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8. mūḍhagarbhanidānam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো মূঢগর্ভনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो मूढगर्भनिदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

গ্রাম্যধর্মযানবাহনাধ্বগমনপ্রস্খলনপ্রপতনপ্রপীডনধাবনাভিঘাতবিষমশযনাসনোপবাসবেগাভিঘাতাতিরূক্ষ- কটুতিক্তভোজনশোকাতিক্ষারসেবনাতিসারবমনবিরেচনপ্রেঙ্খোলনাজীর্ণগর্ভশাতনপ্রভৃতিভির্বিশেষৈর্বন্ধনান্মুচ্যতে গর্ভঃ, ফলমিব বৃন্তবন্ধনাদভিঘাতবিশেষৈঃ; স বিমুক্তবন্ধনো গর্ভাশযমতিক্রম্য যকৃত্প্লীহান্ত্রবিবরৈরবস্রংসমানঃ কোষ্ঠসঙ্ক্ষোভমাপাদযতি, তস্যা জঠরসঙ্ক্ষোভাদ্বাযুরপানো মূঢঃ পার্শ্ববস্তিশীর্ষোদরযোনিশূলানাহমূত্রসঙ্গানামন্যতমমাপদ্য গর্ভং চ্যাবযতি তরুণং শোণিতস্রাবেণ; তমেব কদাচিদ্বিবৃদ্ধমসম্যগাগতমপত্যপথমনুপ্রাপ্তমনিরস্যমানং বিগুণাপানসম্মোহিতং গর্ভং মূঢগর্ভমিত্যাচক্ষতে ||৩||

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ग्राम्यधर्मयानवाहनाध्वगमनप्रस्खलनप्रपतनप्रपीडनधावनाभिघातविषमशयनासनोपवासवेगाभिघातातिरूक्ष- कटुतिक्तभोजनशोकातिक्षारसेवनातिसारवमनविरेचनप्रेङ्खोलनाजीर्णगर्भशातनप्रभृतिभिर्विशेषैर्बन्धनान्मुच्यते गर्भः, फलमिव वृन्तबन्धनादभिघातविशेषैः; स विमुक्तबन्धनो गर्भाशयमतिक्रम्य यकृत्प्लीहान्त्रविवरैरवस्रंसमानः कोष्ठसङ्क्षोभमापादयति, तस्या जठरसङ्क्षोभाद्वायुरपानो मूढः पार्श्वबस्तिशीर्षोदरयोनिशूलानाहमूत्रसङ्गानामन्यतममापद्य गर्भं च्यावयति तरुणं शोणितस्रावेण; तमेव कदाचिद्विवृद्धमसम्यगागतमपत्यपथमनुप्राप्तमनिरस्यमानं विगुणापानसम्मोहितं गर्भं मूढगर्भमित्याचक्षते ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

ততঃ কীলঃ প্রতিখুরো বীজকঃ পরিঘ ইতি | তত্র, ঊর্ধ্ববাহুশিরঃপাদো যো যোনিমুখং নিরুণদ্ধি কীল ইব স কীলঃ; নিঃসৃতহস্তপাদশিরাঃ কাযসঙ্গী প্রতিখুরঃ; যো নির্গচ্ছত্যেকশিরোভুজঃ স বীজকঃ; যস্তু পরিঘ ইব যোনিমুখমাবৃত্য তিষ্ঠতি স পরিঘঃ; ইতি চতুর্বিধো ভবতীত্যেকে ভাষন্তে | তত্তু ন সম্যক্; কস্মাত্? স যদা বিগুণানিলপ্রপীডিতোঽপত্যপথমনেকধা প্রপদ্যতে তদা সঙ্খ্যা হীযতে ||৪||

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ततः कीलः प्रतिखुरो बीजकः परिघ इति | तत्र, ऊर्ध्वबाहुशिरःपादो यो योनिमुखं निरुणद्धि कील इव स कीलः; निःसृतहस्तपादशिराः कायसङ्गी प्रतिखुरः; यो निर्गच्छत्येकशिरोभुजः स बीजकः; यस्तु परिघ इव योनिमुखमावृत्य तिष्ठति स परिघः; इति चतुर्विधो भवतीत्येके भाषन्ते | तत्तु न सम्यक्; कस्मात्? स यदा विगुणानिलप्रपीडितोऽपत्यपथमनेकधा प्रपद्यते तदा सङ्ख्या हीयते ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

তত্র, কশ্চিদ্দ্বাভ্যাং সক্থিভ্যাং যোনিমুখং প্রতিপদ্যতে; কশ্চিদাভুগ্নৈকসক্থিরেকেন; কশ্চিদাভুগ্নসক্থিশরীরঃ স্ফিগ্দেশেন তির্যগাগতঃ; কশ্চিদুরঃপার্শ্বপৃষ্ঠানামন্যতমেন যোনিদ্বারং পিধাযাবতিষ্ঠতে; অন্তঃপার্শ্বাপবৃত্তশিরাঃ কশ্চিদেকেন বাহুনা; কশ্চিদাভুগ্নশিরা বাহুদ্বযেন; কশ্চিদাভুগ্নমধ্যো হস্তপাদশিরোভিঃ; কশ্চিদেকেন সক্থ্না যোনিমুখং প্রতিপদ্যতেঽপরেণ পাযুম্; ইত্যষ্টবিধা মূঢগর্ভগতিরুদ্দিষ্টা সমাসেন ||৫||

