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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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16. vidradhicikitsitam

Adhikarana 1 (1-3) · Śloka 3

অথাতো বিদ্রধীনাং চিকিত্সিতং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২|| উক্তা বিদ্রধযঃ ষড্যে তেষ্বসাধ্যস্তু সর্বজঃ | শেষেষ্বামেষু কর্তব্যা ত্বরিতং শোফবত্ ক্রিযা ||৩||

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अथातो विद्रधीनां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२|| उक्ता विद्रधयः षड्ये तेष्वसाध्यस्तु सर्वजः | शेषेष्वामेषु कर्तव्या त्वरितं शोफवत् क्रिया ||३||

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Adhikarana 2 (4-9) · Śloka 9

বাতঘ্নমূলকল্কৈস্তু ঘৃততৈলবসাযুতৈঃ | সুখোষ্ণো বহলো লেপঃ প্রযোজ্যো বাতবিদ্রধৌ ||৪|| সানূপৌদকমাংসস্তু কাকোল্যাদিঃ সতর্পণঃ | স্নেহাম্লসিদ্ধো লবণঃ প্রযোজ্যশ্চোপনাহনে ||৫|| বেশবারৈঃ সকৃশরৈঃ পযোভিঃ পাযসৈস্তথা | স্বেদযেত্ সততং চাপি নির্হরেচ্চাপি শোণিতম্ ||৬|| স চেদেবমুপক্রান্তঃ পাকাযাভিমুখো যদি | তং পাচযিত্বা শস্ত্রেণ ভিন্দ্যাদ্ভিন্নং চ শোধযেত্ ||৭|| পঞ্চমূলকষাযেণ প্রক্ষাল্য লবণোত্তরৈঃ | তৈলৈর্ভদ্রাদিমধুকসংযুক্তৈঃ প্রতিপূরযেত্ ||৮|| বৈরেচনিকযুক্তেন ত্রৈবৃতেন বিশোধ্য চ | পৃথক্পর্ণ্যাদিসিদ্ধেন ত্রৈবৃতেন চ রোপযেত্ ||৯||

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वातघ्नमूलकल्कैस्तु घृततैलवसायुतैः | सुखोष्णो बहलो लेपः प्रयोज्यो वातविद्रधौ ||४|| सानूपौदकमांसस्तु काकोल्यादिः सतर्पणः | स्नेहाम्लसिद्धो लवणः प्रयोज्यश्चोपनाहने ||५|| वेशवारैः सकृशरैः पयोभिः पायसैस्तथा | स्वेदयेत् सततं चापि निर्हरेच्चापि शोणितम् ||६|| स चेदेवमुपक्रान्तः पाकायाभिमुखो यदि | तं पाचयित्वा शस्त्रेण भिन्द्याद्भिन्नं च शोधयेत् ||७|| पञ्चमूलकषायेण प्रक्षाल्य लवणोत्तरैः | तैलैर्भद्रादिमधुकसंयुक्तैः प्रतिपूरयेत् ||८|| वैरेचनिकयुक्तेन त्रैवृतेन विशोध्य च | पृथक्पर्ण्यादिसिद्धेन त्रैवृतेन च रोपयेत् ||९||

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Adhikarana 3 (10-15) · Śloka 16

পৈত্তিকং শর্করালাজামধুকৈঃ সারিবাযুতৈঃ | প্রদিহ্যাত্ ক্ষীরপিষ্টৈর্বা পযস্যোশীরচন্দনৈঃ ||১০|| পাক্যৈঃ শীতকষাযৈর্বা ক্ষীরৈরিক্ষুরসৈস্তথা | জীবনীযঘৃতৈর্বাঽপি সেচযের্চ্ছ্করাযুতৈঃ ||১১|| ত্রিবৃদ্ধরীতকীনাং চ চূর্ণং লিহ্যান্মধুদ্রবম্ | জলৌকোভির্হরেচ্চাসৃক্ পক্বং চাপাট্য বুদ্ধিমান্ ||১২|| ক্ষীরবৃক্ষকষাযেণ প্রক্ষাল্যৌদকজেন বা | তিলৈঃ সযষ্টীমধুকৈঃ সক্ষৌদ্রৈঃ সর্পিষা যুতৈঃ ||১৩|| উপদিহ্য প্রতনুনা বাসসা বেষ্টযেদ্ব্রণম্ | প্রপৌণ্ডরীকমঞ্জিষ্ঠামধুকোশীরপদ্মকৈঃ ||১৪|| সহরিদ্রৈঃ কৃতং সর্পিঃ সক্ষীরং ব্রণরোপণম্ | ক্ষীরশুক্লাপৃথক্পর্ণীসমঙ্গারোধ্রচন্দনৈঃ ||১৫|| ন্যগ্রোধাদিপ্রবালেষু তেষাং ত্বক্ষ্বথবা কৃতম্ |১৬|

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पैत्तिकं शर्करालाजामधुकैः सारिवायुतैः | प्रदिह्यात् क्षीरपिष्टैर्वा पयस्योशीरचन्दनैः ||१०|| पाक्यैः शीतकषायैर्वा क्षीरैरिक्षुरसैस्तथा | जीवनीयघृतैर्वाऽपि सेचयेर्च्छ्करायुतैः ||११|| त्रिवृद्धरीतकीनां च चूर्णं लिह्यान्मधुद्रवम् | जलौकोभिर्हरेच्चासृक् पक्वं चापाट्य बुद्धिमान् ||१२|| क्षीरवृक्षकषायेण प्रक्षाल्यौदकजेन वा | तिलैः सयष्टीमधुकैः सक्षौद्रैः सर्पिषा युतैः ||१३|| उपदिह्य प्रतनुना वाससा वेष्टयेद्व्रणम् | प्रपौण्डरीकमञ्जिष्ठामधुकोशीरपद्मकैः ||१४|| सहरिद्रैः कृतं सर्पिः सक्षीरं व्रणरोपणम् | क्षीरशुक्लापृथक्पर्णीसमङ्गारोध्रचन्दनैः ||१५|| न्यग्रोधादिप्रवालेषु तेषां त्वक्ष्वथवा कृतम् |१६|

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Adhikarana 4 (16-21) · Śloka 22

নক্তমালস্য পত্রাণি তরুণানি ফলানি চ ||১৬|| সুমনাযাশ্চ পত্রাণি পটোলারিষ্টযোস্তথা | দ্বে হরিদ্রে মধূচ্ছিষ্টং মধুকং তিক্তরোহিণী ||১৭|| প্রিযঙ্গুঃ কুশমূলং চ নিচুলস্য ত্বগেব চ | মঞ্জিষ্ঠাচন্দনোশীরমুত্পলং সারিবে ত্রিবৃত্ ||১৮|| এতেষাং কার্ষিকৈর্ভাগৈর্ঘৃতপ্রস্থং বিপাচযেত্ | দুষ্টব্রণপ্রশমনং নাডীব্রণবিশোধনম্ ||১৯|| সদ্যশ্ছিন্নব্রণানাং চ করঞ্জাদ্যমিদং শুভম্ | দুষ্টব্রণাশ্চ যে কেচিদ্যে চোত্সৃষ্টক্রিযা ব্রণাঃ ||২০|| নাড্যো গম্ভীরিকা যাশ্চ সদ্যশ্ছিন্নাস্তথৈব চ | অগ্নিক্ষারকৃতাশ্চৈব যে ব্রণা দারুণা অপি ||২১|| করঞ্জাদ্যেন হবিষা প্রশাম্যন্তি ন সংশযঃ |২২|

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नक्तमालस्य पत्राणि तरुणानि फलानि च ||१६|| सुमनायाश्च पत्राणि पटोलारिष्टयोस्तथा | द्वे हरिद्रे मधूच्छिष्टं मधुकं तिक्तरोहिणी ||१७|| प्रियङ्गुः कुशमूलं च निचुलस्य त्वगेव च | मञ्जिष्ठाचन्दनोशीरमुत्पलं सारिवे त्रिवृत् ||१८|| एतेषां कार्षिकैर्भागैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् | दुष्टव्रणप्रशमनं नाडीव्रणविशोधनम् ||१९|| सद्यश्छिन्नव्रणानां च करञ्जाद्यमिदं शुभम् | दुष्टव्रणाश्च ये केचिद्ये चोत्सृष्टक्रिया व्रणाः ||२०|| नाड्यो गम्भीरिका याश्च सद्यश्छिन्नास्तथैव च | अग्निक्षारकृताश्चैव ये व्रणा दारुणा अपि ||२१|| करञ्जाद्येन हविषा प्रशाम्यन्ति न संशयः |२२|

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Adhikarana 5 (22-33) · Śloka 33

ইষ্টকাসিকতালোষ্টগোশকৃত্তুষপাংশুভিঃ ||২২|| মূত্রৈরুষ্ণৈশ্চ সততং স্বেদযেচ্ছ্লেষ্মবিদ্রধিম্ | কষাযপানৈর্বমনৈরালেপৈরুপনাহনৈঃ ||২৩|| হরেদ্দোষানভীক্ষ্ণং চাপ্যলাব্বাঽসৃক্ তথৈব চ | আরগ্বধকষাযেণ পক্বং চাপাট্য ধাবযেত্ ||২৪|| হরিদ্রাত্রিবৃতাশক্তুতিলৈর্মধুসমাযুতৈঃ | পূরযিত্বা ব্রণং সম্যগ্বধ্নীযাত্ কীর্তিতং যথা ||২৫|| ততঃ কুলত্থিকাদন্তীত্রিবৃচ্ছ্যামার্কতিল্বকৈঃ | কুর্যাত্তৈলং সগোমূত্রং হিতং তত্র সসৈন্ধবম্ ||২৬|| পিত্তবিদ্রধিবত্ সর্বাঃ ক্রিযা নিরবশেষতঃ | বিদ্রধ্যোঃ কুশলঃ কুর্যাদ্রক্তাগন্তুনিমিত্তযোঃ ||২৭|| বরুণাদিগণক্বাথমপক্বেঽভ্যন্তরোত্থিতে | ঊষকাদিপ্রতীবাপং পিবেত্ সুখকরং নরঃ ||২৮|| অনযোর্বর্গযোঃ সিদ্ধং সর্পির্বৈরেচনেন চ | অচিরাদ্বিদ্রধিং হন্তি প্রাতঃ প্রাতর্নিষেবিতম্ ||২৯|| এভিরেব গণৈশ্চাপি সংসিদ্ধং স্নেহসংযুতম্ | কার্যমাস্থাপনং ক্ষিপ্রং তথৈবাপ্যনুবাসনম্ ||৩০|| পানালেপনভোজ্যেষু মধুশিগ্রুদ্রুমোঽপি বা | দত্তাবাপো যথাদোষমপক্বং হন্তি বিদ্রধিম্ ||৩১|| তোযধান্যাম্লমূত্রৈস্তু পেযো বাঽপি সুরাদিভিঃ | যথাদোষগণক্বাথৈঃ পিবেদ্বাঽপি শিলাজতু ||৩২|| প্রধানং গুগ্গুলং চাপি শুণ্ঠীং চ সুরদারু চ | স্নেহোপনাহৌ কুর্যাচ্চ সদা চাপ্যনুলোমনম্ ||৩৩||

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इष्टकासिकतालोष्टगोशकृत्तुषपांशुभिः ||२२|| मूत्रैरुष्णैश्च सततं स्वेदयेच्छ्लेष्मविद्रधिम् | कषायपानैर्वमनैरालेपैरुपनाहनैः ||२३|| हरेद्दोषानभीक्ष्णं चाप्यलाब्वाऽसृक् तथैव च | आरग्वधकषायेण पक्वं चापाट्य धावयेत् ||२४|| हरिद्रात्रिवृताशक्तुतिलैर्मधुसमायुतैः | पूरयित्वा व्रणं सम्यग्बध्नीयात् कीर्तितं यथा ||२५|| ततः कुलत्थिकादन्तीत्रिवृच्छ्यामार्कतिल्वकैः | कुर्यात्तैलं सगोमूत्रं हितं तत्र ससैन्धवम् ||२६|| पित्तविद्रधिवत् सर्वाः क्रिया निरवशेषतः | विद्रध्योः कुशलः कुर्याद्रक्तागन्तुनिमित्तयोः ||२७|| वरुणादिगणक्वाथमपक्वेऽभ्यन्तरोत्थिते | ऊषकादिप्रतीवापं पिबेत् सुखकरं नरः ||२८|| अनयोर्वर्गयोः सिद्धं सर्पिर्वैरेचनेन च | अचिराद्विद्रधिं हन्ति प्रातः प्रातर्निषेवितम् ||२९|| एभिरेव गणैश्चापि संसिद्धं स्नेहसंयुतम् | कार्यमास्थापनं क्षिप्रं तथैवाप्यनुवासनम् ||३०|| पानालेपनभोज्येषु मधुशिग्रुद्रुमोऽपि वा | दत्तावापो यथादोषमपक्वं हन्ति विद्रधिम् ||३१|| तोयधान्याम्लमूत्रैस्तु पेयो वाऽपि सुरादिभिः | यथादोषगणक्वाथैः पिबेद्वाऽपि शिलाजतु ||३२|| प्रधानं गुग्गुलं चापि शुण्ठीं च सुरदारु च | स्नेहोपनाहौ कुर्याच्च सदा चाप्यनुलोमनम् ||३३||

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Adhikarana 6 (34) · Śloka 34

যথোদ্দিষ্টাং সিরাং বিধ্যেত্ কফজে বিদ্রধৌ ভিষক্ | রক্তপিত্তানিলোত্থেষু কেচিদ্বাহৌ বদন্তি তু ||৩৪||

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यथोद्दिष्टां सिरां विध्येत् कफजे विद्रधौ भिषक् | रक्तपित्तानिलोत्थेषु केचिद्बाहौ वदन्ति तु ||३४||

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Adhikarana 7 (35-37) · Śloka 38

পক্বং বা বহিরুন্নদ্ধং ভিত্ত্বা ব্রণবদাচরেত্ | স্রুতেষূর্ধ্বমধো বাঽপি মৈরেযাম্লসুরাসবৈঃ ||৩৫|| পেযো বরুণকাদিস্তু মধুশিগ্রুদ্রুমোঽপি বা | শিগ্রুমূলজলে সিদ্ধং সসিদ্ধার্থকমোদনম্ ||৩৬|| যবকোলকুলত্থানাং যূষৈর্ভুঞ্জীত মানবঃ | প্রাতঃ প্রাতশ্চ সেবেত মাত্রযা তৈল্বকং ঘৃতম্ ||৩৭|| ত্রিবৃতাদিগণক্বাথসিদ্ধং বাঽপ্যুপশান্তযে |৩৮|

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पक्वं वा बहिरुन्नद्धं भित्त्वा व्रणवदाचरेत् | स्रुतेषूर्ध्वमधो वाऽपि मैरेयाम्लसुरासवैः ||३५|| पेयो वरुणकादिस्तु मधुशिग्रुद्रुमोऽपि वा | शिग्रुमूलजले सिद्धं ससिद्धार्थकमोदनम् ||३६|| यवकोलकुलत्थानां यूषैर्भुञ्जीत मानवः | प्रातः प्रातश्च सेवेत मात्रया तैल्वकं घृतम् ||३७|| त्रिवृतादिगणक्वाथसिद्धं वाऽप्युपशान्तये |३८|

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Adhikarana 8 (38) · Śloka 39

নোপগচ্ছেদ্যথাপাকং প্রযতেত তথা ভিষক্ ||৩৮|| পর্যাগতে বিদ্রধৌ তু সিদ্ধির্নৈকান্তিকী স্মৃতা |৩৯|

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नोपगच्छेद्यथापाकं प्रयतेत तथा भिषक् ||३८|| पर्यागते विद्रधौ तु सिद्धिर्नैकान्तिकी स्मृता |३९|

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Adhikarana 9 (39-43) · Śloka 43

প্রত্যাখ্যায তু কুর্বীত মজ্জজাতে তু বিদ্রধৌ ||৩৯|| স্নেহস্বেদোপপন্নানাং কুর্যাদ্রক্তাবসেচনম্ | বিদ্রধ্যুক্তাং ক্রিযাং কুর্যাত্ পক্বে বাঽস্থি তু ভেদযেত্ ||৪০|| নিঃশল্যমথ বিজ্ঞায কর্তব্যং ব্রণশোধনম্ | ধাবেত্তিক্তকষাযেণ তিক্তং সর্পিস্তথা হিতম্ ||৪১|| যদি মজ্জপরিস্রাবো ন নিবর্তেত দেহিনঃ | কুর্যাত্ সংশোধনীযানি কষাযাদীনি বুদ্ধিমান্ ||৪২|| প্রিযঙ্গুধাতকীরোধ্রকট্ফলং তিনিসৈন্ধবম্ | এতৈস্তৈলং বিপক্তব্যং বিদ্রধিব্রণরোপণম্ ||৪৩||

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प्रत्याख्याय तु कुर्वीत मज्जजाते तु विद्रधौ ||३९|| स्नेहस्वेदोपपन्नानां कुर्याद्रक्तावसेचनम् | विद्रध्युक्तां क्रियां कुर्यात् पक्वे वाऽस्थि तु भेदयेत् ||४०|| निःशल्यमथ विज्ञाय कर्तव्यं व्रणशोधनम् | धावेत्तिक्तकषायेण तिक्तं सर्पिस्तथा हितम् ||४१|| यदि मज्जपरिस्रावो न निवर्तेत देहिनः | कुर्यात् संशोधनीयानि कषायादीनि बुद्धिमान् ||४२|| प्रियङ्गुधातकीरोध्रकट्फलं तिनिसैन्धवम् | एतैस्तैलं विपक्तव्यं विद्रधिव्रणरोपणम् ||४३||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 16

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং চিকিত্সাস্থানে বিদ্রধিচিকিত্সিতং নাম ষোডশোঽধ্যাযঃ ||১৬||

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इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने विद्रधिचिकित्सितं नाम षोडशोऽध्यायः ||१६||

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16. vidradhicikitsitam — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi