Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্বেদাধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
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अथातः स्वेदाध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্বেদাধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ||১|| ইতি হ স্মাহ ভগবানাত্রেযঃ||২||
अथातः स्वेदाध्यायं व्याख्यास्यामः||१|| इति ह स्माह भगवानात्रेयः||२||
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Adhikarana 2 (3-5) · Śloka 5
অতঃ স্বেদাঃ প্রবক্ষ্যন্তে যৈর্যথাবত্প্রযোজিতৈঃ| স্বেদসাধ্যাঃ প্রশাম্যন্তি গদা বাতকফাত্মকাঃ||৩|| স্নেহপূর্বং প্রযুক্তেন স্বেদেনাবজিতেঽনিলে| পুরীষমূত্ররেতাংসি ন সজ্জন্তি কথঞ্চন||৪|| শুষ্কাণ্যপি হি কাষ্ঠানি স্নেহস্বেদোপপাদনৈঃ| নমযন্তি যথান্যাযং কিং পুনর্জীবতো নরান্||৫||
अतः स्वेदाः प्रवक्ष्यन्ते यैर्यथावत्प्रयोजितैः| स्वेदसाध्याः प्रशाम्यन्ति गदा वातकफात्मकाः||३|| स्नेहपूर्वं प्रयुक्तेन स्वेदेनावजितेऽनिले| पुरीषमूत्ररेतांसि न सज्जन्ति कथञ्चन||४|| शुष्काण्यपि हि काष्ठानि स्नेहस्वेदोपपादनैः| नमयन्ति यथान्यायं किं पुनर्जीवतो नरान्||५||
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Adhikarana 3 (6) · Śloka 6
রোগর্তুব্যাধিতাপেক্ষো নাত্যুষ্ণোঽতিমৃদুর্ন চ| দ্রব্যবান্ কল্পিতো দেশে স্বেদঃ কার্যকরো মতঃ||৬||
रोगर्तुव्याधितापेक्षो नात्युष्णोऽतिमृदुर्न च| द्रव्यवान् कल्पितो देशे स्वेदः कार्यकरो मतः||६||
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Adhikarana 4 (7-8) · Śloka 8
ব্যাধৌ শীতে শরীরে চ মহান্ স্বেদো মহাবলে| দুর্বলে দুর্বলঃ স্বেদো মধ্যমে মধ্যমো হিতঃ||৭|| বাতশ্লেষ্মণি বাতে বা কফে বা স্বেদ ইষ্যতে| স্নিগ্ধরূক্ষস্তথা স্নিগ্ধো রূক্ষশ্চাপ্যুপকল্পিতঃ||৮||
व्याधौ शीते शरीरे च महान् स्वेदो महाबले| दुर्बले दुर्बलः स्वेदो मध्यमे मध्यमो हितः||७|| वातश्लेष्मणि वाते वा कफे वा स्वेद इष्यते| स्निग्धरूक्षस्तथा स्निग्धो रूक्षश्चाप्युपकल्पितः||८||
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Adhikarana 5 (9) · Śloka 9
আমাশযগতে বাতে কফে পক্বাশযাশ্রিতে| রূক্ষপূর্বো হিতঃ স্বেদঃ স্নেহপূর্বস্তথৈব চ||৯||
आमाशयगते वाते कफे पक्वाशयाश्रिते| रूक्षपूर्वो हितः स्वेदः स्नेहपूर्वस्तथैव च||९||
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Adhikarana 6 (10) · Śloka 10
বৃষণৌ হৃদযং দৃষ্টী স্বেদযেন্মৃদু নৈব বা| মধ্যমং বঙ্ক্ষণৌ শেষমঙ্গাবযবমিষ্টতঃ||১০||
वृषणौ हृदयं दृष्टी स्वेदयेन्मृदु नैव वा| मध्यमं वङ्क्षणौ शेषमङ्गावयवमिष्टतः||१०||
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Adhikarana 7 (11) · Śloka 11
সুশুদ্ধৈর্নক্তকৈঃ পিণ্ড্যা গোধূমানামথাপি বা| পদ্মোত্পলপলাশৈর্বা স্বেদ্যঃ সংবৃত্য চক্ষুষী||১১||
सुशुद्धैर्नक्तकैः पिण्ड्या गोधूमानामथापि वा| पद्मोत्पलपलाशैर्वा स्वेद्यः संवृत्य चक्षुषी||११||
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Adhikarana 8 (12) · Śloka 12
মুক্তাবলীভিঃ শীতাভিঃ শীতলৈর্ভাজনৈরপি| জলার্দ্রৈর্জলজৈর্হস্তৈঃ স্বিদ্যতো হৃদযং স্পৃশেত্||১২||
मुक्तावलीभिः शीताभिः शीतलैर्भाजनैरपि| जलार्द्रैर्जलजैर्हस्तैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत्||१२||
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Adhikarana 9 (13) · Śloka 13
শীতশূলব্যুপরমে স্তম্ভগৌরবনিগ্রহে| সঞ্জাতে মার্দবে স্বেদে স্বেদনাদ্বিরতির্মতা||১৩||
शीतशूलव्युपरमे स्तम्भगौरवनिग्रहे| सञ्जाते मार्दवे स्वेदे स्वेदनाद्विरतिर्मता||१३||
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Adhikarana 10 (14-15) · Śloka 15
পিত্তপ্রকোপো মূর্চ্ছা চ শরীরসদনং তৃষা| দাহঃ স্বরাঙ্গদৌর্বল্যমতিস্বিন্নস্য লক্ষণম্||১৪|| উক্তস্তস্যাশিতীযে যো গ্রৈষ্মিকঃ সর্বশো বিধিঃ| সোঽতিস্বিন্নস্য কর্তব্যো মধুরঃ স্নিগ্ধশীতলঃ||১৫||
पित्तप्रकोपो मूर्च्छा च शरीरसदनं तृषा| दाहः स्वराङ्गदौर्बल्यमतिस्विन्नस्य लक्षणम्||१४|| उक्तस्तस्याशितीये यो ग्रैष्मिकः सर्वशो विधिः| सोऽतिस्विन्नस्य कर्तव्यो मधुरः स्निग्धशीतलः||१५||
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Adhikarana 11 (16-19) · Śloka 19
কষাযমদ্যনিত্যানাং গর্ভিণ্যা রক্তপিত্তিনাম্| পিত্তিনাং সাতিসারাণাং রূক্ষাণাং মধুমেহিনাম্||১৬|| বিদগ্ধভ্রষ্টব্রধ্নানাং বিষমদ্যবিকারিণাম্| শ্রান্তানাং নষ্টসঞ্জ্ঞানাং স্থূলানাং পিত্তমেহিনাম্||১৭|| তৃষ্যতাং ক্ষুধিতানাং চ ক্রুদ্ধানাং শোচতামপি| কামল্যুদরিণাং চৈব ক্ষতানামাঢ্যরোগিণাম্||১৮|| দুর্বলাতিবিশুষ্কাণামুপক্ষীণৌজসাং তথা| ভিষক্ তৈমিরিকাণাং চ ন স্বেদমবতারযেত্||১৯||
कषायमद्यनित्यानां गर्भिण्या रक्तपित्तिनाम्| पित्तिनां सातिसाराणां रूक्षाणां मधुमेहिनाम्||१६|| विदग्धभ्रष्टब्रध्नानां विषमद्यविकारिणाम्| श्रान्तानां नष्टसञ्ज्ञानां स्थूलानां पित्तमेहिनाम्||१७|| तृष्यतां क्षुधितानां च क्रुद्धानां शोचतामपि| कामल्युदरिणां चैव क्षतानामाढ्यरोगिणाम्||१८|| दुर्बलातिविशुष्काणामुपक्षीणौजसां तथा| भिषक् तैमिरिकाणां च न स्वेदमवतारयेत्||१९||
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Adhikarana 12 (20-24) · Śloka 24
প্রতিশ্যাযে চ কাসে চ হিক্কাশ্বাসেষ্বলাঘবে| কর্ণমন্যাশিরঃশূলে স্বরভেদে গলগ্রহে||২০|| অর্দিতৈকাঙ্গসর্বাঙ্গপক্ষাঘাতে বিনামকে| কোষ্ঠানাহবিবন্ধেষু মূত্রাঘাতে বিজৃম্ভকে||২১|| পার্শ্বপৃষ্ঠকটীকুক্ষিসঙ্গ্রহে গৃধ্রসীষু চ| মূত্রকৃচ্ছ্রে মহত্ত্বে চ মুষ্কযোরঙ্গমর্দকে||২২|| পাদজানূরুজঙ্ঘার্তিসঙ্গ্রহে শ্বযথাবপি| খল্লীষ্বামেষু শীতে চ বেপথৌ বাতকণ্টকে||২৩|| সঙ্কোচাযামশূলেষু স্তম্ভগৌরবসুপ্তিষু | সর্বাঙ্গেষু বিকারেষু স্বেদনং হিতমুচ্যতে||২৪||
प्रतिश्याये च कासे च हिक्काश्वासेष्वलाघवे| कर्णमन्याशिरःशूले स्वरभेदे गलग्रहे||२०|| अर्दितैकाङ्गसर्वाङ्गपक्षाघाते विनामके| कोष्ठानाहविबन्धेषु मूत्राघाते विजृम्भके||२१|| पार्श्वपृष्ठकटीकुक्षिसङ्ग्रहे गृध्रसीषु च| मूत्रकृच्छ्रे महत्त्वे च मुष्कयोरङ्गमर्दके||२२|| पादजानूरुजङ्घार्तिसङ्ग्रहे श्वयथावपि| खल्लीष्वामेषु शीते च वेपथौ वातकण्टके||२३|| सङ्कोचायामशूलेषु स्तम्भगौरवसुप्तिषु | सर्वाङ्गेषु विकारेषु स्वेदनं हितमुच्यते||२४||
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Adhikarana 13 (25-27) · Śloka 27
তিলমাষকুলত্থাম্লঘৃততৈলামিষৌদনৈঃ| পাযসৈঃ কৃশরৈর্মাংসৈঃ পিণ্ডস্বেদং প্রযোজযেত্||২৫|| গোখরোষ্ট্রবরাহাশ্বশকৃদ্ভিঃ সতুষৈর্যবৈঃ| সিকতাপাংশুপাষাণকরীষাযসপূটকৈঃ||২৬|| শ্লৈষ্মিকান্ স্বেদযেত্ পূর্বৈর্বাতিকান্ সমুপাচরেত্| দ্রব্যাণ্যেতানি শস্যন্তে যথাস্বং প্রস্তরেষ্বপি||২৭||
तिलमाषकुलत्थाम्लघृततैलामिषौदनैः| पायसैः कृशरैर्मांसैः पिण्डस्वेदं प्रयोजयेत्||२५|| गोखरोष्ट्रवराहाश्वशकृद्भिः सतुषैर्यवैः| सिकतापांशुपाषाणकरीषायसपूटकैः||२६|| श्लैष्मिकान् स्वेदयेत् पूर्वैर्वातिकान् समुपाचरेत्| द्रव्याण्येतानि शस्यन्ते यथास्वं प्रस्तरेष्वपि||२७||
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Adhikarana 14 (28) · Śloka 28
ভূগৃহেষু চ জেন্তাকেষূষ্ণগর্ভগৃহেষু চ| বিধূমাঙ্গারতপ্তেষু স্বভ্যক্তঃ স্বিদ্যতে সুখম্||২৮||
भूगृहेषु च जेन्ताकेषूष्णगर्भगृहेषु च| विधूमाङ्गारतप्तेषु स्वभ्यक्तः स्विद्यते सुखम्||२८||
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Adhikarana 15 (29-33) · Śloka 33
গ্রাম্যানূপৌদকং মাংসং পযো বস্তশিরস্তথা| বরাহমধ্যপিত্তাসৃক্ স্নেহবত্তিলতণ্ডুলাঃ||২৯|| ইত্যেতানি সমুত্ক্বাথ্য নাডীস্বেদং প্রযোজযেত্| দেশকালবিভাগজ্ঞো যুক্ত্যপেক্ষো ভিষক্তমঃ||৩০|| বারুণামৃতকৈরণ্ডশিগ্রুমূলকসর্ষপৈঃ| বাসাবংশকরঞ্জার্কপত্রৈরশ্মন্তকস্য চ||৩১|| শোভাঞ্জনকসৈরেযমালতীসুরসার্জকৈঃ | পত্রৈরুত্ক্বাথ্য সলিলং নাডীস্বেদং প্রযোজযেত্||৩২|| ভূতীকপঞ্চমূলাভ্যাং সুরযা দধিমস্তুনা| মূত্রৈরম্লৈশ্চ সস্নেহৈর্নাডীস্বেদং প্রযোজযেত্||৩৩||
ग्राम्यानूपौदकं मांसं पयो बस्तशिरस्तथा| वराहमध्यपित्तासृक् स्नेहवत्तिलतण्डुलाः||२९|| इत्येतानि समुत्क्वाथ्य नाडीस्वेदं प्रयोजयेत्| देशकालविभागज्ञो युक्त्यपेक्षो भिषक्तमः||३०|| वारुणामृतकैरण्डशिग्रुमूलकसर्षपैः| वासावंशकरञ्जार्कपत्रैरश्मन्तकस्य च||३१|| शोभाञ्जनकसैरेयमालतीसुरसार्जकैः | पत्रैरुत्क्वाथ्य सलिलं नाडीस्वेदं प्रयोजयेत्||३२|| भूतीकपञ्चमूलाभ्यां सुरया दधिमस्तुना| मूत्रैरम्लैश्च सस्नेहैर्नाडीस्वेदं प्रयोजयेत्||३३||
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Adhikarana 16 (34) · Śloka 34
এত এব চ নির্যূহাঃ প্রযোজ্যা জলকোষ্ঠকে| স্বেদনার্থং ঘৃতক্ষীরতৈলকোষ্ঠাংশ্চ কারযেত্||৩৪||
एत एव च निर्यूहाः प्रयोज्या जलकोष्ठके| स्वेदनार्थं घृतक्षीरतैलकोष्ठांश्च कारयेत्||३४||
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Adhikarana 17 (35-37) · Śloka 37
গোধূমশকলৈশ্চূর্ণৈর্যবানামম্লসংযুতৈঃ| সস্নেহকিণ্বলবণৈরুপনাহঃ প্রশস্যতে||৩৫|| গন্ধৈঃ সুরাযাঃ কিণ্বেন জীবন্ত্যা শতপুষ্পযা| উমযা কুষ্ঠতৈলাভ্যাং যুক্তযা চোপনাহযেত্||৩৬|| চর্মভিশ্চোপনদ্ধব্যঃ সলোমভিরপূতিভিঃ| উষ্ণবীর্যৈরলাভে তু কৌশেযাবিকশাটকৈঃ||৩৭||
गोधूमशकलैश्चूर्णैर्यवानामम्लसंयुतैः| सस्नेहकिण्वलवणैरुपनाहः प्रशस्यते||३५|| गन्धैः सुरायाः किण्वेन जीवन्त्या शतपुष्पया| उमया कुष्ठतैलाभ्यां युक्तया चोपनाहयेत्||३६|| चर्मभिश्चोपनद्धव्यः सलोमभिरपूतिभिः| उष्णवीर्यैरलाभे तु कौशेयाविकशाटकैः||३७||
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Adhikarana 18 (38) · Śloka 38
রাত্রৌ বদ্ধং দিবা মুঞ্চেন্মুঞ্চেদ্রাত্রৌ দিবা কৃতম্| বিদাহপরিহারার্থং, স্যাত্ প্রকর্ষস্তু শীতলে||৩৮||
रात्रौ बद्धं दिवा मुञ्चेन्मुञ्चेद्रात्रौ दिवा कृतम्| विदाहपरिहारार्थं, स्यात् प्रकर्षस्तु शीतले||३८||
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Adhikarana 19 (39-40) · Śloka 40
সঙ্করঃ প্রস্তরো নাডী পরিষেকোঽবগাহনম্| জেন্তাকোঽশ্মঘনঃ কর্ষূঃ কুটী ভূঃ কুম্ভিকৈব চ||৩৯|| কূপো হোলাক ইত্যেতে স্বেদযন্তি ত্রযোদশ| তান্ যথাবত্ প্রবক্ষ্যামি সর্বানেবানুপূর্বশঃ||৪০||
सङ्करः प्रस्तरो नाडी परिषेकोऽवगाहनम्| जेन्ताकोऽश्मघनः कर्षूः कुटी भूः कुम्भिकैव च||३९|| कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश| तान् यथावत् प्रवक्ष्यामि सर्वानेवानुपूर्वशः||४०||
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Adhikarana 20 (41) · Śloka 41
তত্র বস্ত্রান্তরিতৈরবস্ত্রান্তরিতৈর্বা পিণ্ডৈর্যথোক্তৈরুপস্বেদনং সঙ্করস্বেদ ইতি বিদ্যাত্||৪১||
तत्र वस्त्रान्तरितैरवस्त्रान्तरितैर्वा पिण्डैर्यथोक्तैरुपस्वेदनं सङ्करस्वेद इति विद्यात्||४१||
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Adhikarana 21 (42) · Śloka 42
শূকশমীধান্যপুলাকানাং বেশবারপাযসকৃশরোত্কারিকাদীনাং বা প্রস্তরে কৌশেযাবিকোত্তরপ্রচ্ছদেপঞ্চাঙ্গুলোরুবূকার্কপত্রপ্রচ্ছদে বা স্বভ্যক্তসর্বগাত্রস্য শযানস্যোপস্বেদনং প্রস্তরস্বেদ ইতি বিদ্যাত্||৪২||
शूकशमीधान्यपुलाकानां वेशवारपायसकृशरोत्कारिकादीनां वा प्रस्तरे कौशेयाविकोत्तरप्रच्छदेपञ्चाङ्गुलोरुबूकार्कपत्रप्रच्छदे वा स्वभ्यक्तसर्वगात्रस्य शयानस्योपस्वेदनं प्रस्तरस्वेद इति विद्यात्||४२||
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Adhikarana 22 (43) · Śloka 43
স্বেদনদ্রব্যাণাং পুনর্মূলফলপত্রশুঙ্গাদীনাং মৃগশকুনপিশিতশিরস্পদাদীনামুষ্ণস্বভাবানাং বা যথার্হমম্ললবণস্নেহোপসংহিতানাং মূত্রক্ষীরাদীনাং বা কুম্ভ্যাং বাষ্পমনুদ্বমন্ত্যামুত্ক্বথিতানাং নাড্যা শরেষীকাবংশদলকরঞ্জার্কপত্রান্যতমকৃতযা গজাগ্রহস্তসংস্থানযা ব্যামদীর্ঘযা ব্যামার্ধদীর্ঘযা বা ব্যামচতুর্ভাগাষ্টভাগমূলাগ্রপরিণাহস্রোতসা সর্বতো বাতহরপত্রসংবৃতচ্ছিদ্রযা দ্বিস্ত্রির্বা বিনামিতযা বাতহরসিদ্ধস্নেহাভ্যক্তগাত্রো বাষ্পমুপহরেত্; বাষ্পো হ্যনৃজুগামী বিহতচণ্ডবেগস্ত্বচমবিদহন্ সুখং স্বেদযতীতি নাডীস্বেদঃ||৪৩||
स्वेदनद्रव्याणां पुनर्मूलफलपत्रशुङ्गादीनां मृगशकुनपिशितशिरस्पदादीनामुष्णस्वभावानां वा यथार्हमम्ललवणस्नेहोपसंहितानां मूत्रक्षीरादीनां वा कुम्भ्यां बाष्पमनुद्वमन्त्यामुत्क्वथितानां नाड्या शरेषीकावंशदलकरञ्जार्कपत्रान्यतमकृतया गजाग्रहस्तसंस्थानया व्यामदीर्घया व्यामार्धदीर्घया वा व्यामचतुर्भागाष्टभागमूलाग्रपरिणाहस्रोतसा सर्वतो वातहरपत्रसंवृतच्छिद्रया द्विस्त्रिर्वा विनामितया वातहरसिद्धस्नेहाभ्यक्तगात्रो बाष्पमुपहरेत्; बाष्पो ह्यनृजुगामी विहतचण्डवेगस्त्वचमविदहन् सुखं स्वेदयतीति नाडीस्वेदः||४३||
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Adhikarana 23 (44) · Śloka 44
বাতিকোত্তরবাতিকানাং পুনর্মূলাদীনামুত্ক্বাথৈঃ সুখোষ্ণৈঃ কুম্ভীর্বর্ষণিকাঃ প্রনাডীর্বা পূরযিত্বা যথার্হসিদ্ধস্নেহাভ্যক্তগাত্রং বস্ত্রাবচ্ছন্নং পরিষেচযেদিতি পরিষেকঃ||৪৪||
वातिकोत्तरवातिकानां पुनर्मूलादीनामुत्क्वाथैः सुखोष्णैः कुम्भीर्वर्षणिकाः प्रनाडीर्वा पूरयित्वा यथार्हसिद्धस्नेहाभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं परिषेचयेदिति परिषेकः||४४||
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Adhikarana 24 (45) · Śloka 45
বাতহরোত্ক্বাথক্ষীরতৈলঘৃতপিশিতরসোষ্ণসলিলকোষ্ঠকাবগাহস্তু যথোক্ত এবাবগাহঃ||৪৫||
वातहरोत्क्वाथक्षीरतैलघृतपिशितरसोष्णसलिलकोष्ठकावगाहस्तु यथोक्त एवावगाहः||४५||
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Adhikarana 25 (46) · Śloka 46
অথ জেন্তাকং চিকীর্ষুর্ভূমিং পরীক্ষেত- তত্র পূর্বস্যাং দিশ্যুত্তরস্যাং বা গুণবতি প্রশস্তে ভূমিভাগে কৃষ্ণমধুরমৃত্তিকে সুবর্ণমৃত্তিকে বা পরীবাপপুষ্করিণ্যাদীনাং জলাশযানামন্যতমস্য কূলে দক্ষিণে পশ্চিমে বা সূপতীর্থে সমসুবিভক্তভূমিভাগে সপ্তাষ্টৌ বাঽরত্নীরুপক্রম্যোদকাত্ প্রাঙ্মুখমুদঙ্মুখং বাঽভিমুখতীর্থং কূটাগারং কারযেত্, উত্সেধবিস্তারতঃ পরমরত্নীঃ ষোডশ, সমন্তাত্ সুবৃত্তং মৃত্কর্মসম্পন্নমনেকবাতাযনম্; অস্য কূটাগারস্যান্তঃ সমন্ততো ভিত্তিমরত্নিবিস্তারোত্সেধাং পিণ্ডিকাং কারযেদাকপাটাত্, মধ্যে চাস্য কূটাগারস্য চতুষ্কিষ্কুমাত্রং পুরুষপ্রমাণং মৃন্মযং কন্দুসংস্থানং বহুসূক্ষ্মচ্ছিদ্রমঙ্গারকোষ্ঠকস্তম্ভং সপিধানং কারযেত্; তং চ খাদিরাণামাশ্বকর্ণাদীনাং বা কাষ্ঠানাং পূরযিত্বা প্রদীপযেত্; স যদা জানীযাত্ সাধু দগ্ধানি কাষ্ঠানি গতধূমান্যবতপ্তং চ কেবলমগ্নিনা তদগ্নিগৃহং স্বেদযোগ্যেন চোষ্মণা যুক্তমিতি, তত্রৈনং পুরুষং বাতহরাভ্যক্তগাত্রং বস্ত্রাবচ্ছন্নং প্রবেশযেত্, প্রবেশযংশ্চৈনমনুশিষ্যাত্- সৌম্য! প্রবিশ কল্যাণাযারোগ্যায চেতি, প্রবিশ্য চৈনাং পিণ্ডিকামধিরুহ্য পার্শ্বাপরপার্শ্বাভ্যাং যথাসুখং শযীথাঃ, ন চ ত্বযা স্বেদমূর্চ্ছাপরীতেনাপি সতা পিণ্ডিকৈষা বিমোক্তব্যাঽঽপ্রাণোচ্ছ্বাসাত্, ভ্রশ্যমানো হ্যতঃ পিণ্ডিবকাবকাশাদ্দ্বারমনধিগচ্ছন্ স্বেদমূর্চ্ছাপরীততযা সদ্যঃ প্রাণাঞ্জহ্যাঃ, তস্মাত্ পিণ্ডিকামেনাং ন কথঞ্চন মুঞ্চেথাঃ; ত্বং যদা জানীযাঃ- বিগতাভিষ্যন্দমাত্মানং সম্যক্প্রস্রুতস্বেদপিচ্ছং সর্বস্রোতোবিমুক্তং লঘূভূতমপগতবিবন্ধস্তম্ভসুপ্তিবেদনাগৌরবমিতি, ততস্তাং পিণ্ডিকামনুসরন্ দ্বারং প্রপদ্যেথাঃ, নিষ্ক্রম্য চ ন সহসা চক্ষুষোঃ পরিপালনার্থং শীতোদকমুপস্পৃশেথাঃ, অপগতসন্তাপক্লমস্তু মুহূর্তাত্ সুখোষ্ণেন বারিণা যথান্যাযং পরিষিক্তোঽশ্নীযাঃ; ইতি জেন্তাকস্বেদঃ||৪৬||
अथ जेन्ताकं चिकीर्षुर्भूमिं परीक्षेत- तत्र पूर्वस्यां दिश्युत्तरस्यां वा गुणवति प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमधुरमृत्तिके सुवर्णमृत्तिके वा परीवापपुष्करिण्यादीनां जलाशयानामन्यतमस्य कूले दक्षिणे पश्चिमे वा सूपतीर्थे समसुविभक्तभूमिभागे सप्ताष्टौ वाऽरत्नीरुपक्रम्योदकात् प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वाऽभिमुखतीर्थं कूटागारं कारयेत्, उत्सेधविस्तारतः परमरत्नीः षोडश, समन्तात् सुवृत्तं मृत्कर्मसम्पन्नमनेकवातायनम्; अस्य कूटागारस्यान्तः समन्ततो भित्तिमरत्निविस्तारोत्सेधां पिण्डिकां कारयेदाकपाटात्, मध्ये चास्य कूटागारस्य चतुष्किष्कुमात्रं पुरुषप्रमाणं मृन्मयं कन्दुसंस्थानं बहुसूक्ष्मच्छिद्रमङ्गारकोष्ठकस्तम्भं सपिधानं कारयेत्; तं च खादिराणामाश्वकर्णादीनां वा काष्ठानां पूरयित्वा प्रदीपयेत्; स यदा जानीयात् साधु दग्धानि काष्ठानि गतधूमान्यवतप्तं च केवलमग्निना तदग्निगृहं स्वेदयोग्येन चोष्मणा युक्तमिति, तत्रैनं पुरुषं वातहराभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं प्रवेशयेत्, प्रवेशयंश्चैनमनुशिष्यात्- सौम्य! प्रविश कल्याणायारोग्याय चेति, प्रविश्य चैनां पिण्डिकामधिरुह्य पार्श्वापरपार्श्वाभ्यां यथासुखं शयीथाः, न च त्वया स्वेदमूर्च्छापरीतेनापि सता पिण्डिकैषा विमोक्तव्याऽऽप्राणोच्छ्वासात्, भ्रश्यमानो ह्यतः पिण्डिवकावकाशाद्द्वारमनधिगच्छन् स्वेदमूर्च्छापरीततया सद्यः प्राणाञ्जह्याः, तस्मात् पिण्डिकामेनां न कथञ्चन मुञ्चेथाः; त्वं यदा जानीयाः- विगताभिष्यन्दमात्मानं सम्यक्प्रस्रुतस्वेदपिच्छं सर्वस्रोतोविमुक्तं लघूभूतमपगतविबन्धस्तम्भसुप्तिवेदनागौरवमिति, ततस्तां पिण्डिकामनुसरन् द्वारं प्रपद्येथाः, निष्क्रम्य च न सहसा चक्षुषोः परिपालनार्थं शीतोदकमुपस्पृशेथाः, अपगतसन्तापक्लमस्तु मुहूर्तात् सुखोष्णेन वारिणा यथान्यायं परिषिक्तोऽश्नीयाः; इति जेन्ताकस्वेदः||४६||
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Adhikarana 26 (47-49) · Śloka 50
শযানস্য প্রমাণেন ঘনামশ্মমযীং শিলাম্| তাপযিত্বা মারুতঘ্নৈর্দারুভিঃ সম্প্রদীপিতৈঃ||৪৭|| ব্যপোজ্ঝ্য সর্বানঙ্গারান্ প্রোক্ষ্য চৈবোষ্ণবারিণা| তাং শিলামথ কুর্বীত কৌষেযাবিকসংস্তরাম্||৪৮|| তস্যাং স্বভ্যক্তসর্বাঙ্গঃ স্বপন্ স্বিদ্যতি না সুখম্| কৌরবাজিনকৌষেযপ্রাবারাদ্যৈঃ সুসংবৃতঃ ||৪৯|| ইত্যক্তোঽশ্মঘনস্বেদঃ,...|৫০|
शयानस्य प्रमाणेन घनामश्ममयीं शिलाम्| तापयित्वा मारुतघ्नैर्दारुभिः सम्प्रदीपितैः||४७|| व्यपोज्झ्य सर्वानङ्गारान् प्रोक्ष्य चैवोष्णवारिणा| तां शिलामथ कुर्वीत कौषेयाविकसंस्तराम्||४८|| तस्यां स्वभ्यक्तसर्वाङ्गः स्वपन् स्विद्यति ना सुखम्| कौरवाजिनकौषेयप्रावाराद्यैः सुसंवृतः ||४९|| इत्यक्तोऽश्मघनस्वेदः,...|५०|
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Adhikarana 27 (50-51) · Śloka 51
...কর্ষূস্বেদঃ প্রবক্ষ্যতে| খানযেচ্ছযনস্যাধঃ কর্ষূং স্থানবিভাগবিত্||৫০|| দীপ্তৈরধূমৈরঙ্গারৈস্তাং কর্ষূং পূরযেত্ততঃ| তস্যামুপরি শয্যাযাং স্বপন্ স্বিদ্যতি না সুখম্||৫১||
...कर्षूस्वेदः प्रवक्ष्यते| खानयेच्छयनस्याधः कर्षूं स्थानविभागवित्||५०|| दीप्तैरधूमैरङ्गारैस्तां कर्षूं पूरयेत्ततः| तस्यामुपरि शय्यायां स्वपन् स्विद्यति ना सुखम्||५१||
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Adhikarana 28 (52-55) · Śloka 55
অনত্যুত্সেধবিস্তারাং বৃত্তাকারামলোচনাম্| ঘনভিত্তিং কুটীং কৃত্বা কুষ্ঠাদ্যৈঃ সম্প্রলেপযেত্||৫২|| কুটীমধ্যে ভিষক্ শয্যাং স্বাস্তীর্ণামুপকল্পযেত্| প্রাবারাজিনকৌশেযকুথকম্বলগোলকৈঃ||৫৩|| হসন্তিকাভিরঙ্গারপূর্ণাভিস্তাং চ সর্বশঃ| পরিবার্যান্তরারোহেদভ্যক্তঃ স্বিদ্যতে সুখম্||৫৪|| য এবাশ্মঘনস্বেদবিধির্ভূমৌ স এব তু| প্রশস্তাযাং নিবাতাযাং সমাযামুপদিশ্যতে||৫৫||
अनत्युत्सेधविस्तारां वृत्ताकारामलोचनाम्| घनभित्तिं कुटीं कृत्वा कुष्ठाद्यैः सम्प्रलेपयेत्||५२|| कुटीमध्ये भिषक् शय्यां स्वास्तीर्णामुपकल्पयेत्| प्रावाराजिनकौशेयकुथकम्बलगोलकैः||५३|| हसन्तिकाभिरङ्गारपूर्णाभिस्तां च सर्वशः| परिवार्यान्तरारोहेदभ्यक्तः स्विद्यते सुखम्||५४|| य एवाश्मघनस्वेदविधिर्भूमौ स एव तु| प्रशस्तायां निवातायां समायामुपदिश्यते||५५||
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Adhikarana 29 (56-58) · Śloka 58
কুম্ভীং বাতহরক্বাথপূর্ণাং ভূমৌ নিখানযেত্| অর্ধভাগং ত্রিভাগং বা শযনং তত্র চোপরি||৫৬|| স্থাপযেদাসনং বাঽপি নাতিসান্দ্রপরিচ্ছদম্| অথ কুম্ভ্যাং সুসন্তপ্তান্ প্রক্ষিপেদযসো গুডান্||৫৭|| পাষাণান্ বোষ্মণা তেন তত্স্থঃ স্বিদ্যতি না সুখম্| সুসংবৃতাঙ্গঃ স্বভ্যক্তঃ স্নেহৈরনিলনাশনৈঃ||৫৮||
कुम्भीं वातहरक्वाथपूर्णां भूमौ निखानयेत्| अर्धभागं त्रिभागं वा शयनं तत्र चोपरि||५६|| स्थापयेदासनं वाऽपि नातिसान्द्रपरिच्छदम्| अथ कुम्भ्यां सुसन्तप्तान् प्रक्षिपेदयसो गुडान्||५७|| पाषाणान् वोष्मणा तेन तत्स्थः स्विद्यति ना सुखम्| सुसंवृताङ्गः स्वभ्यक्तः स्नेहैरनिलनाशनैः||५८||
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Adhikarana 30 (59-60) · Śloka 60
কূপং শযনবিস্তারং দ্বিগুণং চাপি বেধতঃ| দেশে নিবাতে শস্তে চ কুর্যাদন্তঃসুমার্জিতম্||৫৯|| হস্ত্যশ্বগোখরোষ্ট্রাণাং করীষৈর্দগ্ধপূরিতে| স্ববচ্ছন্নঃ সুসংস্তীর্ণেঽভ্যক্তঃ স্বিদ্যতি না সুখম্||৬০||
कूपं शयनविस्तारं द्विगुणं चापि वेधतः| देशे निवाते शस्ते च कुर्यादन्तःसुमार्जितम्||५९|| हस्त्यश्वगोखरोष्ट्राणां करीषैर्दग्धपूरिते| स्ववच्छन्नः सुसंस्तीर्णेऽभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम्||६०||
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Adhikarana 31 (61-63) · Śloka 63
ধীতীকাং তু করীষাণাং যথোক্তানাং প্রদীপযেত্| শযনান্তঃপ্রমাণেন শয্যামুপরি তত্র চ||৬১|| সুদগ্ধাযাং বিধূমাযাং যথোক্তামুপকল্পযেত্| স্ববচ্ছন্নঃ স্বপংস্তত্রাভ্যক্তঃ স্বিদ্যতি না সুখম্||৬২|| হোলাকস্বেদ ইত্যেষ সুখঃ প্রোক্তো মহর্ষিণা| ইতি ত্রযোদশবিধঃ স্বেদোঽগ্নিগুণসংশ্রযঃ||৬৩||
धीतीकां तु करीषाणां यथोक्तानां प्रदीपयेत्| शयनान्तःप्रमाणेन शय्यामुपरि तत्र च||६१|| सुदग्धायां विधूमायां यथोक्तामुपकल्पयेत्| स्ववच्छन्नः स्वपंस्तत्राभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम्||६२|| होलाकस्वेद इत्येष सुखः प्रोक्तो महर्षिणा| इति त्रयोदशविधः स्वेदोऽग्निगुणसंश्रयः||६३||
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Adhikarana 32 (64) · Śloka 65
ব্যাযাম উষ্ণসদনং গুরুপ্রাবরণং ক্ষুধা| বহুপানং ভযক্রোধাবুপনাহাহবাতপাঃ||৬৪|| স্বেদযন্তি দশৈতানি নরমগ্নিগুণাদৃতে|৬৫|
व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा| बहुपानं भयक्रोधावुपनाहाहवातपाः||६४|| स्वेदयन्ति दशैतानि नरमग्निगुणादृते|६५|
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Adhikarana 33 (65-66) · Śloka 66
ইত্যুক্তো দ্বিবিধঃ স্বেদঃ সংযুক্তোঽগ্নিগুণৈর্ন চ||৬৫|| একাঙ্গসর্বাঙ্গগতঃ স্নিগ্ধো রূক্ষস্তথৈব চ| ইত্যেতত্ত্রিবিধং দ্বন্দ্বং স্বেদমুদ্দিশ্য কীর্তিতম্||৬৬||
इत्युक्तो द्विविधः स्वेदः संयुक्तोऽग्निगुणैर्न च||६५|| एकाङ्गसर्वाङ्गगतः स्निग्धो रूक्षस्तथैव च| इत्येतत्त्रिविधं द्वन्द्वं स्वेदमुद्दिश्य कीर्तितम्||६६||
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Adhikarana 34 (67) · Śloka 67
স্নিগ্ধঃ স্বেদৈরুপক্রম্যঃ স্বিন্নঃ পথ্যাশনো ভবেত্| তদহঃ স্বিন্নগাত্রস্তু ব্যাযামং বর্জযেন্নরঃ||৬৭||
स्निग्धः स्वेदैरुपक्रम्यः स्विन्नः पथ्याशनो भवेत्| तदहः स्विन्नगात्रस्तु व्यायामं वर्जयेन्नरः||६७||
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Adhikarana 35 (68-71) · Śloka 71
তত্র শ্লোকাঃ- স্বেদো যথা কার্যকরো হিতো যেভ্যশ্চ যদ্বিধঃ| যত্র দেশে যথা যোগ্যো দেশো রক্ষ্যশ্চ যো যথা||৬৮|| স্বিন্নাতিস্বিন্নরূপাণি তথাঽতিস্বিন্নভেষজম্| অস্বেদ্যাঃ স্বেদযোগ্যাশ্চ স্বেদদ্রব্যাণি কল্পনা||৬৯|| ত্রযোদশবিধঃ স্বেদো বিনা দশবিধোঽগ্নিনা| সঙ্গ্রহেণ চ ষট্ স্বেদাঃ স্বেদাধ্যাযে নিদর্শিতাঃ||৭০|| স্বেদাধিকারে যদ্বাচ্যমুক্তমেতন্মহর্ষিণা | শিষ্যৈস্তু প্রতিপত্তব্যমুপদেষ্টা পুনর্বসুঃ||৭১||
तत्र श्लोकाः- स्वेदो यथा कार्यकरो हितो येभ्यश्च यद्विधः| यत्र देशे यथा योग्यो देशो रक्ष्यश्च यो यथा||६८|| स्विन्नातिस्विन्नरूपाणि तथाऽतिस्विन्नभेषजम्| अस्वेद्याः स्वेदयोग्याश्च स्वेदद्रव्याणि कल्पना||६९|| त्रयोदशविधः स्वेदो विना दशविधोऽग्निना| सङ्ग्रहेण च षट् स्वेदाः स्वेदाध्याये निदर्शिताः||७०|| स्वेदाधिकारे यद्वाच्यमुक्तमेतन्महर्षिणा | शिष्यैस्तु प्रतिपत्तव्यमुपदेष्टा पुनर्वसुः||७१||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 14
ইত্যগ্নিবেশকৃতে তন্ত্রে চরকপ্রতিসংস্কৃতে শ্লোকস্থানে স্বেদাধ্যাযো নাম চতুর্দশোঽধ্যাযঃ||১৪||
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते श्लोकस्थाने स्वेदाध्यायो नाम चतुर्दशोऽध्यायः||१४||
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