Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কৃত্যাকৃত্যবিধিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः कृत्याकृत्यविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ কৃত্যাকৃত্যবিধিমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः कृत्याकृत्यविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
তত্র, বযঃস্থানাং দৃঢানাং প্রাণবতাং সত্ত্ববতাং (আত্মবতাং) চ সুচিকিত্স্যা ব্রণাঃ; একস্মিন্ বা পুরুষে যত্রৈতদ্গুণচতুষ্টযং তস্য সুখসাধনীযতমাঃ | তত্র, বযঃস্থানাং প্রত্যগ্রধাতুত্বাদাশু ব্রণা রোহন্তি; দৃঢানাং স্থিরবহুমাংসত্বাচ্ছস্ত্রমবচার্যমাণং সিরাস্নায্বাদিবিশেষান্ন প্রাপ্নোতি; প্রাণবতাং বেদনাভিঘাতাহারযন্ত্রণাদিভির্ন গ্লানিরুত্পদ্যতে; সত্ত্ববতাং দারুণৈরপি ক্রিযাবিশেষৈর্ন ব্যথা ভবতি; তস্মাদেতেষাং সুখসাধনীযতমাঃ ||৩||
तत्र, वयःस्थानां दृढानां प्राणवतां सत्त्ववतां (आत्मवतां) च सुचिकित्स्या व्रणाः; एकस्मिन् वा पुरुषे यत्रैतद्गुणचतुष्टयं तस्य सुखसाधनीयतमाः | तत्र, वयःस्थानां प्रत्यग्रधातुत्वादाशु व्रणा रोहन्ति; दृढानां स्थिरबहुमांसत्वाच्छस्त्रमवचार्यमाणं सिरास्नाय्वादिविशेषान्न प्राप्नोति; प्राणवतां वेदनाभिघाताहारयन्त्रणादिभिर्न ग्लानिरुत्पद्यते; सत्त्ववतां दारुणैरपि क्रियाविशेषैर्न व्यथा भवति; तस्मादेतेषां सुखसाधनीयतमाः ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
ত এব বিপরীতগুণা বৃদ্ধকৃশাল্পপ্রাণভীরুষু দ্রষ্টব্যাঃ ||৪||
त एव विपरीतगुणा वृद्धकृशाल्पप्राणभीरुषु द्रष्टव्याः ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
স্ফিক্পাযুপ্রজননললাটগণ্ডৌষ্ঠপৃষ্ঠকর্ণফলকোষোদরজত্রুমুখাভ্যন্তরসংস্থাঃ সুখরোপণীযা ব্রণাঃ ||৫||
स्फिक्पायुप्रजननललाटगण्डौष्ठपृष्ठकर्णफलकोषोदरजत्रुमुखाभ्यन्तरसंस्थाः सुखरोपणीया व्रणाः ||५||
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Adhikarana 5 (6-7) · Śloka 7
অক্ষিদন্তনাসাপাঙ্গশ্রোত্রনাভিজঠরসেবনীনিতম্বপার্শ্বকুক্ষিবক্ষঃকক্ষাস্তনসন্ধিভাগগতাঃ সফেনপূযরক্তানিলবাহিনোঽন্তঃশল্যাশ্চ দুশ্চিকিত্স্যাঃ; অধোভাগাশ্চোর্ধ্বভাগনির্বাহিণো , রোমান্তোপনখমর্মজঙ্ঘাস্থিসংশ্রিতাশ্চ, ভগন্দরমপি চান্তর্মুখং সেবনীকুটকাস্থিসংশ্রিতম্ ||৬|| কুষ্ঠিনাং বিষজুষ্টানাং শোষিণাং মধুমেহিনাম্ | ব্রণাঃ কৃচ্ছ্রেণ সিধ্যন্তি যেষাং চাপি ব্রণে ব্রণাঃ ||৭||
अक्षिदन्तनासापाङ्गश्रोत्रनाभिजठरसेवनीनितम्बपार्श्वकुक्षिवक्षःकक्षास्तनसन्धिभागगताः सफेनपूयरक्तानिलवाहिनोऽन्तःशल्याश्च दुश्चिकित्स्याः; अधोभागाश्चोर्ध्वभागनिर्वाहिणो , रोमान्तोपनखमर्मजङ्घास्थिसंश्रिताश्च, भगन्दरमपि चान्तर्मुखं सेवनीकुटकास्थिसंश्रितम् ||६|| कुष्ठिनां विषजुष्टानां शोषिणां मधुमेहिनाम् | व्रणाः कृच्छ्रेण सिध्यन्ति येषां चापि व्रणे व्रणाः ||७||
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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
অবপাটিকানিরুদ্ধপ্রকশসন্নিরুদ্ধগুদজঠরাণি, গ্রন্থিক্ষতক্রিমযঃ প্রতিশ্যাযজাঃ কোষ্ঠজাশ্চ ত্বগ্দোষিণাং প্রমেহিণাং বা যে পরিক্ষতেষু দৃশ্যন্তে, শর্করা সিকতামেহো বাতকুণ্ডলিকাঽষ্ঠীলা দন্তশর্করোপকুশঃ কণ্ঠশালূকং নিষ্কোষণদূষিতাশ্চ দন্তবেষ্টা বিসর্পাস্থিক্ষতোরঃক্ষতব্রণগ্রন্থিপ্রভৃতযশ্চ যাপ্যাঃ ||৮||
अवपाटिकानिरुद्धप्रकशसन्निरुद्धगुदजठराणि, ग्रन्थिक्षतक्रिमयः प्रतिश्यायजाः कोष्ठजाश्च त्वग्दोषिणां प्रमेहिणां वा ये परिक्षतेषु दृश्यन्ते, शर्करा सिकतामेहो वातकुण्डलिकाऽष्ठीला दन्तशर्करोपकुशः कण्ठशालूकं निष्कोषणदूषिताश्च दन्तवेष्टा विसर्पास्थिक्षतोरःक्षतव्रणग्रन्थिप्रभृतयश्च याप्याः ||८||
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Adhikarana 7 (9) · Śloka 9
সাধ্যা যাপ্যত্বমাযান্তি যাপ্যাশ্চাসাধ্যতাং তথা | ঘ্নন্তি প্রাণানসাধ্যাস্তু নরাণামক্রিযাবতাম্ ||৯||
साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्याश्चासाध्यतां तथा | घ्नन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ||९||
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Adhikarana 8 (10-11) · Śloka 11
যাপনীযং বিজানীযাত্ ক্রিযা ধারযতে তু যম্ | ক্রিযাযাং তু নিবৃত্তাযাং সদ্য এব বিনশ্যতি ||১০|| প্রাপ্তা ক্রিযাং ধারযতি যাপ্যব্যাধিতমাতুরম্ | প্রপতিষ্যদিবাগারং বিষ্কম্ভঃ সাধুযোজিতঃ ||১১||
यापनीयं विजानीयात् क्रिया धारयते तु यम् | क्रियायां तु निवृत्तायां सद्य एव विनश्यति ||१०|| प्राप्ता क्रियां धारयति याप्यव्याधितमातुरम् | प्रपतिष्यदिवागारं विष्कम्भः साधुयोजितः ||११||
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Adhikarana 9 (12) · Śloka 12
অত ঊর্ধ্বমসাধ্যান্ বক্ষ্যামঃ- মাংসপিণ্ডবদুদ্গতাঃ প্রসেকিনোঽন্তঃপূযবেদনাবন্তোঽশ্বাপানবদুদ্বৃত্তৌষ্ঠাঃ , কেচিত্ কঠিনা গোশৃঙ্গবদুদ্গতমৃদুমাংসপ্ররোহাঃ, অপরে দুষ্টরুধিরাস্রাবিণস্তনুশীতপিচ্ছিলাস্রাবিণো বা মধ্যোন্নতাঃ, কেচিদবসন্নশুষিরপর্যন্তাঃ শণতূলবত্ স্নাযুজালবন্তো দুর্দর্শনাঃ, বসামেদোমজ্জমস্তুলুঙ্গস্রাবিণশ্চ দোষসমুত্থাঃ, পীতাসিতমূত্রপুরীষবাতবাহিনশ্চ কোষ্ঠস্থাঃ, ত এবোভযতোভাগব্রণমুখেষু পূযরক্তনির্বাহিণঃ, (ক্ষীণমাংসানাং চ ) সর্বতোগতযশ্চাণুমুখা মাংসবুদ্বুদবন্তঃ, সশব্দবাতবাহিনশ্চ শিরঃকণ্ঠস্থাঃ, ক্ষীণমাংসানাং চ পূযরক্তনির্বাহিণোঽরোচকাবিপাককাসশ্বাসোপদ্রবযুক্তাঃ, ভিন্নে বা শিরঃকপালে যত্র মস্তুলুঙ্গদর্শনং ত্রিদোষলিঙ্গপ্রাদুর্ভাবঃ কাসশ্বাসৌ বা যস্যেতি ||১২||
अत ऊर्ध्वमसाध्यान् वक्ष्यामः- मांसपिण्डवदुद्गताः प्रसेकिनोऽन्तःपूयवेदनावन्तोऽश्वापानवदुद्वृत्तौष्ठाः , केचित् कठिना गोशृङ्गवदुद्गतमृदुमांसप्ररोहाः, अपरे दुष्टरुधिरास्राविणस्तनुशीतपिच्छिलास्राविणो वा मध्योन्नताः, केचिदवसन्नशुषिरपर्यन्ताः शणतूलवत् स्नायुजालवन्तो दुर्दर्शनाः, वसामेदोमज्जमस्तुलुङ्गस्राविणश्च दोषसमुत्थाः, पीतासितमूत्रपुरीषवातवाहिनश्च कोष्ठस्थाः, त एवोभयतोभागव्रणमुखेषु पूयरक्तनिर्वाहिणः, (क्षीणमांसानां च ) सर्वतोगतयश्चाणुमुखा मांसबुद्बुदवन्तः, सशब्दवातवाहिनश्च शिरःकण्ठस्थाः, क्षीणमांसानां च पूयरक्तनिर्वाहिणोऽरोचकाविपाककासश्वासोपद्रवयुक्ताः, भिन्ने वा शिरःकपाले यत्र मस्तुलुङ्गदर्शनं त्रिदोषलिङ्गप्रादुर्भावः कासश्वासौ वा यस्येति ||१२||
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Adhikarana 10 (13) · Śloka 13
