Adhikarana rAjayakShmanidAnam (1) · Śloka 1
অথ রাজযক্ষ্মক্ষতক্ষীণনিদানম্ |
বেগরোধাত্ ক্ষযাচ্চৈব সাহসাদ্বিষমাশনাত্ |
ত্রিদোষো জাযতে যক্ষ্মা গদো হেতুচতুষ্টযাত্ ||১||
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अथ राजयक्ष्मक्षतक्षीणनिदानम् |
वेगरोधात् क्षयाच्चैव साहसाद्विषमाशनात् |
त्रिदोषो जायते यक्ष्मा गदो हेतुचतुष्टयात् ||१||
Adhikarana rAjayakShmasamprAptiH (2) · Śloka 2
কফপ্রধানৈর্দোষৈস্তু রুদ্ধেষু রসবর্ত্মসু |
অতিব্যবাযিনো বাঽপি ক্ষীণে রেতস্যনন্তরাঃ |
ক্ষীযন্তে ধাতবঃ সর্বে ততঃ শুষ্যতি মানবঃ ||২||
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कफप्रधानैर्दोषैस्तु रुद्धेषु रसवर्त्मसु |
अतिव्यवायिनो वाऽपि क्षीणे रेतस्यनन्तराः |
क्षीयन्ते धातवः सर्वे ततः शुष्यति मानवः ||२||
Adhikarana rAjayakShmapUrvarUpam (3-4) · Śloka 4
শ্বাসাঙ্গমর্দকফসংস্রবতালুশোষবম্যগ্নিসাদমদপীনসকাসনিদ্রাঃ |
শোষে ভবিষ্যতি ভবন্তি স চাপি জন্তুঃ শুক্লেক্ষণো ভবতি মাংসপরো রিরংসুঃ ||৩||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
স্বপ্নেষু কাকশুকশল্লকিনীলকণ্ঠা গৃধ্রাস্তথৈব কপযঃ কৃকলাসকাশ্চ |
তং বাহযন্তি স নদীর্বিজলাশ্চ পশ্যেচ্ছুষ্কাংস্তরূন্ পবনধূমদবার্দিতাংশ্চ ||৪||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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श्वासाङ्गमर्दकफसंस्रवतालुशोषवम्यग्निसादमदपीनसकासनिद्राः |
शोषे भविष्यति भवन्ति स चापि जन्तुः शुक्लेक्षणो भवति मांसपरो रिरंसुः ||३||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
स्वप्नेषु काकशुकशल्लकिनीलकण्ठा गृध्रास्तथैव कपयः कृकलासकाश्च |
तं वाहयन्ति स नदीर्विजलाश्च पश्येच्छुष्कांस्तरून् पवनधूमदवार्दितांश्च ||४||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana trirUparAjayakShmaNo lakShaNam (5) · Śloka 5
অংসপার্শ্বাভিতাপশ্চ সন্তাপঃ করপাদযোঃ |
জ্বরঃ সর্বাঙ্গগশ্চেতি লক্ষণং রাজযক্ষ্মণঃ ||৫||
(চ. চি. অ. ৮) |
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अंसपार्श्वाभितापश्च सन्तापः करपादयोः |
ज्वरः सर्वाङ्गगश्चेति लक्षणं राजयक्ष्मणः ||५||
(च. चि. अ. ८) |
Adhikarana rAjayakShmaNaH ShaDrUpANi (6) · Śloka 6
( ভক্তদ্বেষো জ্বরঃ শ্বাসঃ কাসঃ শোণিতদর্শনম্ |
স্বরভেদশ্চ জাযেত ষড্রূপং রাজযক্ষ্মণি) |৬|
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( भक्तद्वेषो ज्वरः श्वासः कासः शोणितदर्शनम् |
स्वरभेदश्च जायेत षड्रूपं राजयक्ष्मणि) |६|
Adhikarana ulbaNadoShabhedena yakShmaNa ekAdasha rUpANi (6-7) · Śloka 7
স্বরভেদোঽনিলাচ্ছূলং সঙ্কোচশ্চাংসপার্শ্বযোঃ |
জ্বরো দাহোঽতিসারশ্চ পিত্তাদ্রক্তস্য চাগমঃ ||৬||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
শিরসঃ পরিপূর্ণত্বমভক্তচ্ছন্দ এব চ |
কাসঃ কণ্ঠস্য চোদ্ধ্বংসো বিজ্ঞেযঃ কফকোপতঃ ||৭||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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स्वरभेदोऽनिलाच्छूलं सङ्कोचश्चांसपार्श्वयोः |
ज्वरो दाहोऽतिसारश्च पित्ताद्रक्तस्य चागमः ||६||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
शिरसः परिपूर्णत्वमभक्तच्छन्द एव च |
कासः कण्ठस्य चोद्ध्वंसो विज्ञेयः कफकोपतः ||७||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana yakShmiNo~asAdhyalakShaNam (8-12) · Śloka 12
একাদশভিরেভির্বা ষড্ভির্বাঽপি সমন্বিতম্ |
কাসাতীসারপার্শ্বার্তিস্বরভেদারুচিজ্বরৈঃ ||৮||
ত্রিভির্বা পীডিতং লিঙ্গৈঃ কাসশ্বাসাসৃগামযৈঃ |
জহ্যাচ্ছোষার্দিতং জন্তুমিচ্ছন্ সুবিমলং যশঃ ||৯||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
সর্বৈরর্ধৈস্ত্রিভির্বাঽপি লিঙ্গৈর্মাংসবলক্ষযে |
যুক্তো বর্জ্যশ্চিকিত্স্যস্তু সর্বরূপোঽপ্যতোঽন্যথা ||১০||
মহাশনং ক্ষীযমাণমতীসারনিপীডিতম্ |
শূনমুষ্কোদরং চৈব যক্ষ্মিণং পরিবর্জযেত্ ||১১||
শুক্লাক্ষমন্নদ্বেষ্টারমূর্ধ্বশ্বাসনিপীডিতম্ |
কৃচ্ছ্রেণ বহুমেহন্তং যক্ষ্মা হন্তীহ মানবম্ ||১২||
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एकादशभिरेभिर्वा षड्भिर्वाऽपि समन्वितम् |
कासातीसारपार्श्वार्तिस्वरभेदारुचिज्वरैः ||८||
त्रिभिर्वा पीडितं लिङ्गैः कासश्वासासृगामयैः |
जह्याच्छोषार्दितं जन्तुमिच्छन् सुविमलं यशः ||९||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
सर्वैरर्धैस्त्रिभिर्वाऽपि लिङ्गैर्मांसबलक्षये |
युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा ||१०||
महाशनं क्षीयमाणमतीसारनिपीडितम् |
शूनमुष्कोदरं चैव यक्ष्मिणं परिवर्जयेत् ||११||
शुक्लाक्षमन्नद्वेष्टारमूर्ध्वश्वासनिपीडितम् |
कृच्छ्रेण बहुमेहन्तं यक्ष्मा हन्तीह मानवम् ||१२||
Adhikarana yakShmiNaH sAdhyalakShaNam (13) · Śloka 13
জ্বরানুবন্ধরহিতং বলবন্তং ক্রিযাসহম্ |
উপক্রমেদাত্মবন্তং দীপ্তাগ্নিমকৃশং নরম্ ||১৩||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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ज्वरानुबन्धरहितं बलवन्तं क्रियासहम् |
उपक्रमेदात्मवन्तं दीप्ताग्निमकृशं नरम् ||१३||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana shoShabhedAH (14) · Śloka 14
ব্যবাযশোকবার্ধক্যব্যাযামাধ্বপ্রশোষিতান্ |
ব্রণোরঃক্ষতসঞ্জ্ঞৌ চ শোষিণৌ লক্ষণৈঃ শৃণু ||১৪||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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व्यवायशोकवार्धक्यव्यायामाध्वप्रशोषितान् |
व्रणोरःक्षतसञ्ज्ञौ च शोषिणौ लक्षणैः शृणु ||१४||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana vyavAyashoShiNo lakShaNam (15) · Śloka 15
ব্যবাযশোষী শুক্রস্য ক্ষযলিঙ্গৈরুপদ্রুতঃ |
পাণ্ডুদেহো যথাপূর্বং ক্ষীযন্তে চাস্য ধাতবঃ ||১৫||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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व्यवायशोषी शुक्रस्य क्षयलिङ्गैरुपद्रुतः |
पाण्डुदेहो यथापूर्वं क्षीयन्ते चास्य धातवः ||१५||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana shokashoShiNo lakShaNam (16) · Śloka 16
প্রধ্যানশীলঃ স্রস্তাঙ্গঃ শোকশোষ্যপি তাদৃশঃ |১৬|
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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प्रध्यानशीलः स्रस्ताङ्गः शोकशोष्यपि तादृशः |१६|
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana vArdhakyashoShiNo lakShaNam (16-17) · Śloka 17
জরাশোষী কৃশো মন্দবীর্যবুদ্ধিবলেন্দ্রিযঃ ||১৬||
কম্পনোঽরুচিমান্ ভিন্নকাংস্যপাত্রহতস্বরঃ |
ষ্ঠীবতি শ্লেষ্মণা হীনং গৌরবারতিপীডিতঃ ||১৭||
সম্প্রস্রুতাস্যনাসাক্ষিঃ শুষ্করূক্ষমলচ্ছবিঃ |
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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जराशोषी कृशो मन्दवीर्यबुद्धिबलेन्द्रियः ||१६||
कम्पनोऽरुचिमान् भिन्नकांस्यपात्रहतस्वरः |
ष्ठीवति श्लेष्मणा हीनं गौरवारतिपीडितः ||१७||
सम्प्रस्रुतास्यनासाक्षिः शुष्करूक्षमलच्छविः |
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana adhvashoShiNo lakShaNam (18) · Śloka 18
অধ্বশোষী চ স্রস্তাঙ্গঃ সম্ভৃষ্টপরুষচ্ছবিঃ ||১৮||
প্রসুপ্তগাত্রাবযবঃ শুষ্কক্লোমগলাননঃ |
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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अध्वशोषी च स्रस्ताङ्गः सम्भृष्टपरुषच्छविः ||१८||
प्रसुप्तगात्रावयवः शुष्कक्लोमगलाननः |
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana vyAyAmashoShiNo lakShaNam (19) · Śloka 19
ব্যাযামশোষী ভূযিষ্ঠমেভিরেব সমন্বিতঃ |
লিঙ্গৈরুরঃক্ষতকৃতৈঃ সংযুক্তশ্চ ক্ষতং বিনা ||১৯||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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व्यायामशोषी भूयिष्ठमेभिरेव समन्वितः |
लिङ्गैरुरःक्षतकृतैः संयुक्तश्च क्षतं विना ||१९||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana vraNashoShiNo lakShaNam (20) · Śloka 20
রক্তক্ষযাদ্বেদনাভিস্তথৈবাহারযন্ত্রণাত্ |
ব্রণিতস্য ভবেচ্ছোষঃ স চাসাধ্যতমো মতঃ ||২০||
(সু. উ. তং. অ. ৪১) |
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रक्तक्षयाद्वेदनाभिस्तथैवाहारयन्त्रणात् |
व्रणितस्य भवेच्छोषः स चासाध्यतमो मतः ||२०||
(सु. उ. तं. अ. ४१) |
Adhikarana sanidAnamuraHkShatalakShaNam (21-28) · Śloka 28
ধনুষাঽঽযস্যতোঽত্যর্থং ভারমুদ্বহতো গুরুম্ |
যুধ্যমানস্য বলিভিঃ পততো বিষমোচ্চতঃ ||২১||
বৃষং হযং বা ধাবন্তং দম্যং বাঽন্যং নিগৃহ্ণতঃ |
শিলাকাষ্ঠাশ্মনির্ঘাতান্ ক্ষিপতো নিঘ্নতঃ পরান্ ||২২||
অধীযানস্য বাঽত্যুচ্চৈর্দূরং বা ব্রজতো দ্রুতম্ |
মহানদীর্বা তরতো হযৈর্বা সহ ধাবতঃ ||২৩||
সহসোত্পততো দূরং তূর্ণং বাঽপি প্রনৃত্যতঃ |
তথাঽন্যৈঃ কর্মভিঃ ক্রূরৈর্ভৃশমভ্যাহতস্য বা ||২৪||
বিক্ষতে বক্ষসি ব্যাধির্বলবান্ সমুদীর্যতে |
স্ত্রীষু চাতিপ্রসক্তস্য রূক্ষাল্পপ্রমিতাশিনঃ ||২৫||
উরো বিভজ্যতেঽত্যর্থং ভিদ্যতেঽথ বিরুজ্যতে |
প্রপীড্যতে ততঃ পার্শ্বে শুষ্যত্যঙ্গং প্রবেপতে ||২৬||
ক্রমাদ্বীর্যং বলং বর্ণো রুচিরগ্নিশ্চ হীযতে |
জ্বরো ব্যথা মনোদৈন্যং বিড্ভেদাগ্নিবধাবপি ||২৭||
দুষ্টঃ শ্যাবঃ সুদুর্গন্ধঃ পীতো বিগ্রথিতো বহুঃ |
কাসমানস্য চাভীক্ষ্ণং কফঃ সাসৃক্ প্রবর্ততে ||২৮||
স ক্ষতী ক্ষীযতেঽত্যর্থং তথা শুক্রৌজসোঃ ক্ষযাত্ |
(চ. চি. অ. ১৬) |
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धनुषाऽऽयस्यतोऽत्यर्थं भारमुद्वहतो गुरुम् |
युध्यमानस्य बलिभिः पततो विषमोच्चतः ||२१||
वृषं हयं वा धावन्तं दम्यं वाऽन्यं निगृह्णतः |
शिलाकाष्ठाश्मनिर्घातान् क्षिपतो निघ्नतः परान् ||२२||
अधीयानस्य वाऽत्युच्चैर्दूरं वा व्रजतो द्रुतम् |
महानदीर्वा तरतो हयैर्वा सह धावतः ||२३||
सहसोत्पततो दूरं तूर्णं वाऽपि प्रनृत्यतः |
तथाऽन्यैः कर्मभिः क्रूरैर्भृशमभ्याहतस्य वा ||२४||
विक्षते वक्षसि व्याधिर्बलवान् समुदीर्यते |
स्त्रीषु चातिप्रसक्तस्य रूक्षाल्पप्रमिताशिनः ||२५||
उरो विभज्यतेऽत्यर्थं भिद्यतेऽथ विरुज्यते |
प्रपीड्यते ततः पार्श्वे शुष्यत्यङ्गं प्रवेपते ||२६||
क्रमाद्वीर्यं बलं वर्णो रुचिरग्निश्च हीयते |
ज्वरो व्यथा मनोदैन्यं विड्भेदाग्निवधावपि ||२७||
दुष्टः श्यावः सुदुर्गन्धः पीतो विग्रथितो बहुः |
कासमानस्य चाभीक्ष्णं कफः सासृक् प्रवर्तते ||२८||
स क्षती क्षीयतेऽत्यर्थं तथा शुक्रौजसोः क्षयात् |
(च. चि. अ. १६) |
Adhikarana uraHkShatapUrvarUpam (29) · Śloka 29
অব্যক্তং লক্ষণং তস্য পূর্বরূপমিতি স্মৃতম্ ||২৯||
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अव्यक्तं लक्षणं तस्य पूर्वरूपमिति स्मृतम् ||२९||
Adhikarana kShatakShINayorasAdhyalakShaNam (30) · Śloka 30
উরোরুক্ শোণিতচ্ছর্দিঃ কাসো বৈশেষিকঃ ক্ষতে |
ক্ষীণে সরক্তমূত্রত্বং পার্শ্বপৃষ্ঠকটীগ্রহঃ ||৩০||
(চ. চি. অ. ১৬) |
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उरोरुक् शोणितच्छर्दिः कासो वैशेषिकः क्षते |
क्षीणे सरक्तमूत्रत्वं पार्श्वपृष्ठकटीग्रहः ||३०||
(च. चि. अ. १६) |
Adhikarana kShatakShINayoH sAdhyAsAdhyavicAraH (31) · Śloka 31
অল্পলিঙ্গস্য দীপ্তাগ্নেঃ সাধ্যো বলবতো নবঃ |
পরিসংবত্সরো যাপ্যঃ সর্বলিঙ্গং তু বর্জযেত্ ||৩১||
(চ. চি. অ. ১৬) |
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अल्पलिङ्गस्य दीप्ताग्नेः साध्यो बलवतो नवः |
परिसंवत्सरो याप्यः सर्वलिङ्गं तु वर्जयेत् ||३१||
(च. चि. अ. १६) |
Adhikarana puShpikA · Śloka 10
ইতি শ্রীমাধবকরবিরচিতে মাধবনিদানে রাজযক্ষ্মক্ষতক্ষীণনিদানং সমাপ্তম্ ||১০||
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इति श्रीमाधवकरविरचिते माधवनिदाने राजयक्ष्मक्षतक्षीणनिदानं समाप्तम् ||१०||