Adhikarana athAtIsAracikitsitannAmaikAdasho~adhyAyaH adhyAyapratij~jA (1) · Śloka 1
অথাতোঽতীসারচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ|
ইতি হ স্মাহুরাত্রেযাদযো মহর্ষযঃ||১||
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अथातोऽतीसारचिकित्सितं व्याख्यास्यामः|
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः||१||
Adhikarana Adau la~gghanam (2) · Śloka 2
প্রাযেণাতীসারো হ্যগ্নিমুপহত্য প্রাগামাধিষ্ঠানো ভবতি|
তস্মাদনিলজমপ্যামপাচনার্থমাদৌ লঙ্ঘনেনোপক্রমেত|
তত্র শূলানাহপ্রসেকার্তং লবণাম্বুনোষ্ণেন বামযেত্|
ন তু সামে পূর্বং সঙ্গ্রাহি প্রযুঞ্জীত বিবদ্ধে বা মলে|
স্তিমিতা- ধ্মাতগুরুসরুজকোষ্ঠঃ প্রাণদামুষ্ণাম্বুনোপযুঞ্জীত বিবদ্ধে বা মলে|
সব্যোষাং বা ধান্যাম্লক্বথিতং বা|
অন্যদ্বা স্রংসনদীপনমৌষধম্||২||
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प्रायेणातीसारो ह्यग्निमुपहत्य प्रागामाधिष्ठानो भवति|
तस्मादनिलजमप्यामपाचनार्थमादौ लङ्घनेनोपक्रमेत|
तत्र शूलानाहप्रसेकार्तं लवणाम्बुनोष्णेन वामयेत्|
न तु सामे पूर्वं सङ्ग्राहि प्रयुञ्जीत विबद्धे वा मले|
स्तिमिता- ध्मातगुरुसरुजकोष्ठः प्राणदामुष्णाम्बुनोपयुञ्जीत विबद्धे वा मले|
सव्योषां वा धान्याम्लक्वथितं वा|
अन्यद्वा स्रंसनदीपनमौषधम्||२||
Adhikarana Adau la~gghanam (3) · Śloka 3
অপি চ- বিশুদ্ধস্রোতসো হ্যস্য দোষশেষে প্রবাহিতে|
সুখং সংগ্রহণং কর্ত্তুং পাচনৈঃ স্তম্ভনেন বা||৩||
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अपि च- विशुद्धस्रोतसो ह्यस्य दोषशेषे प्रवाहिते|
सुखं संग्रहणं कर्त्तुं पाचनैः स्तम्भनेन वा||३||
Adhikarana madhyadoShe kvAthAdikam (4) · Śloka 4
মধ্যদোষস্তু বিশোষযন্ মাগধীনাগরবচাভূতীকধনিকা হরীতকীনাং ক্বাথং পিবেত্|
জলজলদবিল্বপেশিকশুণ্ঠী ধান্যকানাং বা|
উভযমপি চৈতত্ প্রমথ্যারভ্যম্|
বচা দিবর্গং ক্বথিতং চূর্ণিতং বা|
তদ্বদ্বচাভযাবিডঙ্গপাঠা শুণ্ঠীবিড্লবণানি বা|
মুস্তপিপ্পলীন্দ্রযবপাঠাতেজো বতীর্বা|
বিডঙ্গাভযাকণালবণপঞ্চকানি বা|
পিপ্পলী ন্দ্রযবপাঠাশুণ্ঠীর্বা সরক্তে তু প্রবৃত্ত আমে জগপিপ্পলীং মধুশর্করামধুরাম্||৪||
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मध्यदोषस्तु विशोषयन् मागधीनागरवचाभूतीकधनिका हरीतकीनां क्वाथं पिबेत्|
जलजलदबिल्वपेशिकशुण्ठी धान्यकानां वा|
उभयमपि चैतत् प्रमथ्यारभ्यम्|
वचा दिवर्गं क्वथितं चूर्णितं वा|
तद्वद्वचाभयाविडङ्गपाठा शुण्ठीबिड्लवणानि वा|
मुस्तपिप्पलीन्द्रयवपाठातेजो वतीर्वा|
विडङ्गाभयाकणालवणपञ्चकानि वा|
पिप्पली न्द्रयवपाठाशुण्ठीर्वा सरक्ते तु प्रवृत्त आमे जगपिप्पलीं मधुशर्करामधुराम्||४||
Adhikarana alpadoShe upavAsAdikam (5) · Śloka 5
অল্পদোষে পুনরুপবাসযেত্|
পানং ত্বতিসারিণোঽম্বুবচা তিবিষাভ্যাং ক্বথিতম্|
শুণ্ঠ্যতিবিষাভ্যাং মুস্তপর্পট কাভ্যাং নাগরধান্যকাভ্যাং বা|
ক্ষুদ্বতস্তু লঘুপঞ্চমূল পঞ্চকোলহস্তিপিপ্পলীবলাবিল্বপাঠাহিঙ্গুধান্যকজীর কশঠীগন্ধপলাশহপুষাযবানীতিন্তিণীকদাডিমবিড সৈন্ধবৈরন্নপানং যবাগ্বাদি কল্পযেত্||৫||
