Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত উদরাণাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथात उदराणां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাত উদরাণাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथात उदराणां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ধন্বন্তরির্ধর্মভৃতাং বরিষ্ঠো রাজর্ষিরিন্দ্রপ্রতিমোঽভবদ্যঃ | ব্রহ্মর্ষিপুত্রং বিনযোপপন্নং শিষ্যং শুভং সুশ্রুতমন্বশাত্ সঃ ||৩||
धन्वन्तरिर्धर्मभृतां वरिष्ठो राजर्षिरिन्द्रप्रतिमोऽभवद्यः | ब्रह्मर्षिपुत्रं विनयोपपन्नं शिष्यं शुभं सुश्रुतमन्वशात् सः ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
পৃথক্ সমস্তৈরপি চেহ দোষৈঃ প্লীহোদরং বদ্ধগুদং তথৈব | আগন্তুকং সপ্তমমষ্টমং চ দকোদরং চেতি বদন্তি তানি ||৪||
पृथक् समस्तैरपि चेह दोषैः प्लीहोदरं बद्धगुदं तथैव | आगन्तुकं सप्तममष्टमं च दकोदरं चेति वदन्ति तानि ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 6
সুদুর্বলাগ্নেরহিতাশনস্য সংশুষ্কপূত্যন্ননিষেবণাদ্বা | স্নেহাদিমিথ্যাচরণাচ্চ জন্তোর্বৃদ্ধিং গতাঃ কোষ্ঠমভিপ্রপন্নাঃ ||৫|| গুল্মাকৃতিব্যঞ্জিতলক্ষণানি কুর্বন্তি ঘোরাণ্যুদরাণি দোষাঃ |৬|
सुदुर्बलाग्नेरहिताशनस्य संशुष्कपूत्यन्ननिषेवणाद्वा | स्नेहादिमिथ्याचरणाच्च जन्तोर्वृद्धिं गताः कोष्ठमभिप्रपन्नाः ||५|| गुल्माकृतिव्यञ्जितलक्षणानि कुर्वन्ति घोराण्युदराणि दोषाः |६|
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 7
কোষ্ঠাদুপস্নেহবদন্নসারো নিঃসৃত্য দুষ্টোঽনিলবেগনুন্নঃ ||৬|| ত্বচঃ সমুন্নম্য শনৈঃ সমন্তাদ্বিবর্ধমানো জঠরং করোতি |৭|
कोष्ठादुपस्नेहवदन्नसारो निःसृत्य दुष्टोऽनिलवेगनुन्नः ||६|| त्वचः समुन्नम्य शनैः समन्ताद्विवर्धमानो जठरं करोति |७|
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 8
তত্পূর্বরূপং বলবর্ণকাঙ্ক্ষাবলীবিনাশো জঠরে হি রাজ্যঃ ||৭|| জীর্ণাপরিজ্ঞানবিদাহবত্যো বস্তৌ রুজঃ পাদগতশ্চ শোফঃ |৮|
तत्पूर्वरूपं बलवर्णकाङ्क्षावलीविनाशो जठरे हि राज्यः ||७|| जीर्णापरिज्ञानविदाहवत्यो बस्तौ रुजः पादगतश्च शोफः |८|
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 9
সঙ্গৃহ্য পার্শ্বোদরপৃষ্ঠনাভীর্যদ্বর্ধতে কৃষ্ণসিরাবনদ্ধম্ ||৮|| সশূলমানাহবদুগ্রশব্দং সতোদভেদং পবনাত্মকং তত্ |৯|
सङ्गृह्य पार्श्वोदरपृष्ठनाभीर्यद्वर्धते कृष्णसिरावनद्धम् ||८|| सशूलमानाहवदुग्रशब्दं सतोदभेदं पवनात्मकं तत् |९|
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 10
যচ্চোষতৃষ্ণাজ্বরদাহযুক্তং পীতং সিরা ভান্তি চ যত্র পীতাঃ ||৯|| পীতাক্ষিবিণ্মূত্রনখাননস্য পিত্তোদরং তত্ত্বচিরাভিবৃদ্ধি |১০|
यच्चोषतृष्णाज्वरदाहयुक्तं पीतं सिरा भान्ति च यत्र पीताः ||९|| पीताक्षिविण्मूत्रनखाननस्य पित्तोदरं तत्त्वचिराभिवृद्धि |१०|
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 11
যচ্ছীতলং শুক্লসিরাবনদ্ধং গুরু স্থিরং শুক্লনখাননস্য ||১০|| স্নিগ্ধং মহচ্ছোফযুতং সসাদং কফোদরং তত্তু চিরাভিবৃদ্ধি |১১|
यच्छीतलं शुक्लसिरावनद्धं गुरु स्थिरं शुक्लनखाननस्य ||१०|| स्निग्धं महच्छोफयुतं ससादं कफोदरं तत्तु चिराभिवृद्धि |११|
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Adhikarana 10 (11-13) · Śloka 14
স্ত্রিযোঽন্নপানং নখরোমমূত্রবিডার্তবৈর্যুক্তমসাধুবৃত্তাঃ ||১১|| যস্মৈ প্রযচ্ছন্ত্যরযো গরাংশ্চ দুষ্টাম্বুদূষীবিষসেবনাদ্বা | তেনাশু রক্তং কুপিতাশ্চ দোষাঃ কুর্বন্তি ঘোরং জঠরং ত্রিলিঙ্গম্ ||১২|| তচ্ছীতবাতাভ্রসমুদ্ভবেষু বিশেষতঃ কুপ্যতি দহ্যতে চ স চাতুরো মূর্চ্ছতি সম্প্রসক্তং পাণ্ডুঃ কৃশঃ শুষ্যতি তৃষ্ণযা চ ||১৩|| প্রকীর্তিতং দূষ্যুদরং তু ঘোরং ... |১৪|
स्त्रियोऽन्नपानं नखरोममूत्रविडार्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः ||११|| यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो गरांश्च दुष्टाम्बुदूषीविषसेवनाद्वा | तेनाशु रक्तं कुपिताश्च दोषाः कुर्वन्ति घोरं जठरं त्रिलिङ्गम् ||१२|| तच्छीतवाताभ्रसमुद्भवेषु विशेषतः कुप्यति दह्यते च स चातुरो मूर्च्छति सम्प्रसक्तं पाण्डुः कृशः शुष्यति तृष्णया च ||१३|| प्रकीर्तितं दूष्युदरं तु घोरं ... |१४|
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Adhikarana 11 (14-15) · Śloka 16
... প্লীহোদরং কীর্তযতো নিবোধ | বিদাহ্যভিষ্যন্দিরতস্য জন্তোঃ প্রদুষ্টমত্যর্থমসৃক্ কফশ্চ ||১৪|| প্লীহাভিবৃদ্ধিং সততং করোতি প্লীহোদরং তত্ প্রবদন্তি তজ্জ্ঞাঃ | বামে চ পার্শ্বে পরিবৃদ্ধিমেতি বিশেষতঃ সীদতি চাতুরোঽত্র ||১৫|| মন্দজ্বরাগ্নিঃ কফপিত্তলিঙ্গৈরুপদ্রুতঃ ক্ষীণবলোঽতিপাণ্ডুঃ |১৬|
... प्लीहोदरं कीर्तयतो निबोध | विदाह्यभिष्यन्दिरतस्य जन्तोः प्रदुष्टमत्यर्थमसृक् कफश्च ||१४|| प्लीहाभिवृद्धिं सततं करोति प्लीहोदरं तत् प्रवदन्ति तज्ज्ञाः | वामे च पार्श्वे परिवृद्धिमेति विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र ||१५|| मन्दज्वराग्निः कफपित्तलिङ्गैरुपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः |१६|
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Adhikarana 12 (16) · Śloka 16
সব্যেতরস্মিন্ যকৃতি প্রদুষ্টে জ্ঞেযং যকৃদ্দাল্যুদরং তদেব ||১৬||
सव्येतरस्मिन् यकृति प्रदुष्टे ज्ञेयं यकृद्दाल्युदरं तदेव ||१६||
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Adhikarana 13 (17-18) · Śloka 19
যস্যান্ত্রমন্নৈরুপলেপিভির্বা বালাশ্মভির্বা সহিতৈঃ পৃথগ্বা | সঞ্চীযতে তত্র মলঃ সদোষঃ ক্রমেণ নাড্যামিব সঙ্করো হি ||১৭|| নিরুধ্যতে চাস্য গুদে পুরীষং নিরেতি কৃচ্ছ্রাদপি চাল্পমল্পম্ | হৃন্নাভিমধ্যে পরিবৃদ্ধিমেতি ত(য)চ্চোদরং বিট্সমগন্ধিকং চ ||১৮|| প্রচ্ছর্দযন্ বদ্ধগুদী বিভাব্যঃ, ... |১৯|
यस्यान्त्रमन्नैरुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा सहितैः पृथग्वा | सञ्चीयते तत्र मलः सदोषः क्रमेण नाड्यामिव सङ्करो हि ||१७|| निरुध्यते चास्य गुदे पुरीषं निरेति कृच्छ्रादपि चाल्पमल्पम् | हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति त(य)च्चोदरं विट्समगन्धिकं च ||१८|| प्रच्छर्दयन् बद्धगुदी विभाव्यः, ... |१९|
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Adhikarana 14 (19-20) · Śloka 21
...ততঃ পরিস্রাব্যুদরং নিবোধ | শল্যং যদন্নোপহিতং তদন্ত্রং ভিনত্তি যস্যাগতমন্যথা বা ||১৯|| তস্মাত্ স্রুতোঽন্ত্রাত্ সলিলপ্রকাশঃ স্রাবঃ স্রবেদ্বৈ গুদতস্তু ভূযঃ | নাভেরধশ্চোদরমেতি বৃদ্ধিং নিস্তুদ্যতেঽতীব বিদহ্যতে চ ||২০|| এতত্ পরিস্রাব্যুদরং প্রদিষ্টং... |২১|
...ततः परिस्राव्युदरं निबोध | शल्यं यदन्नोपहितं तदन्त्रं भिनत्ति यस्यागतमन्यथा वा ||१९|| तस्मात् स्रुतोऽन्त्रात् सलिलप्रकाशः स्रावः स्रवेद्वै गुदतस्तु भूयः | नाभेरधश्चोदरमेति वृद्धिं निस्तुद्यतेऽतीव विदह्यते च ||२०|| एतत् परिस्राव्युदरं प्रदिष्टं... |२१|
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Adhikarana 15 (21-23) · Śloka 23
... দকোদরং কীর্তযতো নিবোধ | যঃ স্নেহপীতোঽপ্যনুবাসিতো বা বান্তো বিরিক্তোঽপ্যথবা নিরূঢঃ ||২১|| পিবেজ্জলং শীতলমাশু তস্য স্রোতাংসি দুষ্যন্তি হি তদ্বহানি | স্নেহোপলিপ্তেষ্বথবাঽপি তেষু দকোদরং পূর্ববদভ্যুপৈতি ||২২|| স্নিগ্ধং মহত্ সম্পরিবৃত্তনাভি ভৃশোন্নতং পূর্ণমিবাম্বুনা চ | যথা দৃতিঃ ক্ষুভ্যতি কম্পতে চ শব্দাযতে চাপি দকোদরং তত্ ||২৩||
... दकोदरं कीर्तयतो निबोध | यः स्नेहपीतोऽप्यनुवासितो वा वान्तो विरिक्तोऽप्यथवा निरूढः ||२१|| पिबेज्जलं शीतलमाशु तस्य स्रोतांसि दुष्यन्ति हि तद्वहानि | स्नेहोपलिप्तेष्वथवाऽपि तेषु दकोदरं पूर्ववदभ्युपैति ||२२|| स्निग्धं महत् सम्परिवृत्तनाभि भृशोन्नतं पूर्णमिवाम्बुना च | यथा दृतिः क्षुभ्यति कम्पते च शब्दायते चापि दकोदरं तत् ||२३||
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Adhikarana 16 (24) · Śloka 24
আধ্মানং গমনেঽশক্তির্দৌর্বল্যং দুর্বলাগ্নিতা | শোফঃ সদনমঙ্গানাং সঙ্গো বাতপুরীষযোঃ | দাহস্তৃষ্ণা চ সর্বেষু জঠরেষু ভবন্তি হি ||২৪||
आध्मानं गमनेऽशक्तिर्दौर्बल्यं दुर्बलाग्निता | शोफः सदनमङ्गानां सङ्गो वातपुरीषयोः | दाहस्तृष्णा च सर्वेषु जठरेषु भवन्ति हि ||२४||
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Adhikarana 17 (25) · Śloka 25
অন্তে সলিলভাবং হি ভজন্তে জঠরাণি তু | সর্বাণ্যেব পরীপাকাত্তদা তানি বিবর্জযেত্ ||২৫||
अन्ते सलिलभावं हि भजन्ते जठराणि तु | सर्वाण्येव परीपाकात्तदा तानि विवर्जयेत् ||२५||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 7
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং নিদানস্থানে উদরনিদানং নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ ||৭||
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने उदरनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः ||७||
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