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तत्र, कश्चिद्द्वाभ्यां सक्थिभ्यां योनिमुखं प्रतिपद्यते; कश्चिदाभुग्नैकसक्थिरेकेन; कश्चिदाभुग्नसक्थिशरीरः स्फिग्देशेन तिर्यगागतः; कश्चिदुरःपार्श्वपृष्ठानामन्यतमेन योनिद्वारं पिधायावतिष्ठते; अन्तःपार्श्वापवृत्तशिराः कश्चिदेकेन बाहुना; कश्चिदाभुग्नशिरा बाहुद्वयेन; कश्चिदाभुग्नमध्यो हस्तपादशिरोभिः; कश्चिदेकेन सक्थ्ना योनिमुखं प्रतिपद्यतेऽपरेण पायुम्; इत्यष्टविधा मूढगर्भगतिरुद्दिष्टा समासेन ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

তত্র দ্বাবন্ত্যাবসাধ্যৌ মূঢগর্ভৌ, শেষানপি বিপরীতেন্দ্রিযার্থাক্ষেপকযোনিভ্রংশসংবরণমক্কল্লশ্বাসকাসভ্রমনিপীডিতান্ পরিহরেত্ ||৬||

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तत्र द्वावन्त्यावसाध्यौ मूढगर्भौ, शेषानपि विपरीतेन्द्रियार्थाक्षेपकयोनिभ्रंशसंवरणमक्कल्लश्वासकासभ्रमनिपीडितान् परिहरेत् ||६||

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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8

ভবন্তি চাত্র- কালস্য পরিণামেন মুক্তং বৃন্তাদ্যথা ফলম্ | প্রপদ্যতে স্বভাবেন নান্যথা পতিতুং ধ্রুবম্ ||৭|| এবং কালপ্রকর্ষেণ মুক্তো নাডীনিবন্ধনাত্ | গর্ভাশযস্থো যো গর্ভো জননায প্রপদ্যতে ||৮||

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भवन्ति चात्र- कालस्य परिणामेन मुक्तं वृन्ताद्यथा फलम् | प्रपद्यते स्वभावेन नान्यथा पतितुं ध्रुवम् ||७|| एवं कालप्रकर्षेण मुक्तो नाडीनिबन्धनात् | गर्भाशयस्थो यो गर्भो जननाय प्रपद्यते ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9

কৃমিবাতাভিঘাতৈস্তু তদেবোপদ্রুতং ফলম্ | পতত্যকালেঽপি যথা তথা স্যাদ্গর্ভবিচ্যুতিঃ ||৯||

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कृमिवाताभिघातैस्तु तदेवोपद्रुतं फलम् | पतत्यकालेऽपि यथा तथा स्याद्गर्भविच्युतिः ||९||

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Adhikarana 8 (10) · Śloka 10

আচতুর্থাত্ততো মাসাত্ প্রস্রবেদ্গর্ভবিচ্যুতিঃ | ততঃ স্থিরশরীরস্য পাতঃ পঞ্চমষষ্ঠযোঃ ||১০||

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आचतुर्थात्ततो मासात् प्रस्रवेद्गर्भविच्युतिः | ततः स्थिरशरीरस्य पातः पञ्चमषष्ठयोः ||१०||

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Adhikarana 9 (11) · Śloka 11

প্রবিধ্যতি শিরো যা তু শীতাঙ্গী নিরপত্রপা | নীলোদ্ধতসিরা হন্তি সা গর্ভং স চ তাং তথা ||১১||

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प्रविध्यति शिरो या तु शीताङ्गी निरपत्रपा | नीलोद्धतसिरा हन्ति सा गर्भं स च तां तथा ||११||

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Adhikarana 10 (12-13) · Śloka 13

গর্ভাস্পন্দনমাবীনাং প্রণাশঃ শ্যাবপাণ্ডুতা | ভবত্যুচ্ছ্বাসপূতিত্বং শূলং চান্তর্মৃতে শিশৌ ||১২|| মানসাগন্তুভির্মাতুরুপতাপৈঃ প্রপীডিতঃ | গর্ভো ব্যাপদ্যতে কুক্ষৌ ব্যাধিভিশ্চ প্রপীডিতঃ ||১৩||

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गर्भास्पन्दनमावीनां प्रणाशः श्यावपाण्डुता | भवत्युच्छ्वासपूतित्वं शूलं चान्तर्मृते शिशौ ||१२|| मानसागन्तुभिर्मातुरुपतापैः प्रपीडितः | गर्भो व्यापद्यते कुक्षौ व्याधिभिश्च प्रपीडितः ||१३||

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Adhikarana 11 (14) · Śloka 14

বস্তমারবিপন্নাযাঃ কুক্ষিঃ প্রস্পন্দতে যদি | তত্ক্ষণাজ্জন্মকালে তং পাটযিত্বোদ্ধরেদ্ভিষক্ ||১৪||

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बस्तमारविपन्नायाः कुक्षिः प्रस्पन्दते यदि | तत्क्षणाज्जन्मकाले तं पाटयित्वोद्धरेद्भिषक् ||१४||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 8

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং নিদানস্থানে মূঢগর্ভনিদানং নামাষ্টমোঽধ্যাযঃ ||৮||

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इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने मूढगर्भनिदानं नामाष्टमोऽध्यायः ||८||

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8. mūḍhagarbhanidānam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi