Skip to content
AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
Open navigation
Explore AyurvedaBook appointment

26. śirōrōgapratiṣēdhādhyāyaḥ

Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3

অথাতঃ শিরোরোগপ্রতিষেধং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২|| বাতব্যাধিবিধিঃ কার্যঃ শিরোরোগেঽনিলাত্মকে | পযোনুপানং সেবেত ঘৃতং তৈলমথাপি বা ||৩||

View original

अथातः शिरोरोगप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२|| वातव्याधिविधिः कार्यः शिरोरोगेऽनिलात्मके | पयोनुपानं सेवेत घृतं तैलमथापि वा ||३||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 2 (4) · Śloka 5

মুদ্গান্ কুলত্থান্মাষাংশ্চ খাদেচ্চ নিশি কেবলান্ | কটূষ্ণাংশ্চ সসর্পিষ্কানুষ্ণং চানু পযঃ পিবেত্ ||৪|| পিবেদ্বা পযসা তৈলং তত্কল্কং বাঽপি মানবঃ |৫|

View original

मुद्गान् कुलत्थान्माषांश्च खादेच्च निशि केवलान् | कटूष्णांश्च ससर्पिष्कानुष्णं चानु पयः पिबेत् ||४|| पिबेद्वा पयसा तैलं तत्कल्कं वाऽपि मानवः |५|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 3 (5-9) · Śloka 10

বাতঘ্নসিদ্ধৈঃ ক্ষীরৈশ্চ সুখোষ্ণৈঃ সেকমাচরেত্ ||৫|| তত্সিদ্ধৈঃ পাযসৈর্বাঽপি সুখোষ্ণৈর্লেপযেচ্ছিরঃ | স্বিন্নৈর্বা মত্স্যপিশিতৈঃ কৃশরৈর্বা সসৈন্ধবৈঃ ||৬|| চন্দনোত্পলকুষ্ঠৈর্বা সুশ্লক্ষ্ণৈর্মগধাযুতৈঃ | স্নিগ্ধস্য তৈলং নস্যং স্যাত্ কুলীররসসাধিতম্ ||৭|| বরুণাদৌ গণে ক্ষুণ্ণে ক্ষীরমর্ধোদকং পচেত্ | ক্ষীরশেষং চ তন্মথ্যং শীতং সারমুপাহরেত্ ||৮|| ততো মধুরকৈঃ সিদ্ধং নস্যে তত্ পূজিতং হবিঃ | তস্মিন্ বিপক্বে ক্ষীরে তু পেযং সর্পিঃ সশর্করম্ ||৯|| ধূমং চাস্য যথাকালং স্নৈহিকং যোজযেদ্ভিষক্ |১০|

View original

वातघ्नसिद्धैः क्षीरैश्च सुखोष्णैः सेकमाचरेत् ||५|| तत्सिद्धैः पायसैर्वाऽपि सुखोष्णैर्लेपयेच्छिरः | स्विन्नैर्वा मत्स्यपिशितैः कृशरैर्वा ससैन्धवैः ||६|| चन्दनोत्पलकुष्ठैर्वा सुश्लक्ष्णैर्मगधायुतैः | स्निग्धस्य तैलं नस्यं स्यात् कुलीररससाधितम् ||७|| वरुणादौ गणे क्षुण्णे क्षीरमर्धोदकं पचेत् | क्षीरशेषं च तन्मथ्यं शीतं सारमुपाहरेत् ||८|| ततो मधुरकैः सिद्धं नस्ये तत् पूजितं हविः | तस्मिन् विपक्वे क्षीरे तु पेयं सर्पिः सशर्करम् ||९|| धूमं चास्य यथाकालं स्नैहिकं योजयेद्भिषक् |१०|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 4 (10) · Śloka 11

পানাভ্যঞ্জননস্যেষু বস্তিকর্মণি সেচনে ||১০|| বিদধ্যাত্ত্রৈবৃতং ধীমান্ বলাতৈলমথাপি বা |১১|

View original

पानाभ्यञ्जननस्येषु बस्तिकर्मणि सेचने ||१०|| विदध्यात्त्रैवृतं धीमान् बलातैलमथापि वा |११|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 5 (11) · Śloka 11

ভোজযেচ্চ রসৈঃ স্নিগ্ধৈঃ পযোভির্বা সুসংস্কৃতৈঃ ||১১||

View original

भोजयेच्च रसैः स्निग्धैः पयोभिर्वा सुसंस्कृतैः ||११||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 6 (12) · Śloka 13

পিত্তরক্তসমুত্থানৌ শিরোরোগৌ নিবারযেত্ | শিরোলেপৈঃ সসর্পিষ্কৈঃ পরিষেকৈশ্চ শীতলৈঃ ||১২|| ক্ষীরেক্ষুরসধান্যাম্লমস্তুক্ষৌদ্রসিতাজলৈঃ |১৩|

View original

पित्तरक्तसमुत्थानौ शिरोरोगौ निवारयेत् | शिरोलेपैः ससर्पिष्कैः परिषेकैश्च शीतलैः ||१२|| क्षीरेक्षुरसधान्याम्लमस्तुक्षौद्रसिताजलैः |१३|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 7 (13-14) · Śloka 15

নলবঞ্জুলকহ্লারচন্দনোত্পলপদ্মকৈঃ ||১৩|| বংশশৈবলযষ্ট্যাহ্বমুস্তাম্ভোরুহসংযুতৈঃ | শিরঃপ্রলেপৈঃ সঘৃতৈর্বৈসর্পৈশ্চ তথাবিধৈঃ ||১৪|| মধুরৈশ্চ মুখালৈপৈর্নস্যকর্মভিরেব চ |১৫|

View original

नलवञ्जुलकह्लारचन्दनोत्पलपद्मकैः ||१३|| वंशशैवलयष्ट्याह्वमुस्ताम्भोरुहसंयुतैः | शिरःप्रलेपैः सघृतैर्वैसर्पैश्च तथाविधैः ||१४|| मधुरैश्च मुखालैपैर्नस्यकर्मभिरेव च |१५|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 8 (15) · Śloka 16

আস্থাপনৈর্বিরেকৈশ্চ পথ্যৈশ্চ স্নেহবস্তিভিঃ ||১৫|| ক্ষীরসর্পির্হিতং নস্যং বসা বা জাঙ্গলা শুভা |১৬|

View original

आस्थापनैर्विरेकैश्च पथ्यैश्च स्नेहबस्तिभिः ||१५|| क्षीरसर्पिर्हितं नस्यं वसा वा जाङ्गला शुभा |१६|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 9 (16-17) · Śloka 17

উত্পলাদিবিপক্বেন ক্ষীরেণাস্থাপনং হিতম্ ||১৬|| ভোজনং জাঙ্গলরসৈঃ সর্পিষা চানুবাসনম্ | মধুরৈঃ ক্ষীরসর্পিস্তু স্নেহনে চ সশর্করম্ ||১৭||

View original

उत्पलादिविपक्वेन क्षीरेणास्थापनं हितम् ||१६|| भोजनं जाङ्गलरसैः सर्पिषा चानुवासनम् | मधुरैः क्षीरसर्पिस्तु स्नेहने च सशर्करम् ||१७||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 10 (18) · Śloka 18

পিত্তরক্তঘ্নমুদ্দিষ্টং যচ্চান্যদপি তদ্ধিতম্ |১৮|

View original

पित्तरक्तघ्नमुद्दिष्टं यच्चान्यदपि तद्धितम् |१८|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 11 (18-20) · Śloka 20

কফোত্থিতং শিরোরোগং জযেত্ কফনিবারণৈঃ ||১৮|| শিরোবিরেকৈর্বমনৈস্তীক্ষ্ণৈর্গণ্ডূষধারণৈঃ | অচ্ছং চ পাযযেত্সর্পিঃ স্বেদযেচ্চাপ্যভীক্ষ্ণশঃ ||১৯|| শিরো মধূকসারেণ স্নিগ্ধং চাপি বিরেচযেত্ | ইঙ্গুদস্য ত্বচা বাঽপি মেষশৃঙ্গস্য বা ভিষক্ ||২০||

View original

कफोत्थितं शिरोरोगं जयेत् कफनिवारणैः ||१८|| शिरोविरेकैर्वमनैस्तीक्ष्णैर्गण्डूषधारणैः | अच्छं च पाययेत्सर्पिः स्वेदयेच्चाप्यभीक्ष्णशः ||१९|| शिरो मधूकसारेण स्निग्धं चापि विरेचयेत् | इङ्गुदस्य त्वचा वाऽपि मेषशृङ्गस्य वा भिषक् ||२०||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 12 (21-22) · Śloka 22

আভ্যামেব কৃতাং বর্তিং ধূমপানে প্রযোজযেত্ | ঘ্রেযং কট্ফলচূর্ণং চ কবলাশ্চ কফাপহাঃ ||২১|| সরলাকুষ্ঠশার্ঙ্গেষ্টাদেবকাষ্ঠৈঃ সরোহিষৈঃ | ক্ষারপিষ্টৈঃ সলবণৈঃ সুখোষ্ণৈর্লেপযেচ্ছিরঃ ||২২||

View original

आभ्यामेव कृतां वर्तिं धूमपाने प्रयोजयेत् | घ्रेयं कट्फलचूर्णं च कवलाश्च कफापहाः ||२१|| सरलाकुष्ठशार्ङ्गेष्टादेवकाष्ठैः सरोहिषैः | क्षारपिष्टैः सलवणैः सुखोष्णैर्लेपयेच्छिरः ||२२||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 13 (23) · Śloka 23

যবষষ্টিকযোশ্চান্নং ব্যোষক্ষারসমাযুতম্ | পটোলমুদ্গকৌলত্থৈর্মাত্রাবদ্ভোজযেদ্রসৈঃ ||২৩||

View original

यवषष्टिकयोश्चान्नं व्योषक्षारसमायुतम् | पटोलमुद्गकौलत्थैर्मात्रावद्भोजयेद्रसैः ||२३||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 14 (24) · Śloka 24

শিরোরোগে ত্রিদোষোত্থে ত্রিদোষঘ্নো বিধির্হিতঃ |২৪|

View original

शिरोरोगे त्रिदोषोत्थे त्रिदोषघ्नो विधिर्हितः |२४|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 15 (24) · Śloka 24

সর্পিঃপানং বিশেষেণ পুরাণং বা দিশন্তি হি ||২৪||

View original

सर्पिःपानं विशेषेण पुराणं वा दिशन्ति हि ||२४||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 16 (25) · Śloka 26

ক্ষযজে ক্ষযমাসাদ্য কর্তব্যো বৃংহণো বিধিঃ | পানে নস্যে চ সর্পিঃ স্যাদ্বাতঘ্নমধুরৈঃ শৃতম্ ||২৫|| ক্ষযকাসাপহং চাত্র সর্পিঃ পথ্যতমং বিদুঃ |২৬|

View original

क्षयजे क्षयमासाद्य कर्तव्यो बृंहणो विधिः | पाने नस्ये च सर्पिः स्याद्वातघ्नमधुरैः शृतम् ||२५|| क्षयकासापहं चात्र सर्पिः पथ्यतमं विदुः |२६|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 17 (26-27) · Śloka 27

কৃমিভির্ভক্ষ্যমাণস্য বক্ষ্যতে শিরসঃ ক্রিযা ||২৬|| নস্যে হি শোণিতং দদ্যাত্তেন মূর্চ্ছন্তি জন্তবঃ | মত্তাঃ শোণিতগন্ধেন সমাযান্তি যতস্ততঃ ||২৭||

View original

कृमिभिर्भक्ष्यमाणस्य वक्ष्यते शिरसः क्रिया ||२६|| नस्ये हि शोणितं दद्यात्तेन मूर्च्छन्ति जन्तवः | मत्ताः शोणितगन्धेन समायान्ति यतस्ततः ||२७||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 18 (28-29) · Śloka 29

তেষাং নির্হরণং কার্যং ততো মূর্ধবিরেচনৈঃ | হ্রস্বশিগ্রুকবীজৈর্বা কাংস্যনীলীসমাযুতৈঃ ||২৮|| কৃমিঘ্নৈরবপীডৈশ্চ মূত্রপিষ্টৈরুপাচরেত্ | পূতিমত্স্যযুতান্ ধূমান্ কৃমিঘ্নাংশ্চ প্রযোজযেত্ ||২৯||

View original

तेषां निर्हरणं कार्यं ततो मूर्धविरेचनैः | ह्रस्वशिग्रुकबीजैर्वा कांस्यनीलीसमायुतैः ||२८|| कृमिघ्नैरवपीडैश्च मूत्रपिष्टैरुपाचरेत् | पूतिमत्स्ययुतान् धूमान् कृमिघ्नांश्च प्रयोजयेत् ||२९||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 19 (30) · Śloka 30

ভোজনানি কৃমিঘ্নানি পানানি বিবিধানি চ |৩০|

View original

भोजनानि कृमिघ्नानि पानानि विविधानि च |३०|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 20 (30) · Śloka 30

সূর্যাবর্তে বিধাতব্যং নস্যকর্মাদিভেষজম্ ||৩০||

View original

सूर्यावर्ते विधातव्यं नस्यकर्मादिभेषजम् ||३०||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 21 (31) · Śloka 31

ভোজনং জাঙ্গলপ্রাযং ক্ষীরান্নবিকৃতির্ঘৃতম্ |৩১|

View original

भोजनं जाङ्गलप्रायं क्षीरान्नविकृतिर्घृतम् |३१|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 22 (31-33) · Śloka 34

তথাঽর্ধভেদকে ব্যাধৌ প্রাপ্তমন্যচ্চ যদ্ভবেত্ ||৩১|| শিরীষমূলকফলৈরবপীডোঽনযোর্হিতঃ | বংশমূলককর্পূরৈরবপীডং প্রযোজযেত্ ||৩২|| অবপীডো হিতশ্চাত্র বচামাগধিকাযুতঃ | মধুকেনাবপীডো বা মধুনা সহ সংযুতঃ ||৩৩|| মনঃশিলাবপীডো বা মধুনা চন্দনেন বা |৩৪|

View original

तथाऽर्धभेदके व्याधौ प्राप्तमन्यच्च यद्भवेत् ||३१|| शिरीषमूलकफलैरवपीडोऽनयोर्हितः | वंशमूलककर्पूरैरवपीडं प्रयोजयेत् ||३२|| अवपीडो हितश्चात्र वचामागधिकायुतः | मधुकेनावपीडो वा मधुना सह संयुतः ||३३|| मनःशिलावपीडो वा मधुना चन्दनेन वा |३४|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 23 (34) · Śloka 34

তেষামন্তে হিতং নস্যং সর্পির্মধুরসান্বিতম্ ||৩৪||

View original

तेषामन्ते हितं नस्यं सर्पिर्मधुरसान्वितम् ||३४||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 24 (35) · Śloka 36

সারিবোত্পলকুষ্ঠানি মধুকং চাম্লপেষিতম্ | সর্পিস্তৈলযুতো লেপো দ্বযোরপি সুখাবহঃ ||৩৫|| এষ এব প্রযোক্তব্যঃ শিরোরোগে কফাত্মকে |৩৬|

View original

सारिवोत्पलकुष्ठानि मधुकं चाम्लपेषितम् | सर्पिस्तैलयुतो लेपो द्वयोरपि सुखावहः ||३५|| एष एव प्रयोक्तव्यः शिरोरोगे कफात्मके |३६|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 25 (36-37) · Śloka 38

অনন্তবাতে কর্তব্যঃ সূর্যাবর্তহরো বিধিঃ ||৩৬|| সিরাব্যধশ্চ কর্তব্যোঽনন্তবাতপ্রশান্তযে | আহারশ্চ বিধাতব্যো বাতপিত্তবিনাশনঃ ||৩৭|| মধুমস্তকসংযাবঘৃতপূরৈশ্চ ভোজনম্ |৩৮|

View original

अनन्तवाते कर्तव्यः सूर्यावर्तहरो विधिः ||३६|| सिराव्यधश्च कर्तव्योऽनन्तवातप्रशान्तये | आहारश्च विधातव्यो वातपित्तविनाशनः ||३७|| मधुमस्तकसंयावघृतपूरैश्च भोजनम् |३८|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 26 (38) · Śloka 39

ক্ষীরসর্পিঃ প্রশংসন্তি নস্যে পানে চ শঙ্খকে ||৩৮|| জাঙ্গলানাং রসৈঃ স্নিগ্ধৈরাহারশ্চাত্র শস্যতে |৩৯|

View original

क्षीरसर्पिः प्रशंसन्ति नस्ये पाने च शङ्खके ||३८|| जाङ्गलानां रसैः स्निग्धैराहारश्चात्र शस्यते |३९|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 27 (39-40) · Śloka 40

শতাবরীং তিলান্ কৃষ্ণান্ মধুকং নীলমুত্পলম্ ||৩৯|| দূর্বাং পুনর্নবাং চৈব লেপে সাধ্ববচারযেত্ | মহাসুগন্ধামথবা পালিন্দীং চাম্লপেষিতাম্ ||৪০||

View original

शतावरीं तिलान् कृष्णान् मधुकं नीलमुत्पलम् ||३९|| दूर्वां पुनर्नवां चैव लेपे साध्ववचारयेत् | महासुगन्धामथवा पालिन्दीं चाम्लपेषिताम् ||४०||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 28 (41) · Śloka 41

শীতাংশ্চাত্র পরীষেকান্ প্রদেহাংশ্চ প্রযোজযেত্ |৪১|

View original

शीतांश्चात्र परीषेकान् प्रदेहांश्च प्रयोजयेत् |४१|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 29 (41) · Śloka 41

অবপীডশ্চ দেযোঽত্র সূর্যাবর্তনিবারণঃ ||৪১||

View original

अवपीडश्च देयोऽत्र सूर्यावर्तनिवारणः ||४१||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 30 (42) · Śloka 43

কৃমিক্ষযকৃতৌ হিত্বা শিরোরোগেষু বুদ্ধিমান্ | মধুতৈলসমাযুক্তৈঃ শিরাংস্যতিবিরেচযেত্ ||৪২|| পশ্চাত্সর্ষপতৈলেন ততো নস্যং প্রযোজযেত্ |৪৩|

View original

कृमिक्षयकृतौ हित्वा शिरोरोगेषु बुद्धिमान् | मधुतैलसमायुक्तैः शिरांस्यतिविरेचयेत् ||४२|| पश्चात्सर्षपतैलेन ततो नस्यं प्रयोजयेत् |४३|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 31 (43) · Śloka 44

ন চেচ্ছান্তিং ব্রজন্ত্যেবং স্নিগ্ধস্বিন্নাংস্ততো ভিষক্ ||৪৩|| পশ্চাদুপাচরেত্সম্যক্ সিরাণামথ মোক্ষণৈঃ |৪৪|

View original

न चेच्छान्तिं व्रजन्त्येवं स्निग्धस्विन्नांस्ततो भिषक् ||४३|| पश्चादुपाचरेत्सम्यक् सिराणामथ मोक्षणैः |४४|

🔊 Audio coming soon

Adhikarana 32 (44-46) · Śloka 46

ষট্সপ্ততির্নেত্ররোগা দশাষ্টাদশ কর্ণজাঃ ||৪৪|| একত্রিংশদ্ ঘ্রাণগতাঃ শিরস্যেকাদশৈব তু | ইতি বিস্তরতো দৃ(দি)ষ্টাঃ সলক্ষণচিকিত্সিতাঃ ||৪৫|| সংহিতাযামভিহিতাঃ সপ্তষষ্টির্মুখামযাঃ | এতাবন্তো যথাস্থূলমুত্তমাঙ্গগতা গদাঃ | অস্মিঞ্ছাস্ত্রে নিগদিতাঃ সঙ্খ্যারূপচিকিত্সিতৈঃ ||৪৬||

View original

षट्सप्ततिर्नेत्ररोगा दशाष्टादश कर्णजाः ||४४|| एकत्रिंशद् घ्राणगताः शिरस्येकादशैव तु | इति विस्तरतो दृ(दि)ष्टाः सलक्षणचिकित्सिताः ||४५|| संहितायामभिहिताः सप्तषष्टिर्मुखामयाः | एतावन्तो यथास्थूलमुत्तमाङ्गगता गदाः | अस्मिञ्छास्त्रे निगदिताः सङ्ख्यारूपचिकित्सितैः ||४६||

🔊 Audio coming soon

Adhikarana puShpikA · Śloka 26

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতে শালাক্যতন্ত্রে শিরোরোগপ্রতিষেধো নাম ষড্বিংশোঽধ্যাযঃ ||২৬|| ইতি শ্রীভগবতা ধন্বন্তরিণোপদিষ্টাযাং মহর্ষিণা সুশ্রুতাচার্যেণ বিরচিতাযাং সুশ্রুতসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রান্তর্গতং শালাক্যতন্ত্রং সমাপ্তম্ |

View original

इति सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गते शालाक्यतन्त्रे शिरोरोगप्रतिषेधो नाम षड्विंशोऽध्यायः ||२६|| इति श्रीभगवता धन्वन्तरिणोपदिष्टायां महर्षिणा सुश्रुताचार्येण विरचितायां सुश्रुतसंहितायामुत्तरतन्त्रान्तर्गतं शालाक्यतन्त्रं समाप्तम् |

🔊 Audio coming soon

26. śirōrōgapratiṣēdhādhyāyaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi