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4. sarpadaṣṭaviṣavijñānīyakalpaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ সর্পদষ্টবিষবিজ্ঞানীযং কল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः सर्पदष्टविषविज्ञानीयं कल्पं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

ধন্বন্তরিং মহাপ্রাজ্ঞং সর্বশাস্ত্রবিশারদম্ | পাদযোরুপসঙ্গৃহ্য সুশ্রুতঃ পরিপৃচ্ছতি ||৩||

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धन्वन्तरिं महाप्राज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् | पादयोरुपसङ्गृह्य सुश्रुतः परिपृच्छति ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

সর্পসঙ্খ্যাং বিভাগং চ দষ্টলক্ষণমেব চ | জ্ঞানং চ বিষবেগানাং ভগবন্ ! বক্তুমর্হসি ||৪||

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सर्पसङ्ख्यां विभागं च दष्टलक्षणमेव च | ज्ञानं च विषवेगानां भगवन् ! वक्तुमर्हसि ||४||

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Adhikarana 4 (5-8) · Śloka 9

তস্য তদ্বচনং শ্রুত্বা প্রাব্রবীদ্ভিষজাং বরঃ | অসঙ্খ্যা বাসুকিশ্রেষ্ঠা বিখ্যাতাস্তক্ষকাদযঃ ||৫|| মহীধরাশ্চ নাগেন্দ্রা হুতাগ্নিসমতেজসঃ | যে চাপ্যজস্রং গর্জন্তি বর্ষন্তি চ তপন্তি চ ||৬|| সসাগরগিরিদ্বীপা যৈরিযং ধার্যতে মহী | ক্রুদ্ধা নিঃশ্বাসদৃষ্টিভ্যাং যে হন্যুরখিলং জগত্ ||৭|| নমস্তেভ্যোঽস্তি নো তেষাং কার্যং কিঞ্চিচ্চিকিত্সযা | যে তু দংষ্ট্রাবিষা ভৌমা যে দশন্তি চ মানুষান্ ||৮|| তেষাং সঙ্খ্যাং প্রবক্ষ্যামি যথাবদনুপূর্বশঃ |৯|

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तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्राब्रवीद्भिषजां वरः | असङ्ख्या वासुकिश्रेष्ठा विख्यातास्तक्षकादयः ||५|| महीधराश्च नागेन्द्रा हुताग्निसमतेजसः | ये चाप्यजस्रं गर्जन्ति वर्षन्ति च तपन्ति च ||६|| ससागरगिरिद्वीपा यैरियं धार्यते मही | क्रुद्धा निःश्वासदृष्टिभ्यां ये हन्युरखिलं जगत् ||७|| नमस्तेभ्योऽस्ति नो तेषां कार्यं किञ्चिच्चिकित्सया | ये तु दंष्ट्राविषा भौमा ये दशन्ति च मानुषान् ||८|| तेषां सङ्ख्यां प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः |९|

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Adhikarana 5 (9-12) · Śloka 13

অশীতিস্ত্বেব সর্পাণাং ভিদ্যতে পঞ্চধা তু সা ||৯|| দর্বীকরা মণ্ডলিনো রাজিমন্তস্তথৈব চ | নির্বিষা বৈকরঞ্জাশ্চ ত্রিবিধাস্তে পুনঃ স্মৃতাঃ ||১০|| দর্বীকরা মণ্ডলিনো রাজিমন্তশ্চ পন্নগাঃ | তেষু দর্বীকরা জ্ঞেযা বিংশতিঃ ষট্ চ পন্নগাঃ ||১১|| দ্বাবিংশতির্মণ্ডলিনো রাজিমন্তস্তথা দশ | নির্বিষা দ্বাদশ জ্ঞেযা বৈকরঞ্জাস্ত্রযস্তথা ||১২|| বৈকরঞ্জোদ্ভবাঃ সপ্ত চিত্রা মণ্ডলিরাজিলাঃ |১৩|

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अशीतिस्त्वेव सर्पाणां भिद्यते पञ्चधा तु सा ||९|| दर्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तस्तथैव च | निर्विषा वैकरञ्जाश्च त्रिविधास्ते पुनः स्मृताः ||१०|| दर्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तश्च पन्नगाः | तेषु दर्वीकरा ज्ञेया विंशतिः षट् च पन्नगाः ||११|| द्वाविंशतिर्मण्डलिनो राजिमन्तस्तथा दश | निर्विषा द्वादश ज्ञेया वैकरञ्जास्त्रयस्तथा ||१२|| वैकरञ्जोद्भवाः सप्त चित्रा मण्डलिराजिलाः |१३|

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Adhikarana 6 (13) · Śloka 14

পাদাভিমৃষ্টা দুষ্টা বা ক্রুদ্ধা গ্রাসার্থিনোঽপি বা ||১৩|| তে দশন্তি মহাক্রোধাস্ত্রিবিধং ভীমদর্শনাঃ |১৪|

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पादाभिमृष्टा दुष्टा वा क्रुद्धा ग्रासार्थिनोऽपि वा ||१३|| ते दशन्ति महाक्रोधास्त्रिविधं भीमदर्शनाः |१४|

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Adhikarana 7 (14-19) · Śloka 19

সর্পিতং রদিতং চাপি তৃতীযমথ নির্বিষম্ | সর্পাঙ্গাভিহতং কেচিদিচ্ছন্তি খলু তদ্বিদঃ ||১৪|| পদানি যত্র দন্তানামেকং দ্বে বা বহূনি বা | নিমগ্নান্যল্পরক্তানি যান্যুদ্বৃত্য করোতি হি ||১৫|| চঞ্চুমালকযুক্তানি বৈকৃত্যকরণানি চ | সঙ্ক্ষিপ্তানি সশোফানি বিদ্যাত্তত্ সর্পিতং ভিষক্ ||১৬|| রাজ্যঃ সলোহিতা যত্র নীলাঃ পীতাঃ সিতাস্তথা | বিজ্ঞেযং রদিতং তত্তু জ্ঞেযমল্পবিষং চ তত্ ||১৭|| অশোফমল্পদুষ্টাসৃক্ প্রকৃতিস্থস্য দেহিনঃ | পদং পদানি বা বিদ্যাদবিষং তচ্চিকিত্সকঃ ||১৮|| সর্পস্পৃষ্টস্য ভীরোর্হি ভযেন কুপিতোঽনিলঃ | কস্যচিত্ কুরুতে শোফং সর্পাঙ্গাভিহতং তু তত্ ||১৯||

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सर्पितं रदितं चापि तृतीयमथ निर्विषम् | सर्पाङ्गाभिहतं केचिदिच्छन्ति खलु तद्विदः ||१४|| पदानि यत्र दन्तानामेकं द्वे वा बहूनि वा | निमग्नान्यल्परक्तानि यान्युद्वृत्य करोति हि ||१५|| चञ्चुमालकयुक्तानि वैकृत्यकरणानि च | सङ्क्षिप्तानि सशोफानि विद्यात्तत् सर्पितं भिषक् ||१६|| राज्यः सलोहिता यत्र नीलाः पीताः सितास्तथा | विज्ञेयं रदितं तत्तु ज्ञेयमल्पविषं च तत् ||१७|| अशोफमल्पदुष्टासृक् प्रकृतिस्थस्य देहिनः | पदं पदानि वा विद्यादविषं तच्चिकित्सकः ||१८|| सर्पस्पृष्टस्य भीरोर्हि भयेन कुपितोऽनिलः | कस्यचित् कुरुते शोफं सर्पाङ्गाभिहतं तु तत् ||१९||

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Adhikarana 8 (20-21) · Śloka 21

ব্যাধিতোদ্বিগ্নদষ্টানি জ্ঞেযান্যল্পবিষাণি তু | তথাঽতিবৃদ্ধবালাভিদষ্টমল্পবিষং স্মৃতম্ ||২০|| সুপর্ণদেবব্রহ্মর্ষিযক্ষসিদ্ধনিষেবিতে | বিষঘ্নৌষধিযুক্তে চ দেশে ন ক্রমতে বিষম্ ||২১||

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व्याधितोद्विग्नदष्टानि ज्ञेयान्यल्पविषाणि तु | तथाऽतिवृद्धबालाभिदष्टमल्पविषं स्मृतम् ||२०|| सुपर्णदेवब्रह्मर्षियक्षसिद्धनिषेविते | विषघ्नौषधियुक्ते च देशे न क्रमते विषम् ||२१||

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Adhikarana 9 (22-24) · Śloka 24

রথাঙ্গলাঙ্গলচ্ছত্রস্বস্তিকাঙ্কুশধারিণঃ | জ্ঞেযা দর্বীকরাঃ সর্পাঃ ফণিনঃ শীঘ্রগামিনঃ ||২২|| মণ্ডলৈর্বিবিধৈশ্চিত্রাঃ পৃথবো মন্দগামিনঃ | জ্ঞেযা মণ্ডলিনঃ সর্পা জ্বলনার্কসমপ্রভাঃ ||২৩|| স্নিগ্ধা বিবিধবর্ণাভিস্তির্যগূর্ধ্বং চ রাজিভিঃ | চিত্রিতা ইব যে ভান্তি রাজিমন্তস্তু তে স্মৃতাঃ ||২৪||

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रथाङ्गलाङ्गलच्छत्रस्वस्तिकाङ्कुशधारिणः | ज्ञेया दर्वीकराः सर्पाः फणिनः शीघ्रगामिनः ||२२|| मण्डलैर्विविधैश्चित्राः पृथवो मन्दगामिनः | ज्ञेया मण्डलिनः सर्पा ज्वलनार्कसमप्रभाः ||२३|| स्निग्धा विविधवर्णाभिस्तिर्यगूर्ध्वं च राजिभिः | चित्रिता इव ये भान्ति राजिमन्तस्तु ते स्मृताः ||२४||

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Adhikarana 10 (25-28) · Śloka 28

মুক্তারূপ্যপ্রভা যে চ কপিলা যে চ পন্নগাঃ | সুগন্ধযঃ সুবর্ণাভাস্তে জাত্যা ব্রাহ্মণাঃ স্মৃতাঃ ||২৫|| ক্ষত্রিযাঃ স্নিগ্ধবর্ণাস্তু পন্নগা ভৃশকোপনাঃ | সূর্যচন্দ্রাকৃতিচ্ছত্রলক্ষ্ম তেষাং তথাঽম্বুজম্ ||২৬|| কৃষ্ণা বজ্রনিভা যে চ লোহিতা বর্ণতস্তথা | ধূম্রাঃ পারাবতাভাশ্চ বৈশ্যাস্তে পন্নগাঃ স্মৃতাঃ ||২৭|| মহিষদ্বীপিবর্ণাভাস্তথৈব পরুষত্বচঃ | ভিন্নবর্ণাশ্চ যে কেচিচ্ছূদ্রাস্তে পরিকীর্তিতাঃ ||২৮||

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मुक्तारूप्यप्रभा ये च कपिला ये च पन्नगाः | सुगन्धयः सुवर्णाभास्ते जात्या ब्राह्मणाः स्मृताः ||२५|| क्षत्रियाः स्निग्धवर्णास्तु पन्नगा भृशकोपनाः | सूर्यचन्द्राकृतिच्छत्रलक्ष्म तेषां तथाऽम्बुजम् ||२६|| कृष्णा वज्रनिभा ये च लोहिता वर्णतस्तथा | धूम्राः पारावताभाश्च वैश्यास्ते पन्नगाः स्मृताः ||२७|| महिषद्वीपिवर्णाभास्तथैव परुषत्वचः | भिन्नवर्णाश्च ये केचिच्छूद्रास्ते परिकीर्तिताः ||२८||

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Adhikarana 11 (29) · Śloka 31

কোপযন্ত্যনিলং জন্তোঃ ফণিনঃ সর্ব এব তু | পিত্তং মণ্ডলিনশ্চাপি কফং চানেকরাজযঃ ||২৯|| অপত্যমসবর্ণাভ্যাং দ্বিদোষকরলক্ষণম্ | জ্ঞেযৌ দোষৈশ্চ দম্পত্যো... |৩১|

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कोपयन्त्यनिलं जन्तोः फणिनः सर्व एव तु | पित्तं मण्डलिनश्चापि कफं चानेकराजयः ||२९|| अपत्यमसवर्णाभ्यां द्विदोषकरलक्षणम् | ज्ञेयौ दोषैश्च दम्पत्यो... |३१|

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Adhikarana 12 (30-31) · Śloka 31

...র্বিশেষশ্চাত্র বক্ষ্যতে ||৩০|| রজন্যাঃ পশ্চিমে যামে সর্পাশ্চিত্রাশ্চরন্তি হি | শেষেষূক্তা মণ্ডলিনো দিবা দর্বীকরাঃ স্মৃতাঃ ||৩১||

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...र्विशेषश्चात्र वक्ष्यते ||३०|| रजन्याः पश्चिमे यामे सर्पाश्चित्राश्चरन्ति हि | शेषेषूक्ता मण्डलिनो दिवा दर्वीकराः स्मृताः ||३१||

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Adhikarana 13 (32) · Śloka 32

দর্বীকরাস্তু তরুণা বৃদ্ধা মণ্ডলিনস্তথা | রাজিমন্তো বযোমধ্যা জাযন্তে মৃত্যুহেতবঃ ||৩২||

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दर्वीकरास्तु तरुणा वृद्धा मण्डलिनस्तथा | राजिमन्तो वयोमध्या जायन्ते मृत्युहेतवः ||३२||

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Adhikarana 14 (33) · Śloka 33

নকুলাকুলিতা বালা বারিবিপ্রহতাঃ কৃশাঃ | বৃদ্ধা মুক্তত্বচো ভীতাঃ সর্পাস্ত্বল্পবিষাঃ স্মৃতাঃ ||৩৩||

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नकुलाकुलिता बाला वारिविप्रहताः कृशाः | वृद्धा मुक्तत्वचो भीताः सर्पास्त्वल्पविषाः स्मृताः ||३३||

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Adhikarana 15 (34) · Śloka 34

তত্র, দর্বীকরাঃ- কৃষ্ণসর্পো, মহাকৃষ্ণঃ, কৃষ্ণোদরঃ শ্বেতকপোতো, মহাকপোতো, বলাহকো, মহাসর্পঃ, শঙ্খকপালো , লোহিতাক্ষো, গবেধুকঃ, পরিসর্পঃ, খণ্ডফণঃ, ককুদঃ, পদ্মো, মহাপদ্মো, দর্ভপুষ্পো, দধিমুখঃ, পুণ্ডরীকো, ভ্রূকুটীমুখো, বিষ্কিরঃ, পুষ্পাভিকীর্ণো, গিরিসর্পঃ, ঋজুসর্পঃ, শ্বেতোদরো, মহাশিরা, অলগর্দ, আশীবিষ ইতি (১); মণ্ডলিনস্তু- আদর্শমণ্ডলঃ, শ্বেতমণ্ডলো, রক্তমণ্ডলঃ, চিত্রমণ্ডলঃ, পৃষতো, রোধ্রপুষ্পো, মিলিন্দকো, গোনসো, বৃদ্ধগোনসঃ, পনসো, মহাপনসো, বেণুপত্রকঃ, শিশুকো মদনঃ, পালিন্দিরঃ, পিঙ্গলঃ , তন্তুকঃ পুষ্পপাণ্ডুঃ, ষডঙ্গো, অগ্নিকো বভ্রুঃ, কষাযঃ, কলুষঃ পারাবতো, হস্তাভরণঃ, চিত্রকঃ, এণীপদ ইতি (২); রাজিমন্তস্তু- পুণ্ডরীকো রাজিচিত্রো, অঙ্গুলরাজিঃ, বিন্দুরাজিঃ, কর্দমকঃ, তৃণশোষকঃ, সর্ষপকঃ শ্বেতহনুঃ, দর্ভপুষ্পশ্চক্রকো, গোধূমকঃ, কিক্কিসাদ ইতি (৩); নির্বিষাস্তু- গলগোলী, শূকপত্রো, অজগরো, দিব্যকো, বর্ষাহিকঃ, পুষ্পশকলী, জ্যোতীরথঃ, ক্ষীরিকাপুষ্পকো, অহিপতাকো, অন্ধাহিকো, গৌরাহিকো, বৃক্ষেশয ইতি (৪); বৈকরঞ্জাস্তু ত্রযাণাং দর্বীকরাদীনাং ব্যতিকরাজ্জাতাঃ, তদ্যথা- মাকুলিঃ, পোটগলঃ, স্নিগ্ধরাজিরিতি | তত্র, কৃষ্ণসর্পেণ গোনস্যাং বৈপরীত্যেন বা জাতো মাকুলিঃ; রাজিলেন গোনস্যাং বৈপরীত্যেন বা জাতঃ পোটগলঃ; কৃষ্ণসর্পেণ রাজিমত্যাং বৈপরীত্যেন বা জাতঃ স্নিগ্ধরাজিরিতি | তেষামাদ্যস্য পিতৃবদ্বিষোত্কর্ষো, দ্বযোর্মাতৃবদিত্যেকে (৫) |৩৪|

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तत्र, दर्वीकराः- कृष्णसर्पो, महाकृष्णः, कृष्णोदरः श्वेतकपोतो, महाकपोतो, बलाहको, महासर्पः, शङ्खकपालो , लोहिताक्षो, गवेधुकः, परिसर्पः, खण्डफणः, ककुदः, पद्मो, महापद्मो, दर्भपुष्पो, दधिमुखः, पुण्डरीको, भ्रूकुटीमुखो, विष्किरः, पुष्पाभिकीर्णो, गिरिसर्पः, ऋजुसर्पः, श्वेतोदरो, महाशिरा, अलगर्द, आशीविष इति (१); मण्डलिनस्तु- आदर्शमण्डलः, श्वेतमण्डलो, रक्तमण्डलः, चित्रमण्डलः, पृषतो, रोध्रपुष्पो, मिलिन्दको, गोनसो, वृद्धगोनसः, पनसो, महापनसो, वेणुपत्रकः, शिशुको मदनः, पालिन्दिरः, पिङ्गलः , तन्तुकः पुष्पपाण्डुः, षडङ्गो, अग्निको बभ्रुः, कषायः, कलुषः पारावतो, हस्ताभरणः, चित्रकः, एणीपद इति (२); राजिमन्तस्तु- पुण्डरीको राजिचित्रो, अङ्गुलराजिः, बिन्दुराजिः, कर्दमकः, तृणशोषकः, सर्षपकः श्वेतहनुः, दर्भपुष्पश्चक्रको, गोधूमकः, किक्किसाद इति (३); निर्विषास्तु- गलगोली, शूकपत्रो, अजगरो, दिव्यको, वर्षाहिकः, पुष्पशकली, ज्योतीरथः, क्षीरिकापुष्पको, अहिपताको, अन्धाहिको, गौराहिको, वृक्षेशय इति (४); वैकरञ्जास्तु त्रयाणां दर्वीकरादीनां व्यतिकराज्जाताः, तद्यथा- माकुलिः, पोटगलः, स्निग्धराजिरिति | तत्र, कृष्णसर्पेण गोनस्यां वैपरीत्येन वा जातो माकुलिः; राजिलेन गोनस्यां वैपरीत्येन वा जातः पोटगलः; कृष्णसर्पेण राजिमत्यां वैपरीत्येन वा जातः स्निग्धराजिरिति | तेषामाद्यस्य पितृवद्विषोत्कर्षो, द्वयोर्मातृवदित्येके (५) |३४|

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Adhikarana 16 (34) · Śloka 34

ত্রযাণাং বৈকরঞ্জানাং পুনর্দিব্যেলকরোধ্রপুষ্পকরাজিচিত্রকপোটগলপুষ্পাভিকীর্ণদর্ভপুষ্পবেল্লিতকাঃ সপ্ত; তেষামাদ্যাস্ত্রযো রাজিলবত্, শেষা মণ্ডলিবত্, এবমেতেষাং সর্পাণামশীতির্ব্যাখ্যাতা ||৩৪||

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त्रयाणां वैकरञ्जानां पुनर्दिव्येलकरोध्रपुष्पकराजिचित्रकपोटगलपुष्पाभिकीर्णदर्भपुष्पवेल्लितकाः सप्त; तेषामाद्यास्त्रयो राजिलवत्, शेषा मण्डलिवत्, एवमेतेषां सर्पाणामशीतिर्व्याख्याता ||३४||

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Adhikarana 17 (35) · Śloka 35

তত্র মহানেত্রজিহ্বাস্যশিরসঃ পুমাংসঃ, সূক্ষ্মনেত্রজিহ্বাস্যশিরসঃ স্ত্রিযঃ, উভযলক্ষণা মন্দবিষা অক্রোধা নপুংসকা ইতি ||৩৫||

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तत्र महानेत्रजिह्वास्यशिरसः पुमांसः, सूक्ष्मनेत्रजिह्वास्यशिरसः स्त्रियः, उभयलक्षणा मन्दविषा अक्रोधा नपुंसका इति ||३५||

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Adhikarana 18 (36) · Śloka 36

তত্র সর্বেষাং সর্পাণাং সামান্যত এব দষ্টলক্ষণং বক্ষ্যামঃ | কিং কারণং? বিষং হি নিশিতনিস্ত্রিংশাশনিহুতবহদেশ্যমাশুকারি মুহর্তমপ্যুপেক্ষিতমাতুরমতিপাতযতি, ন চাবকাশোঽস্তি বাক্সমূহমুপসর্তুং প্রত্যেকমপি দষ্টলক্ষণেঽভিহিতে সর্বত্র ত্রৈবিধ্যং ভবতি, তস্মাত্ ত্রৈবিধ্যমেব বক্ষ্যামঃ; এতদ্ধ্যাতুরহিতমসম্মোহকরং চ, অপি চাত্রৈব সর্বসর্পব্যঞ্জনাবরোধঃ ||৩৬||

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तत्र सर्वेषां सर्पाणां सामान्यत एव दष्टलक्षणं वक्ष्यामः | किं कारणं? विषं हि निशितनिस्त्रिंशाशनिहुतवहदेश्यमाशुकारि मुहर्तमप्युपेक्षितमातुरमतिपातयति, न चावकाशोऽस्ति वाक्समूहमुपसर्तुं प्रत्येकमपि दष्टलक्षणेऽभिहिते सर्वत्र त्रैविध्यं भवति, तस्मात् त्रैविध्यमेव वक्ष्यामः; एतद्ध्यातुरहितमसम्मोहकरं च, अपि चात्रैव सर्वसर्पव्यञ्जनावरोधः ||३६||

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Adhikarana 19 (37) · Śloka 37

তত্র, দর্বীকরবিষেণ ত্বঙ্নযননখদশনবদনমূত্রপুরীষদংশকৃষ্ণত্বং রৌক্ষ্যং শিরসো গৌরবং সন্ধিবেদনা কটীপৃষ্ঠগ্রীবাদৌর্বল্যং জৃম্ভণং বেপথুঃ স্বরাবসাদো ঘুর্ঘুরকো জডতা শুষ্কোদ্গারঃ কাসশ্বাসৌ হিক্কা বাযোরূর্ধ্বগমনং শূলোদ্বেষ্টনং তৃষ্ণা লালাস্রাবঃ ফেনাগমনং স্রোতোঽবরোধস্তাস্তাশ্চ বাতবেদনা ভবন্তি; মণ্ডলিবিষেণ ত্বগাদীনাং পীতত্বং শীতাভিলাষঃ পরিধূপনং দাহস্তৃষ্ণা মদো মূর্চ্ছা জ্বরঃ শোণিতাগমনমূর্ধ্বমধশ্চ মাংসানামবশাতনং শ্বযথুর্দংশকোথঃ পীতরূপদর্শনমাশুকোপস্তাস্তাশ্চ পিত্তবেদনা ভবন্তি; রাজিমদ্বিষেণ শুক্লত্বং ত্বগাদীনাং শীতজ্বরো রোমহর্ষঃ স্তব্ধত্বং গাত্রাণামাদংশশোফঃ সান্দ্রকফপ্রসেকশ্ছর্দিরভীক্ষ্ণমক্ষ্ণোঃ কণ্ডূঃ কণ্ঠে শ্বযথুর্ঘুর্ঘুরক উচ্ছ্বাসনিরোধস্তমঃপ্রবেশস্তাস্তাশ্চ কফবেদনা ভবন্তি ||৩৭||

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तत्र, दर्वीकरविषेण त्वङ्नयननखदशनवदनमूत्रपुरीषदंशकृष्णत्वं रौक्ष्यं शिरसो गौरवं सन्धिवेदना कटीपृष्ठग्रीवादौर्बल्यं जृम्भणं वेपथुः स्वरावसादो घुर्घुरको जडता शुष्कोद्गारः कासश्वासौ हिक्का वायोरूर्ध्वगमनं शूलोद्वेष्टनं तृष्णा लालास्रावः फेनागमनं स्रोतोऽवरोधस्तास्ताश्च वातवेदना भवन्ति; मण्डलिविषेण त्वगादीनां पीतत्वं शीताभिलाषः परिधूपनं दाहस्तृष्णा मदो मूर्च्छा ज्वरः शोणितागमनमूर्ध्वमधश्च मांसानामवशातनं श्वयथुर्दंशकोथः पीतरूपदर्शनमाशुकोपस्तास्ताश्च पित्तवेदना भवन्ति; राजिमद्विषेण शुक्लत्वं त्वगादीनां शीतज्वरो रोमहर्षः स्तब्धत्वं गात्राणामादंशशोफः सान्द्रकफप्रसेकश्छर्दिरभीक्ष्णमक्ष्णोः कण्डूः कण्ठे श्वयथुर्घुर्घुरक उच्छ्वासनिरोधस्तमःप्रवेशस्तास्ताश्च कफवेदना भवन्ति ||३७||

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Adhikarana 20 (38) · Śloka 38

পুরুষাভিদষ্ট ঊর্ধ্বং প্রেক্ষতে, অধস্তাত্ স্ত্রিযা সিরাশ্চোত্তিষ্ঠন্তি ললাটে, নপুংসকাভিদষ্টস্তির্যক্প্রেক্ষী ভবতি, গর্ভিণ্যা পাণ্ডুমুখোধ্মাতশ্চ, সূতিকযা কুক্ষিশূলার্তঃ সরুধিরং মেহত্যুপজিহ্বিকা চাস্য ভবতি, গ্রাসার্থিনাঽন্নং কাঙ্ক্ষতি, বৃদ্ধেন চিরান্মন্দাশ্চ বেগাঃ, বালেনাশু মৃদবশ্চ, নির্বিষেণাবিষলিঙ্গং, অন্ধাহিকেনান্ধত্বমিত্যেকে, গ্রসনাত্ অজগরঃ শরীরপ্রাণহরো ন বিষাত্ | তত্র সদ্যঃপ্রাণহরাহিদষ্টঃ পততি শাস্ত্রাশনিহত ইব ভূমৌ, স্রস্তাঙ্গঃ স্বপিতি ||৩৮||

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पुरुषाभिदष्ट ऊर्ध्वं प्रेक्षते, अधस्तात् स्त्रिया सिराश्चोत्तिष्ठन्ति ललाटे, नपुंसकाभिदष्टस्तिर्यक्प्रेक्षी भवति, गर्भिण्या पाण्डुमुखोध्मातश्च, सूतिकया कुक्षिशूलार्तः सरुधिरं मेहत्युपजिह्विका चास्य भवति, ग्रासार्थिनाऽन्नं काङ्क्षति, वृद्धेन चिरान्मन्दाश्च वेगाः, बालेनाशु मृदवश्च, निर्विषेणाविषलिङ्गं, अन्धाहिकेनान्धत्वमित्येके, ग्रसनात् अजगरः शरीरप्राणहरो न विषात् | तत्र सद्यःप्राणहराहिदष्टः पतति शास्त्राशनिहत इव भूमौ, स्रस्ताङ्गः स्वपिति ||३८||

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Adhikarana 21 (39) · Śloka 39

তত্র সর্বেষাং সর্পাণাং বিষস্য সপ্ত বেগা ভবন্তি | তত্র, দর্বীকরাণাং প্রথমে বেগে বিষং শোণিতং দূষযতি, তত্ প্রদুষ্টং কৃষ্ণতামুপৈতি, তেন কার্ষ্ণ্যং পিপীলিকাপরিসর্পণমিব চাঙ্গে ভবতি; দ্বিতীযে মাংসং দূষযতি, তেনাত্যর্থং কৃষ্ণতা শোফো গ্রন্থযশ্চাঙ্গে ভবন্তি; তৃতীযে মেদো দূষযতি, তেন দংশক্লেদঃ শিরোগৌরবং স্বেদশ্চক্ষুর্গ্রহণং চ; চতুর্থে কোষ্ঠমনুপ্রবিশ্য কফপ্রধানান্ দোষান্ দূষযতি, তেন তন্দ্রাপ্রসেকসন্ধিবিশ্লেষা ভবন্তি; পঞ্চমেঽস্থীন্যনুপ্রবিশতি প্রাণমগ্নিং চ দূষযতি, তেন পর্বভেদো হিক্কা দাহশ্চ ভবতি; ষষ্ঠে মজ্জানমনুপ্রবিশতি গ্রহণীং চাত্যর্থং দূষযতি, তেন গাত্রাণাং গৌরবমতীসারো হৃত্পীডা মূর্চ্ছা চ ভবতি; সপ্তমে শুক্রমনুপ্রবিশতি ব্যানং চাত্যর্থং কোপযতি কফং চ সূক্ষ্মস্রোতোভ্যঃ প্রচ্যাবযতি, তেন শ্লেষ্মবর্তিপ্রাদুর্ভাবঃ কটীপৃষ্ঠভঙ্গঃ সর্বচেষ্টাবিঘাতো লালাস্বেদযোরতিপ্রবৃত্তিরুচ্ছ্বাসনিরোধশ্চ ভবতি | মণ্ডলিনাং প্রথমে বেগে বিষং শোণিতং দূষযতি, তত্ প্রদুষ্টং পীততামুপৈতি, তত্র পরিদাহঃ পীতাবভাসতা চাঙ্গানাং ভবতি; দ্বিতীযে মাংসং দূষযতি, তেনাত্যর্থং পীততা পরিদাহো দংশে শ্বযথুশ্চ ভবতি; তৃতীযে মেদো দূষযতি, তেন পূর্ববচ্চক্ষুর্গ্রহণং তৃষ্ণা দংশক্লেদঃ স্বেদশ্চ; চতুর্থে কোষ্ঠমনুপ্রবিশ্য জ্বরমাপাদযতি; পঞ্চমে পরিদাহং সর্বগাত্রেষু করোতি, ষষ্ঠসপ্তমযোঃ পূর্ববত্ | রাজিমতাং প্রথমে বেগে বিষং শোণিতং দূষযতি তত্ প্রদুষ্টং পাণ্ডুতামুপৈতি, তেন রোমহর্ষঃ শুক্লাবভাসশ্চ পুরুষো ভবতি; দ্বিতীযে মাংসং দূষযতি, তেন পাণ্ডুতাঽত্যর্থং জাড্যং শিরঃশোফশ্চ ভবতি; তৃতীযে মেদো দূষযতি, তেন চক্ষুর্গ্রহণং দংশক্লেদঃ স্বেদো ঘ্রাণাক্ষিস্রাবশ্চ ভবতি; চতুর্থে কোষ্ঠমনুপ্রবিশ্য মন্যাস্তম্ভং শিরোগৌরবং চাপাদযতি; পঞ্চমে বাক্সঙ্গং শীতজ্বরং চ করোতি; ষষ্ঠসপ্তমযোঃ পূর্ববদিতি ||৩৯||

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तत्र सर्वेषां सर्पाणां विषस्य सप्त वेगा भवन्ति | तत्र, दर्वीकराणां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति, तत् प्रदुष्टं कृष्णतामुपैति, तेन कार्ष्ण्यं पिपीलिकापरिसर्पणमिव चाङ्गे भवति; द्वितीये मांसं दूषयति, तेनात्यर्थं कृष्णता शोफो ग्रन्थयश्चाङ्गे भवन्ति; तृतीये मेदो दूषयति, तेन दंशक्लेदः शिरोगौरवं स्वेदश्चक्षुर्ग्रहणं च; चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य कफप्रधानान् दोषान् दूषयति, तेन तन्द्राप्रसेकसन्धिविश्लेषा भवन्ति; पञ्चमेऽस्थीन्यनुप्रविशति प्राणमग्निं च दूषयति, तेन पर्वभेदो हिक्का दाहश्च भवति; षष्ठे मज्जानमनुप्रविशति ग्रहणीं चात्यर्थं दूषयति, तेन गात्राणां गौरवमतीसारो हृत्पीडा मूर्च्छा च भवति; सप्तमे शुक्रमनुप्रविशति व्यानं चात्यर्थं कोपयति कफं च सूक्ष्मस्रोतोभ्यः प्रच्यावयति, तेन श्लेष्मवर्तिप्रादुर्भावः कटीपृष्ठभङ्गः सर्वचेष्टाविघातो लालास्वेदयोरतिप्रवृत्तिरुच्छ्वासनिरोधश्च भवति | मण्डलिनां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति, तत् प्रदुष्टं पीततामुपैति, तत्र परिदाहः पीतावभासता चाङ्गानां भवति; द्वितीये मांसं दूषयति, तेनात्यर्थं पीतता परिदाहो दंशे श्वयथुश्च भवति; तृतीये मेदो दूषयति, तेन पूर्ववच्चक्षुर्ग्रहणं तृष्णा दंशक्लेदः स्वेदश्च; चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य ज्वरमापादयति; पञ्चमे परिदाहं सर्वगात्रेषु करोति, षष्ठसप्तमयोः पूर्ववत् | राजिमतां प्रथमे वेगे विषं शोणितं दूषयति तत् प्रदुष्टं पाण्डुतामुपैति, तेन रोमहर्षः शुक्लावभासश्च पुरुषो भवति; द्वितीये मांसं दूषयति, तेन पाण्डुताऽत्यर्थं जाड्यं शिरःशोफश्च भवति; तृतीये मेदो दूषयति, तेन चक्षुर्ग्रहणं दंशक्लेदः स्वेदो घ्राणाक्षिस्रावश्च भवति; चतुर्थे कोष्ठमनुप्रविश्य मन्यास्तम्भं शिरोगौरवं चापादयति; पञ्चमे वाक्सङ्गं शीतज्वरं च करोति; षष्ठसप्तमयोः पूर्ववदिति ||३९||

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Adhikarana 22 (40) · Śloka 40

ভবন্তি চাত্র- ধাত্বন্তরেষু যাঃ সপ্ত কলাঃ সম্পরিকীর্তিতাঃ | তাস্বেকৈকামতিক্রম্য বেগং প্রকুরুতে বিষম্ ||৪০||

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भवन्ति चात्र- धात्वन्तरेषु याः सप्त कलाः सम्परिकीर्तिताः | तास्वेकैकामतिक्रम्य वेगं प्रकुरुते विषम् ||४०||

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Adhikarana 23 (41) · Śloka 41

যেনান্তরেণ তু কলাং কালকল্পং ভিনত্তি হি | সমীরণেনোহ্যমানং তত্তু বেগান্তরং স্মৃতম্ ||৪১||

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येनान्तरेण तु कलां कालकल्पं भिनत्ति हि | समीरणेनोह्यमानं तत्तु वेगान्तरं स्मृतम् ||४१||

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Adhikarana 24 (42-45) · Śloka 45

শূনাঙ্গঃ প্রথমে বেগে পশুর্ধ্যাযতি দুঃখিতঃ | লালাস্রাবো দ্বিতীযে তু কৃষ্ণাঙ্গঃ পীড্যতে হৃদি ||৪২|| তৃতীযে চ শিরোদুঃখং কণ্ঠগ্রীবং চ ভজ্যতে | চতুর্থে বেপতে মূঢঃ খাদন্ দন্তান্ জহাত্যসূন্ ||৪৩|| কেচিদ্বেগত্রযং প্রাহুরন্তং চৈতেষু তদ্বিদঃ | ধ্যাযতি প্রথমে বেগে পক্ষী মুহ্যত্যতঃ পরম্ ||৪৪|| দ্বিতীযে বিহ্বলঃ প্রোক্তস্তৃতীযে মৃত্যুমৃচ্ছতি | কেচিদেকং বিহঙ্গেষু বিষবেগমুশন্তি হি | মার্জারনকুলাদীনাং বিষং নাতিপ্রবর্ততে ||৪৫||

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शूनाङ्गः प्रथमे वेगे पशुर्ध्यायति दुःखितः | लालास्रावो द्वितीये तु कृष्णाङ्गः पीड्यते हृदि ||४२|| तृतीये च शिरोदुःखं कण्ठग्रीवं च भज्यते | चतुर्थे वेपते मूढः खादन् दन्तान् जहात्यसून् ||४३|| केचिद्वेगत्रयं प्राहुरन्तं चैतेषु तद्विदः | ध्यायति प्रथमे वेगे पक्षी मुह्यत्यतः परम् ||४४|| द्वितीये विह्वलः प्रोक्तस्तृतीये मृत्युमृच्छति | केचिदेकं विहङ्गेषु विषवेगमुशन्ति हि | मार्जारनकुलादीनां विषं नातिप्रवर्तते ||४५||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 4

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং কল্পস্থানে সর্পদষ্টবিষবিজ্ঞানীযং নাম চতুর্থোঽধ্যাযঃ ||৪||

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इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने सर्पदष्टविषविज्ञानीयं नाम चतुर्थोऽध्यायः ||४||

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4. sarpadaṣṭaviṣavijñānīyakalpaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi