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5. kuṣṭhanidānam

Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2

অথাতঃ কুষ্ঠনিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||

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अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||

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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3

মিথ্যাহারাচারস্য বিশেষাদ্গুরুবিরুদ্ধাসাত্ম্যাজীর্ণাহিতাশিনঃ স্নেহপীতস্য বান্তস্য বা ব্যাযামগ্রাম্যধর্মসেবিনো গ্রাম্যানূপৌদকমাংসানি বা পযসাঽভীক্ষ্ণমশ্নতো যো বা মজ্জত্যপ্সূষ্মাভিতপ্তঃ সহসা ছর্দিং বা প্রতিহন্তি, তস্য পিত্তশ্লেষ্মাণৌ প্রকুপিতৌ পরিগৃহ্যানিলঃ প্রবৃদ্ধস্তির্যগ্গাঃ সিরাঃ সম্প্রপদ্য সমুদ্ধূয বাহ্যং মার্গং প্রতি সমন্তাদ্বিক্ষিপতি, যত্র যত্র চ দোষো বিক্ষিপ্তো নিশ্চরতি তত্র তত্র মণ্ডলানি প্রাদুর্ভবন্তি, এবং সমুত্পন্নস্ত্বচি দোষস্তত্র তত্র চ পরিবৃদ্ধিং প্রাপ্যাপ্রতিক্রিযমাণোঽভ্যন্তরং প্রতিপদ্যতে ধাতূনভিদূষযন্ ||৩||

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मिथ्याहाराचारस्य विशेषाद्गुरुविरुद्धासात्म्याजीर्णाहिताशिनः स्नेहपीतस्य वान्तस्य वा व्यायामग्राम्यधर्मसेविनो ग्राम्यानूपौदकमांसानि वा पयसाऽभीक्ष्णमश्नतो यो वा मज्जत्यप्सूष्माभितप्तः सहसा छर्दिं वा प्रतिहन्ति, तस्य पित्तश्लेष्माणौ प्रकुपितौ परिगृह्यानिलः प्रवृद्धस्तिर्यग्गाः सिराः सम्प्रपद्य समुद्धूय बाह्यं मार्गं प्रति समन्ताद्विक्षिपति, यत्र यत्र च दोषो विक्षिप्तो निश्चरति तत्र तत्र मण्डलानि प्रादुर्भवन्ति, एवं समुत्पन्नस्त्वचि दोषस्तत्र तत्र च परिवृद्धिं प्राप्याप्रतिक्रियमाणोऽभ्यन्तरं प्रतिपद्यते धातूनभिदूषयन् ||३||

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Adhikarana 3 (4) · Śloka 4

তস্য পূর্বরূপাণি- ত্বক্পারুষ্যমকস্মাদ্রোমহর্ষঃ কণ্ডূঃ স্বেদবাহুল্যমস্বেদনং বাঽঙ্গপ্রদেশানাং স্বাপঃ ক্ষতবিসর্পণমসৃজঃ কৃষ্ণতা চেতি ||৪||

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तस्य पूर्वरूपाणि- त्वक्पारुष्यमकस्माद्रोमहर्षः कण्डूः स्वेदबाहुल्यमस्वेदनं वाऽङ्गप्रदेशानां स्वापः क्षतविसर्पणमसृजः कृष्णता चेति ||४||

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Adhikarana 4 (5) · Śloka 5

তত্র সপ্ত মহাকুষ্ঠানি, একাদশ ক্ষুদ্রকুষ্ঠানি, এবমষ্টাদশ কুষ্ঠানি ভবন্তি | তত্র মহাকুষ্ঠান্যরুণোদুম্বরর্ষ্য(র্ক্ষ)জিহ্বকপালকাকণকপুণ্ডরীকদদ্রুকুষ্ঠানীতি | ক্ষুদ্রকুষ্ঠান্যপি স্থূলারুষ্কং মহাকুষ্ঠমেককুষ্ঠং চর্মদলং বিসর্পঃ পরিসর্পঃ সিধ্মং বিচর্চিকা কিটিভং (মং) পামা রকসা চেতি ||৫||

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तत्र सप्त महाकुष्ठानि, एकादश क्षुद्रकुष्ठानि, एवमष्टादश कुष्ठानि भवन्ति | तत्र महाकुष्ठान्यरुणोदुम्बरर्ष्य(र्क्ष)जिह्वकपालकाकणकपुण्डरीकदद्रुकुष्ठानीति | क्षुद्रकुष्ठान्यपि स्थूलारुष्कं महाकुष्ठमेककुष्ठं चर्मदलं विसर्पः परिसर्पः सिध्मं विचर्चिका किटिभं (मं) पामा रकसा चेति ||५||

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Adhikarana 5 (6) · Śloka 6

সর্বাণি কুষ্ঠানি সবাতানি সপিত্তানি সশ্লেষ্মাণি সক্রিমীণি চ ভবন্তি, উত্সন্নতস্তু দোষগ্রহণমভিভবাত্ ||৬||

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सर्वाणि कुष्ठानि सवातानि सपित्तानि सश्लेष्माणि सक्रिमीणि च भवन्ति, उत्सन्नतस्तु दोषग्रहणमभिभवात् ||६||

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Adhikarana 6 (7) · Śloka 7

তত্র বাতেনারুণং, পিত্তেনোদুম্বরর্ষ্য(র্ক্ষ)জিহ্বকপালকাকণকানি, শ্লেষ্মণা পুণ্ডরীকং দদ্রুকুষ্ঠং চেতি | তেষাং মহত্ত্বং ক্রিযাগুরুত্বমুত্তরোত্তরং ধাত্বনুপ্রবেশাদসাধ্যত্বং চেতি ||৭||

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तत्र वातेनारुणं, पित्तेनोदुम्बरर्ष्य(र्क्ष)जिह्वकपालकाकणकानि, श्लेष्मणा पुण्डरीकं दद्रुकुष्ठं चेति | तेषां महत्त्वं क्रियागुरुत्वमुत्तरोत्तरं धात्वनुप्रवेशादसाध्यत्वं चेति ||७||

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Adhikarana 7 (8) · Śloka 8

তত্র, বাতেনারুণাভানি তনূনি বিসর্পীণি তোদভেদস্বাপযুক্তান্যরুণানি | পিত্তেন পক্বোদুম্বরফলাকৃতিবর্ণান্যৌদুম্বরাণি , ঋষ্য(ক্ষ)জিহ্বাপ্রকাশানি খরাণি ঋষ্য(ক্ষ)জিহ্বানি, কৃষ্ণকপালিকাপ্রকাশানি কপালকুষ্ঠানি, কাকণন্তিকাফলসদৃশান্যতীব রক্তকৃষ্ণানি কাকণকানি ; তেষাং চতুর্ণামপ্যোষচোষপরিদাহধূমাযনানি ক্ষিপ্রোত্থানপ্রপাকভেদিত্বানি ক্রিমিজন্ম চ সামান্যানি লিঙ্গানি | শ্লেষ্মণা পুণ্ডরীকপত্রপ্রকাশানি পৌণ্ডরীকাণি, অতসীপুষ্পবর্ণানি তাম্রাণি বা বিসর্পীণি পিডকাবন্তি চ দদ্রুকুষ্ঠানি; তযোর্দ্বযোরপ্যুত্সন্নতা পরিমণ্ডলতা কণ্ডূশ্চিরোত্থানত্বং চেতি সামান্যানি রূপাণি ||৮||

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तत्र, वातेनारुणाभानि तनूनि विसर्पीणि तोदभेदस्वापयुक्तान्यरुणानि | पित्तेन पक्वोदुम्बरफलाकृतिवर्णान्यौदुम्बराणि , ऋष्य(क्ष)जिह्वाप्रकाशानि खराणि ऋष्य(क्ष)जिह्वानि, कृष्णकपालिकाप्रकाशानि कपालकुष्ठानि, काकणन्तिकाफलसदृशान्यतीव रक्तकृष्णानि काकणकानि ; तेषां चतुर्णामप्योषचोषपरिदाहधूमायनानि क्षिप्रोत्थानप्रपाकभेदित्वानि क्रिमिजन्म च सामान्यानि लिङ्गानि | श्लेष्मणा पुण्डरीकपत्रप्रकाशानि पौण्डरीकाणि, अतसीपुष्पवर्णानि ताम्राणि वा विसर्पीणि पिडकावन्ति च दद्रुकुष्ठानि; तयोर्द्वयोरप्युत्सन्नता परिमण्डलता कण्डूश्चिरोत्थानत्वं चेति सामान्यानि रूपाणि ||८||

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Adhikarana 8 (9) · Śloka 9

ক্ষুদ্রকুষ্ঠান্যত ঊর্ধ্বং বক্ষ্যামঃ- স্থূলানি সন্ধিষ্বতিদারুণানি স্থূলারুষি স্যুঃ কঠিনান্যরূংষি |৯|

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क्षुद्रकुष्ठान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः- स्थूलानि सन्धिष्वतिदारुणानि स्थूलारुषि स्युः कठिनान्यरूंषि |९|

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Adhikarana 9 (9) · Śloka 9

ত্বক্কোচভেদস্বপনাঙ্গসাদাঃ কুষ্ঠে মহত্পূর্বযুতে ভবন্তি ||৯||

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त्वक्कोचभेदस्वपनाङ्गसादाः कुष्ठे महत्पूर्वयुते भवन्ति ||९||

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Adhikarana 10 (10) · Śloka 10

কৃষ্ণারুণং যেন ভবেচ্ছরীরং তদেককুষ্ঠং প্রবদন্তি কুষ্ঠম্ |১০|

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कृष्णारुणं येन भवेच्छरीरं तदेककुष्ठं प्रवदन्ति कुष्ठम् |१०|

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Adhikarana 11 (10) · Śloka 10

স্যুর্যেন কণ্ডূব্যথনৌষচোষাস্তলেষু তচ্চর্মদলং বদন্তি ||১০||

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स्युर्येन कण्डूव्यथनौषचोषास्तलेषु तच्चर्मदलं वदन्ति ||१०||

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Adhikarana 12 (11) · Śloka 11

বিসর্পবত্ সর্পতি সর্বতো যস্ত্বগ্রক্তমাংসান্যভিভূয শীঘ্রম্ | মূর্চ্ছাবিদাহারতিতোদপাকান্ কৃত্বা বিসর্পঃ স ভবেদ্বিকারঃ ||১১||

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विसर्पवत् सर्पति सर्वतो यस्त्वग्रक्तमांसान्यभिभूय शीघ्रम् | मूर्च्छाविदाहारतितोदपाकान् कृत्वा विसर्पः स भवेद्विकारः ||११||

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Adhikarana 13 (12) · Śloka 12

শনৈঃ শরীরে পিডকাঃ স্রবন্ত্যঃ সর্পন্তি যাস্তং পরিসর্পমাহুঃ |১২|

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शनैः शरीरे पिडकाः स्रवन्त्यः सर्पन्ति यास्तं परिसर्पमाहुः |१२|

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Adhikarana 14 (12) · Śloka 12

কণ্ড্বন্বিতং শ্বেতমপাযি সিধ্ম বিদ্যাত্তনু প্রাযশ ঊর্ধ্বকাযে ||১২||

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कण्ड्वन्वितं श्वेतमपायि सिध्म विद्यात्तनु प्रायश ऊर्ध्वकाये ||१२||

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Adhikarana 15 (13) · Śloka 13

রাজ্যোঽতিকণ্ড্বর্তিরুজঃ সরূক্ষা ভবন্তি গাত্রেষু বিচর্চিকাযাম্ | কণ্ডূমতী দাহরুজোপপন্না বিপাদিকা পাদগতেযমেব ||১৩||

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राज्योऽतिकण्ड्वर्तिरुजः सरूक्षा भवन्ति गात्रेषु विचर्चिकायाम् | कण्डूमती दाहरुजोपपन्ना विपादिका पादगतेयमेव ||१३||

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Adhikarana 16 (14) · Śloka 14

যত্ স্রাবি বৃত্তং ঘনমুগ্রকণ্ডু তত্ স্নিগ্ধকৃষ্ণং কিটিভং(মং) বদন্তি |১৪|

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यत् स्रावि वृत्तं घनमुग्रकण्डु तत् स्निग्धकृष्णं किटिभं(मं) वदन्ति |१४|

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Adhikarana 17 (14) · Śloka 15

সাস্রাবকণ্ডূপরিদাহকাভিঃ পামাঽণুকাভিঃ পিডকাভিরূহ্যা ||১৪|| স্ফোটৈঃ সদাহৈরতি সৈব কচ্ছূঃ স্ফিক্পাণিপাদপ্রভবৈর্নিরূপ্যা |১৫|

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सास्रावकण्डूपरिदाहकाभिः पामाऽणुकाभिः पिडकाभिरूह्या ||१४|| स्फोटैः सदाहैरति सैव कच्छूः स्फिक्पाणिपादप्रभवैर्निरूप्या |१५|

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Adhikarana 18 (15) · Śloka 15

কণ্ড্বন্বিতা যা পিডকা শরীরে সংস্রাবহীনা রকসোচ্যতে সা ||১৫||

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कण्ड्वन्विता या पिडका शरीरे संस्रावहीना रकसोच्यते सा ||१५||

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Adhikarana 19 (16) · Śloka 16

অরুঃ সসিধ্মং রকসা মহচ্চ যচ্চৈককুষ্ঠং কফজান্যমূনি | বাযোঃ প্রকোপাত্ পরিসর্পমেকং শেষাণি পিত্তপ্রভবাণি বিদ্যাত্ ||১৬||

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अरुः ससिध्मं रकसा महच्च यच्चैककुष्ठं कफजान्यमूनि | वायोः प्रकोपात् परिसर्पमेकं शेषाणि पित्तप्रभवाणि विद्यात् ||१६||

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Adhikarana 20 (17) · Śloka 17

কিলাসমপি কুষ্ঠবিকল্প এব; তত্ত্রিবিধং- বাতেন, পিত্তেন, শ্লেষ্মণা চেতি | কুষ্ঠকিলাসযোরন্তরং- ত্বগ্গতমেব কিলাসমপরিস্রাবি চ | তদ্বাতেন মণ্ডলমরুণং পরুষং পরিধ্বংসি চ, পিত্তেন পদ্মপত্রপ্রতীকাশং সপরিদাহং চ, শ্লেষ্মণা শ্বেতং স্নিগ্ধং বহলং কণ্ডূমচ্চ | তেষু সম্বদ্ধমণ্ডলমন্তেজাতং রক্তরোম চাসাধ্যমগ্নিদগ্ধং চ ||১৭||

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किलासमपि कुष्ठविकल्प एव; तत्त्रिविधं- वातेन, पित्तेन, श्लेष्मणा चेति | कुष्ठकिलासयोरन्तरं- त्वग्गतमेव किलासमपरिस्रावि च | तद्वातेन मण्डलमरुणं परुषं परिध्वंसि च, पित्तेन पद्मपत्रप्रतीकाशं सपरिदाहं च, श्लेष्मणा श्वेतं स्निग्धं बहलं कण्डूमच्च | तेषु सम्बद्धमण्डलमन्तेजातं रक्तरोम चासाध्यमग्निदग्धं च ||१७||

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Adhikarana 21 (18) · Śloka 18

কুষ্ঠেষু তু ত্বক্সঙ্কোচস্বাপস্বেদশোফভেদকৌণ্যস্বরোপঘাতা বাতেন, পাকাবদরণাঙ্গুলিপতনকর্ণনাসাভঙ্গাক্ষিরাগসত্ত্বোত্পত্তযঃ পিত্তেন, কণ্ডূবর্ণভেদশোফাস্রাবগৌরবাণি শ্লেষ্মণা ||১৮||

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कुष्ठेषु तु त्वक्सङ्कोचस्वापस्वेदशोफभेदकौण्यस्वरोपघाता वातेन, पाकावदरणाङ्गुलिपतनकर्णनासाभङ्गाक्षिरागसत्त्वोत्पत्तयः पित्तेन, कण्डूवर्णभेदशोफास्रावगौरवाणि श्लेष्मणा ||१८||

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Adhikarana 22 (19) · Śloka 19

তত্রাদিবলপ্রবৃত্তং পৌণ্ডরীকং কাকণং চাসাধ্যম্ ||১৯||

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तत्रादिबलप्रवृत्तं पौण्डरीकं काकणं चासाध्यम् ||१९||

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Adhikarana 23 (20-21) · Śloka 21

ভবন্তি চাত্র- যথা বনস্পতির্জাতঃ প্রাপ্য কালপ্রকর্ষণম্ | অন্তর্ভূমিং বিগাহেত মূলৈর্বৃষ্টিবিবর্ধিতৈঃ ||২০|| এবং কুষ্ঠং সমুত্পন্নং ত্বচি কালপ্রকর্ষতঃ | ক্রমেণ ধাতূন্ ব্যাপ্নোতি নরস্যাপ্রতিকারিণঃ ||২১||

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भवन्ति चात्र- यथा वनस्पतिर्जातः प्राप्य कालप्रकर्षणम् | अन्तर्भूमिं विगाहेत मूलैर्वृष्टिविवर्धितैः ||२०|| एवं कुष्ठं समुत्पन्नं त्वचि कालप्रकर्षतः | क्रमेण धातून् व्याप्नोति नरस्याप्रतिकारिणः ||२१||

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Adhikarana 24 (22-28) · Śloka 28

স্পর্শহানিঃ স্বেদনত্বমীষত্কণ্ডূশ্চ জাযতে | বৈবর্ণ্যং রূক্ষভাবশ্চ কুষ্ঠে ত্বচি সমাশ্রিতে ||২২|| ত্বক্স্বাপো রোমহর্ষশ্চ স্বেদস্যাভিপ্রবর্তনম্ | কণ্ডূর্বিপূযকশ্চৈব কুষ্ঠে শোণিতসংশ্রিতে ||২৩|| বাহুল্যং বক্রশোষশ্চ কার্কশ্যং পিডকোদ্গমঃ | তোদঃ স্ফোটঃ স্থিরত্বং চ কুষ্ঠে মাংসসমাশ্রিতে ||২৪|| দৌর্গন্ধ্যমুপদেহশ্চ পূযোঽথ ক্রিমযস্তথা | গাত্রাণাং ভেদনং চাপি কুষ্ঠে মেদঃসমাশ্রিতে ||২৫|| নাসাভঙ্গোঽক্ষিরাগশ্চ ক্ষতে চ ক্রিমিসম্ভবঃ | ভবেত্ স্বরোপঘাতশ্চ হ্যস্থিমজ্জসমাশ্রিতে ||২৬|| কৌণ্যং গতিক্ষযোঽঙ্গানাং সম্ভেদঃ ক্ষতসর্পণম্ | শুক্রস্থানগতে লিঙ্গং প্রাগুক্তানি তথৈব চ ||২৭|| স্ত্রীপুংসযোঃ কুষ্ঠদোষাদ্দুষ্টশোণিতশুক্রযোঃ | যদপত্যং তযোর্জাতং জ্ঞেযং তদপি কুষ্ঠিতম্ ||২৮||

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स्पर्शहानिः स्वेदनत्वमीषत्कण्डूश्च जायते | वैवर्ण्यं रूक्षभावश्च कुष्ठे त्वचि समाश्रिते ||२२|| त्वक्स्वापो रोमहर्षश्च स्वेदस्याभिप्रवर्तनम् | कण्डूर्विपूयकश्चैव कुष्ठे शोणितसंश्रिते ||२३|| बाहुल्यं वक्रशोषश्च कार्कश्यं पिडकोद्गमः | तोदः स्फोटः स्थिरत्वं च कुष्ठे मांससमाश्रिते ||२४|| दौर्गन्ध्यमुपदेहश्च पूयोऽथ क्रिमयस्तथा | गात्राणां भेदनं चापि कुष्ठे मेदःसमाश्रिते ||२५|| नासाभङ्गोऽक्षिरागश्च क्षते च क्रिमिसम्भवः | भवेत् स्वरोपघातश्च ह्यस्थिमज्जसमाश्रिते ||२६|| कौण्यं गतिक्षयोऽङ्गानां सम्भेदः क्षतसर्पणम् | शुक्रस्थानगते लिङ्गं प्रागुक्तानि तथैव च ||२७|| स्त्रीपुंसयोः कुष्ठदोषाद्दुष्टशोणितशुक्रयोः | यदपत्यं तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम् ||२८||

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Adhikarana 25 (29) · Śloka 29

কুষ্ঠমাত্মবতঃ সাধ্যং ত্বগ্রক্তপিশিতাশ্রিতম্ | মেদোগতং ভবেদ্যাপ্যমসাধ্যমত উত্তরম্ ||২৯||

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कुष्ठमात्मवतः साध्यं त्वग्रक्तपिशिताश्रितम् | मेदोगतं भवेद्याप्यमसाध्यमत उत्तरम् ||२९||

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Adhikarana 26 (30) · Śloka 30

ব্রহ্মস্ত্রীসজ্জনবধপরস্বহরণাদিভিঃ | কর্মভিঃ পাপরোগস্য প্রাহুঃ কুষ্ঠস্য সম্ভবম্ ||৩০||

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ब्रह्मस्त्रीसज्जनवधपरस्वहरणादिभिः | कर्मभिः पापरोगस्य प्राहुः कुष्ठस्य सम्भवम् ||३०||

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Adhikarana 27 (31-32) · Śloka 32

ম্রিযতে যদি কুষ্ঠেন পুনর্জাতেঽপি গচ্ছতি | নাতঃ কষ্টতরো রোগো যথা কুষ্ঠং প্রকীর্তিতম্ ||৩১|| আহারাচারযোঃ প্রোক্তামাস্থায মহতীং ক্রিযাম্ | ঔষধীনাং বিশিষ্টানাং তপসশ্চ নিষেবণাত্ | যস্তেন মুচ্যতে জন্তুঃ স পুণ্যাং গতিমাপ্নুযাত্ ||৩২||

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म्रियते यदि कुष्ठेन पुनर्जातेऽपि गच्छति | नातः कष्टतरो रोगो यथा कुष्ठं प्रकीर्तितम् ||३१|| आहाराचारयोः प्रोक्तामास्थाय महतीं क्रियाम् | औषधीनां विशिष्टानां तपसश्च निषेवणात् | यस्तेन मुच्यते जन्तुः स पुण्यां गतिमाप्नुयात् ||३२||

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Adhikarana 28 (33-34) · Śloka 34

প্রসঙ্গাদ্গাত্রসংস্পর্শান্নিশ্বাসাত্ সহভোজনাত্ | সহশয্যাসনাচ্চাপি বস্ত্রমাল্যানুলেপনাত্ ||৩৩|| কুষ্ঠং জ্বরশ্চ শোষশ্চ নেত্রাভিষ্যন্দ এব চ | ঔপসর্গিকরোগাশ্চ সঙ্ক্রামন্তি নরান্নরম্ ||৩৪||

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प्रसङ्गाद्गात्रसंस्पर्शान्निश्वासात् सहभोजनात् | सहशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ||३३|| कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च | औपसर्गिकरोगाश्च सङ्क्रामन्ति नरान्नरम् ||३४||

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Adhikarana puShpikA · Śloka 5

ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং নিদানস্থানে কুষ্ঠনিদানং নাম পঞ্চমোঽধ্যাযঃ ||৫||

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इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने कुष्ठनिदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ||५||

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