ভবতি চাত্র- বসাং মেদোঽথ মজ্জানং মস্তুলুঙ্গং চ যঃ স্রবেত্ | আগন্তুস্তু ব্রণঃ সিধ্যেন্ন সিধ্যেদ্দোষসম্ভবঃ ||১৩||
भवति चात्र- वसां मेदोऽथ मज्जानं मस्तुलुङ्गं च यः स्रवेत् | आगन्तुस्तु व्रणः सिध्येन्न सिध्येद्दोषसम्भवः ||१३||
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Adhikarana 11 (13-14) · Śloka 14
অমর্মোপহিতে দেশে সিরাসন্ধ্যস্থিবর্জিতে | বিকারোযোঽনুপর্যেতি তদসাধ্যস্য লক্ষণম্ ||১৪||
अमर्मोपहिते देशे सिरासन्ध्यस्थिवर्जिते | विकारोयोऽनुपर्येति तदसाध्यस्य लक्षणम् ||१४||
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Adhikarana 12 (15-16) · Śloka 16
ক্রমেণোপচযং প্রাপ্য ; ধাতূননুগতঃ শনৈঃ | ন শক্য উন্মূলযিতুং বৃদ্ধো বৃক্ষ ইবামযঃ ||১৫|| স স্থিরত্বান্মহত্ত্বাচ্চ ধাত্বনুক্রমণেন চ | নিহন্ত্যৌষধবীর্যাণি মন্ত্রান্ দুষ্টগ্রহো যথা ||১৬||
क्रमेणोपचयं प्राप्य ; धातूननुगतः शनैः | न शक्य उन्मूलयितुं वृद्धो वृक्ष इवामयः ||१५|| स स्थिरत्वान्महत्त्वाच्च धात्वनुक्रमणेन च | निहन्त्यौषधवीर्याणि मन्त्रान् दुष्टग्रहो यथा ||१६||
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Adhikarana 13 (17) · Śloka 17
অতো যো বিপরীতঃ স্যাত্ সুখসাধ্যঃ স উচ্যতে | অবদ্ধমূলঃ ক্ষুপকো যদ্বদুত্পাটনে সুখঃ ||১৭||
अतो यो विपरीतः स्यात् सुखसाध्यः स उच्यते | अबद्धमूलः क्षुपको यद्वदुत्पाटने सुखः ||१७||
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Adhikarana 14 (18) · Śloka 18
ত্রিভির্দোষৈরনাক্রান্তঃ শ্যাবৌষ্ঠঃ পিডকী সমঃ | অবেদনো নিরাস্রাবো ব্রণঃ শুদ্ধ ইহোচ্যতে ||১৮||
त्रिभिर्दोषैरनाक्रान्तः श्यावौष्ठः पिडकी समः | अवेदनो निरास्रावो व्रणः शुद्ध इहोच्यते ||१८||
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Adhikarana 15 (19) · Śloka 19
কপোতবর্ণপ্রতিমা যস্যান্তাঃ ক্লেদবর্জিতাঃ | স্থিরাশ্চিপিটিকাবন্তো রোহতীতি তমাদিশেত্ ||১৯||
कपोतवर्णप्रतिमा यस्यान्ताः क्लेदवर्जिताः | स्थिराश्चिपिटिकावन्तो रोहतीति तमादिशेत् ||१९||
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Adhikarana 16 (20) · Śloka 20
রূঢবর্ত্মানমগ্রন্থিমশূনমরুজং ব্রণম্ | ত্বক্সবর্ণং সমতলং সম্যগ্রূঢং বিনির্দিশেত্ ||২০||
रूढवर्त्मानमग्रन्थिमशूनमरुजं व्रणम् | त्वक्सवर्णं समतलं सम्यग्रूढं विनिर्दिशेत् ||२०||
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Adhikarana 17 (21) · Śloka 21
দোষপ্রকোপাদ্ব্যাযামাদভিঘাতাদজীর্ণতঃ | হর্ষাত্ ক্রোধাদ্ভযাদ্বাঽপি ব্রণো রূঢোঽপি দীর্যতে ||২১||
दोषप्रकोपाद्व्यायामादभिघातादजीर्णतः | हर्षात् क्रोधाद्भयाद्वाऽपि व्रणो रूढोऽपि दीर्यते ||२१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 23
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে কৃত্যাকৃত্যবিধির্নাম ত্রযোবিংশোঽধ্যাযঃ ||২৩||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने कृत्याकृत्यविधिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ||२३||
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