Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বিদ্রধীনাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
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अथातो विद्रधीनां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 1 (1-2) · Śloka 2
অথাতো বিদ্রধীনাং নিদানং ব্যাখ্যাস্যামঃ ||১|| যথোবাচ ভগবান্ ধন্বন্তরিঃ ||২||
अथातो विद्रधीनां निदानं व्याख्यास्यामः ||१|| यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ||२||
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Adhikarana 2 (3) · Śloka 3
সর্বামরগুরুঃ শ্রীমান্নিমিত্তান্তরভূমিপঃ | শিষ্যাযোবাচ নিখিলমিদং বিদ্রধিলক্ষণম্ ||৩||
सर्वामरगुरुः श्रीमान्निमित्तान्तरभूमिपः | शिष्यायोवाच निखिलमिदं विद्रधिलक्षणम् ||३||
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Adhikarana 3 (4-6) · Śloka 6
ত্বগ্রক্তমাংসমেদাংসি প্রদূষ্যাস্থিসমাশ্রিতাঃ | দোষাঃ শোফং শনৈর্ঘোরং জনযন্ত্যুচ্ছ্রিতা ভৃশম্ ||৪|| মহামূলং রুজাবন্তং বৃত্তং চা(বাঽ)প্যথবাঽঽযতম্ | তমাহুর্বিদ্রধিং ধীরা, বিজ্ঞেযঃ স চ ষড্বিধঃ ||৫|| পৃথগ্দোষৈঃ সমস্তৈশ্চ ক্ষতেনাপ্যসৃজা তথা | ষণ্ণামপি হি তেষাং তু লক্ষণং সম্প্রবক্ষ্যতে ||৬||
त्वग्रक्तमांसमेदांसि प्रदूष्यास्थिसमाश्रिताः | दोषाः शोफं शनैर्घोरं जनयन्त्युच्छ्रिता भृशम् ||४|| महामूलं रुजावन्तं वृत्तं चा(वाऽ)प्यथवाऽऽयतम् | तमाहुर्विद्रधिं धीरा, विज्ञेयः स च षड्विधः ||५|| पृथग्दोषैः समस्तैश्च क्षतेनाप्यसृजा तथा | षण्णामपि हि तेषां तु लक्षणं सम्प्रवक्ष्यते ||६||
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Adhikarana 4 (7) · Śloka 7
কৃষ্ণোঽরুণো বা পরুষো ভৃশমত্যর্থবেদনঃ | চিত্রোত্থানপ্রপাকশ্চ বিদ্রধির্বাতসম্ভবঃ ||৭||
कृष्णोऽरुणो वा परुषो भृशमत्यर्थवेदनः | चित्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिर्वातसम्भवः ||७||
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Adhikarana 5 (8) · Śloka 8
পক্বোদুম্বরসঙ্কাশঃ শ্যাবো বা জ্বরদাহবান্ | ক্ষিপ্রোত্থানপ্রপাকশ্চ বিদ্রধিঃ পিত্তসম্ভবঃ ||৮||
पक्वोदुम्बरसङ्काशः श्यावो वा ज्वरदाहवान् | क्षिप्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिः पित्तसम्भवः ||८||
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Adhikarana 6 (9) · Śloka 9
শরাবসদৃশঃ পাণ্ডুঃ শীতঃ স্তব্ধোঽল্পবেদনঃ | চিরোত্থানপ্রপাকশ্চ সকণ্ডুশ্চ কফোত্থিতঃ ||৯||
शरावसदृशः पाण्डुः शीतः स्तब्धोऽल्पवेदनः | चिरोत्थानप्रपाकश्च सकण्डुश्च कफोत्थितः ||९||
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Adhikarana 7 (10) · Śloka 10
তনুপীতসিতাশ্চৈষামাস্রাবাঃ ক্রমশঃ স্মৃতাঃ |১০|
तनुपीतसिताश्चैषामास्रावाः क्रमशः स्मृताः |१०|
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Adhikarana 8 (10) · Śloka 11
নানাবর্ণরুজাস্রাবো ঘাটালো বিষমো মহান্ ||১০|| বিষমং পচ্যতে চাপি বিদ্রধিঃ সান্নিপাতিকঃ |১১|
नानावर्णरुजास्रावो घाटालो विषमो महान् ||१०|| विषमं पच्यते चापि विद्रधिः सान्निपातिकः |११|
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Adhikarana 9 (11-12) · Śloka 13
তৈস্তৈর্ভাবৈরভিহতে ক্ষতে বাঽপথ্যসেবিনঃ ||১১|| ক্ষতোষ্মা বাযুবিসৃতঃ সরক্তং পিত্তমীরযেত্ | জ্বরস্তৃষ্ণা চ দাহশ্চ জাযতে তস্য দেহিনঃ ||১২|| এষ বিদ্রধিরাগন্তুঃ পিত্তবিদ্রধিলক্ষণঃ |১৩|
तैस्तैर्भावैरभिहते क्षते वाऽपथ्यसेविनः ||११|| क्षतोष्मा वायुविसृतः सरक्तं पित्तमीरयेत् | ज्वरस्तृष्णा च दाहश्च जायते तस्य देहिनः ||१२|| एष विद्रधिरागन्तुः पित्तविद्रधिलक्षणः |१३|
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Adhikarana 10 (13) · Śloka 14
কৃষ্ণস্ফোটাবৃতঃ শ্যাবস্তীব্রদাহরুজাজ্বরঃ ||১৩|| পিত্তবিদ্রধিলিঙ্গস্তু রক্তবিদ্রধিরুচ্যতে |১৪|
कृष्णस्फोटावृतः श्यावस्तीव्रदाहरुजाज्वरः ||१३|| पित्तविद्रधिलिङ्गस्तु रक्तविद्रधिरुच्यते |१४|
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Adhikarana 11 (14) · Śloka 14
উক্তা বিদ্রধযো হ্যেতে তেষ্বসাধ্যস্তু সর্বজঃ ||১৪||
उक्ता विद्रधयो ह्येते तेष्वसाध्यस्तु सर्वजः ||१४||
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Adhikarana 12 (15-18) · Śloka 19
আভ্যন্তরানতস্তূর্ধ্বং বিদ্রধীন্ পরিচক্ষতে | গুর্বসাত্ম্যবিরুদ্ধান্নশুষ্কসংসৃষ্টভোজনাত্ ||১৫|| অতিব্যবাযব্যাযামবেগাঘাতবিদাহিভিঃ | পৃথক্ সম্ভূয বা দোষাঃ কুপিতা গুল্মরূপিণম্ ||১৬|| বল্মীকবত্সমুন্নদ্ধমন্তঃ কুর্বন্তি বিদ্রধিম্ | গুদে বস্তিমুখে নাভ্যাং কুক্ষৌ বঙ্ক্ষণযোস্তথা ||১৭|| বৃক্কযোর্যকৃতি প্লীহ্নি হৃদযে ক্লোম্নি বা তথা | তেষাং লিঙ্গানি জানীযাদ্বাহ্যবিদ্রধিলক্ষণৈঃ ||১৮|| আমপক্বৈষণীযাচ্চ পক্বাপক্বং বিনির্দিশেত্ |১৯|
आभ्यन्तरानतस्तूर्ध्वं विद्रधीन् परिचक्षते | गुर्वसात्म्यविरुद्धान्नशुष्कसंसृष्टभोजनात् ||१५|| अतिव्यवायव्यायामवेगाघातविदाहिभिः | पृथक् सम्भूय वा दोषाः कुपिता गुल्मरूपिणम् ||१६|| वल्मीकवत्समुन्नद्धमन्तः कुर्वन्ति विद्रधिम् | गुदे बस्तिमुखे नाभ्यां कुक्षौ वङ्क्षणयोस्तथा ||१७|| वृक्कयोर्यकृति प्लीह्नि हृदये क्लोम्नि वा तथा | तेषां लिङ्गानि जानीयाद्बाह्यविद्रधिलक्षणैः ||१८|| आमपक्वैषणीयाच्च पक्वापक्वं विनिर्दिशेत् |१९|
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Adhikarana 13 (19-22) · Śloka 22
অধিষ্ঠানবিশেষেণ লিঙ্গং শৃণু বিশেষতঃ ||১৯|| গুদে বাতনিরোধস্তু বস্তৌ কৃচ্ছ্রাল্পমূত্রতা | নাভ্যাং হিক্কা তথাঽঽটোপঃ কুক্ষৌ মারুতকোপনম্ ||২০|| কটীপৃষ্ঠগ্রহস্তীব্রো বঙ্ক্ষণোত্থে তু বিদ্রধৌ | বৃক্কযোঃ পার্শ্বসঙ্কোচঃ প্লীহ্ন্যুচ্ছ্বাসাবরোধনম্ ||২১|| সর্বাঙ্গপ্রগ্রহস্তীব্রো হৃদি শূলশ্চ দারুণঃ | শ্বাসো যকৃতি তৃষ্ণা চ পিপাসাক্লোমজেঽধিকা ||২২||
अधिष्ठानविशेषेण लिङ्गं शृणु विशेषतः ||१९|| गुदे वातनिरोधस्तु बस्तौ कृच्छ्राल्पमूत्रता | नाभ्यां हिक्का तथाऽऽटोपः कुक्षौ मारुतकोपनम् ||२०|| कटीपृष्ठग्रहस्तीव्रो वङ्क्षणोत्थे तु विद्रधौ | वृक्कयोः पार्श्वसङ्कोचः प्लीह्न्युच्छ्वासावरोधनम् ||२१|| सर्वाङ्गप्रग्रहस्तीव्रो हृदि शूलश्च दारुणः | श्वासो यकृति तृष्णा च पिपासाक्लोमजेऽधिका ||२२||
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Adhikarana 14 (23) · Śloka 23
আমো বা যদি বা পক্বো মহান্ বা যদি বেতরঃ | সর্বো মর্মোত্থিতশ্চাপি বিদ্রধিঃ কষ্ট উচ্যতে ||২৩||
आमो वा यदि वा पक्वो महान् वा यदि वेतरः | सर्वो मर्मोत्थितश्चापि विद्रधिः कष्ट उच्यते ||२३||
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Adhikarana 15 (24-25) · Śloka 25
নাভেরুপরিজাঃ পক্বা যান্ত্যূর্ধ্বমিতরে ত্বধঃ | জীবত্যধো নিঃস্রুতেষু স্রুতেষূর্ধ্বং ন জীবতি ||২৪|| হৃন্নাভিবস্তিবর্জ্যা যে তেষু ভিন্নেষু বাহ্যতঃ | জীবেত্ কদাচিত্ পুরুষো নেতরেষু কদাচন ||২৫||
नाभेरुपरिजाः पक्वा यान्त्यूर्ध्वमितरे त्वधः | जीवत्यधो निःस्रुतेषु स्रुतेषूर्ध्वं न जीवति ||२४|| हृन्नाभिबस्तिवर्ज्या ये तेषु भिन्नेषु बाह्यतः | जीवेत् कदाचित् पुरुषो नेतरेषु कदाचन ||२५||
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Adhikarana 16 (26) · Śloka 26
স্ত্রীণামপপ্রজাতানাং প্রজাতানাং তথাঽহিতৈঃ | দাহজ্বরকরো ঘোরো জাযতে রক্তবিদ্রধিঃ ||২৬||
स्त्रीणामपप्रजातानां प्रजातानां तथाऽहितैः | दाहज्वरकरो घोरो जायते रक्तविद्रधिः ||२६||
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Adhikarana 17 (27) · Śloka 28
অপি সম্যক্প্রজাতানামসৃক্ কাযাদনিঃসৃতম্ | রক্তজং বিদ্রধিং কুর্যাত্ কুক্ষৌ মক্কল্লসঞ্জ্ঞিতম্ ||২৭|| সপ্তাহান্নোপশান্তশ্চেত্ততোঽসৌ সম্প্রপচ্যতে |২৮|
अपि सम्यक्प्रजातानामसृक् कायादनिःसृतम् | रक्तजं विद्रधिं कुर्यात् कुक्षौ मक्कल्लसञ्ज्ञितम् ||२७|| सप्ताहान्नोपशान्तश्चेत्ततोऽसौ सम्प्रपच्यते |२८|
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Adhikarana 18 (28-33) · Śloka 33
বিশেষমথ বক্ষ্যামি স্পষ্টং বিদ্রধিগুল্মযোঃ ||২৮|| গুল্মদোষসমুত্থানাদ্বিদ্রধের্গুল্মকস্য চ | কস্মান্ন পচ্যতে গুল্মো বিদ্রধিঃ পাকমেতি চ ||২৯|| ন নিবন্ধোঽস্তি গুল্মানাং বিদ্রধিঃ সনিবন্ধনঃ | গুল্মাকারাঃ স্বযং দোষা বিদ্রধির্মাংসশোণিতে ||৩০|| বিবরানুচরো গ্রন্থিরপ্সু বুদ্বুদকো যথা | এবম্প্রকারো গুল্মস্তু তস্মাত্ পাকং ন গচ্ছতি ||৩১|| মাংসশোণিতবাহুল্যাত্ পাকং গচ্ছতি বিদ্রধিঃ | মাংসশোণিতহীনত্বাদ্গুল্মঃ পাকং ন গচ্ছতি ||৩২|| গুল্মস্তিষ্ঠতি দোষে স্বে বিদ্রধির্মাংসশোণিতে | বিদ্রধিঃ পচ্যতে তস্মাদ্গুল্মশ্চাপি ন পচ্যতে ||৩৩||
विशेषमथ वक्ष्यामि स्पष्टं विद्रधिगुल्मयोः ||२८|| गुल्मदोषसमुत्थानाद्विद्रधेर्गुल्मकस्य च | कस्मान्न पच्यते गुल्मो विद्रधिः पाकमेति च ||२९|| न निबन्धोऽस्ति गुल्मानां विद्रधिः सनिबन्धनः | गुल्माकाराः स्वयं दोषा विद्रधिर्मांसशोणिते ||३०|| विवरानुचरो ग्रन्थिरप्सु बुद्बुदको यथा | एवम्प्रकारो गुल्मस्तु तस्मात् पाकं न गच्छति ||३१|| मांसशोणितबाहुल्यात् पाकं गच्छति विद्रधिः | मांसशोणितहीनत्वाद्गुल्मः पाकं न गच्छति ||३२|| गुल्मस्तिष्ठति दोषे स्वे विद्रधिर्मांसशोणिते | विद्रधिः पच्यते तस्माद्गुल्मश्चापि न पच्यते ||३३||
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Adhikarana 19 (34) · Śloka 34
হৃন্নাভিবস্তিজঃ পক্বো বর্জ্যো যশ্চ ত্রিদোষজঃ |৩৪|
हृन्नाभिबस्तिजः पक्वो वर्ज्यो यश्च त्रिदोषजः |३४|
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Adhikarana 20 (34-38) · Śloka 38
অথ মজ্জপরীপাকো ঘোরঃ সমুপজাযতে ||৩৪|| সোঽস্থিমাংসনিরোধেন দ্বারং ন লভতে যদা | ততঃ স ব্যাধিনা তেন জ্বলনেনেব দহ্যতে ||৩৫|| অস্থি(থ) মজ্জোষ্মণা তেন শীর্যতে দহ্যমানবত্ | বিকারঃ শল্যভূতোঽযং ক্লেশযেদাতুরং চিরম্ ||৩৬|| অথাস্য কর্মণা ব্যাধির্দ্বারং তু লভতে যদা | ততো মেদঃপ্রভং স্নিগ্ধং শুক্লং শীতমথো গুরু ||৩৭|| ভিন্নেঽস্থ্নি নিঃস্রবেত্ পূযমেতদস্থিগতং বিদুঃ | বিদ্রধিং শাস্ত্রকুশলাঃ সর্বদোষরুজাবহম্ ||৩৮||
अथ मज्जपरीपाको घोरः समुपजायते ||३४|| सोऽस्थिमांसनिरोधेन द्वारं न लभते यदा | ततः स व्याधिना तेन ज्वलनेनेव दह्यते ||३५|| अस्थि(थ) मज्जोष्मणा तेन शीर्यते दह्यमानवत् | विकारः शल्यभूतोऽयं क्लेशयेदातुरं चिरम् ||३६|| अथास्य कर्मणा व्याधिर्द्वारं तु लभते यदा | ततो मेदःप्रभं स्निग्धं शुक्लं शीतमथो गुरु ||३७|| भिन्नेऽस्थ्नि निःस्रवेत् पूयमेतदस्थिगतं विदुः | विद्रधिं शास्त्रकुशलाः सर्वदोषरुजावहम् ||३८||
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Adhikarana puShpikA · Śloka 9
ইতি সুশ্রুতসংহিতাযাং নিদানস্থানে বিদ্রধিনিদানং নাম নবমোঽধ্যাযঃ ||৯||
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने विद्रधिनिदानं नाम नवमोऽध्यायः ||९||
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