Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽন্নপানরক্ষাকল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातोऽन्नपानरक्षाकल्पं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতোঽন্নপানরক্ষাকল্পং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातोऽन्नपानरक्षाकल्पं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
ধন্বন্তরিঃ কাশিপতিস্তপোধর্মভৃতাং বরঃ | সুশ্রুতপ্রভৃতীঞ্ছিষ্যাঞ্ছশাসাহতশাসনঃ ||৩||
धन्वन्तरिः काशिपतिस्तपोधर्मभृतां वरः | सुश्रुतप्रभृतीञ्छिष्याञ्छशासाहतशासनः ||३||
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Adhikarana 3 (4-6) · Śloka 6
রিপবো বিক্রমাক্রান্তা যে চ স্বে কৃত্যতাং গতাঃ | সিসৃক্ষবঃ ক্রোধবিষং বিবরং প্রাপ্য তাদৃশম্ ||৪|| বিষৈর্নিহন্যুর্নিপুণং নৃপতিং দুষ্টচেতসঃ | স্ত্রিযো বা বিবিধান্ যোগান্ কদাচিত্সুভগেচ্ছযা ||৫|| বিষকন্যোপযোগাদ্বা ক্ষণাজ্জহ্যাদসূন্নরঃ | তস্মাদ্বৈদ্যেন সততং বিষাদ্রক্ষ্যো নরাধিপঃ ||৬||
रिपवो विक्रमाक्रान्ता ये च स्वे कृत्यतां गताः | सिसृक्षवः क्रोधविषं विवरं प्राप्य तादृशम् ||४|| विषैर्निहन्युर्निपुणं नृपतिं दुष्टचेतसः | स्त्रियो वा विविधान् योगान् कदाचित्सुभगेच्छया ||५|| विषकन्योपयोगाद्वा क्षणाज्जह्यादसून्नरः | तस्माद्वैद्येन सततं विषाद्रक्ष्यो नराधिपः ||६||
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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
যস্মাচ্চ চেতোঽনিত্যত্বমশ্ববত্ প্রথিতং নৃণাম্ | ন বিশ্বস্যাত্ততো রাজা কদাচিদপি কস্যচিত্ ||৭||
यस्माच्च चेतोऽनित्यत्वमश्ववत् प्रथितं नृणाम् | न विश्वस्यात्ततो राजा कदाचिदपि कस्यचित् ||७||
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Adhikarana 5 (8-11) · Śloka 11
কুলীনং ধার্মিকং স্নিগ্ধং সুভৃতং সন্ততোত্থিতম্ | অলুব্ধমশঠং ভক্তং কৃতজ্ঞং প্রিযদর্শনম্ ||৮|| ক্রোধপারুষ্যমাত্সর্যমাযালস্যবিবর্জিতম্ | জিতেন্দ্রিযং ক্ষমাবন্তং শুচিং শীলদযান্বিতম্ ||৯|| মেধাবিনমসংশ্রান্তমনুরক্তং হিতৈষিণম্ | পটুং প্রগল্ভং নিপুণং দক্ষমালস্যবর্জিতম্ ||১০|| পূর্বোক্তৈশ্চ গুণৈর্যুক্তং নিত্যং সন্নিহিতাগদম্ | মহানসে প্রযুঞ্জীত বৈদ্যং তদ্বিদ্যপূজিতম্ ||১১||
कुलीनं धार्मिकं स्निग्धं सुभृतं सन्ततोत्थितम् | अलुब्धमशठं भक्तं कृतज्ञं प्रियदर्शनम् ||८|| क्रोधपारुष्यमात्सर्यमायालस्यविवर्जितम् | जितेन्द्रियं क्षमावन्तं शुचिं शीलदयान्वितम् ||९|| मेधाविनमसंश्रान्तमनुरक्तं हितैषिणम् | पटुं प्रगल्भं निपुणं दक्षमालस्यवर्जितम् ||१०|| पूर्वोक्तैश्च गुणैर्युक्तं नित्यं सन्निहितागदम् | महानसे प्रयुञ्जीत वैद्यं तद्विद्यपूजितम् ||११||
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Adhikarana 6 (12-13) · Śloka 13
প্রশস্তদিগ্দেশকৃতং শুচিভাণ্ডং মহচ্ছুচি | সজালকং গবাক্ষাঢ্যমাপ্তবর্গনিষেবিতম্ ||১২|| বিকক্ষসৃষ্টসংসৃষ্টং সবিতানং কৃতার্চনম্ | পরীক্ষিতস্ত্রীপুরুষং ভবেচ্চাপি মহানসম্ ||১৩||
प्रशस्तदिग्देशकृतं शुचिभाण्डं महच्छुचि | सजालकं गवाक्षाढ्यमाप्तवर्गनिषेवितम् ||१२|| विकक्षसृष्टसंसृष्टं सवितानं कृतार्चनम् | परीक्षितस्त्रीपुरुषं भवेच्चापि महानसम् ||१३||
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Adhikarana 7 (14) · Śloka 14
তত্রাধ্যক্ষং নিযুঞ্জীত প্রাযো বৈদ্যগুণান্বিতম্ |১৪|
तत्राध्यक्षं नियुञ्जीत प्रायो वैद्यगुणान्वितम् |१४|
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Adhikarana 8 (14-15) · Śloka 16
শুচযো দক্ষিণা দক্ষা বিনীতাঃ প্রিযদর্শনাঃ ||১৪|| সংবিভক্তাঃ সুমনসো নীচকেশনখাঃ স্থিরাঃ | স্নাতা দৃঢং সংযমিনঃ কৃতোষ্ণীষাঃ সুসংযতাঃ ||১৫|| তস্য চাজ্ঞাবিধেযাঃ স্যুর্বিবিধাঃ পরিকর্মিণঃ |১৬|
शुचयो दक्षिणा दक्षा विनीताः प्रियदर्शनाः ||१४|| संविभक्ताः सुमनसो नीचकेशनखाः स्थिराः | स्नाता दृढं संयमिनः कृतोष्णीषाः सुसंयताः ||१५|| तस्य चाज्ञाविधेयाः स्युर्विविधाः परिकर्मिणः |१६|
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Adhikarana 9 (16) · Śloka 17
আহারস্থিতযশ্চাপি ভবন্তি প্রাণিনো যতঃ ||১৬|| তস্মান্মহানসে বৈদ্যঃ প্রমাদরহিতো ভবেত্ |১৭|
आहारस्थितयश्चापि भवन्ति प्राणिनो यतः ||१६|| तस्मान्महानसे वैद्यः प्रमादरहितो भवेत् |१७|
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Adhikarana 10 (17) · Śloka 18
মাহানসিকবোঢারঃ সৌপৌদনিকপৌপিকাঃ ||১৭|| ভবেযুর্বৈদ্যবশগা যে চাপ্যন্যেঽত্র কেচন |১৮|
माहानसिकवोढारः सौपौदनिकपौपिकाः ||१७|| भवेयुर्वैद्यवशगा ये चाप्यन्येऽत्र केचन |१८|
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Adhikarana 11 (18-22) · Śloka 23
ইঙ্গিতজ্ঞো মনুষ্যাণাং বাক্চেষ্টামুখবৈকৃতৈঃ ||১৮|| বিদ্যাদ্বিষস্য দাতারমেভির্লিঙ্গৈশ্চ বুদ্ধিমান্ | ন দদাত্যুত্তরং পৃষ্টো বিবক্ষন্ মোহমেতি চ ||১৯|| অপার্থং বহু সঙ্কীর্ণং ভাষতে চাপি মূঢবত্ | স্ফোটযত্যঙ্গুলীর্ভূমিমকস্মাদ্বিলিখেদ্ধসেত্ ||২০|| বেপথুর্জাযতে তস্য ত্রস্তশ্চান্যোঽন্যমীক্ষতে | ক্ষামো বিবর্ণবক্ত্রশ্চ নখৈঃ কিঞ্চিচ্ছিনত্ত্যপি ||২১|| আলভেতাসকৃদ্দীনঃ করেণ চ শিরোরুহান্ | নির্যিযাসুরপদ্বারৈর্বীক্ষতে চ পুনঃ পুনঃ ||২২|| বর্ততে বিপরীতং তু বিষদাতা বিচেতনঃ |২৩|
इङ्गितज्ञो मनुष्याणां वाक्चेष्टामुखवैकृतैः ||१८|| विद्याद्विषस्य दातारमेभिर्लिङ्गैश्च बुद्धिमान् | न ददात्युत्तरं पृष्टो विवक्षन् मोहमेति च ||१९|| अपार्थं बहु सङ्कीर्णं भाषते चापि मूढवत् | स्फोटयत्यङ्गुलीर्भूमिमकस्माद्विलिखेद्धसेत् ||२०|| वेपथुर्जायते तस्य त्रस्तश्चान्योऽन्यमीक्षते | क्षामो विवर्णवक्त्रश्च नखैः किञ्चिच्छिनत्त्यपि ||२१|| आलभेतासकृद्दीनः करेण च शिरोरुहान् | निर्यियासुरपद्वारैर्वीक्षते च पुनः पुनः ||२२|| वर्तते विपरीतं तु विषदाता विचेतनः |२३|
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Adhikarana 12 (23-24) · Śloka 24
কেচিদ্ভযাত্ পার্থিবস্য ত্বরিতা বা তদাজ্ঞযা ||২৩|| অসতামপি সন্তোঽপি চেষ্টাং কুর্বন্তি মানবাঃ | তস্মাত্ পরীক্ষণং কার্যং ভৃত্যানামাদৃতৈর্নৃপৈঃ ||২৪||
केचिद्भयात् पार्थिवस्य त्वरिता वा तदाज्ञया ||२३|| असतामपि सन्तोऽपि चेष्टां कुर्वन्ति मानवाः | तस्मात् परीक्षणं कार्यं भृत्यानामादृतैर्नृपैः ||२४||
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Adhikarana 13 (25-27) · Śloka 27
অন্নে পানে দন্তকাষ্ঠে তথাঽভ্যঙ্গেঽবলেখনে | উত্সাদনে কষাযে চ পরিষেকেঽনুলেপনে ||২৫|| স্রক্ষু বস্ত্রেষু শয্যাসু কবচাভরণেষু চ | পাদুকাপাদপীঠেষু পৃষ্ঠেষু গজবাজিনাম্ ||২৬|| বিষজুষ্টেষু চান্যেষু নস্যধূমাঞ্জনাদিষু | লক্ষণানি প্রবক্ষ্যামি চিকিত্সামপ্যনন্তরম্ ||২৭||
अन्ने पाने दन्तकाष्ठे तथाऽभ्यङ्गेऽवलेखने | उत्सादने कषाये च परिषेकेऽनुलेपने ||२५|| स्रक्षु वस्त्रेषु शय्यासु कवचाभरणेषु च | पादुकापादपीठेषु पृष्ठेषु गजवाजिनाम् ||२६|| विषजुष्टेषु चान्येषु नस्यधूमाञ्जनादिषु | लक्षणानि प्रवक्ष्यामि चिकित्सामप्यनन्तरम् ||२७||
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Adhikarana 14 (28-33) · Śloka 34
নৃপভক্তাদ্বলিং ন্যস্তং সবিষং ভক্ষযন্তি যে | তত্রৈব তে বিনশ্যন্তি মক্ষিকাবাযসাদযঃ ||২৮|| হুতভুক্ তেন চান্নেন ভৃশং চটচটাযতে | মযূরকণ্ঠপ্রতিমো জাযতে চাপি দুঃসহঃ ||২৯|| ভিন্নার্চিস্তীক্ষ্ণধূমশ্চ নচিরাচ্চোপশাম্যতি | চকোরস্যাক্ষিবৈরাগ্যং জাযতে ক্ষিপ্রমেব তু ||৩০|| দৃষ্ট্বাঽন্নং বিষসংসৃষ্টং ম্রিযন্তে জীবজীবকাঃ | কোকিলঃ স্বরবৈকৃত্যং ক্রৌঞ্চস্তু মদমৃচ্ছতি ||৩১|| হৃষ্যেন্মযূর উদ্বিগ্নঃ ক্রোশতঃ শুকসারিকে | হংসঃ ক্ষ্বেডতি চাত্যর্থং ভৃঙ্গরাজস্তু কূজতি ||৩২|| পৃষতো বিসৃজত্যশ্রুং বিষ্ঠাং মুঞ্চতি মর্কটঃ | সন্নিকৃষ্টাংস্ততঃ কুর্যাদ্রাজ্ঞস্তান্ মৃগপক্ষিণঃ ||৩৩|| বেশ্মনোঽথ বিভূষার্থং রক্ষার্থং চাত্মনঃ সদা |৩৪|
नृपभक्ताद्बलिं न्यस्तं सविषं भक्षयन्ति ये | तत्रैव ते विनश्यन्ति मक्षिकावायसादयः ||२८|| हुतभुक् तेन चान्नेन भृशं चटचटायते | मयूरकण्ठप्रतिमो जायते चापि दुःसहः ||२९|| भिन्नार्चिस्तीक्ष्णधूमश्च नचिराच्चोपशाम्यति | चकोरस्याक्षिवैराग्यं जायते क्षिप्रमेव तु ||३०|| दृष्ट्वाऽन्नं विषसंसृष्टं म्रियन्ते जीवजीवकाः | कोकिलः स्वरवैकृत्यं क्रौञ्चस्तु मदमृच्छति ||३१|| हृष्येन्मयूर उद्विग्नः क्रोशतः शुकसारिके | हंसः क्ष्वेडति चात्यर्थं भृङ्गराजस्तु कूजति ||३२|| पृषतो विसृजत्यश्रुं विष्ठां मुञ्चति मर्कटः | सन्निकृष्टांस्ततः कुर्याद्राज्ञस्तान् मृगपक्षिणः ||३३|| वेश्मनोऽथ विभूषार्थं रक्षार्थं चात्मनः सदा |३४|
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Adhikarana 15 (34-36) · Śloka 36
উপক্ষিপ্তস্য চান্নস্য বাষ্পেণোর্ধ্বং প্রসর্পতা ||৩৪|| হৃত্পীডা ভ্রান্তনেত্রত্বং শিরোদুঃখং চ জাযতে | তত্র নস্যাঞ্জনে কুষ্ঠং লামজ্জং নলদং মধু ||৩৫|| কুর্যাচ্ছিরীষরজনীচন্দনৈশ্চ প্রলেপনম্ | হৃদি চন্দনলেপস্তু তথা সুখমবাপ্নুযাত্ ||৩৬||
उपक्षिप्तस्य चान्नस्य बाष्पेणोर्ध्वं प्रसर्पता ||३४|| हृत्पीडा भ्रान्तनेत्रत्वं शिरोदुःखं च जायते | तत्र नस्याञ्जने कुष्ठं लामज्जं नलदं मधु ||३५|| कुर्याच्छिरीषरजनीचन्दनैश्च प्रलेपनम् | हृदि चन्दनलेपस्तु तथा सुखमवाप्नुयात् ||३६||
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Adhikarana 16 (37) · Śloka 37
পাণিপ্রাপ্তং পাণিদাহং নখশাতং করোতি চ | অত্র প্রলেপঃ শ্যামেন্দ্রগোপাসোমোত্পলানি চ ||৩৭||
पाणिप्राप्तं पाणिदाहं नखशातं करोति च | अत्र प्रलेपः श्यामेन्द्रगोपासोमोत्पलानि च ||३७||
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Adhikarana 17 (38-39) · Śloka 39
স চেত্ প্রমাদান্মোহাদ্বা তদন্নমুপসেবতে | অষ্ঠীলাবত্ততো জিহ্বা ভবত্যরসবেদিনী ||৩৮|| তুদ্যতে দহ্যতে চাপি শ্লেষ্মা চাস্যাত্ প্রসিচ্যতে | তত্র বাষ্পেরিতং কর্ম যচ্চ স্যাদ্দান্তকাষ্ঠিকম্ ||৩৯||
स चेत् प्रमादान्मोहाद्वा तदन्नमुपसेवते | अष्ठीलावत्ततो जिह्वा भवत्यरसवेदिनी ||३८|| तुद्यते दह्यते चापि श्लेष्मा चास्यात् प्रसिच्यते | तत्र बाष्पेरितं कर्म यच्च स्याद्दान्तकाष्ठिकम् ||३९||
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Adhikarana 18 (40-41) · Śloka 41
মূর্চ্ছাং ছর্দিমতীসারমাধ্মানং দাহবেপথূ | ইন্দ্রিযাণাং চ বৈকৃত্যং কুর্যাদামাশযং গতম্ ||৪০|| তত্রাশু মদনালাবুবিম্বীকোশাতকীফলৈঃ | ছর্দনং দধ্যুদশ্বিদ্ভ্যামথবা তণ্ডুলাম্বুনা ||৪১||
मूर्च्छां छर्दिमतीसारमाध्मानं दाहवेपथू | इन्द्रियाणां च वैकृत्यं कुर्यादामाशयं गतम् ||४०|| तत्राशु मदनालाबुबिम्बीकोशातकीफलैः | छर्दनं दध्युदश्विद्भ्यामथवा तण्डुलाम्बुना ||४१||
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Adhikarana 19 (42-43) · Śloka 43
দাহং মূর্চ্ছামতীসারং তৃষ্ণামিন্দ্রিযবৈকৃতম্ | আটোপং পাণ্ডুতাং কার্শ্যং কুর্যাত্ পক্বাশযং গতম্ ||৪২|| বিরেচনং সসর্পিষ্কং তত্রোক্তং নীলিনীফলম্ | দধ্না দূষীবিষারিশ্চ পেযো বা মধুসংযুতঃ ||৪৩||
दाहं मूर्च्छामतीसारं तृष्णामिन्द्रियवैकृतम् | आटोपं पाण्डुतां कार्श्यं कुर्यात् पक्वाशयं गतम् ||४२|| विरेचनं ससर्पिष्कं तत्रोक्तं नीलिनीफलम् | दध्ना दूषीविषारिश्च पेयो वा मधुसंयुतः ||४३||
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Adhikarana 20 (44-45) · Śloka 45
দ্রবদ্রব্যেষু সর্বেষু ক্ষীরমদ্যোদকাদিষু | ভবন্তি বিবিধা রাজ্যঃ ফেনবুদ্বুদজন্ম চ ||৪৪|| ছাযাশ্চাত্র ন দৃশ্যন্তে দৃশ্যন্তে যদি বা পুনঃ | ভবন্তি যমলাশ্ছিদ্রাস্তন্ব্যো বা বিকৃতাস্তথা ||৪৫||
द्रवद्रव्येषु सर्वेषु क्षीरमद्योदकादिषु | भवन्ति विविधा राज्यः फेनबुद्बुदजन्म च ||४४|| छायाश्चात्र न दृश्यन्ते दृश्यन्ते यदि वा पुनः | भवन्ति यमलाश्छिद्रास्तन्व्यो वा विकृतास्तथा ||४५||
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Adhikarana 21 (46-47) · Śloka 47
শাকসূপান্নমাংসানি ক্লিন্নানি বিরসানি চ | সদ্যঃ পর্যুষিতানীব বিগন্ধানি ভবন্তি চ ||৪৬|| গন্ধবর্ণরসৈর্হীনাঃ সর্বে ভক্ষ্যাঃ ফলানি চ | পক্বান্যাশু বিশীর্যন্তে পাকমামানি যান্তি চ ||৪৭||
शाकसूपान्नमांसानि क्लिन्नानि विरसानि च | सद्यः पर्युषितानीव विगन्धानि भवन्ति च ||४६|| गन्धवर्णरसैर्हीनाः सर्वे भक्ष्याः फलानि च | पक्वान्याशु विशीर्यन्ते पाकमामानि यान्ति च ||४७||
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Adhikarana 22 (48-50) · Śloka 50
বিশীর্যতে কূর্চকস্তু দন্তকাষ্ঠগতে বিষে | জিহ্বাদন্তৌষ্ঠমাংসানাং শ্বযথুশ্চোপজাযতে ||৪৮|| অথাস্য ধাতকীপুষ্পপথ্যাজম্বূফলাস্থিভিঃ | সক্ষৌদ্রৈঃ প্রচ্ছিতে শোফে কর্তব্যং প্রতিসারণম্ ||৪৯|| অথবাঽঙ্কোঠমূলানি ত্বচঃ সপ্তচ্ছদস্য বা | শিরীষমাষকা বাঽপি সক্ষৌদ্রাঃ প্রতিসারণম্ ||৫০||
विशीर्यते कूर्चकस्तु दन्तकाष्ठगते विषे | जिह्वादन्तौष्ठमांसानां श्वयथुश्चोपजायते ||४८|| अथास्य धातकीपुष्पपथ्याजम्बूफलास्थिभिः | सक्षौद्रैः प्रच्छिते शोफे कर्तव्यं प्रतिसारणम् ||४९|| अथवाऽङ्कोठमूलानि त्वचः सप्तच्छदस्य वा | शिरीषमाषका वाऽपि सक्षौद्राः प्रतिसारणम् ||५०||
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Adhikarana 23 (51) · Śloka 51
জিহ্বানির্লেখকবলৌ দন্তকাষ্ঠবদাদিশেত্ |৫১|
जिह्वानिर्लेखकवलौ दन्तकाष्ठवदादिशेत् |५१|
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Adhikarana 24 (51-54) · Śloka 54
পিচ্ছিলো বহুলোঽভ্যঙ্গো বিবর্ণো বা বিষান্বিতঃ ||৫১|| স্ফোটজন্মরুজাস্রাবত্বক্পাকঃ স্বেদনং জ্বরঃ | দরণং চাপি মাংসানামভ্যঙ্গে বিষসংযুতে ||৫২|| তত্র শীতাম্বুসিক্তস্য কর্তব্যমনুলেপনম্ | চন্দনং তগরং কুষ্ঠমুশীরং বেণুপত্রিকা ||৫৩|| সোমবল্ল্যমৃতা শ্বেতা পদ্মং কালীযকং ত্বচম্ | কপিত্থরসমূত্রাভ্যাং পানমেতচ্চ যুজ্যতে ||৫৪||
पिच्छिलो बहुलोऽभ्यङ्गो विवर्णो वा विषान्वितः ||५१|| स्फोटजन्मरुजास्रावत्वक्पाकः स्वेदनं ज्वरः | दरणं चापि मांसानामभ्यङ्गे विषसंयुते ||५२|| तत्र शीताम्बुसिक्तस्य कर्तव्यमनुलेपनम् | चन्दनं तगरं कुष्ठमुशीरं वेणुपत्रिका ||५३|| सोमवल्ल्यमृता श्वेता पद्मं कालीयकं त्वचम् | कपित्थरसमूत्राभ्यां पानमेतच्च युज्यते ||५४||
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Adhikarana 25 (55) · Śloka 55
উত্সাদনে পরীষেকে কষাযে চানুলেপনে | শয্যাবস্ত্রতনুত্রেষু জ্ঞেযমভ্যঙ্গলক্ষণৈঃ ||৫৫||
उत्सादने परीषेके कषाये चानुलेपने | शय्यावस्त्रतनुत्रेषु ज्ञेयमभ्यङ्गलक्षणैः ||५५||
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Adhikarana 26 (56-58) · Śloka 58
কেশশাতঃ শিরোদুঃখং খেভ্যশ্চ রুধিরাগমঃ | গ্রন্থিজন্মোত্তমাঙ্গেষু বিষজুষ্টেঽবলেখনে ||৫৬|| প্রলেপো বহুশস্তত্র ভাবিতাঃ কৃষ্ণমৃত্তিকাঃ | ঋষ্যপিত্তঘৃতশ্যামাপালিন্দীতণ্ডুলীযকৈঃ ||৫৭|| গোমযস্বরসো বাঽপি হিতো বা মালতীরসঃ | রসো মূষিকপর্ণ্যা বা ধূমো বাঽগারসম্ভবঃ ||৫৮||
केशशातः शिरोदुःखं खेभ्यश्च रुधिरागमः | ग्रन्थिजन्मोत्तमाङ्गेषु विषजुष्टेऽवलेखने ||५६|| प्रलेपो बहुशस्तत्र भाविताः कृष्णमृत्तिकाः | ऋष्यपित्तघृतश्यामापालिन्दीतण्डुलीयकैः ||५७|| गोमयस्वरसो वाऽपि हितो वा मालतीरसः | रसो मूषिकपर्ण्या वा धूमो वाऽगारसम्भवः ||५८||
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Adhikarana 27 (59) · Śloka 59
শিরোঽভ্যঙ্গঃ শিরস্ত্রাণং স্নানমুষ্ণীষমেব চ | স্রজশ্চ বিষসংসৃষ্টাঃ সাধযেদবলেখনাত্ ||৫৯||
शिरोऽभ्यङ्गः शिरस्त्राणं स्नानमुष्णीषमेव च | स्रजश्च विषसंसृष्टाः साधयेदवलेखनात् ||५९||
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Adhikarana 28 (60-61) · Śloka 61
মুখালেপে মুখং শ্যাবং যুক্তমভ্যঙ্গলক্ষণৈঃ | পদ্মিনীকণ্টকপ্রখ্যৈঃ কণ্টকৈশ্চোপচীযতে ||৬০|| তত্র ক্ষৌদ্রঘৃতং পানং প্রলেপশ্চন্দনং ঘৃতম্ | পযস্যা মধুকং ফঞ্জী বন্ধুজীবঃ পুনর্নবা ||৬১||
मुखालेपे मुखं श्यावं युक्तमभ्यङ्गलक्षणैः | पद्मिनीकण्टकप्रख्यैः कण्टकैश्चोपचीयते ||६०|| तत्र क्षौद्रघृतं पानं प्रलेपश्चन्दनं घृतम् | पयस्या मधुकं फञ्जी बन्धुजीवः पुनर्नवा ||६१||
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Adhikarana 29 (62) · Śloka 63
অস্বাস্থ্যং কুঞ্জরাদীনাং লালাস্রাবোঽক্ষিরক্ততা | স্ফিক্পাযুমেঢ্রমুষ্কেষু যাতুশ্চ স্ফোটসম্ভবঃ ||৬২|| তত্রাভ্যঙ্গবদেবেষ্টা যাতৃবাহনযোঃ ক্রিযা |৬৩|
अस्वास्थ्यं कुञ्जरादीनां लालास्रावोऽक्षिरक्तता | स्फिक्पायुमेढ्रमुष्केषु यातुश्च स्फोटसम्भवः ||६२|| तत्राभ्यङ्गवदेवेष्टा यातृवाहनयोः क्रिया |६३|
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Adhikarana 30 (63-64) · Śloka 65
শোণিতাগমনং খেভ্যঃ শিরোরুক্কফসংস্রবঃ ||৬৩|| নস্যধূমগতে লিঙ্গমিন্দ্রিযাণাং চ বৈকৃতম্ | তত্র দুগ্ধৈর্গবাদীনাং সর্পিঃ সাতিবিষৈঃ শৃতম্ ||৬৪|| পানে নস্যে চ সশ্বেতং হিতং সমদযন্তিকম্ |৬৫|
शोणितागमनं खेभ्यः शिरोरुक्कफसंस्रवः ||६३|| नस्यधूमगते लिङ्गमिन्द्रियाणां च वैकृतम् | तत्र दुग्धैर्गवादीनां सर्पिः सातिविषैः शृतम् ||६४|| पाने नस्ये च सश्वेतं हितं समदयन्तिकम् |६५|
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Adhikarana 31 (65-66) · Śloka 66
গন্ধহানির্বিবর্ণত্বং পুষ্পাণাং ম্লানতা ভবেত্ ||৬৫|| জিঘ্রতশ্চ শিরোদুঃখং বারিপূর্ণে চ লোচনে | তত্র বাষ্পেরিতং কর্ম মুখালেপে চ যত্ স্মৃতম্ ||৬৬||
गन्धहानिर्विवर्णत्वं पुष्पाणां म्लानता भवेत् ||६५|| जिघ्रतश्च शिरोदुःखं वारिपूर्णे च लोचने | तत्र बाष्पेरितं कर्म मुखालेपे च यत् स्मृतम् ||६६||
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Adhikarana 32 (67-68) · Śloka 68
কর্ণতৈলগতে শ্রোত্রবৈগুণ্যং শোফবেদনে | কর্ণস্রাবশ্চ তত্রাশু কর্তব্যং প্রতিপূরণম্ ||৬৭|| স্বরসো বহুপুত্রাযাঃ সঘৃতঃ ক্ষৌদ্রসংযুতঃ | সোমবল্করসশ্চাপি সুশীতো হিত ইষ্যতে ||৬৮||
कर्णतैलगते श्रोत्रवैगुण्यं शोफवेदने | कर्णस्रावश्च तत्राशु कर्तव्यं प्रतिपूरणम् ||६७|| स्वरसो बहुपुत्रायाः सघृतः क्षौद्रसंयुतः | सोमवल्करसश्चापि सुशीतो हित इष्यते ||६८||
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Adhikarana 33 (69-71) · Śloka 72
অশ্রূপদেহো দাহশ্চ বেদনা দৃষ্টিবিভ্রমঃ | অঞ্জনে বিষসংসৃষ্টে ভবেদান্ধ্যমথাপি চ ||৬৯|| তত্র সদ্যো ঘৃতং পেযং তর্পণং চ সমাগধম্ | অঞ্জনং মেষশৃঙ্গস্য নির্যাসো বরুণস্য চ ||৭০|| মুষ্ককস্যাজকর্ণস্য ফেনো গোপিত্তসংযুতঃ | কপিত্থমেষশৃঙ্গ্যোশ্চ পুষ্পং ভল্লাতকস্য বা ||৭১|| একৈকং কারযেত্ পুষ্পং বন্ধূকাঙ্কোটযোরপি |৭২|
अश्रूपदेहो दाहश्च वेदना दृष्टिविभ्रमः | अञ्जने विषसंसृष्टे भवेदान्ध्यमथापि च ||६९|| तत्र सद्यो घृतं पेयं तर्पणं च समागधम् | अञ्जनं मेषशृङ्गस्य निर्यासो वरुणस्य च ||७०|| मुष्ककस्याजकर्णस्य फेनो गोपित्तसंयुतः | कपित्थमेषशृङ्ग्योश्च पुष्पं भल्लातकस्य वा ||७१|| एकैकं कारयेत् पुष्पं बन्धूकाङ्कोटयोरपि |७२|
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Adhikarana 34 (72-73) · Śloka 73
শোফঃ স্রাবস্তথা স্বাপঃ পাদযোঃ স্ফোটজন্ম চ ||৭২|| ভবন্তি বিষজুষ্টাভ্যাং পাদুকাভ্যামসংশযম্ | উপানত্পাদপীঠানি পাদুকাবত্ প্রসাধযেত্ ||৭৩||
शोफः स्रावस्तथा स्वापः पादयोः स्फोटजन्म च ||७२|| भवन्ति विषजुष्टाभ्यां पादुकाभ्यामसंशयम् | उपानत्पादपीठानि पादुकावत् प्रसाधयेत् ||७३||
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Adhikarana 35 (74) · Śloka 75
ভূষণানি হতার্চীংষি ন বিভান্তি যথা পুরা | স্বানি স্থানানি হন্যুশ্চ দাহপাকাবদারণৈঃ ||৭৪|| পাদুকাভূষণেষূক্তমভ্যঙ্গবিধিমাচরেত্ |৭৫|
भूषणानि हतार्चींषि न विभान्ति यथा पुरा | स्वानि स्थानानि हन्युश्च दाहपाकावदारणैः ||७४|| पादुकाभूषणेषूक्तमभ्यङ्गविधिमाचरेत् |७५|
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Adhikarana 36 (75-78) · Śloka 79
বিষোপসর্গো বাষ্পাদির্ভূষণান্তো য ঈরিতঃ ||৭৫|| সমীক্ষ্যোপদ্রবাংস্তস্য বিদধীত চিকিত্সিতম্ | মহাসুগন্ধিমগদং যং প্রবক্ষ্যামি তং ভিষক্ ||৭৬|| পানালেপননস্যেষু বিদধীতাঞ্জনেষু চ | বিরেচনানি তীক্ষ্ণানি কুর্যাত্ প্রচ্ছর্দনানি চ ||৭৭|| সিরাশ্চ ব্যধযেত্ ক্ষিপ্রং প্রাপ্তং বিস্রাবণং যদি | মূষিকাঽজরুহা বাঽপি হস্তে বদ্ধা তু ভূপতেঃ ||৭৮|| করোতি নির্বিষং সর্বমন্নং বিষসমাযুতম্ |৭৯|
विषोपसर्गो बाष्पादिर्भूषणान्तो य ईरितः ||७५|| समीक्ष्योपद्रवांस्तस्य विदधीत चिकित्सितम् | महासुगन्धिमगदं यं प्रवक्ष्यामि तं भिषक् ||७६|| पानालेपननस्येषु विदधीताञ्जनेषु च | विरेचनानि तीक्ष्णानि कुर्यात् प्रच्छर्दनानि च ||७७|| सिराश्च व्यधयेत् क्षिप्रं प्राप्तं विस्रावणं यदि | मूषिकाऽजरुहा वाऽपि हस्ते बद्धा तु भूपतेः ||७८|| करोति निर्विषं सर्वमन्नं विषसमायुतम् |७९|
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Adhikarana 37 (79-81) · Śloka 81
হৃদযাবরণং নিত্যং কুর্যাচ্চ মিত্রমধ্যগঃ ||৭৯|| পিবেদ্ধৃতমজেযাখ্যমমৃতাখ্যং চ বুদ্ধিমান্ | সর্পির্দধি পযঃ ক্ষৌদ্রং পিবেদ্বা শীতলং জলম্ ||৮০|| মযূরান্নকুলান্ গোধাঃ পৃষতান্ হরিণানপি | সততং ভক্ষযেচ্চপি রসাংস্তেষাং পিবেদপি ||৮১||
हृदयावरणं नित्यं कुर्याच्च मित्रमध्यगः ||७९|| पिबेद्धृतमजेयाख्यममृताख्यं च बुद्धिमान् | सर्पिर्दधि पयः क्षौद्रं पिबेद्वा शीतलं जलम् ||८०|| मयूरान्नकुलान् गोधाः पृषतान् हरिणानपि | सततं भक्षयेच्चपि रसांस्तेषां पिबेदपि ||८१||
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Adhikarana 38 (82-84) · Śloka 84
গোধানকুলমাংসেষু হরিণস্য চ বুদ্ধিমান্ | দদ্যাত্ সুপিষ্টাং পালিন্দীং মধুকং শর্করাং তথা ||৮২|| শর্করাতিবিষে দেযে মাযূরে সমহৌষধে | পার্ষতে চাপি দেযাঃ স্যুঃ পিপ্পল্যঃ সমহৌষধাঃ ||৮৩|| সক্ষৌদ্রঃ সঘৃতশ্চৈব শিম্বীযূষো হিতঃ সদা | বিষঘ্নানি চ সেবেত ভক্ষ্যভোজ্যানি বুদ্ধিমান্ ||৮৪||
गोधानकुलमांसेषु हरिणस्य च बुद्धिमान् | दद्यात् सुपिष्टां पालिन्दीं मधुकं शर्करां तथा ||८२|| शर्करातिविषे देये मायूरे समहौषधे | पार्षते चापि देयाः स्युः पिप्पल्यः समहौषधाः ||८३|| सक्षौद्रः सघृतश्चैव शिम्बीयूषो हितः सदा | विषघ्नानि च सेवेत भक्ष्यभोज्यानि बुद्धिमान् ||८४||
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Adhikarana 39 (85) · Śloka 85
পিপ্পলীমধুকক্ষৌদ্রশর্করেক্ষুরসাম্বুভিঃ | ছর্দযেদ্গুপ্তহৃদযো ভক্ষিতং যদি বৈ বিষম্ ||৮৫||
पिप्पलीमधुकक्षौद्रशर्करेक्षुरसाम्बुभिः | छर्दयेद्गुप्तहृदयो भक्षितं यदि वै विषम् ||८५||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 1
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং কল্পস্থানেঽন্নপানরক্ষাকল্পো নাম প্রথমোঽধ্যাযঃ ||১||
इति सुश्रुतसंहितायां कल्पस्थानेऽन्नपानरक्षाकल्पो नाम प्रथमोऽध्यायः ||१||
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