Adhikarana pratij~jA (1) · Śloka 1
অথাতো ভূতবিজ্ঞানীযং নামাধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ| ইতি হ স্মাহুরাত্রেযাদযো মহর্ষযঃ||১||
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अथातो भूतविज्ञानीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः| इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः||१||
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Adhikarana pratij~jA (1) · Śloka 1
অথাতো ভূতবিজ্ঞানীযং নামাধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ| ইতি হ স্মাহুরাত্রেযাদযো মহর্ষযঃ||১||
अथातो भूतविज्ञानीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः| इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः||१||
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Adhikarana BUtalokanirdeshaH (2) · Śloka 2
অষ্টাদশ ভূতাধিপতযঃ| তদ্যথা-সুরাসুরগন্ধর্বারগ যক্ষব্রহ্মরাক্ষসরাক্ষসপিশাচপ্রেতকূষ্মাণ্ডকাখোর্দমৌকি রণবেতালপিতরঃ ঋষিগুরুবৃদ্ধসিদ্ধাশ্চ| তে পুনঃ পৃথক্ কোটিপরিবারাঃ| তেষামপি প্রত্যেকমপরিসঙ্খ্যেযঃ পরি বার ইত্যনন্তো ভূতলোকঃ||২||
अष्टादश भूताधिपतयः| तद्यथा-सुरासुरगन्धर्वारग यक्षब्रह्मराक्षसराक्षसपिशाचप्रेतकूष्माण्डकाखोर्दमौकि रणवेतालपितरः ऋषिगुरुवृद्धसिद्धाश्च| ते पुनः पृथक् कोटिपरिवाराः| तेषामपि प्रत्येकमपरिसङ्ख्येयः परि वार इत्यनन्तो भूतलोकः||२||
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Adhikarana sAmAnyena BUtasvaBAvaH (3) · Śloka 3
সর্বেঽপি চ প্রাযেণাহারকামা নিশাঽর্ধবিচারিণো ভযা নকা মাংসাসৃগ্বসাশিনঃ||৩||
सर्वेऽपि च प्रायेणाहारकामा निशाऽर्धविचारिणो भया नका मांसासृग्वसाशिनः||३||
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Adhikarana BUtasaMj~jAvisheShe hetuH (4) · Śloka 4
অপি চ সুরাসুরাদিসংবাসসংসর্গাত্তচ্ছীলাচারকর্মতযা চ তত্সংজ্ঞাং লভন্তে||৪||
अपि च सुरासुरादिसंवाससंसर्गात्तच्छीलाचारकर्मतया च तत्संज्ञां लभन्ते||४||
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Adhikarana BUtAnupraveshahetuH sampraptishca (5) · Śloka 5
তেষাং পুনরনুপ্রবেশে কারণং সদ্যঃ পূর্বকৃতো বা বিশেষেণ প্রজ্ঞাপরাধঃ| তেন হি কামক্রোধলোভমোহাদিজনিতেন প্রলুপ্তধর্মো ভিন্ন ব্রতাচারশৌচো মলীমসঃ পূজ্যানতিক্রামন্নাত্মানমুপহন্তি| ততস্তমাত্মহনমবতারগবেষিণো দেবাদিগ্রহা অপ্যনুঘ্নন্তি| তদ্বদুন্মাদাপস্মারোপপ্লুতচিত্তং তথা জ্বরাদ্যামযোপহতমপি| বিশেষতশ্চ ব্রণিনঃ পূযাসৃক্স্নেহগন্ধেন||৫||
तेषां पुनरनुप्रवेशे कारणं सद्यः पूर्वकृतो वा विशेषेण प्रज्ञापराधः| तेन हि कामक्रोधलोभमोहादिजनितेन प्रलुप्तधर्मो भिन्न व्रताचारशौचो मलीमसः पूज्यानतिक्रामन्नात्मानमुपहन्ति| ततस्तमात्महनमवतारगवेषिणो देवादिग्रहा अप्यनुघ्नन्ति| तद्वदुन्मादापस्मारोपप्लुतचित्तं तथा ज्वराद्यामयोपहतमपि| विशेषतश्च व्रणिनः पूयासृक्स्नेहगन्धेन||५||
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Adhikarana BUtAveshakAlAH (6) · Śloka 6
এবংবিধাংস্তু পুরুষনেষ্বাঘাতকালেষ্বভিগচ্ছন্তি| তদ্যথা-পাপস্য কর্মণঃ সমারম্ভে| পূর্বকৃতস্য বা পরিণামকালে| একস্য বা শূন্যগৃহনিবাসে| চতুষ্পথাধিষ্ঠানে ব| সন্ধ্যাবেলাযামপ্রযতভাবে বা পক্ষসন্ধিষু যা মিথুনীভাবে| রজস্বলাভিগমনে বা| বিগুণে বাধ্যা পনহোমবলিমঙ্গলপ্রযোগে| নিযমব্রহ্মচর্যব্রতভঙ্গে বা| মহাহবে বা| দেশপুরকুলবিনাশে বা| মহাগ্রহোপগমনে বা| স্ত্রিযা বা প্রজননকালে| বিবিধভূতাশুচিসংস্পর্শে বা| বমনবিরেচনরুধিরস্রাবে বা| অশুচেরপ্রযতস্য বা চৈত্যদেবাযতনাভিগমনে বা| মাংসমধুগুডাতিলমদ্যোচ্ছিষ্টে বা| দিগ্বাসসি বা| নিশি নগরচতুষ্পথোপবনশ্মশা নাভিগমনে বা| দ্বিজগুরুসুরযতিপূজ্যব্যতিক্রমে বা||৬||
एवंविधांस्तु पुरुषनेष्वाघातकालेष्वभिगच्छन्ति| तद्यथा-पापस्य कर्मणः समारम्भे| पूर्वकृतस्य वा परिणामकाले| एकस्य वा शून्यगृहनिवासे| चतुष्पथाधिष्ठाने व| सन्ध्यावेलायामप्रयतभावे वा पक्षसन्धिषु या मिथुनीभावे| रजस्वलाभिगमने वा| विगुणे वाध्या पनहोमबलिमङ्गलप्रयोगे| नियमब्रह्मचर्यव्रतभङ्गे वा| महाहवे वा| देशपुरकुलविनाशे वा| महाग्रहोपगमने वा| स्त्रिया वा प्रजननकाले| विविधभूताशुचिसंस्पर्शे वा| वमनविरेचनरुधिरस्रावे वा| अशुचेरप्रयतस्य वा चैत्यदेवायतनाभिगमने वा| मांसमधुगुडातिलमद्योच्छिष्टे वा| दिग्वाससि वा| निशि नगरचतुष्पथोपवनश्मशा नाभिगमने वा| द्विजगुरुसुरयतिपूज्यव्यतिक्रमे वा||६||
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Adhikarana surAdInAmAveshaprakAraH (7) · Śloka 7
তত্রাবলোকযন্তো জনযন্তি মনোবিকারং সুরাসুরগ্রহাঃ| স্পৃশন্তো গন্ধর্বাঃ| সমাবিশন্তো ভুজগাঃ| যক্ষাশ্চাত্মগন্ধমাঘ্রাপযন্তঃ| রাক্ষসা বাহযন্তোঽধিরুহ্য| তথৈব পিশাচাদ্যাঃ| দর্শযন্তঃ পিতরোঽভিশপন্ত ঋষিগুরু বৃদ্ধসিদ্ধাঃ||৭||
तत्रावलोकयन्तो जनयन्ति मनोविकारं सुरासुरग्रहाः| स्पृशन्तो गन्धर्वाः| समाविशन्तो भुजगाः| यक्षाश्चात्मगन्धमाघ्रापयन्तः| राक्षसा वाहयन्तोऽधिरुह्य| तथैव पिशाचाद्याः| दर्शयन्तः पितरोऽभिशपन्त ऋषिगुरु वृद्धसिद्धाः||७||
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Adhikarana surAdInAmAveshapAtrANi kAlashca (8) · Śloka 8
তত্র শীলবন্তং চোক্ষাচারং শুক্লাম্বরধরং তপঃস্বা ধ্যাযপরং প্রাযঃ শুক্লপ্রতিপদি ত্রযোদশ্যাং চতুর্দশ্যাং পৌর্ণমাস্যাং বা দেবা গৃহ্ণন্তি| ক্রোধনং কদর্যমাত্মসম্ভাবিনং কুলরূপগর্বিতং কৃষ্ণদ্বাদশ্যাং কৃষ্ণত্রযোদশ্যাং সন্ধ্য যোশ্চাসুরাঃ| প্রিযনৃত্তগীতবাদিত্রগন্ধমাল্যাম্বরং পরদার রতম্ চোক্ষাচারং প্রাযশ্চতুর্থ্যামষ্টম্যাং দ্বাদশ্যাং চতুর্দশ্যাং চ গন্ধর্বাঃ| স্বপ্নশীলং চপলমনিমিত্তক্রোধনমর্থসিদ্ধং ব্রাহ্মণং প্রাযঃ পঞ্চম্যাং সন্ধ্যযোর্মধ্যাহ্নে চ নাগাঃ| সত্ত্ববলরূপগান্ধর্বধনশৌর্যযুক্তং মাল্যানুলেপনহা স্যপ্রিযমতিব্যাকরণং প্রাযঃ শুক্লসপ্তম্যামেকাদশ্যাঞ্চ যক্ষাঃ| স্বাধ্যাযতপোব্রতচর্যাদেবযতিগুরুপূজারতং ভ্রষ্টশৌচং বা ব্রাহ্মণমব্রাহ্মণং বা ব্রহ্মবাদিনং শূরং মানিনং দেবাগার সলিলক্রীডনপ্রিযং চ স্খলিতব্রহ্মচর্যং প্রাযঃ শুক্ল পঞ্চম্যামষ্টম্যাং পূর্ণচন্দ্রদর্শনে সন্ধ্যাসু চ ব্রহ্মরাক্ষসাঃ| হীনস্ত্বং পিশুনং স্তেনং লুব্ধং শঠং প্রাযো দ্বিতীযাতৃতী যাষ্টমীষু রাক্ষসপিশাচাদযঃ| কলিপানপ্রিযমসূযাবন্তং পরুষভাষিণং বহ্বাশিনং চ কৃষ্ণনবমীদ্বাদশ্যোর্নিশি চ রাক্ষসাঃ| আত্মশ্লাঘিনং কূটসাক্ষ্যপ্রদং পরোপতাপিনং চ চতুর্দশ্যাং পিশাচাদযঃ| মাতাপিতৃগুরুবৃদ্ধসিদ্ধাচার্যোপসেবিনং প্রাযো দশম্যামমা বাস্যাং চ পিতরঃ| তদ্বিধমেব চ প্রাযঃ ষষ্ঠ্যাং নবম্যাং চ গুরুবৃদ্ধসিদ্ধাঃ| তথৈব চ স্নানশুচিবিবিক্তসেবিনং ধর্মশাস্ত্রশ্রুতিকাব্যকুশলমৃষযঃ||৮||
तत्र शीलवन्तं चोक्षाचारं शुक्लाम्बरधरं तपःस्वा ध्यायपरं प्रायः शुक्लप्रतिपदि त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां पौर्णमास्यां वा देवा गृह्णन्ति| क्रोधनं कदर्यमात्मसम्भाविनं कुलरूपगर्वितं कृष्णद्वादश्यां कृष्णत्रयोदश्यां सन्ध्य योश्चासुराः| प्रियनृत्तगीतवादित्रगन्धमाल्याम्बरं परदार रतम् चोक्षाचारं प्रायश्चतुर्थ्यामष्टम्यां द्वादश्यां चतुर्दश्यां च गन्धर्वाः| स्वप्नशीलं चपलमनिमित्तक्रोधनमर्थसिद्धं ब्राह्मणं प्रायः पञ्चम्यां सन्ध्ययोर्मध्याह्ने च नागाः| सत्त्वबलरूपगान्धर्वधनशौर्ययुक्तं माल्यानुलेपनहा स्यप्रियमतिव्याकरणं प्रायः शुक्लसप्तम्यामेकादश्याञ्च यक्षाः| स्वाध्यायतपोव्रतचर्यादेवयतिगुरुपूजारतं भ्रष्टशौचं वा ब्राह्मणमब्राह्मणं वा ब्रह्मवादिनं शूरं मानिनं देवागार सलिलक्रीडनप्रियं च स्खलितब्रह्मचर्यं प्रायः शुक्ल पञ्चम्यामष्टम्यां पूर्णचन्द्रदर्शने सन्ध्यासु च ब्रह्मराक्षसाः| हीनस्त्वं पिशुनं स्तेनं लुब्धं शठं प्रायो द्वितीयातृती याष्टमीषु राक्षसपिशाचादयः| कलिपानप्रियमसूयावन्तं परुषभाषिणं बह्वाशिनं च कृष्णनवमीद्वादश्योर्निशि च राक्षसाः| आत्मश्लाघिनं कूटसाक्ष्यप्रदं परोपतापिनं च चतुर्दश्यां पिशाचादयः| मातापितृगुरुवृद्धसिद्धाचार्योपसेविनं प्रायो दशम्याममा वास्यां च पितरः| तद्विधमेव च प्रायः षष्ठ्यां नवम्यां च गुरुवृद्धसिद्धाः| तथैव च स्नानशुचिविविक्तसेविनं धर्मशास्त्रश्रुतिकाव्यकुशलमृषयः||८||
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Adhikarana grahagrahaNapUrvarUpANi (9) · Śloka 9
তেষাং তু গ্রহীষ্যতাং পূর্বারূপাণি ভবন্তি| তদ্যথা-দেব গোব্রাহ্মণতপস্বিনাং হিংসারুচিত্বং নৃশংসাভিপ্রাযতা কোপ নত্বমরতিরোজোবর্ণচ্ছাযাবলবপুষাং চোপতপ্তিঃ স্বপ্নে দেবাদিভির্ভর্ত্সনং প্রবর্ত্তনং চ||৯||
तेषां तु ग्रहीष्यतां पूर्वारूपाणि भवन्ति| तद्यथा-देव गोब्राह्मणतपस्विनां हिंसारुचित्वं नृशंसाभिप्रायता कोप नत्वमरतिरोजोवर्णच्छायाबलवपुषां चोपतप्तिः स्वप्ने देवादिभिर्भर्त्सनं प्रवर्त्तनं च||९||
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Adhikarana devagrahAviShTe lakShaNAni (10) · Śloka 10
তত্র সৌম্যদৃষ্টিং গম্ভীরমপ্রধৃষ্যমকোপনং শুচিমনিদ্রং ভোজ নানাভিলাষিণমল্পস্বেদমূত্রপুরীষবাচং সংস্কৃতবাদিনং দেবদ্বিজগুরুভক্তং শুক্লমাল্যাম্বরসরিত্পুলিনশৈলোচ্চ ভবনদধিক্ষীরসুরভিপ্রিযং চিরাদক্ষিণী নিমীলযন্তংবর প্রদাতারং শুভগন্ধং বর্চস্বিনং ফুল্লপদ্মোপমমুখং দেবগ্রহেণ গৃহীতং বিদ্যাত্| তত্রাপি গোবৃষমিব নদন্তং দীপ্তমুখনযনমাদীপ্তেন স্বরেণ সর্বমা ভাষমাণমীশ্বরেণ| মেঘস্তনিতবিদ্যুদৃষ্টীর্বাচা বিসৃজন্তমিন্দ্রেণ| ধনানি বাচা প্রযচ্ছন্তমাচ্ছিন্দন্তং চ ধনদেন| সুরাসবসমগন্ধং কাষ্ঠতৃণরজ্জ্বাদি সর্বং পাশমভিমন্যমানং বরুণেন||১০||
तत्र सौम्यदृष्टिं गम्भीरमप्रधृष्यमकोपनं शुचिमनिद्रं भोज नानाभिलाषिणमल्पस्वेदमूत्रपुरीषवाचं संस्कृतवादिनं देवद्विजगुरुभक्तं शुक्लमाल्याम्बरसरित्पुलिनशैलोच्च भवनदधिक्षीरसुरभिप्रियं चिरादक्षिणी निमीलयन्तंवर प्रदातारं शुभगन्धं वर्चस्विनं फुल्लपद्मोपममुखं देवग्रहेण गृहीतं विद्यात्| तत्रापि गोवृषमिव नदन्तं दीप्तमुखनयनमादीप्तेन स्वरेण सर्वमा भाषमाणमीश्वरेण| मेघस्तनितविद्युदृष्टीर्वाचा विसृजन्तमिन्द्रेण| धनानि वाचा प्रयच्छन्तमाच्छिन्दन्तं च धनदेन| सुरासवसमगन्धं काष्ठतृणरज्ज्वादि सर्वं पाशमभिमन्यमानं वरुणेन||१०||
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Adhikarana asurAviShTe lakShaNAni (11) · Śloka 11
জিহ্বাদৃষ্টিং দুষ্টাত্মানং ক্রোধনমতৃপ্তং সস্বেদগাত্রং দেব ব্রাহ্মণগুরুদ্বেষিণং নির্ভযমভিমানিনং শূরং ব্যবসাযিনং রুদ্রোঽহমিন্দ্রোঽহমুপেন্দ্রোঽহং স্কন্দোঽহং বিশাখেঽহমি ত্যাদিভাষমাণং বিকৃতবাচমসকৃদ্ধসন্তং সুরামিষরুচিং দন্তৈর্নখৈশ্চ পরান্ হিংসন্তমসুরেণ||১১||
जिह्वादृष्टिं दुष्टात्मानं क्रोधनमतृप्तं सस्वेदगात्रं देव ब्राह्मणगुरुद्वेषिणं निर्भयमभिमानिनं शूरं व्यवसायिनं रुद्रोऽहमिन्द्रोऽहमुपेन्द्रोऽहं स्कन्दोऽहं विशाखेऽहमि त्यादिभाषमाणं विकृतवाचमसकृद्धसन्तं सुरामिषरुचिं दन्तैर्नखैश्च परान् हिंसन्तमसुरेण||११||
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Adhikarana gandharvAviShTe lakShaNAni (12) · Śloka 12
স্বাচারং হৃষ্টাত্মানং শুভগন্ধমল্পব্যবহারং নৃত্যন্তং গাযন্তং মুখবাদ্যানি কুর্বন্তং প্রিযোদ্যানপুলিনরক্তবস্ত্রস্নানমা- ল্যানুলেপনধূপান্নপানহাসলীলা শৃঙ্গারকথাগান্ধর্বং গন্ধ র্বেণ| তত্রাপি শিরো ধুনানং কলহং কুর্বন্তং সংরম্ভেণ জা-গরূকং পঠন্তং হসন্তং হসনেন||১২||
स्वाचारं हृष्टात्मानं शुभगन्धमल्पव्यवहारं नृत्यन्तं गायन्तं मुखवाद्यानि कुर्वन्तं प्रियोद्यानपुलिनरक्तवस्त्रस्नानमा- ल्यानुलेपनधूपान्नपानहासलीला शृङ्गारकथागान्धर्वं गन्ध र्वेण| तत्रापि शिरो धुनानं कलहं कुर्वन्तं संरम्भेण जा-गरूकं पठन्तं हसन्तं हसनेन||१२||
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Adhikarana uragAviShTe lakShaNAni (13) · Śloka 13
ক্রোধনমনিশং নিঃশ্বসন্তং ভ্রমন্তমাতপত্রাত্ ত্রস্যন্তং রক্তাক্ষং স্তব্ধদৃষ্টিং জিহ্বাং লোলযন্তং সৃক্কিণ্যৌ লিহানমধোমুখ শাযিনং চলং বক্রগামিনং বিলমবলোক্য সর্পবদূর্ধ্বং প্রসরন্তং জলৌঘঘনদুন্নুভিস্বনৈর্হৃষ্যন্তং ক্ষীরঘৃতগুডমধু স্নানমাল্যপ্রিযং গাত্রাণি কম্পযন্তং দন্তৈঃ খাদন্তং জলেঽবতীর্ণমুত্তরণমনিচ্ছন্তমুরগেণ||১৩||
क्रोधनमनिशं निःश्वसन्तं भ्रमन्तमातपत्रात् त्रस्यन्तं रक्ताक्षं स्तब्धदृष्टिं जिह्वां लोलयन्तं सृक्किण्यौ लिहानमधोमुख शायिनं चलं वक्रगामिनं बिलमवलोक्य सर्पवदूर्ध्वं प्रसरन्तं जलौघघनदुन्नुभिस्वनैर्हृष्यन्तं क्षीरघृतगुडमधु स्नानमाल्यप्रियं गात्राणि कम्पयन्तं दन्तैः खादन्तं जलेऽवतीर्णमुत्तरणमनिच्छन्तमुरगेण||१३||
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Adhikarana yakShAviShTe lakShaNAni (14) · Śloka 14
অসকৃত্ স্বপ্নরোদনহাসনৃত্যগীতপাঠকথান্নপানস্নান মাল্যধূপগন্ধরক্তবস্ত্ররতিং রক্তত্রস্তবিপ্লুতাক্ষং দ্রুতং সগর্বং মত্তমিব গচ্ছন্তং বস্ত্রান্তমুত্কর্ষযন্তং চলিতাগ্রহস্তং বহু ভাষিণং স্ত্রীলোলুপং মদ্যামিষপ্রিযং সন্নহ্য শস্ত্রং মৃগযমাণ মতিবলমব্যথং হৃষ্টং তুষ্টমল্পরোষং কিং কস্মৈ দদামীতি বাদিনং শুভগন্ধং বর্চস্বিনং দ্বিজাতিবৈদ্যপরিভাবিনং রহস্য ভাষিণং যক্ষেণ||১৪||
असकृत् स्वप्नरोदनहासनृत्यगीतपाठकथान्नपानस्नान माल्यधूपगन्धरक्तवस्त्ररतिं रक्तत्रस्तविप्लुताक्षं द्रुतं सगर्वं मत्तमिव गच्छन्तं वस्त्रान्तमुत्कर्षयन्तं चलिताग्रहस्तं बहु भाषिणं स्त्रीलोलुपं मद्यामिषप्रियं सन्नह्य शस्त्रं मृगयमाण मतिबलमव्यथं हृष्टं तुष्टमल्परोषं किं कस्मै ददामीति वादिनं शुभगन्धं वर्चस्विनं द्विजातिवैद्यपरिभाविनं रहस्य भाषिणं यक्षेण||१४||
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Adhikarana yakShavisheShAviShTe lakShaNAni (15) · Śloka 15
তত্রাপি হৃষিতরোমাণমূর্ধ্বেক্ষণং প্রহৃষ্টনযনং চণ্ডং পরুষং মহানিনাদং মণিবরেণ| রহোহসিতনৃত্যগীতান্যাচরন্ত মাকীর্ণে মৌনমাসেবমানং বিকটেন||১৫||
तत्रापि हृषितरोमाणमूर्ध्वेक्षणं प्रहृष्टनयनं चण्डं परुषं महानिनादं मणिवरेण| रहोहसितनृत्यगीतान्याचरन्त माकीर्णे मौनमासेवमानं विकटेन||१५||
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Adhikarana brahmarAkShasAviShTe lakShaNAni (16) · Śloka 16
হাসনৃত্তপ্রিযমাক্রোশিনং প্রধাবিনং দেবদ্বিজভিষগ্দ্বেষিণং মন্ত্র বেদশাস্ত্রাভিধাযিনং কাষ্ঠশস্ত্রাদিভিশ্চাত্মানমাঘ্নন্তং ছিদ্রপ্রহারিণং বৈদ্যরন্ধ্রান্বেষিণং ভোঃশব্দবাদিনং পরুষং রৌদ্র চেষ্টং শীঘ্রগামিনং ব্রহ্মরাক্ষসেন| তত্রাপি বিকৃতস্বরং ভাষযন্তমুত্রাসযন্তং ব্রহ্মবাদিনং সংস্কৃতভাষিণং বহুশ স্তোযং যাচন্তং যজ্ঞসেনেন||১৬||
हासनृत्तप्रियमाक्रोशिनं प्रधाविनं देवद्विजभिषग्द्वेषिणं मन्त्र वेदशास्त्राभिधायिनं काष्ठशस्त्रादिभिश्चात्मानमाघ्नन्तं छिद्रप्रहारिणं वैद्यरन्ध्रान्वेषिणं भोःशब्दवादिनं परुषं रौद्र चेष्टं शीघ्रगामिनं ब्रह्मराक्षसेन| तत्रापि विकृतस्वरं भाषयन्तमुत्रासयन्तं ब्रह्मवादिनं संस्कृतभाषिणं बहुश स्तोयं याचन्तं यज्ञसेनेन||१६||
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Adhikarana rAkShasAviShTe lakShaNAni (17) · Śloka 17
সক্ড়্রোধদৃষ্টিং ভ্রূকুটিমুদ্বহন্তং ভৈরবাস্যং ত্বরিতমভিধাবন্তং রুবন্তং সসম্ভ্রমং প্রহরন্তং নষ্টনিদ্রং নিশাবিচারিণমন্ন দ্বেষিণমনাহারমপ্যতিবলিনমন্নকালে হসন্তং নির্লজ্জং শূরং রোষণমপ্রিযবাদিনমশুচিং স্ত্রীমদ্যমাংসরক্তমাল্যপ্রিযং রক্তমামিবং বা দৃষ্ট্বোষ্ঠৌ পরিলিহন্তং দীনং শঙ্কিতং ধাব ন্তমকস্মাদ্রুদন্তং হসন্তং গাযন্তং নৃত্যন্তং নিরর্থকং পরি ভাষমাণং রাক্ষসেন| তত্রাপি পরুষচ্ছবিং ভূমিং তাডযন্ত মকস্মাদ্রুদন্তং বিশাখেন| ভিন্নগদ্গদকণ্ঠমঙ্গানি ভঞ্জ যন্তং জিহ্বাং পরিলিহানমক্ষমালযা জপমানং শৌচমভীক্ষ্ণং কুর্বাণং সঙমেন| মেঘবিদ্যুদুদযাযাসতে ক্রুধ্যন্তং জলবৃষ্টিং সমন্তান্মন্যমানং শকটনিষ্পীডিনং বিদ্যুন্মালিনা| আম মাংসপলমূলকাপূপপরমান্নযাচিনং রূক্ষচ্ছবিং বিরূ পাক্ষেণ||১৭||
सक्ऱ्रोधदृष्टिं भ्रूकुटिमुद्वहन्तं भैरवास्यं त्वरितमभिधावन्तं रुवन्तं ससम्भ्रमं प्रहरन्तं नष्टनिद्रं निशाविचारिणमन्न द्वेषिणमनाहारमप्यतिबलिनमन्नकाले हसन्तं निर्लज्जं शूरं रोषणमप्रियवादिनमशुचिं स्त्रीमद्यमांसरक्तमाल्यप्रियं रक्तमामिवं वा दृष्ट्वोष्ठौ परिलिहन्तं दीनं शङ्कितं धाव न्तमकस्माद्रुदन्तं हसन्तं गायन्तं नृत्यन्तं निरर्थकं परि भाषमाणं राक्षसेन| तत्रापि परुषच्छविं भूमिं ताडयन्त मकस्माद्रुदन्तं विशाखेन| भिन्नगद्गदकण्ठमङ्गानि भञ्ज यन्तं जिह्वां परिलिहानमक्षमालया जपमानं शौचमभीक्ष्णं कुर्वाणं सङमेन| मेघविद्युदुदयायासते क्रुध्यन्तं जलवृष्टिं समन्तान्मन्यमानं शकटनिष्पीडिनं विद्युन्मालिना| आम मांसपलमूलकापूपपरमान्नयाचिनं रूक्षच्छविं विरू पाक्षेण||१७||
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Adhikarana pishAcAviShTe lakShaNAni (18) · Śloka 18
অস্বস্থচিত্তং নৈকত্র তিষ্ঠন্তং পরিধাবিনং দযিতনৃত্যগীত হাসোচ্ছিষ্টমদ্যমাংসশূন্যনিবাসরতিং পুরস্তাদভিঘ্নন্তং নির্ভর্ত্সনাদ্দীনশঙ্কিতবদনং নখৈরাত্মবপুষি লিখন্তং নষ্ট স্মৃতিং বদ্ধাবদ্ধভাষিণমকস্মাদ্রুদন্তং দুঃখান্যাবেদযমান মুধ্বস্তরূক্ষদেহস্বরং দুর্গন্ধমশুচিং নগ্নং মলিনং রথ্যাচৈল তৃণাভরণাং সঙ্করকূটকাষ্ঠাশ্বারোহিণং লোলং বহ্বাশিনং পিশাচেন||১৮||
अस्वस्थचित्तं नैकत्र तिष्ठन्तं परिधाविनं दयितनृत्यगीत हासोच्छिष्टमद्यमांसशून्यनिवासरतिं पुरस्तादभिघ्नन्तं निर्भर्त्सनाद्दीनशङ्कितवदनं नखैरात्मवपुषि लिखन्तं नष्ट स्मृतिं बद्धाबद्धभाषिणमकस्माद्रुदन्तं दुःखान्यावेदयमान मुध्वस्तरूक्षदेहस्वरं दुर्गन्धमशुचिं नग्नं मलिनं रथ्याचैल तृणाभरणां सङ्करकूटकाष्ठाश्वारोहिणं लोलं बह्वाशिनं पिशाचेन||१८||
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Adhikarana pretAviShTe lakShaNAni (19) · Śloka 19
তত্রাপি ভোজনং দৃষ্ট্বা হসন্তং বিস্বরং ক্রোশন্তং নিত্যভীতং কশ্মলেন| সর্বগাত্রাণি স্পন্দযন্তং মুহুর্মুহুর্ধাবন্তং ভীষ যমাণং কুশেন| বৈদ্য দৃষ্ট্বা কুপ্যন্তং ভ্রমদ্ভোজিন বহ্বাশিনং ভস্মগণ্ঠনশযনং স্ত্রিযোমার্গে রুন্ধানং মূত্রপুরীষবিমর্দিনং নিস্তেজসা| প্রেতাকৃতিচেষ্টাগন্ধং তৃণচ্ছেদিনং ভীতমাহার দ্বেষিণং প্রেতেন||১৯||
तत्रापि भोजनं दृष्ट्वा हसन्तं विस्वरं क्रोशन्तं नित्यभीतं कश्मलेन| सर्वगात्राणि स्पन्दयन्तं मुहुर्मुहुर्धावन्तं भीष यमाणं कुशेन| वैद्य दृष्ट्वा कुप्यन्तं भ्रमद्भोजिन बह्वाशिनं भस्मगण्ठनशयनं स्त्रियोमार्गे रुन्धानं मूत्रपुरीषविमर्दिनं निस्तेजसा| प्रेताकृतिचेष्टागन्धं तृणच्छेदिनं भीतमाहार द्वेषिणं प्रेतेन||१९||
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Adhikarana kUShmANDAviShTe lakShaNAni (20) · Śloka 20
বহুপ্রলাপমুগ্রবাক্যং বিলম্বিতগতিং কৃষ্ণবদনং শূনপ্রল ম্ববৃষণং কূষ্মাণ্ডেন||২০||
बहुप्रलापमुग्रवाक्यं विलम्बितगतिं कृष्णवदनं शूनप्रल म्बवृषणं कूष्माण्डेन||२०||
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Adhikarana kAkhordAviShTe lakShaNAni (21) · Śloka 21
নগ্নং ধাবন্তমকস্মাদশ্মকাষ্ঠাদি গৃহীত্বা ভ্রমন্তং তৃণ চীরমাল্যনিবসনমুত্রস্তদৃষ্টিং পরুষাভিধযিনং শ্মশান শূন্যৈকবৃক্ষরথ্যানিষেবিণং তিলান্নমদ্যামিষসক্তদৃষ্টিং কাখোর্দেন||২১||
नग्नं धावन्तमकस्मादश्मकाष्ठादि गृहीत्वा भ्रमन्तं तृण चीरमाल्यनिवसनमुत्रस्तदृष्टिं परुषाभिधयिनं श्मशान शून्यैकवृक्षरथ्यानिषेविणं तिलान्नमद्यामिषसक्तदृष्टिं काखोर्देन||२१||
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Adhikarana maukiraNAviShTe lakShaNAni (22) · Śloka 22
উগ্রবাদিনং রক্তত্রস্তনেন্নমন্নাভিলাষিণমুদকং প্রার্থযমানং মৌকিরণেন||২২||
उग्रवादिनं रक्तत्रस्तनेन्नमन्नाभिलाषिणमुदकं प्रार्थयमानं मौकिरणेन||२२||
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Adhikarana vetAlAviShTe lakShaNAni (23) · Śloka 23
সত্যবাদিনং পরিবেপিনং ধূপগন্ধমাল্যরতিমতিনিদ্রালুং বেতা লেন||২৩||
सत्यवादिनं परिवेपिनं धूपगन्धमाल्यरतिमतिनिद्रालुं वेता लेन||२३||
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Adhikarana pitRugrahAviShTe lakShaNAni (24) · Śloka 24
অপ্রসন্নদৃষ্টিং চলন্নেত্রপক্ষ্মাণং শঙ্কিতেক্ষণং দীনবদনং সং শুষ্কতালুং নিদ্রালুং প্রতিহতবাচমপসব্যবস্ত্রমল্পাগ্নি মরোচকিনং তিলগুডপাযসমাংসরুচিং চ পিতৃগ্রহেণ||২৪||
अप्रसन्नदृष्टिं चलन्नेत्रपक्ष्माणं शङ्कितेक्षणं दीनवदनं सं शुष्कतालुं निद्रालुं प्रतिहतवाचमपसव्यवस्त्रमल्पाग्नि मरोचकिनं तिलगुडपायसमांसरुचिं च पितृग्रहेण||२४||
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Adhikarana RuShyAdyAviShTe lakShaNam (25) · Śloka 25
ঋষিগুরুবৃদ্ধসিদ্ধানামভিশাপানুধ্যানানুরূপবিহার ব্যাহারং তদ্ গ্রহেণ গৃহীতং বিদ্যাদিতি||২৫||
ऋषिगुरुवृद्धसिद्धानामभिशापानुध्यानानुरूपविहार व्याहारं तद् ग्रहेण गृहीतं विद्यादिति||२५||
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Adhikarana saMgrahashlokaH (26) · Śloka 26
ভবতি চাত্র লক্ষযেত্ জ্ঞানবিজ্ঞানবাক্চেষ্টাবলপৌরুষম্| পুরুষেঽপৌরুষং যত্র তত্র ভূতগ্রহং বদেত্||২৬||
भवति चात्र लक्षयेत् ज्ञानविज्ञानवाक्चेष्टाबलपौरुषम्| पुरुषेऽपौरुषं यत्र तत्र भूतग्रहं वदेत्||२६||
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Adhikarana asAdhyagrahalakShaNam (27-28) · Śloka 28
কুমারবৃন্দানুগতং নগ্নমুদ্ধতমূর্ধজম্| অস্বস্থমনসং দৈর্ঘ্যকালিকং সগ্রহং ত্যজেত্||২৭|| ইতি বৈদ্যপতিসিংহগুপ্তস্য সূনোর্বাগ্ভটস্য কৃতাবষ্টাঙ্গসংগ্রহসংহিতাযামুত্তরতন্ত্রে ভূতবিজ্ঞানীযো নাম সপ্তমোঽধ্যাযঃ||২৮||
कुमारवृन्दानुगतं नग्नमुद्धतमूर्धजम्| अस्वस्थमनसं दैर्घ्यकालिकं सग्रहं त्यजेत्||२७|| इति वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भटस्य कृतावष्टाङ्गसंग्रहसंहितायामुत्तरतन्त्रे भूतविज्ञानीयो नाम सप्तमोऽध्यायः||२८||
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