Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ব্যাধিসমুদ্দেশীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो व्याधिसमुद्देशीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো ব্যাধিসমুদ্দেশীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो व्याधिसमुद्देशीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
দ্বিবিধাস্তু ব্যাধযঃ- শস্ত্রসাধ্যাঃ, স্নেহাদিক্রিযাসাধ্যাশ্চ | তত্র শস্ত্রসাধ্যেষু স্নেহাদিক্রিযা ন প্রতিষিধ্যতে, স্নেহাদিক্রিযাসাধ্যেষু শস্ত্রকর্ম ন ক্রিযতে ||৩||
द्विविधास्तु व्याधयः- शस्त्रसाध्याः, स्नेहादिक्रियासाध्याश्च | तत्र शस्त्रसाध्येषु स्नेहादिक्रिया न प्रतिषिध्यते, स्नेहादिक्रियासाध्येषु शस्त्रकर्म न क्रियते ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
অস্মিন্ পুনঃ শাস্ত্রে সর্বতন্ত্রসামান্যাত্ সর্বেষাং ব্যাধীনাং যথাস্থূলমবরোধঃ ক্রিযতে | প্রাগভিহিতং ‘তদ্দুঃখসংযোগা ব্যাধয’ (সূ. অ. ১) ইতি | তচ্চ দুঃখং ত্রিবিধম্- আধ্যাত্মিকম্, আধিভৌতিকম্, আধিদৈবিকমিতি | তত্তু সপ্তবিধে ব্যাধাবুপনিপততি | তে পুনঃ সপ্তবিধা ব্যাধযঃ; তদ্যথা- আদিবলপ্রবৃত্তাঃ, জন্মবলপ্রবৃত্তাঃ, দোষবলপ্রবৃত্তাঃ, সঙ্ঘাতবলপ্রবৃত্তাঃ, কালবলপ্রবৃত্তাঃ, দৈববলপ্রবৃত্তাঃ, স্বভাববলপ্রবৃত্তা ইতি ||৪||
अस्मिन् पुनः शास्त्रे सर्वतन्त्रसामान्यात् सर्वेषां व्याधीनां यथास्थूलमवरोधः क्रियते | प्रागभिहितं ‘तद्दुःखसंयोगा व्याधय’ (सू. अ. १) इति | तच्च दुःखं त्रिविधम्- आध्यात्मिकम्, आधिभौतिकम्, आधिदैविकमिति | तत्तु सप्तविधे व्याधावुपनिपतति | ते पुनः सप्तविधा व्याधयः; तद्यथा- आदिबलप्रवृत्ताः, जन्मबलप्रवृत्ताः, दोषबलप्रवृत्ताः, सङ्घातबलप्रवृत्ताः, कालबलप्रवृत्ताः, दैवबलप्रवृत्ताः, स्वभावबलप्रवृत्ता इति ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তত্র, আদিবলপ্রবৃত্তা যে শুক্রশোণিতদোষান্বযাঃ কুষ্ঠার্শঃপ্রভৃতযঃ; তেঽপি দ্বিবিধাঃ- মাতৃজাঃ, পিতৃজাশ্চ | জন্মবলপ্রবৃত্তা যে মাতুরপচারাত্ পঙ্গুজাত্যন্ধবধিরমূকমিন্মিনবামনপ্রভৃতযো জাযন্তে; তেঽপি দ্বিবিধাঃ রসকৃতাঃ, দৌহৃদাপচারকৃতাশ্চ | দোষবলপ্রবৃত্তা যে আতঙ্কসমুত্পন্না মিথ্যাহারাচারকৃতাশ্চ; তেঽপি দ্বিবিধাঃ আমাশযসমুত্থাঃ , পক্বাশযসমুত্থাশ্চ; পুনশ্চ দ্বিবিধাঃ- শারীরা, মানসাশ্চ | ত এতে আধ্যাত্মিকাঃ ||৫||
तत्र, आदिबलप्रवृत्ता ये शुक्रशोणितदोषान्वयाः कुष्ठार्शःप्रभृतयः; तेऽपि द्विविधाः- मातृजाः, पितृजाश्च | जन्मबलप्रवृत्ता ये मातुरपचारात् पङ्गुजात्यन्धबधिरमूकमिन्मिनवामनप्रभृतयो जायन्ते; तेऽपि द्विविधाः रसकृताः, दौहृदापचारकृताश्च | दोषबलप्रवृत्ता ये आतङ्कसमुत्पन्ना मिथ्याहाराचारकृताश्च; तेऽपि द्विविधाः आमाशयसमुत्थाः , पक्वाशयसमुत्थाश्च; पुनश्च द्विविधाः- शारीरा, मानसाश्च | त एते आध्यात्मिकाः ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
সঙ্ঘাতবলপ্রবৃত্তা য আগন্তবো দুর্বলস্য বলবদ্বিগ্রহাত্; তেঽপি দ্বিবিধাঃ- শস্ত্রকৃতা, ব্যালকৃতাশ্চ | এতে আধিভৌতিকাঃ ||৬||
सङ्घातबलप्रवृत्ता य आगन्तवो दुर्बलस्य बलवद्विग्रहात्; तेऽपि द्विविधाः- शस्त्रकृता, व्यालकृताश्च | एते आधिभौतिकाः ||६||
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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7
কালবলপ্রবৃত্তা যে শীতোষ্ণবাতবর্ষাতপপ্রভৃতিনিমিত্তাঃ; তেঽপি দ্বিবিধাঃ- ব্যাপন্নর্তুকৃতাঃ, অব্যাপন্নর্তুকৃতাশ্চ | দৈববলপ্রবৃতা যে দেবদ্রোহাদভিশপ্তকা অথর্বণকৃতা উপসর্গজাশ্চ; তেঽপি দ্বিবিধাঃ- বিদ্যুদশনিকৃতাঃ, পিশাচাদিকৃতাশ্চ; পুনশ্চ দ্বিবিধাঃ- সংসর্গজা , আকস্মিকাশ্চ | স্বভাববলপ্রবৃত্তা যে ক্ষুত্পিপাসাজরামৃত্যুনিদ্রাপ্রভৃতযঃ; তেঽপি দ্বিবিধাঃ- কালজা, অকালজাশ্চ; তত্র পরিরক্ষণকৃতাঃ কালজাঃ, অপরিরক্ষণকৃতা অকালজাঃ | এতে আধিদৈবিকাঃ | অত্র সর্বব্যাধ্যবরোধঃ ||৭||
कालबलप्रवृत्ता ये शीतोष्णवातवर्षातपप्रभृतिनिमित्ताः; तेऽपि द्विविधाः- व्यापन्नर्तुकृताः, अव्यापन्नर्तुकृताश्च | दैवबलप्रवृता ये देवद्रोहादभिशप्तका अथर्वणकृता उपसर्गजाश्च; तेऽपि द्विविधाः- विद्युदशनिकृताः, पिशाचादिकृताश्च; पुनश्च द्विविधाः- संसर्गजा , आकस्मिकाश्च | स्वभावबलप्रवृत्ता ये क्षुत्पिपासाजरामृत्युनिद्राप्रभृतयः; तेऽपि द्विविधाः- कालजा, अकालजाश्च; तत्र परिरक्षणकृताः कालजाः, अपरिरक्षणकृता अकालजाः | एते आधिदैविकाः | अत्र सर्वव्याध्यवरोधः ||७||
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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8
সর্বেষাং চ ব্যাধীনাং বাতপিত্তশ্লেষ্মাণ এব মূলং; তল্লিঙ্গত্বাদ্দৃষ্টফলত্বাদাগমাচ্চ | যথা হি কৃত্স্নং বিকারজাতং বিশ্বরূপেণাবস্থিতং সত্ত্বরজস্তমাংসি ন ব্যতিরিচ্যন্তে, এবমেব কৃত্স্নং বিকারজাতং বিশ্বরূপেণাবস্থিতমব্যতিরিচ্য বাতপিত্তশ্লেষ্মাণো বর্তন্তে | দোষধাতুমলসংসর্গাদাযতনবিশেষান্নিমিত্ততশ্চৈষাং বিকল্পঃ | দোষদূষিতেষ্বত্যর্থং ধাতুষু সঞ্জ্ঞা- রসজোঽযং, শোণিতজোঽযং, মাংসজোঽযং, মেদোজোঽযং, অস্থিজোঽযং মজ্জজোঽযং, শুক্রজোঽযং ব্যাধিরিতি ||৮||
सर्वेषां च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एव मूलं; तल्लिङ्गत्वाद्दृष्टफलत्वादागमाच्च | यथा हि कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितं सत्त्वरजस्तमांसि न व्यतिरिच्यन्ते, एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वातपित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते | दोषधातुमलसंसर्गादायतनविशेषान्निमित्ततश्चैषां विकल्पः | दोषदूषितेष्वत्यर्थं धातुषु सञ्ज्ञा- रसजोऽयं, शोणितजोऽयं, मांसजोऽयं, मेदोजोऽयं, अस्थिजोऽयं मज्जजोऽयं, शुक्रजोऽयं व्याधिरिति ||८||
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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9
তত্র, অন্নাশ্রদ্ধারোচকাবিপাকাঙ্গমর্দজ্বরহৃল্লাসতৃপ্তিগৌরবহৃত্পাণ্ডুরোগমার্গোপরোধকার্শ্যবৈরস্যাঙ্গসাদাকালজবলীপলিতদর্শনপ্রভৃতযো রসদোষজা বিকারাঃ; কুষ্ঠবিসর্পপিডকামশকনীলিকাতিলকালকন্যচ্ছব্যঙ্গেন্দ্রলুপ্তপ্লীহবিদ্রধিগুল্মবাতশোণিতার্শোঽর্বুদাঙ্গমর্দাসৃগ্দররক্তপিত্তপ্রভৃতযো রক্তদোষজাঃ , গুদমুখমেঢ্রপাকাশ্চ; অধিমাংসার্বুদার্শোঽধিজিহ্বোপজিহ্বোপকুশগলশুণ্ডিকালজীমাংসসঙ্ঘাতৌষ্ঠপ্রকোপগলগণ্ডগণ্ডমালাপ্রভৃতযো মাংসদোষজাঃ; গ্রন্থিবৃদ্ধিগলগণ্ডার্বুদমেদোজৌষ্ঠপ্রকোপমধুমেহাতিস্থৌল্যাতিস্বেদপ্রভৃতযো মেদোদোষজাঃ; অধ্যস্থ্যধিদন্তাস্থিতোদশূলকুনখপ্রভৃতযোঽস্থিদোষজাঃ; তমোদর্শনমূর্চ্ছাভ্রমপর্বস্থূলমূলারুর্জন্মনেত্রাভিষ্যন্দপ্রভৃতযো মজ্জদোষজাঃ; ক্লৈব্যাপ্রহর্ষশুক্রাশ্মরীশুক্রমেহশুক্রদোষাদযশ্চ তদ্দোষাঃ; ত্বগ্দোষাঃ সঙ্গোঽতিপ্রবৃত্তিরযথাপ্রবৃত্তির্বা মলাযতনদোষাঃ; ইন্দ্রিযাণামপ্রবৃত্তিরযথাপ্রবৃত্তির্বেন্দ্রিযাযতনদোষাঃ; ইত্যেষ সমাস উক্তঃ; বিস্তরং নিমিত্তানি চৈষাং প্রতিরোগং বক্ষ্যামঃ ||৯||
तत्र, अन्नाश्रद्धारोचकाविपाकाङ्गमर्दज्वरहृल्लासतृप्तिगौरवहृत्पाण्डुरोगमार्गोपरोधकार्श्यवैरस्याङ्गसादाकालजवलीपलितदर्शनप्रभृतयो रसदोषजा विकाराः; कुष्ठविसर्पपिडकामशकनीलिकातिलकालकन्यच्छव्यङ्गेन्द्रलुप्तप्लीहविद्रधिगुल्मवातशोणितार्शोऽर्बुदाङ्गमर्दासृग्दररक्तपित्तप्रभृतयो रक्तदोषजाः , गुदमुखमेढ्रपाकाश्च; अधिमांसार्बुदार्शोऽधिजिह्वोपजिह्वोपकुशगलशुण्डिकालजीमांससङ्घातौष्ठप्रकोपगलगण्डगण्डमालाप्रभृतयो मांसदोषजाः; ग्रन्थिवृद्धिगलगण्डार्बुदमेदोजौष्ठप्रकोपमधुमेहातिस्थौल्यातिस्वेदप्रभृतयो मेदोदोषजाः; अध्यस्थ्यधिदन्तास्थितोदशूलकुनखप्रभृतयोऽस्थिदोषजाः; तमोदर्शनमूर्च्छाभ्रमपर्वस्थूलमूलारुर्जन्मनेत्राभिष्यन्दप्रभृतयो मज्जदोषजाः; क्लैब्याप्रहर्षशुक्राश्मरीशुक्रमेहशुक्रदोषादयश्च तद्दोषाः; त्वग्दोषाः सङ्गोऽतिप्रवृत्तिरयथाप्रवृत्तिर्वा मलायतनदोषाः; इन्द्रियाणामप्रवृत्तिरयथाप्रवृत्तिर्वेन्द्रियायतनदोषाः; इत्येष समास उक्तः; विस्तरं निमित्तानि चैषां प्रतिरोगं वक्ष्यामः ||९||
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Adhikarana 9 (10) · Śloka 10
ভবতি চাত্র- কুপিতানাং হি দোষাণাং শরীরে পরিধাবতাম্ | যত্র সঙ্গঃ খবৈগুণ্যাদ্ব্যাধিস্তত্রোপজাযতে ||১০||
भवति चात्र- कुपितानां हि दोषाणां शरीरे परिधावताम् | यत्र सङ्गः खवैगुण्याद्व्याधिस्तत्रोपजायते ||१०||
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Adhikarana 10 (11) · Śloka 11
ভূযোঽত্র জিজ্ঞাস্যং, কিং বাতাদীনাং জ্বরাদীনাং চ নিত্যঃ সংশ্লেষঃ পরিচ্ছেদো বা? ইতি; যদি নিত্যঃ সংশ্লেষঃ স্যাত্তর্হি নিত্যাতুরাঃ সর্ব এব প্রাণিনঃ স্যুঃ; অথাপ্যন্যথা বাতাদীনাং জ্বরাদীনাং চ, ‘অন্যত্র বর্তমানানামন্যত্র লিঙ্গং ন ভবতি’ ইতি কৃত্বা যদুচ্যতে বাতাদযো জ্বরাদীনাং মূলানীতি তন্ন | অত্রোচ্যতে- দোষান্ প্রত্যাখ্যায জ্বরাদযো ন ভবন্তি; অথ চ ন (নিত্যঃ) সম্বন্ধঃ; যথাহি বিদ্যুদ্বাতাশনিবর্ষাণ্যাকাশং প্রত্যাখ্যায ন ভবন্তি, সত্যপ্যাকাশে কদাচিন্ন ভবন্তি, অথ চ নিমিত্ততস্তত এবোত্পত্তিরিতি; তরঙ্গবুদ্বুদাদযশ্চোদকবিশেষাঃ এব; বাতাদীনাং জ্বরাদীনাং চ নাপ্যেবং সংশ্লেষো ন পরিচ্ছেদঃ শাশ্বতিকঃ, অথ চ নিমিত্তত এবোত্পত্তিরিতি ||১১||
भूयोऽत्र जिज्ञास्यं, किं वातादीनां ज्वरादीनां च नित्यः संश्लेषः परिच्छेदो वा? इति; यदि नित्यः संश्लेषः स्यात्तर्हि नित्यातुराः सर्व एव प्राणिनः स्युः; अथाप्यन्यथा वातादीनां ज्वरादीनां च, ‘अन्यत्र वर्तमानानामन्यत्र लिङ्गं न भवति’ इति कृत्वा यदुच्यते वातादयो ज्वरादीनां मूलानीति तन्न | अत्रोच्यते- दोषान् प्रत्याख्याय ज्वरादयो न भवन्ति; अथ च न (नित्यः) सम्बन्धः; यथाहि विद्युद्वाताशनिवर्षाण्याकाशं प्रत्याख्याय न भवन्ति, सत्यप्याकाशे कदाचिन्न भवन्ति, अथ च निमित्ततस्तत एवोत्पत्तिरिति; तरङ्गबुद्बुदादयश्चोदकविशेषाः एव; वातादीनां ज्वरादीनां च नाप्येवं संश्लेषो न परिच्छेदः शाश्वतिकः, अथ च निमित्तत एवोत्पत्तिरिति ||११||
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Adhikarana 11 (12) · Śloka 12
ভবতি চাত্র- বিকারপরিমাণং চ সঙ্খ্যা চৈষাং পৃথক্ পৃথক্ | বিস্তরেণোত্তরে তন্ত্রে সর্বাবাধাশ্চ বক্ষ্যতে ||১২||
भवति चात्र- विकारपरिमाणं च सङ्ख्या चैषां पृथक् पृथक् | विस्तरेणोत्तरे तन्त्रे सर्वाबाधाश्च वक्ष्यते ||१२||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 24
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং সূত্রস্থানে ব্যাধিসমুদ্দেশীযো নাম চতুর্বিংশোঽধ্যাযঃ ||২৪||
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्याधिसमुद्देशीयो नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ||२४||
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