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24. pratiśyāyapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ প্রতিশ্যাযপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः प्रतिश्यायप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

নারীপ্রসঙ্গঃ শিরসোঽভিতাপো ধূমো রজঃ শীতমতিপ্রতাপঃ | সন্ধারণং মূত্রপুরীষযোশ্চ সদ্যঃ প্রতিশ্যাযনিদানমুক্তম্ ||৩||

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नारीप्रसङ्गः शिरसोऽभितापो धूमो रजः शीतमतिप्रतापः | सन्धारणं मूत्रपुरीषयोश्च सद्यः प्रतिश्यायनिदानमुक्तम् ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

চযং গতা মূর্ধনি মারুতাদযঃ পৃথক্ সমস্তাশ্চ তথৈব শোণিতম্ | প্রকোপ্যমাণা বিবিধৈঃ প্রকোপণৈর্নৃণাং প্রতিশ্যাযকরা ভবন্তি হি ||৪||

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चयं गता मूर्धनि मारुतादयः पृथक् समस्ताश्च तथैव शोणितम् | प्रकोप्यमाणा विविधैः प्रकोपणैर्नृणां प्रतिश्यायकरा भवन्ति हि ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

শিরোগুরুত্বং ক্ষবথোঃ প্রবর্তনং তথাঽঙ্গমর্দঃ পরিহৃষ্টরোমতা | উপদ্রবাশ্চাপ্যপরে পৃথগ্বিধা নৃণাং প্রতিশ্যাযপুরঃসরাঃ স্মৃতাঃ ||৫||

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शिरोगुरुत्वं क्षवथोः प्रवर्तनं तथाऽङ्गमर्दः परिहृष्टरोमता | उपद्रवाश्चाप्यपरे पृथग्विधा नृणां प्रतिश्यायपुरःसराः स्मृताः ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 7

আনদ্ধা পিহিতা নাসা তনুস্রাবপ্রবর্তিনী | গলতাল্বোষ্ঠশোষশ্চ নিস্তোদঃ শঙ্খযোস্তথা ||৬|| স্বরোপঘাতশ্চ ভবেত্ প্রতিশ্যাযেঽনিলাত্মকে |৭|

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आनद्धा पिहिता नासा तनुस्रावप्रवर्तिनी | गलताल्वोष्ठशोषश्च निस्तोदः शङ्खयोस्तथा ||६|| स्वरोपघातश्च भवेत् प्रतिश्यायेऽनिलात्मके |७|

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Adhikarana 6 (7-8) · Śloka 8

উষ্ণঃ সপীতকঃ স্রাবো ঘ্রাণাত্ স্রবতি পৈত্তিকে ||৭|| কৃশোঽতিপাণ্ডুঃ সন্তপ্তো ভবত্তৃষ্ণানি(ভি)পীডিতঃ | সধূমং সহসা বহ্নিং বমতীব চ মানবঃ ||৮||

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उष्णः सपीतकः स्रावो घ्राणात् स्रवति पैत्तिके ||७|| कृशोऽतिपाण्डुः सन्तप्तो भवत्तृष्णानि(भि)पीडितः | सधूमं सहसा वह्निं वमतीव च मानवः ||८||

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Adhikarana 7 (9) · Śloka 10

কফঃ কফকৃতে ঘ্রাণাচ্ছুক্লঃ শীতঃ স্রবেন্মুহুঃ | শুক্লাবভাসঃ শূনাক্ষো ভবেদ্গুরুশিরোমুখঃ ||৯|| শিরোগলৌষ্ঠতালূনাং কণ্ডূযনমতীব চ |১০|

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कफः कफकृते घ्राणाच्छुक्लः शीतः स्रवेन्मुहुः | शुक्लावभासः शूनाक्षो भवेद्गुरुशिरोमुखः ||९|| शिरोगलौष्ठतालूनां कण्डूयनमतीव च |१०|

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Adhikarana 8 (10-11) · Śloka 11

