Adhikarana 1 (1-4) · Śloka 4
অথাতঃ শিরোরোগবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
শিরো রুজতি মর্ত্যানাং বাতপিত্তকফৈস্ত্রিভিঃ |
সন্নিপাতেন রক্তেন ক্ষযেণ ক্রিমিভিস্তথা ||৩||
সূর্যাবর্তানন্তবাতার্ধাবভেদকশঙ্খকৈঃ |
একাদশপ্রকারস্য লক্ষণং সম্প্রবক্ষ্যতে ||৪||
View original
अथातः शिरोरोगविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
शिरो रुजति मर्त्यानां वातपित्तकफैस्त्रिभिः |
सन्निपातेन रक्तेन क्षयेण क्रिमिभिस्तथा ||३||
सूर्यावर्तानन्तवातार्धावभेदकशङ्खकैः |
एकादशप्रकारस्य लक्षणं सम्प्रवक्ष्यते ||४||
Adhikarana 2 (5) · Śloka 5
যস্যানিমিত্তং শিরসো রুজশ্চ ভবন্তি তীব্রা নিশি চাতিমাত্রম্ |
বন্ধোপতাপৈশ্চ ভবেদ্বিশেষঃ শিরোভিতাপঃ স সমীরণেন ||৫||
View original
यस्यानिमित्तं शिरसो रुजश्च भवन्ति तीव्रा निशि चातिमात्रम् |
बन्धोपतापैश्च भवेद्विशेषः शिरोभितापः स समीरणेन ||५||
Adhikarana 3 (6) · Śloka 6
যস্যোষ্ণমঙ্গারচিতং যথৈব দহ্যেত ধূপ্যেত শিরোক্ষিনাসম্ |
শীতেন রাত্রৌ চ ভবেদ্বিশেষঃ শিরোভিতাপঃ স তু পিত্তকোপাত্ ||৬||
View original
यस्योष्णमङ्गारचितं यथैव दह्येत धूप्येत शिरोक्षिनासम् |
शीतेन रात्रौ च भवेद्विशेषः शिरोभितापः स तु पित्तकोपात् ||६||
Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
শিরোগলং যস্য কফোপদিগ্ধং গুরু প্রতিষ্টব্ধমথো হিমং চ |
শূনাক্ষিকূটং বদনং চ যস্য শিরোভিতাপঃ স কফপ্রকোপাত্ ||৭||
View original
शिरोगलं यस्य कफोपदिग्धं गुरु प्रतिष्टब्धमथो हिमं च |
शूनाक्षिकूटं वदनं च यस्य शिरोभितापः स कफप्रकोपात् ||७||
Adhikarana 5 (8) · Śloka 8
শিরোভিতাপে ত্রিতযপ্রবৃত্তে সর্বাণি লিঙ্গানি সমুদ্ভবন্তি |৮|
View original
शिरोभितापे त्रितयप्रवृत्ते सर्वाणि लिङ्गानि समुद्भवन्ति |८|
Adhikarana 6 (8) · Śloka 8
রক্তাত্মকঃ পিত্তসমানলিঙ্গঃ স্পর্শাসহত্বং শিরসো ভবেচ্চ ||৮||
View original
रक्तात्मकः पित्तसमानलिङ्गः स्पर्शासहत्वं शिरसो भवेच्च ||८||
Adhikarana 7 (9) · Śloka 10
বসাবলাসক্ষতসম্ভবানাং শিরোগতানামিহ সঙ্ক্ষযেণ |
ক্ষযপ্রবৃত্তঃ শিরসোঽভিতাপঃ কষ্টো ভবেদুগ্ররুজোঽতিমাত্রম্ ||৯||
সংস্বেদনচ্ছর্দনধূমনস্যৈরসৃগ্বিমোক্ষৈশ্চ বিবৃদ্ধিমেতি |১০|
View original
वसाबलासक्षतसम्भवानां शिरोगतानामिह सङ्क्षयेण |
क्षयप्रवृत्तः शिरसोऽभितापः कष्टो भवेदुग्ररुजोऽतिमात्रम् ||९||
संस्वेदनच्छर्दनधूमनस्यैरसृग्विमोक्षैश्च विवृद्धिमेति |१०|
Adhikarana 8 (10) · Śloka 11
নিস্তুদ্যতে যস্য শিরোঽতিমাত্রং সম্ভক্ষ্যমাণং স্ফুটতীব চান্তঃ ||১০||
ঘ্রাণাচ্চ গচ্ছেত্সলিলং সরক্তং শিরোভিতাপঃ কৃমিভিঃ স ঘোরঃ |১১|
View original
निस्तुद्यते यस्य शिरोऽतिमात्रं सम्भक्ष्यमाणं स्फुटतीव चान्तः ||१०||
घ्राणाच्च गच्छेत्सलिलं सरक्तं शिरोभितापः कृमिभिः स घोरः |११|
Adhikarana 9 (11-12) · Śloka 13
সূর্যোদযং যা প্রতি মন্দমন্দমক্ষিভ্রুবং রুক্ সমুপৈতি গাঢম্ ||১১||
বিবর্ধতে চাংশুমতা সহৈব সূর্যাপবৃত্তৌ বিনিবর্ততে চ |
শীতেন শান্তিং লভতে কদাচিদুষ্ণেন জন্তুঃ সুখমাপ্নুযাচ্চ ||১২||
তং ভাস্করাবর্তমুদাহরন্তি সর্বাত্মকং কষ্টতমং বিকারম্ |১৩|
View original
सूर्योदयं या प्रति मन्दमन्दमक्षिभ्रुवं रुक् समुपैति गाढम् ||११||
विवर्धते चांशुमता सहैव सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च |
शीतेन शान्तिं लभते कदाचिदुष्णेन जन्तुः सुखमाप्नुयाच्च ||१२||
तं भास्करावर्तमुदाहरन्ति सर्वात्मकं कष्टतमं विकारम् |१३|
Adhikarana 10 (13-14) · Śloka 15
দোষাস্তু দুষ্টাস্ত্রয এব মন্যাং সম্পীড্য ঘাটাসু রুজাং সুতীব্রাম্ ||১৩||
কুর্বন্তি সাক্ষিভ্রুবি শঙ্খদেশে স্থিতিং করোত্যাশু বিশেষতস্তু |
গণ্ডস্য পার্শ্বে তু করোতি কম্পং হনুগ্রহং লোচনজাংশ্চ রোগান্ ||১৪||
অনন্তবাতং তমুদাহরন্তি দোষত্রযোত্থং শিরসো বিকারম্ |১৫|
View original
दोषास्तु दुष्टास्त्रय एव मन्यां सम्पीड्य घाटासु रुजां सुतीव्राम् ||१३||
कुर्वन्ति साक्षिभ्रुवि शङ्खदेशे स्थितिं करोत्याशु विशेषतस्तु |
गण्डस्य पार्श्वे तु करोति कम्पं हनुग्रहं लोचनजांश्च रोगान् ||१४||
अनन्तवातं तमुदाहरन्ति दोषत्रयोत्थं शिरसो विकारम् |१५|
Adhikarana 11 (15) · Śloka 16
যস্যোত্তমাঙ্গার্ধমতীব জন্তোঃ সম্ভেদতোদভ্রমশূলজুষ্টম্ ||১৫||
পক্ষাদ্দশাহাদথবাঽপ্যকস্মাত্তস্যার্ধভেদং ত্রিতযাদ্ব্যবস্যেত্ |১৬|
View original
यस्योत्तमाङ्गार्धमतीव जन्तोः सम्भेदतोदभ्रमशूलजुष्टम् ||१५||
पक्षाद्दशाहादथवाऽप्यकस्मात्तस्यार्धभेदं त्रितयाद्व्यवस्येत् |१६|
Adhikarana 12 (16-18) · Śloka 18
শঙ্খাশ্রিতো বাযুরুদীর্ণবেগঃ কৃতানুযাত্রঃ কফপিত্তরক্তৈঃ ||১৬||
রুজঃ সুতীব্রাঃ প্রতনোতি মূর্ধ্নি বিশেষতশ্চাপি হি শঙ্খযোস্তু |
সুকষ্টমেনং খলু শঙ্খকাখ্যং মহর্ষযো বেদবিদঃ পুরাণাঃ ||১৭||
ব্যাধিং বদন্ত্যুদ্গতমৃত্যুকল্পং ভিষক্সহস্রৈরপি দুর্নিবারম্ ||১৮||
View original
शङ्खाश्रितो वायुरुदीर्णवेगः कृतानुयात्रः कफपित्तरक्तैः ||१६||
रुजः सुतीव्राः प्रतनोति मूर्ध्नि विशेषतश्चापि हि शङ्खयोस्तु |
सुकष्टमेनं खलु शङ्खकाख्यं महर्षयो वेदविदः पुराणाः ||१७||
व्याधिं वदन्त्युद्गतमृत्युकल्पं भिषक्सहस्रैरपि दुर्निवारम् ||१८||
Adhikarana puShpikA · Śloka 25
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে শিরোরোগবিজ্ঞানীযো নাম পঞ্চবিংশোঽধ্যাযঃ ||২৫||
View original
इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे शिरोरोगविज्ञानीयो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ||२५||