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AYANAAYURVEDAby Dr Vijaya Dwarampudi
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5. sarpadaṣṭaviṣacikitsitakalpaḥ

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ সর্পদষ্টবিষচিকিত্সিতং কল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः सर्पदष्टविषचिकित्सितं कल्पं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3-4) · Śloka 4

সর্বৈরেবাদিতঃ সর্পৈঃ শাখাদষ্টস্য দেহিনঃ | দংশস্যোপরি বধ্নীযাদরিষ্টাশ্চতুরঙ্গুলে ||৩|| প্লোতচর্মান্তবল্কানাং মৃদুনাঽন্যতমেন বৈ | ন গচ্ছতি বিষং দেহমরিষ্টাভির্নিবারিতম্ ||৪||

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सर्वैरेवादितः सर्पैः शाखादष्टस्य देहिनः | दंशस्योपरि बध्नीयादरिष्टाश्चतुरङ्गुले ||३|| प्लोतचर्मान्तवल्कानां मृदुनाऽन्यतमेन वै | न गच्छति विषं देहमरिष्टाभिर्निवारितम् ||४||

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Adhikarana 3 (5) · Śloka 5

দহেদ্দংশমথোত্কৃত্য যত্র বন্ধো ন জাযতে | আচূষণচ্ছেদদাহাঃ সর্বত্রৈব তু পূজিতাঃ ||৫||

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दहेद्दंशमथोत्कृत्य यत्र बन्धो न जायते | आचूषणच्छेददाहाः सर्वत्रैव तु पूजिताः ||५||

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Adhikarana 4 (6) · Śloka 6

প্রতিপূর্য মুখং বস্ত্রৈর্হিতমাচূষণং ভবেত্ | স দষ্টব্যোঽথবা সর্পো লোষ্টো বাঽপি হি তত্ক্ষণম্ ||৬||

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प्रतिपूर्य मुखं वस्त्रैर्हितमाचूषणं भवेत् | स दष्टव्योऽथवा सर्पो लोष्टो वाऽपि हि तत्क्षणम् ||६||

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Adhikarana 5 (7) · Śloka 7

অথ মণ্ডলিনা দষ্টং ন কথঞ্চন দাহযেত্ | স পিত্তবাহুল্যবিষাদ্দংশো দাহাদ্বিসর্পতে ||৭||

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अथ मण्डलिना दष्टं न कथञ्चन दाहयेत् | स पित्तबाहुल्यविषाद्दंशो दाहाद्विसर्पते ||७||

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Adhikarana 6 (8) · Śloka 8

অরিষ্টামপি মন্ত্রৈশ্চ বধ্নীযান্মন্ত্রকোবিদঃ | সা তু রজ্জ্বাদিভির্বদ্ধা বিষপ্রতিকরী মতা ||৮||

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अरिष्टामपि मन्त्रैश्च बध्नीयान्मन्त्रकोविदः | सा तु रज्ज्वादिभिर्बद्धा विषप्रतिकरी मता ||८||

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Adhikarana 7 (9-10) · Śloka 10

দেবব্রহ্মর্ষিভিঃ প্রোক্তা মন্ত্রাঃ সত্যতপোমযাঃ | ভবন্তি নান্যথা ক্ষিপ্রং বিষং হন্যুঃ সুদুস্তরম্ ||৯|| বিষং তেজোমযৈর্মন্ত্রৈঃ সত্যব্রহ্মতপোমযৈঃ | যথা নিবার্যতে ক্ষিপ্রং প্রযুক্তৈর্ন তথৌষধৈঃ ||১০||

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देवब्रह्मर्षिभिः प्रोक्ता मन्त्राः सत्यतपोमयाः | भवन्ति नान्यथा क्षिप्रं विषं हन्युः सुदुस्तरम् ||९|| विषं तेजोमयैर्मन्त्रैः सत्यब्रह्मतपोमयैः | यथा निवार्यते क्षिप्रं प्रयुक्तैर्न तथौषधैः ||१०||

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Adhikarana 8 (11) · Śloka 12

মন্ত্রাণাং গ্রহণং কার্যং স্ত্রীমাংসমধুবর্জিনা | মিতাহারেণ শুচিনা কুশাস্তরণশাযিনা ||১১|| গন্ধমাল্যোপহারৈশ্চ বলিভিশ্চাপি দেবতাঃ | পূজযেন্মন্ত্রসিদ্ধ্যর্থং জপহোমৈশ্চ যত্নতঃ ||১২||

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मन्त्राणां ग्रहणं कार्यं स्त्रीमांसमधुवर्जिना | मिताहारेण शुचिना कुशास्तरणशायिना ||११|| गन्धमाल्योपहारैश्च बलिभिश्चापि देवताः | पूजयेन्मन्त्रसिद्ध्यर्थं जपहोमैश्च यत्नतः ||१२||

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Adhikarana 9 (13) · Śloka 13

মন্ত্রাস্ত্ববিধিনা প্রোক্তা হীনা বা স্বরবর্ণতঃ | যস্মান্ন সিদ্ধিমাযান্তি তস্মাদ্যোজ্যোঽগদক্রমঃ ||১৩||

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मन्त्रास्त्वविधिना प्रोक्ता हीना वा स्वरवर्णतः | यस्मान्न सिद्धिमायान्ति तस्माद्योज्योऽगदक्रमः ||१३||

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Adhikarana 10 (14-16) · Śloka 16

সমন্ততঃ সিরা দংশাদ্বিধ্যেত্তু কুশলো ভিষক্ | শাখাগ্রে বা ললাটে বা ব্যধ্যাস্তা বিসৃতে বিষে ||১৪|| রক্তে নির্হ্রিযমাণে তু কৃত্স্নং নির্হ্রিযতে বিষম্ | তস্মাদ্বিস্রাবযেদ্রক্তং সা হ্যস্য পরমা ক্রিযা ||১৫|| সমন্তাদগদৈর্দংশং প্রচ্ছযিত্বা প্রলেপযেত্ | চন্দনোশীরযুক্তেন বারিণা পরিষেচযেত্ ||১৬||

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समन्ततः सिरा दंशाद्विध्येत्तु कुशलो भिषक् | शाखाग्रे वा ललाटे वा व्यध्यास्ता विसृते विषे ||१४|| रक्ते निर्ह्रियमाणे तु कृत्स्नं निर्ह्रियते विषम् | तस्माद्विस्रावयेद्रक्तं सा ह्यस्य परमा क्रिया ||१५|| समन्तादगदैर्दंशं प्रच्छयित्वा प्रलेपयेत् | चन्दनोशीरयुक्तेन वारिणा परिषेचयेत् ||१६||

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Adhikarana 11 (17) · Śloka 18

পাযযেতাগদাংস্তাংস্তান্ ক্ষীরক্ষৌদ্রঘৃতাদিভিঃ | তদলাভে হিতা বা স্যাত্ কৃষ্ণা বল্মীকমৃত্তিকা ||১৭|| কোবিদারশিরীষার্ককটভীর্বাঽপি ভক্ষযেত্ |১৮|

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पाययेतागदांस्तांस्तान् क्षीरक्षौद्रघृतादिभिः | तदलाभे हिता वा स्यात् कृष्णा वल्मीकमृत्तिका ||१७|| कोविदारशिरीषार्ककटभीर्वाऽपि भक्षयेत् |१८|

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Adhikarana 12 (18-19) · Śloka 19

ন পিবেত্তৈলকৌলত্থমদ্যসৌবীরকাণি চ ||১৮|| দ্রবমন্যত্তু যত্কিঞ্চিত্ পীত্বা পীত্বা তদুদ্বমেত্ | প্রাযো হি বমনেনৈব সুখং নির্হ্রিযতে বিষম্ ||১৯||

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न पिबेत्तैलकौलत्थमद्यसौवीरकाणि च ||१८|| द्रवमन्यत्तु यत्किञ्चित् पीत्वा पीत्वा तदुद्वमेत् | प्रायो हि वमनेनैव सुखं निर्ह्रियते विषम् ||१९||

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Adhikarana 13 (20-23) · Śloka 24

ফণিনাং বিষবেগে তু প্রথমে শোণিতং হরেত্ | দ্বিতীযে মধুসর্পির্ভ্যাং পাযযেতাগদং ভিষক্ ||২০|| নস্যকর্মাঞ্জনে যুঞ্জ্যাত্তৃতীযে বিষনাশনে | বান্তং চতুর্থে পূর্বোক্তাং যবাগূমথ দাপযেত্ ||২১|| শীতোপচারং কৃত্বাঽঽদৌ ভিষক্ পঞ্চমষষ্ঠযোঃ | পাযযেচ্ছোধনং তীক্ষ্ণং যবাগূং চাপি কীর্তিতাম্ ||২২|| সপ্তমে ত্ববপীডেন শিরস্তীক্ষ্ণেন শোধযেত্ | তীক্ষ্ণমেবাঞ্জনং দদ্যাত্, তীক্ষ্ণশস্ত্রেণ মূর্ধ্নি চ ||২৩|| কৃত্বা কাকপদং চর্ম সাসৃগ্বা পিশিতং ক্ষিপেত্ |২৪|

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फणिनां विषवेगे तु प्रथमे शोणितं हरेत् | द्वितीये मधुसर्पिर्भ्यां पाययेतागदं भिषक् ||२०|| नस्यकर्माञ्जने युञ्ज्यात्तृतीये विषनाशने | वान्तं चतुर्थे पूर्वोक्तां यवागूमथ दापयेत् ||२१|| शीतोपचारं कृत्वाऽऽदौ भिषक् पञ्चमषष्ठयोः | पाययेच्छोधनं तीक्ष्णं यवागूं चापि कीर्तिताम् ||२२|| सप्तमे त्ववपीडेन शिरस्तीक्ष्णेन शोधयेत् | तीक्ष्णमेवाञ्जनं दद्यात्, तीक्ष्णशस्त्रेण मूर्ध्नि च ||२३|| कृत्वा काकपदं चर्म सासृग्वा पिशितं क्षिपेत् |२४|

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Adhikarana 14 (24-27) · Śloka 27

পূর্বে মণ্ডলিনাং বেগে দর্বীকরবদাচরেত্ ||২৪|| অগদং মধুসর্পির্ভ্যাং দ্বিতীযে পাযযেত চ | বামযিত্বা যবাগূং চ পূর্বোক্তামথ দাপযেত্ ||২৫|| তৃতীযে শোধিতং তীক্ষ্ণৈর্যবাগূং পাযযেদ্ধিতাম্ | চতুর্থে পঞ্চমে চাপি দর্বীকরবদাচরেত্ ||২৬|| কাকোল্যাদির্হিতঃ ষষ্ঠে পেযশ্চ মধুরোঽগদঃ | হিতোঽবপীডে ত্বগদঃ সপ্তমে বিষনাশনঃ ||২৭||

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पूर्वे मण्डलिनां वेगे दर्वीकरवदाचरेत् ||२४|| अगदं मधुसर्पिर्भ्यां द्वितीये पाययेत च | वामयित्वा यवागूं च पूर्वोक्तामथ दापयेत् ||२५|| तृतीये शोधितं तीक्ष्णैर्यवागूं पाययेद्धिताम् | चतुर्थे पञ्चमे चापि दर्वीकरवदाचरेत् ||२६|| काकोल्यादिर्हितः षष्ठे पेयश्च मधुरोऽगदः | हितोऽवपीडे त्वगदः सप्तमे विषनाशनः ||२७||

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Adhikarana 15 (28-29) · Śloka 30

পূর্বে রাজিমতাং বেগেঽলাবুভিঃ শোণিতং হরেত্ | অগদং মধুসর্পির্ভ্যাং সংযুক্তং পাযযেত চ ||২৮|| বান্তং দ্বিতীযে ত্বগদং পাযযেদ্বিষনাশনম্ | তৃতীযাদিষু ত্রিষ্বেবং বিধির্দার্বীকরো হিতঃ ||২৯|| ষষ্ঠেঽঞ্জনং তীক্ষ্ণতমমবপীডশ্চ সপ্তমে |৩০|

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पूर्वे राजिमतां वेगेऽलाबुभिः शोणितं हरेत् | अगदं मधुसर्पिर्भ्यां संयुक्तं पाययेत च ||२८|| वान्तं द्वितीये त्वगदं पाययेद्विषनाशनम् | तृतीयादिषु त्रिष्वेवं विधिर्दार्वीकरो हितः ||२९|| षष्ठेऽञ्जनं तीक्ष्णतममवपीडश्च सप्तमे |३०|

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Adhikarana 16 (30) · Śloka 31

গর্ভিণীবালবৃদ্ধানাং সিরাব্যধনবর্জিতম্ ||৩০|| বিষার্তানাং যথোদ্দিষ্টং বিধানং শস্যতে মৃদু |৩১|

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गर्भिणीबालवृद्धानां सिराव्यधनवर्जितम् ||३०|| विषार्तानां यथोद्दिष्टं विधानं शस्यते मृदु |३१|

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Adhikarana 17 (31) · Śloka 33

রক্তাবসেকাঞ্জনানি নরতুল্যান্যজাবিকে ||৩১|| ত্রিগুণং মহিষে সোষ্ট্রে গবাশ্বে দ্বিগুণং তু তত্ | চতুর্গুণং তু নাগানাং,... |৩৩|

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रक्तावसेकाञ्जनानि नरतुल्यान्यजाविके ||३१|| त्रिगुणं महिषे सोष्ट्रे गवाश्वे द्विगुणं तु तत् | चतुर्गुणं तु नागानां,... |३३|

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Adhikarana 18 (32-33) · Śloka 33

...কেবলং সর্বপক্ষিণাম্ ||৩২|| পরিষেকান্ প্রদেহাংশ্চ সুশীতানবচারযেত্ | মাষকং ত্বঞ্জনস্যেষ্টং দ্বিগুণং নস্যতো হিতম্ | পানে চতুর্গুণং পথ্যং বমনেঽষ্টগুণং পুনঃ ||৩৩||

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...केवलं सर्वपक्षिणाम् ||३२|| परिषेकान् प्रदेहांश्च सुशीतानवचारयेत् | माषकं त्वञ्जनस्येष्टं द्विगुणं नस्यतो हितम् | पाने चतुर्गुणं पथ्यं वमनेऽष्टगुणं पुनः ||३३||

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Adhikarana 19 (34) · Śloka 34

দেশপ্রকৃতিসাত্ম্যর্তুবিষবেগবলাবলম্ | প্রধার্য নিপুণং বুদ্ধ্যা ততঃ কর্ম সমাচরেত্ ||৩৪||

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देशप्रकृतिसात्म्यर्तुविषवेगबलाबलम् | प्रधार्य निपुणं बुद्ध्या ततः कर्म समाचरेत् ||३४||

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Adhikarana 20 (35) · Śloka 35

বেগানুপূর্ব্যা কর্মোক্তমিদং বিষবিনাশনম্ | কর্মাবস্থাবিশেষেণ বিষযোরুভযোঃ শৃণু ||৩৫||

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वेगानुपूर्व्या कर्मोक्तमिदं विषविनाशनम् | कर्मावस्थाविशेषेण विषयोरुभयोः शृणु ||३५||

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Adhikarana 21 (36) · Śloka 36

বিবর্ণে কঠিনে শূনে সরুজেঽঙ্গে বিষান্বিতে | তূর্ণং বিস্রবণং কার্যমুক্তেন বিধিনা ততঃ ||৩৬||

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विवर्णे कठिने शूने सरुजेऽङ्गे विषान्विते | तूर्णं विस्रवणं कार्यमुक्तेन विधिना ततः ||३६||

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Adhikarana 22 (37) · Śloka 37

ক্ষুধার্তমনিলপ্রাযং তদ্বিষার্তং সমাহিতঃ | পাযযেত রসং সর্পিঃ শুক্তং ক্ষৌদ্রং তথা দধি ||৩৭||

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क्षुधार्तमनिलप्रायं तद्विषार्तं समाहितः | पाययेत रसं सर्पिः शुक्तं क्षौद्रं तथा दधि ||३७||

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Adhikarana 23 (38) · Śloka 38

তৃড্দাহঘর্মসম্মোহে পৈত্তং পৈত্তবিষাতুরম্ | শীতৈঃ সংবাহনস্নানপ্রদেহৈঃ সমুপাচরেত্ ||৩৮||

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तृड्दाहघर्मसम्मोहे पैत्तं पैत्तविषातुरम् | शीतैः संवाहनस्नानप्रदेहैः समुपाचरेत् ||३८||

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Adhikarana 24 (39) · Śloka 39

শীতে শীতপ্রসেকার্তং শ্লৈষ্মিকং কফকৃদ্বিষম্ | বামযেদ্বমনৈস্তীক্ষ্ণৈস্তথা মূর্চ্ছামদান্বিতম্ ||৩৯||

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शीते शीतप्रसेकार्तं श्लैष्मिकं कफकृद्विषम् | वामयेद्वमनैस्तीक्ष्णैस्तथा मूर्च्छामदान्वितम् ||३९||

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Adhikarana 25 (40) · Śloka 40

কোষ্ঠদাহরুজাধ্মানমূত্রসঙ্গরুগন্বিতম্ | বিরেচযেচ্ছকৃদ্বাযুসঙ্গপিত্তাতুরং নরম্ ||৪০||

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कोष्ठदाहरुजाध्मानमूत्रसङ्गरुगन्वितम् | विरेचयेच्छकृद्वायुसङ्गपित्तातुरं नरम् ||४०||

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Adhikarana 26 (41) · Śloka 41

শূনাক্ষিকূটং নিদ্রার্তং বিবর্ণাবিললোচনম্ | বিবর্ণং চাপি পশ্যন্তমঞ্জনৈঃ সমুপাচরেত্ ||৪১||

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शूनाक्षिकूटं निद्रार्तं विवर्णाविललोचनम् | विवर्णं चापि पश्यन्तमञ्जनैः समुपाचरेत् ||४१||

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Adhikarana 27 (42-49) · Śloka 50

শিরোরুগ্গৌরবালস্যহনুস্তম্ভগলগ্রহে | শিরো বিরেচযেত্ ক্ষিপ্রং মন্যাস্তম্ভে চ দারুণে ||৪২|| নষ্টসঞ্জ্ঞং বিবৃত্তাক্ষং ভগ্নগ্রীবং বিরেচনৈঃ | চূর্ণৈঃ প্রধমনৈস্তীক্ষ্ণৈর্বিষার্তং সমুপাচরেত্ ||৪৩|| তাডযেচ্চ সিরাঃ ক্ষিপ্রং তস্য শাখাললাটজাঃ | তাস্বপ্রসিচ্যমানাসু মূর্ধ্নি শস্ত্রেণ শস্ত্রবিত্ ||৪৪|| কুর্যাত্ কাকপদাকারং ব্রণমেবং স্রবন্তি তাঃ | সরক্তং চর্ম মাংসং বা নিক্ষিপেচ্চাস্য মূর্ধনি ||৪৫|| চর্মবৃক্ষকষাযং বা কল্কং বা কুশলো ভিষক্ | বাদযেচ্চাগদৈর্লিপ্ত্বা দুন্দুভীংস্তস্য পার্শ্বযোঃ ||৪৬|| লব্ধসঞ্জ্ঞং পুনশ্চৈনমূর্ধ্বং চাধশ্চ শোধযেত্ | নিঃশেষং নির্হরেচ্চৈবং বিষং পরমদুর্জযম্ ||৪৭|| অল্পমপ্যবশিষ্টং হি ভূযো বেগায কল্পতে | কুর্যাদ্বা সাদবৈবর্ণ্যজ্বরকাসশিরোরুজঃ ||৪৮|| শোফশোষপ্রতিশ্যাযতিমিরারুচিপীনসান্ | তেষু চাপি যথাদোষং প্রতিকর্ম প্রযোজযেত্ ||৪৯|| বিষার্তোপদ্রবাংশ্চাপি যথাস্বং সমুপাচরেত্ |৫০|

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शिरोरुग्गौरवालस्यहनुस्तम्भगलग्रहे | शिरो विरेचयेत् क्षिप्रं मन्यास्तम्भे च दारुणे ||४२|| नष्टसञ्ज्ञं विवृत्ताक्षं भग्नग्रीवं विरेचनैः | चूर्णैः प्रधमनैस्तीक्ष्णैर्विषार्तं समुपाचरेत् ||४३|| ताडयेच्च सिराः क्षिप्रं तस्य शाखाललाटजाः | तास्वप्रसिच्यमानासु मूर्ध्नि शस्त्रेण शस्त्रवित् ||४४|| कुर्यात् काकपदाकारं व्रणमेवं स्रवन्ति ताः | सरक्तं चर्म मांसं वा निक्षिपेच्चास्य मूर्धनि ||४५|| चर्मवृक्षकषायं वा कल्कं वा कुशलो भिषक् | वादयेच्चागदैर्लिप्त्वा दुन्दुभींस्तस्य पार्श्वयोः ||४६|| लब्धसञ्ज्ञं पुनश्चैनमूर्ध्वं चाधश्च शोधयेत् | निःशेषं निर्हरेच्चैवं विषं परमदुर्जयम् ||४७|| अल्पमप्यवशिष्टं हि भूयो वेगाय कल्पते | कुर्याद्वा सादवैवर्ण्यज्वरकासशिरोरुजः ||४८|| शोफशोषप्रतिश्यायतिमिरारुचिपीनसान् | तेषु चापि यथादोषं प्रतिकर्म प्रयोजयेत् ||४९|| विषार्तोपद्रवांश्चापि यथास्वं समुपाचरेत् |५०|

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Adhikarana 28 (50) · Śloka 51

অথারিষ্টাং বিমুচ্যাশু প্রচ্ছযিত্বাঽঙ্কিতং তযা ||৫০|| দহ্যাত্তত্র বিষং স্কন্নং ভূযো বেগায কল্পতে |৫১|

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अथारिष्टां विमुच्याशु प्रच्छयित्वाऽङ्कितं तया ||५०|| दह्यात्तत्र विषं स्कन्नं भूयो वेगाय कल्पते |५१|

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Adhikarana 29 (51-54) · Śloka 54

এবমৌষধিভির্মন্ত্রৈঃ ক্রিযাযোগৈশ্চ যত্নতঃ ||৫১|| বিষে হৃতগুণে দেহাদ্যদা দোষঃ প্রকুপ্যতি | তদা পবনমুদ্বৃত্তং স্নেহাদ্যৈঃ সমুপাচরেত্ ||৫২|| তৈলমত্স্যকুলত্থাম্লবর্জ্যৈর্বিষহরাযুতৈঃ | পিত্তজ্বরহরৈঃ পিত্তং কষাযস্নেহবস্তিভিঃ ||৫৩|| কফমারগ্বধাদ্যেন সক্ষৌদ্রেণ গণেন তু | শ্লেষ্মঘ্নৈরগদৈশ্চৈব তিক্তৈ রূক্ষৈশ্চ ভোজনৈঃ ||৫৪||

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एवमौषधिभिर्मन्त्रैः क्रियायोगैश्च यत्नतः ||५१|| विषे हृतगुणे देहाद्यदा दोषः प्रकुप्यति | तदा पवनमुद्वृत्तं स्नेहाद्यैः समुपाचरेत् ||५२|| तैलमत्स्यकुलत्थाम्लवर्ज्यैर्विषहरायुतैः | पित्तज्वरहरैः पित्तं कषायस्नेहबस्तिभिः ||५३|| कफमारग्वधाद्येन सक्षौद्रेण गणेन तु | श्लेष्मघ्नैरगदैश्चैव तिक्तै रूक्षैश्च भोजनैः ||५४||

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Adhikarana 30 (55) · Śloka 55

বৃক্ষপ্রপাতবিষমপতিতং মৃতমম্ভসি | উদ্বদ্ধং চ মৃতং সদ্যশ্চিকিত্সেন্নষ্টসঞ্জ্ঞবত্ ||৫৫||

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वृक्षप्रपातविषमपतितं मृतमम्भसि | उद्बद्धं च मृतं सद्यश्चिकित्सेन्नष्टसञ्ज्ञवत् ||५५||

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Adhikarana 31 (56) · Śloka 56

গাঢং বদ্ধেঽরিষ্টযা প্রচ্ছিতে বা তীক্ষ্ণৈর্লেপৈস্তদ্বিধৈর্বাঽবশিষ্টৈঃ | শূনে গাত্রে ক্লিন্নমত্যর্থপূতি জ্ঞেযং মাংসং তদ্বিষাত্ পূতি কষ্টম্ ||৫৬||

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गाढं बद्धेऽरिष्टया प्रच्छिते वा तीक्ष्णैर्लेपैस्तद्विधैर्वाऽवशिष्टैः | शूने गात्रे क्लिन्नमत्यर्थपूति ज्ञेयं मांसं तद्विषात् पूति कष्टम् ||५६||

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Adhikarana 32 (57) · Śloka 58

সদ্যো বিদ্ধং নিস্রবেত্ কৃষ্ণরক্তং পাকং যাযাদ্দহ্যতে চাপ্যভীক্ষ্ণম্ | কৃষ্ণীভূতং ক্লিন্নমত্যর্থপূতি শীর্ণং মাংসং যাত্যজস্রং ক্ষতাচ্চ ||৫৭|| তৃষ্ণা মূর্চ্ছা ভ্রান্তিদাহৌ জ্বরশ্চ যস্য স্যুস্তং দিগ্ধবিদ্ধং ব্যবস্যেত্ |৫৮|

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सद्यो विद्धं निस्रवेत् कृष्णरक्तं पाकं यायाद्दह्यते चाप्यभीक्ष्णम् | कृष्णीभूतं क्लिन्नमत्यर्थपूति शीर्णं मांसं यात्यजस्रं क्षताच्च ||५७|| तृष्णा मूर्च्छा भ्रान्तिदाहौ ज्वरश्च यस्य स्युस्तं दिग्धविद्धं व्यवस्येत् |५८|

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Adhikarana 33 (58) · Śloka 59

পূর্বোদ্দিষ্টং লক্ষণং সর্বমেতজ্জুষ্টং যস্যালং বিষেণ ব্রণাঃ স্যুঃ ||৫৮|| লূতাদষ্টা দিগ্ধবিদ্ধা বিষৈর্বা জুষ্টা প্রাযস্তে ব্রণাঃ পূতিমাংসাঃ |৫৯|

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पूर्वोद्दिष्टं लक्षणं सर्वमेतज्जुष्टं यस्यालं विषेण व्रणाः स्युः ||५८|| लूतादष्टा दिग्धविद्धा विषैर्वा जुष्टा प्रायस्ते व्रणाः पूतिमांसाः |५९|

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Adhikarana 34 (59-60) · Śloka 60

তেষাং যুক্ত্যা পূতিমাংসান্যপোহ্য বার্যোকোভিঃ শোণিতং চাপহৃত্য ||৫৯|| হৃত্বা দোষান্ ক্ষিপ্রমূর্ধ্বং ত্বধশ্চ সম্যক্ সিঞ্চেত্ ক্ষীরিণাং ত্বক্কষাযৈঃ | অন্তর্বস্ত্রং দাপযেচ্চ প্রদেহান্ শীতৈর্দ্রব্যৈরাজ্যযুক্তৈর্বিষঘ্নৈঃ ||৬০||

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तेषां युक्त्या पूतिमांसान्यपोह्य वार्योकोभिः शोणितं चापहृत्य ||५९|| हृत्वा दोषान् क्षिप्रमूर्ध्वं त्वधश्च सम्यक् सिञ्चेत् क्षीरिणां त्वक्कषायैः | अन्तर्वस्त्रं दापयेच्च प्रदेहान् शीतैर्द्रव्यैराज्ययुक्तैर्विषघ्नैः ||६०||

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Adhikarana 35 (61) · Śloka 61

ভিন্নে ত্বস্থ্না দুষ্টজাতেন কার্যঃ পূর্বো মার্গঃ পৈত্তিকে যো বিষে চ |৬১|

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भिन्ने त्वस्थ्ना दुष्टजातेन कार्यः पूर्वो मार्गः पैत्तिके यो विषे च |६१|

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Adhikarana 36 (61-62) · Śloka 63

ত্রিবৃদ্বিশল্যে মধুকং হরিদ্রে রক্তা নরেন্দ্রো লবণশ্চ বর্গঃ ||৬১|| কটুত্রিকং চৈব সুচূর্ণিতানি শৃঙ্গে নিদধ্যান্মধুসংযুতানি | এষোঽগদো হন্তি বিষং প্রযুক্তঃ পানাঞ্জনাভ্যঞ্জননস্যযোগৈঃ ||৬২|| অবার্যবীর্যো বিষবেগহন্তা মহাগদো নাম মহাপ্রভাবঃ |৬৩|

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त्रिवृद्विशल्ये मधुकं हरिद्रे रक्ता नरेन्द्रो लवणश्च वर्गः ||६१|| कटुत्रिकं चैव सुचूर्णितानि शृङ्गे निदध्यान्मधुसंयुतानि | एषोऽगदो हन्ति विषं प्रयुक्तः पानाञ्जनाभ्यञ्जननस्ययोगैः ||६२|| अवार्यवीर्यो विषवेगहन्ता महागदो नाम महाप्रभावः |६३|

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Adhikarana 37 (63-64) · Śloka 65

বিডঙ্গপাঠত্রিফলাজমোদাহিঙ্গূনি বক্রং ত্রিকটূনি চৈব ||৬৩|| সর্বশ্চ বর্গো লবণঃ সুসূক্ষ্মঃ সচিত্রকঃ ক্ষৌদ্রযুতো নিধেযঃ | শৃঙ্গে গবাং শৃঙ্গমযেন চৈব প্রচ্ছাদিতঃ পক্ষমুপেক্ষিতশ্চ ||৬৪|| এষোঽগদঃ স্থাবরজঙ্গমানাং জেতা বিষাণামজিতো হি নাম্না |৬৫|

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विडङ्गपाठत्रिफलाजमोदाहिङ्गूनि वक्रं त्रिकटूनि चैव ||६३|| सर्वश्च वर्गो लवणः सुसूक्ष्मः सचित्रकः क्षौद्रयुतो निधेयः | शृङ्गे गवां शृङ्गमयेन चैव प्रच्छादितः पक्षमुपेक्षितश्च ||६४|| एषोऽगदः स्थावरजङ्गमानां जेता विषाणामजितो हि नाम्ना |६५|

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Adhikarana 38 (65-67) · Śloka 68

প্রপৌণ্ডরীকং সুরদারু মুস্তা কালানুসার্যা কটুরোহিণী চ ||৬৫|| স্থৌণেযকধ্যামকগুগ্গুলূনি পুন্নাগতালীশসুবর্চিকাশ্চ | কুটন্নটৈলাসিতসিন্ধুবারাঃ শৈলেযকুষ্ঠে তগরং প্রিযঙ্গুঃ ||৬৬|| রোধ্রং জলং কাঞ্চনগৈরিকং চ সমাগধং চন্দনসৈন্ধবং চ | সূক্ষ্মাণি চূর্ণানি সমানি কৃত্বা শৃঙ্গে নিদধ্যান্মধুসংযুতানি ||৬৭|| এষোঽগদস্তার্ক্ষ্য ইতি প্রদিষ্টো বিষং নিহন্যাদপি তক্ষকস্য |৬৮|

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प्रपौण्डरीकं सुरदारु मुस्ता कालानुसार्या कटुरोहिणी च ||६५|| स्थौणेयकध्यामकगुग्गुलूनि पुन्नागतालीशसुवर्चिकाश्च | कुटन्नटैलासितसिन्धुवाराः शैलेयकुष्ठे तगरं प्रियङ्गुः ||६६|| रोध्रं जलं काञ्चनगैरिकं च समागधं चन्दनसैन्धवं च | सूक्ष्माणि चूर्णानि समानि कृत्वा शृङ्गे निदध्यान्मधुसंयुतानि ||६७|| एषोऽगदस्तार्क्ष्य इति प्रदिष्टो विषं निहन्यादपि तक्षकस्य |६८|

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Adhikarana 39 (68-72) · Śloka 73

মাংসীহরেণুত্রিফলামুরঙ্গীরক্তালতাযষ্টিকপদ্মকানি ||৬৮|| বিডঙ্গতালীশসুগন্ধিকৈলাত্বক্কুষ্ঠপত্রাণি সচন্দনানি | ভার্গী পটোলং কিণিহী সপাঠা মৃগাদনী কর্কটিকা পুরশ্চ ||৬৯|| পালিন্দ্যশোকৌ ক্রমুকং সুরস্যাঃ প্রসূনমারুষ্করজং চ পুষ্পম্ | সূক্ষ্মানি চূর্ণানি সমানি শৃঙ্গে ন্যসেত্ সপিত্তানি সমাক্ষিকাণি ||৭০|| বরাহগোধাশিখিশল্লকীনাং মার্জারজং পার্ষতনাকুলে চ | যস্যাগদোঽযং সুকৃতো গৃহে স্যান্নাম্নর্ষভো নাম নরর্ষভস্য ||৭১|| ন তত্র সর্পাঃ কুত এব কীটাস্ত্যজন্তি বীর্যাণি বিষাণি চৈব | এতেন ভের্যঃ পটহাশ্চ দিগ্ধা নানদ্যমানা বিষমাশু হন্যুঃ ||৭২|| দিগ্ধাঃ পতাকাশ্চ নিরীক্ষ্য সদ্যো বিষাভিভূতা হ্যবিষা ভবন্তি |৭৩|

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मांसीहरेणुत्रिफलामुरङ्गीरक्तालतायष्टिकपद्मकानि ||६८|| विडङ्गतालीशसुगन्धिकैलात्वक्कुष्ठपत्राणि सचन्दनानि | भार्गी पटोलं किणिही सपाठा मृगादनी कर्कटिका पुरश्च ||६९|| पालिन्द्यशोकौ क्रमुकं सुरस्याः प्रसूनमारुष्करजं च पुष्पम् | सूक्ष्मानि चूर्णानि समानि शृङ्गे न्यसेत् सपित्तानि समाक्षिकाणि ||७०|| वराहगोधाशिखिशल्लकीनां मार्जारजं पार्षतनाकुले च | यस्यागदोऽयं सुकृतो गृहे स्यान्नाम्नर्षभो नाम नरर्षभस्य ||७१|| न तत्र सर्पाः कुत एव कीटास्त्यजन्ति वीर्याणि विषाणि चैव | एतेन भेर्यः पटहाश्च दिग्धा नानद्यमाना विषमाशु हन्युः ||७२|| दिग्धाः पताकाश्च निरीक्ष्य सद्यो विषाभिभूता ह्यविषा भवन्ति |७३|

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Adhikarana 40 (73-74) · Śloka 75

লাক্ষা হরেণুর্নলদং প্রিযঙ্গুঃ শিগ্রুদ্বযং যষ্টিকপৃথ্বিকাশ্চ ||৭৩|| চূর্ণীকৃতোঽযং রজনীবিমিশ্রো সর্পির্মধুভ্যাং সহিতো নিধেযঃ | শৃঙ্গে গবাং পূর্ববদাপিধানস্ততঃ প্রযোজ্যোঽঞ্জননস্যপানৈঃ ||৭৪|| সঞ্জীবনো নাম গতাসুকল্পানেষোঽগদো জীবযতীহ মর্ত্যান্ |৭৫|

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लाक्षा हरेणुर्नलदं प्रियङ्गुः शिग्रुद्वयं यष्टिकपृथ्विकाश्च ||७३|| चूर्णीकृतोऽयं रजनीविमिश्रो सर्पिर्मधुभ्यां सहितो निधेयः | शृङ्गे गवां पूर्ववदापिधानस्ततः प्रयोज्योऽञ्जननस्यपानैः ||७४|| सञ्जीवनो नाम गतासुकल्पानेषोऽगदो जीवयतीह मर्त्यान् |७५|

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Adhikarana 41 (75) · Śloka 76

শ্লেষ্মাতকীকট্ফলমাতুলুঙ্গ্যঃ শ্বেতা গিরিহ্বা কিণিহী সিতা চ ||৭৫|| সতণ্ডুলীযোঽগদ এষ মুখ্যো বিষেষু দর্বীকররাজিলানাম্ |৭৬|

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श्लेष्मातकीकट्फलमातुलुङ्ग्यः श्वेता गिरिह्वा किणिही सिता च ||७५|| सतण्डुलीयोऽगद एष मुख्यो विषेषु दर्वीकरराजिलानाम् |७६|

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Adhikarana 42 (76-77) · Śloka 78

দ্রাক্ষা সুগন্ধা নগবৃত্তিকা চ শ্বেতা সমঙ্গা সমভাগযুক্তা ||৭৬|| দেযো দ্বিভাগঃ সুরসাচ্ছদস্য কপিত্থবিল্বাদপি দাডিমাচ্চ | তথাঽর্ধভাগঃ সিতসিন্ধুবারাদঙ্কোঠমূলাদপি গৈরিকাচ্চ ||৭৭|| এষোঽগদঃ ক্ষৌদ্রযুতো নিহন্তি বিশেষতো মণ্ডলিনাং বিষাণি |৭৮|

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द्राक्षा सुगन्धा नगवृत्तिका च श्वेता समङ्गा समभागयुक्ता ||७६|| देयो द्विभागः सुरसाच्छदस्य कपित्थबिल्वादपि दाडिमाच्च | तथाऽर्धभागः सितसिन्धुवारादङ्कोठमूलादपि गैरिकाच्च ||७७|| एषोऽगदः क्षौद्रयुतो निहन्ति विशेषतो मण्डलिनां विषाणि |७८|

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Adhikarana 43 (78-80) · Śloka 80

বংশত্বগার্দ্রাঽঽমলকং কপিত্থং কটুত্রিকং হৈমবতী সকুষ্ঠা ||৭৮|| করঞ্জবীজং তগরং শিরীষপুষ্পং চ গোপিত্তযুতং নিহন্তি | বিষাণি লূতোন্দুরপন্নগানাং কৈটং চ লেপাঞ্জননস্যপানৈঃ ||৭৯|| পুরীষমূত্রানিলগর্ভসঙ্গান্নিহন্তি বর্ত্যঞ্জননাভিলেপৈঃ | কাচার্মকোথান্ পটলাংশ্চ ঘোরান্ পুষ্পং চ হন্ত্যঞ্জননস্যযোগৈঃ ||৮০||

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वंशत्वगार्द्राऽऽमलकं कपित्थं कटुत्रिकं हैमवती सकुष्ठा ||७८|| करञ्जबीजं तगरं शिरीषपुष्पं च गोपित्तयुतं निहन्ति | विषाणि लूतोन्दुरपन्नगानां कैटं च लेपाञ्जननस्यपानैः ||७९|| पुरीषमूत्रानिलगर्भसङ्गान्निहन्ति वर्त्यञ्जननाभिलेपैः | काचार्मकोथान् पटलांश्च घोरान् पुष्पं च हन्त्यञ्जननस्ययोगैः ||८०||

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Adhikarana 44 (81) · Śloka 81

সমূলপুষ্পাঙ্কুরবল্কবীজাত্ ক্বাথঃ শিরীষাত্ ত্রিকটুপ্রগাঢঃ | সলাবণঃ ক্ষৌদ্রযুতোঽথ পীতো বিশেষতঃ কীটবিষং নিহন্তি ||৮১||

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समूलपुष्पाङ्कुरवल्कबीजात् क्वाथः शिरीषात् त्रिकटुप्रगाढः | सलावणः क्षौद्रयुतोऽथ पीतो विशेषतः कीटविषं निहन्ति ||८१||

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Adhikarana 45 (82-83) · Śloka 83

কুষ্ঠং ত্রিকটুকং দার্বী মধুকং লবণদ্বযম্ | মালতী নাগপুষ্পং চ সর্বাণি মধুরাণি চ ||৮২|| কপিত্থরসপিষ্টোঽযং শর্করাক্ষৌদ্রসংযুতঃ | বিষং হন্ত্যগদঃ সর্বং মূষিকাণাং বিশেষতঃ ||৮৩||

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कुष्ठं त्रिकटुकं दार्वी मधुकं लवणद्वयम् | मालती नागपुष्पं च सर्वाणि मधुराणि च ||८२|| कपित्थरसपिष्टोऽयं शर्कराक्षौद्रसंयुतः | विषं हन्त्यगदः सर्वं मूषिकाणां विशेषतः ||८३||

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Adhikarana 46 (84-86) · Śloka 86

সোমরাজীফলং পুষ্পং কটভী সিন্ধুবারকঃ | চোরকো বরুণঃ কুষ্ঠং সর্পগন্ধা সসপ্তলা ||৮৪|| পুনর্নবা শিরীষস্য পুষ্পমারগ্বধার্কজম্ | শ্যামাঽম্বষ্ঠা বিডঙ্গানি তথাঽম্রাশ্মন্তকানি চ ||৮৫|| ভূমী কুরবকশ্চৈব গণ একসরঃ স্মৃতঃ | একশো দ্বিত্রিশো বাঽপি প্রযোক্তব্যো বিষাপহঃ ||৮৬||

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सोमराजीफलं पुष्पं कटभी सिन्धुवारकः | चोरको वरुणः कुष्ठं सर्पगन्धा ससप्तला ||८४|| पुनर्नवा शिरीषस्य पुष्पमारग्वधार्कजम् | श्यामाऽम्बष्ठा विडङ्गानि तथाऽम्राश्मन्तकानि च ||८५|| भूमी कुरबकश्चैव गण एकसरः स्मृतः | एकशो द्वित्रिशो वाऽपि प्रयोक्तव्यो विषापहः ||८६||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 5

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং কল্পস্থানে সর্পদষ্টবিষচিকিত্সিতং নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ ||৫||

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इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थाने सर्पदष्टविषचिकित्सितं नाम पञ्चमोऽध्यायः ||५||

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5. sarpadaṣṭaviṣacikitsitakalpaḥ — Sushruta Samhita | Ayana Ayurveda | Dr Vijaya Dwarampudi