ভূত্বা ভূত্বা প্রতিশ্যাযো যোঽকস্মাদ্বিনিবর্ততে ||১০|| সম্পক্বো বাঽপ্যপক্বো বা স সর্বপ্রভবঃ স্মৃতঃ | লিঙ্গানি চৈব সর্বেষাং পীনসানাং চ সর্বজে ||১১||

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भूत्वा भूत्वा प्रतिश्यायो योऽकस्माद्विनिवर्तते ||१०|| सम्पक्वो वाऽप्यपक्वो वा स सर्वप्रभवः स्मृतः | लिङ्गानि चैव सर्वेषां पीनसानां च सर्वजे ||११||

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Adhikarana 9 (12-13) · Śloka 14

রক্তজে তু প্রতিশ্যাযে রক্তাস্রাবঃ প্রবর্ততে | তাম্রাক্ষশ্চ ভবেজ্জন্তুরুরোঘাতপ্রপীডিতঃ ||১২|| দুর্গন্ধোচ্ছ্বাসবদনস্তথা গন্ধান্ন বেত্তি চ | মূর্চ্ছন্তি চাত্র কৃমযঃ শ্বেতাঃ স্নিগ্ধাস্তথাঽণবঃ ||১৩|| কৃমিমূর্ধবিকারেণ সমানং চাস্য লক্ষণম্ |১৪|

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रक्तजे तु प्रतिश्याये रक्तास्रावः प्रवर्तते | ताम्राक्षश्च भवेज्जन्तुरुरोघातप्रपीडितः ||१२|| दुर्गन्धोच्छ्वासवदनस्तथा गन्धान्न वेत्ति च | मूर्च्छन्ति चात्र कृमयः श्वेताः स्निग्धास्तथाऽणवः ||१३|| कृमिमूर्धविकारेण समानं चास्य लक्षणम् |१४|

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Adhikarana 10 (14-15) · Śloka 16

প্রক্লিদ্যতি পুনর্নাসা পুনশ্চ পরিশুষ্যতি ||১৪|| মুহুরানহ্যতে চাপি মুহুর্বিব্রিযতে তথা | নিঃশ্বাসোচ্ছ্বাসদৌর্গন্ধ্যং তথা গন্ধান্ন বেত্তি চ ||১৫|| এবং দুষ্টপ্রতিশ্যাযং জানীযাত্ কৃচ্ছ্রসাধনম্ |১৬|

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प्रक्लिद्यति पुनर्नासा पुनश्च परिशुष्यति ||१४|| मुहुरानह्यते चापि मुहुर्विव्रियते तथा | निःश्वासोच्छ्वासदौर्गन्ध्यं तथा गन्धान्न वेत्ति च ||१५|| एवं दुष्टप्रतिश्यायं जानीयात् कृच्छ्रसाधनम् |१६|

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Adhikarana 11 (16-17) · Śloka 17

সর্ব এব প্রতিশ্যাযা নরস্যাপ্রতিকারিণঃ ||১৬|| কালেন রোগজননা জাযন্তে দুষ্টপীনসাঃ | বাধির্যমান্ধ্যমঘ্রাণং ঘোরাংশ্চ নযনামযান্ | কাসাগ্নিসাদশোফাংশ্চ বৃদ্ধাঃ কুর্বন্তি পীনসাঃ ||১৭||

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सर्व एव प्रतिश्याया नरस्याप्रतिकारिणः ||१६|| कालेन रोगजनना जायन्ते दुष्टपीनसाः | बाधिर्यमान्ध्यमघ्राणं घोरांश्च नयनामयान् | कासाग्निसादशोफांश्च वृद्धाः कुर्वन्ति पीनसाः ||१७||

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Adhikarana 12 (18) · Śloka 18

নবং প্রতিশ্যাযমপাস্য সর্বমুপাচরেত্ সর্পিষ এব পানৈঃ | স্বেদৈর্বিচিত্রৈর্বমনৈশ্চ যুক্তৈঃ কালোপপন্নৈরবপীডনৈশ্চ ||১৮||

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नवं प्रतिश्यायमपास्य सर्वमुपाचरेत् सर्पिष एव पानैः | स्वेदैर्विचित्रैर्वमनैश्च युक्तैः कालोपपन्नैरवपीडनैश्च ||१८||

