Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্বরভেদপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः स्वरभेदप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্বরভেদপ্রতিষেধমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः स्वरभेदप्रतिषेधमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
অত্যুচ্চভাষণবিষাধ্যযনাতিগীতশীতাদিভিঃ প্রকুপিতাঃ পবনাদযস্তু | স্রোতঃসু তে স্বরবহেষু গতাঃ প্রতিষ্ঠাং হন্যুঃ স্বরং ভবতি চাপি হি ষড্বিধঃ সঃ ||৩||
अत्युच्चभाषणविषाध्ययनातिगीतशीतादिभिः प्रकुपिताः पवनादयस्तु | स्रोतःसु ते स्वरवहेषु गताः प्रतिष्ठां हन्युः स्वरं भवति चापि हि षड्विधः सः ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
বাতেন কৃষ্ণনযনাননমূত্রবর্চা ভিন্নং শনৈর্বদতি গদ্গদবত্ স্বরং চ |৪|
वातेन कृष्णनयनाननमूत्रवर्चा भिन्नं शनैर्वदति गद्गदवत् स्वरं च |४|
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Adhikarana 4 (4) · Śloka 4
পিত্তেন পীতবদনাক্ষিপুরীষমূত্রো ব্রূযাদ্গলেন পরিদাহসমন্বিতেন ||৪||
पित्तेन पीतवदनाक्षिपुरीषमूत्रो ब्रूयाद्गलेन परिदाहसमन्वितेन ||४||
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Adhikarana 5 (5) · Śloka 5
কৃচ্ছ্রাত্ কফেন সততং কফরুদ্ধকণ্ঠো মন্দং শনৈর্বদতি চাপি দিবা বিশেষঃ |৫|
कृच्छ्रात् कफेन सततं कफरुद्धकण्ठो मन्दं शनैर्वदति चापि दिवा विशेषः |५|
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Adhikarana 6 (5) · Śloka 5
সর্বাত্মকে ভবতি সর্ববিকারসম্পদব্যক্ততা চ বচসস্তমসাধ্যমাহুঃ ||৫||
सर्वात्मके भवति सर्वविकारसम्पदव्यक्तता च वचसस्तमसाध्यमाहुः ||५||
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Adhikarana 7 (6) · Śloka 6
ধূপ্যেত বাক্ ক্ষযকৃতে ক্ষযমাপ্নুযাচ্চ বাগেষ চা(বা)পি হতবাক্ পরিবর্জনীযঃ |৬|
धूप्येत वाक् क्षयकृते क्षयमाप्नुयाच्च वागेष चा(वा)पि हतवाक् परिवर्जनीयः |६|
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Adhikarana 8 (6-7) · Śloka 7
অন্তর্গলং স্বরমলক্ষ্যপদং চিরেণ মেদশ্চযাদ্বদতি দিগ্ধগলৌষ্ঠতালুঃ ||৬|| ক্ষীণস্য বৃদ্ধস্য কৃশস্য চাপি চিরোত্থিতো যশ্চ সহোপজাতঃ | মেদস্বিনঃ সর্বসমুদ্ভবশ্চ স্বরামযো যো ন স সিদ্ধিমেতি ||৭||
अन्तर्गलं स्वरमलक्ष्यपदं चिरेण मेदश्चयाद्वदति दिग्धगलौष्ठतालुः ||६|| क्षीणस्य वृद्धस्य कृशस्य चापि चिरोत्थितो यश्च सहोपजातः | मेदस्विनः सर्वसमुद्भवश्च स्वरामयो यो न स सिद्धिमेति ||७||
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Adhikarana 9 (8) · Śloka 8
স্নিগ্ধান্ স্বরাতুরনরানপকৃষ্টদোষান্ ন্যাযেন তান্ বমনরেচনবস্তিভিশ্চ | নস্যাবপীডমুখধাবনধূমলেহৈঃ সম্পাদযেচ্চ বিবিধৈঃ কবলগ্রহৈশ্চ ||৮||
स्निग्धान् स्वरातुरनरानपकृष्टदोषान् न्यायेन तान् वमनरेचनबस्तिभिश्च | नस्यावपीडमुखधावनधूमलेहैः सम्पादयेच्च विविधैः कवलग्रहैश्च ||८||
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Adhikarana 10 (9) · Śloka 9
যঃ শ্বাসকাসবিধিরাদিত এব চোক্তস্তং চাপ্যশেষমবতারযিতুং যতেত |৯|
यः श्वासकासविधिरादित एव चोक्तस्तं चाप्यशेषमवतारयितुं यतेत |९|
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Adhikarana 11 (9) · Śloka 9
বৈশেষিকং চ বিধিমূর্ধ্বমতো বদামি তং বৈ স্বরাতুরহিতং নিখিলং নিবোধ ||৯||
वैशेषिकं च विधिमूर्ध्वमतो वदामि तं वै स्वरातुरहितं निखिलं निबोध ||९||
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Adhikarana 12 (10) · Śloka 11
স্বরোপঘাতেঽনিলজে ভুক্তোপরি ঘৃতং পিবেত্ | কাসমর্দকবার্তাকমার্কবস্বরসে শৃতম্ ||১০|| পীতং ঘৃতং হন্ত্যনিলং সিদ্ধমার্তগলে রসে |১১|
स्वरोपघातेऽनिलजे भुक्तोपरि घृतं पिबेत् | कासमर्दकवार्ताकमार्कवस्वरसे शृतम् ||१०|| पीतं घृतं हन्त्यनिलं सिद्धमार्तगले रसे |११|
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Adhikarana 13 (11) · Śloka 12
যবক্ষারাজমোদাভ্যাং চিত্রকামলকেষু বা ||১১|| দেবদার্বগ্নিকাভ্যাং বা সিদ্ধমাজং সমাক্ষিকম্ |১২|
यवक्षाराजमोदाभ्यां चित्रकामलकेषु वा ||११|| देवदार्वग्निकाभ्यां वा सिद्धमाजं समाक्षिकम् |१२|
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Adhikarana 14 (12) · Śloka 12
সুখোদকানুপানো বা সসর্পিষ্কো গুডৌদনঃ ||১২||
सुखोदकानुपानो वा ससर्पिष्को गुडौदनः ||१२||
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Adhikarana 15 (13) · Śloka 13
ক্ষীরানুপানং পিত্তে তু পিবেত্ সর্পিরতন্দ্রিতঃ |১৩|
क्षीरानुपानं पित्ते तु पिबेत् सर्पिरतन्द्रितः |१३|
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Adhikarana 16 (13) · Śloka 13
অশ্নীযাচ্চ সসর্পিষ্কং যষ্টীমধুকপাযসম্ ||১৩||
अश्नीयाच्च ससर्पिष्कं यष्टीमधुकपायसम् ||१३||
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Adhikarana 17 (14) · Śloka 14
লিহ্যান্মধুরকাণাং বা চূর্ণং মধুঘৃতাপ্লুতম্ | শতাবরীচূর্ণযোগং বলাচূর্ণমথাপি বা ||১৪||
लिह्यान्मधुरकाणां वा चूर्णं मधुघृताप्लुतम् | शतावरीचूर्णयोगं बलाचूर्णमथापि वा ||१४||
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Adhikarana 18 (15) · Śloka 15
পিবেত্ কটূনি মূত্রেণ কফজে স্বরসঙ্ক্ষযে | লিহ্যাদ্বা মধুতৈলাভ্যাং ভুক্ত্বা খাদেত্ কটূনি বা ||১৫||
पिबेत् कटूनि मूत्रेण कफजे स्वरसङ्क्षये | लिह्याद्वा मधुतैलाभ्यां भुक्त्वा खादेत् कटूनि वा ||१५||
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Adhikarana 19 (16) · Śloka 16
স্বরোপঘাতে মেদোজে কফবদ্বিধিরিষ্যতে |১৬|
स्वरोपघाते मेदोजे कफवद्विधिरिष्यते |१६|
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Adhikarana 20 (16) · Śloka 16
সর্বজে ক্ষযজে চাপি প্রত্যাখ্যাযাচরেত্ ক্রিযাম্ ||১৬||
सर्वजे क्षयजे चापि प्रत्याख्यायाचरेत् क्रियाम् ||१६||
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Adhikarana 21 (17) · Śloka 17
শর্করামধুমিশ্রাণি শৃতানি মধুরৈঃ সহ | পিবেত্ পযাংসি যস্যোচ্চৈর্বদতোঽভিহতঃ স্বরঃ ||১৭||
शर्करामधुमिश्राणि शृतानि मधुरैः सह | पिबेत् पयांसि यस्योच्चैर्वदतोऽभिहतः स्वरः ||१७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 53
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে কাযচিকিত্সাতন্ত্রে ছর্দিপ্রতিষেধো নাম (পঞ্চদশোঽধ্যাযঃ, আদিতঃ) ত্রিপঞ্চাশত্তমোঽধ্যাযঃ ||৫৩||
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते कायचिकित्सातन्त्रे छर्दिप्रतिषेधो नाम (पञ्चदशोऽध्यायः, आदितः) त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ||५३||
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