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अल्पदोषे पुनरुपवासयेत्|
पानं त्वतिसारिणोऽम्बुवचा तिविषाभ्यां क्वथितम्|
शुण्ठ्यतिविषाभ्यां मुस्तपर्पट काभ्यां नागरधान्यकाभ्यां वा|
क्षुद्वतस्तु लघुपञ्चमूल पञ्चकोलहस्तिपिप्पलीबलाबिल्वपाठाहिङ्गुधान्यकजीर कशठीगन्धपलाशहपुषायवानीतिन्तिणीकदाडिमबिड सैन्धवैरन्नपानं यवाग्वादि कल्पयेत्||५||
Adhikarana mUDhavAtAdiShu visheShaH (6) · Śloka 6
বিল্বশলাটুহরীকীপিপ্পলীমূলৈর্মূঢবাতস্য|
অংশুমতী দ্বযবলাবিল্বশলাটুভিঃ পিত্তোল্বণস্য|
পিবেচ্চ তৃষিতঃ পটপূতং তক্রম্|
মধুসুরাধান্যাম্লযবাগূমণ্ডান্যতমং বা|
এষ ক্রমোঽনিলকফঘ্নো দীপনপাচনোং রোচনঃ সঙ্গ্রাহী বল্যশ্চ||৬||
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बिल्वशलाटुहरीकीपिप्पलीमूलैर्मूढवातस्य|
अंशुमती द्वयबलाबिल्वशलाटुभिः पित्तोल्बणस्य|
पिबेच्च तृषितः पटपूतं तक्रम्|
मधुसुराधान्याम्लयवागूमण्डान्यतमं वा|
एष क्रमोऽनिलकफघ्नो दीपनपाचनों रोचनः सङ्ग्राही बल्यश्च||६||
Adhikarana pravAhikA tatra kramashca (7) · Śloka 7
পক্বদোষেঽপি যোঽতিসার্যতে বহুশোঽনিলেন বিবদ্ধং সপিচ্ছং সফেনং সশূলপরিকর্তিকং সরোমহর্ষং নিষ্পুরীষং চ তাং প্রবা হিকাং বিংবিসীমিতি চাচক্ষতে|
তত্রোদাবর্তোপদিষ্টাংস্তেনৈব বিধিনা সংস্কৃতাংশ্ছাগপিশিতরসান্ দদ্যাত্||৭||
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पक्वदोषेऽपि योऽतिसार्यते बहुशोऽनिलेन विबद्धं सपिच्छं सफेनं सशूलपरिकर्तिकं सरोमहर्षं निष्पुरीषं च तां प्रवा हिकां बिंबिसीमिति चाचक्षते|
तत्रोदावर्तोपदिष्टांस्तेनैव विधिना संस्कृतांश्छागपिशितरसान् दद्यात्||७||
Adhikarana varcaHkShaye visheShaH (8) · Śloka 8
যূষাংশ্চ বর্চঃক্ষযে তৃষ্যতো যবমুদ্গমাষতিলকৃতান্|
সমেন বা তিলবালবিল্বযোঃ কল্কেন দধিরসস্নেহযুক্তং খলকম্|
চিত্রকশৃঙ্গীবেরপূতীককরঞ্জবিল্বাজমৌদৈর্বা তক্রদাডিম তৈলাঢ্যং সৈন্ধবোপেতমজিতাখ্যম্|
শঠীতিন্তিণীকবিড দাডিমক্ষারপঞ্চকোলমরিচত্রিফলাধাতকীধনিকাপাঠাজমো দাজাজীজীরককপিত্থজম্ব্বাম্রাস্থিভির্বা তুল্যভাগৈঃ ষড্গুণবিল্বমধ্যৈর্গুডমুদ্গরসস্নেহদধিসিদ্ধোঽপরাজিতাখ্যঃ খলকো দীপনঃ পাচনো রুচ্যো গ্রাহী বিংবিসিনাশনঃ|
দধিসরং বা সগুডদাডিমং যমকভৃষ্টম্|
যমক ভৃষ্টান্ বা সশুণ্ঠীচূর্ণান্ সক্তূন্|
মাষান্ বা সুসিদ্ধান্ ঘৃত মণ্ডোপসেচনান্ মরিচোপদংশান্|
ছাগমেষযোর্বান্তরাধি রসং দাডিমাম্লং ধান্যনাগরোপেতং স্নেহবিপক্বং ব্যঞ্জনং পানং চ|
তদ্বত্ সুরাং যমকস্নিগ্ধাং পিবেদ্বা|
শুণ্ঠীবদর চূর্ণং দধিঘৃততৈলক্ষৌদ্রফাণিতোপেতম্|
হিঙ্গুদাডিমমহৌষধপকুল্যাচূর্ণং বা ঘৃতক্ষীরোষ্ণাম্বু মদ্যান্যতমেন|
লিহ্যাদ্বা লোধ্রবিল্বশলাটুগুডাংস্ত্রিকটু কোত্কটাংস্তৈলেন|
অশ্বত্থবাতপোতক্বাথসিদ্ধং বা শা ল্যোদনং ঘৃততৈলক্ষৌদ্রযুক্তং দধ্না খজাহতদধিসরানুপা মশ্নীযাত্||৮||
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यूषांश्च वर्चःक्षये तृष्यतो यवमुद्गमाषतिलकृतान्|
समेन वा तिलबालबिल्वयोः कल्केन दधिरसस्नेहयुक्तं खलकम्|
चित्रकशृङ्गीवेरपूतीककरञ्जबिल्वाजमौदैर्वा तक्रदाडिम तैलाढ्यं सैन्धवोपेतमजिताख्यम्|
