Adhikarana 1 (1-6) · Śloka 6
অথাতঃ কৃমিরোগপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
অজীর্ণাধ্যশনাসাত্ম্যবিরুদ্ধমলিনাশনৈঃ |
অব্যাযামদিবাস্বপ্নগুর্বতিস্নিগ্ধশীতলৈঃ ||৩||
মাষপিষ্টান্নবিদলবিসশালূকসেরুকৈঃ |
পর্ণশাকসুরাশুক্তদধিক্ষীরগুডেক্ষুভিঃ ||৪||
পললানূপপিশিতপিণ্যাকপৃথুকাদিভিঃ |
স্বাদ্বম্লদ্রবপানৈশ্চ শ্লেষ্মা পিত্তং চ কুপ্যতি ||৫||
কৃমীন্ বহুবিধাকারান্ করোতি বিবিধাশ্রযান্ |
আমপক্বাশযে তেষাং কফবিড্জন্মনাং পুনঃ |
ধমন্যাং রক্তজানাং চ প্রসবঃ প্রাযশঃ স্মৃতঃ ||৬||
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अथातः कृमिरोगप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
अजीर्णाध्यशनासात्म्यविरुद्धमलिनाशनैः |
अव्यायामदिवास्वप्नगुर्वतिस्निग्धशीतलैः ||३||
माषपिष्टान्नविदलबिसशालूकसेरुकैः |
पर्णशाकसुराशुक्तदधिक्षीरगुडेक्षुभिः ||४||
पललानूपपिशितपिण्याकपृथुकादिभिः |
स्वाद्वम्लद्रवपानैश्च श्लेष्मा पित्तं च कुप्यति ||५||
कृमीन् बहुविधाकारान् करोति विविधाश्रयान् |
आमपक्वाशये तेषां कफविड्जन्मनां पुनः |
धमन्यां रक्तजानां च प्रसवः प्रायशः स्मृतः ||६||
Adhikarana 2 (7) · Śloka 7
বিংশতেঃ কৃমিজাতীনাং ত্রিবিধঃ সম্ভবঃ স্মৃতঃ |
পুরীষকফরক্তানি, তাসাং বক্ষ্যামি বিস্তরম্ ||৭||
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विंशतेः कृमिजातीनां त्रिविधः सम्भवः स्मृतः |
पुरीषकफरक्तानि, तासां वक्ष्यामि विस्तरम् ||७||
Adhikarana 3 (8) · Śloka 8
অজবা বিজবাঃ কিপ্যাশ্চিপ্যা গণ্ডূপদাস্তথা |
চূরবো দ্বিমুখাশ্চৈব জ্ঞেযাঃ সপ্ত পুরীষজাঃ ||৮||
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अजवा विजवाः किप्याश्चिप्या गण्डूपदास्तथा |
चूरवो द्विमुखाश्चैव ज्ञेयाः सप्त पुरीषजाः ||८||
Adhikarana 4 (9-10) · Śloka 10
শ্বেতাঃ সূক্ষ্মাস্তুদন্ত্যেতে গুদং প্রতিসরন্তি চ |
তেষামেবাপরে পুচ্ছৈঃ পৃথবশ্চ ভবন্তি হি ||৯||
শূলাগ্নিমান্দ্যপাণ্ডুত্ববিষ্টম্ভবলসঙ্ক্ষযাঃ |
প্রসেকারুচিহৃদ্রোগবিড্ভেদাস্তু পুরীষজৈঃ ||১০||
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श्वेताः सूक्ष्मास्तुदन्त्येते गुदं प्रतिसरन्ति च |
तेषामेवापरे पुच्छैः पृथवश्च भवन्ति हि ||९||
शूलाग्निमान्द्यपाण्डुत्वविष्टम्भबलसङ्क्षयाः |
प्रसेकारुचिहृद्रोगविड्भेदास्तु पुरीषजैः ||१०||
Adhikarana 5 (11) · Śloka 11
রক্তা গণ্ডূপদা দীর্ঘা গুদকণ্ডূনিপাতিনঃ |
শূলাটোপশকৃদ্ভেদপক্তিনাশকরাশ্চ তে ||১১||
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रक्ता गण्डूपदा दीर्घा गुदकण्डूनिपातिनः |
शूलाटोपशकृद्भेदपक्तिनाशकराश्च ते ||११||
Adhikarana 6 (12) · Śloka 12
দর্ভপুষ্পা মহাপুষ্পাঃ প্রলূনাশ্চিপিটাস্তথা |
পিপীলিকা দারুণাশ্চ কফকোপসমুদ্ভবাঃ ||১২||
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दर्भपुष्पा महापुष्पाः प्रलूनाश्चिपिटास्तथा |
पिपीलिका दारुणाश्च कफकोपसमुद्भवाः ||१२||
Adhikarana 7 (13) · Śloka 13
রোমশা রোমমূর্ধানঃ সপুচ্ছাঃ শ্যাবমণ্ডলাঃ |
রূঢধান্যাঙ্কুরাকারাঃ শুক্লাস্তে তনবস্তথা ||১৩||
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रोमशा रोममूर्धानः सपुच्छाः श्यावमण्डलाः |
रूढधान्याङ्कुराकाराः शुक्लास्ते तनवस्तथा ||१३||
Adhikarana 8 (14) · Śloka 14
মজ্জাদা নেত্রলেঢারস্তালুশ্রোত্রভুজস্তথা |১৪|
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मज्जादा नेत्रलेढारस्तालुश्रोत्रभुजस्तथा |१४|
Adhikarana 9 (14) · Śloka 14
শিরোহৃদ্রোগবমথুপ্রতিশ্যাযকরাশ্চ তে ||১৪||
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शिरोहृद्रोगवमथुप्रतिश्यायकराश्च ते ||१४||
Adhikarana 10 (15) · Śloka 15
কেশরোমনখাদাশ্চ দন্তাদাঃ কিক্কিশাস্তথা |
কুষ্ঠজাঃ সপরীসর্পা জ্ঞেযাঃ শোণিতসম্ভবাঃ ||১৫||
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केशरोमनखादाश्च दन्तादाः किक्किशास्तथा |
कुष्ठजाः सपरीसर्पा ज्ञेयाः शोणितसम्भवाः ||१५||
Adhikarana 11 (16) · Śloka 16
তে সরক্তাশ্চ কৃষ্ণাশ্চ স্নিগ্ধাশ্চ পৃথবস্তথা |১৬|
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ते सरक्ताश्च कृष्णाश्च स्निग्धाश्च पृथवस्तथा |१६|
Adhikarana 12 (16) · Śloka 16
রক্তাধিষ্ঠানজান্ প্রাযো বিকারান্ জনযন্তি তে ||১৬||
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रक्ताधिष्ठानजान् प्रायो विकारान् जनयन्ति ते ||१६||
Adhikarana 13 (17-18) · Śloka 19
মাষপিষ্টান্নবিদলপর্ণশাকৈঃ পুরীষজাঃ |
মাংসমাষগুডক্ষীরদধিতৈলৈঃ কফোদ্ভবাঃ ||১৭||
বিরুদ্ধাজীর্ণশাকাদ্যৈঃ শোণিতোত্থা ভবন্তি হি |
জ্বরো বিবর্ণতা শূলং হৃদ্রোগঃ সদনং ভ্রমঃ ||১৮||
ভক্তদ্বেষোঽতিসারশ্চ সঞ্জাতকৃমিলক্ষণম্ |১৯|
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माषपिष्टान्नविदलपर्णशाकैः पुरीषजाः |
मांसमाषगुडक्षीरदधितैलैः कफोद्भवाः ||१७||
विरुद्धाजीर्णशाकाद्यैः शोणितोत्था भवन्ति हि |
ज्वरो विवर्णता शूलं हृद्रोगः सदनं भ्रमः ||१८||
भक्तद्वेषोऽतिसारश्च सञ्जातकृमिलक्षणम् |१९|
Adhikarana 14 (19) · Śloka 20
দৃশ্যাস্ত্রযোদশাদ্যাস্তু কৃমীণাং পরিকীর্তিতাঃ ||১৯||
কেশাদাদ্যাস্ত্বদৃশ্যাস্তে দ্বাবাদ্যৌ পরিবর্জযেত্ |২০|
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दृश्यास्त्रयोदशाद्यास्तु कृमीणां परिकीर्तिताः ||१९||
केशादाद्यास्त्वदृश्यास्ते द्वावाद्यौ परिवर्जयेत् |२०|
Adhikarana 15 (20) · Śloka 21
এষামন্যতমং জ্ঞাত্বা জিঘাংসুঃ স্নিগ্ধমাতুরম্ ||২০||
সুরসাদিবিপক্বেন সর্পিষা বান্তমাদিতঃ |
বিরেচযেত্তীক্ষ্ণতরৈর্যোগৈ ... |২১|
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एषामन्यतमं ज्ञात्वा जिघांसुः स्निग्धमातुरम् ||२०||
सुरसादिविपक्वेन सर्पिषा वान्तमादितः |
विरेचयेत्तीक्ष्णतरैर्योगै ... |२१|
Adhikarana 16 (21-22) · Śloka 22
... রাস্থাপযেচ্চ তম্ ||২১||
যবকোলকুলত্থানাং সুরসাদের্গণস্য চ |
বিডঙ্গস্নেহযুক্তেন ক্বাথেন লবণেন চ ||২২||
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... रास्थापयेच्च तम् ||२१||
यवकोलकुलत्थानां सुरसादेर्गणस्य च |
विडङ्गस्नेहयुक्तेन क्वाथेन लवणेन च ||२२||
Adhikarana 17 (23) · Śloka 24
প্রত্যাগতে নিরূহে তু নরং স্নাতং সুখাম্বুনা |
যুঞ্জ্যাত্ কৃমিঘ্নৈরশনৈস্ততঃ শীঘ্রং ভিষগ্বরঃ ||২৩||
স্নেহেনোক্তেন চৈনং তু যোজযেত্ স্নেহবস্তিনা |২৪|
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प्रत्यागते निरूहे तु नरं स्नातं सुखाम्बुना |
युञ्ज्यात् कृमिघ्नैरशनैस्ततः शीघ्रं भिषग्वरः ||२३||
स्नेहेनोक्तेन चैनं तु योजयेत् स्नेहबस्तिना |२४|
Adhikarana 18 (24) · Śloka 24
ততঃ শিরীষকিণিহীরসং ক্ষৌদ্রযুতং পিবেত্ ||২৪||
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ततः शिरीषकिणिहीरसं क्षौद्रयुतं पिबेत् ||२४||
Adhikarana 19 (25) · Śloka 25
কেবূকস্বরসং বাঽপি পূর্ববত্তীক্ষ্ণভোজনঃ |২৫|
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केवूकस्वरसं वाऽपि पूर्ववत्तीक्ष्णभोजनः |२५|
Adhikarana 20 (25) · Śloka 25
পলাশবীজস্বরসং কল্কং বা তণ্ডুলাম্বুনা ||২৫||
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पलाशबीजस्वरसं कल्कं वा तण्डुलाम्बुना ||२५||
Adhikarana 21 (26) · Śloka 26
পারিভদ্রকপত্রাণাং ক্ষৌদ্রেণ স্বরসং পিবেত্ |
পত্তূরস্বরসং বাঽপি পিবেদ্বা সুরসাদিজম্ ||২৬||
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पारिभद्रकपत्राणां क्षौद्रेण स्वरसं पिबेत् |
पत्तूरस्वरसं वाऽपि पिबेद्वा सुरसादिजम् ||२६||
Adhikarana 22 (27) · Śloka 27
লিহ্যাদশ্বশকৃচ্চূর্ণং বৈডঙ্গং বা সমাক্ষিকম্ |২৭|
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लिह्यादश्वशकृच्चूर्णं वैडङ्गं वा समाक्षिकम् |२७|
Adhikarana 23 (27) · Śloka 28
পত্রৈর্মূষিকপর্ণ্যা বা সুপিষ্টৈঃ পিষ্টমিশ্রিতৈঃ ||২৭||
খাদেত্ পূপলিকাঃ পক্বা ধান্যাম্লং চ পিবেদনু |২৮|
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पत्रैर्मूषिकपर्ण्या वा सुपिष्टैः पिष्टमिश्रितैः ||२७||
खादेत् पूपलिकाः पक्वा धान्याम्लं च पिबेदनु |२८|
Adhikarana 24 (28) · Śloka 29
সুরসাদিগণে পক্বং তৈলং বা পানমিষ্যতে ||২৮||
বিডঙ্গচূর্ণযুক্তৈর্বা পিষ্টৈর্ভক্ষ্যাংস্তু কারযেত্ |২৯|
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सुरसादिगणे पक्वं तैलं वा पानमिष्यते ||२८||
विडङ्गचूर्णयुक्तैर्वा पिष्टैर्भक्ष्यांस्तु कारयेत् |२९|
Adhikarana 25 (29) · Śloka 29
তত্কষাযপ্রপীতানাং তিলানাং স্নেহমেব বা ||২৯||
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तत्कषायप्रपीतानां तिलानां स्नेहमेव वा ||२९||
Adhikarana 26 (31) · Śloka 31
শ্বাবিধঃ শকৃতশ্চূর্ণং সপ্তকৃত্বঃ সুভাবিতম্ |
বিডঙ্গানাং কষাযেণ ত্রৈফলেন তথৈব চ ||৩০||
ক্ষৌদ্রেণ লীঢ্বাঽনুপিবেদ্রসমামলকোদ্ভবম্ |
অক্ষাভযারসং বাঽপি... |৩১|
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श्वाविधः शकृतश्चूर्णं सप्तकृत्वः सुभावितम् |
विडङ्गानां कषायेण त्रैफलेन तथैव च ||३०||
क्षौद्रेण लीढ्वाऽनुपिबेद्रसमामलकोद्भवम् |
अक्षाभयारसं वाऽपि... |३१|
Adhikarana 27 (31) · Śloka 31
... বিধিরেষোঽযসামপি ||৩১||
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... विधिरेषोऽयसामपि ||३१||
Adhikarana 28 (32) · Śloka 33
পূতীকস্বরসং বাঽপি পিবেদ্বা মধুনা সহ |
পিবেদ্বা পিপ্পলীমূলমজামূত্রেণ সংযুতম্ ||৩২||
সপ্তরাত্রং পিবেদ্ধৃষ্টং ত্রপু বা দধিমস্তুনা |৩৩|
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पूतीकस्वरसं वाऽपि पिबेद्वा मधुना सह |
पिबेद्वा पिप्पलीमूलमजामूत्रेण संयुतम् ||३२||
सप्तरात्रं पिबेद्धृष्टं त्रपु वा दधिमस्तुना |३३|
Adhikarana 29 (33) · Śloka 33
পুরীষজান্ কফোত্থাংশ্চ হন্যাদেবং কৃমীন্ ভিষক্ ||৩৩||
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पुरीषजान् कफोत्थांश्च हन्यादेवं कृमीन् भिषक् ||३३||
Adhikarana 30 (34) · Śloka 34
শিরোহৃদ্ঘ্রাণকর্ণাক্ষিসংশ্রিতাংশ্চ পৃথগ্বিধান্ |
বিশেষেণাঞ্জনৈর্নস্যৈরবপীডৈশ্চ সাধযেত্ ||৩৪||
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शिरोहृद्घ्राणकर्णाक्षिसंश्रितांश्च पृथग्विधान् |
विशेषेणाञ्जनैर्नस्यैरवपीडैश्च साधयेत् ||३४||
Adhikarana 31 (35) · Śloka 35
শকৃদ্রসং তুরঙ্গস্য সুশুষ্কং ভাবযেদতি |
নিষ্ক্বাথেন বিডঙ্গানাং চূর্ণং প্রধমনং তু তত্ ||৩৫||
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शकृद्रसं तुरङ्गस्य सुशुष्कं भावयेदति |
निष्क्वाथेन विडङ्गानां चूर्णं प्रधमनं तु तत् ||३५||
Adhikarana 32 (36) · Śloka 36
অযশ্চূর্ণান্যনেনৈব বিধিনা যোজযেদ্ভিষক্ |
সকাংস্যনীলং তৈলং চ নস্যং স্যাত্সুরসাদিকে ||৩৬||
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अयश्चूर्णान्यनेनैव विधिना योजयेद्भिषक् |
सकांस्यनीलं तैलं च नस्यं स्यात्सुरसादिके ||३६||
Adhikarana 33 (37) · Śloka 37
ইন্দ্রলুপ্তবিধিশ্চাপি বিধেযো রোমভোজিষু |৩৭|
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इन्द्रलुप्तविधिश्चापि विधेयो रोमभोजिषु |३७|
Adhikarana 34 (37) · Śloka 37
দন্তাদানাং সমুদ্দিষ্টং বিধানং মুখরোগিকম্ ||৩৭||
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दन्तादानां समुद्दिष्टं विधानं मुखरोगिकम् ||३७||
Adhikarana 35 (38) · Śloka 38
রক্তজানাং প্রতীকারং কুর্যাত্ কুষ্ঠচিকিত্সিতে |৩৮|
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रक्तजानां प्रतीकारं कुर्यात् कुष्ठचिकित्सिते |३८|
Adhikarana 36 (38) · Śloka 38
সুরসাদিং তু সর্বেষু সর্বথৈবোপযোজযেত্ ||৩৮||
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सुरसादिं तु सर्वेषु सर्वथैवोपयोजयेत् ||३८||
Adhikarana 37 (39) · Śloka 39
প্রব্যক্ততিক্তকটুকং ভোজনং চ হিতং ভবেত্ |৩৯|
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प्रव्यक्ततिक्तकटुकं भोजनं च हितं भवेत् |३९|
Adhikarana 38 (39) · Śloka 39
কুলত্থক্ষারসংসৃষ্টং ক্ষারপানং চ পূজিতম্ ||৩৯||
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कुलत्थक्षारसंसृष्टं क्षारपानं च पूजितम् ||३९||
Adhikarana 39 (40) · Śloka 40
ক্ষীরাণি মাংসানি ঘৃতানি চৈব দধীনি শাকানি চ পর্ণবন্তি |
সমাসতোঽম্লান্মধুরান্ হিমাংশ্চ কৃমীন্ জিঘাংসুঃ পরিবর্জযেত্তু ||৪০||
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क्षीराणि मांसानि घृतानि चैव दधीनि शाकानि च पर्णवन्ति |
समासतोऽम्लान्मधुरान् हिमांश्च कृमीन् जिघांसुः परिवर्जयेत्तु ||४०||
Adhikarana puShpikA · Śloka 54
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে কৃমিপ্রতিষেধো নাম (ষোডশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) চতুঃপঞ্চাশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৫৪||
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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे कृमिप्रतिषेधो नाम (षोडशोऽध्यायः, आदितः) चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ||५४||