Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্নেহাধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্নেহাধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সাঙ্খ্যৈঃ সঙ্খ্যাতসঙ্খ্যেযৈঃ সহাসীনং পুনর্বসুম্| জগদ্ধিতার্থং পপ্রচ্ছ বহ্নিবেশঃ স্বসংশযম্||৩||
साङ्ख्यैः सङ्ख्यातसङ्ख्येयैः सहासीनं पुनर्वसुम्| जगद्धितार्थं पप्रच्छ वह्निवेशः स्वसंशयम्||३||
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Adhikarana 3 (4-8) · Śloka 8
কিংযোনযঃ কতি স্নেহাঃ কে চ স্নেহগুণাঃ পৃথক্| কালানুপানে কে কস্য কতি কাশ্চ বিচারণাঃ||৪|| কতি মাত্রাঃ কথম্মানাঃ কা চ কেষূপদিশ্যতে| কশ্চ কেভ্যো হিতঃ স্নেহঃ প্রকর্ষঃ স্নেহনে চ কঃ||৫|| স্নেহ্যাঃ কে কে ন চ স্নিগ্ধাস্নিগ্ধাতিস্নিগ্ধলক্ষণম্| কিং পানাত্ প্রথমং পীতে জীর্ণে কিঞ্চ হিতাহিতম্||৬|| কে মৃদুক্রূরকোষ্ঠাঃ কা ব্যাপদঃ সিদ্ধযশ্চ কাঃ| অচ্ছে সংশোধনে চৈব স্নেহে কা বৃত্তিরিষ্যতে||৭|| বিচারণাঃ কেষু যোজ্যা বিধিনা কেন তত্ প্রভো!| স্নেহস্যামিতবিজ্ঞান জ্ঞানমিচ্ছামি বেদিতুম্||৮||
किंयोनयः कति स्नेहाः के च स्नेहगुणाः पृथक्| कालानुपाने के कस्य कति काश्च विचारणाः||४|| कति मात्राः कथम्मानाः का च केषूपदिश्यते| कश्च केभ्यो हितः स्नेहः प्रकर्षः स्नेहने च कः||५|| स्नेह्याः के के न च स्निग्धास्निग्धातिस्निग्धलक्षणम्| किं पानात् प्रथमं पीते जीर्णे किञ्च हिताहितम्||६|| के मृदुक्रूरकोष्ठाः का व्यापदः सिद्धयश्च काः| अच्छे संशोधने चैव स्नेहे का वृत्तिरिष्यते||७|| विचारणाः केषु योज्या विधिना केन तत् प्रभो!| स्नेहस्यामितविज्ञान ज्ञानमिच्छामि वेदितुम्||८||
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Adhikarana 4 (9-11) · Śloka 11
অথ তত্সংশযচ্ছেত্তা প্রত্যুবাচ পুনর্বসুঃ| স্নেহানাং দ্বিবিধা সৌম্য যোনিঃ স্থাবরজঙ্গমা||৯|| তিলঃ প্রিযালাভিষুকৌ বিভীতকশ্চিত্রাভযৈরণ্ডমধূকসর্ষপাঃ| কুসুম্ভবিল্বারুকমূলকাতসীনিকোচকাক্ষোডকরঞ্জশিগ্রুকাঃ||১০|| স্নেহাশযাঃ স্থাবরসঞ্জ্ঞিতাস্তথা স্যুর্জঙ্গমা মত্স্যমৃগাঃ সপক্ষিণঃ| তেষাং দধিক্ষীরঘৃতামিষং বসা স্নেহেষু মজ্জা চ তথোপদিশ্যতে||১১||
अथ तत्संशयच्छेत्ता प्रत्युवाच पुनर्वसुः| स्नेहानां द्विविधा सौम्य योनिः स्थावरजङ्गमा||९|| तिलः प्रियालाभिषुकौ बिभीतकश्चित्राभयैरण्डमधूकसर्षपाः| कुसुम्भबिल्वारुकमूलकातसीनिकोचकाक्षोडकरञ्जशिग्रुकाः||१०|| स्नेहाशयाः स्थावरसञ्ज्ञितास्तथा स्युर्जङ्गमा मत्स्यमृगाः सपक्षिणः| तेषां दधिक्षीरघृतामिषं वसा स्नेहेषु मज्जा च तथोपदिश्यते||११||
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Adhikarana 5 (12) · Śloka 1
সর্বেষাং তৈলজাতানাং তিলতৈলং বিশিষ্যতে| বলার্থে স্নেহনে চাগ্র্যমৈরণ্ডং তু বিরেচনে||১২|| (কটূষ্ণং তৈলমৈরণ্ডং বাতশ্লেষ্মহরং গুরু | কষাযস্বাদুতিক্তৈশ্চ যোজিতং পিত্তহন্ত্রপি ||১||)|
सर्वेषां तैलजातानां तिलतैलं विशिष्यते| बलार्थे स्नेहने चाग्र्यमैरण्डं तु विरेचने||१२|| (कटूष्णं तैलमैरण्डं वातश्लेष्महरं गुरु | कषायस्वादुतिक्तैश्च योजितं पित्तहन्त्रपि ||१||)|
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Adhikarana 6 (13) · Śloka 13
সর্পিস্তৈলং বসা মজ্জা সর্বস্নেহোত্তমা মতাঃ| এষু চৈবোত্তমং সর্পিঃ সংস্কারস্যানুবর্তনাত্||১৩||
सर्पिस्तैलं वसा मज्जा सर्वस्नेहोत्तमा मताः| एषु चैवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात्||१३||
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Adhikarana 7 (14-17) · Śloka 17
ঘৃতং পিত্তানিলহরং রসশুক্রৌজসাং হিতম্| নির্বাপণং মৃদুকরং স্বরবর্ণপ্রসাদনম্||১৪|| মারুতঘ্নং ন চ শ্লেষ্মবর্ধনং বলবর্ধনম্| ত্বচ্যমুষ্ণং স্থিরকরং তৈলং যোনিবিশোধনম্||১৫|| বিদ্ধভগ্নাহতভ্রষ্টযোনিকর্ণশিরোরুজি| পৌরুষোপচযে স্নেহে ব্যাযামে চেষ্যতে বসা||১৬|| বলশুক্ররসশ্লেষ্মমেদোমজ্জবিবর্ধনঃ| মজ্জা বিশেষতোঽস্থ্নাং চ বলকৃত্ স্নেহনে হিতঃ||১৭||
घृतं पित्तानिलहरं रसशुक्रौजसां हितम्| निर्वापणं मृदुकरं स्वरवर्णप्रसादनम्||१४|| मारुतघ्नं न च श्लेष्मवर्धनं बलवर्धनम्| त्वच्यमुष्णं स्थिरकरं तैलं योनिविशोधनम्||१५|| विद्धभग्नाहतभ्रष्टयोनिकर्णशिरोरुजि| पौरुषोपचये स्नेहे व्यायामे चेष्यते वसा||१६|| बलशुक्ररसश्लेष्ममेदोमज्जविवर्धनः| मज्जा विशेषतोऽस्थ्नां च बलकृत् स्नेहने हितः||१७||
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Adhikarana 8 (18) · Śloka 18
সর্পিঃ শরদি পাতব্যং বসা মজ্জা চ মাধবে| তৈলং প্রাবৃষি নাত্যুষ্ণশীতে স্নেহং পিবেন্নরঃ||১৮||
सर्पिः शरदि पातव्यं वसा मज्जा च माधवे| तैलं प्रावृषि नात्युष्णशीते स्नेहं पिबेन्नरः||१८||
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Adhikarana 9 (19) · Śloka 19
বাতপিত্তাধিকো রাত্রাবুষ্ণে চাপি পিবেন্নরঃ| শ্লেষ্মাধিকো দিবা শীতে পিবেচ্চামলভাস্করে||১৯||
वातपित्ताधिको रात्रावुष्णे चापि पिबेन्नरः| श्लेष्माधिको दिवा शीते पिबेच्चामलभास्करे||१९||
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Adhikarana 10 (20-21) · Śloka 21
অত্যুষ্ণে বা দিবা পীতো বাতপিত্তাধিকেন বা| মূর্চ্ছাং পিপাসামুন্মাদং কামলাং বা সমীরযেত্||২০|| শীতে রাত্রৌ পিবন্ স্নেহং নরঃ শ্লেষ্মাধিকোঽপি বা| আনাহমরুচিং শূলং পাণ্ডুতাং বা সমৃচ্ছতি||২১||
अत्युष्णे वा दिवा पीतो वातपित्ताधिकेन वा| मूर्च्छां पिपासामुन्मादं कामलां वा समीरयेत्||२०|| शीते रात्रौ पिबन् स्नेहं नरः श्लेष्माधिकोऽपि वा| आनाहमरुचिं शूलं पाण्डुतां वा समृच्छति||२१||
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Adhikarana 11 (22) · Śloka 22
জলমুষ্ণং ঘৃতে পেযং যূষস্তৈলেঽনু শস্যতে| বসামজ্জ্ঞোস্তু মণ্ডঃ স্যাত্ সর্বেষূষ্ণমথাম্বু বা||২২||
जलमुष्णं घृते पेयं यूषस्तैलेऽनु शस्यते| वसामज्ज्ञोस्तु मण्डः स्यात् सर्वेषूष्णमथाम्बु वा||२२||
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Adhikarana 12 (23-25) · Śloka 25
ওদনশ্চ বিলেপী চ রসো মাংসং পযো দধি| যবাগূঃ সূপশাকৌ চ যূষঃ কাম্বলিকঃ খডঃ||২৩|| সক্তবস্তিলপিষ্টং চ মদ্যং লেহাস্তথৈব চ| ভক্ষ্যমভ্যঞ্জনং বস্তিস্তথা চোত্তরবস্তযঃ||২৪|| গণ্ডূষঃ কর্ণতৈলং চ নস্তঃকর্ণাক্ষিতর্পণম্| চতুর্বিংশতিরিত্যেতাঃ স্নেহস্য প্রবিচারণাঃ ||২৫||
ओदनश्च विलेपी च रसो मांसं पयो दधि| यवागूः सूपशाकौ च यूषः काम्बलिकः खडः||२३|| सक्तवस्तिलपिष्टं च मद्यं लेहास्तथैव च| भक्ष्यमभ्यञ्जनं बस्तिस्तथा चोत्तरबस्तयः||२४|| गण्डूषः कर्णतैलं च नस्तःकर्णाक्षितर्पणम्| चतुर्विंशतिरित्येताः स्नेहस्य प्रविचारणाः ||२५||
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Adhikarana 13 (26) · Śloka 26
অচ্ছপেযস্তু যঃ স্নেহো ন তামাহুর্বিচারণাম্| স্নেহস্য স ভিষগ্দৃষ্টঃ কল্পঃ প্রাথমকল্পিকঃ||২৬||
अच्छपेयस्तु यः स्नेहो न तामाहुर्विचारणाम्| स्नेहस्य स भिषग्दृष्टः कल्पः प्राथमकल्पिकः||२६||
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Adhikarana 14 (27-28) · Śloka 28
রসৈশ্চোপহিতঃ স্নেহঃ সমাসব্যাসযোগিভিঃ| ষড্ভিস্ত্রিষষ্টিধা সঙ্খ্যাং প্রাপ্নোত্যেকশ্চ কেবলঃ||২৭|| এবমেতাশ্চতুঃষষ্টিঃ স্নেহানাং প্রবিচারণা | ওকর্তুব্যাধিপুরুষান্ প্রযোজ্যা জানতা ভবেত্||২৮||
रसैश्चोपहितः स्नेहः समासव्यासयोगिभिः| षड्भिस्त्रिषष्टिधा सङ्ख्यां प्राप्नोत्येकश्च केवलः||२७|| एवमेताश्चतुःषष्टिः स्नेहानां प्रविचारणा | ओकर्तुव्याधिपुरुषान् प्रयोज्या जानता भवेत्||२८||
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Adhikarana 15 (29-40) · Śloka 40
অহোরাত্রমহঃ কৃত্স্নমর্ধাহং চ প্রতীক্ষতে| প্রধানা মধ্যমা হ্রস্বা স্নেহমাত্রা জরাং প্রতি||২৯|| ইতি তিস্রঃ সমুদ্দিষ্টা মাত্রাঃ স্নেহস্য মানতঃ| তাসাং প্রযোগান্ বক্ষ্যামি পুরুষং পুরুষং প্রতি||৩০|| প্রভূতস্নেহনিত্যা যে ক্ষুত্পিপাসাসহা নরাঃ| পাবকশ্চোত্তমবলো যেষাং যে চোত্তমা বলে||৩১|| গুল্মিনঃ সর্পদষ্টাশ্চ বিসর্পোপহতাশ্চ যে| উন্মত্তাঃ কৃচ্ছ্রমূত্রাশ্চ গাঢবর্চস এব চ||৩২|| পিবেযুরুত্তমাং মাত্রাং তস্যাঃ পানে গুণাঞ্ছৃণু| বিকারাঞ্ছমযত্যেষাং শীঘ্রং সম্যক্প্রযোজিতা||৩৩|| দোষানুকর্ষিণী মাত্রা সর্বমার্গানুসারিণী| বল্যা পুনর্নবকরী শরীরেন্দ্রিযচেতসাম্||৩৪|| অরুষ্কস্ফোটপিডকাকণ্ডূপামাভিরর্দিতাঃ| কুষ্ঠিনশ্চ প্রমীঢাশ্চ বাতশোণিতিকাশ্চ যে||৩৫|| নাতিবহ্বাশিনশ্চৈব মৃদুকোষ্ঠাস্তথৈব চ| পিবেযুর্মধ্যমাং মাত্রাং মধ্যমাশ্চাপি যে বলে||৩৬|| মাত্রৈষা মন্দবিভ্রংশা ন চাতিবলহারিণী| সুখেন চ স্নেহযতি শোধনার্থে চ যুজ্যতে||৩৭|| যে তু বৃদ্ধাশ্চ বালাশ্চ সুকুমারাঃ সুখোচিতাঃ| রিক্তকোষ্ঠত্বমহিতং যেষাং মন্দাগ্নযশ্চ যে||৩৮|| জ্বরাতীসারকাসাশ্চ যেষাং চিরসমুত্থিতাঃ| স্নেহমাত্রাং পিবেযুস্তে হ্রস্বাং যে চাবরা বলে||৩৯|| পরিহারে সুখা চৈষা মাত্রা স্নেহনবৃংহণী| বৃষ্যা বল্যা নিরাবাধা চিরং চাপ্যনুবর্ততে||৪০||
अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्धाहं च प्रतीक्षते| प्रधाना मध्यमा ह्रस्वा स्नेहमात्रा जरां प्रति||२९|| इति तिस्रः समुद्दिष्टा मात्राः स्नेहस्य मानतः| तासां प्रयोगान् वक्ष्यामि पुरुषं पुरुषं प्रति||३०|| प्रभूतस्नेहनित्या ये क्षुत्पिपासासहा नराः| पावकश्चोत्तमबलो येषां ये चोत्तमा बले||३१|| गुल्मिनः सर्पदष्टाश्च विसर्पोपहताश्च ये| उन्मत्ताः कृच्छ्रमूत्राश्च गाढवर्चस एव च||३२|| पिबेयुरुत्तमां मात्रां तस्याः पाने गुणाञ्छृणु| विकाराञ्छमयत्येषां शीघ्रं सम्यक्प्रयोजिता||३३|| दोषानुकर्षिणी मात्रा सर्वमार्गानुसारिणी| बल्या पुनर्नवकरी शरीरेन्द्रियचेतसाम्||३४|| अरुष्कस्फोटपिडकाकण्डूपामाभिरर्दिताः| कुष्ठिनश्च प्रमीढाश्च वातशोणितिकाश्च ये||३५|| नातिबह्वाशिनश्चैव मृदुकोष्ठास्तथैव च| पिबेयुर्मध्यमां मात्रां मध्यमाश्चापि ये बले||३६|| मात्रैषा मन्दविभ्रंशा न चातिबलहारिणी| सुखेन च स्नेहयति शोधनार्थे च युज्यते||३७|| ये तु वृद्धाश्च बालाश्च सुकुमाराः सुखोचिताः| रिक्तकोष्ठत्वमहितं येषां मन्दाग्नयश्च ये||३८|| ज्वरातीसारकासाश्च येषां चिरसमुत्थिताः| स्नेहमात्रां पिबेयुस्ते ह्रस्वां ये चावरा बले||३९|| परिहारे सुखा चैषा मात्रा स्नेहनबृंहणी| वृष्या बल्या निराबाधा चिरं चाप्यनुवर्तते||४०||
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Adhikarana 16 (41-43) · Śloka 43
বাতপিত্তপ্রকৃতযো বাতপিত্তবিকারিণঃ| চক্ষুঃকামাঃ ক্ষতাঃ ক্ষীণা বৃদ্ধা বালাস্তথাঽবলাঃ||৪১|| আযুঃপ্রকর্ষকামাশ্চ বলবর্ণস্বরার্থিনঃ| পুষ্টিকামাঃ প্রজাকামাঃ সৌকুমার্যার্থিনশ্চ যে||৪২|| দীপ্ত্যোজঃস্মৃতিমেধাগ্নিবুদ্ধীন্দ্রিযবলার্থিনঃ| পিবেযুঃ সর্পিরার্তাশ্চ দাহশস্ত্রবিষাগ্নিভিঃ||৪৩||
वातपित्तप्रकृतयो वातपित्तविकारिणः| चक्षुःकामाः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः||४१|| आयुःप्रकर्षकामाश्च बलवर्णस्वरार्थिनः| पुष्टिकामाः प्रजाकामाः सौकुमार्यार्थिनश्च ये||४२|| दीप्त्योजःस्मृतिमेधाग्निबुद्धीन्द्रियबलार्थिनः| पिबेयुः सर्पिरार्ताश्च दाहशस्त्रविषाग्निभिः||४३||
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Adhikarana 17 (44-46) · Śloka 46
প্রবৃদ্ধশ্লেষ্মমেদস্কাশ্চলস্থূলগলোদরাঃ| বাতব্যাধিভিরাবিষ্টা বাতপ্রকৃতযশ্চ যে||৪৪|| বলং তনুত্বং লঘুতাং দৃঢতাং স্থিরগাত্রতাম্ | স্নিগ্ধশ্লক্ষ্ণতনুত্বক্তাং যে চ কাঙ্ক্ষন্তি দেহিনঃ||৪৫|| কৃমিকোষ্ঠাঃ ক্রূরকোষ্ঠাস্তথা নাডীভিরর্দিতাঃ| পিবেযুঃ শীতলে কালে তৈলং তৈলোচিতাশ্চ যে||৪৬||
प्रवृद्धश्लेष्ममेदस्काश्चलस्थूलगलोदराः| वातव्याधिभिराविष्टा वातप्रकृतयश्च ये||४४|| बलं तनुत्वं लघुतां दृढतां स्थिरगात्रताम् | स्निग्धश्लक्ष्णतनुत्वक्तां ये च काङ्क्षन्ति देहिनः||४५|| कृमिकोष्ठाः क्रूरकोष्ठास्तथा नाडीभिरर्दिताः| पिबेयुः शीतले काले तैलं तैलोचिताश्च ये||४६||
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Adhikarana 18 (47-49) · Śloka 49
বাতাতপসহা যে চ রূক্ষা ভারাধ্বকর্শিতাঃ| সংশুষ্করেতোরুধিরা নিষ্পীতকফমেদসঃ||৪৭|| অস্থিসন্ধিসিরাস্নাযুমর্মকোষ্ঠমহারুজঃ| বলবান্মারুতো যেষাং খানি চাবৃত্য তিষ্ঠতি||৪৮|| মহচ্চাগ্নিবলং যেষাং বসাসাত্ম্যাশ্চ যে নরাঃ| তেষাং স্নেহযিতব্যানাং বসাপানং বিধীযতে||৪৯||
वातातपसहा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः| संशुष्करेतोरुधिरा निष्पीतकफमेदसः||४७|| अस्थिसन्धिसिरास्नायुमर्मकोष्ठमहारुजः| बलवान्मारुतो येषां खानि चावृत्य तिष्ठति||४८|| महच्चाग्निबलं येषां वसासात्म्याश्च ये नराः| तेषां स्नेहयितव्यानां वसापानं विधीयते||४९||
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Adhikarana 19 (50) · Śloka 51
দীপ্তাগ্নযঃ ক্লেশসহা ঘস্মরাঃ স্নেহসেবিনঃ| বাতার্তাঃ ক্রূরকোষ্ঠাশ্চ স্নেহ্যা মজ্জানমাপ্নুযুঃ||৫০|| যেভ্যো যেভ্যো হিতো যো যঃ স্নেহঃ স পরিকীর্তিতঃ|৫১|
दीप्ताग्नयः क्लेशसहा घस्मराः स्नेहसेविनः| वातार्ताः क्रूरकोष्ठाश्च स्नेह्या मज्जानमाप्नुयुः||५०|| येभ्यो येभ्यो हितो यो यः स्नेहः स परिकीर्तितः|५१|
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Adhikarana 20 (51) · Śloka 51
স্নেহনস্য প্রকর্ষৌ তু সপ্তরাত্রত্রিরাত্রকৌ||৫১||
स्नेहनस्य प्रकर्षौ तु सप्तरात्रत्रिरात्रकौ||५१||
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Adhikarana 21 (52) · Śloka 52
স্বেদ্যাঃ শোধযিতব্যাশ্চ রূক্ষা বাতবিকারিণঃ| ব্যাযামমদ্যস্ত্রীনিত্যাঃ স্নেহ্যাঃ স্যুর্যে চ চিন্তকাঃ||৫২||
स्वेद्याः शोधयितव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः| व्यायाममद्यस्त्रीनित्याः स्नेह्याः स्युर्ये च चिन्तकाः||५२||
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Adhikarana 22 (53-56) · Śloka 56
সংশোধনাদৃতে যেষাং রূক্ষণং সম্প্রবক্ষ্যতে| ন তেষাং স্নেহনং শস্তমুত্সন্নকফমেদসাম্||৫৩|| অভিষ্যণ্ণাননগুদা নিত্যমন্দাগ্নযশ্চ যে| তৃষ্ণামূর্চ্ছাপরীতাশ্চ গর্ভিণ্যস্তালুশোষিণঃ||৫৪|| অন্নদ্বিষশ্ছর্দযন্তো জঠরামগরার্দিতাঃ| দুর্বলাশ্চ প্রতান্তাশ্চ স্নেহগ্লানা মদাতুরাঃ||৫৫|| ন স্নেহ্যা বর্তমানেষু ন নস্তো বস্তিকর্মসু| স্নেহপানাত্ প্রজাযন্তে তেষাং রোগাঃ সুদারুণাঃ||৫৬||
संशोधनादृते येषां रूक्षणं सम्प्रवक्ष्यते| न तेषां स्नेहनं शस्तमुत्सन्नकफमेदसाम्||५३|| अभिष्यण्णाननगुदा नित्यमन्दाग्नयश्च ये| तृष्णामूर्च्छापरीताश्च गर्भिण्यस्तालुशोषिणः||५४|| अन्नद्विषश्छर्दयन्तो जठरामगरार्दिताः| दुर्बलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहग्लाना मदातुराः||५५|| न स्नेह्या वर्तमानेषु न नस्तो बस्तिकर्मसु| स्नेहपानात् प्रजायन्ते तेषां रोगाः सुदारुणाः||५६||
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Adhikarana 23 (57-59) · Śloka 59
পুরীষং গ্রথিতং রূক্ষং বাযুরপ্রগুণো মৃদুঃ| পক্তা খরত্বং রৌক্ষ্যং চ গাত্রস্যাস্নিগ্ধলক্ষণম্||৫৭|| বাতানুলোম্যং দীপ্তোঽগ্নির্বর্চঃ স্নিগ্ধমসংহতম্| মার্দবং স্নিগ্ধতা চাঙ্গে স্নিগ্ধানামুপজাযতে||৫৮|| পাণ্ডুতা গৌরবং জাড্যং পুরীষস্যাবিপক্বতা| তন্দ্রীররুচিরুত্কেশঃ স্যাদতিস্নিগ্ধলক্ষণম্||৫৯||
पुरीषं ग्रथितं रूक्षं वायुरप्रगुणो मृदुः| पक्ता खरत्वं रौक्ष्यं च गात्रस्यास्निग्धलक्षणम्||५७|| वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम्| मार्दवं स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते||५८|| पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्वता| तन्द्रीररुचिरुत्केशः स्यादतिस्निग्धलक्षणम्||५९||
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Adhikarana 24 (60-61) · Śloka 61
দ্রবোষ্ণমনভিষ্যন্দি ভোজ্যমন্নং প্রমাণতঃ| নাতিস্নিগ্ধমসঙ্কীর্ণং শ্বঃ স্নেহং পাতুমিচ্ছতা||৬০|| পিবেত্ সংশমনং স্নেহমন্নকালে প্রকাঙ্ক্ষিতঃ| শুদ্ধ্যর্থং পুনরাহারে নৈশে জীর্ণে পিবেন্নরঃ||৬১||
द्रवोष्णमनभिष्यन्दि भोज्यमन्नं प्रमाणतः| नातिस्निग्धमसङ्कीर्णं श्वः स्नेहं पातुमिच्छता||६०|| पिबेत् संशमनं स्नेहमन्नकाले प्रकाङ्क्षितः| शुद्ध्यर्थं पुनराहारे नैशे जीर्णे पिबेन्नरः||६१||
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Adhikarana 25 (62-64) · Śloka 64
উষ্ণোদকোপচারী স্যাদ্ব্রহ্মচারী ক্ষপাশযঃ | শকৃন্মূত্রানিলোদ্গারানুদীর্ণাংশ্চ ন ধারযেত্||৬২|| ব্যাযামমুচ্চৈর্বচনং ক্রোধশোকৌ হিমাতপৌ| বর্জযেদপ্রবাতং চ সেবেত শযনাসনম্||৬৩|| স্নেহং পীত্বা নরঃ স্নেহং প্রতিভুঞ্জান এব চ| স্নেহমিথ্যোপচারাদ্ধি জাযন্তে দারুণা গদাঃ||৬৪||
उष्णोदकोपचारी स्याद्ब्रह्मचारी क्षपाशयः | शकृन्मूत्रानिलोद्गारानुदीर्णांश्च न धारयेत्||६२|| व्यायाममुच्चैर्वचनं क्रोधशोकौ हिमातपौ| वर्जयेदप्रवातं च सेवेत शयनासनम्||६३|| स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रतिभुञ्जान एव च| स्नेहमिथ्योपचाराद्धि जायन्ते दारुणा गदाः||६४||
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Adhikarana 26 (65-69) · Śloka 69
মৃদুকোষ্ঠস্ত্রিরাত্রেণ স্নিহ্যত্যচ্ছোপসেবযা| স্নিহ্যতি ক্রূরক্রোষ্ঠস্তু সপ্তরাত্রেণ মানবঃ||৬৫|| গুডমিক্ষুরসং মস্তু ক্ষীরমুল্লোডিতং দধি| পাযসং কৃশরাং সর্পিঃ কাশ্মর্যত্রিফলারসম্||৬৬|| দ্রাক্ষারসং পীলুরসং জলমুষ্ণমথাপি বা| মদ্যং বা তরুণং পীত্বা মৃদুকোষ্ঠো বিরিচ্যতে||৬৭|| বিরেচযন্তি নৈতানি ক্রূরকোষ্ঠং কদাচন| ভবতি ক্রূরকোষ্ঠস্য গ্রহণ্যত্যুল্বণানিলা||৬৮|| উদীর্ণপিত্তাঽল্পকফা গ্রহণী মন্দমারুতা| মৃদুকোষ্ঠস্য তস্মাত্ স সুবিরেচ্যো নরঃ স্মৃতঃ||৬৯||
मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निह्यत्यच्छोपसेवया| स्निह्यति क्रूरक्रोष्ठस्तु सप्तरात्रेण मानवः||६५|| गुडमिक्षुरसं मस्तु क्षीरमुल्लोडितं दधि| पायसं कृशरां सर्पिः काश्मर्यत्रिफलारसम्||६६|| द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा| मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते||६७|| विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन| भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहण्यत्युल्बणानिला||६८|| उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता| मृदुकोष्ठस्य तस्मात् स सुविरेच्यो नरः स्मृतः||६९||
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Adhikarana 27 (70-78) · Śloka 78
উদীর্ণপিত্তা গ্রহণী যস্য চাগ্নিবলং মহত্| ভস্মীভবতি তস্যাশু স্নেহঃ পীতোঽগ্নিতেজসা||৭০|| স জগ্ধ্বা স্নেহমাত্রাং তামোজঃ প্রক্ষারযন্ বলী| স্নেহাগ্নিরুত্তমাং তৃষ্ণাং সোপসর্গামুদীরযেত্||৭১|| নালং স্নেহসমৃদ্ধস্য শমাযান্নং সুগুর্বপি| স চেত্ সুশীতং সলিলং নাসাদযতি দহ্যতে| যথৈবাশীবিষঃ কক্ষমধ্যগঃ স্ববিষাগ্নিনা||৭২|| অজীর্ণে যদি তু স্নেহে তৃষ্ণা স্যাচ্ছর্দযেদ্ভিষক্| শীতোদকং পুনঃ পীত্বা ভুক্ত্বা রূক্ষান্নমুল্লিখেত্||৭৩|| ন সর্পিঃ কেবলং পিত্তে পেযং সামে বিশেষতঃ| সর্বং হ্যনুরজেদ্দেহং হত্বা সঞ্জ্ঞাং চ মারযেত্||৭৪|| তন্দ্রা সোত্ক্লেশ আনাহো জ্বরঃ স্তম্ভো বিসঞ্জ্ঞতা| কুষ্ঠানি কণ্ডূঃ পাণ্ডুত্বং শোফার্শাংস্যরুচিস্তৃষা||৭৫|| জঠরং গ্রহণীদোষাঃ স্তৈমিত্যং বাক্যনিগ্রহঃ| শূলমামপ্রদোষাশ্চ জাযন্তে স্নেহবিভ্রমাত্||৭৬|| তত্রাপ্যুল্লেখনং শস্তং স্বেদঃ কালপ্রতীক্ষণম্| প্রতি প্রতি ব্যাধিবলং বুদ্ধ্বা স্রংসনমেব চ||৭৭|| তক্রারিষ্টপ্রযোগশ্চ রূক্ষপানান্নসেবনম্| মূত্রাণাং ত্রিফলাযাশ্চ স্নেহব্যাপত্তিভেষজম্||৭৮||
उदीर्णपित्ता ग्रहणी यस्य चाग्निबलं महत्| भस्मीभवति तस्याशु स्नेहः पीतोऽग्नितेजसा||७०|| स जग्ध्वा स्नेहमात्रां तामोजः प्रक्षारयन् बली| स्नेहाग्निरुत्तमां तृष्णां सोपसर्गामुदीरयेत्||७१|| नालं स्नेहसमृद्धस्य शमायान्नं सुगुर्वपि| स चेत् सुशीतं सलिलं नासादयति दह्यते| यथैवाशीविषः कक्षमध्यगः स्वविषाग्निना||७२|| अजीर्णे यदि तु स्नेहे तृष्णा स्याच्छर्दयेद्भिषक्| शीतोदकं पुनः पीत्वा भुक्त्वा रूक्षान्नमुल्लिखेत्||७३|| न सर्पिः केवलं पित्ते पेयं सामे विशेषतः| सर्वं ह्यनुरजेद्देहं हत्वा सञ्ज्ञां च मारयेत्||७४|| तन्द्रा सोत्क्लेश आनाहो ज्वरः स्तम्भो विसञ्ज्ञता| कुष्ठानि कण्डूः पाण्डुत्वं शोफार्शांस्यरुचिस्तृषा||७५|| जठरं ग्रहणीदोषाः स्तैमित्यं वाक्यनिग्रहः| शूलमामप्रदोषाश्च जायन्ते स्नेहविभ्रमात्||७६|| तत्राप्युल्लेखनं शस्तं स्वेदः कालप्रतीक्षणम्| प्रति प्रति व्याधिबलं बुद्ध्वा स्रंसनमेव च||७७|| तक्रारिष्टप्रयोगश्च रूक्षपानान्नसेवनम्| मूत्राणां त्रिफलायाश्च स्नेहव्यापत्तिभेषजम्||७८||
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Adhikarana 28 (79) · Śloka 79
অকালে চাহিতশ্চৈব মাত্রযা ন চ যোজিতঃ| স্নেহো মিথ্যোপচারাচ্চ ব্যাপদ্যেতাতিসেবিতঃ||৭৯||
अकाले चाहितश्चैव मात्रया न च योजितः| स्नेहो मिथ्योपचाराच्च व्यापद्येतातिसेवितः||७९||
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Adhikarana 29 (80) · Śloka 80
স্নেহাত্ প্রস্কন্দনং জন্তুস্ত্রিরাত্রোপরতঃ পিবেত্| স্নেহবদ্দ্রবমুষ্ণং চ ত্র্যহং ভুক্ত্বা রসৌদনম্||৮০||
स्नेहात् प्रस्कन्दनं जन्तुस्त्रिरात्रोपरतः पिबेत्| स्नेहवद्द्रवमुष्णं च त्र्यहं भुक्त्वा रसौदनम्||८०||
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Adhikarana 30 (81) · Śloka 81
একাহোপরতস্তদ্বদ্ভুক্ত্বা প্রচ্ছর্দনং পিবেত্|৮১|
एकाहोपरतस्तद्वद्भुक्त्वा प्रच्छर्दनं पिबेत्|८१|
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Adhikarana 31 (81) · Śloka 81
স্যাত্ত্বসংশোধনার্থীযে বৃত্তিঃ স্নেহে বিরিক্তবত্||৮১||
स्यात्त्वसंशोधनार्थीये वृत्तिः स्नेहे विरिक्तवत्||८१||
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Adhikarana 32 (82-90) · Śloka 1
স্নেহদ্বিষঃ স্নেহনিত্যা মৃদুকোষ্ঠাশ্চ যে নরাঃ| ক্লেশাসহা মদ্যনিত্যাস্তেষামিষ্টা বিচারণা||৮২|| লাবতৈত্তিরমাযূরহাংসবারাহকৌক্কুটাঃ| গব্যাজৌরভ্রমাত্স্যাশ্চ রসাঃ স্যুঃ স্নেহনে হিতাঃ||৮৩|| যবকোলকুলত্থাশ্চ স্নেহাঃ সগুডশর্করাঃ| দাডিমং দধি সব্যোষং রসসংযোগসঙ্গ্রহঃ||৮৪|| স্নেহযন্তি তিলাঃ পূর্বং জগ্ধাঃ সস্নেহফাণিতাঃ| কৃশরাশ্চ বহুস্নেহাস্তিলকাম্বলিকাস্তথা||৮৫|| ফাণিতং শৃঙ্গবেরং চ তৈলং চ সুরযা সহ| পিবেদ্রূক্ষো ভৃতৈর্মাংসৈর্জীর্ণেঽশ্নীযাচ্চ ভোজনম্||৮৬|| তৈলং সুরাযা মণ্ডেন বসাং মজ্জানমেব বা| পিবন্ সফাণিতং ক্ষীরং নরঃ স্নিহ্যতি বাতিকঃ||৮৭|| ধারোষ্ণং স্নেহসংযুক্তং পীত্বা সশর্করং পযঃ| নরঃ স্নিহ্যতি পীত্বা বা সরং দধ্নঃ সফাণিতম্||৮৮|| পাঞ্চপ্রসৃতিকী পেযা পাযসো মাষমিশ্রকঃ| ক্ষীরসিদ্ধো বহুস্নেহঃ স্নেহযেদচিরান্নরম্||৮৯|| সর্পিস্তৈলবসামজ্জাতণ্ডুলপ্রসৃতৈঃ শৃ(কৃ)তা| পাঞ্চপ্রসৃতিকী পেযা পেযা স্নেহনমিচ্ছতা||৯০|| (শৌকরো বা রসঃ স্নিগ্ধঃ সর্পির্লবণসংযুতঃ | পীতো দ্বির্বাসরে যত্নাত্ স্নেহযেদচিরান্নরম্ ||১||)|
स्नेहद्विषः स्नेहनित्या मृदुकोष्ठाश्च ये नराः| क्लेशासहा मद्यनित्यास्तेषामिष्टा विचारणा||८२|| लावतैत्तिरमायूरहांसवाराहकौक्कुटाः| गव्याजौरभ्रमात्स्याश्च रसाः स्युः स्नेहने हिताः||८३|| यवकोलकुलत्थाश्च स्नेहाः सगुडशर्कराः| दाडिमं दधि सव्योषं रससंयोगसङ्ग्रहः||८४|| स्नेहयन्ति तिलाः पूर्वं जग्धाः सस्नेहफाणिताः| कृशराश्च बहुस्नेहास्तिलकाम्बलिकास्तथा||८५|| फाणितं शृङ्गवेरं च तैलं च सुरया सह| पिबेद्रूक्षो भृतैर्मांसैर्जीर्णेऽश्नीयाच्च भोजनम्||८६|| तैलं सुराया मण्डेन वसां मज्जानमेव वा| पिबन् सफाणितं क्षीरं नरः स्निह्यति वातिकः||८७|| धारोष्णं स्नेहसंयुक्तं पीत्वा सशर्करं पयः| नरः स्निह्यति पीत्वा वा सरं दध्नः सफाणितम्||८८|| पाञ्चप्रसृतिकी पेया पायसो माषमिश्रकः| क्षीरसिद्धो बहुस्नेहः स्नेहयेदचिरान्नरम्||८९|| सर्पिस्तैलवसामज्जातण्डुलप्रसृतैः शृ(कृ)ता| पाञ्चप्रसृतिकी पेया पेया स्नेहनमिच्छता||९०|| (शौकरो वा रसः स्निग्धः सर्पिर्लवणसंयुतः | पीतो द्विर्वासरे यत्नात् स्नेहयेदचिरान्नरम् ||१||)|
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Adhikarana 33 (91-94) · Śloka 94
গ্রাম্যানূপৌদকং মাংসং গুডং দধি পযস্তিলান্| কুষ্ঠী শোথী প্রমেহী চ স্নেহনে ন প্রযোজযেত্||৯১|| স্নেহৈর্যথার্হং তান্ সিদ্ধৈঃ স্নেহযেদবিকারিভিঃ| পিপ্পলীভির্হরীতক্যা সিদ্ধৈস্ত্রিফলযাঽপি বা||৯২|| দ্রাক্ষামলকযূষাভ্যাং দধ্না চাম্লেন সাধযেত্| ব্যোষগর্ভং ভিষক্ স্নেহং পীত্বা স্নিহ্যতি তং নরঃ||৯৩|| যবকোলকুলত্থানাং রসাঃ ক্ষারঃ সুরা দধি| ক্ষীরসর্পিশ্চ তত্ সিদ্ধং স্নেহনীযং ঘৃতোত্তমম্||৯৪||
ग्राम्यानूपौदकं मांसं गुडं दधि पयस्तिलान्| कुष्ठी शोथी प्रमेही च स्नेहने न प्रयोजयेत्||९१|| स्नेहैर्यथार्हं तान् सिद्धैः स्नेहयेदविकारिभिः| पिप्पलीभिर्हरीतक्या सिद्धैस्त्रिफलयाऽपि वा||९२|| द्राक्षामलकयूषाभ्यां दध्ना चाम्लेन साधयेत्| व्योषगर्भं भिषक् स्नेहं पीत्वा स्निह्यति तं नरः||९३|| यवकोलकुलत्थानां रसाः क्षारः सुरा दधि| क्षीरसर्पिश्च तत् सिद्धं स्नेहनीयं घृतोत्तमम्||९४||
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Adhikarana 34 (95) · Śloka 95
তৈলমজ্জবসাসর্পির্বদরত্রিফলারসৈঃ| যোনিশুক্রপ্রদোষেষু সাধযিত্বা প্রযোজযেত্||৯৫||
तैलमज्जवसासर्पिर्बदरत्रिफलारसैः| योनिशुक्रप्रदोषेषु साधयित्वा प्रयोजयेत्||९५||
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Adhikarana 35 (96-97) · Śloka 97
গৃহ্ণাত্যম্বু যথা বস্ত্রং প্রস্রবত্যধিকং যথা| যথাগ্নি জীর্যতি স্নেহস্তথা স্রবতি চাধিকঃ||৯৬|| যথা বাঽঽক্লেদ্য মৃত্পিণ্ডমাসিক্তং ত্বরযা জলম্| স্রবতি স্রংসতে স্নেহস্তথা ত্বরিতসেবিতঃ||৯৭||
गृह्णात्यम्बु यथा वस्त्रं प्रस्रवत्यधिकं यथा| यथाग्नि जीर्यति स्नेहस्तथा स्रवति चाधिकः||९६|| यथा वाऽऽक्लेद्य मृत्पिण्डमासिक्तं त्वरया जलम्| स्रवति स्रंसते स्नेहस्तथा त्वरितसेवितः||९७||
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Adhikarana 36 (98) · Śloka 98
লবণোপহিতাঃ স্নেহাঃ স্নেহযন্ত্যচিরান্নরম্| তদ্ধ্যভিষ্যন্দ্যরূক্ষং চ সূক্ষ্মমুষ্ণং ব্যবাযি চ||৯৮||
लवणोपहिताः स्नेहाः स्नेहयन्त्यचिरान्नरम्| तद्ध्यभिष्यन्द्यरूक्षं च सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च||९८||
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Adhikarana 37 (99) · Śloka 99
স্নেহমগ্রে প্রযুঞ্জীত ততঃ স্বেদমনন্তরম্| স্নেহস্বেদোপপন্নস্য সংশোধনমথেতরত্ ||৯৯||
स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमनन्तरम्| स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमथेतरत् ||९९||
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Adhikarana 38 (100) · Śloka 100
তত্র শ্লোকঃ- স্নেহাঃ স্নেহবিধিঃ কৃত্স্নব্যাপত্সিদ্ধিঃ সভেষজা| যথাপ্রশ্নং ভগবতা ব্যাহৃতং চান্দ্রভাগিনা||১০০||
तत्र श्लोकः- स्नेहाः स्नेहविधिः कृत्स्नव्यापत्सिद्धिः सभेषजा| यथाप्रश्नं भगवता व्याहृतं चान्द्रभागिना||१००||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 13
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে স্নেহাধ্যাযো নাম ত্রযোদশোঽধ্যাযঃ সমাপ্তঃ||১৩||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने स्नेहाध्यायो नाम त्रयोदशोऽध्यायः समाप्तः||१३||
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