शठीतिन्तिणीकबिड दाडिमक्षारपञ्चकोलमरिचत्रिफलाधातकीधनिकापाठाजमो दाजाजीजीरककपित्थजम्ब्वाम्रास्थिभिर्वा तुल्यभागैः षड्गुणबिल्वमध्यैर्गुडमुद्गरसस्नेहदधिसिद्धोऽपराजिताख्यः खलको दीपनः पाचनो रुच्यो ग्राही बिंबिसिनाशनः|
दधिसरं वा सगुडदाडिमं यमकभृष्टम्|
यमक भृष्टान् वा सशुण्ठीचूर्णान् सक्तून्|
माषान् वा सुसिद्धान् घृत मण्डोपसेचनान् मरिचोपदंशान्|
छागमेषयोर्वान्तराधि रसं दाडिमाम्लं धान्यनागरोपेतं स्नेहविपक्वं व्यञ्जनं पानं च|
तद्वत् सुरां यमकस्निग्धां पिबेद्वा|
शुण्ठीबदर चूर्णं दधिघृततैलक्षौद्रफाणितोपेतम्|
हिङ्गुदाडिममहौषधपकुल्याचूर्णं वा घृतक्षीरोष्णाम्बु मद्यान्यतमेन|
लिह्याद्वा लोध्रबिल्वशलाटुगुडांस्त्रिकटु कोत्कटांस्तैलेन|
अश्वत्थवातपोतक्वाथसिद्धं वा शा ल्योदनं घृततैलक्षौद्रयुक्तं दध्ना खजाहतदधिसरानुपा मश्नीयात्||८||
Adhikarana dIpanAdika~jca (9) · Śloka 9
অপি চ - দীপনং পাচনং রুচ্যং দধি বাতহরং পরম্|
বদ্ধবিড্বা হরত্যস্মাচ্চিরোত্থামপি বিংবিসীম্||৯||
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अपि च - दीपनं पाचनं रुच्यं दधि वातहरं परम्|
बद्धविड्वा हरत्यस्माच्चिरोत्थामपि बिंबिसीम्||९||
Adhikarana tRuShNolbaNe visheShaH (10) · Śloka 10
তৃষ্ণোল্বণস্তু সরক্তপিচ্ছোপবেশীপানান্নবিরতো ধারো ষ্ণং ক্ষীরমাকাংক্ষং পিবেত্|
শৃতং বা গন্ধর্বহস্তমলেনা থবা বিল্বশলাটুভিঃ|
তদেব বাল্পতৃষ্ণঃ সগুডতৈলম্|
শৃতেন বা পযসা মরিচকল্কং দ্বিগুণতিলকল্কযুক্তম্|
ক্ষীরেণৈব বা পিপ্পলীম্|
ব্যোষসিদ্ধেন বা পযসান্নানি ভুঞ্জীত||১০||
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तृष्णोल्बणस्तु सरक्तपिच्छोपवेशीपानान्नविरतो धारो ष्णं क्षीरमाकांक्षं पिबेत्|
शृतं वा गन्धर्वहस्तमलेना थवा बिल्वशलाटुभिः|
तदेव वाल्पतृष्णः सगुडतैलम्|
शृतेन वा पयसा मरिचकल्कं द्विगुणतिलकल्कयुक्तम्|
क्षीरेणैव वा पिप्पलीम्|
व्योषसिद्धेन वा पयसान्नानि भुञ्जीत||१०||
Adhikarana shUlAdhikye visheShaH (11) · Śloka 11
শূলাধিক্যে তু দশমূলক্বথিতেন পযসা সক্ষৌদ্রেণা স্থাপনং দদ্যাত্|
অথবা পিচ্ছাবস্তিমনুবাসনং চ বাতঘ্নং বা পিত্তঘ্নং বা||১১||
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शूलाधिक्ये तु दशमूलक्वथितेन पयसा सक्षौद्रेणा स्थापनं दद्यात्|
अथवा पिच्छाबस्तिमनुवासनं च वातघ्नं वा पित्तघ्नं वा||११||
Adhikarana gudabhraMshe visheShaH (12) · Śloka 12
গুদভ্রংশে শূলে চাম্লবদরচাঙ্গেরীরসদধিক্ষারনাগরকল্কেন শৃতমম্লং সর্পির্নিরামমাতুরং পাযযেত্ মরিচপঞ্চকোলা জাজীধনিকাবিডদাডিমগর্ভং বা পূর্ববদম্লম্|
অনু বাসযেদ্বা দশমূলসিদ্ধেন স্নেহেন|
পিপ্পল্যাদিনা বা|
গুদংচাভ্যঙ্গ্য পূর্বং স্বেদেন মৃদুভূতং প্রবেশযেত্|
সচ্ছিদ্রেণ চাস্য চর্মণা গোষ্ফণাবন্ধং কুর্যাত্|
মূষিকমনান্বং কৃত্বা মহাপঞ্চমূলকষাযঞ্চ ক্ষীরে বিপচেত্|
তেন পযসা বাতহর কল্কপ্রতীবাপং তৈলম্পাচযেত্|
তদভ্যঞ্জনেন পানেন চ সুকৃ চ্ছ্রমপি গুদভ্রংশং সাধযতি||১২||
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गुदभ्रंशे शूले चाम्लबदरचाङ्गेरीरसदधिक्षारनागरकल्केन शृतमम्लं सर्पिर्निराममातुरं पाययेत् मरिचपञ्चकोला जाजीधनिकाबिडदाडिमगर्भं वा पूर्ववदम्लम्|
अनु वासयेद्वा दशमूलसिद्धेन स्नेहेन|
पिप्पल्यादिना वा|
गुदंचाभ्यङ्ग्य पूर्वं स्वेदेन मृदुभूतं प्रवेशयेत्|
सच्छिद्रेण चास्य चर्मणा गोष्फणाबन्धं कुर्यात्|
मूषिकमनान्वं कृत्वा महापञ्चमूलकषायञ्च क्षीरे विपचेत्|
तेन पयसा वातहर कल्कप्रतीवापं तैलम्पाचयेत्|
तदभ्यञ्जनेन पानेन च सुकृ च्छ्रमपि गुदभ्रंशं साधयति||१२||
Adhikarana pittAtisAracikitsA (13) · Śloka 13
পিত্তাতিসারমপি সামমাদৌ তীক্ষ্ণবর্জ্যৈরৌষধৈর্বাতাতি সারবত্ পাচযেত্|
তৃষ্ণাযং সশারিবাভূনিম্বং জ্বরবিহিত মম্ভঃ ষডঙ্গমবচারযেত্|
উপোষিতস্য চান্নকালেঽভীরু হ্রস্বপঞ্চমূলবলাদ্বযসূপ্যপর্ণ্যাদিমৃদুমধুরতিক্তদীপন দ্রব্যনির্যূহযুক্তান্ কালবিন্মণ্ডপেযাসক্তুযূষরসাদীনিষ দম্লাননম্লান্ বা কবোষ্ণান্ সুশীতান্ বা সক্ষৌদ্রান্||১৩||
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पित्तातिसारमपि साममादौ तीक्ष्णवर्ज्यैरौषधैर्वाताति सारवत् पाचयेत्|
तृष्णायं सशारिवाभूनिम्बं ज्वरविहित मम्भः षडङ्गमवचारयेत्|
उपोषितस्य चान्नकालेऽभीरु ह्रस्वपञ्चमूलबलाद्वयसूप्यपर्ण्यादिमृदुमधुरतिक्तदीपन द्रव्यनिर्यूहयुक्तान् कालविन्मण्डपेयासक्तुयूषरसादीनिष दम्लाननम्लान् वा कवोष्णान् सुशीतान् वा सक्षौद्रान्||१३||
Adhikarana anubandhe cikitsA (14) · Śloka 14
অনুবন্ধে তু মূর্বাতিবিষেন্দ্রযবহরিদ্রারসাঞ্জনানি ক্বথি তানি পিবেত্|
কেবলং বা বৃক্ষকবীজম্|
পাঠাগুডূচী কটুকাকিরাততিক্তানি বা|
হরিদ্রাদিগণং বা|
বত্সক বীজাতিবিষাবিল্বাম্বুমুস্তানি বা তণ্ডুলোদকেন বাতি বিষাবৃক্ষকত্বক্ফলানি সক্ষৌদ্রাণি|
চন্দনোশীরশুণ্ঠী লোধ্রনীলোত্পলানি ব|
নাগরোত্পলধাতকীপুষ্পদাডিম ত্বচো বা|
কমলোত্পললোধ্রমোচরসসঙ্গাতিলান্ বা|
মধুকশৃঙ্গিবেরদীর্ঘবৃন্তত্বচো বা মধুযুক্তানি শর্করাপদ্ম কেসরমুস্তাপযস্যাচন্দনানি বা শাল্মলীবৃন্তকৃতং বা শীতকষাযং মধুমধুকোপেতম্|
মধুকপ্রিযঙ্গুকট্বঙ্গত্বগ্দাডিমাঙ্কুরকল্কেন বা দধিযুতাং যবাগূং খলকং বা|
বিল্বকপিত্থজম্ব্বাম্রাস্থিভির্বা|
মধুযুক্তান্ বা লোধ্রাম্বষ্ঠাপ্রিযঙ্গ্বাদিগণান্ ক্বা থাদিষু পৃথক্কল্পিতান্|
শ্যামাদিমহাকষাযং বা||১৪||
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अनुबन्धे तु मूर्वातिविषेन्द्रयवहरिद्रारसाञ्जनानि क्वथि तानि पिबेत्|
केवलं वा वृक्षकबीजम्|
पाठागुडूची कटुकाकिराततिक्तानि वा|
हरिद्रादिगणं वा|
वत्सक बीजातिविषाबिल्वाम्बुमुस्तानि वा तण्डुलोदकेन वाति विषावृक्षकत्वक्फलानि सक्षौद्राणि|
चन्दनोशीरशुण्ठी लोध्रनीलोत्पलानि व|
नागरोत्पलधातकीपुष्पदाडिम त्वचो वा|
कमलोत्पललोध्रमोचरससङ्गातिलान् वा|
मधुकशृङ्गिवेरदीर्घवृन्तत्वचो वा मधुयुक्तानि शर्करापद्म केसरमुस्तापयस्याचन्दनानि वा शाल्मलीवृन्तकृतं वा शीतकषायं मधुमधुकोपेतम्|
मधुकप्रियङ्गुकट्वङ्गत्वग्दाडिमाङ्कुरकल्केन वा दधियुतां यवागूं खलकं वा|
बिल्वकपित्थजम्ब्वाम्रास्थिभिर्वा|
मधुयुक्तान् वा लोध्राम्बष्ठाप्रियङ्ग्वादिगणान् क्वा थादिषु पृथक्कल्पितान्|
श्यामादिमहाकषायं वा||१४||
Adhikarana shUlarte visheShaH (15) · Śloka 15
শূলার্ত্তস্তু রূক্ষকোষ্ঠো ঘৃতং সক্ষারং পিবেত্|
ক্ষীরং বা বৃহতীবলাংশুমতীকচ্ছুরামূলসিদ্ধং মধুককট্বঙ্গাজমো দশর্করাবচূর্ণিতং সতৈলক্ষৌদ্রম্|
ক্ষীরমেব বা ধারোষ্ণম্||১৫||
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शूलार्त्तस्तु रूक्षकोष्ठो घृतं सक्षारं पिबेत्|
क्षीरं वा बृहतीबलांशुमतीकच्छुरामूलसिद्धं मधुककट्वङ्गाजमो दशर्करावचूर्णितं सतैलक्षौद्रम्|
क्षीरमेव वा धारोष्णम्||१५||
Adhikarana balavati virekaH (16) · Śloka 16
বলবান্ বিবদ্ধমলো বিরেকার্থং ত্রিফলাচূর্ণযুক্তং বা পলাশফলক্বাথসিদ্ধং বা পযঃ পীত্বা পয এব কবোষ্ণ মনুপিবেত্|
এবমেব চ ত্রাযমাণযা শৃতম্|
ততো নিস্সৃতে শকৃতি পুরাণেঽতিসারঃ শান্তিমেতি||১৬||
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बलवान् विबद्धमलो विरेकार्थं त्रिफलाचूर्णयुक्तं वा पलाशफलक्वाथसिद्धं वा पयः पीत्वा पय एव कवोष्ण मनुपिबेत्|
एवमेव च त्रायमाणया शृतम्|
ततो निस्सृते शकृति पुराणेऽतिसारः शान्तिमेति||१६||
Adhikarana anuvAsanam (17) · Śloka 17
স্রুতদোষস্য চ সংসর্জনকালে শূলং চেদনুবর্তেত ততো বিল্ব মধুকশতাহ্বাদ্বযগর্ভং সক্ষীরং তৈলচতুর্গুণং সর্পিরনুবাসনং দদ্যাত্||১৭||
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स्रुतदोषस्य च संसर्जनकाले शूलं चेदनुवर्तेत ततो बिल्व मधुकशताह्वाद्वयगर्भं सक्षीरं तैलचतुर्गुणं सर्पिरनुवासनं दद्यात्||१७||
Adhikarana picchAbastiH (18) · Śloka 18
ততঃ সম্যক্কৃতাযামপি সংসর্গ্যামতীসারানুবন্ধে পিচ্ছা বস্তযো যোজ্যঃ|
শাল্মলীবৃন্তান্যার্দ্রদর্ভৈর্বেষ্টযিত্বা কৃষ্ণমৃদাবলিপ্য গোমযাগ্নিনা স্বেদযেত্|
শুষ্কাযাং মৃদি স্বিন্নানি জ্ঞাত্বা বৃন্তান্যুলূখলে সমাপোথ্য তেষাং মুষ্টি সম্মিতং পিণ্ডং ক্ষীরপ্রস্থে বিমর্দযেত্|
ততস্তেন পযসা পূতেন সঘৃততৈলেন মধুমধুককল্কযুক্তেনাস্থাপযেত্|
প্রত্যাগতে চ স্নাতঃ পযসা কচ্ছুরাশৃতেন জাঙ্গলর সৈর্বাঽশ্নীযাত্|
এষ পিচ্ছাবস্তিঃ পিত্তরক্তাতিসার গ্রহণীগুল্মশোষজ্বরান্ বিরেচনাস্থাপনাতিযোগং চ শম যতি||১৮||
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ततः सम्यक्कृतायामपि संसर्ग्यामतीसारानुबन्धे पिच्छा बस्तयो योज्यः|
शाल्मलीवृन्तान्यार्द्रदर्भैर्वेष्टयित्वा कृष्णमृदावलिप्य गोमयाग्निना स्वेदयेत्|
शुष्कायां मृदि स्विन्नानि ज्ञात्वा वृन्तान्युलूखले समापोथ्य तेषां मुष्टि सम्मितं पिण्डं क्षीरप्रस्थे विमर्दयेत्|
ततस्तेन पयसा पूतेन सघृततैलेन मधुमधुककल्कयुक्तेनास्थापयेत्|
प्रत्यागते च स्नातः पयसा कच्छुराशृतेन जाङ्गलर सैर्वाऽश्नीयात्|
एष पिच्छाबस्तिः पित्तरक्तातिसार ग्रहणीगुल्मशोषज्वरान् विरेचनास्थापनातियोगं च शम यति||१८||
Adhikarana puTapAkaprayogaH (19) · Śloka 19
চিরোত্থিতং ত্বতীসারমবেদনং পক্বমপ্যশাম্যন্তং পুট পাকৈরুপাচরেত্|
অরলুত্বক্কল্কং কাশ্মর্যপত্রপ্রচ্ছন্নং পুটপাকবিধিনা পাচযেত্|
তদ্রসং সুশীতং মধুযুতং পিবেত্|
বটাদিত্বক্প্ররোহকল্কমপ্যেবং কল্পযেত্|
অথবা তিত্তিরি মপনীতান্ত্রপিচ্ছং ন্যগ্রোধাদের্বল্কলস্য প্ররোহাণাং বা কল্কেন পূরযিত্বা পূর্ববত্ পুটপাকং কুর্যাত্|
ততস্তস্মা দ্রসমাদায সিতাক্ষৌদ্রযুক্তং পাযযেত্|
অনেন সর্বে জাঙ্গল সত্বা ব্যাখ্যাতাঃ||১৯||
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चिरोत्थितं त्वतीसारमवेदनं पक्वमप्यशाम्यन्तं पुट पाकैरुपाचरेत्|
अरलुत्वक्कल्कं काश्मर्यपत्रप्रच्छन्नं पुटपाकविधिना पाचयेत्|
तद्रसं सुशीतं मधुयुतं पिबेत्|
वटादित्वक्प्ररोहकल्कमप्येवं कल्पयेत्|
अथवा तित्तिरि मपनीतान्त्रपिच्छं न्यग्रोधादेर्वल्कलस्य प्ररोहाणां वा कल्केन पूरयित्वा पूर्ववत् पुटपाकं कुर्यात्|
ततस्तस्मा द्रसमादाय सिताक्षौद्रयुक्तं पाययेत्|
अनेन सर्वे जाङ्गल सत्वा व्याख्याताः||१९||
Adhikarana raktAtisAre kShIraprayogaH (20) · Śloka 20
যস্তু পিত্তাতিসারী পিত্তলান্যাসেবেত তস্য পিত্তমতিবৃদ্ধং রক্তাতিসারং তৃড্দাহমোহজ্বরশূলপাযুপাকাংশ্চ করোতি|
তত্র ক্ষীরমাজং ন্যগ্রোধাদিপ্রসবশৃতং সিতামধুযুক্তমাহারে গুদপ্রক্ষালনে চ বিদধ্যাত্|
তদ্বিধং বা সর্পিঃ সপযস্কং পিবেত্|
ক্ষীরোত্থং বা সর্পিঃ ক্ষীরানুপানং কপিঞ্জলরসাশী ক্ষীরাশী বা লিহ্যাত্||২০||
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यस्तु पित्तातिसारी पित्तलान्यासेवेत तस्य पित्तमतिवृद्धं रक्तातिसारं तृड्दाहमोहज्वरशूलपायुपाकांश्च करोति|
तत्र क्षीरमाजं न्यग्रोधादिप्रसवशृतं सितामधुयुक्तमाहारे गुदप्रक्षालने च विदध्यात्|
तद्विधं वा सर्पिः सपयस्कं पिबेत्|
क्षीरोत्थं वा सर्पिः क्षीरानुपानं कपिञ्जलरसाशी क्षीराशी वा लिह्यात्||२०||
Adhikarana raktAtisAre prayogAntarANi (21) · Śloka 21
সল্লকীপ্রিযঙ্গুতিনিশশাল্মলীপ্লক্ষত্বক্সংসৃষ্টং সিদ্ধং বা সক্ষৌদ্রং ক্ষীরং পিবেত্|
যষ্টীলোধ্রশারিবাভির্বা শৃতং সমধুসিতম্|
তদ্বত্ কৃষ্ণতিলসমঙ্গোত্পলযষ্টীমধুভিঃ শশকপিঞ্জলপারাবততণ্ডূলীযকমুদ্গকাশ্মর্যবীজা দিরসাংশ্চ সেবেত|
ঘৃতভৃষ্টং বা রক্তমাজং মার্গং বা|
পূর্বোক্তান্ বা পুটপাকান্ মধুককৃষ্ণমৃত্তিকাশঙ্খ কল্কং বা সরুধিরং পিবেত্ তণ্ডুলোদকেন|
তেন বা সমা ক্ষিকং ফলিনীকল্কম্|
অথবা সসিতাক্ষৌদ্রং চন্দনম্|
এতে হি প্রযোগাঃ তৃষ্ণাদিপ্রশমনা রক্তাতিযোগঘ্নাশ্চ|
বাতোত্তরস্তু শতাবরীঘৃতং লিহ্যাত্|
সশর্করং বা নব নীতম্|
পিচ্ছিলস্বরসসাধিতং বা সর্পিঃ|
লাক্ষা পিপ্পলীশৃঙ্গীবেরকটুকেন্দ্রযবদার্বীত্বগ্ভির্ঘৃতং সিদ্ধং পেযা মণ্ডেন পীতমতিসারং ত্রিদোষমপি বারযেত্||২১||
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सल्लकीप्रियङ्गुतिनिशशाल्मलीप्लक्षत्वक्संसृष्टं सिद्धं वा सक्षौद्रं क्षीरं पिबेत्|
यष्टीलोध्रशारिवाभिर्वा शृतं समधुसितम्|
तद्वत् कृष्णतिलसमङ्गोत्पलयष्टीमधुभिः शशकपिञ्जलपारावततण्डूलीयकमुद्गकाश्मर्यबीजा दिरसांश्च सेवेत|
घृतभृष्टं वा रक्तमाजं मार्गं वा|
पूर्वोक्तान् वा पुटपाकान् मधुककृष्णमृत्तिकाशङ्ख कल्कं वा सरुधिरं पिबेत् तण्डुलोदकेन|
तेन वा समा क्षिकं फलिनीकल्कम्|
अथवा ससिताक्षौद्रं चन्दनम्|
एते हि प्रयोगाः तृष्णादिप्रशमना रक्तातियोगघ्नाश्च|
वातोत्तरस्तु शतावरीघृतं लिह्यात्|
सशर्करं वा नव नीतम्|
पिच्छिलस्वरससाधितं वा सर्पिः|
लाक्षा पिप्पलीशृङ्गीवेरकटुकेन्द्रयवदार्वीत्वग्भिर्घृतं सिद्धं पेया मण्डेन पीतमतिसारं त्रिदोषमपि वारयेत्||२१||
Adhikarana raktAtisAre picchAbastyanuvAsanam (22) · Śloka 22
যদা পুনর্বাযুনা বিড্বদ্ধং সশোণিতমল্পাল্পং সফেনং কৃচ্ছ্রাদুপবেশ্যতে তদা পূর্বোক্তং পিচ্ছাবস্তিং দদ্যাত্|
মধুরৌষধসিদ্ধেন চ সর্পিষাঽনুবাসযেত্|
প্রাযেণ হি দুর্বলগুদা গুদাশ্রযামযিনো ভবন্তি|
বিশেষতশ্চির কালাতীসারিণঃ|
অতিসারাতিপ্রবৃত্তৌ স্বস্থানবলবৃদ্ধো বাযুঃ পিত্তমনু বলমবাপ্য দুর্জযতরো ভবতি|
তস্মা ত্তোষামভীক্ষ্ণমনুবাসং প্রযুঞ্জীত||২২||
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यदा पुनर्वायुना विड्बद्धं सशोणितमल्पाल्पं सफेनं कृच्छ्रादुपवेश्यते तदा पूर्वोक्तं पिच्छाबस्तिं दद्यात्|
मधुरौषधसिद्धेन च सर्पिषाऽनुवासयेत्|
प्रायेण हि दुर्बलगुदा गुदाश्रयामयिनो भवन्ति|
विशेषतश्चिर कालातीसारिणः|
अतिसारातिप्रवृत्तौ स्वस्थानबलवृद्धो वायुः पित्तमनु बलमवाप्य दुर्जयतरो भवति|
तस्मा त्तोषामभीक्ष्णमनुवासं प्रयुञ्जीत||२२||
Adhikarana gudadAhe visheShaH (23) · Śloka 23
গুদদাহে পুনঃ পটোলমধুকমধূকক্ষীরিবৃক্ষাদিকষাযেণ সঘৃতশর্করাক্ষৌদ্রেণ বা গুদং তদাসন্নাশ্চ প্রদেশান্ সিঞ্চেত্|
শতধৌতাদিভির্ঘৃতৈশ্চ পিচূনভ্যঙ্গাংশ্চ দদ্যাত্|
পটোলাদীনামেব চ কল্কেন সঘৃতেন প্রদিহ্যাত্|
তচ্চূর্ণৌ র্ধাতকীলোধ্রমাষচূর্ণেন চ পাযুদ্বারমবচূর্ণযেত্|
এবমেব চ শূলে বাতহরতৈলপ্রদেহৈরুপাচরেত্|
যঃ পুনরেবমপি পিত্ত লান্যাসেবেত স শীঘ্রং গুদবলীষু পক্বাসু ব্যাপদ্যতে||২৩||
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गुददाहे पुनः पटोलमधुकमधूकक्षीरिवृक्षादिकषायेण सघृतशर्कराक्षौद्रेण वा गुदं तदासन्नाश्च प्रदेशान् सिञ्चेत्|
शतधौतादिभिर्घृतैश्च पिचूनभ्यङ्गांश्च दद्यात्|
पटोलादीनामेव च कल्केन सघृतेन प्रदिह्यात्|
तच्चूर्णौ र्धातकीलोध्रमाषचूर्णेन च पायुद्वारमवचूर्णयेत्|
एवमेव च शूले वातहरतैलप्रदेहैरुपाचरेत्|
यः पुनरेवमपि पित्त लान्यासेवेत स शीघ्रं गुदवलीषु पक्वासु व्यापद्यते||२३||
Adhikarana shleShmAtisAracikitsA (24) · Śloka 24
শ্লেষ্মাতীসারং তু প্রাগেব নিতরামামপাচনার্থং লঙ্হ্ঘনেন সাধযেত্|
অনুবন্ধে চ পিবেত্ কষাযং মুস্তাভযাশুণ্ঠী বিল্বশলাটূনাম্|
বচাবিডঙ্গভূতীকদেবাদারুণাং বা|
পাথাতিবিষাকুষ্ঠচব্যকটুরোহিণীনাং বা|
চিত্রক পিপ্পলীদ্বযপিপ্পলীমূলানাং বা|
সুখাম্বুনা বা হিঙ্গ্বা দ্যলসকোক্তম্|
পথ্যাসৈন্ধবশুণ্ঠীচূর্ণং বা লিহ্যাদ্বা ত্রিকটুচূর্ণং ক্ষৌদ্রশর্করোপেতম্|
কপিত্থং ক্ষৌদ্রেণ বা|
কট্ফলং ব পিপ্পলীর্বা|
পুর্ববচ্চ সর্বং বাতপিত্তামরক্ত সংসর্গমপেক্ষ্য যথাযথমুপকল্পযেত্|
সশূলপ্রবাহিকস্য চ নিরামস্য বাতেঽধিকে বচাবিল্বপিপ্পলীকুষ্ঠশতা হ্বাকল্কযুক্তং সলবণং পিচ্ছাবস্তিমনুবাসনং চ কোষ্ণেন বিল্বতৈলেন বহুশো বচাদিগর্ভেণ বা তৈলেনেতি||২৪||
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श्लेष्मातीसारं तु प्रागेव नितरामामपाचनार्थं लङ्ह्घनेन साधयेत्|
अनुबन्धे च पिबेत् कषायं मुस्ताभयाशुण्ठी बिल्वशलाटूनाम्|
वचाविडङ्गभूतीकदेवादारुणां वा|
पाथातिविषाकुष्ठचव्यकटुरोहिणीनां वा|
चित्रक पिप्पलीद्वयपिप्पलीमूलानां वा|
सुखाम्बुना वा हिङ्ग्वा द्यलसकोक्तम्|
पथ्यासैन्धवशुण्ठीचूर्णं वा लिह्याद्वा त्रिकटुचूर्णं क्षौद्रशर्करोपेतम्|
कपित्थं क्षौद्रेण वा|
कट्फलं व पिप्पलीर्वा|
पुर्ववच्च सर्वं वातपित्तामरक्त संसर्गमपेक्ष्य यथायथमुपकल्पयेत्|
सशूलप्रवाहिकस्य च निरामस्य वातेऽधिके वचाबिल्वपिप्पलीकुष्ठशता ह्वाकल्कयुक्तं सलवणं पिच्छाबस्तिमनुवासनं च कोष्णेन बिल्वतैलेन बहुशो वचादिगर्भेण वा तैलेनेति||२४||
Adhikarana shleShmAtisAracikitsA (25) · Śloka 25
ভবতি চাত্র স্বস্থানে মারুতোঽবশ্যং বর্ধতে কফসংক্ষযাত্|
স বৃদ্ধঃ সহসা হন্যাত্তস্মাত্তং ত্বরযা জযেত্||২৫||
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भवति चात्र स्वस्थाने मारुतोऽवश्यं वर्धते कफसंक्षयात्|
स वृद्धः सहसा हन्यात्तस्मात्तं त्वरया जयेत्||२५||
Adhikarana bhayajashokajayoH kriyA (26) · Śloka 26
ভীশোকাভ্যামপি মরুচ্ছীঘ্রং কুপ্যত্যতস্তযোঃ|
কার্যা ক্রিযা বাতহরা হর্শণাশ্বাসনানি চ||২৬||
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भीशोकाभ्यामपि मरुच्छीघ्रं कुप्यत्यतस्तयोः|
कार्या क्रिया वातहरा हर्शणाश्वासनानि च||२६||
Adhikarana vigatAtisAra lakShaNam (27) · Śloka 27
যস্যোচ্চারাদ্বিনা মূত্রং পবনো বা প্রবর্ততে|
দীপ্তাগ্নের্লঘুকোষ্ঠস্য শান্তস্তস্যোদরামযঃ||২৭||
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यस्योच्चाराद्विना मूत्रं पवनो वा प्रवर्तते|
दीप्ताग्नेर्लघुकोष्ठस्य शान्तस्तस्योदरामयः||२७||
Adhikarana saMkShepeto punaH kramasmaraNam (28) · Śloka 28
আমস্য পাকো মলসংগ্রহোঽনু ন সংগ্রহে রুগ্গুদনাভিজন্মা|
বিলঙ্ঘনৈর্গ্রাহিভিরীরণঘ্নৈঃ ক্রমেণ তৈস্তৈর্বিধিভির্বিধেযঃ||২৮||
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आमस्य पाको मलसंग्रहोऽनु न संग्रहे रुग्गुदनाभिजन्मा|
विलङ्घनैर्ग्राहिभिरीरणघ्नैः क्रमेण तैस्तैर्विधिभिर्विधेयः||२८||
Adhikarana purIShabandhahetuH (29) · Śloka 29
ন রিক্তকোষ্ঠস্য পুরীষবন্ধো ন রূক্ষকুক্ষেঃ সুহিতস্য চাতি|
পিত্তাস্রতোঽন্যত্র চ চাতিশীতৈর ত্যুষ্ণতীক্ষ্ণৈর্ন কদাচিদেব||২৯||
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न रिक्तकोष्ठस्य पुरीषबन्धो न रूक्षकुक्षेः सुहितस्य चाति|
पित्तास्रतोऽन्यत्र च चातिशीतैर त्युष्णतीक्ष्णैर्न कदाचिदेव||२९||
Adhikarana pravAhikopayogI kalpanAsaMgrahaH (11) · Śloka 11
খলরসদাধিকা যমকদাডিমসারকৃতা দধি সগুডং পযোঽসিততিলাশ্চ সুজর্জরিতাঃ|
সলবণমারুতঘ্নগণসাধিততৈলমলং ঘৃতমপি বা প্রবাহণকৃতাং বিজযেদ্রুজাম্||৩০||
ইতি বৈদ্যপতিসিংহগুপ্তস্য সূনোর্বগ্ভটস্য কৃতাব ষ্টাঙ্গসংগ্রহসংহিতাযাং চিকিত্সিতস্থানেঽতীসার চিকিত্সিতন্নামৈকাদশোঽধ্যাযঃ||১১||
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खलरसदाधिका यमकदाडिमसारकृता दधि सगुडं पयोऽसिततिलाश्च सुजर्जरिताः|
सलवणमारुतघ्नगणसाधिततैलमलं घृतमपि वा प्रवाहणकृतां विजयेद्रुजाम्||३०||
इति वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वग्भटस्य कृताव ष्टाङ्गसंग्रहसंहितायां चिकित्सितस्थानेऽतीसार चिकित्सितन्नामैकादशोऽध्यायः||११||