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Adhikarana 13 (19) · Śloka 19

অপচ্যমানস্য হি পাচনার্থং স্বেদো হিতোঽম্লৈরহিমং চ ভোজ্যম্ | নিষেব্যমাণং পযসাঽঽর্দ্রকং বা সম্পাচযেদিক্ষুবিকারযোগৈঃ ||১৯||

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अपच्यमानस्य हि पाचनार्थं स्वेदो हितोऽम्लैरहिमं च भोज्यम् | निषेव्यमाणं पयसाऽऽर्द्रकं वा सम्पाचयेदिक्षुविकारयोगैः ||१९||

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Adhikarana 14 (20) · Śloka 20

পক্বং ঘনং চাপ্যবলম্বমানং শিরোবিরেকৈরপকর্ষযেত্তম্ | বিরেচনাস্থাপনধূমপানৈরবেক্ষ্য দোষান্ কবলগ্রহৈশ্চ ||২০||

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पक्वं घनं चाप्यवलम्बमानं शिरोविरेकैरपकर्षयेत्तम् | विरेचनास्थापनधूमपानैरवेक्ष्य दोषान् कवलग्रहैश्च ||२०||

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Adhikarana 15 (21) · Śloka 21

নিবাতশয্যাসনচেষ্টনানি মূর্ধ্নো গুরূষ্ণং চ তথৈব বাসঃ | তীক্ষ্ণা বিরেকাঃ শিরসঃ সধূমা রূক্ষং যবান্নং বিজযা চ সেব্যা ||২১||

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निवातशय्यासनचेष्टनानि मूर्ध्नो गुरूष्णं च तथैव वासः | तीक्ष्णा विरेकाः शिरसः सधूमा रूक्षं यवान्नं विजया च सेव्या ||२१||

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Adhikarana 16 (22) · Śloka 22

শীতাম্বুযোষিচ্ছিশিরাবগাহচিন্তাতিরূক্ষাশনবেগরোধান্ | শোকং চ মদ্যানি নবানি চৈব বিবর্জযেত্ পীনসরোগজুষ্টঃ ||২২||

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शीताम्बुयोषिच्छिशिरावगाहचिन्तातिरूक्षाशनवेगरोधान् | शोकं च मद्यानि नवानि चैव विवर्जयेत् पीनसरोगजुष्टः ||२२||

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Adhikarana 17 (23) · Śloka 23

ছর্দ্যঙ্গসাদজ্বরগৌরবার্তমরোচকারত্যতিসারযুক্তম্ | বিলঙ্ঘনৈঃ পাচনদীপনীযৈরুপাচরেত্ পীনসিনং যথাবত্ ||২৩||

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छर्द्यङ्गसादज्वरगौरवार्तमरोचकारत्यतिसारयुक्तम् | विलङ्घनैः पाचनदीपनीयैरुपाचरेत् पीनसिनं यथावत् ||२३||

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Adhikarana 18 (24) · Śloka 24

বহুদ্রবৈর্বাতকফোপসৃষ্টং প্রচ্ছর্দযেত্ পীনসিনং বযঃস্থম্ | উপদ্রবাংশ্চাপি যথোপদেশং স্বৈর্ভেষজৈর্ভোজনসংবিধানৈঃ | জযেদ্বিদিত্বা মৃদুতাং গতেষু প্রাগ্লক্ষণেষূক্তমথাদিশেচ্চ ||২৪||

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बहुद्रवैर्वातकफोपसृष्टं प्रच्छर्दयेत् पीनसिनं वयःस्थम् | उपद्रवांश्चापि यथोपदेशं स्वैर्भेषजैर्भोजनसंविधानैः | जयेद्विदित्वा मृदुतां गतेषु प्राग्लक्षणेषूक्तमथादिशेच्च ||२४||

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Adhikarana 19 (25) · Śloka 26

বাতিকে তু প্রতিশ্যাযে পিবেত্ সর্পির্যথাক্রমম্ | পঞ্চভির্লবণৈঃ সিদ্ধং প্রথমেন গণেন চ ||২৫|| নস্যাদিষু বিধিং কৃত্স্নমবেক্ষেতার্দিতেরিতম্ |২৬|

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वातिके तु प्रतिश्याये पिबेत् सर्पिर्यथाक्रमम् | पञ्चभिर्लवणैः सिद्धं प्रथमेन गणेन च ||२५|| नस्यादिषु विधिं कृत्स्नमवेक्षेतार्दितेरितम् |२६|

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Adhikarana 20 (26-28) · Śloka 28

পিত্তরক্তোত্থযোঃ পেযং সর্পির্মধুরকৈঃ শৃতম্ ||২৬|| পরিষেকান্ প্রদেহাংশ্চ কুর্যাদপি চ শীতলান্ | শ্রীসর্জরসপত্তঙ্গপ্রিযঙ্গুমধুশর্করাঃ ||২৭|| দ্রাক্ষামধূলিকাগোজীশ্রীপর্ণীমধুকৈস্তথা | যুজ্যন্তে কবলাশ্চাত্র বিরেকো মধুরৈরপি ||২৮||

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पित्तरक्तोत्थयोः पेयं सर्पिर्मधुरकैः शृतम् ||२६|| परिषेकान् प्रदेहांश्च कुर्यादपि च शीतलान् | श्रीसर्जरसपत्तङ्गप्रियङ्गुमधुशर्कराः ||२७|| द्राक्षामधूलिकागोजीश्रीपर्णीमधुकैस्तथा | युज्यन्ते कवलाश्चात्र विरेको मधुरैरपि ||२८||

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Adhikarana 21 (29) · Śloka 30

ধবত্বক্ত্রিফলাশ্যামাতিল্বকৈর্মধুকেন চ | শ্রীপর্ণীরজনীমিশ্রৈঃ ক্ষীরে দশগুণে পচেত্ ||২৯|| তৈলং কালোপপন্নং তন্নস্যং স্যাদনযোর্হিতম্ |৩০|

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धवत्वक्त्रिफलाश्यामातिल्वकैर्मधुकेन च | श्रीपर्णीरजनीमिश्रैः क्षीरे दशगुणे पचेत् ||२९|| तैलं कालोपपन्नं तन्नस्यं स्यादनयोर्हितम् |३०|

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Adhikarana 22 (30-33) · Śloka 33

কফজে সর্পিষা স্নিগ্ধং তিলমাষবিপক্বযা ||৩০|| যবাগ্বা বামযেদ্বান্তঃ কফঘ্নং ক্রমমাচরেত্ | উভে বলে বৃহত্যৌ চ বিডঙ্গং সত্রিকণ্টকম্ ||৩১|| শ্বেতামূলং সদাভদ্রাং বর্ষাভূং চাত্র সংহরেত্ | তৈলমেভির্বিপক্বং তু নস্যমস্যোপকল্পযেত্ ||৩২|| সরলাকিণিহীদারুনিকুম্ভেঙ্গুদিভিঃ কৃতাঃ | বর্তযশ্চোপযোজ্যাঃ স্যুর্ধূমপানে যথাবিধি ||৩৩||

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कफजे सर्पिषा स्निग्धं तिलमाषविपक्वया ||३०|| यवाग्वा वामयेद्वान्तः कफघ्नं क्रममाचरेत् | उभे बले बृहत्यौ च विडङ्गं सत्रिकण्टकम् ||३१|| श्वेतामूलं सदाभद्रां वर्षाभूं चात्र संहरेत् | तैलमेभिर्विपक्वं तु नस्यमस्योपकल्पयेत् ||३२|| सरलाकिणिहीदारुनिकुम्भेङ्गुदिभिः कृताः | वर्तयश्चोपयोज्याः स्युर्धूमपाने यथाविधि ||३३||

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Adhikarana 23 (34-35) · Śloka 35

সর্পীংষি কটুতিক্তানি তীক্ষ্ণধূমাঃ কটূনি চ | ভেষজান্যুপযুক্তানি হন্যুঃ সর্বপ্রকোপজম্ ||৩৪|| রসাঞ্জনে সাতিবিষে মুস্তাযাং ভদ্রদারুণি | তৈলং বিপক্বং নস্যার্থে বিদধ্যাচ্চাত্র বুদ্ধিমান্ ||৩৫||

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सर्पींषि कटुतिक्तानि तीक्ष्णधूमाः कटूनि च | भेषजान्युपयुक्तानि हन्युः सर्वप्रकोपजम् ||३४|| रसाञ्जने सातिविषे मुस्तायां भद्रदारुणि | तैलं विपक्वं नस्यार्थे विदध्याच्चात्र बुद्धिमान् ||३५||

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Adhikarana 24 (36-37) · Śloka 38

মুস্তা তেজোবতী পাঠা কট্ফলং কটুকা বচা | সর্ষপাঃ পিপ্পলীমূলং পিপ্পল্যঃ সৈন্ধবাগ্নিকৌ ||৩৬|| তুত্থং করঞ্জবীজং চ লবণং ভদ্রদারু চ | এতৈঃ কৃতং কষাযং তু কবলে সম্প্রযোজযেত্ ||৩৭|| হিতং মূর্ধবিরেকে চ তৈলমেভির্বিপাচিতম্ |৩৮|

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मुस्ता तेजोवती पाठा कट्फलं कटुका वचा | सर्षपाः पिप्पलीमूलं पिप्पल्यः सैन्धवाग्निकौ ||३६|| तुत्थं करञ्जबीजं च लवणं भद्रदारु च | एतैः कृतं कषायं तु कवले सम्प्रयोजयेत् ||३७|| हितं मूर्धविरेके च तैलमेभिर्विपाचितम् |३८|

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Adhikarana 25 (38-41) · Śloka 41

ক্ষীরমর্ধজলে ক্বাথ্যং জাঙ্গলৈর্মৃগপক্ষিভিঃ ||৩৮|| পুষ্পৈর্বিমিশ্রং জলজৈর্বাতঘ্নৈরৌষধৈরপি | হিমে ক্ষীরাবশিষ্টেঽস্মিন্ ঘৃতমুত্পাদ্য যত্নতঃ ||৩৯|| সর্বগন্ধসিতানন্তামধুকং চন্দনং তথা | আবাপ্য বিপযেদ্ভূযো দশক্ষীরং তু তদ্ঘৃতম্ ||৪০|| নস্যে প্রযুক্তমুদ্রিক্তান্ প্রতিশ্যাযান্ ব্যপোহতি | যথাস্বং দোষশমনৈস্তৈলং কুর্যাচ্চ যত্নতঃ ||৪১||

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क्षीरमर्धजले क्वाथ्यं जाङ्गलैर्मृगपक्षिभिः ||३८|| पुष्पैर्विमिश्रं जलजैर्वातघ्नैरौषधैरपि | हिमे क्षीरावशिष्टेऽस्मिन् घृतमुत्पाद्य यत्नतः ||३९|| सर्वगन्धसितानन्तामधुकं चन्दनं तथा | आवाप्य विपयेद्भूयो दशक्षीरं तु तद्घृतम् ||४०|| नस्ये प्रयुक्तमुद्रिक्तान् प्रतिश्यायान् व्यपोहति | यथास्वं दोषशमनैस्तैलं कुर्याच्च यत्नतः ||४१||

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Adhikarana 26 (42) · Śloka 42

সমূত্রপিত্তাশ্চোদ্দিষ্টাঃ ক্রিযাঃ কৃমিষু যোজযেত্ | যাপনার্থং কৃমিঘ্নানি ভেষজানি চ বুদ্ধিমান্ ||৪২||

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समूत्रपित्ताश्चोद्दिष्टाः क्रियाः कृमिषु योजयेत् | यापनार्थं कृमिघ्नानि भेषजानि च बुद्धिमान् ||४२||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 24

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে প্রতিশ্যাযপ্রতিষেধো নাম চতুর্বিংশতিতমোঽধ্যাযঃ ||২৪||

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इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे प्रतिश्यायप्रतिषेधो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ||२४||

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