Adhikarana kAsasya nidAnasamprAptipUrvakaM lakShaNam (1-2) · Śloka 2
অথ কাসনিদানম্ |
ধূমোপঘাতাদ্রসতস্তথৈব ব্যাযামরূক্ষান্ননিষেবণাচ্চ |
বিমার্গগত্বাচ্চ হি ভোজনস্য বেগাবরোধাত্ ক্ষবথোস্তথৈব ||১||
প্রাণো হ্যুদানানুগতঃ প্রদুষ্টঃ স ভিন্নকাংস্যস্বনতুল্যঘোষঃ |
নিরেতি বক্ত্রাত্ সহসা সদোষো মনীষিভিঃ কাস ইতি প্রদিষ্টঃ ||২||
(সু. উ. তং. অ. ৫২) |
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अथ कासनिदानम् |
धूमोपघाताद्रसतस्तथैव व्यायामरूक्षान्ननिषेवणाच्च |
विमार्गगत्वाच्च हि भोजनस्य वेगावरोधात् क्षवथोस्तथैव ||१||
प्राणो ह्युदानानुगतः प्रदुष्टः स भिन्नकांस्यस्वनतुल्यघोषः |
निरेति वक्त्रात् सहसा सदोषो मनीषिभिः कास इति प्रदिष्टः ||२||
(सु. उ. तं. अ. ५२) |
Adhikarana kAsasa~gkhyA (3) · Śloka 3
পঞ্চ কাসাঃ স্মৃতা বাতপিত্তশ্লেষ্মক্ষতক্ষযৈঃ |
ক্ষযাযোপেক্ষিতাঃ সর্বে বলিনশ্চোত্তরোত্তরম্ ||৩||
(অ. হৃ. নি. অ. ৩) |
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पञ्च कासाः स्मृता वातपित्तश्लेष्मक्षतक्षयैः |
क्षयायोपेक्षिताः सर्वे बलिनश्चोत्तरोत्तरम् ||३||
(अ. हृ. नि. अ. ३) |
Adhikarana kAsapUrvarUpam (4) · Śloka 4
পূর্বরূপং ভবেত্তেষাং শূকপূর্ণগলাস্যতা |
কণ্ঠে কণ্ডূশ্চ ভোজ্যানামবরোধশ্চ জাযতে ||৪||
(চ. চি. অ. ২২) |
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पूर्वरूपं भवेत्तेषां शूकपूर्णगलास्यता |
कण्ठे कण्डूश्च भोज्यानामवरोधश्च जायते ||४||
(च. चि. अ. २२) |
Adhikarana vAtikakAsalakShaNam (5) · Śloka 5
হৃচ্ছঙ্খমূর্ধোদরপার্শ্বশূলী ক্ষামাননঃ ক্ষীণবলস্বরৌজাঃ |
প্রসক্তবেগস্তু সমীরণেন ভিন্নস্বরঃ কাসতি শুষ্কমেব ||৫||
(সু. উ. তং. অ. ৫২) |
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हृच्छङ्खमूर्धोदरपार्श्वशूली क्षामाननः क्षीणबलस्वरौजाः |
प्रसक्तवेगस्तु समीरणेन भिन्नस्वरः कासति शुष्कमेव ||५||
(सु. उ. तं. अ. ५२) |
Adhikarana paittikakAsalakShaNam (6) · Śloka 6
উরোবিদাহজ্বরবক্ত্রশোষৈরভ্যর্দিতস্তিক্তমুখস্তৃষার্তঃ |
পিত্তেন পীতানি বমেত্ কটূনি কাসেত্ সপাণ্ডুঃ পরিদহ্যমানঃ ||৬||
(সু. উ. তং. অ. ৫২) |
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उरोविदाहज्वरवक्त्रशोषैरभ्यर्दितस्तिक्तमुखस्तृषार्तः |
पित्तेन पीतानि वमेत् कटूनि कासेत् सपाण्डुः परिदह्यमानः ||६||
(सु. उ. तं. अ. ५२) |
Adhikarana kaphajakAsalakShaNam (7) · Śloka 7
প্রলিপ্যমানেন মুখেন সীদন্ শিরোরুজার্তঃ কফপূর্ণদেহঃ |
অভক্তরুগ্গৌরবকণ্ডুযুক্তঃ কাসেদ্ভৃশং সান্দ্রকফঃ কফেন ||৭||
(সু. উ. তং. অ. ৫২) |
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प्रलिप्यमानेन मुखेन सीदन् शिरोरुजार्तः कफपूर्णदेहः |
अभक्तरुग्गौरवकण्डुयुक्तः कासेद्भृशं सान्द्रकफः कफेन ||७||
(सु. उ. तं. अ. ५२) |
Adhikarana kShatajakAsalakShaNam (8-11) · Śloka 11
অতিব্যবাযভারাধ্বযুদ্ধাশ্বগজবিগ্রহৈঃ |
রূক্ষস্যোরঃক্ষতং বাযুর্গৃহীত্বা কাসমাচরেত্ ||৮||
স পূর্বং কাসতে শুষ্কং ততঃ ষ্ঠীবেত্ সশোণিতম্ |
কণ্ঠেন রুজতাঽত্যর্থং বিরুগ্ণেনেব চোরসা ||৯||
সূচীভিরিব তীক্ষ্ণাভিস্তুদ্যমানেন শূলিনা |
দুঃখস্পর্শেন শূলেন ভেদপীডাভিতাপিনা ||১০||
পর্বভেদজ্বরশ্বাসতৃষ্ণাবৈস্বর্যপীডিতঃ |
পারাবত ইবাকূজন্ কাসবেগাত্ ক্ষতোদ্ভবাত্ ||১১||
(সু. উ. তং. অ. ৫২) |
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अतिव्यवायभाराध्वयुद्धाश्वगजविग्रहैः |
रूक्षस्योरःक्षतं वायुर्गृहीत्वा कासमाचरेत् ||८||
स पूर्वं कासते शुष्कं ततः ष्ठीवेत् सशोणितम् |
कण्ठेन रुजताऽत्यर्थं विरुग्णेनेव चोरसा ||९||
सूचीभिरिव तीक्ष्णाभिस्तुद्यमानेन शूलिना |
दुःखस्पर्शेन शूलेन भेदपीडाभितापिना ||१०||
पर्वभेदज्वरश्वासतृष्णावैस्वर्यपीडितः |
पारावत इवाकूजन् कासवेगात् क्षतोद्भवात् ||११||
(सु. उ. तं. अ. ५२) |
Adhikarana kShayajakAsalakShaNam (12-13) · Śloka 13
বিষমাসাত্ম্যভোজ্যাতিব্যবাযাদ্বেগনিগ্রহাত্ |
ঘৃণিনাং শোচতাং নৄণাং ব্যাপন্নেঽগ্নৌ ত্রযো মলাঃ |
কুপিতাঃ ক্ষযজং কাসং কুর্যুর্দেহক্ষযপ্রদম্ ||১২||
স গাত্রশূলজ্বরদাহমোহান্ প্রাণক্ষযং চোপলভেত কাসী |
শুষ্যন্ বিনিষ্ঠীবতি দুর্বলস্তু প্রক্ষীণমাংসো রুধিরং সপূযম্ |
তং সর্বলিঙ্গং ভৃশদুশ্চিকিত্স্যং চিকিত্সিতজ্ঞাঃ ক্ষযজং বদন্তি ||১৩||
(সু. উ. তং. অ. ৫২) |
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विषमासात्म्यभोज्यातिव्यवायाद्वेगनिग्रहात् |
घृणिनां शोचतां नॄणां व्यापन्नेऽग्नौ त्रयो मलाः |
कुपिताः क्षयजं कासं कुर्युर्देहक्षयप्रदम् ||१२||
स गात्रशूलज्वरदाहमोहान् प्राणक्षयं चोपलभेत कासी |
शुष्यन् विनिष्ठीवति दुर्बलस्तु प्रक्षीणमांसो रुधिरं सपूयम् |
तं सर्वलिङ्गं भृशदुश्चिकित्स्यं चिकित्सितज्ञाः क्षयजं वदन्ति ||१३||
(सु. उ. तं. अ. ५२) |
Adhikarana kAsasya sAdhyatvAdilakShaNam (14-15) · Śloka 15
ইত্যেষ ক্ষযজঃ কাসঃ ক্ষীণানাং দেহনাশনঃ |
সাধ্যো বলবতাং বা স্যাদ্যাপ্যস্ত্বেবং ক্ষতোত্থিতঃ ||১৪||
নবৌ কদাচিত্সিধ্যেতামপি পাদগুণান্বিতৌ |
স্থবিরাণাং জরাকাসঃ সর্বো যাপ্যঃ প্রকীর্তিতঃ |
ত্রীন্ পূর্বান্ সাধযেত্ সাধ্যান্ পথ্যৈর্যাপ্যাংস্তু যাপযেত্ ||১৫||
(সু. উ. তং. অ. ৫২) |
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इत्येष क्षयजः कासः क्षीणानां देहनाशनः |
साध्यो बलवतां वा स्याद्याप्यस्त्वेवं क्षतोत्थितः ||१४||
नवौ कदाचित्सिध्येतामपि पादगुणान्वितौ |
स्थविराणां जराकासः सर्वो याप्यः प्रकीर्तितः |
त्रीन् पूर्वान् साधयेत् साध्यान् पथ्यैर्याप्यांस्तु यापयेत् ||१५||
(सु. उ. तं. अ. ५२) |
Adhikarana puShpikA · Śloka 11
ইতি শ্রীমাধবকরবিরচিতে মাধবনিদানে কাসনিদানং সমাপ্তম্ ||১১||
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इति श्रीमाधवकरविरचिते माधवनिदाने कासनिदानं समाप्तम् ||११||