ ||৩||
स्नेहसारोऽयं पुरुषः, प्राणाश्च स्नेहभूयिष्ठाः स्नेहसाध्याश्च भवन्ति | स्नेहो हि पानानुवासनमस्तिष्कशिरोबस्त्युत्तरबस्तिनस्यकर्णपूरणगात्राभ्यङ्गभोजनेषूपयोज्यः ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
তত্র দ্বিযোনিশ্চতুর্বিকল্পোঽভিহিতঃ স্নেহঃ স্নেহগুণাশ্চ | তত্র জঙ্গমেভ্যো গব্যং ঘৃতং প্রধানং, স্থাবরেভ্যস্তিলতৈলং প্রধানমিতি ||৪||
तत्र द्वियोनिश्चतुर्विकल्पोऽभिहितः स्नेहः स्नेहगुणाश्च | तत्र जङ्गमेभ्यो गव्यं घृतं प्रधानं, स्थावरेभ्यस्तिलतैलं प्रधानमिति ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
অত ঊর্ধ্বং যথাপ্রযোজনং যথাপ্রধানং চ স্থাবরস্নেহানুপদেক্ষ্যামঃ- তত্র তিল্বকৈরণ্ডকোশাম্রদন্তীদ্রবন্তীসপ্তলাশঙ্খিনীপলাশবিষাণিকাগবাক্ষীকম্পিল্লকশম্পাকনীলিনীস্নেহা বিরেচযন্তি, জীমূতককুটজকৃতবেধনেক্ষ্বাকুধামার্গবমদনস্নেহা বামযন্তি, বিডঙ্গখরমঞ্জরীমধুশিগ্রুসূর্যবল্লীপীলুসিদ্ধার্থকজ্যোতিষ্মতীস্নেহাঃ শিরো বিরেচযন্তি, করঞ্জপূতীককৃতমালমাতুলুঙ্গেঙ্গুদীকিরাততিক্তকস্নেহা দুষ্টব্রণেষূপযুজ্যন্তে, তুবরককপিত্থকম্পিল্লকভল্লাতকপটোলস্নেহা মহাব্যাধিষু, ত্রপুসৈর্বারুককর্কারুকতুম্বীকূষ্মাণ্ডস্নেহা মূত্রসঙ্গেষু, কপোতবঙ্কাবল্গুজহরীতকীস্নেহাঃ শর্করাশ্মরীষু, কুসুম্ভসর্ষপাতসীপিচুমর্দাতিমুক্তকভাণ্ডীকটুতুম্বীকটভীস্নেহাঃ প্রমেহেষু, তালনারিকেলপনসমোচপ্রিযালবিল্বমধূকশ্লেষ্মাতকাম্রাতকফলস্নেহাঃ পিত্তসংসৃষ্টে বাযৌ, বিভীতকভল্লাতকপিণ্ডীতকস্নেহাঃ কৃষ্ণীকরণে, শ্রবণকঙ্গুকটুণ্টুকস্নেহাঃ পাণ্ডূকরণে, সরলপীতদারুশিংশপাগুরুসারস্নেহা দদ্রুকুষ্ঠকিটিভেষু, সর্ব এব স্নেহা বাতমুপঘ্নন্তি, তৈলগুণাশ্চ সমাসেন ব্যাখ্যাতাঃ ||৫||
अत ऊर्ध्वं यथाप्रयोजनं यथाप्रधानं च स्थावरस्नेहानुपदेक्ष्यामः- तत्र तिल्वकैरण्डकोशाम्रदन्तीद्रवन्तीसप्तलाशङ्खिनीपलाशविषाणिकागवाक्षीकम्पिल्लकशम्पाकनीलिनीस्नेहा विरेचयन्ति, जीमूतककुटजकृतवेधनेक्ष्वाकुधामार्गवमदनस्नेहा वामयन्ति, विडङ्गखरमञ्जरीमधुशिग्रुसूर्यवल्लीपीलुसिद्धार्थकज्योतिष्मतीस्नेहाः शिरो विरेचयन्ति, करञ्जपूतीककृतमालमातुलुङ्गेङ्गुदीकिराततिक्तकस्नेहा दुष्टव्रणेषूपयुज्यन्ते, तुवरककपित्थकम्पिल्लकभल्लातकपटोलस्नेहा महाव्याधिषु, त्रपुसैर्वारुककर्कारुकतुम्बीकूष्माण्डस्नेहा मूत्रसङ्गेषु, कपोतवङ्कावल्गुजहरीतकीस्नेहाः शर्कराश्मरीषु, कुसुम्भसर्षपातसीपिचुमर्दातिमुक्तकभाण्डीकटुतुम्बीकटभीस्नेहाः प्रमेहेषु, तालनारिकेलपनसमोचप्रियालबिल्वमधूकश्लेष्मातकाम्रातकफलस्नेहाः पित्तसंसृष्टे वायौ, बिभीतकभल्लातकपिण्डीतकस्नेहाः कृष्णीकरणे, श्रवणकङ्गुकटुण्टुकस्नेहाः पाण्डूकरणे, सरलपीतदारुशिंशपागुरुसारस्नेहा दद्रुकुष्ठकिटिभेषु, सर्व एव स्नेहा वातमुपघ्नन्ति, तैलगुणाश्च समासेन व्याख्याताः ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
অত ঊর্ধ্বং কষাযস্নেহপাকক্রমমুপদেক্ষ্যামঃ | তত্র কেচিদাহুঃ- ত্বক্পত্রফলমূলাদীনাং ভাগস্তচ্চতুর্গুণং জলং চতুর্ভাগাবশেষং নিষ্ক্বাথ্যাপহরেদিত্যেষ কষাযপাককল্পঃ; স্নেহপ্রসৃতেষু ষট্সু চতুর্গুণং দ্রবমাবাপ্য চতুরশ্চাক্ষসমান্ ভেষজপিণ্ডানিত্যেষ স্নেহপাককল্পঃ | এতত্তু ন সম্যক্; কস্মাত্? আগমাসিদ্ধত্বাত্ ||৬||
अत ऊर्ध्वं कषायस्नेहपाकक्रममुपदेक्ष्यामः | तत्र केचिदाहुः- त्वक्पत्रफलमूलादीनां भागस्तच्चतुर्गुणं जलं चतुर्भागावशेषं निष्क्वाथ्यापहरेदित्येष कषायपाककल्पः; स्नेहप्रसृतेषु षट्सु चतुर्गुणं द्रवमावाप्य चतुरश्चाक्षसमान् भेषजपिण्डानित्येष स्नेहपाककल्पः | एतत्तु न सम्यक्; कस्मात्? आगमासिद्धत्वात् ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
পলকুডবাদীনামতো মানং তু ব্যাখ্যাস্যামঃ- তত্র দ্বাদশ ধান্যমাষা মধ্যমাঃ সুবর্ণমাষকঃ, তে ষোডশ সুবর্ণম্; অথবা মধ্যমনিষ্পাবা একোনবিংশতির্ধরণং, তান্যর্ধতৃতীযানি কর্ষঃ; ততশ্চোর্ধ্বং চতুর্গুণমভিবর্ধযন্তঃ পলকুডবপ্রস্থাঢকদ্রোণা ইত্যভিনিষ্পদ্যন্তে, তুলা পুনঃ পলশতং, তাঃ পুনর্বিংশতির্ভারঃ; শুষ্কাণামিদং মানম্, আর্দ্রদ্রবাণাং চ দ্বিগুণমিতি ||৭||
पलकुडवादीनामतो मानं तु व्याख्यास्यामः- तत्र द्वादश धान्यमाषा मध्यमाः सुवर्णमाषकः, ते षोडश सुवर्णम्; अथवा मध्यमनिष्पावा एकोनविंशतिर्धरणं, तान्यर्धतृतीयानि कर्षः; ततश्चोर्ध्वं चतुर्गुणमभिवर्धयन्तः पलकुडवप्रस्थाढकद्रोणा इत्यभिनिष्पद्यन्ते, तुला पुनः पलशतं, ताः पुनर्विंशतिर्भारः; शुष्काणामिदं मानम्, आर्द्रद्रवाणां च द्विगुणमिति ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
তত্রান্যতমপরিমাণসম্মিতানাং যথাযোগং ত্বক্পত্রফলমূলাদীনামাতপপরিশোষিতানাং ছেদ্যানি খণ্ডশশ্ছেদযিত্বা ভেদ্যান্যণুশো ভেদযিত্বাঽবকুট্যাষ্টগুণেন ষোডশগুণেন বাঽম্ভসাঽভিষিচ্য স্থাল্যাং চতুর্ভাগাবশিষ্টং ক্বাথযিত্বাঽপহরেদিত্যেষ কষাযপাককল্পঃ | স্নেহাচ্চতুর্গুণো দ্রবঃ, স্নেহচতুর্থাংশো ভেষজকল্কঃ, তদৈকধ্যং সংসৃজ্য বিপচেদিত্যেষ স্নেহপাককল্পঃ | অথবা তত্রোদকদ্রোণে ত্বক্পত্রফলমূলাদীনাং তুলামাবাপ্য চতুর্ভাগাবশিষ্টং নিষ্ক্বাথ্যাপহরেদিত্যেষ কষাযপাককল্পঃ; স্নেহকুডবে ভেষজপলং পিষ্টং কল্কং চতুর্গুণং দ্রবমাবাপ্য বিপচেদিত্যেষ স্নেহপাককল্পঃ ||৮||
तत्रान्यतमपरिमाणसम्मितानां यथायोगं त्वक्पत्रफलमूलादीनामातपपरिशोषितानां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यान्यणुशो भेदयित्वाऽवकुट्याष्टगुणेन षोडशगुणेन वाऽम्भसाऽभिषिच्य स्थाल्यां चतुर्भागावशिष्टं क्वाथयित्वाऽपहरेदित्येष कषायपाककल्पः | स्नेहाच्चतुर्गुणो द्रवः, स्नेहचतुर्थांशो भेषजकल्कः, तदैकध्यं संसृज्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः | अथवा तत्रोदकद्रोणे त्वक्पत्रफलमूलादीनां तुलामावाप्य चतुर्भागावशिष्टं निष्क्वाथ्यापहरेदित्येष कषायपाककल्पः; स्नेहकुडवे भेषजपलं पिष्टं कल्कं चतुर्गुणं द्रवमावाप्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः ||८||
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Adhikarana 8 (9-10) · Śloka 10
ভবতশ্চাত্র- স্নেহভেষজতোযানাং প্রমাণং যত্র নেরিতম্ | তত্রাযং বিধিরাস্থেযো নির্দিষ্টে তদ্বদেব তু ||৯|| অনুক্তে দ্রবকার্যে তু সর্বত্র সলিলং মতম্ | কল্কক্বাথাবনির্দেশে গণাত্তস্মাত্ প্রযোজযেত্ ||১০||
भवतश्चात्र- स्नेहभेषजतोयानां प्रमाणं यत्र नेरितम् | तत्रायं विधिरास्थेयो निर्दिष्टे तद्वदेव तु ||९|| अनुक्ते द्रवकार्ये तु सर्वत्र सलिलं मतम् | कल्कक्वाथावनिर्देशे गणात्तस्मात् प्रयोजयेत् ||१०||
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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11
অত ঊর্ধ্বং স্নেহপাকক্রমমুপদেক্ষ্যামঃ | স তু ত্রিবিধঃ; তদ্যথা- মৃদুঃ, মধ্যমঃ, খর ইতি | তত্র স্নেহৌষধিবিবেকমাত্রং যত্র ভেষজং স মৃদুরিতি, মধূচ্ছিষ্টমিব বিশদমবিলেপি যত্র ভেষজং স মধ্যমঃ, কৃষ্ণমবসন্নমীষদ্বিশদং চিক্কণং চ যত্র ভেষজং স খর ইতি; অত ঊর্ধ্বং দগ্ধস্নেহো ভবতি, তং পুনঃ সাধু সাধযেত্ | তত্র পানাভ্যবহারযোর্মৃদুঃ, নস্যাভ্যঙ্গযোর্মধ্যমঃ, বস্তিকর্ণপূরণযোস্তু খর ইতি ||১১||
अत ऊर्ध्वं स्नेहपाकक्रममुपदेक्ष्यामः | स तु त्रिविधः; तद्यथा- मृदुः, मध्यमः, खर इति | तत्र स्नेहौषधिविवेकमात्रं यत्र भेषजं स मृदुरिति, मधूच्छिष्टमिव विशदमविलेपि यत्र भेषजं स मध्यमः, कृष्णमवसन्नमीषद्विशदं चिक्कणं च यत्र भेषजं स खर इति; अत ऊर्ध्वं दग्धस्नेहो भवति, तं पुनः साधु साधयेत् | तत्र पानाभ्यवहारयोर्मृदुः, नस्याभ्यङ्गयोर्मध्यमः, बस्तिकर्णपूरणयोस्तु खर इति ||११||
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Adhikarana 10 (12-13) · Śloka 13
ভবতশ্চাত্র- শব্দস্যোপরমে প্রাপ্তে ফেনস্যোপশমে তথা | গন্ধবর্ণরসাদীনাং সম্পত্তৌ সিদ্ধিমাদিশেত্ ||১২|| ঘৃতস্যৈবং বিপক্বস্য জানীযাত্ কুশলো ভিষক্ | ফেনোঽতিমাত্রং তৈলস্য শেষং ঘৃতবদাদিশেত্ ||১৩||
भवतश्चात्र- शब्दस्योपरमे प्राप्ते फेनस्योपशमे तथा | गन्धवर्णरसादीनां सम्पत्तौ सिद्धिमादिशेत् ||१२|| घृतस्यैवं विपक्वस्य जानीयात् कुशलो भिषक् | फेनोऽतिमात्रं तैलस्य शेषं घृतवदादिशेत् ||१३||
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Adhikarana 11 (14) · Śloka 14
অত ঊর্ধ্বং স্নেহপানক্রমমুপদেক্ষ্যামঃ- অথ খলু লঘুকোষ্ঠাযাতুরায কৃতমঙ্গলস্বস্তিবাচনাযোদযগিরিশিখরসংস্থিতে প্রতপ্তকনকনিকরপীতলোহিতে সবিতরি যথাবলং তৈলস্য ঘৃতস্য বা মাত্রাং পাতুং প্রযচ্ছেত্ | পীতমাত্রে চোষ্ণোদকেনোপস্পৃশ্য সোপানত্কো যথাসুখং বিহরেত্ ||১৪||
अत ऊर्ध्वं स्नेहपानक्रममुपदेक्ष्यामः- अथ खलु लघुकोष्ठायातुराय कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनायोदयगिरिशिखरसंस्थिते प्रतप्तकनकनिकरपीतलोहिते सवितरि यथाबलं तैलस्य घृतस्य वा मात्रां पातुं प्रयच्छेत् | पीतमात्रे चोष्णोदकेनोपस्पृश्य सोपानत्को यथासुखं विहरेत् ||१४||
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Adhikarana 12 (15-18) · Śloka 18
রূক্ষক্ষতবিষার্তানাং বাতপিত্তবিকারিণাম্ | হীনমেধাস্মৃতীনাং চ সর্পিঃপানং প্রশস্যতে ||১৫|| কৃমিকোষ্ঠানিলাবিষ্টাঃ প্রবৃদ্ধকফমেদসঃ | পিবেযুস্তৈলসাত্ম্যাশ্চ তৈলং দার্ঢ্যার্থিনশ্চ যে ||১৬|| ব্যাযামকর্শিতাঃ শুষ্করেতোরক্তা মহারুজঃ | মহাগ্নিমারুতপ্রাণা বসাযোগ্যা নরাঃ স্মৃতাঃ ||১৭|| ক্রূরাশযাঃ ক্লেশসহা বাতার্তা দীপ্তবহ্নযঃ | মজ্জানমাপ্নুযুঃ সর্বে সর্পির্বা স্বৌষধান্বিতম্ ||১৮||
रूक्षक्षतविषार्तानां वातपित्तविकारिणाम् | हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिःपानं प्रशस्यते ||१५|| कृमिकोष्ठानिलाविष्टाः प्रवृद्धकफमेदसः | पिबेयुस्तैलसात्म्याश्च तैलं दार्ढ्यार्थिनश्च ये ||१६|| व्यायामकर्शिताः शुष्करेतोरक्ता महारुजः | महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ||१७|| क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्ता दीप्तवह्नयः | मज्जानमाप्नुयुः सर्वे सर्पिर्वा स्वौषधान्वितम् ||१८||
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Adhikarana 13 (19) · Śloka 19
কেবলং পৈত্তিকে সর্পির্বাতিকে লবণান্বিতম্ | দেযং বহুকফে চাপি ব্যোষক্ষারসমাযুতম্ ||১৯||
केवलं पैत्तिके सर्पिर्वातिके लवणान्वितम् | देयं बहुकफे चापि व्योषक्षारसमायुतम् ||१९||
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Adhikarana 14 (20) · Śloka 20
দোষাণামল্পভূযস্ত্বং সংসর্গং সমবেক্ষ্য চ | যুঞ্জ্যাত্ত্রিষষ্টিধাভিন্নৈঃ সমাসব্যাসতো রসৈঃ ||২০||
दोषाणामल्पभूयस्त्वं संसर्गं समवेक्ष्य च | युञ्ज्यात्त्रिषष्टिधाभिन्नैः समासव्यासतो रसैः ||२०||
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Adhikarana 15 (21) · Śloka 21
স্নেহসাত্ম্যঃ ক্লেশসহঃ কালে নাত্যুষ্ণশীতলে | অচ্ছমেব পিবেত্ স্নেহমচ্ছপানং হি পূজিতম্ ||২১||
स्नेहसात्म्यः क्लेशसहः काले नात्युष्णशीतले | अच्छमेव पिबेत् स्नेहमच्छपानं हि पूजितम् ||२१||
