Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্থাবরবিষবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातः स्थावरविषविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতঃ স্থাবরবিষবিজ্ঞানীযমধ্যাযং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातः स्थावरविषविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
স্থাবরং জঙ্গমং চৈব দ্বিবিধং বিষমুচ্যতে | দশাধিষ্ঠানমাদ্যং তু দ্বিতীযং ষোডশাশ্রযম্ ||৩||
स्थावरं जङ्गमं चैव द्विविधं विषमुच्यते | दशाधिष्ठानमाद्यं तु द्वितीयं षोडशाश्रयम् ||३||
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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4
মূলং পত্রং ফলং পুষ্পং ত্বক্ ক্ষীরং সার এব চ | নির্যাসো ধাতবশ্চৈব কন্দশ্চ দশমঃ স্মৃতঃ ||৪||
मूलं पत्रं फलं पुष्पं त्वक् क्षीरं सार एव च | निर्यासो धातवश्चैव कन्दश्च दशमः स्मृतः ||४||
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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5
তত্র, ক্লীতকাশ্বমারগুঞ্জাসুগন্ধগর্গরককরঘাটবিদ্যুচ্ছিখাবিজযানীত্যষ্টৌ মূলবিষাণি; বিষপত্রিকালম্বাবরদারুকরম্ভমহাকরম্ভাণি পঞ্চ পত্রবিষাণি; কুমুদ্বতীবেণুকাকরম্ভমহাকরম্ভকর্কোটকরেণুকখদ্যোতকচর্মরীভগন্ধাসর্পঘাতিনন্দনসারপাকানীতি দ্বাদশ ফলবিষাণি; বেত্রকাদম্ববল্লীজকরম্ভমহাকরম্ভাণি পঞ্চ পুষ্পবিষাণি; অন্ত্রপাচককর্তরীযসৌরীযককরঘাটকরম্ভনন্দননারাচকানি সপ্ত ত্বক্সারনির্যাসবিষাণি; কুমুদঘ্নীস্নুহীজালক্ষীরীণি ত্রীণি ক্ষীরবিষাণি; ফেনাশ্ম(ভস্ম) হরিতালং চ দ্বে ধাতুবিষে; কালকূটবত্সনাভসর্ষপপালককর্দমকবৈরাটকমুস্তকশৃঙ্গীবিষপ্রপুণ্ডরীকমূলকহালাহলমহাবিষকর্কটকানীতি ত্রযোদশ কন্দবিষাণি; ইত্যেবং পঞ্চপঞ্চাশত্ স্থাবরবিষাণি ভবন্তি ||৫||
तत्र, क्लीतकाश्वमारगुञ्जासुगन्धगर्गरककरघाटविद्युच्छिखाविजयानीत्यष्टौ मूलविषाणि; विषपत्रिकालम्बावरदारुकरम्भमहाकरम्भाणि पञ्च पत्रविषाणि; कुमुद्वतीवेणुकाकरम्भमहाकरम्भकर्कोटकरेणुकखद्योतकचर्मरीभगन्धासर्पघातिनन्दनसारपाकानीति द्वादश फलविषाणि; वेत्रकादम्बवल्लीजकरम्भमहाकरम्भाणि पञ्च पुष्पविषाणि; अन्त्रपाचककर्तरीयसौरीयककरघाटकरम्भनन्दननाराचकानि सप्त त्वक्सारनिर्यासविषाणि; कुमुदघ्नीस्नुहीजालक्षीरीणि त्रीणि क्षीरविषाणि; फेनाश्म(भस्म) हरितालं च द्वे धातुविषे; कालकूटवत्सनाभसर्षपपालककर्दमकवैराटकमुस्तकशृङ्गीविषप्रपुण्डरीकमूलकहालाहलमहाविषकर्कटकानीति त्रयोदश कन्दविषाणि; इत्येवं पञ्चपञ्चाशत् स्थावरविषाणि भवन्ति ||५||
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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6
চত্বারি বত্সনাভানি মুস্তকে দ্বে প্রকীর্তিতে | ষট্ চৈব সর্ষপাণ্যাহুঃ শেষাণ্যেকৈকমেব তু ||৬||
चत्वारि वत्सनाभानि मुस्तके द्वे प्रकीर्तिते | षट् चैव सर्षपाण्याहुः शेषाण्येकैकमेव तु ||६||
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Adhikarana 6 (7-10) · Śloka 11
উদ্বেষ্টনং মূলবিষৈঃ প্রলাপো মোহ এব চ | জৃম্ভাঙ্গোদ্বেষ্টনশ্বাসা জ্ঞেযাঃ পত্রবিষেণ তু ||৭|| মুষ্কশোফঃ ফলবিষৈর্দাহোঽন্নদ্বেষ এব চ | ভবেত্ পুষ্পবিষৈশ্ছর্দিরাধ্মানং মোহ এব চ ||৮|| ত্বক্সারনির্যাসবিষৈরুপযুক্তৈর্ভবন্তি হি | আস্যদৌর্গন্ধ্যপারুষ্যশিরোরুক্কফসংস্রবাঃ ||৯|| ফেনাগমঃ ক্ষীরবিষৈর্বিড্ভেদো গুরুজিহ্বতা | হৃত্পীডনং ধাতুবিষৈর্মূর্চ্ছা দাহশ্চ তালুনি ||১০|| প্রাযেণ কালঘাতীনি বিষাণ্যেতানি নির্দিশেত্ |১১|
उद्वेष्टनं मूलविषैः प्रलापो मोह एव च | जृम्भाङ्गोद्वेष्टनश्वासा ज्ञेयाः पत्रविषेण तु ||७|| मुष्कशोफः फलविषैर्दाहोऽन्नद्वेष एव च | भवेत् पुष्पविषैश्छर्दिराध्मानं मोह एव च ||८|| त्वक्सारनिर्यासविषैरुपयुक्तैर्भवन्ति हि | आस्यदौर्गन्ध्यपारुष्यशिरोरुक्कफसंस्रवाः ||९|| फेनागमः क्षीरविषैर्विड्भेदो गुरुजिह्वता | हृत्पीडनं धातुविषैर्मूर्च्छा दाहश्च तालुनि ||१०|| प्रायेण कालघातीनि विषाण्येतानि निर्दिशेत् |११|
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Adhikarana 7 (11-17) · Śloka 18
কন্দজানি তু তীক্ষ্ণানি তেষাং বক্ষ্যামি বিস্তরম্ ||১১|| স্পর্শাজ্ঞানং কালকূটে বেপথুঃ স্তম্ভ এব চ | গ্রীবাস্তম্ভো বত্সনাভে পীতবিণ্মূত্রনেত্রতা ||১২|| সর্ষপে বাতবৈগুণ্যমানাহো গ্রন্থিজন্ম চ | গ্রীবাদৌর্বল্যবাক্সঙ্গৌ পালকেঽনুমতাবিহ ||১৩|| প্রসেকঃ কর্দমাখ্যেন বিড্ভেদো নেত্রপীততা | বৈরাটকেনাঙ্গদুঃখং শিরোরোগশ্চ জাযতে ||১৪|| গাত্রস্তম্ভো বেপথুশ্চ জাযতে মুস্তকেন তু | শৃঙ্গীবিষেণাঙ্গসাদদাহোদরবিবৃদ্ধযঃ ||১৫|| পুণ্ডরীকেণ রক্তত্বমক্ষ্ণোর্বৃদ্ধিস্তথোদরে | বৈবর্ণ্যং মূলকৈশ্ছর্দির্হিক্কাশোফপ্রমূঢতাঃ ||১৬|| চিরেণোচ্ছ্বসিতি শ্যাবো নরো হালাহলেন বৈ | মহাবিষেণ হৃদযে গ্রন্থিশূলোদ্গমৌ ভৃশম্ ||১৭|| কর্কটেনোত্পতত্যূর্ধ্বং হসন্ দন্তান্ দশত্যপি |১৮|
कन्दजानि तु तीक्ष्णानि तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ||११|| स्पर्शाज्ञानं कालकूटे वेपथुः स्तम्भ एव च | ग्रीवास्तम्भो वत्सनाभे पीतविण्मूत्रनेत्रता ||१२|| सर्षपे वातवैगुण्यमानाहो ग्रन्थिजन्म च | ग्रीवादौर्बल्यवाक्सङ्गौ पालकेऽनुमताविह ||१३|| प्रसेकः कर्दमाख्येन विड्भेदो नेत्रपीतता | वैराटकेनाङ्गदुःखं शिरोरोगश्च जायते ||१४|| गात्रस्तम्भो वेपथुश्च जायते मुस्तकेन तु | शृङ्गीविषेणाङ्गसाददाहोदरविवृद्धयः ||१५|| पुण्डरीकेण रक्तत्वमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे | वैवर्ण्यं मूलकैश्छर्दिर्हिक्काशोफप्रमूढताः ||१६|| चिरेणोच्छ्वसिति श्यावो नरो हालाहलेन वै | महाविषेण हृदये ग्रन्थिशूलोद्गमौ भृशम् ||१७|| कर्कटेनोत्पतत्यूर्ध्वं हसन् दन्तान् दशत्यपि |१८|
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Adhikarana 8 (18) · Śloka 19
কন্দজান্যুগ্রবীর্যাণি প্রত্যুক্তানি ত্রযোদশ ||১৮|| সর্বাণি কুশলৈর্জ্ঞেযান্যেতানি দশভির্গুণৈঃ |১৯|
कन्दजान्युग्रवीर्याणि प्रत्युक्तानि त्रयोदश ||१८|| सर्वाणि कुशलैर्ज्ञेयान्येतानि दशभिर्गुणैः |१९|
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Adhikarana 9 (19-23) · Śloka 23
রূক্ষমুষ্ণং তথা তীক্ষ্ণং সূক্ষ্মমাশুব্যবাযি চ ||১৯|| বিকাশি বিশদং চৈব লঘ্বপাকি চ তত্ স্মৃতম্ | তদ্রৌক্ষ্যাত্ কোপযেদ্বাযুমৌষ্ণ্যাত্ পিত্তং সশোণিতম্ ||২০|| মতিং চ মোহযেত্তৈক্ষ্ণ্যান্মর্মবন্ধান্ ছিনত্তি চ | শরীরাবযবান্ সৌক্ষ্ম্যাত্ প্রবিশেদ্বিকরোতি চ ||২১|| আশুত্বাদাশু তদ্ধন্তি ব্যবাযাত্ প্রকৃতিং ভজেত্ | ক্ষপযেচ্চ বিকাশিত্বাদ্দোষান্ধাতূন্মলানপি ||২২|| বৈশদ্যাদতিরিচ্যেত দুশ্চিকিত্স্যং চ লাঘবাত্ | দুর্হরং চাবিপাকিত্বাত্তস্মাত্ ক্লেশযতে চিরম্ ||২৩||
रूक्षमुष्णं तथा तीक्ष्णं सूक्ष्ममाशुव्यवायि च ||१९|| विकाशि विशदं चैव लघ्वपाकि च तत् स्मृतम् | तद्रौक्ष्यात् कोपयेद्वायुमौष्ण्यात् पित्तं सशोणितम् ||२०|| मतिं च मोहयेत्तैक्ष्ण्यान्मर्मबन्धान् छिनत्ति च | शरीरावयवान् सौक्ष्म्यात् प्रविशेद्विकरोति च ||२१|| आशुत्वादाशु तद्धन्ति व्यवायात् प्रकृतिं भजेत् | क्षपयेच्च विकाशित्वाद्दोषान्धातून्मलानपि ||२२|| वैशद्यादतिरिच्येत दुश्चिकित्स्यं च लाघवात् | दुर्हरं चाविपाकित्वात्तस्मात् क्लेशयते चिरम् ||२३||
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Adhikarana 10 (24) · Śloka 25
স্থাবরং জঙ্গমং যচ্চ কৃত্রিমং চাপি যদ্বিষম্ | সদ্যো ব্যাপাদযেত্তত্তু জ্ঞেযং দশগুণান্বিতম্ ||২৪|| যত্ স্থাবরং জঙ্গমকৃত্রিমং বা দেহাদশেষং যদনির্গতং তত্ |২৫|
स्थावरं जङ्गमं यच्च कृत्रिमं चापि यद्विषम् | सद्यो व्यापादयेत्तत्तु ज्ञेयं दशगुणान्वितम् ||२४|| यत् स्थावरं जङ्गमकृत्रिमं वा देहादशेषं यदनिर्गतं तत् |२५|
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Adhikarana 11 (25-26) · Śloka 26
জীর্ণং বিষঘ্নৌষধিভির্হতং বা দাবাগ্নিবাতাতপশোষিতং বা ||২৫|| স্বভাবতো বা গুণবিপ্রহীনং বিষং হি দূষীবিষতামুপৈতি | বীর্যাল্পভাবান্ন নিপাতযেত্তত্ কফাবৃতং বর্ষগণানুবন্ধি ||২৬||
जीर्णं विषघ्नौषधिभिर्हतं वा दावाग्निवातातपशोषितं वा ||२५|| स्वभावतो वा गुणविप्रहीनं विषं हि दूषीविषतामुपैति | वीर्याल्पभावान्न निपातयेत्तत् कफावृतं वर्षगणानुबन्धि ||२६||
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Adhikarana 12 (27-28) · Śloka 30
তেনার্দিতো ভিন্নপুরীষবর্ণো বিগন্ধবৈরস্যমুখঃ পিপাসী | মূর্চ্ছন্ বমন্ গদ্গদবাগ্বিষণ্ণো ভবেচ্চ দুষ্যোদরলিঙ্গজুষ্টঃ ||২৭|| আমাশযস্থে কফবাতরোগী পক্বাশযস্থেঽনিলপিত্তরোগী | ভবেন্নরো ধ্বস্তশিরোরুহাঙ্গো বিলূনপক্ষস্তু যথা বিহঙ্গঃ ||২৮|| স্থিতং রসাদিষ্বথবা যথোক্তান্ করোতি ধাতুপ্রভবান্ বিকারান্ | কোপং চ শীতানিলদুর্দিনেষু যাত্যাশু,... |৩০|
तेनार्दितो भिन्नपुरीषवर्णो विगन्धवैरस्यमुखः पिपासी | मूर्च्छन् वमन् गद्गदवाग्विषण्णो भवेच्च दुष्योदरलिङ्गजुष्टः ||२७|| आमाशयस्थे कफवातरोगी पक्वाशयस्थेऽनिलपित्तरोगी | भवेन्नरो ध्वस्तशिरोरुहाङ्गो विलूनपक्षस्तु यथा विहङ्गः ||२८|| स्थितं रसादिष्वथवा यथोक्तान् करोति धातुप्रभवान् विकारान् | कोपं च शीतानिलदुर्दिनेषु यात्याशु,... |३०|
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Adhikarana 13 (29) · Śloka 30
...পূর্বং শৃণু তত্র রূপম্ ||২৯|| নিদ্রা গুরুত্বং চ বিজৃম্ভণং চ বিশ্লেষহর্ষাবথবাঽঙ্গমর্দঃ |৩০|
...पूर्वं शृणु तत्र रूपम् ||२९|| निद्रा गुरुत्वं च विजृम्भणं च विश्लेषहर्षावथवाऽङ्गमर्दः |३०|
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Adhikarana 14 (30-32) · Śloka 32
ততঃ করোত্যন্নমদাবিপাকাবরোচকং মণ্ডলকোঠমোহান্ ||৩০|| ধাতুক্ষযং পাদকরাস্যশোফং দকোদরং ছর্দিমথাতিসারম্ | বৈবর্ণ্যমূর্চ্ছাবিষমজ্বরান্ বা কুর্যাত্ প্রবৃদ্ধাং প্রবলাং তৃষাং বা ||৩১|| উন্মাদমন্যজ্জনযেত্তথাঽন্যদানাহমন্যত্ ক্ষপযেচ্চ শুক্রম্ | গাদ্গদ্যমন্যজ্জনযেচ্চ কুষ্ঠং তাংস্তান্ বিকারাশ্চং বহুপ্রকারান্ ||৩২||
ततः करोत्यन्नमदाविपाकावरोचकं मण्डलकोठमोहान् ||३०|| धातुक्षयं पादकरास्यशोफं दकोदरं छर्दिमथातिसारम् | वैवर्ण्यमूर्च्छाविषमज्वरान् वा कुर्यात् प्रवृद्धां प्रबलां तृषां वा ||३१|| उन्मादमन्यज्जनयेत्तथाऽन्यदानाहमन्यत् क्षपयेच्च शुक्रम् | गाद्गद्यमन्यज्जनयेच्च कुष्ठं तांस्तान् विकाराश्चं बहुप्रकारान् ||३२||
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Adhikarana 15 (33) · Śloka 33
দূষিতং দেশকালান্নদিবাস্বপ্নৈরভীক্ষ্ণশঃ | যস্মাদ্দূষযতে ধাতূন্ তস্মাদ্দূষীবিষং স্মৃতম্ ||৩৩||
दूषितं देशकालान्नदिवास्वप्नैरभीक्ष्णशः | यस्माद्दूषयते धातून् तस्माद्दूषीविषं स्मृतम् ||३३||
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Adhikarana 16 (34-39) · Śloka 39
স্থাবরস্যোপযুক্তস্য বেগে তু প্রথমে নৃণাম্ | শ্যাবা জিহ্বা ভবেত্স্তব্ধা মূর্চ্ছা শ্বাসশ্চ জাযতে ||৩৪|| দ্বিতীযে বেপথুঃ সাদো দাহঃ কণ্ঠরুজস্তথা | বিষমামাশযপ্রাপ্তং কুরুতে হৃদি বেদনাম্ ||৩৫|| তালুশোষং তৃতীযে তু শূলং চামাশযে ভৃশম্ | দুর্বর্ণে হরিতে শূনে জাযেতে চাস্য লোচনে ||৩৬|| পক্বামাশযযোস্তোদো হিক্কা কাসোঽন্ত্রকূজনম্ | চতুর্থে জাযতে বেগে শিরসশ্চাতিগৌরবম্ ||৩৭|| কফপ্রসেকো বৈবর্ণ্যং পর্বভেদশ্চ পঞ্চমে | সর্বদোষপ্রকোপশ্চ পক্বাধানে চ বেদনা ||৩৮|| ষষ্ঠে প্রজ্ঞাপ্রণাশশ্চ ভৃশং চাপ্যতিসার্যতে | স্কন্ধপৃষ্ঠকটীভঙ্গঃ সন্নিরোধশ্চ সপ্তমে ||৩৯||
स्थावरस्योपयुक्तस्य वेगे तु प्रथमे नृणाम् | श्यावा जिह्वा भवेत्स्तब्धा मूर्च्छा श्वासश्च जायते ||३४|| द्वितीये वेपथुः सादो दाहः कण्ठरुजस्तथा | विषमामाशयप्राप्तं कुरुते हृदि वेदनाम् ||३५|| तालुशोषं तृतीये तु शूलं चामाशये भृशम् | दुर्वर्णे हरिते शूने जायेते चास्य लोचने ||३६|| पक्वामाशययोस्तोदो हिक्का कासोऽन्त्रकूजनम् | चतुर्थे जायते वेगे शिरसश्चातिगौरवम् ||३७|| कफप्रसेको वैवर्ण्यं पर्वभेदश्च पञ्चमे | सर्वदोषप्रकोपश्च पक्वाधाने च वेदना ||३८|| षष्ठे प्रज्ञाप्रणाशश्च भृशं चाप्यतिसार्यते | स्कन्धपृष्ठकटीभङ्गः सन्निरोधश्च सप्तमे ||३९||
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Adhikarana 17 (40-43) · Śloka 43
প্রথমে বিষবেগে তু বান্তং শীতাম্বুসেচিতম্ | অগদং মধুসর্পির্ভ্যাং পাযযেত সমাযুতম্ ||৪০|| দ্বিতীযে পূর্ববদ্বান্তং পাযযেত্তু বিরেচনম্ | তৃতীযেঽগদপানং তু হিতং নস্যং তথাঽঞ্জনম্ ||৪১|| চতুর্থে স্নেহসম্মিশ্রং পাযযেতাগদং ভিষক্ | পঞ্চমে ক্ষৌদ্রমধুকক্বাথযুক্তং প্রদাপযেত্ ||৪২|| ষষ্ঠেঽতীসারবত্ সিদ্ধিরবপীডশ্চ সপ্তমে | মূর্ধ্নি কাকপদং কৃত্বা সাসৃগ্বা পিশিতং ক্ষিপেত্ ||৪৩||
प्रथमे विषवेगे तु वान्तं शीताम्बुसेचितम् | अगदं मधुसर्पिर्भ्यां पाययेत समायुतम् ||४०|| द्वितीये पूर्ववद्वान्तं पाययेत्तु विरेचनम् | तृतीयेऽगदपानं तु हितं नस्यं तथाऽञ्जनम् ||४१|| चतुर्थे स्नेहसम्मिश्रं पाययेतागदं भिषक् | पञ्चमे क्षौद्रमधुकक्वाथयुक्तं प्रदापयेत् ||४२|| षष्ठेऽतीसारवत् सिद्धिरवपीडश्च सप्तमे | मूर्ध्नि काकपदं कृत्वा सासृग्वा पिशितं क्षिपेत् ||४३||
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Adhikarana 18 (44-46) · Śloka 46
বেগান্তরে ত্বন্যতমে কৃতে কর্মণি শীতলাম্ | যবাগূং সঘৃতক্ষৌদ্রামিমাং দদ্যাদ্বিষাপহাম্ ||৪৪|| কোষাতক্যোঽগ্নিকঃ পাঠাসূর্যবল্ল্যমৃতাভযাঃ | শিরীষঃ কিণিহী শেলুর্গির্যাহ্বা রজনীদ্বযম্ ||৪৫|| পুনর্নবে হরেণুশ্চ ত্রিকটুঃ সারিবে বলা | এষাং যবাগূর্নিষ্ক্বাথে কৃতা হন্তি বিষদ্বযম্ ||৪৬||
वेगान्तरे त्वन्यतमे कृते कर्मणि शीतलाम् | यवागूं सघृतक्षौद्रामिमां दद्याद्विषापहाम् ||४४|| कोषातक्योऽग्निकः पाठासूर्यवल्ल्यमृताभयाः | शिरीषः किणिही शेलुर्गिर्याह्वा रजनीद्वयम् ||४५|| पुनर्नवे हरेणुश्च त्रिकटुः सारिवे बला | एषां यवागूर्निष्क्वाथे कृता हन्ति विषद्वयम् ||४६||
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Adhikarana 19 (47-49) · Śloka 49
মধুকং তগরং কুষ্ঠং ভদ্রদারু হরেণবঃ | পুন্নাগৈলৈলবালূনি নাগপুষ্পোত্পলং সিতা ||৪৭|| বিডঙ্গং চন্দনং পত্রং প্রিযঙ্গুর্ধ্যামকং তথা | হরিদ্রে দ্বে বৃহত্যৌ চ সারিবে চ স্থিরা সহা ||৪৮|| কল্কৈরেষাং ঘৃতং সিদ্ধমজেযমিতি বিশ্রুতম্ | বিষাণি হন্তি সর্বাণি শীঘ্রমেবাজিতং ক্বচিত্ ||৪৯||
मधुकं तगरं कुष्ठं भद्रदारु हरेणवः | पुन्नागैलैलवालूनि नागपुष्पोत्पलं सिता ||४७|| विडङ्गं चन्दनं पत्रं प्रियङ्गुर्ध्यामकं तथा | हरिद्रे द्वे बृहत्यौ च सारिवे च स्थिरा सहा ||४८|| कल्कैरेषां घृतं सिद्धमजेयमिति विश्रुतम् | विषाणि हन्ति सर्वाणि शीघ्रमेवाजितं क्वचित् ||४९||
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Adhikarana 20 (50-52) · Śloka 52
দূষীবিষার্তং সুস্বিন্নমূর্ধ্বং চাধশ্চ শোধিতম্ | পাযযেতাগদং নিত্যমিমং দূষীবিষাপহম্ ||৫০|| পিপ্পল্যো ধ্যামকং মাংসী শাবরঃ পরিপেলবম্ | সুবর্চিকা সসূক্ষ্মৈলা তোযং কনকগৈরিকম্ ||৫১|| ক্ষৌদ্রযুক্তোঽগদো হ্যেষ দূষীবিষমপোহতি | নাম্না দূষীবিষারিস্তু ন চান্যত্রাপি বার্যতে ||৫২||
दूषीविषार्तं सुस्विन्नमूर्ध्वं चाधश्च शोधितम् | पाययेतागदं नित्यमिमं दूषीविषापहम् ||५०|| पिप्पल्यो ध्यामकं मांसी शावरः परिपेलवम् | सुवर्चिका ससूक्ष्मैला तोयं कनकगैरिकम् ||५१|| क्षौद्रयुक्तोऽगदो ह्येष दूषीविषमपोहति | नाम्ना दूषीविषारिस्तु न चान्यत्रापि वार्यते ||५२||
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Adhikarana 21 (53-54) · Śloka 54
জ্বরে দাহে চ হিক্কাযামানাহে শুক্রসঙ্ক্ষযে | শোফেঽতিসারে মূর্চ্ছাযাং হৃদ্রোগে জঠরেঽপি চ ||৫৩|| উন্মাদে বেপথৌ চৈব যে চান্যে স্যুরুপদ্রবাঃ | যথাস্বং তেষু কুর্বীত বিষঘ্নৈরৌষধৈঃ ক্রিযাম্ ||৫৪||
ज्वरे दाहे च हिक्कायामानाहे शुक्रसङ्क्षये | शोफेऽतिसारे मूर्च्छायां हृद्रोगे जठरेऽपि च ||५३|| उन्मादे वेपथौ चैव ये चान्ये स्युरुपद्रवाः | यथास्वं तेषु कुर्वीत विषघ्नैरौषधैः क्रियाम् ||५४||
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Adhikarana 22 (55) · Śloka 55
সাধ্যমাত্মবতঃ সদ্যো যাপ্যং সংবত্সরোত্থিতম্ | দূষীবিষমসাধ্যং তু ক্ষীণস্যাহিতসেবিনঃ ||৫৫||
साध्यमात्मवतः सद्यो याप्यं संवत्सरोत्थितम् | दूषीविषमसाध्यं तु क्षीणस्याहितसेविनः ||५५||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 2
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং কল্পস্থানে স্থাবরবিষবিজ্ঞানীযো নাম দ্বিতীযোঽধ্যাযঃ ||২||
इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने स्थावरविषविज्ञानीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ||२||
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