Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 3
অথাতো বিসর্পনাডীস্তনরোগচিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১||
যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
সাধ্যা বিসর্পাস্ত্রয আদিতো যে ন সন্নিপাতক্ষতজৌ হি সাধ্যৌ |৩|
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अथातो विसर्पनाडीस्तनरोगचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१||
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
साध्या विसर्पास्त्रय आदितो ये न सन्निपातक्षतजौ हि साध्यौ |३|
Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সাধ্যেষু তত্পথ্যগণৈর্বিদধ্যাদ্ধৃতানি সেকাংশ্চ তথোপদেহান্ ||৩||
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साध्येषु तत्पथ्यगणैर्विदध्याद्धृतानि सेकांश्च तथोपदेहान् ||३||
Adhikarana 3 (4-5) · Śloka 5
মুস্তাশতাহ্বাসুরদারুকুষ্ঠবারাহিকুস্তুম্বুরুকৃষ্ণগন্ধাঃ |
বাতাত্মকে চোষ্ণগণাঃ প্রযোজ্যাঃ সেকেষু লেপেষু তথা শৃতেষু ||৪||
যত্ পঞ্চমূলং খলু কণ্টকাখ্যমল্পং মহচ্চাপ্যথ বল্লিজং চ |
তচ্চোপযোজ্যং ভিষজা প্রদেহে সেকে ঘৃতে চাপি তথৈব তৈলে ||৫||
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मुस्ताशताह्वासुरदारुकुष्ठवाराहिकुस्तुम्बुरुकृष्णगन्धाः |
वातात्मके चोष्णगणाः प्रयोज्याः सेकेषु लेपेषु तथा शृतेषु ||४||
यत् पञ्चमूलं खलु कण्टकाख्यमल्पं महच्चाप्यथ वल्लिजं च |
तच्चोपयोज्यं भिषजा प्रदेहे सेके घृते चापि तथैव तैले ||५||
Adhikarana 4 (6-9) · Śloka 9
কসেরুশৃঙ্গাটকপদ্মগুন্দ্রাঃ সশৈবলাঃ সোত্পলকর্দমাশ্চ |
বস্ত্রান্তরাঃ পিত্তকৃতে বিসর্পে লেপা বিধেযাঃ সঘৃতাঃ সুশীতাঃ ||৬||
হ্রীবেরলামজ্জকচন্দনানি স্রোতোজমুক্তামণিগৈরিকাশ্চ |
ক্ষীরেণ পিষ্টাঃ সঘৃতাঃ সুশীতা লেপাঃ প্রযোজ্যাস্তনবঃ সুখায ||৭||
প্রপৌণ্ডরীকং মধুকং পযস্যা মঞ্জিষ্ঠিকা পদ্মকচন্দনে চ |
সুগন্ধিকা চেতি সুখায লেপঃ পৈত্তে বিসর্পে ভিষজা প্রযোজ্যঃ ||৮||
ন্যগ্রোধবর্গৈঃ পরিষেচনং চ ঘৃতং চ কুর্যাত্ স্বরসেন তস্য |
শীতৈঃ পযোভিশ্চ মধূদকৈশ্চ সশর্করৈরিক্ষুরসৈশ্চ সেকান্ ||৯||
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कसेरुशृङ्गाटकपद्मगुन्द्राः सशैवलाः सोत्पलकर्दमाश्च |
वस्त्रान्तराः पित्तकृते विसर्पे लेपा विधेयाः सघृताः सुशीताः ||६||
ह्रीवेरलामज्जकचन्दनानि स्रोतोजमुक्तामणिगैरिकाश्च |
क्षीरेण पिष्टाः सघृताः सुशीता लेपाः प्रयोज्यास्तनवः सुखाय ||७||
प्रपौण्डरीकं मधुकं पयस्या मञ्जिष्ठिका पद्मकचन्दने च |
सुगन्धिका चेति सुखाय लेपः पैत्ते विसर्पे भिषजा प्रयोज्यः ||८||
न्यग्रोधवर्गैः परिषेचनं च घृतं च कुर्यात् स्वरसेन तस्य |
शीतैः पयोभिश्च मधूदकैश्च सशर्करैरिक्षुरसैश्च सेकान् ||९||
Adhikarana 5 (10-13) · Śloka 13
ঘৃতস্য গৌরীমধুকারবিন্দরোধ্রাম্বুরাজাদনগৈরিকেষু |
তথর্ষভে পদ্মকসারিবাসু কাকোলিমেদাকুমুদোত্পলেষু ||১০||
সচন্দনাযাং মধুশর্করাযাং দ্রাক্ষাস্থিরাপৃশ্নিশতাহ্বযাসু |
কল্কীকৃতাসূদকমত্র দত্ত্বা ন্যগ্রোধবর্গস্য তথা স্থিরাদেঃ ||১১||
গণস্য বিল্বাদিকপঞ্চমূল্যাশ্চতুর্গুণং ক্ষীরমথাপি তদ্বত্ |
প্রস্থং বিপক্বং পরিষেচনেন পৈত্তীর্নিহন্যাত্তু বিসর্পনাডীঃ ||১২||
বিস্ফোটদুষ্টব্রণশীর্ষরোগান্ পাকং তথাঽঽস্যস্য নিহন্তি পানাত্ |
গ্রহার্দিতে শোষিণি চাপি বালে ঘৃতং হি গৌর্যাদিকমেতদিষ্টম্ ||১৩||
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घृतस्य गौरीमधुकारविन्दरोध्राम्बुराजादनगैरिकेषु |
तथर्षभे पद्मकसारिवासु काकोलिमेदाकुमुदोत्पलेषु ||१०||
सचन्दनायां मधुशर्करायां द्राक्षास्थिरापृश्निशताह्वयासु |
कल्कीकृतासूदकमत्र दत्त्वा न्यग्रोधवर्गस्य तथा स्थिरादेः ||११||
गणस्य बिल्वादिकपञ्चमूल्याश्चतुर्गुणं क्षीरमथापि तद्वत् |
प्रस्थं विपक्वं परिषेचनेन पैत्तीर्निहन्यात्तु विसर्पनाडीः ||१२||
विस्फोटदुष्टव्रणशीर्षरोगान् पाकं तथाऽऽस्यस्य निहन्ति पानात् |
ग्रहार्दिते शोषिणि चापि बाले घृतं हि गौर्यादिकमेतदिष्टम् ||१३||
Adhikarana 6 (14-15) · Śloka 15
অজাঽশ্ববগন্ধা সরলা সকালা সৈকৈষিকা চাপ্যথবাঽজশৃঙ্গী |
গোমূত্রপিষ্টো বিহিতঃ প্রদেহো হন্যাদ্বিসর্পং কফজং স শীঘ্রম্ ||১৪||
কালানুসার্যাগুরুচোচগুঞ্জারাস্নাবচাশীতশিবেন্দ্রপর্ণ্যঃ |
পালিন্দিমুঞ্জাতমহীকদম্বা হিতা বিসর্পেষু কফাত্মকেষু ||১৫||
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अजाऽश्ववगन्धा सरला सकाला सैकैषिका चाप्यथवाऽजशृङ्गी |
गोमूत्रपिष्टो विहितः प्रदेहो हन्याद्विसर्पं कफजं स शीघ्रम् ||१४||
कालानुसार्यागुरुचोचगुञ्जारास्नावचाशीतशिवेन्द्रपर्ण्यः |
पालिन्दिमुञ्जातमहीकदम्बा हिता विसर्पेषु कफात्मकेषु ||१५||
Adhikarana 7 (16) · Śloka 17
গণস্তু যোজ্যো বরুণপ্রবৃত্তঃ ক্রিযাসু সর্বাসু বিচক্ষণেন |
সংশোধনং শোণিতমোক্ষণং চ শ্রেষ্ঠং বিসর্পেষু চিকিত্সিতং হি ||১৬||
সর্বাংশ্চ পক্বান্ পরিশোধ্য ধীমান্ ব্রণক্রমেণোপচরেদ্যথোক্তম্ |১৭|
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गणस्तु योज्यो वरुणप्रवृत्तः क्रियासु सर्वासु विचक्षणेन |
संशोधनं शोणितमोक्षणं च श्रेष्ठं विसर्पेषु चिकित्सितं हि ||१६||
सर्वांश्च पक्वान् परिशोध्य धीमान् व्रणक्रमेणोपचरेद्यथोक्तम् |१७|
Adhikarana 8 (17-19) · Śloka 20
নাডী ত্রিদোষপ্রভবা ন সিধ্যেচ্ছেষাশ্চতস্নঃ খলু যত্নসাধ্যাঃ ||১৭||
তত্রানিলোত্থামুপনাহ্য পূর্বমশেষতঃ পূযগতিং বিদার্য |
তিলৈরপামার্গফলৈশ্চ পিষ্ট্বা সসৈন্ধবৈর্বন্ধনমত্র কুর্যাত্ ||১৮||
প্রক্ষালনে চাপি সদা ব্রণস্য যোজ্যং মহদ্যত্ খলু পঞ্চমূলম্ |
হিংস্রাং হরিদ্রাং কটুকাং বলাং চ গোজিহ্বিকাং চাপি সবিল্বমূলাম্ ||১৯||
সংহৃত্য তৈলং বিপচেদ্ব্রণস্য সংশোধনং পূরণরোপণং চ |২০|
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नाडी त्रिदोषप्रभवा न सिध्येच्छेषाश्चतस्नः खलु यत्नसाध्याः ||१७||
तत्रानिलोत्थामुपनाह्य पूर्वमशेषतः पूयगतिं विदार्य |
तिलैरपामार्गफलैश्च पिष्ट्वा ससैन्धवैर्बन्धनमत्र कुर्यात् ||१८||
प्रक्षालने चापि सदा व्रणस्य योज्यं महद्यत् खलु पञ्चमूलम् |
हिंस्रां हरिद्रां कटुकां बलां च गोजिह्विकां चापि सबिल्वमूलाम् ||१९||
संहृत्य तैलं विपचेद्व्रणस्य संशोधनं पूरणरोपणं च |२०|
Adhikarana 9 (20-21) · Śloka 21
পিত্তাত্মিকাং প্রাগুপনাহ্য ধীমানুত্কারিকাভিঃ সপযোঘৃতাভিঃ ||২০||
নিপাত্য শস্ত্রং তিলনাগদন্তীযষ্ট্যাহ্বকল্কৈঃ পরিপূরযেত্তাম্ |
প্রক্ষালনে চাপি সসোমনিম্বা নিশা প্রযোজ্যা কুশলেন নিত্যম্ ||২১||
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पित्तात्मिकां प्रागुपनाह्य धीमानुत्कारिकाभिः सपयोघृताभिः ||२०||
निपात्य शस्त्रं तिलनागदन्तीयष्ट्याह्वकल्कैः परिपूरयेत्ताम् |
प्रक्षालने चापि ससोमनिम्बा निशा प्रयोज्या कुशलेन नित्यम् ||२१||
Adhikarana 10 (22) · Śloka 22
শ্যামাত্রিভণ্ডীত্রিফলাসু সিদ্ধং হরিদ্রযো রোধ্রকবৃক্ষযোশ্চ |
ঘৃতং সদুগ্ধং ব্রণতর্পণেন হন্যাদ্গতিং কোষ্ঠগতাঽপি যা স্যাত্ ||২২||
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श्यामात्रिभण्डीत्रिफलासु सिद्धं हरिद्रयो रोध्रकवृक्षयोश्च |
घृतं सदुग्धं व्रणतर्पणेन हन्याद्गतिं कोष्ठगताऽपि या स्यात् ||२२||
Adhikarana 11 (23-25) · Śloka 25
নাডীং কফোত্থামুপনাহ্য সম্যক্ কুলত্থসিদ্ধার্থকশক্তুকিণ্বৈঃ |
মৃদূকৃতামেষ্য গতিং বিদিত্বা নিপাতযেচ্ছস্ত্রমশেষকারী ||২৩||
দদ্যাদ্ব্রণে নিম্বতিলান্ সদন্তীন্ সুরাষ্ট্রজাসৈন্ধবসম্প্রযুক্তান্ |
প্রক্ষালনে চাপি করঞ্জনিম্ব জাত্যক্ষপীলুস্বরসাঃ প্রযোজ্যাঃ ||২৪||
সুবর্চিকাসৈন্ধবচিত্রকেষু নিকুম্ভতালীতলরূপিকাসু |
ফলেষ্বপামার্গভবেষু চৈব কুর্যাত্ সমূত্রেষু হিতায তৈলম্ ||২৫||
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नाडीं कफोत्थामुपनाह्य सम्यक् कुलत्थसिद्धार्थकशक्तुकिण्वैः |
मृदूकृतामेष्य गतिं विदित्वा निपातयेच्छस्त्रमशेषकारी ||२३||
दद्याद्व्रणे निम्बतिलान् सदन्तीन् सुराष्ट्रजासैन्धवसम्प्रयुक्तान् |
प्रक्षालने चापि करञ्जनिम्ब जात्यक्षपीलुस्वरसाः प्रयोज्याः ||२४||
सुवर्चिकासैन्धवचित्रकेषु निकुम्भतालीतलरूपिकासु |
फलेष्वपामार्गभवेषु चैव कुर्यात् समूत्रेषु हिताय तैलम् ||२५||
Adhikarana 12 (26-28) · Śloka 28
নাডীং তু শল্যপ্রভবাং বিদার্য নির্হৃত্য শল্যং প্রবিশোধ্য মার্গম্ |
সংশোধযেত্ ক্ষৌদ্রঘৃতপ্রগাঢৈস্তিলৈস্ততো রোপণমাশু কুর্যাত্ ||২৬||
কুম্ভীকখর্জূরকপিত্থবিল্ববনস্পতীনাং চ শলাটুবর্গৈঃ |
কৃত্বা কষাযং বিপচেত্তু তৈলমাবাপ্য মুস্তাসরলাপ্রিযঙ্গূঃ ||২৭||
সুগন্ধিকামোচরসাহিপুষ্পং রোধ্রং বিদধ্যাদপি ধাতকীং চ |
এতেন শল্যপ্রভবা তু নাডী রোহেদ্ব্রণো বা সুখমাশু চৈব ||২৮||
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नाडीं तु शल्यप्रभवां विदार्य निर्हृत्य शल्यं प्रविशोध्य मार्गम् |
संशोधयेत् क्षौद्रघृतप्रगाढैस्तिलैस्ततो रोपणमाशु कुर्यात् ||२६||
कुम्भीकखर्जूरकपित्थबिल्ववनस्पतीनां च शलाटुवर्गैः |
कृत्वा कषायं विपचेत्तु तैलमावाप्य मुस्तासरलाप्रियङ्गूः ||२७||
सुगन्धिकामोचरसाहिपुष्पं रोध्रं विदध्यादपि धातकीं च |
एतेन शल्यप्रभवा तु नाडी रोहेद्व्रणो वा सुखमाशु चैव ||२८||
Adhikarana 13 (29-33) · Śloka 33
কৃশদুর্বলভীরূণাং নাডী মর্মাশ্রিতা চ যা |
ক্ষারসূত্রেণ তাং চ্ছিন্দ্যান্ন তু শস্ত্রেণ বুদ্ধিমান্ ||২৯||
এষণ্যা গতিমন্বিষ্য ক্ষারসূত্রানুসারিণীম্ |
সূচীং নিদধ্যাদ্গত্যন্তে তথোন্নম্যাশু নির্হরেত্ ||৩০||
সূত্রস্যান্তং সমানীয গাঢং বন্ধং সমাচরেত্ |
ততঃ ক্ষারবলং বীক্ষ্য সূত্রমন্যত্ প্রবেশযেত্ ||৩১||
ক্ষারাক্তং মতিমান্ বৈদ্যো যাবন্ন ছিদ্যতে গতিঃ |
ভগন্দরেঽপ্যেষ বিধিঃ কার্যো বৈদ্যেন জানতা ||৩২||
অর্বুদাদিষু চোত্ক্ষিপ্য মূলে সূত্রং নিধাপযেত্ |
সূচীভির্যববক্রাভিরাচিতান্ বা সমন্ততঃ |
মূলে সূত্রেণ বধ্নীযাচ্ছিন্নে চোপচরেদ্ব্রণম্ ||৩৩||
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कृशदुर्बलभीरूणां नाडी मर्माश्रिता च या |
क्षारसूत्रेण तां च्छिन्द्यान्न तु शस्त्रेण बुद्धिमान् ||२९||
एषण्या गतिमन्विष्य क्षारसूत्रानुसारिणीम् |
सूचीं निदध्याद्गत्यन्ते तथोन्नम्याशु निर्हरेत् ||३०||
सूत्रस्यान्तं समानीय गाढं बन्धं समाचरेत् |
ततः क्षारबलं वीक्ष्य सूत्रमन्यत् प्रवेशयेत् ||३१||
क्षाराक्तं मतिमान् वैद्यो यावन्न छिद्यते गतिः |
भगन्दरेऽप्येष विधिः कार्यो वैद्येन जानता ||३२||
अर्बुदादिषु चोत्क्षिप्य मूले सूत्रं निधापयेत् |
सूचीभिर्यववक्राभिराचितान् वा समन्ततः |
मूले सूत्रेण बध्नीयाच्छिन्ने चोपचरेद्व्रणम् ||३३||
Adhikarana 14 (34-41) · Śloka 42
যা দ্বিব্রণীযেঽভিহিতাস্তু বর্ত্যস্তাঃ সর্বনাডীষু ভিষগ্বিদধ্যাত্ |
ঘোণ্টাফলত্বগ্লবণানি লাক্ষাপূগীফলং চালবণং চ পত্রম্ ||৩৪||
স্নুহ্যর্কদুগ্ধেন তু কল্ক এষ বর্তীকৃতো হন্ত্যচিরেণ নাডীঃ |
বিভীতকাম্রাস্থিবটপ্রবালা হরেণুকাশঙ্খিনিবীজমস্যঃ ||৩৫||
বারাহিকন্দশ্চ তথা প্রদেযো নাডীষু তৈলেন চ মিশ্রযিত্বা ||৩৬||
ধত্তূরজং মদনকোদ্রবজং চ বীজং কোশাতকী শুকনসা মৃগভোজিনী চ |
অঙ্কোটবীজকুসুমং গতিষু প্রযোজ্যং লাক্ষোদকাহৃতমলাসু বিকৃত্য চূর্ণম্ ||৩৭||
তথা চ গোমাংসমসীং হিতায কোষ্ঠাশ্রিতস্যাদরতো দিশন্তি |
বর্তীকৃতং মাক্ষিকসম্প্রযুক্তং নাডীঘ্নমুক্তং লবণোত্তমং বা ||৩৮||
দুষ্টব্রণে যদ্বিহিতং চ তৈলং তত্ সর্বনাডীষু ভিষগ্বিদধ্যাত্ |
চূর্ণীকৃতৈরথ বিমিশ্রিতমেভিরেব তৈলং প্রযুক্তমচিরেণ গতিং নিহন্তি ||৩৯||
এষ্বেব মূত্রসহিতেষু বিধায তৈলং তত্ সাধিতং গতিমপোহতি সপ্তরাত্রাত্ |
পিণ্ডীতকস্য তু বরাহবিভাবিতস্য মূলেষু কন্দশকলেষু চ সৌবহেষু ||৪০||
তৈলং কৃতং গতিমপোহতি শীঘ্রমেতত্ কন্দেষু চামরবরাযুধসাহ্বযেষু |
ভল্লাতকার্কমরিচৈর্লবণোত্তমেন সিদ্ধং বিডঙ্গরজনীদ্বযচিত্রকৈশ্চ ||৪১||
স্যান্মার্কবস্য চ রসেন নিহন্তি তৈলং নাডীং কফানিলকৃতামপচীং ব্রণাংশ্চ |৪২|
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या द्विव्रणीयेऽभिहितास्तु वर्त्यस्ताः सर्वनाडीषु भिषग्विदध्यात् |
घोण्टाफलत्वग्लवणानि लाक्षापूगीफलं चालवणं च पत्रम् ||३४||
स्नुह्यर्कदुग्धेन तु कल्क एष वर्तीकृतो हन्त्यचिरेण नाडीः |
बिभीतकाम्रास्थिवटप्रवाला हरेणुकाशङ्खिनिबीजमस्यः ||३५||
वाराहिकन्दश्च तथा प्रदेयो नाडीषु तैलेन च मिश्रयित्वा ||३६||
धत्तूरजं मदनकोद्रवजं च बीजं कोशातकी शुकनसा मृगभोजिनी च |
अङ्कोटबीजकुसुमं गतिषु प्रयोज्यं लाक्षोदकाहृतमलासु विकृत्य चूर्णम् ||३७||
तथा च गोमांसमसीं हिताय कोष्ठाश्रितस्यादरतो दिशन्ति |
वर्तीकृतं माक्षिकसम्प्रयुक्तं नाडीघ्नमुक्तं लवणोत्तमं वा ||३८||
दुष्टव्रणे यद्विहितं च तैलं तत् सर्वनाडीषु भिषग्विदध्यात् |
चूर्णीकृतैरथ विमिश्रितमेभिरेव तैलं प्रयुक्तमचिरेण गतिं निहन्ति ||३९||
एष्वेव मूत्रसहितेषु विधाय तैलं तत् साधितं गतिमपोहति सप्तरात्रात् |
पिण्डीतकस्य तु वराहविभावितस्य मूलेषु कन्दशकलेषु च सौवहेषु ||४०||
तैलं कृतं गतिमपोहति शीघ्रमेतत् कन्देषु चामरवरायुधसाह्वयेषु |
भल्लातकार्कमरिचैर्लवणोत्तमेन सिद्धं विडङ्गरजनीद्वयचित्रकैश्च ||४१||
स्यान्मार्कवस्य च रसेन निहन्ति तैलं नाडीं कफानिलकृतामपचीं व्रणांश्च |४२|
Adhikarana 15 (42-44) · Śloka 45
স্তন্যে গতে বিকৃতিমাশু ভিষক্ তু ধাত্রীং পীতাং ঘৃতং পরিণতেঽহনি বামযেত্তু ||৪২||
নিম্বোদকেন মধুমাগধিকাযুতেন বান্তাগতেঽহনি চ মুদ্গরসাশনা স্যাত্ |
এবং ত্র্যহং চতুরহং ষডহং বমেদ্বা সর্পিঃ পিবেত্ত্রিফলযা সহ সংযুতং বা ||৪৩||
ভার্গীং বচামতিবিষাং সুরদারু পাঠাং মুস্তাদিকং মধুরসাং কটুরোহিণীং চ |
ধাত্রী পিবেত্তু পযসঃ পরিশোধনার্থ মারগ্বধাদিষু বরং মধুনা কষাযম্ ||৪৪||
সামান্যমেতদুপদিষ্টমতো বিশেষাদ্দোষান্ পযোনিপতিতান্ শমযেদ্যথাস্বম্ |৪৫|
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स्तन्ये गते विकृतिमाशु भिषक् तु धात्रीं पीतां घृतं परिणतेऽहनि वामयेत्तु ||४२||
निम्बोदकेन मधुमागधिकायुतेन वान्तागतेऽहनि च मुद्गरसाशना स्यात् |
एवं त्र्यहं चतुरहं षडहं वमेद्वा सर्पिः पिबेत्त्रिफलया सह संयुतं वा ||४३||
भार्गीं वचामतिविषां सुरदारु पाठां मुस्तादिकं मधुरसां कटुरोहिणीं च |
धात्री पिबेत्तु पयसः परिशोधनार्थ मारग्वधादिषु वरं मधुना कषायम् ||४४||
सामान्यमेतदुपदिष्टमतो विशेषाद्दोषान् पयोनिपतितान् शमयेद्यथास्वम् |४५|
Adhikarana 16 (45-47) · Śloka 47
রোগং স্তনোত্থিতমবেক্ষ্য ভিষগ্বিদধ্যা দ্যদ্বিদ্রধাবভিহিতং বহুশো বিধানম্ ||৪৫||
সম্পচ্যমানমপি তং তু বিনোপনাহৈঃ সম্ভোজনেন খলু পাচযিতুং যতেত |
শীঘ্রং স্তনো হি মৃদুমাংসতযোপনদ্ধঃ সর্বং প্রকোথমুপযাত্যবদীর্যতে চ ||৪৬||
পক্বে তু দুগ্ধহরিণীঃ পরিহৃত্য নাডীঃ কৃষ্ণং চ চূচুকযুগং বিদধীত শস্ত্রম্ |
আমে বিদাহিনি তথৈব গতে চ পাকং ধাত্র্যাঃ স্তনৌ সততমেব চ নির্দুহীত ||৪৭||
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रोगं स्तनोत्थितमवेक्ष्य भिषग्विदध्या द्यद्विद्रधावभिहितं बहुशो विधानम् ||४५||
सम्पच्यमानमपि तं तु विनोपनाहैः सम्भोजनेन खलु पाचयितुं यतेत |
शीघ्रं स्तनो हि मृदुमांसतयोपनद्धः सर्वं प्रकोथमुपयात्यवदीर्यते च ||४६||
पक्वे तु दुग्धहरिणीः परिहृत्य नाडीः कृष्णं च चूचुकयुगं विदधीत शस्त्रम् |
आमे विदाहिनि तथैव गते च पाकं धात्र्याः स्तनौ सततमेव च निर्दुहीत ||४७||
Adhikarana puShpikA · Śloka 17
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে বিসর্পনাডীস্তনরোগচিকিত্সিতং নাম সপ্তদশোঽধ্যাযঃ ||১৭||
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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने विसर्पनाडीस्तनरोगचिकित्सितं नाम सप्तदशोऽध्यायः ||१७||