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Adhikarana 16 (22) · Śloka 22
শীতকালে দিবা স্নেহমুষ্ণকালে পিবেন্নিশি | বাতপিত্তাধিকো রাত্রৌ বাতশ্লেষ্মাধিকো দিবা ||২২||
शीतकाले दिवा स्नेहमुष्णकाले पिबेन्निशि | वातपित्ताधिको रात्रौ वातश्लेष्माधिको दिवा ||२२||
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Adhikarana 17 (23) · Śloka 23
বাতপিত্তাধিকস্যোষ্ণে তৃণ্মূর্চ্ছোন্মাদকারকঃ | শীতে বাতকফার্তস্য গৌরবারুচিশূলকৃত্ ||২৩||
वातपित्ताधिकस्योष्णे तृण्मूर्च्छोन्मादकारकः | शीते वातकफार्तस्य गौरवारुचिशूलकृत् ||२३||
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Adhikarana 18 (24) · Śloka 25
স্নেহপীতস্য চেত্তৃষ্ণা পিবেদুষ্ণোদকং নরঃ | এবং চানুপশাম্যন্ত্যাং স্নেহমুষ্ণাম্বুনা বমেত্ ||২৪|| দিহ্যাচ্ছীতৈঃ শিরঃ শীতং তোযং চাপ্যবগাহযেত্ |২৫|
स्नेहपीतस्य चेत्तृष्णा पिबेदुष्णोदकं नरः | एवं चानुपशाम्यन्त्यां स्नेहमुष्णाम्बुना वमेत् ||२४|| दिह्याच्छीतैः शिरः शीतं तोयं चाप्यवगाहयेत् |२५|
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Adhikarana 19 (25-29) · Śloka 30
যা মাত্রা পরিজীর্যেত চতুর্ভাগগতেঽহনি ||২৫|| সা মাত্রা দীপযত্যগ্নিমল্পদোষে চ পূজিতা | যা মাত্রা পরিজীর্যেত তথাঽর্ধদিবসে গতে ||২৬|| সা বৃষ্যা বৃংহণী যা চ মধ্যদোষে চ পূজিতা | যা মাত্রা পরিজীর্যেত চতুর্ভাগাবশেষিতে ||২৭|| স্নেহনীযা চ সা মাত্রা বহুদোষে চ পূজিতা | যা মাত্রা পরিজীর্যেত্তু তথা পরিণতেঽহনি ||২৮|| গ্লানিমূর্চ্ছামদান্ হিত্বা সা মাত্রা পূজিতা ভবেত্ অহোরাত্রাদসন্দুষ্টা যা মাত্রা পরীজীর্যতি ||২৯|| সা তু কুষ্ঠবিষোন্মাদগ্রহাপস্মারনাশিনী |৩০|
या मात्रा परिजीर्येत चतुर्भागगतेऽहनि ||२५|| सा मात्रा दीपयत्यग्निमल्पदोषे च पूजिता | या मात्रा परिजीर्येत तथाऽर्धदिवसे गते ||२६|| सा वृष्या बृंहणी या च मध्यदोषे च पूजिता | या मात्रा परिजीर्येत चतुर्भागावशेषिते ||२७|| स्नेहनीया च सा मात्रा बहुदोषे च पूजिता | या मात्रा परिजीर्येत्तु तथा परिणतेऽहनि ||२८|| ग्लानिमूर्च्छामदान् हित्वा सा मात्रा पूजिता भवेत् अहोरात्रादसन्दुष्टा या मात्रा परीजीर्यति ||२९|| सा तु कुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी |३०|
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Adhikarana 20 (30-33) · Śloka 33
যথাগ্নি প্রথমাং মাত্রাং পাযযেত বিচক্ষণঃ ||৩০|| পীতো হ্যতিবহুঃ স্নেহো জনযেত্ প্রাণসংশযম্ | মিথ্যাচারাদ্বহুত্বাদ্বা যস্য স্নেহো ন জীর্যতি ||৩১|| বিষ্টভ্য চাপি জীর্যেত্তং বারিণোষ্ণেন বামযেত্ | ততঃ স্নেহং পুনর্দদ্যাল্লঘুকোষ্ঠায দেহিনে | জীর্ণাজীর্ণবিশঙ্কাযাং স্নেহস্যোষ্ণোদকং পিবেত্ ||৩২|| তেনোদ্গারো ভবেচ্ছুদ্ধো ভক্তং প্রতি রুচিস্তথা | স্যুঃ পচ্যমানে তৃড্দাহভ্রমসাদারতিক্লমাঃ ||৩৩||
यथाग्नि प्रथमां मात्रां पाययेत विचक्षणः ||३०|| पीतो ह्यतिबहुः स्नेहो जनयेत् प्राणसंशयम् | मिथ्याचाराद्बहुत्वाद्वा यस्य स्नेहो न जीर्यति ||३१|| विष्टभ्य चापि जीर्येत्तं वारिणोष्णेन वामयेत् | ततः स्नेहं पुनर्दद्याल्लघुकोष्ठाय देहिने | जीर्णाजीर्णविशङ्कायां स्नेहस्योष्णोदकं पिबेत् ||३२|| तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिस्तथा | स्युः पच्यमाने तृड्दाहभ्रमसादारतिक्लमाः ||३३||
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Adhikarana 21 (34-35) · Śloka 35
পরিষিচ্যাদ্ভিরুষ্ণাভির্জীর্ণস্নেহং ততো নরম্ | যবাগূং পাযযেচ্চোষ্ণাং কামং ক্লিন্নাল্পতণ্ডুলাম্ ||৩৪|| দেযৌ যূষরসৌ বাঽপি সুগন্ধী স্নেহবর্জিতৌ | কৃতৌ বাঽত্যল্পসর্পিষ্কৌ বিলেপী বা বিধীযতে ||৩৫||
परिषिच्याद्भिरुष्णाभिर्जीर्णस्नेहं ततो नरम् | यवागूं पाययेच्चोष्णां कामं क्लिन्नाल्पतण्डुलाम् ||३४|| देयौ यूषरसौ वाऽपि सुगन्धी स्नेहवर्जितौ | कृतौ वाऽत्यल्पसर्पिष्कौ विलेपी वा विधीयते ||३५||
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Adhikarana 22 (36) · Śloka 36
পিবেত্ত্র্যহং চতুরহং পঞ্চাহং ষডহং তথা | সপ্তরাত্রাত্ পরং স্নেহঃ সাত্ম্যীভবতি সেবিতঃ ||৩৬||
पिबेत्त्र्यहं चतुरहं पञ्चाहं षडहं तथा | सप्तरात्रात् परं स्नेहः सात्म्यीभवति सेवितः ||३६||
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Adhikarana 23 (37) · Śloka 37
সুকুমারং কৃশং বৃদ্ধং শিশুং স্নেহদ্বিষং তথা | তৃষ্ণার্তমুষ্ণকালে চ সহ ভক্তেন পাযযেত্ ||৩৭||
सुकुमारं कृशं वृद्धं शिशुं स्नेहद्विषं तथा | तृष्णार्तमुष्णकाले च सह भक्तेन पाययेत् ||३७||
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Adhikarana 24 (38-44) · Śloka 44
পিপ্পল্যো লবণং স্নেহাশ্চত্বারো দধিমস্তুকঃ | পীতমৈকধ্যমেতদ্ধি সদ্যঃস্নেহনমুচ্যতে ||৩৮|| ভৃষ্টা মাংসরসে স্নিগ্ধা যবাগূঃ সূপকল্পিতা | প্রক্ষুদ্রা পীযমানা তু সদ্যঃস্নেহনমুচ্যতে ||৩৯|| সর্পিষ্মতী পযঃসিদ্ধা যবাগূঃ স্বল্পতণ্ডুলা | সুখোষ্ণা সেব্যমানা তু সদ্যঃস্নেহনমুচ্যতে ||৪০|| পিপ্পল্যো লবণং সর্পিস্তিলপিষ্টং বরাহজা | বসা চ পীতমৈকধ্যং সদ্যঃস্নেহনমুচ্যতে ||৪১|| শর্করাচূর্ণসংসৃষ্টে দোহনস্থে ঘৃতে তু গাম্ | দুগ্ধ্বা ক্ষীরং পিবেদ্রূক্ষঃ সদ্যঃস্নেহনমুচ্যতে ||৪২|| যবকোলকুলত্থানাং ক্বাথো মাগধিকান্বিতঃ | পযো দধি সুরা চেতি ঘৃতমপ্যষ্টমং ভবেত্ ||৪৩|| সিদ্ধমেতৈর্ঘৃতং পীতং সদ্যঃস্নেহনমুত্তমম্ | রাজ্ঞে রাজসমেভ্যো বা দেযমেতদ্ধৃতোত্তমম্ ||৪৪||
पिप्पल्यो लवणं स्नेहाश्चत्वारो दधिमस्तुकः | पीतमैकध्यमेतद्धि सद्यःस्नेहनमुच्यते ||३८|| भृष्टा मांसरसे स्निग्धा यवागूः सूपकल्पिता | प्रक्षुद्रा पीयमाना तु सद्यःस्नेहनमुच्यते ||३९|| सर्पिष्मती पयःसिद्धा यवागूः स्वल्पतण्डुला | सुखोष्णा सेव्यमाना तु सद्यःस्नेहनमुच्यते ||४०|| पिप्पल्यो लवणं सर्पिस्तिलपिष्टं वराहजा | वसा च पीतमैकध्यं सद्यःस्नेहनमुच्यते ||४१|| शर्कराचूर्णसंसृष्टे दोहनस्थे घृते तु गाम् | दुग्ध्वा क्षीरं पिबेद्रूक्षः सद्यःस्नेहनमुच्यते ||४२|| यवकोलकुलत्थानां क्वाथो मागधिकान्वितः | पयो दधि सुरा चेति घृतमप्यष्टमं भवेत् ||४३|| सिद्धमेतैर्घृतं पीतं सद्यःस्नेहनमुत्तमम् | राज्ञे राजसमेभ्यो वा देयमेतद्धृतोत्तमम् ||४४||
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Adhikarana 25 (45) · Śloka 45
বলহীনেষু বৃদ্ধেষু মৃদ্বগ্নিস্ত্রীহতাত্মসু | অল্পদোষেষু যোজ্যাঃ স্যুর্যে যোগাঃ সম্যগীরিতাঃ ||৪৫||
बलहीनेषु वृद्धेषु मृद्वग्निस्त्रीहतात्मसु | अल्पदोषेषु योज्याः स्युर्ये योगाः सम्यगीरिताः ||४५||
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Adhikarana 26 (46-50) · Śloka 51
বিবর্জযেত্ স্নেহপানমজীর্ণী তরুণজ্বরী | দুর্বলোঽরোচকী স্থূলো মূর্চ্ছার্তো মদপীডিতঃ ||৪৬|| ছর্দ্যর্দিতঃ পিপাসার্তঃ শ্রান্তঃ পানক্লমান্বিতঃ | দত্তবস্তির্বিরিক্তশ্চ বান্তো যশ্চাপি মানবঃ ||৪৭|| অকালে দুর্দিনে চৈব ন চ স্নেহং পিবেন্নরঃ | অকালে চ প্রসূতা স্ত্রী স্নেহপানং বিবর্জযেত্ ||৪৮|| স্নেহপানাদ্ভবন্ত্যেষাং নৄণাং নানাবিধা গদাঃ | গদা বা কৃচ্ছ্রতাং যান্তি ন সিধ্যন্ত্যথবা পুনঃ ||৪৯|| গর্ভাশযেঽবশেষাঃ স্যূ রক্তক্লেদমলাস্ততঃ | স্নেহং জহ্যান্নিষেবেত পাচনং রূক্ষমেব চ ||৫০|| দশরাত্রাত্ততঃ স্নেহং যথাবদবচারযেত্ |৫১|
विवर्जयेत् स्नेहपानमजीर्णी तरुणज्वरी | दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छार्तो मदपीडितः ||४६|| छर्द्यर्दितः पिपासार्तः श्रान्तः पानक्लमान्वितः | दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च वान्तो यश्चापि मानवः ||४७|| अकाले दुर्दिने चैव न च स्नेहं पिबेन्नरः | अकाले च प्रसूता स्त्री स्नेहपानं विवर्जयेत् ||४८|| स्नेहपानाद्भवन्त्येषां नॄणां नानाविधा गदाः | गदा वा कृच्छ्रतां यान्ति न सिध्यन्त्यथवा पुनः ||४९|| गर्भाशयेऽवशेषाः स्यू रक्तक्लेदमलास्ततः | स्नेहं जह्यान्निषेवेत पाचनं रूक्षमेव च ||५०|| दशरात्रात्ततः स्नेहं यथावदवचारयेत् |५१|
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Adhikarana 27 (51-52) · Śloka 52
পুরীষং গ্রথিতং রূক্ষং কৃচ্ছ্রাদন্নং বিপচ্যতে ||৫১|| উরো বিদহতে বাযুঃ কোষ্ঠাদুপরি ধাবতি | দুর্বর্ণো দুর্বলশ্চৈব রূক্ষো ভবতি মানবঃ ||৫২||
पुरीषं ग्रथितं रूक्षं कृच्छ्रादन्नं विपच्यते ||५१|| उरो विदहते वायुः कोष्ठादुपरि धावति | दुर्वर्णो दुर्बलश्चैव रूक्षो भवति मानवः ||५२||
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Adhikarana 28 (53) · Śloka 53
সুস্নিগ্ধা ত্বগ্বিট্শৈথিল্যং দীপ্তোঽগ্নির্মৃদুগাত্রতা | গ্লানির্লাঘবমঙ্গানামধস্তাত্ স্নেহদর্শনম্ | সম্যক্স্নিগ্ধস্য লিঙ্গানি স্নেহোদ্বেগস্তথৈব চ ||৫৩||
सुस्निग्धा त्वग्विट्शैथिल्यं दीप्तोऽग्निर्मृदुगात्रता | ग्लानिर्लाघवमङ्गानामधस्तात् स्नेहदर्शनम् | सम्यक्स्निग्धस्य लिङ्गानि स्नेहोद्वेगस्तथैव च ||५३||
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Adhikarana 29 (54) · Śloka 54
ভক্তদ্বেষো মুখস্রাবো গুদদাহঃ প্রবাহিকা | পুরীষাতিপ্রবৃত্তিশ্চ ভৃশস্নিগ্ধস্য লক্ষণম্ ||৫৪||
भक्तद्वेषो मुखस्रावो गुददाहः प्रवाहिका | पुरीषातिप्रवृत्तिश्च भृशस्निग्धस्य लक्षणम् ||५४||
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Adhikarana 30 (55) · Śloka 55
রূক্ষস্য স্নেহনং স্নেহৈরতিস্নিগ্ধস্য রূক্ষণম্ | শ্যামাককোরদূষান্নতক্রপিণ্যাকশক্তুভিঃ ||৫৫||
रूक्षस्य स्नेहनं स्नेहैरतिस्निग्धस्य रूक्षणम् | श्यामाककोरदूषान्नतक्रपिण्याकशक्तुभिः ||५५||
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Adhikarana 31 (56) · Śloka 56
দীপ্তান্তরগ্নিঃ পরিশুদ্ধকোষ্ঠঃ প্রত্যগ্রধাতুর্বলবর্ণযুক্তঃ | দৃঢেন্দ্রিযো মন্দজরঃ শতাযুঃ স্নেহোপসেবী পুরুষো ভবেত্তু ||৫৬||
दीप्तान्तरग्निः परिशुद्धकोष्ठः प्रत्यग्रधातुर्बलवर्णयुक्तः | दृढेन्द्रियो मन्दजरः शतायुः स्नेहोपसेवी पुरुषो भवेत्तु ||५६||
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Adhikarana 32 (57) · Śloka 57
স্নেহো হিতো দুর্বলবহ্নিদেহসন্ধুক্ষণে ব্যাধিনিপীডিতস্য | বলান্বিতৌ ভোজনদোষজাতৈঃ প্রমর্দিতুং তৌ সহসা ন সাধ্যৌ ||৫৭||
स्नेहो हितो दुर्बलवह्निदेहसन्धुक्षणे व्याधिनिपीडितस्य | बलान्वितौ भोजनदोषजातैः प्रमर्दितुं तौ सहसा न साध्यौ ||५७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 31
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে স্নেহোপযৌগিকচিকিত্সিতং নামৈকত্রিংশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৩১||
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्नेहोपयौगिकचिकित्सितं नामैकत्रिंशत्तमोऽध्यायः ||३१||
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