Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ ফলমাত্রাসিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः फलमात्रासिद्धिं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ ফলমাত্রাসিদ্ধিং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः फलमात्रासिद्धिं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-14) · Śloka 14
ভগবন্তমুদারসত্ত্বধীশ্রুতিবিজ্ঞানসমৃদ্ধমত্রিজম্| ফলবস্তিবরত্বনিশ্চযে সবিবাদা মুনযোঽভ্যুপাগমন্||৩|| ভৃগুকৌশিককাপ্যশৌনকাঃ সপুলস্ত্যাসিতগৌতমাদযঃ| কতমত্ প্রবরং ফলাদিষু স্মৃতমাস্থাপনযোজনাস্বিতি||৪|| কফপিত্তহরং বরং ফলেষ্বথ জীমূতকমাহ শৌনকঃ| মৃদুবীর্যতযাঽভিনত্তি তচ্ছকৃদিত্যাহ নৃপোঽথ বামকঃ||৫|| কটুতুম্বমমন্যতোত্তমং বমনে দোষসমীরণং চ তত্| তদবৃষ্যমশৈত্যতীক্ষ্ণতাকটুরৌক্ষ্যাদিতি গৌতমোঽব্রবীত্ ||৬|| কফপিত্তনিবর্হণং পরং স চ ধামার্গবমিত্যমন্যত | তদমন্যত বাতলং পুনর্বডিশো গ্লানিকরং বলাপহম্||৭|| কুটজং প্রশশংস চোত্তমং ন বলঘ্নং কফপিত্তহারি চ| অতিবিজ্জলমৌর্ধ্বভাগিকং পবনক্ষোভি চ কাপ্য আহ তত্||৮|| কৃতবেধনমাহ বাতলং কফপিত্তং প্রবলং হরেদিতি| তদসাধ্বিতি ভদ্রশৌনকঃ কটুকং চাতিবলঘ্নমিত্যপি||৯|| ইতি তদ্বচনানি হেতুভিঃ সুবিচিত্রাণি নিশম্য বুদ্ধিমান্ | প্রশশংস ফলেষু নিশ্চযং পরমং চাত্রিসুতোঽব্রবীদিদম্||১০|| ফলদোষগুণান্ সরস্বতী প্রতি সর্বৈরপি সম্যগীরিতা| ন তু কিঞ্চিদদোষনির্গুণং গুণভূযস্ত্বমতো বিচিন্ত্যতে ||১১|| ইহ কুষ্ঠহিতা গরাগরী হিতমিক্ষ্বাকু তু মেহিনে মতম্| কুটজস্য ফলং হৃদামযে প্রবরং কোঠফলং চ পাণ্ডুষু||১২|| উদরে কৃতবেধনং হিতং, মদনং সর্বগদাবিরোধি তু| মধুরং সকষাযতিক্তকং তদরূক্ষং সকটূষ্ণবিজ্জলম্||১৩|| কফপিত্তহৃদাশুকারি চাপ্যনপাযং পবনানুলোমি চ| ফলনাম বিশেষতস্ত্বতো লভতেঽন্যেষু ফলেষু সত্স্বপি||১৪||
भगवन्तमुदारसत्त्वधीश्रुतिविज्ञानसमृद्धमत्रिजम्| फलबस्तिवरत्वनिश्चये सविवादा मुनयोऽभ्युपागमन्||३|| भृगुकौशिककाप्यशौनकाः सपुलस्त्यासितगौतमादयः| कतमत् प्रवरं फलादिषु स्मृतमास्थापनयोजनास्विति||४|| कफपित्तहरं वरं फलेष्वथ जीमूतकमाह शौनकः| मृदुवीर्यतयाऽभिनत्ति तच्छकृदित्याह नृपोऽथ वामकः||५|| कटुतुम्बममन्यतोत्तमं वमने दोषसमीरणं च तत्| तदवृष्यमशैत्यतीक्ष्णताकटुरौक्ष्यादिति गौतमोऽब्रवीत् ||६|| कफपित्तनिबर्हणं परं स च धामार्गवमित्यमन्यत | तदमन्यत वातलं पुनर्बडिशो ग्लानिकरं बलापहम्||७|| कुटजं प्रशशंस चोत्तमं न बलघ्नं कफपित्तहारि च| अतिविज्जलमौर्ध्वभागिकं पवनक्षोभि च काप्य आह तत्||८|| कृतवेधनमाह वातलं कफपित्तं प्रबलं हरेदिति| तदसाध्विति भद्रशौनकः कटुकं चातिबलघ्नमित्यपि||९|| इति तद्वचनानि हेतुभिः सुविचित्राणि निशम्य बुद्धिमान् | प्रशशंस फलेषु निश्चयं परमं चात्रिसुतोऽब्रवीदिदम्||१०|| फलदोषगुणान् सरस्वती प्रति सर्वैरपि सम्यगीरिता| न तु किञ्चिददोषनिर्गुणं गुणभूयस्त्वमतो विचिन्त्यते ||११|| इह कुष्ठहिता गरागरी हितमिक्ष्वाकु तु मेहिने मतम्| कुटजस्य फलं हृदामये प्रवरं कोठफलं च पाण्डुषु||१२|| उदरे कृतवेधनं हितं, मदनं सर्वगदाविरोधि तु| मधुरं सकषायतिक्तकं तदरूक्षं सकटूष्णविज्जलम्||१३|| कफपित्तहृदाशुकारि चाप्यनपायं पवनानुलोमि च| फलनाम विशेषतस्त्वतो लभतेऽन्येषु फलेषु सत्स्वपि||१४||
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Adhikarana 3 (15-18) · Śloka 18
গুরুণেতি বচস্যুদাহৃতে মুনিসঙ্ঘেন চ পূজিতে ততঃ | প্রণিপত্য মুদা সমন্বিতঃ সহিতঃ শিষ্যগণোঽনুপৃষ্টবান্||১৫|| সর্বকর্মগুণকৃদ্গুরুণোক্তো বস্তিরূর্ধ্বমথ নৈতি নাভিতঃ| নাভ্যধো গুদমতঃ স শরীরাত্ সর্বতঃ কথমপোহতি দোষান্ ||১৬|| তদ্গুরুরব্রবীদিদং শরীরং তন্ত্রযতেঽনিলঃ সঙ্গবিঘাতাত্ | কেবল এব দোষসহিতো বা স্বাশযগঃ প্রকোপমুপযাতি||১৭|| তং পবনং সপিত্তকফবিট্কং শুদ্ধিকরোঽনুলোমযতি বস্তিঃ| সর্বশরীরগশ্চ গদসঙ্ঘস্তত্প্রশমাত্ প্রশান্তিমুপযাতি||১৮||
गुरुणेति वचस्युदाहृते मुनिसङ्घेन च पूजिते ततः | प्रणिपत्य मुदा समन्वितः सहितः शिष्यगणोऽनुपृष्टवान्||१५|| सर्वकर्मगुणकृद्गुरुणोक्तो बस्तिरूर्ध्वमथ नैति नाभितः| नाभ्यधो गुदमतः स शरीरात् सर्वतः कथमपोहति दोषान् ||१६|| तद्गुरुरब्रवीदिदं शरीरं तन्त्रयतेऽनिलः सङ्गविघातात् | केवल एव दोषसहितो वा स्वाशयगः प्रकोपमुपयाति||१७|| तं पवनं सपित्तकफविट्कं शुद्धिकरोऽनुलोमयति बस्तिः| सर्वशरीरगश्च गदसङ्घस्तत्प्रशमात् प्रशान्तिमुपयाति||१८||
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Adhikarana 4 (19-22) · Śloka 22
অথাধিগম্যার্থমখণ্ডিতং ধিযা গজোষ্ট্রগোশ্বাব্যজকর্ম রোগনুত্| অপৃচ্ছদেনং স চ বস্তিমব্রবীদ্বিধিং চ তস্যাহ পুনঃ প্রচোদিতঃ||১৯|| আজোরণৌ সৌম্য গজোষ্ট্রযোঃ কৃতে গবাশ্বযোর্বস্তিমুশন্তি মাহিষম্| অজাবিকানাং তু জরদ্গবোদ্ভবং বদন্তি বস্তিং তদুপাযচিন্তকাঃ||২০|| অরত্নিমষ্টাদশষোডশাঙ্গুলং তথৈব নেত্রং হি দশাঙ্গুলং ক্রমাত্| গজোষ্ট্রগোশ্বাব্যজবস্তিসন্ধৌ চতুর্থভাগোপনযং হিতং বদেত্ ||২১|| প্রস্থস্ত্বজাব্যোর্হি নিরূহমাত্রা গবাদিষু দ্বিত্রিগুণং যথাবলম্| নিরূহমুষ্ট্রস্য তথাঽঽঢকদ্বযং গজস্য বৃদ্ধিস্ত্বনুবাসনেঽষ্টমঃ||২২||
अथाधिगम्यार्थमखण्डितं धिया गजोष्ट्रगोश्वाव्यजकर्म रोगनुत्| अपृच्छदेनं स च बस्तिमब्रवीद्विधिं च तस्याह पुनः प्रचोदितः||१९|| आजोरणौ सौम्य गजोष्ट्रयोः कृते गवाश्वयोर्बस्तिमुशन्ति माहिषम्| अजाविकानां तु जरद्गवोद्भवं वदन्ति बस्तिं तदुपायचिन्तकाः||२०|| अरत्निमष्टादशषोडशाङ्गुलं तथैव नेत्रं हि दशाङ्गुलं क्रमात्| गजोष्ट्रगोश्वाव्यजबस्तिसन्धौ चतुर्थभागोपनयं हितं वदेत् ||२१|| प्रस्थस्त्वजाव्योर्हि निरूहमात्रा गवादिषु द्वित्रिगुणं यथाबलम्| निरूहमुष्ट्रस्य तथाऽऽढकद्वयं गजस्य वृद्धिस्त्वनुवासनेऽष्टमः||२२||
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Adhikarana 5 (23-26) · Śloka 26
কলিঙ্গকুষ্ঠে মধুকং চ পিপ্পলী বচা শতাহ্বা মদনং রসাঞ্জনম্| হিতানি সর্বেষু গুডঃ সসৈন্ধবো দ্বিপঞ্চমূলং চ বিকল্পনা ত্বিযম্||২৩|| গজেঽধিকাঽশ্বত্থবটাশ্বকর্ণকাঃ সখাদিরপ্রগ্রহশালতালজাঃ| তথা চ পর্ণ্যৌ ধবশিগ্রুপাটলী মধূকসারাঃ সনিকুম্ভচিত্রকাঃ||২৪|| পলাশভূতীকসুরাহ্বরোহিণীকষায উক্তস্ত্বধিকো গবাং হিতঃ| পলাশদন্তীসুরদারুকত্তৃণদ্রবন্ত্য উক্তাস্তুরগস্য চাধিকাঃ||২৫|| খরোষ্ট্রযোঃ পীলুকরীরখাদিরাঃ শম্যাকবিল্বাদিগণস্য চ চ্ছদাঃ| অজাবিকানাং ত্রিফলাপরূষকং কপিত্থকর্কন্ধু সবিল্বকোলজম্||২৬||
कलिङ्गकुष्ठे मधुकं च पिप्पली वचा शताह्वा मदनं रसाञ्जनम्| हितानि सर्वेषु गुडः ससैन्धवो द्विपञ्चमूलं च विकल्पना त्वियम्||२३|| गजेऽधिकाऽश्वत्थवटाश्वकर्णकाः सखादिरप्रग्रहशालतालजाः| तथा च पर्ण्यौ धवशिग्रुपाटली मधूकसाराः सनिकुम्भचित्रकाः||२४|| पलाशभूतीकसुराह्वरोहिणीकषाय उक्तस्त्वधिको गवां हितः| पलाशदन्तीसुरदारुकत्तृणद्रवन्त्य उक्तास्तुरगस्य चाधिकाः||२५|| खरोष्ट्रयोः पीलुकरीरखादिराः शम्याकबिल्वादिगणस्य च च्छदाः| अजाविकानां त्रिफलापरूषकं कपित्थकर्कन्धु सबिल्वकोलजम्||२६||
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Adhikarana 6 (27) · Śloka 27
অথাগ্নিবেশঃ সততাতুরান্ নরান্ হিতং চ পপ্রচ্ছ গুরুস্তদাহ চ| সদাঽঽতুরাঃ শ্রোত্রিযরাজসেবকাস্তথৈব বেশ্যা সহ পণ্যজীবিভিঃ||২৭||
अथाग्निवेशः सततातुरान् नरान् हितं च पप्रच्छ गुरुस्तदाह च| सदाऽऽतुराः श्रोत्रियराजसेवकास्तथैव वेश्या सह पण्यजीविभिः||२७||
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Adhikarana 7 (28-30) · Śloka 30
দ্বিজো হি বেদাধ্যযনব্রতাহ্নিকক্রিযাদিভির্দেহহিতং ন চেষ্টতে | নৃপোপসেবী নৃপচিত্তরক্ষণাত্ পরানুরোধাদ্বহুচিন্তনাদ্ভযাত্ ||২৮|| নৃচিত্তবর্তিন্যুপচারতত্পরা মৃজাভি(বি)ভূষানিরতা পণাঙ্গনা| সদাসনাদত্যনুবন্ধবিক্রযক্রযাদিলোভাদপি পণ্যজীবিনঃ||২৯|| সদৈব তে হ্যাগতবেগনিগ্রহং সমাচরন্তে ন চ কালভোজনম্| অকালনির্হারবিহারসেবিনো ভবন্তি যেঽন্যেঽপি সদাঽঽতুরাশ্চ তে||৩০||
द्विजो हि वेदाध्ययनव्रताह्निकक्रियादिभिर्देहहितं न चेष्टते | नृपोपसेवी नृपचित्तरक्षणात् परानुरोधाद्बहुचिन्तनाद्भयात् ||२८|| नृचित्तवर्तिन्युपचारतत्परा मृजाभि(वि)भूषानिरता पणाङ्गना| सदासनादत्यनुबन्धविक्रयक्रयादिलोभादपि पण्यजीविनः||२९|| सदैव ते ह्यागतवेगनिग्रहं समाचरन्ते न च कालभोजनम्| अकालनिर्हारविहारसेविनो भवन्ति येऽन्येऽपि सदाऽऽतुराश्च ते||३०||
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Adhikarana 8 (31-36) · Śloka 36
সমীরণং বেগবিধারণোদ্ধতং বিবন্ধসর্বাঙ্গরুজাকরং ভিষক্| সমীক্ষ্য তেষাং ফলবর্তিমাদিতঃ সুকল্পিতাং স্নেহবতীং প্রযোজযেত্||৩১|| পুনর্নবৈরণ্ডনিকুম্ভচিত্রকান্ সদেবদারুত্রিবৃতানিদিগ্ধিকান্| মহান্তি মূলানি চ পঞ্চ যানি বিপাচ্য মূত্রে দধিমস্তুসংযুতে||৩২|| সতৈলসর্পির্লবণৈশ্চ পঞ্চভির্বিমূর্চ্ছিতং বস্তিমথ প্রযোজযেত্| নিরূহিতং ধন্বরসেন ভোজিতং নিকুম্ভতৈলেন ততোঽনুবাসযেত্||৩৩|| বলাং সরাস্নাং ফলবিল্বচিত্রকান্ দ্বিপঞ্চমূলং কৃতমালকাত্ ফলম্| যবান্ কুলত্থাংশ্চ পচেজ্জলাঢকে রসঃ স পেষ্যৈস্তু কলিঙ্গকাদিভিঃ||৩৪|| সতৈলসর্পির্গুডসৈন্ধবো হিতঃ সদাতুরাণাং বলবর্ণবর্ধনঃ| তথাঽনুবাস্যে মধুকেন সাধিতং ফলেন বিল্বেন শতাহ্বযাঽপি বা||৩৫|| সজীবনীযস্তু রসোঽনুবাসনে নিরূহণে চালবণঃ শিশোর্হিতঃ| ন চান্যদাশ্বঙ্গবলাভিবর্ধনং নিরূহবস্তেঃ শিশুবৃদ্ধযোঃ পরম্||৩৬||
समीरणं वेगविधारणोद्धतं विबन्धसर्वाङ्गरुजाकरं भिषक्| समीक्ष्य तेषां फलवर्तिमादितः सुकल्पितां स्नेहवतीं प्रयोजयेत्||३१|| पुनर्नवैरण्डनिकुम्भचित्रकान् सदेवदारुत्रिवृतानिदिग्धिकान्| महान्ति मूलानि च पञ्च यानि विपाच्य मूत्रे दधिमस्तुसंयुते||३२|| सतैलसर्पिर्लवणैश्च पञ्चभिर्विमूर्च्छितं बस्तिमथ प्रयोजयेत्| निरूहितं धन्वरसेन भोजितं निकुम्भतैलेन ततोऽनुवासयेत्||३३|| बलां सरास्नां फलबिल्वचित्रकान् द्विपञ्चमूलं कृतमालकात् फलम्| यवान् कुलत्थांश्च पचेज्जलाढके रसः स पेष्यैस्तु कलिङ्गकादिभिः||३४|| सतैलसर्पिर्गुडसैन्धवो हितः सदातुराणां बलवर्णवर्धनः| तथाऽनुवास्ये मधुकेन साधितं फलेन बिल्वेन शताह्वयाऽपि वा||३५|| सजीवनीयस्तु रसोऽनुवासने निरूहणे चालवणः शिशोर्हितः| न चान्यदाश्वङ्गबलाभिवर्धनं निरूहबस्तेः शिशुवृद्धयोः परम्||३६||
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Adhikarana 9 (37) · Śloka 37
তত্র শ্লোকঃ- ফলকর্ম বস্তিবরতা নেত্রং যদ্বস্তযো গবাদীনাম্| সততাতুরাশ্চ দিষ্টাঃ ফলমাত্রাযাং হিতং চৈষাম্||৩৭||
तत्र श्लोकः- फलकर्म बस्तिवरता नेत्रं यद्बस्तयो गवादीनाम्| सततातुराश्च दिष्टाः फलमात्रायां हितं चैषाम्||३७||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 11
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতেঽপ্রাপ্তে দৃঢবলসম্পূরিতে সিদ্ধিস্থানে ফলমাত্রাসিদ্ধির্নামৈকাদশোঽধ্যাযঃ||১১||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृतेऽप्राप्ते दृढबलसम्पूरिते सिद्धिस्थाने फलमात्रासिद्धिर्नामैकादशोऽध्यायः||११||
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