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3. jaṅgamaviṣavijñānīyakalpaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতো জঙ্গমবিষবিজ্ঞানীযং কল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातो जङ्गमविषविज्ञानीयं कल्पं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

জঙ্গমস্য বিষস্যোক্তান্যধিষ্ঠানানি ষোডশ | সমাসেন মযা যানি বিস্তরস্তেষু বক্ষ্যতে ||৩|| তত্র, দৃষ্টিনিঃশ্বাসদংষ্ট্রানখমূত্রপুরীষশুক্রলালার্তবমুখসন্দংশ- বিশর্ধিততুণ্ডাস্থিপিত্তশূকশবানীতি ||৪||

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जङ्गमस्य विषस्योक्तान्यधिष्ठानानि षोडश | समासेन मया यानि विस्तरस्तेषु वक्ष्यते ||३|| तत्र, दृष्टिनिःश्वासदंष्ट्रानखमूत्रपुरीषशुक्रलालार्तवमुखसन्दंश- विशर्धिततुण्डास्थिपित्तशूकशवानीति ||४||

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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5

তত্র, দৃষ্টিনিঃশ্বাসবিষা দিব্যাঃ সর্পাঃ, ভৌমাস্তু দংষ্ট্রাবিষাঃ, মার্জারশ্ববানরমকরমণ্ডূকপাকমত্স্যগোধাশম্বূকপ্রচলাকগৃহগোধিকাচতুষ্পাদকীটাস্তথাঽন্যে দংষ্ট্রানখবিষাঃ, চিপিটপিচ্চিটককষাযবাসিকসর্ষপকতোটকবর্চঃকীটকৌণ্ডিন্যকাঃ শকৃন্মূত্রবিষাঃ, মূষিকাঃ শুক্রবিষাঃ, লূতা লালামূত্রপুরীষমুখসন্দংশনখশুক্রার্তববিষাঃ , বৃশ্চিকবিশ্বম্ভরবরটীরাজীবমত্স্যোচ্চিটিঙ্গাঃ সমুদ্রবৃশ্চিকাশ্চাল(র)বিষাঃ, চিত্রশিরঃসরাবকুর্দিশতদারুকারিমেদকসারিকামুখা মুখসন্দংশবিশর্ধিতমূত্রপুরীষবিষাঃ, মক্ষিকাকণভজলাযুকা মুখসন্দংশবিষাঃ, বিষহতাস্থি সর্পকণ্টকবরটীমত্স্যাস্থি চেত্যস্থিবিষাণি, শকুলীমত্স্যরক্তরাজিবরকী(টী)মত্স্যাশ্চ পিত্তবিষাঃ, সূক্ষ্মতুণ্ডোচ্চিটিঙ্গবরটীশতপদীশূকবলভিকাশৃঙ্গিভ্রমরাঃ শূকতুণ্ডবিষাঃ, কীটসর্পদেহা গতাসবঃ শববিষাঃ; শেষাস্ত্বনুক্তা মুখসন্দংশবিষেষ্বেব গণযিতব্যাঃ ||৫||

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तत्र, दृष्टिनिःश्वासविषा दिव्याः सर्पाः, भौमास्तु दंष्ट्राविषाः, मार्जारश्ववानरमकरमण्डूकपाकमत्स्यगोधाशम्बूकप्रचलाकगृहगोधिकाचतुष्पादकीटास्तथाऽन्ये दंष्ट्रानखविषाः, चिपिटपिच्चिटककषायवासिकसर्षपकतोटकवर्चःकीटकौण्डिन्यकाः शकृन्मूत्रविषाः, मूषिकाः शुक्रविषाः, लूता लालामूत्रपुरीषमुखसन्दंशनखशुक्रार्तवविषाः , वृश्चिकविश्वम्भरवरटीराजीवमत्स्योच्चिटिङ्गाः समुद्रवृश्चिकाश्चाल(र)विषाः, चित्रशिरःसरावकुर्दिशतदारुकारिमेदकसारिकामुखा मुखसन्दंशविशर्धितमूत्रपुरीषविषाः, मक्षिकाकणभजलायुका मुखसन्दंशविषाः, विषहतास्थि सर्पकण्टकवरटीमत्स्यास्थि चेत्यस्थिविषाणि, शकुलीमत्स्यरक्तराजिवरकी(टी)मत्स्याश्च पित्तविषाः, सूक्ष्मतुण्डोच्चिटिङ्गवरटीशतपदीशूकवलभिकाशृङ्गिभ्रमराः शूकतुण्डविषाः, कीटसर्पदेहा गतासवः शवविषाः; शेषास्त्वनुक्ता मुखसन्दंशविषेष्वेव गणयितव्याः ||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6

ভবন্তি চাত্র- রাজ্ঞোঽরিদেশে রিপবস্তৃণাম্বুমার্গান্নধূমশ্বসনান্ বিষেণ | সন্দূষযন্ত্যেভিরতিপ্রদুষ্টান্ বিজ্ঞায লিঙ্গৈরভিশোধযেত্তান্ ||৬||

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भवन्ति चात्र- राज्ञोऽरिदेशे रिपवस्तृणाम्बुमार्गान्नधूमश्वसनान् विषेण | सन्दूषयन्त्येभिरतिप्रदुष्टान् विज्ञाय लिङ्गैरभिशोधयेत्तान् ||६||

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Adhikarana 5 (7-8) · Śloka 8

দুষ্টং জলং পিচ্ছিলমুগ্রগন্ধি ফেনান্বিতং রাজিভিরাবৃতং চ | মণ্ডূকমত্স্যং ম্রিযতে বিহঙ্গা মত্তাশ্চ সানূপচরা ভ্রমন্তি ||৭|| মজ্জন্তি যে চাত্র নরাশ্বনাগাস্তে ছর্দিমোহজ্বরদাহশোফান্ | ঋ(গ)চ্ছন্তি তেষামপহৃত্য দোষান্ দুষ্টং জলং শোধযিতুং যতেত ||৮||

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दुष्टं जलं पिच्छिलमुग्रगन्धि फेनान्वितं राजिभिरावृतं च | मण्डूकमत्स्यं म्रियते विहङ्गा मत्ताश्च सानूपचरा भ्रमन्ति ||७|| मज्जन्ति ये चात्र नराश्वनागास्ते छर्दिमोहज्वरदाहशोफान् | ऋ(ग)च्छन्ति तेषामपहृत्य दोषान् दुष्टं जलं शोधयितुं यतेत ||८||

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Adhikarana 6 (9) · Śloka 10

ধবাশ্বকর্ণাসনপারিভদ্রান্ সপাটলান্ সিদ্ধকমোক্ষকৌ চ | দগ্ধ্বা সরাজদ্রুমসোমবল্কাংস্তদ্ভস্ম শীতং বিতরেত্ সরঃসু ||৯|| ভস্মাঞ্জলিং চাপি ঘটে নিধায বিশোধযেদীপ্সিতমেবমম্ভঃ |১০|

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धवाश्वकर्णासनपारिभद्रान् सपाटलान् सिद्धकमोक्षकौ च | दग्ध्वा सराजद्रुमसोमवल्कांस्तद्भस्म शीतं वितरेत् सरःसु ||९|| भस्माञ्जलिं चापि घटे निधाय विशोधयेदीप्सितमेवमम्भः |१०|

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Adhikarana 7 (10-12) · Śloka 12

ক্ষিতিপ্রদেশং বিষদূষিতং তু শিলাতলং তীর্থমথেরিণং বা ||১০|| স্পৃশন্তি গাত্রেণ তু যেন যেন গোবাজিনাগোষ্ট্রখরা নরা বা | তচ্ছূনতাং যাত্যথ দহ্যতে চ বিশীর্যতে রোমনখং তথৈব ||১১|| তত্রাপ্যনন্তাং সহ সর্বগন্ধৈঃ পিষ্ট্বা সুরাভির্বিনিযোজ্য মার্গম্ | সিঞ্চেত্ পযোভিঃ সুমৃদন্বতৈস্তং বিডঙ্গপাঠাকটভীজলৈর্বা ||১২||

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क्षितिप्रदेशं विषदूषितं तु शिलातलं तीर्थमथेरिणं वा ||१०|| स्पृशन्ति गात्रेण तु येन येन गोवाजिनागोष्ट्रखरा नरा वा | तच्छूनतां यात्यथ दह्यते च विशीर्यते रोमनखं तथैव ||११|| तत्राप्यनन्तां सह सर्वगन्धैः पिष्ट्वा सुराभिर्विनियोज्य मार्गम् | सिञ्चेत् पयोभिः सुमृदन्वतैस्तं विडङ्गपाठाकटभीजलैर्वा ||१२||

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Adhikarana 8 (13-15) · Śloka 15

তৃণেষু ভক্তেষু চ দূষিতেষু সীদন্তি মূর্চ্ছন্তি বমন্তি চান্যে | বিড্ভেদমৃচ্ছন্ত্যথবা ম্রিযন্তে তেষাং চিকিত্সাং প্রণযেদ্যথোক্তাম্ ||১৩|| বিষাপহৈর্বাঽপ্যগদৈর্বিলিপ্য বাদ্যানি চিত্রাণ্যপি বাদযেত | তারঃ সুতারঃ সসুরেন্দ্রগোপঃ সর্বৈশ্চ তুল্যঃ কুরুবিন্দভাগঃ ||১৪|| পিত্তেন যুক্তঃ কপিলান্বযেন বাদ্যপ্রলেপো বিহিতঃ প্রশস্তঃ | বাদ্যস্য শব্দেন হি যান্তি নাশং বিষাণি ঘোরাণ্যপি যানি সন্তি ||১৫||

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तृणेषु भक्तेषु च दूषितेषु सीदन्ति मूर्च्छन्ति वमन्ति चान्ये | विड्भेदमृच्छन्त्यथवा म्रियन्ते तेषां चिकित्सां प्रणयेद्यथोक्ताम् ||१३|| विषापहैर्वाऽप्यगदैर्विलिप्य वाद्यानि चित्राण्यपि वादयेत | तारः सुतारः ससुरेन्द्रगोपः सर्वैश्च तुल्यः कुरुविन्दभागः ||१४|| पित्तेन युक्तः कपिलान्वयेन वाद्यप्रलेपो विहितः प्रशस्तः | वाद्यस्य शब्देन हि यान्ति नाशं विषाणि घोराण्यपि यानि सन्ति ||१५||

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Adhikarana 9 (16-17) · Śloka 17

ধূমেঽনিলে বা বিষসম্প্রযুক্তে খগাঃ শ্রমার্তাঃ প্রপতন্তি ভূমৌ | কাসপ্রতিশ্যাযশিরোরুজশ্চ ভবন্তি তীব্রা নযনামযাশ্চ ||১৬|| লাক্ষাহরিদ্রাতিবিষাভযাব্দহরেণুকৈলাদলবক্রকুষ্ঠম্ | প্রিযঙ্গুকাং চাপ্যনলে নিধায ধূমানিলৌ চাপি বিশোধযেত ||১৭||

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धूमेऽनिले वा विषसम्प्रयुक्ते खगाः श्रमार्ताः प्रपतन्ति भूमौ | कासप्रतिश्यायशिरोरुजश्च भवन्ति तीव्रा नयनामयाश्च ||१६|| लाक्षाहरिद्रातिविषाभयाब्दहरेणुकैलादलवक्रकुष्ठम् | प्रियङ्गुकां चाप्यनले निधाय धूमानिलौ चापि विशोधयेत ||१७||

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Adhikarana 10 (18-22) · Śloka 22

প্রজামিমামাত্মযোনের্ব্রহ্মণঃ সৃজতঃ কিল | অকরোদসুরো বিঘ্নং কৈটভো নাম দর্পিতঃ ||১৮|| তস্য ক্রুদ্ধস্য বৈ বক্ত্রাদ্ব্রহ্মণস্তেজসো নিধেঃ | ক্রোধো বিগ্রহবান্ ভূত্বা নিপপাতাতিদারুণঃ ||১৯|| স তং দদাহ গর্জন্তমন্তকাভং মহাবলম্ | ততোঽসুরং ঘাতযিত্বা তত্তেজোঽবর্ধতাদ্ভুতম্ ||২০|| ততো বিষাদো দেবানামভবত্তং নিরীক্ষ্য বৈ | বিষাদজননত্বাচ্চ বিষমিত্যভিধীযতে ||২১|| ততঃ সৃষ্ট্বা প্রজাঃ শেষং তদা তং ক্রোধমীশ্বরঃ | বিন্যস্তবান্ স ভূতেষু স্থাবরেষু চরেষু চ ||২২||

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प्रजामिमामात्मयोनेर्ब्रह्मणः सृजतः किल | अकरोदसुरो विघ्नं कैटभो नाम दर्पितः ||१८|| तस्य क्रुद्धस्य वै वक्त्राद्ब्रह्मणस्तेजसो निधेः | क्रोधो विग्रहवान् भूत्वा निपपातातिदारुणः ||१९|| स तं ददाह गर्जन्तमन्तकाभं महाबलम् | ततोऽसुरं घातयित्वा तत्तेजोऽवर्धताद्भुतम् ||२०|| ततो विषादो देवानामभवत्तं निरीक्ष्य वै | विषादजननत्वाच्च विषमित्यभिधीयते ||२१|| ततः सृष्ट्वा प्रजाः शेषं तदा तं क्रोधमीश्वरः | विन्यस्तवान् स भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च ||२२||

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Adhikarana 11 (23-24) · Śloka 24

যথাঽব্যক্তরসং তোযমন্তরীক্ষান্মহীগতম্ | তেষু তেষু প্রদেশেষু রসং তং তং নিযচ্ছতি ||২৩|| এবমেব বিষং যদ্যদ্দ্রব্যং ব্যাপ্যাবতিষ্ঠতে | স্বভাবাদেব তং তস্য রসং সমনুবর্ততে ||২৪||

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यथाऽव्यक्तरसं तोयमन्तरीक्षान्महीगतम् | तेषु तेषु प्रदेशेषु रसं तं तं नियच्छति ||२३|| एवमेव विषं यद्यद्द्रव्यं व्याप्यावतिष्ठते | स्वभावादेव तं तस्य रसं समनुवर्तते ||२४||

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Adhikarana 12 (25-27) · Śloka 27

বিষে যস্মাদ্গুণাঃ সর্বে তীক্ষ্ণাঃ প্রাযেণ সন্তি হি | বিষং সর্বমতো জ্ঞেযং সর্বদোষপ্রকোপণম্ ||২৫|| তে তু বৃত্তিং প্রকুপিতা জহতি স্বাং বিষার্দিতাঃ | নোপযাতি বিষং পাকমতঃ প্রাণান্ রুণদ্ধি চ ||২৬|| শ্লেষ্মণাঽঽবৃতমার্গত্বাদুচ্ছ্বাসোঽস্য নিরুধ্যতে | বিসঞ্জ্ঞঃ সতি জীবেঽপি তস্মাত্তিষ্ঠতি মানবঃ ||২৭||

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विषे यस्माद्गुणाः सर्वे तीक्ष्णाः प्रायेण सन्ति हि | विषं सर्वमतो ज्ञेयं सर्वदोषप्रकोपणम् ||२५|| ते तु वृत्तिं प्रकुपिता जहति स्वां विषार्दिताः | नोपयाति विषं पाकमतः प्राणान् रुणद्धि च ||२६|| श्लेष्मणाऽऽवृतमार्गत्वादुच्छ्वासोऽस्य निरुध्यते | विसञ्ज्ञः सति जीवेऽपि तस्मात्तिष्ठति मानवः ||२७||

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Adhikarana 13 (28-29) · Śloka 29

শুক্রবত্ সর্বসর্পাণাং বিষং সর্বশরীরগম্ | ক্রুদ্ধানামেতি চাঙ্গেভ্যঃ শুক্রং নির্মন্থনাদিব ||২৮|| তেষাং বডিশবদ্দংষ্ট্রাস্তাসু সজ্জতি চাগতম্ | অনুদ্বৃত্তা বিষং তস্মান্ন মুঞ্চন্তি চ ভোগিনঃ ||২৯||

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शुक्रवत् सर्वसर्पाणां विषं सर्वशरीरगम् | क्रुद्धानामेति चाङ्गेभ्यः शुक्रं निर्मन्थनादिव ||२८|| तेषां बडिशवद्दंष्ट्रास्तासु सज्जति चागतम् | अनुद्वृत्ता विषं तस्मान्न मुञ्चन्ति च भोगिनः ||२९||

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Adhikarana 14 (30-31) · Śloka 32

যস্মাদত্যর্থমুষ্ণং চ তীক্ষ্ণং চ পঠিতং বিষম্ | অতঃ সর্ববিষেষূক্তঃ পরিষেকস্তু শীতলঃ ||৩০|| মন্দং কীটেষু নাত্যুষ্ণং বহুবাতকফং বিষম্ | অতঃ কীটবিষে চাপি স্বেদো ন প্রতিষিধ্যতে ||৩১|| কীটৈর্দষ্টানুগ্রবিষৈঃ সর্পবত্ সমুপাচরেত্ |৩২|

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यस्मादत्यर्थमुष्णं च तीक्ष्णं च पठितं विषम् | अतः सर्वविषेषूक्तः परिषेकस्तु शीतलः ||३०|| मन्दं कीटेषु नात्युष्णं बहुवातकफं विषम् | अतः कीटविषे चापि स्वेदो न प्रतिषिध्यते ||३१|| कीटैर्दष्टानुग्रविषैः सर्पवत् समुपाचरेत् |३२|

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Adhikarana 15 (32-34) · Śloka 35

স্বভাবাদেব তিষ্ঠেত্তু প্রহারাদংশযোর্বিষম্ ||৩২|| ব্যাপ্য সাবযবং দেহং দিগ্ধবিদ্ধাহিদষ্টযোঃ | লৌল্যাদ্বিষান্বিতং মাংসং যঃ খাদেন্মৃতমাত্রযোঃ ||৩৩|| যথাবিষং স রোগেণ ক্লিশ্যতে ম্রিযতেঽপি বা | অতশ্চাপ্যনযোর্মাংসমভক্ষ্যং মৃতমাত্রযোঃ ||৩৪|| মুহূর্তাত্তদুপাদেযং প্রহারাদংশবর্জিতম্ |৩৫|

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स्वभावादेव तिष्ठेत्तु प्रहारादंशयोर्विषम् ||३२|| व्याप्य सावयवं देहं दिग्धविद्धाहिदष्टयोः | लौल्याद्विषान्वितं मांसं यः खादेन्मृतमात्रयोः ||३३|| यथाविषं स रोगेण क्लिश्यते म्रियतेऽपि वा | अतश्चाप्यनयोर्मांसमभक्ष्यं मृतमात्रयोः ||३४|| मुहूर्तात्तदुपादेयं प्रहारादंशवर्जितम् |३५|

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Adhikarana 16 (35-37) · Śloka 37

সবাতং গৃহধূমাভং পুরীষং যোঽতিসার্যতে ||৩৫|| আধ্মাতোঽত্যর্থমুষ্ণাস্রো বিবর্ণঃ সাদপীডিতঃ | উদ্বমত্যথ ফেনং চ বিষপীতং তমাদিশেত্ ||৩৬|| ন চাস্য হৃদযং বহ্নির্বিষজুষ্টং দহত্যপি | তদ্ধি স্থানং চেতনাযাঃ স্বভাবাদ্ব্যাপ্য তিষ্ঠতি ||৩৭||

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सवातं गृहधूमाभं पुरीषं योऽतिसार्यते ||३५|| आध्मातोऽत्यर्थमुष्णास्रो विवर्णः सादपीडितः | उद्वमत्यथ फेनं च विषपीतं तमादिशेत् ||३६|| न चास्य हृदयं वह्निर्विषजुष्टं दहत्यपि | तद्धि स्थानं चेतनायाः स्वभावाद्व्याप्य तिष्ठति ||३७||

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Adhikarana 17 (38) · Śloka 38

অশ্বত্থদেবাযতনশ্মশানবল্মীকসন্ধ্যাসু চতুষ্পথেষু | যাম্যে সপিত্র্যে পরিবর্জনীযা ঋক্ষে নরা মর্মসু যে চ দষ্টাঃ ||৩৮||

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अश्वत्थदेवायतनश्मशानवल्मीकसन्ध्यासु चतुष्पथेषु | याम्ये सपित्र्ये परिवर्जनीया ऋक्षे नरा मर्मसु ये च दष्टाः ||३८||

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Adhikarana 18 (39) · Śloka 40

দর্বীকরাণাং বিষমাশুঘাতি সর্বাণি চোষ্ণে দ্বিগুণীভবন্তি | অজীর্ণপিত্তাতপপীডিতেষু বালপ্রমেহিষ্বথ গর্ভিণীষু ||৩৯|| বৃদ্ধাতুরক্ষীণবুভুক্ষিতেষু রূক্ষেষু ভীরুষ্বথ দুর্দিনেষু |৪০|

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दर्वीकराणां विषमाशुघाति सर्वाणि चोष्णे द्विगुणीभवन्ति | अजीर्णपित्तातपपीडितेषु बालप्रमेहिष्वथ गर्भिणीषु ||३९|| वृद्धातुरक्षीणबुभुक्षितेषु रूक्षेषु भीरुष्वथ दुर्दिनेषु |४०|

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Adhikarana 19 (40-44) · Śloka 44

শস্ত্রক্ষতে যস্য ন রক্তমেতি রাজ্যো লতাভিশ্চ ন সম্ভবন্তি ||৪০|| শীতাভিরদ্ভিশ্চ ন রোমহর্ষো বিষাভিভূতং পরিবর্জযেত্তম্ | জিহ্বা সিতা যস্য চ কেশশাতো নাসাবভঙ্গশ্চ সকণ্ঠভঙ্গঃ ||৪১|| কৃষ্ণঃ সরক্তঃ শ্বযথুশ্চ দংশে হন্বোঃ স্থিরত্বং চ স বর্জনীযঃ | বর্তির্ঘনা যস্য নিরেতি বক্ত্রাদ্রক্তং স্রবেদূর্ধ্বমধশ্চ যস্য ||৪২|| দংষ্ট্রানিপাতাঃ সকলাশ্চ যস্য তং চাপি বৈদ্যঃ পরিবর্জযেত্তু | উন্মত্তমত্যর্থমুপদ্রুতং বা হীনস্বরং বাঽপ্যথবা বিবর্ণম্ ||৪৩|| সারিষ্টমত্যর্থমবেগিনং চ জহ্যান্নরং তত্র ন কর্ম কুর্যাত্ ||৪৪||

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शस्त्रक्षते यस्य न रक्तमेति राज्यो लताभिश्च न सम्भवन्ति ||४०|| शीताभिरद्भिश्च न रोमहर्षो विषाभिभूतं परिवर्जयेत्तम् | जिह्वा सिता यस्य च केशशातो नासावभङ्गश्च सकण्ठभङ्गः ||४१|| कृष्णः सरक्तः श्वयथुश्च दंशे हन्वोः स्थिरत्वं च स वर्जनीयः | वर्तिर्घना यस्य निरेति वक्त्राद्रक्तं स्रवेदूर्ध्वमधश्च यस्य ||४२|| दंष्ट्रानिपाताः सकलाश्च यस्य तं चापि वैद्यः परिवर्जयेत्तु | उन्मत्तमत्यर्थमुपद्रुतं वा हीनस्वरं वाऽप्यथवा विवर्णम् ||४३|| सारिष्टमत्यर्थमवेगिनं च जह्यान्नरं तत्र न कर्म कुर्यात् ||४४||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 3

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং কল্পস্থানে জঙ্গমবিষবিজ্ঞানীযো নাম তৃতীযোঽধ্যাযঃ ||৩||

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इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने जङ्गमविषविज्ञानीयो नाम तृतीयोऽध्यायः ||३||

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3. jaṅgamaviṣavijñānīyakalpaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi